रविवारीय भोजन गाथा

रविवार, जुलाई 14, 2019

2000-2002 दिल्ली युग

हम कालकाजी में अलकनंदा अपार्टमेंट्स के पास एक 1 BHK फ्लैट में छह मित्रो के साथ रहते थे। इनमें से तीन कमाने वाले तीन नौकरी की तलाश में लगे थे। रहने, खाने और बेरोजगार दोस्तो की नौकरी तलाश का खर्च कमाने वाले ही सम्हालते थे।

एक मेड रखी थी जो सुबह नाश्ता, दोपहर का खाना और शाम को रात का खाना बनाने के साथ बर्तन, और घर की सफाई कर जाती थी।

समस्या यह थी कि वह रविवार को छूट्टी लेती थी। उस अपार्टमेंट में हमारे आविर्भाव से पहले रविवार को खाना बनाना का काम अरविंद लाल के पास था, बाकी बर्तन धोने का काम करते थे।

अरविंद लाल का खाना बनाना बड़ी नफासत का काम था। पूरी फुरसत में नफासत से सब्जी काटेगा, क्या मजाल की सब्जी के दो टूकड़ो का आकार अलग हो। उसके बाद धीमी आंच में खाना पकाएगा। धीमी आंच में प्याज भूनेगा, नापकर तेल मसाले डालेगा, प्यार से चम्मच चलाएगा। छह व्यक्ति के लिए दाल, चावल, सब्जी बनाने में तीन से चार घण्टे लगते थे। ऊपर से तुर्रा यह कि उन्हें खाना बनाने में किसी का दखल बर्दाश्त नही। कहता था कि मैं दिल से खाना बनाता हूँ।

हम पहुंचे तो पहले रविवार को 12 बजे तक खाना बनने का इंतजार करना पड़ा। लाल साहब आठ बजे से किचन में घुसे हुए थे। हमे बैचेन देख राजेश ने बोला कि चिंता मत कर लाल खाना अच्छा बनाता है। खैर खाना मस्त था, लपेट कर खाया गया।

ऐसा तीन चार सप्ताह चला। उसके बाद हमारा धैर्य चूक गया। एक शनिवार की शाम हमने लाल साहब को बोला कि कल खाना हम बनाएंगे। लाल साहब का हम पर भरोसा नही था। राजेश मेरे साथ कालेज में भी पढ़ा था, कॉलेज के दिनों में उसने मेरे बनाया खाना भी खूब खाया था। उसने अब लाल को कहा कि एक बार इसके हाथ का खाना खा कर देख ले। लाल कुनमुनाते हुए माने।

दूसरे दिन हम आठ बजे उठे। नहा धोकर सब्जी लाने गए। नौ बजे वापस आये। उसके बाद मटरगस्ती के लिए निकले। लाल साहब परेशान खाना कब बनाएगा। हमने लाल को कहा टेंशन मत ले 12 बजे तक खाना बन जायेगा।

साढ़े दस बजे वापिस आये और किचन में घुसे। लाल के लिए 'नो एंट्री' का बोर्ड लगाया।

बारह बजे तक रोटी, दाल, चावल, सब्जी और सलाद तैयार था। सबको ख़ाने के लिए बुलाया। लाल साहब चौंक गए, इतनी जल्दी खाना कैसे बन गया। किचन में देखा, दाल, रोटी सलाद भी था। चावल, सब्जी की मात्रा देखी तो बोले कि सारा मोहल्ले को न्योता है क्या ?

हम और राजेश मुसकराये। खाना शुरू हुआ। आम दिनों से लगभग दुगुना खाना सफाचट हो गया था।

इसके बाद लाल साहब का नाम भी बर्तन साफ करने वालो में आ गया था।

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दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 3 रामेश्वरम

गुरुवार, मई 23, 2019

कन्याकुमारी मे सूर्यास्त के पश्चात हम रामेश्वरम की ओर रवाना हुये। दूरी 310 किमी है और गूगल महाराज ने कहा था कि पांच घंटे लगेंगे। अब तक हम गूगलदेव के समय से कम समय मे ही लक्ष्य तक पहुंच जा रहे थे। लेकिन अब रास्ते मे अंतर था। बैंगलोर-मदुरै-कन्याकुमारी का रास्ता हमने अधिकतर 4 लेन, और कुछ भागो मे 6 लेन वाले रास्ते से किया था। कन्याकुमारी से रामेश्वरम का रास्ता अच्छा है लेकिन दो लेन वाली बिना डीवाईडर की सिंगल सड़क है, गति हम होनी थी।

नाश्ता


कन्याकुमारी से ईस्ट कोस्ट रोड पर आने के बाद गति कम हो गई थी लेकिन 60-80 किमी/घंटा की गति मिल रही थी। सुबह केवल चाय पीकर निकले थे, साढ़े नौ बजे तक भूख लगने लगी थी। सड़क किनारे एक छोटे रेस्तरां मे रूके। नाश्ते के लिये पुछा, पोंगल, इडली और दोसा उपलब्ध था। हमने अपने लिये पोंगल, गार्गी और निवेदिता के लिये इडली मंगवाई। केले के पत्तो मे उन्होने पोगल और इडली परोसी, उपर से सांभर और चटनी डाल दी। कटोरी चम्मच फ़िर से नदारद। उन्होने साथ मे स्वयं ही केले के पत्तो को कचरे के डिब्बे डालने का  निर्देश दे दिया था। नाश्ता किया, सादा पानी पिया और वापस सड़क पर आ गये।

रास्ते मे


अब रास्ते मे एक अजीब नजारा दिखा। बहुत सी महिलाये तेज धूप मे चार पांच घड़ो को एक दुपहीया वाहन पर लाद कर पानी ढोते दिखी। यह नजारा पूरे पचास किलोमीटर के रास्ते मे दिखा। सड़क के किनारे तालाब, बावड़ीया और नाले दिख तो रहे थे लेकिन सूखे। रास्ते मे नमक के खेत भी दिखे। अधिक जानकारी लेने पर पता चला कि ये सारा रास्ता सड़क से अधिकतम एक से दो किमी दूर पर है। साफ़ पानी की कमी है। अधिकतर भूजल बहुत नीचे चला गया है, कुंये सूख चुके है और बोरवेलो मे 200-300 फ़ीट के बाद बमुश्किल पानी मिलता है।

लगभग 11:30 के आस पास हम रामेश्वरम द्वीप के मुहाने पर पहुंचे। जब हम पंबन पुल से गुजर रहे थे तो नीचे वाले ट्रेन ट्रेक से एक रेल भी जा रही थी। खूबसूरत नजारा था।

रास्ते मे अब्दुल कलाम मेमोरीयल दिखा, ये हाल ही मे बना मेमोरीयल है। इस मेमोरीयल को पार करने पर रामेश्वर नगर परिषद हर बाहर से आने वाले वाहनो से 30 रूपये शुल्क ले रही थी। रामेश्वरम प्लास्टीक फ़्री शहर है।

