एक कुंवारे की व्यथा !

मंगलवार, जुलाई 05, 2005

४ जुलाई का लंबा सप्ताहांत आया. सारी देशी बिरादरी का सप्ताहांत का कार्यक्रम बन गया. हम हमेशा की तरह परेशान क्या करे ? पूरे तिन दिनो के सप्ताहांत पर निन्द्रालोक की यात्रा भी आसान नही, वो भी गर्मियों मे(वैसे तो सर्दियो मे पूरे ४ दिन सोने का हमारा विश्व किर्तिमान है, जिसमे से हमने भोजन और अन्य आवश्यक दैनिक क्रियाओं का समय ह्टा दिया है). जगजीत को सुने ,किशोर को सुने, पर पुरे तिन दिन ? हमारी इस समस्या को हल किया सुरेन्दर भाई ने. वो और पद्मनाभन अपने परिवारो(सपत्निक्) पश्चिम वर्जिनीया के इस्कान मन्दिर जा रहे थे, उन्होने औपचारिक रूप से (गलती से?)पुछ लिया, चलोगे क्या ? अन्धा क्या मांगे, दो आखें ! नेकी और पुछ पुछ. हमने हामी भर दी, और साथ चिपक लिये.

वैसे तो धार्मिक विचारो से हमारा कोई रिश्ता नही है. लेकिन नास्तीक भी नही हुं. भगवान जी से मै साल मे एक बार मिलता हुं, अपने जन्मदिन पर और अगले साल का मिलने का समय तय कर लेता हुँ. इस बार भगवान जी से जब नियत समय से तिन महिने पहले मिला तो, उन्हे जरुर आश्चर्य हुआ होगा. खैर साथ चिपक तो लिये, साथ साथ भगवानजी के दर्शन किये( या भगवानजी को दर्शन दिये ?). ये सब किस्सा बाद मे ,हम मुल समस्या पर आते हैं.

जैसा की देशी बिरादरी मे रिवाज है, इस अवसर पर कुछ चित्र भी खिंचे गये. हमने भी कुछ चित्र लिए और याहू पर डाल दिये. सारे दोस्तो को चित्र देखने का निमंत्रण भी भेज दिया गया. हमारे मित्रमण्डली चित्रो को देखे, और अपने विचारो को व्यक्त ना करे, असम्भव!

अब आप इस चित्र को देखें.

इस चित्र मे कुछ गलत लग रहा है? नही ना ? आप कहेंगे गुलाबो की पृष्ठभुमी मे सभी लोग अच्छे लग रहे हैं. य़ा फीर आप कहंगे गुलाबों के साथ पांच और फूल(?). आप ये भी कह सकते है कि चित्र तो सुन्दर है, पता नही ये लोग कहाँ से आ गये.
ये सब तो ठीक है. पर हमारे मित्रों(?) को इस चित्र मे पांच नही छह लोग चाहिये. अजुंषा जी उवाच "दो परिवारो के बीच छडे कैसे लग रहे हो?". देशपान्डे उवाच "शादी कर ले, बुढ्ढा हो रहा है !" राजेश उवाच "अबे अब तो सुधर जा !" राजेश भाई के शब्दकोष मे शादी करने का अर्थ सुधरना होता है.

मेरी समझ नही आता लोगो को मै हसंता खेलता अच्छा क्यों नही लगता. लोगो को मेरी स्वतन्त्रता से नफरत क्यो है ?
भइया हम तो शरद जोशी जी के अनन्य भक्त है. उन्होने "एक दोस्त के विवाह पर" कहा था.
"भगवान ने भी जब धरती पर् जन्म लिया था,काफी वर्षो तक शादी ब्याह का डौल जमाते रहे. जब धरती पाप के बोझ से लद रही थी , वे रूक्मीणी हरण मे "एनर्जी" नष्ट कर रहे थे. क्या वे समझ नही रहे थे की शिव का धनुष उठाना अर्थात कामदेव का तीर खाना. धनुष नही मुसीबत उठा ली. पर बेचारे क्या करे मनुष्य-जन्म जो लिया था और मनुष्य विवाहशील प्राणी है. बरबादी के फेर मे पड ही गये. जब भगवान ही नही छुटे तो इन्सान की क्या बिसात. जिस दिशा मे निकल जाइये आदमी शादी करता दिख जायेगा. बाहर घोडा सज रहा है, अंदर गधा सज रहा है"

