रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं ..

बुधवार, सितंबर 26, 2018

अक्सर लोग मुझसे पुछ लेते है कि कहाँ से हो ? हम सोच मे पड़ जाते है कि इसका उत्तर क्या दे!

पापा बुंदेलखंड से थे, मम्मी छत्तीसगढ़ से। जन्म दुर्ग छत्तीसगढ़ यानी ननीहाल मे हुआ। लेकिन सारा बचपन झालिया जिला गोंदिया महाराष्ट्र मे बीता। हाईस्कूल आमगांव , गोंदिया से, इंजीनियरींग गोंदिया महाराष्ट्र से की।

बंजारा जिंदगी विरासत मे मिली थी, पापा भी बुंदेलखंड से भटकते हुये महाराष्ट्र मे नौकरी करते हुये भटक रहे थे। वही बंजारा जिंदगी हमारे नसीब मे।

लेकिन हमने इस बंजारा जीवन को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया। पहली नौकरी मे ही मध्यभारत से दूर उत्तर भारत गुड़गांव दिल्ली पहुंच गये। रहना दिल्ली मे, नौकरी गुड़गांव मे। अगला डेरा उत्तर से एक दम दक्षिण चेन्नई मे। चेन्नई से निकाला हुआ, पहुंच गये पश्चिम भारत पुणे!

पुणे की जिंदगी रास नही आई, झोला उठाया और आ गये बैंगलोर!

ये तो एक झांकी ही थी, भारत मे सूटकेसो को खोलने और वापिस पैक करने के ठीहे।

जब चेन्नई मे थे तब से एक पैर भारत मे एक अमरीका मे रहता था। हालात तो यह थे कि भारत पहुंचते साथ बास फ़ोन कर बोल देता था कि सूट केस मत खोलना, अगले सप्ताह इस जगह जाना है। शादी से पहले अकेले भटके, शादी के बाद सप्त्निक भटके। अमरीका मे ही मिलफ़र्ड, मिनियापोलीस, न्युयार्क, स्टैमफ़र्ड, क्लिवलैंड, फ़िलाडेल्फ़िआ और रिचमंड मे डेरा रहा। कनाडा मे मांट्रीयल मे फ़्रेंच भाषीयो को अंग्रेजी सीखाई, साउ पाउलो ब्राजील मे मुश्किल से अंग्रेजी मे शाकाहारी खाने का जुगाड़ किया। लंदन मे न्युटन की कब्र पर मत्था टेकने के बहाने तीन महीने बिताये।

पश्चिम से बोर होने के बाद चल पड़े पूरब की ओर। आस्ट्रेलिया मे कंगारु दर्शन के नाम पर तीन साल काट लिये।

इस सूची मे एक दिन दो दिन, एक सप्ताह वाले डेरों का समावेश नही है, उन्हे जोड़े तो "ग्वानझाउ" का फ़्राईड राईस के नाम पर पोर्क फ़्राईड राईस भी आ जाता है!

बस एक अफ़्रीकी महाद्वीप बचा है जहाँ पर कदम नही पड़े है.. वो भी हो जाता बस जोहानिसबर्ग के नाम पर हिम्मत नही हुई।

कुछ अनोखे रिकार्ड भी बनाये। पिछले सप्ताह वाली "स्पिरिट आफ़ विप्रो हाफ़ मैराथन" चार महाद्विपो मे दौड़ चुके है, उत्तरी अमरीका, यूरोप, एशिया और आस्ट्रेलिया।

 गार्गी के आने के बाद जिंदगी मे एक ठहराव आया था, 2013-2017 तक एक ही स्थान बैंगलोर मे टिके रहे। इस साल उसपर भी नजर लगी, वापिस दो सूटकेसो मे कैद जिंदगी का आरंभ हो गया..

 अरे हम भूल ही गये थे कि प्रश्न था कि हम कहाँ से है ?

 उत्तर :
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
 रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
 पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
 अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं।
 वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
 किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं ।
 जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
 कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं।
 चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
 सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं ।
 गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
 हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं ।
-निदा फ़ाज़ली

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मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