रामेश्वरम के अंदर आते ही गति कम हो गई। रास्तो पर पर्यटक वाहन , बसो की भरमार थी। हमारा होटल रामानाथस्वामी मंदिर के पास ही थी लेकिन 12 बज रहे थे। हमे पता था कि मंदिर बंद हो गया होगा और शाम को चार बजे ही खुलेगा। होटल पहुंचे, सामान रखा और हाथ मुंह धोकर तरोताजा हुये। भूख लग आई थी, बाहर ही एक उत्तर भारतीय रेस्तरां दिखा। तीनो के लिये उत्तर भारतीय थाली का आर्डर दिया। गरमागरम रोटीयों का सब्जी, दाल, कढ़ी और अचार के साथ भोग लगाया गया।

रामानाथस्वामी मंदिर चार बजे खुलने वाला था तो सोचा कि रामेश्वर के बाकी आकर्षण पहले घूम लेते है। उसके बाद रामानाथस्वामी मंदिर। समय बचा तो धनुषकोटि और उसके पश्चात अब्दुल कलाम मेमोरीयल जायेंगे। रामेश्वरम मे कार से घुमना आसान नही है इसलिये एक आटोरिक्शा कर लिया, उसने 300 रूपये मे सारे स्थान घुमा देने की कही।

गंधामाथाना पर्वत


सबसे पहले हम गंधामाथाना पर्वत पहुंचे, यह  एक छोटा सा शिखर है जो श्री रंगनाथस्‍वामी मंदिर के उत्‍तर में स्थित है। यह मंदिर पैदल दूरी पर 3 किमी. की दूरी पर स्थित है और इसे रामेश्‍वरम का सबसे ऊंचा प्‍वाइंट माना जाता है। गंधामाथाना पर्वतम के रास्‍ते पर एक हॉल है जिसमें दो मंजिले है, इस कक्ष में आप भगवान राम के पैरों की खडाऊ के चिन्‍ह् देख सकते है। इसके अलावा, इस पर्वत के रास्‍ते पर एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है, पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह मंदिर उसी स्‍थान पर बना है जहां रावण के हरण करने पर माता सीता ने अपना गहना गिराया था। पर्यटक इस शिखर पर जाना इसलिए भी पसंद करते है क्‍योंकि यहां से रामेश्‍वरम द्वीप का दृश्‍य बेहद शानदार नजर आता है। यहां से आप समुद्र के नीले चमकते पानी को भी देख सकते है। यह वास्‍तव में अनोखी जगह है।

साक्षी हनुमान मंदिर

अगला पड़ाव साक्षी हनुमान मंदिर था, श्री रामनाथेश्‍वर मंदिर से 3 किमी. की दूरी पर स्थित है जो गंधामथाना पर्वथम के रास्‍ते पर पड़ता है। किंवदंतियों के अनुसार, हनुमान जी ने भगवान राम को सूचना दी थी कि माता सीता, रावण के कब्‍जे में है। उन्‍होने इस सूचना को साक्ष्‍य के साथ प्रस्‍तुत किया था, साक्ष्‍य के रूप में उन्‍होने माता सीता की अंगूठी दिखाई थी। ऐसा भी माना जाता है कि इसी स्‍थान पर भगवान राम अपनी पत्‍नी को याद करके रोए थे। हनुमान जी को भगवान राम का भक्‍त माना जाता है। भगवान राम और हनुमान के भक्‍त, इस मंदिर में हर साल दर्शन करने आते है। कई तीर्थयात्री, गांधामथान पर्वतम जाने के रास्‍ते में यहां दर्शन आते है।

विलुंदी तीर्थम 


इसके बाद हम  विलुंदी तीर्थम पहुंचे, 24 मुख्‍य तीर्थमों में से एक है जो हिंदू धर्म में प्रमुख माने जाते है। यह तीर्थम उस दौरान बना था, जब भगवान राम ने अपनी पत्‍नी सीता की प्‍यास बुझाने के लिए समुद्र में तीर मारा था। तीर चलाने के फलस्‍वरूप, समुद्र से पीने योग्‍य पानी की एक धारा निकली थी। हर वर्ष, इस तीर्थम की यात्रा करने सैकड़ों भक्‍त आते है और इसमें स्‍नान करके अपने पाप धुलने की कोशिश करते है। यह तीर्थम, पंबन के नजदीक एक गांव थागाचिमदम में स्थित है। धार्मिक महत्‍व के अलावा, यह जल स्‍त्रोत, स्‍थानीय लोगों के लिए पीने योग्‍य पानी भी प्रदान करता है। स्‍थानीय लोगों के लिए पीने के पानी का प्रबंन करने की दृष्टि से 1979 में यहां एक निर्माण भी करवाया गया था। हालांकि, वर्तमान में यह संरचना टूट चुकी है क्‍योंकि यहां ही हवा में भी नमक की मात्रा बहुत ज्‍यादा है। सरकार ने कई और संरचनाओं को बनाने का प्रयास भी किया है।

पंच - मुखी हनुमान


इसके पश्चात हम पंच - मुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। यह श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम, माता सीता और भक्‍त हनुमान की मूर्ति स्थित है। इस सभी मूर्तियों को धनुषकोडी से लाया गया था, 1964 के दौरान ये सभी मूर्तियां धनुषकोडी गांव में आएं साइक्‍लोन में नष्‍ट हो गई थी।  यही कारण है कि पूरे देश से भक्‍त यहां दर्शन करने आते है। इस मंदिर की अन्‍य विशेषता यह है कि इस मंदिर के बाहर बहुत से तैरता हुआ पत्‍थर भी रखे  है। यह पत्‍थर रामसेतू पुल का हिस्‍सा माना जाता है जिसे हनुमान जी और उनकी वानर सेना के द्वारा बनाया गया था। इस पुल की सहायता से ही भगवान राम लंका तक पहुंचे थे और माता सीता को रावण की कैद से छुड़ा पाएं थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर में हनुमान जी ने अपने पंच मुख के दर्शन करवाएं थे। हनुमान जी को इस मंदिर में भगवान राम के द्वारा सिंदुर से लेप भी लगाया गया था।

इसी मंदिर परिसर मे हमने रामसेतु का एक पत्थर भी खरीदा।

रामानाथस्वामी मंदिर 

इन सारी जगहो के घुमने तक चार बज गये थे तो हम मुख्य मंदिर रामानाथस्वामी मंदिर पहुंचे। मंदिर मे अधिक भीड़ नही थी। हम लोगो का इस मंदिर मे कुंडो मे स्नान का भी इरादा नही था। मंदिर मे मूर्ती के दर्शन किये। यह मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्‍योर्तिलिंगों में से एक है। इसे सभी मंदिरों में भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति पूजा नहीं होती है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि इस मंदिर की स्‍थापना पांडवों ने की थी, लेकिन वर्तमान मंदिर लगभग 12 वीं सदी में स्‍थापित किया गया था। इस मंदिर की स्‍थापत्‍य कला काफी प्राचीन है जो इसे संगमरमर से बनाया गया है। हर साल लाखों की संख्‍या में भक्‍त इस मंदिर में दर्शन करने आते है।