हम तो सारी दुनीया को समझा कर हार गये कि शादी कर लेना सृष्टी का अंतिम सत्य नही है.मगर सभी ने अपने कानो(आंखो सहित्) पर ठीक वैसे ही पट्टी बांध रखी है जैसे, बाल ठाकरे ने पुत्र मोह मे बांध रखी है. मुझे तो यही लगता है, कि सभी ने निश्चय कर रखा है हम तो डुब चुके है सनम लेकिन तुम्हे डुबाये बिना नही मानेंगे. कहावत भी है नकटा चाहे सारी दुनीया नकटी हो जाये.

गुरूजी(शरद जोशी जी) के कथनानुसार हम गधा नही बनना चाहते. लेकिन जिससे भी मिलो सबसे पहले ये ही पुछेगा "और शादी कब कर रहे हो ?".जैसे हमारा क्वांरा होना इराक् युद्ध , पेट्रोल की बढती किमतो या गुजरात मे आयी बाढ से भी बडा ज्वलंत मुद्दा हो गया. जनता नही सोचती कि और भी गम है जमाने मे हमारे क्वांरेपन के सिवा. या फिर ऐसा है कि हमारे शादी करते ही ओसामा बिन लादेन पकडा जाएगा या अयोध्या मे राम मन्दिर बन जायेगा.

जब घर जाता हुँ मम्मी शुरू हो जाती है, कुछ रिश्ते आये है जरा एक नजर तो डाल ले. बहने शादी ब्याह मे पुछती है "वो पीले सुट वाली कैसी लग रही है?". और तो और छोटे भाई को मै अपने रास्ते का सबसे बडा कांटा नजर आता हुँ. हे भगवान इन लोगो को सद्बुध्दी दे, ये नही जानते , ये क्या कर रहे है. गुरूजी,कहां हैं आप ?

इन सब को तो छोडो अमेरीकन सरकार भी हमारे पिछे पडी है कि हम बर्बाद हो जांए(शादी कर लें). मुझे कुंवारे होने की सजा ज्यादा आयकर दे कर चुकानी पडती है. अभी अभी खबर आयी थी कि ब्रिटीश दुतावास भी कुवांरो को वीसा आसानी से नही देता.

हमे बरबाद करने के लिए लोग किस तरह के अनुचित दबाव डालते है इसका एक उदाहरण देख लिजिए. कार्यालय मे "मिंटीग" बुलायी गयी है. मुद्दा है सप्ताहान्त मे कुछ कार्यवश किसी एक को कार्यालय आना होगा. सारी नजरो के केन्द्रबिन्दु हम ही है. हमारे अलावा सभी के पास ना आ सकने के कारण है, मसलन सुमितजी का २ महिने (?) पुराना सपरिवार चलचित्र का कार्यक्रम है जो कि रद्द नही कर सकते वर्ना उनका घर से दाना पानी उठ जाएगा. हमारी तो क्या जुर्रत की ऐसे कार्यक्रम बनाए और बना भी लिए तो रद्द कर सकते है. शशि के ससुराल वाले आ रहे है, उन्हे चेन्नई घुमाना है. हमे अकेले घुमने का कोई अधिकार ही नही है. क्रिष्णा के घर का राशन पानी खत्म हो गया है, और खरीददारी करनी है, हम तो खैर हवा पानी पर ही जिते है.