सोमवार, सितंबर 03, 2018

2 सितंबर 2015, सोमवार शाम मै वापिस बैंगलोर आने के लिये सपरिवार नागपुर एअरपोर्ट पहुंचा। एअरपोर्ट के अंदर आने पर पीछे से आवाज आई "आशीष भैया!"
पीछे मुडकर देखा एक बीस बाईस साल का युवक चला आ रहा है। पास आने पर उसने कहा "पहचाना ? मै ....."! थोड़ा समय लगा उसे पहचानने मे, आखीर मै उसे 17 वर्ष बाद देख रहा था। आखीरी बार जब मैने उसे देखा था तब वो और उसके मित्र गांव की गलियो मे कंचे, गुल्ली डंडा खेलते थे और नहर मे नंग धड़ंग नहाते थे।
उसे एअरपोर्ट पर देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। मै उसकी पृष्ठभूमी से परिचित था। उसके दोनो चाचा मेरे सहपाठी रह चुके थे, मै आगे बढ़ता गया था और वे एक कक्षा मे एक साल, दो साल करते जैसे तैसे हाई स्कूल पहुंचने के बाद पढ़ाई छोड़ कर खेती-किसानी और मजदूरी मे लग गये थे। उसके पिता भी कृषि मजदूर ही थे।
मै पिछले सप्ताह ही गांव गया था। गांव मे सड़क पक्की हो गयी थी, जहाँ तहाँ डिश एंटीना भी दिख रहे थे, लोगो के हाथ मे मोबाईल भी दिख रहे थे। लेकिन यह सारी प्रगति एक छलावा सी लग रही थी, क्योंकि गांव का चौक जहाँ पर बसे रूकती थी अब वीरान हो चुका था। जिस जगह पर देर शाम तक रौनक रहती थी, कई दुकानें थी, अब उजाड़ था। गांव के अंदर भी लोगो को घरो के बुरे हाल थे। मेरे अधिकतर सहपाठी जिन्होने आगे पढ़ाई की थी वे अच्छी जिंदगी की तलाश मे गांव छोड़ चुके थे, और जो आगे नही पढ़ पाये थे वो तो हमारे कालेज के ही दिनो मे गांव छोड़ कर रोजगार की तलाश मे निकल लिये थे। केवल एक ही मित्र मिला था जो दर्जी का काम कर रहा था, मुझसे केवल दो तीन वर्ष बड़ा था लेकिन पचास से उपर का लग रहा था।
अपने इस गांव के ऐसे हालात देखे थे कि संपन्न परिवारों के लड़के ही पढ़ लिख कर आगे बढ़ रहे थे, बाकी केवल मजदूर ही बन रहे थे, चाहे कृषि मज़दूर हो या कारखाना मजदूर। ऐसे मे एक आर्थिक/शैक्षणिक दोनो तरह से पिछड़े परिवार की नयी पीढ़ी का एक नवयुवक हवाई यात्रा कर रहा है, मेरे लिये सुखद आश्चर्य से कम नही था।
मेरी दसंवी कक्षा (सन 1991) मे कुल 152 साथी थे। उसमे से केवल पांच ही आगे बढ़ पाये। दो इंजीनियर(मुझे लेकर) क्योंकि दोनो के पिता शिक्षक थे, तीन शिक्षक, जिसमे से दो के पिता धनी किसान थे और तिसरे के पिता मजदूर थे। इसमे से मजदूर पिता का पुत्र मेहनती था और एक डाक्टर के घर पर काम करता था तो उसे वातावरण अच्छा मिला, पढ़ाई के लिए अपना खर्च निकाल लेता था, जिससे उसे समस्या नही आयी। लेकिन बाकी 147 (40 लड़कीयाँ समेत) वहीं के वहीं रह गये। इनमे से सात-आठ परिवार के पास इतनी भूमि थी कि वे तरीके से कृषि कर पायें, बाकी केवल मजदूर बन कर रह गये। 

आज जब मै अपने सहपाठीयों से मिलता हुं तो वे आंख मिलाकर बात नही कर पाते है, मुझे साहब कह कर बुलाते है और मै शर्म से गड़ जाता हुं। ऐसे वातावरण मे मुझसे अगली पीढ़ी हवाई यात्रा कर पा रही है एक आशा जगा रही थी। मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

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स्पाईवेयर गाथा : हमारा ज्योतिष साफ़्टवेयर

मंगलवार, जुलाई 24, 2018

2001-2002 हम गुड़गांव मे एक कंपनी मे काम करते थे। छोटी कंपनी थी, करीब 400 लोग। साफ़्टवेयर कंपनी और वह समय साफ़्टवेयर सेवा कंपनीओ के लिये सुनहरा समय था। औसत आयु लगभग 22-25 वर्ष।

कंपनी मे माहौल किसी कालेज के जैसे ही होता था। काम के साथ मौज मस्ती खूब चलती थी। महाराष्ट्र से होने के बावजूद भी मेरी एक अच्छी खासी मित्र मंडली बन गई थी, जिसमे कुछ लड़कीयाँ भी थी।

हमारी छवि उन दिनो मे भी एक टेकी, नर्डी बंदे की थी। हमारे क्षेत्र मे कोई भी समस्या का तुरंत हल रहता था हमारे पास, जिससे सारी कंपनी मे सभी मुझे अच्छे से जानते थे, हर किसी से मित्रवत संबध थे।

एक दिन कपिल महाशय आये, बोले "यार तेरे से एक काम है ? बोल करेगा क्या ?"