मंदिर से बाहर आते आते पांच बज गये थे। गर्मीयों के दिन है, सूर्यास्त देर से होता है, तो सोचा कि दो घंटे मे धनुषकोटि से आ जायेंगे। होटल से कार उठाई और धनुषकोटि की ओर चल दिये। लेकिन रामेश्वरम से बाहर निकलते ही पुलिस वालो ने रोका और कहा कि पांच बजे के पश्चात धनुषकोटि मे पर्यटक नही जा सकते है। उन्होने दूसरे दिन सुबह छ: बजे आने कहा।

अब्दुल कलाम मेमोरीयल 


हमने सोचा कि अब्दुल कलाम मेमोरीयल चलते है जोकि छ: बजे तक खुला रहता है। इस स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की समाधि है। मेमोरियल अच्छा बनाया गया है। अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी चीजों और राकेटो, मिसाइलो के माडल रखे हुये है। प्रवेश निशुल्क है। हम छ: बजे तक मेमोरीयल मे घुमते रहे है गार्गी को राकेट, मिसाईल की जानकारी देते रहे।

हम सब पूरे दिन की आवारागर्दी से थक गये थे। वापस होटल पहुंचे। सारे दिन मंदिर देखते देखते हालत यह हो गई थी कि मैने होटल के सामने भी चप्पल उतार दी थी। गार्गी ने चप्पल के लिये याद दिलाया कि पापा ये मंदिर नही है। दोबारा स्नान किया और बाहर खाना खाने निकले। खाना खाकर सो गये।

सुबह छ: बजे उठे। होटल से चेक आउट किया। और धनुषकोटि की ओर चल दिये।

कोथानदारामार मंदिर 

रास्ते मे कोथानदारामार मंदिर है। सबसे पहले वहीं पर रूके। यह मंदिर उस स्‍थान पर बना है जहां भगवान राम ने रावण के वध के बाद विभीषण को लंका का राजा बना दिया था। इस मंदिर को सेतुसमुद्रम शिप कैनाल परियोजना के बाहर रखा गया, ताकि इसका अस्तित्‍व खतरे में न आएं। यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों से हमेशा भरा रहता है जिसके कारण स्‍थानीय मछुआरों को काफी लाभ मिलता है और वह अपनी मछलियां बेच पाते है।  वर्तमान में, इस मंदिर की देखभाल श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के प्रशासन के द्वारा किया जाता है क्‍योंकि यह मंदिर श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के 31 उप - मंदिरों में से एक है।

धनुषकोडी 



इसके बाद हम धनुषकोडी पहुंचे। धनुषकोडी एक गांव है ( वर्तमान में यह एक महत्‍वपूर्ण गांव है ) जो रामेश्‍वरम द्वीप पर स्थित है। यह गांव, द्वीप के दक्षिणोत्‍तर हिस्‍से के पूर्वी भाग में स्थित है। यह गांव, श्रीलंका में स्थित तलाईमन्‍नार से 31 किमी. की दूरी पर स्थित है। किवंदंतियों के अनुसार, विभीषण, रावण के भाई ने इसी स्‍थान पर भगवान राम से सेतू तोड़ने के लिए कहा था और भगवान राम ने एक ही बाण से सेतू को तोड़ दिया था। इसीकारण, इस स्‍थान का नाम धनुषकोड़ी रखा गया। वास्‍तव में, आज भी यहां पुल की एक रेखा देखी जा सकती है जिसके बारे में मानना है कि इसे भगवान राम ने वानर सेना के साथ मिलकर बनाया था।  इस स्थान पर सागर एक दम साफ़ है, बीच का पानी और रेत इतनी साफ़ है कि आस्ट्रेलिया, न्युजीलैंड के बीच याद आ जाते है।

गार्गी के साथ बीच पर रेत पर हम काफ़ी देर तक खेलते रहे। गार्गी ने अपना एक हिप्पोपोटामस रेत मे दफ़ना दिया और बाद मे असली जगह भूल गई। बहुत देर तक हम उसे रेत मे खोद खोद कर खोजते रहे। अंत मे थक कर उसे वहीं छॊड़ दिया और वापसी की तैयारी की।

नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर


रास्ते मे नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर पड़ा। यह मंदिर, रामेश्‍वरम के मुख्‍य मंदिर से 8 किमी. की दूरी पर स्थित है। धनुषकोडी से श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर की ओर जाने पर इस मंदिर में दर्शन किए जा सकते है। यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है और हर साल दशहरे के दिन यहां भारी संख्‍या में दर्शनार्थी दर्शन करने आते है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 14 वीं शताब्‍दी में हुआ था और इसे स्‍थानीय स्‍तर के रामांद ने स्‍वंय बनाया था। यही कारण है कि यह मंदिर, रामेश्‍वरम से काफी दूर स्थित है। मंदिर के आसपास का क्षेत्र वास्‍तव में बेहद सुंदर है। थके - हारे पर्यटक यहां के घने वृक्षों के नीचे आराम कर सकते है। मंदिर के आसपास स्थित सुंदर गार्डन, वंसत के मौसम में बेहद खूबसूरत लगते है।

पंबन पुल


वापसी मे हम पंबन पुल पर रूके। इस पुल की खासियत यह है कि इसे पाल्‍क स्‍ट्रेट पर एक कैंटीलिवर ब्रिज के रूप में मनाया गया है। यह पुल , रामेश्‍वरम को देश के अन्‍य हिस्‍सों से जोड़ता है। यह पुल , समुद्र पर बना अपनी तरह का अनोखा पुल है। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री पुल है जिसकी लम्‍बाई 2.3 किमी. है। इसके बाजु मे एक रेल्वे पुल  है जिसे पुल को दक्षिण भारतीय रेलवे परियोजना के हिस्‍से के रूप में बनाया गया था।



लौट के बुद्धु घर को आये


सुबह के आठ बज गये थे, हम रामेश्वर द्वीप से बाहर आ गये थे और बैंगलोर का रास्ता ले लिया था। रास्ता 560 किमी था लेकिन अच्छा रास्ता होने से खाने और नाश्ते के 1 घंटा को जोड़ते हुये भी हम शाम के सात बजे घर पहुंच गये।

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दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 2 कन्याकुमारी

बुधवार, मई 22, 2019

दूसरा दिन 17 मई


सुबह पांच बजे अलार्म बजने से ठीक पहले ही नींद खुल गई। खुद उठे, बाथरूम मे घुसकर नहा धो कर बाहर निकले। तब तक गार्गी भी जाग गई थी, उसे नहला कर तैयार किया। तब तक निवेदिता सामान पैक कर रही थी। अंत मे निवेदिता के नहा धोकर तैयार होने पर बाहर निकले।