ऐसा भी नही की कार्यालय के बाहर कुवारो के साथ सद्व्यव्हार होता है. जब हम भारत मे थे और चेन्नई मे आशियाना ढून्ढ रहे थे,
"एक अकेला शहर मे, रात मे और दोपहर मे आशियाना ढून्ढता है".
जिस घर पर to let का फलक देखते दरवाजा ठकठका देते. मकान मालिक आते और पुछते "अकेले रहोगे या परिवार के साथ?” आगे क्या लिखे आप खुद समझदार है. हम मुंह लटकाए लौट आते. वो तो भला हो हमारे मानव संसाधन विभाग का जिन्होने हमे अपनी जिम्मेदारी पर एक कमरे का मकान दिला दिया. साथ मे एक अलिखित चेतावनी भी दे दी कि हम शराफत से रहें, गोया कि कुवारें शरीफ नही होते.

अब तो लगता है कि कुवांरो के लिए मानवाधिकार ही नही है. आतंकवादीयो के मानवाधिकारो के लिए भी काफी सगंठन सामने आ जाते है, जानवरो के लिए भी मेनका गाधीं है. पर कुवांरो के लिए ? हे बजरंगबली रक्षा कर !

गुरूजी(शरद जोशी जी) कह गये है
"इस कमबख्त को शर्म भी नही आती. एक ऐसा काम कर (शादी कर) के मुंह दिखाने की जुर्रत कर सकेगा ! समझ मे नही आता कि वह इस दुर्घटना का शिकार कैसे हो गया ? आदमी जाने क्यो चलते चलते ऐसी मजिंल पर पहुंच जाता है जहां वह शादी कर लेता है या उसकी शादी हो जाती है. शायद सदैव शादी की नही जाती हो जाती है, जैसे कमबख्त प्रेम कीया नही जाता हो जाता है."

लेकिन हम कहते है "शादी हो नही जाती,जबरन करवा दी जाती है. एक बन्धनमुक्त आजाद पंछी को साम दाम दंड भेद का दुरूपयोग कर कैद कर लिया जाता है. आपने किसी बारात को देखा है,दुल्हे को बली के बकरे की तरह सजा कर सामने नौजवान नाचते हुवे और पिछे बुजुर्ग सिर झुकाये चलते है. नौजवान बारात के सामने नाचते इसीलिये है कि दुल्हे का ध्यान बंटा रहे. बुजुर्ग पिछे इसीलिये चलते है दुल्हे को पिछे से भागने से रोका जा सके."

हे भगवान ! कैसे कैसे हथकन्डे अपनाए जाते है ! अब आप ही बतायें मै क्या कर सकता हुं ?

नोट : वैसे गुरूजी( शरद जोशी जी) भी शादी-शुदा थे !

3 comments:

अनूप शुक्ला बुधवार, जुलाई 06, 2005 7:22:00 pm  

जैसे कि आइंसटीन जी कह गये हैं कि पदार्थ/ऊर्जा को बनाया या न नष्ट नहीं किया जा सकता हैकेवल रूपान्तरण किया जा सकता है।वैसे ही व्यथाओं का केवल रूपान्तरण किया जा सकता है।सो हे मूढ़ बालक, ये कुंवारेपन की पगडंडियां त्यागकर वैवाहिक जीवन का राजपथ पकड़। इस तरह कम से कम कुंवारेपन की व्यथा से तो मुक्त होगा ।नये लफड़े आयेंगे तो निपटने के नये तरीके भी सोचेगा।
यह लिखना फिजूल है फिर भी लिखना मजबूरी है कि लेख पढ़ने में आनंद आया तथा आगे और
भी नियमित पढ़ने की आशायें जगीं।बधाई।

अनुनाद सिंह गुरुवार, जुलाई 07, 2005 8:01:00 pm  

वाह शिष्य , वाह ! चिर_ब्रह्मचारी भव ! अपनी लंगोट को ढीली मत होने देना । दुनिया तो लकीर की फ़कीर है ।

बजरंगबली

SHASHI SINGH मंगलवार, जुलाई 19, 2005 11:43:00 pm  

कल तक हम भी क्रांतिकारी हुआ करते थे. पिछले साल से हमारा नाम शहीदी खाते की शोभा बढ़ा रहा है. वैसे जब इस जालिम जमाने के सामने गुरूजी (शरद जोशीजी) ने घुटने टेक दिये तो भला हमारी और आपकी विसात ही क्या? फिर भी आपके लिए दुआ करेंगे.

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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