पता चला कि कार पार्किंग मे कार के आगे और पीछे कारें इस तरह से पार्क थी कि अपनी कार निकल नही सकती थी। होटल के रिसेप्शन पर शिकायत की तो उन्होने अपने ड्राईवर को भेजा। उसने हमारी कार के पीछे वाली कारों को हटाया, तब हमारी कार बाहर निकल पाई।

चेक-आउट कर बाहर आये, छ: बज गया था लेकिन मदुरै अब तक सुस्ता रहा था। होटल के सामने एक टपरीनुमा दुकान पर चाय पी। और चल दिये कन्याकुमारी की ओर।


मदुरै से कन्याकुमारी


रास्ता खाली था और 240 किमी की दूरी तय करनी थी। कन्याकुमारी ग्यारह बजे तक पहुंच जाने की उम्मीद थी। गति 100/120 किमी प्रतिघंटा चल रही थी। मदुरै से आगे 100 किमी की दूरी तय करने के पश्चात रास्ते के दोनो ओर पवनचक्कीयाँ दिखना शुरु हो गई थी और साथ मे गार्गी के प्रश्न भी। ये क्या है, क्या करती है, वगैरह! जैसे ही उसे बताया कि ये हवा से बिजली बनाती है, गार्गी बोली "ओह विंडव्हील! पापा ऐसे बताओ ना!"

पूरे रास्ते खेतो के मध्य पवनचक्कीयाँ ही नजर आ रही थी। इंटरनेट पर देखा तो पता चला कि एक 50 मीटर लंबाई की पंखुड़ी वाली पवन चक्की से एक वर्ष मे 60 लाख kWh बिजली उत्पन्न हो सकती है जो कि 1500 आधुनिक घरो की विद्युत आवश्यकता के लिये पर्याप्त है।

नौ बजते तक भूख लग आई। सड़क के किनारे एक औसत किस्म के ढाबे नुमा रेस्तरां पर कार रोकी। नाश्ते के लिये पुछा तो उन्होने बताया कि इडली, दोसा, पूरी उपलब्ध है। हमने अपने लिये दोसा और गार्गी, निवेदिता के लिये इडली आर्डर की। उन्होने टेबल पर केले के पत्ते बिछा दिये, और हर पत्ते पर दो मेदु वड़ा रख दिये। उसके बाद दोसा और इडली परोसा। इडली दोसा के उपर ही सांभर और चटनी डाल दी। कटोरी, चम्मच का कोई नाम ही नही।  हमने पूरे दक्षिण भारतीय अंदाज हाथ से ही दोसा और इडली का भोग लगाया। नाश्ता समाप्त होने पर वेटर ने हमे बताया कि केले के पत्तो को स्वयं ही कूड़ेदान मे फ़ेंकना है, अच्छा लगा और स्वयं ही पत्तो को कुड़े दान मे डाल आये। पानी का स्वाद लिया, अच्छा लगा, तो वही पानी पीया।

नाश्ता कर आगे बढ़े। थोड़ी दूर पर त्रिचांदूर जाने का रास्ता दिखा, इस स्थान पर एक विशाल सुब्रमनियम मंदिर है। चेन्नई से दोस्तो के साथ कुट्टालम, कन्याकुमारी यात्रा मे हम लोग एक जीप से इस मंदिर गये थे।

कन्याकुमारी के समीप आ गये थे, होटल जाने के रास्ते के लिये गूगलदेव की सेवायें आरंभ की। ग्यारह बज रहे थे और कन्याकुमारी मे हम प्रवेश कर गये थे। कन्याकुमारी एक छोटा सा कस्बा है, कुल मिलाकर एक से दो किमी लंबाई मे सिमटा हुआ। गूगल देव ने हमे होटेल के लिये एक गली मे मुड़ने कहा, हमे होटेल भी दिख गया, लेकिन ट्रेफ़िक पुलीस ने रोक दिया। पता चला कि उस गली मे जत्रा(रथ यात्रा) चल रही है। पुलिस वाले से पुछा कि कब तक जात्रा चलेगी, उसने कहा कि दो घंटे ! सामने ही गांधी मंडपम दिख रहा था। हमने कार आगे बढ़ाई। गांधी मंडपम से पहले कार पार्किंग है और कार खड़ी कर दी। सोच रहे थे कि अब क्या करे?

विवेकानंद शिला और थिरुवल्लौवर मुर्ती









सोचा कि जब तक जात्रा से रास्ता खाली हो, देवी कुमारी मंदिर हो आते है। सारा सामान कार मे रहने दिया और पैदल चल पड़े। अब मंदिर मे पता चला कि मंदिर जात्रा के चक्कर मे बंद है और शाम चार बजे खुलेगा।  हमने सोचा कि चलो अब विवेकानंद शिला और थिरुवल्लौवर मुर्ती घूम आते है।

विवेकानंद शिला जाने के लिये नाव की टिकट लेने पता किया तो देखा कि लगभग एक किमी लंबी कतार है, कम से कम 3000 लोग लगे हुये है। लेकिन हम जानते थे कि इनके पास चार बड़ी नावं है और हर नाव मे 200 लोग आ जाते है। एक राउंड ट्रीप मे नाव को अधिकतम दस मिनट लगते है। कतार मे खड़े हो गये। आधे घंटे मे हम टिकटघर पहुंच गये। विवेकानंद शिला के जाने के पचास रुपये प्रति व्यक्ति टिकट है। विवेकानंद शिला पर विवेकानंद मेमोरीयल का 20 रूपये  प्रतिव्यक्ति अलग से है।

अब हम नाव के लिये प्रतिक्षा कक्ष मे थे। दस मिनट मे अपनी बारी आई। दो तीन वर्ष पहले हुई नाव दुर्घटना के बाद हर यात्री को लाईफ़ जैकेट पहनना अनिवार्य है। उतरने वाले यात्रीयों के उतरने के बाद सारी लाईफ़ जैकेट के जमा होने के बाद नये यात्रीयो को लाईफ़ जैकेट पहनकर नांव पर जाना होता है। नांव से विवेकानंद शीला की दूरी मुश्किल से पांच मिनट की है।

विवेकानंद शिला पर उतरे। मेमोरियल हाल का टिकट लिया और आगे बड़े। धूप तेज थी, सारा स्थल ही शिला है और सब कुछ पत्थर से बना हुआ। उपर चप्पल/जुते उतारना अनिवार्य। पैर जलने से  हम डर रहे थे, लेकिन व्यवस्थापको मे पादचारी मार्ग पर सफ़ेद एंटीरिफ़्लेक्शन पेंट किया हुआ है, जो तेज धूप मे भी शीतल था।

विवेकानंद शिला पर स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रसिद्ध अमरीका यात्रा से पहले तीन दिन तक समाधी ली थी। उस स्थान पर वर्तमान मे एक प्रार्थना/ध्यान कक्ष है। आप जाकर ध्यान लगा सकते है। हम ध्यान कक्ष मे अंदर गये और बाहर आ गये क्योंकि ध्यान कक्ष मे शांति बनाये रखनी होती है, हमारा शैतान मुंह बंद नही रख सकता है। विवेकानंद मेमोरियल के सामने ही देवी कुमारी के पदचिह्न है। कहते है कि इसी स्थान पर देवी कुमारी ने शिव से विवाह के लिये खड़े रह कर तपस्या की थी तो उस स्थान पर उनके पैर के निशान बन गये है। विवेकानंद शिला पर तेज हवा चल रही थी, कुछ देर टहले, तस्वीरें ली और थिरुवल्लुवर मूर्ती के लिये रवाना हुये।

थिरुवल्लुवर मूर्ती


थिरुवल्लुवर मूर्ती यह एक 133 फ़ीट उंची मूर्ती है जो तमिळ कवि वल्लुवर की है। थिरु का अर्थ श्री होता है। थिरुवल्लुवर का तमिळ साहित्य मे वही दर्जा है जो संस्कृत मे वाल्मिकी का है, उनके द्वारा रचित ग्रंथ  थिरुक्कुरल(Thirukkuṛaḷ) है जोकि नैतिकता, राजनिति और आर्थिक मुद्दो पर है।

थिरुवल्लुवर मूर्ती पर कुछ समय बिताने के बाद वापस कन्याकुमारी पहुंचे। तब तक एक बज गया था। होटल जाने का रास्ता खुल गया था। होटल पहुंचे, चेक-इन किया। हाथ मुंह धोकर तरोताजा होने के बाद खाना खाने निकले। एक तमिळ रेस्तरां मे दक्षिण भारतीय थालीयों का आर्डर दिया। रसम, सांभर, सब्जीयों, दही, पापड़ और अचार के साथ भात का भोग लगाया।

शुचिंद्रम थानुमलायन मंदिर 


तब तक दो बज गये थे। मंदिर खुलने मे अभी दो घंटे और थे। सोचा कि इतने समय मे शुचिंद्रम से हो आते है। होटल से कार ली और शुचिंद्रम की ओर रवाना हुये। सुचिंद्रम का थानुमलायन मंदिर कन्याकुमारी से 12किमी दूरी पर है लेकिन रास्तानिर्मानाधिन था तो पहुंचने मे 45 मिनट लगे, मंदिर 3 बजे पहुंचे। पता चला कि यह मंदिर भी चार बजे खुलेगा। हमारे पास एक घंटा समय था। पास मे एक कुंड था, उस कुंड के पास घुमने लगे। हम और गार्गी दोनो पानी मे पैर भीगो कर वापिस आये। एक चाय की दुकान पर पहले चाय पी। दूसरी दुकान पर शर्बत पीया। एक टपरी पर शानदार गरमागरम मिर्ची भज्जी खाई।

इसके बाद मंदिर मे गये। इस मंदिर मे आपको कमर से नीचे मुंडु/वेस्टी पहनना होता है, और उपरी भाग मे अंगवस्त्रम। टीशर्ट और बनियान उतारनी पड़ी। गार्गी मजे ले रही थी, पापा शेम शेम!

थानुमलायन मंदिर मे शिव(स्थानु), विष्णु(मला) और ब्रह्मा(आयन) को एक अकेली मुर्ती के रूप मे दिखाया गया है जिसे स्थानुमलायन कहते है। यह मंदिर वास्तुकला का एक अच्छा उदाहरण है, सात मंजीला गोपुरम दूर से दिखाई देता है। मंदिर के अंदर हनुमान की एक ही पत्थर से बनी अठारह फ़ीट उंची मूर्ती है। यह मान्यता है कि लंका दहन के पश्चात हनुमान ने इसी स्थान पर आराम किया था तो उन्हे लोग पुंछ मे लगी आग की पिड़ा से शांति के लिये मख्खन और पान चढ़ाते है।

मुख्य मूर्ती के सामने जब मै निवेदिता को यह सब बता रहा था तो पुजारी ने हमे अपने साथ आने के लिये कहा। पुजारी समझ गया था कि यह बंदा खडुस है एक पैसा दक्षिणा नही देगा लेकिन निवेदितो से दक्षिणा वसूली जा सकती है। उसने हमे सारे मंदिर का टूर कराया। इस मंदिर के पिल्लर भी एक ही पत्थर से तराशे हुये है। इन पत्थरो मे आप सरगम बजा सकते है। पुजारी ने हम पिल्लर के अलग अलग स्तंभो को ठोंक कस सातो स्वर की ध्वनि निकाल कर दिखाई। पूरा टूर कराने के बाद उसने निवेदिता से दक्षिणा वसूली। आश्चर्य यह कि उसने मुझसे कोई उम्मीद नही की, ना ही दक्षिणा मांगी।



देवी कुमारी मंदिर


सुचिंद्रम  से कन्याकुमारी लौटे। पांच बज गये थे। देवी कुमारी मंदिर पहुंचे। अब मंदिर लगभग खाली था। इस मंदिर मे भी मुंडु/वेस्टी और अंगवस्त्रम वाली शर्त। टीशर्त/बनियान उतारी। मंदिर के अंदर गये। इस मंदिर मे देवी कुमारी विग्रह के  चारो ओर दिये इस तरह से जलाते है कि देवी के नाक मे लगा हीरा दूर से ही चमकते दिखता है। भीड़ नही थी, आराम से मंदिर घूमा। निवेदिता को फ़िर से एक बार पूरा पुराण सुनाया।

गांधी मंडपम 


अब बारी थी गांधी मंडपम की। फ़रवरी 1948 मे इसी स्थान पर महात्मा गांधी की अस्थियों को सागर मे विसर्जन से पहले रखा गया था। इस मंदिर का निर्माण ऐसा है कि दो अक्टूबर को सूर्य प्रकाश अस्थी रखने के स्थान पर सीधे पड़ता है। सारा स्मारक घुमा। गार्गी को महात्मा गांधी की कहानी सुनाई, उनकी विभिन्न तस्वीरों के बारे मे जानकारी दी।

गांधी मंडपम से निकल कर हम लोग बीच पर पहुंचे। निवेदिता को जूतो, पर्स और सामान को देखने लगा कर गार्गी के साथ पानी मे घुस गये। सूर्यास्त का समय हो रहा था। सूर्यास्त पाइंट लगभग एक किमी दूर था। लेकिन पश्चिम मे क्षितिज पर बादल थे और सूर्य  के उत्तरायण मे होने अस्त सागर मे ना होकर भूमी पर ही होना था। उपर से गार्गी पानी से निकलने तैयार नही थी तो तय हुआ कि सूर्यास्त बिच पर से ही देखा जाये।

सूर्यास्त के बाद अंधेरा होने पर होटल पहुंचे, नहाया धोया गया। और रात्रिभोजन के लिये निकले। इस बार हम एक पंजाबी रेस्तरां पहुंचे। दाल, सब्जी, कढ़ी, पापड़ और अचार  के साथ गर्मागरम  रोटीयाँ खाई।


 सूर्योदय 


वापस होटल पहुंचे। सुबह सूर्योदय का समय देखा, सूर्योदय छ: बजकर एक मिनट पर होने वाला था। पांच बजे का अलार्म लगाया और सो गये।

सुबह पांच बजे उठे। अब हमारे पास दो विकल्प थे। बाल्कनी से सूर्योदय देखे, या बीच पर जाकर सूर्योदय देखे। दूसरा विकल्प चुना। नहा धोकर तैयार होकर 5:45 तक बीच पहुंच गये। बीच पर अच्छी खासी भीड़ थी। अब भी क्षितिज पर बादल थे। छ बजकर एक मिनट निकल गया, दो मिनट हुये, चौथा मिनट भी निकल गया सूर्य महाराज नही दिखे। इतने मे सतह से थोड़ा उपर सूर्यमहाराज ने बादलो के बीच से अपनी जगह बनाई और निकलना आरंभ किया। बीच पर चाय बिक रही थी, चाय पीते हुये सूर्योदय देखा।






सूर्य महाराज के क्षितिज पर उपर आने के बाद वापिस होटल आये, सामान उठाया और निकल पढ़े अगले पढ़ाव रामेश्वरम की ओर...



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दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 1 मदुरै

मंगलवार, मई 21, 2019

गार्गी की छुट्टीयाँ समाप्त हो रही थी। सारी छुट्टी निकल गई और वो शिकायत करते रह गई कि पापा "हालीडे" जाना है। तो हमने भी सोचा कि चलो तीन चार दिन कहीँ घूम आते है।

अचानक बाहर घूमने का कार्यक्रम था तो ट्रेन या फ़्लाईट से जाने का मौका नही था, अंतिम समय पर ट्रेन आरक्षण नही मिल पाता और फ़्लाईट की तो आसमान छूती कीमत होती। सोचा कि अपनी कार से ही चलते है।

लेकिन अब जायें कहाँ? ऐसी जगह जो तीन चार दिनो मे अच्छे से घूमी जा सके, जेब को अधिक नुकसान ना हो। ऊटी, कोडैकनाल जाना नही चाहता था, भीड़ बहुत रहती है। मैसोर, चेन्नई, पांडीचेरी, महाबलीपुरम पिछले वर्ष ही घूम चूके थे।

योजना आयोग


अपने चेन्नई के दिनो मे मैने अपने सहकर्मीयों के साथ नागरकोईल, त्रिचांदुर, कन्याकुमारी तथा शुछिंद्रम की सैर की थी। प्रदीप नाशीककर के साथ कन्याकुमारी और रामेश्वरम घुमा था। मम्मी, भाई और छोटी बहन के साथ मदुरै और रामेश्वरम की यात्रा की थी। तो हमने इन सभी यात्राओं के अनुभव से मदुरै, कन्याकुमारी, शुछिंद्रम और रामेश्वरम की यात्रा की योजना बना ली।

इस ट्रिप की योजना बनाते समय कुछ नियम बनाये कि सारी ड्राइवींग दिन मे करेंगे, जैसे ही पेट पूजा का समय होगा भोजन या नाश्ता करेंगे। रात के नौ से दस बजे सो जायेंगे जिससे कि दूसरे दिन तरोताजा रहे।

कुल मिलाकर योजना ऐसे बनी कि पहले दिन सुबह छ: बजे बैंगलोर से निकलकर मदुरै पहुंचा जाये। मेरे घर से मदुरै 435 किमी है, गूगल महाराज के अनुसार 6 घंटे लगना थे, रास्ते मे नाश्ता , खाना मिलाकर आठ घंटे, अर्थात दो बजे मदुरै पहुंचेंगे। होटल मे चेक-इन कर मीनाक्षी मंदिर जायेंगे। उसके बाद मदुरै बाजार घुमेंगे। दूसरे दिन सुबह कन्याकुमारी के लिये निकलेंगे, मदुरै से कन्याकुमारी किमी है, गूगलदेव के अनुसार चार घंटे। नाश्ता लेकर पांच घंटे। ग्यारह बजे कन्याकुमारी पहुंच जायेंगे। कन्याकुमारी मे विवेकानंद शिला, थिरुवल्लुवर मूर्ती, कन्याकुमारी मंदिर, गांधी मंडपम, रेल्वे स्टेशन और निकट का शुछिंद्रम मंदिर मे शाम हो जायेगी। शाम को सूर्यास्त दर्शन, गार्गी के लिये बीच पर मस्ती। तीसरे दिन सुबह सूर्योदय दर्शन के पश्चात रामेश्वरम के लिये प्रस्थान। रामेश्वरम कन्याकुमारी से 310 किमी है, गूगल देव के अनुसार पांच घंटे लगेंगे। नाश्ता लेकर 12 बजेंगे। रामेश्वर मे पंबन पुल, अब्दुल कलाम मेमोरीयल, राम झरोखा, विभिषण मंदिर इत्यादि के साथ रामेश्वर मंदिर मे शाम हो जायेगी। समय मिला तो धनुषकोडी जायेंगे, नही तो अगले दिन जायेंगे। चौथे दिन बैंगलोर के लिये वापसी। रामेश्वरम से बैंगलोर मेरा घर  560 किमी है, गूगलदेव के अनुसार 9:30 घंटे, नाश्ता/खाना पीना मिलाकर बारह घंटे। सुबह छ: बजे निकले तो शाम के छ: बजे घर!

होटल बुकींग


योजना बन गई। अब होटेल की बुकींग की जाये। सस्ते बजट होटेल के लिये ओयो रूम्स की ओर नजर डाली, 700-2000 रूपये के कमरे दिखा रहा था। होटेल बुक करने के लिये हमे गार्गी का ध्यान रखना होता है, हम गरीब मास्टर के बेटे है लेकिन वो साफ़्टवेयर इंजीनियर की बेटी है। उसे साफ़सुथरा बिस्तर और साफ़सुथरा चमचमाता टायलेट चाहीये। ओयोरूम्स ने निराश किया, सारे होटलो के रिव्यु बकवास थे। यात्रा डाट काम पर नजर डाली, पता चला कि वह पहली बुकींग पर 450 रूपये का डिस्काउंट दे रहा है, मदुरै मे मीनाक्षी मंदिर से एक किमी दूर होटेल विजय बुक किया, डिस्काउंट मिलाकर मुझे 1200 रूपये मे अच्छा कमरा मिल गया। कन्याकुमारी छोटी जगह है लेकिन पर्यटकों की भीड़ रहती है। होटेल महंगे होने की संभावना थी। यात्रा, आईबीबो, ओयोरूम्स, मेकमाईट्रीप सब छान लिया। इस बार मेकमाईट्रीप से होटेल मदिनी बुक किया, कारण पहली बुकिंग पर 20% छुट। 1800 रूपये मे सागर की ओर बालकनी वाला वातावनुकुलित कमरा मिल गया। रामेश्वरम मे बड़े और अच्छे होटेल कम है और जो भी है, वे पर्यटन स्थलो से दूर है। इस बार आइबीबो से 1200 रूपये मे वातावनुकुलित कमरा मीला, वही पुरानी ट्रिक, पहली बुकिंग और 600 रूपये का कुपन! सारी सर्कस मे एक बात तय हो गई कि ओयोरूम्स भले ही सस्ते कमरो की बात करता है लेकिन मिलते नही है। जो भी मिलते है वो यातो घटिया होंगे या दूरी पर!

तय हुआ था कि 16 मई गुरुवार को प्रस्थान करेंगे और 19 मई रविवार शाम घर आ जायेंगे। तैयारी कुछ खास करनी नही थी, गर्मी है तो हल्के फ़ुल्के कपड़े रखने थे। गार्गी ने अपने बैग मे बीच पर रेत से खेलने एक बाल्टी और दो तीन प्लास्टिक के फ़ावड़े, सांचे रख लिये थे। आवश्यकता नही थी, लेकिन हमने अपना टेंट रख लिया। रास्ते मे गार्गी का मुंह बंद रखने बिस्किट, चाकलेट, दही और चिप्स रख लिया। पानी की चार पांच बोतले रख ली गई। कारे मे शेल पेट्रोल से टैंक फ़ुल करा लिया। हमारा सारा सफ़र तमिळनाडु मे होना था जहाँ पर पेट्रोल कर्नाटक से दो रूपये प्रति लिटर अधिक है।

पहला दिन -16 मई- मदुरै



गुरुवार सुबह छ: बजे निकलना था लेकिन भारतीय स्टैंडर्ड समय का पालन करते हुये हम आठ बजे निकले। सेलम तक रास्ता छ: लेन है, हम बड़े आराम से 100-120 किमी/घंटा से चल रहे थे। दस बजे सेलम पहुंचे। भूख लग गई थी तो सेलम से ठीक पहले एक रोड किनारे के रेस्तरां मे रुके। नास्ता पुछा, पता चला कि केवल दोसा और पुरी उपलब्ध है, इडली नही है। तीनो के लिये दोसा आर्डर किया और भोग लगाया। जब पानी पीने की बारी आई तो देखा कि रेस्तरां मे यु वी वाला आर ओ लगा है, साफ़ सुथरा दिख रहा है। बेहिचक सादा पानी पिया और बोतलो मे भी भर लिया। मतलब कि बोतलबंद पानी नही लिया। नाश्ता कर आगे चले।

रास्ता खाली था, अधिक ट्रेफ़िक नही था। सेलम के पास से गुजरे, रास्ते मे येरकाड जाने का रास्ता दिखा। याद आया कि चेन्नई दिनो मे अपनी टीम की एक लड़की की शादी मे सेलम आये थे, तब येरकाड भी घूमे थे। पहाड़ो मे उपर एक छोटा सा कस्बा, जिसमे एक रेसीडेंशीयल इंटरनेशनल स्कूल है, एक खूबसूरत झील है।



मदुरै पहुंचते पहुंचते दो बज गये, दो घंटे देरी से निकले तब भी समय पर पहुंचे।  मदुरै मे तापमान चालीस डीग्री था बैंगलोर के 32 से आठ डीग्री अधिक। होटल पहुंचे, चेक इन किया। हाथ मुंह धोकर ताजा हुये। मीनाक्षी मंदिर इस समय बंद हो जाता है और दोबरा शाम को चार बजे खुलेगा। हमारे पास दो घंटे थे तो सोचा कि पहले खाना खा लेते है। होटल वाले ने बाजु वाली एक गली मे एक अच्छे रेस्तरां का पता बताया। खाने मे हमने दक्षिण भारतीय थालीयाँ मंगवाई। एक चपाती, सांभर, रसम, दो करी, दही, पायसम, पापड़ , अचार, तली सूखी दही वाली मिर्चे, अचार, पोड़ी घी और पेट भर भात। आत्मा तृप्त हो गई। पानी फ़िर से सादा वाला लिया, बोतलबंद पानी की आवश्यकता महसूस नही हुई।

कार होटल मे ही छोड़ी और मंदिर की ओर आटो रिक्शा से निकले। रास्ते मे एक हस्तकला प्रदर्शनी दिखी। उसमे एक चीनीमिट्टी की अचार रखने वाली बरनी दिखी। एक जमाने से खोज रहा था। किमत पता की, 580 रूपये, ठीक ठाक लगी। पैक करवाया और दूकानवाले को कहा कि लौटते समय ले जायेंगे। गार्गी ने अपने लिये एक लकड़ी की बनी सीटी ले ली।

मंदिर पहुंचे। हम अपनी हमेशा वाली ड्रेस, मतलब बरमूडा और टीशर्ट मे थे। मंदिर से पहले एक दूकानदार ने आवाज लगाई और कहा कि इस कपड़े मे मंदिर मे घुसने नही देंगे। उसी से हमने मुंडू खरीदा। खतरा लेने के मूड मे नही थे, मुंडु को उपर से लपेटा और बरमूडा मे खोंच लिया। गार्गी को यह सब पसंद नही आ रहा था, वो बोली पापा इसको उतारो! बड़ी मुश्किल से उसे मनाया।

मंदिर के बाहर मोबाईल चप्पल जुते जमा कराये और मंदिर के अंदर प्रवेश किया। मंदिर के अंदर घुटनो तक मुड़ा मुंडु/लुंगी/वेस्टी की अनुमति है लेकिन घुटनो तक के बरमूडा की नही। अब मंदिर मे दो कतारे थी, स्पेशल दर्शन और फ़ोकटीया दर्शन। हमने तो पहले से ही सोच रखा था कि एक पैसा फ़ालतु खर्च नही करना है तो फ़ोकटीया कतार मे खड़े हो गये। कतार तेजी से आगे बढ़ रही थी तो हमे अपने निर्णय पर खुशी भी थी कि पैसे बचा लिये। 30 मिनट मे हम गर्भगृह के सामने भी आ गये। इतने मे कपाट बंद हो गये, पता चला कि स्नान हो रहा है, उसके पश्चात शृंगार के बाद ही कपाट खुलेंगे। कतार मे 30 मिनट तक हम भुनभुनाते रहे , साथ मे गार्गी भी भुनभुनाते रही कि मंदिर नही जाना है, लाईन मे नही लगना है। कपाट खूले, कतार आगे बढ़ी। गर्भगृह के सामने तक पहुंचे। मूर्ती के सामने पहुंचने पर पंडे ने माथे पर तिलक किया, दक्षिणा की उम्मीद से हमे देखा, हम उसे अनदेखा कर आगे बढ़े, लेकिन पीछे से निवेदिता ने उसे पैसे थमा ही दिये!

मीनाक्षी मंदिर के बाजु मे ही शिव मंदिर है लेकिन भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। उसकी कतार मे लगे। इस बार माथे पर भस्म पुतवाई।

मीनाक्षी मंदिर बहुत बड़ा है। पूरा मंदिर ढंग से देखने के लिये कम से कम 3-4 घंटे चाहिये। बाहर आते तक सात बज गये थे। गर्मी, पसीने और कतार मे सब थक गये थे। सोचा कि होटल पहुंच कर थोड़ा आराम कर बाजार घूमते है। 7:30 शाम को दोबारा होटल से बाहर निकले। बरनी उठाई। कुछ कपड़ो की दुकानो मे गये और सिल्क साड़ीयों की कीमत सुन कर मुंह लटकाकर वापिस आये।

वापस आते समय तक नौ बज गये थे, सोचा खाना खाकर होटल जायेंगे। दोबारा उसी होटल मे पहुंचे। खाने का मेनु पुछा, पता चला कि शाम को थाली उपलब्ध नही है, चाईनिज मेनु है, फ़्राईड चावल के कई व्यंजन उपलब्ध है। हमारे साथ समस्या यह है कि गार्गी को चावल मे केवल सफ़ेद उबले चावल चाहिये होते है, बिरयानी, पुलाव, फ़्राईड चावल नही खाती है। अब वेटर की ओर देख कर पुछा तो उसने कहा कि इडली है, घी इडली है। तब हमारी बांछे खिल गई। घी ईडली मे 24 छोटी छोटी इडली, सांभर मे डूबी रहती है, उसपर से घी की प्रचुर मात्रा होती है। इसके पहले मैने घी इडली चेन्नई मे 2006 के आसपास ही खाई थी। अपने लिये घी इडली, गार्गी के लिये सादी इडली और निवेदिता के लिये चाईनिज फ़्राईड राईस का आर्डर दिया। तीनो ने भोग लगाया।

वापिस होटल आये, सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया और सो गये...

कन्याकुमारी और रामेश्वर आगे ....

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पत्रिका गाथा

सोमवार, अप्रैल 22, 2019

बचपन की जितनी धुँधली याद है, मेरे जीवन की सबसे पहली पुस्तक चंदामामा या नंदन ही रही होगी। इसमे से चंदामामा पौराणीक कहानीयों के लिये जानी जाती है, इसकी खासीयत इसके रंगबिरंगे खूबसूरत चित्र होते थे।  विक्रम बेताल का परिचय चंदामामा से ही हुआ। चंदामामा ने ही भारत ही नही विश्व की पौराणीक गाथाओं से भी परिचय कराया, जिसमे तमिळ काव्य शिलप्पादिकारम (जिसकी नायिका कण्णगी है), इलियड और ओडीसी भी शामिल है।

इसके दूसरी ओर नंदन थी, परीकथा और जादुई दुनिया वाली बाल पत्रिका। विश्व बाल साहित्य से परिचय इसी पत्रिका ने कराया जिसमे हेंस क्रिश्चियन एंडरसन जैसे लेखक का समावेश है। उनकी कहानी ’नन्ही दियासलाई वाली लड़की(The Little Match Girl)' नंदन मे ही पढ़ी थी। नंदन की ख़ासियत इसके मध्य मे छपने वाला चार पृष्ठो का अखबार होता था।

पापा को कामिक्स पसंद नही आते थे, वे हमे कामिक्स पढ़ने मना  भी करते थे। लेकिन इसका अपवाद थी अमर चित्रकथा जो वे खुद ला देते थे। अधिकतर भारतीय पौराणीक गाथाओं से परिचय अमर चित्र कथा से ही हुआ था।

इस बीच बीच मे कभी कभी पराग, चंपक और लोटपोट भी आ जाती थी। पंचतंत्र की थीम पर जानवरो के माध्यम से कहानी कहने का अंदाज़ लिये चंपक थी। पराग के कार्टून का अपना अलग ही रंग होता था। लोटपोट के मोटू पटलू , घसीटा और डा झटका एक पीढी के बाद गार्गी को भी पसंद है। लोटपोट मे ही हम काजल कुमार जी के चिंपु और मिन्नी से मीले। कभी सोचा नही था कि काजल जी से कभी आभासी ही सही मित्रता भी होगी।

1986 के आसपास बालहंस से परिचय हुआ। इसके दो पात्र अब भी याद है, ठोलाराम और कवि आहत! अपेक्षाकृत सस्ती लेकिन ढेर सारी पठनीय सामग्री वाली पत्रिका। नन्हे सम्राट और मुर्खीस्तान का परिचय इसी दौरान हुआ।

1988 के आसपास विज्ञान प्रगति पढ़ना आरंभ हुआ। देवेन मेवाड़ी सर की सौरमंडल शृंखला ने अंतरिक्ष मे जो रुची जगाई वह आज भी जारी है। इसी दौरान स्पेस शटल डिस्कवरी का प्रक्षेपण भी हुआ था। अविष्कार भी पढने मीली लेकिन थोड़ी बोझील सी लगी, शायद समय से पहले पढ़ रहे थे। इस समय जब गर्मियों मे ताउजी के घर सिहोर जाते थे, तब चकमक पढ़ने मील जाती थी जोकि महाराष्ट्र मे नही मिल पाती थी।

बड़े हो रहे थे, रुचि बदल रही थी। एक किशोरों की पत्रिका थी सुमन सौरभ, पढ़ी लेकिन मजा नही आया। इलेक्ट्रॉनिक फ़ॉर यु भी पढ़ना आरंभ किया। कादंबिनी, सरिता जैसी पत्रिकाये भी पढ़ने मे आ रही थी, इसके साथ प्रतियोगिता दर्पण भी।

जब कालेज मे इंजीनियरींग करने पहुंचे पत्रिकाये पढ़ना कम होते गया लेकिन कभी कभार, इंडीया टूडे, कांपटीशन सक्सेस, आउटलूक, माया जैसी पत्रिकायें भी पढ़ लेते थे। कालेज के बाद नौकरी करते समय रेलयात्राओं मे भी इन पत्रिकाओं का पढ़ना जारी रहा लेकिन पिछले कुछ वर्षो मे पत्रिका पढ़ना पूरी तरह से बंद हो गया है। अधिकतर पढ़ना इंटरनेट, आईपैड और किंडल पर ही होता है।

किसी को बताईयेगा नही लेकिन किसी समय मनोहर कहानियाँ और सत्यकथा जैसी पत्रिकायें भी पढ़ी है। कभी कभार तबियत से धुनाई भी हुई है!

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

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