कपिल महाशय दिलफ़ेंक इंसान थे, कन्याओं के आगे पीछे घूमते रहते थे। लेकिन मुझे लगा कि मेरे पास आया है तो किसी टेकी समस्या के लिये ही आया होगा। हमने बोला, काम बताओ, हमारे बस का होगा तो कर देंगे।

कपिल : "मुझे सुनयना की जन्म तारीख पता करनी है ?" (*नाम बदल दिया है।)
हम : "यार इसमे मै क्या करुंगा ? तु सीधे जाकर उससे पुछ ले ना!"
कपिल : "नही यार , बड़ी अकडु लड़की है! नही बतायेगी। एच आर को बता दिया तो मेरी लग जायेगी!"
हम :"अबे तो मेरी क्यों वाट लगा रहा है ?"
कपिल : " यार तु उससे पुछेगा तो बता देगी, तेरी उससे अच्छे से बनती है!"
हम :"अबे तो जन्मतारीख कैसे पुछुंगा ? उसको क्या लगेगा ?"
कपिल :"कुछ कर यार!"
हम : "ठीक है, कुछ सोचते है!"

मुझे अपना एक पुराना ज्योतिष साफ़्टवेयर याद आया। ये साफ़्टवेयर जन्मकुंडली बनाता था। नाम, जन्मतिथि समय, लिंग, जन्मस्थान की जानकारी देने पर कुंडली बना देता था। साथ मे भविष्य भी बताता था। जन्मकुंडली तो सही बनाता था लेकिन भविष्यवाणी मे कुछ भी रैंडम बना कर दिखा देता था।

उसकी भविष्यवाणी मे सब कुछ मीठा मीठा ही होता था, जैसे -  " आप बहुत मेहनती है, लेकिन मेहनत का पूरा फ़ल नही मिलता है। आप सब पर विश्वास करते है लेकिन लोग आपके विश्वास का गलत फ़ायदा उठाते है। आप का वर्तमान समय कठिन है लेकिन अगले एक-दो वर्षो मे सुनहरा समय आपका इंतजार कर रहा है!"

इस साफ़्टवेयर का सोर्स कोड खोज निकाला। उसमे कुछ बदलाव किये जैसे कि प्रेमसंबधो और वैवाहिक जीवन की भविष्यवाणी। ये भी सब मनबहलाव वाला था, मतलब कि कुछ भी बना कर दिखा दो, बस ध्यान रखो की सब कुछ मीठा मीठा ही हो। लेकिन इस भविष्यवाणी के लिये उपयोगकर्ता को अपने प्रेमी/प्रेमिका/पति/पत्नि का नाम भी देना होगा।

दूसरा बदलाव यह किया कि उपयोग कर्ता की सारी जानकारी वह मेरे कंप्युटर पर भेज देगा। उपयोगकर्ता को केवल जन्मकुंडली और भविष्यवाणी दिखेगी, उसे पता भी नही चलेगा कि पीठ पीछे उसकी सारी जानकारी मेरे पास पहुंच चुकी है।

नये साफ़्टवेयर को अच्छी तरह से टेस्ट किया। सब कुछ ठीक ठाक लगा तो उस साफ़्टवेयर को उस लड़की के साथ कुछ और मित्रो को भेज दिया। साफ़्टवेयर भेजने के पंद्रह मिनट मे ही उस लड़की का सारा कच्चा चिठ्ठा मेरे पास था।

लेकिन जनता रूकी नही, उन लोगो ने साफ़्टवेयर अपने मित्रो के पास भेजा। शाम तक यह हाल था कि मेरे पास कंपनी की 90% लड़कीयों का बायोडाटा था और 50% लड़को का। लड़के पता नही केवल इसे अग्रेषित कर रहे थे, प्रयोग नही कर रहे थे। जबकि लड़कीया प्रयोग कर रही थी लेकिन आगे नही भेज रही थी।

शाम को कपिल आया! पूछा काम हो गया! हमने कहा हो गया लेकिन पहले पार्टी! पित्जा मंगवाया गया, भोग लगाया गया। उसके बाद हमने डाटाबेस खोला। उस कन्या की जन्मतिथि देखी कपिल को बताई। अचानक मेरी नजर प्रेमी/प्रेमिका/पति/पत्नि पर पड़ी, वह कालम खाली नही था और उसमे कपिल का नाम होने की कोई संभावना तो थी ही नही।

उस कालम को कपिल से बचाने की कोशिश की लेकिन उसकी भी नजर पड़ गई। भाई साहब का मूड आफ़ हो गया।

बोले :"आशीष! ये काम तुने अच्छा नही किया!"

हम :" अबे इसमे मै क्या कर सकता हुं। मैने थोड़े ही डाटा डाला है!"

कपिल महाशय का 400 रूपये का चूना लग गया था, भूनभूनाते हुये पैर पटकते हुये चले गये।

दस कदम गया होगा कपिल वापिस आया। बोला "यार ये डाटाबेस मुझे दे दे ?"

हम :" अबे तु इसका क्या करेगा ?"

कपिल :"अबे इसमे सारी सिंगल लड़कीयो की जानकारी भी है, वो गई तो क्या हुआ बाकी की जानकारी काम आयेगी!"

हम :"आंय़!"

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2012 : अवसाद का वह भयावह अनुभव

सोमवार, जुलाई 16, 2018

कल एक मित्र से अवसाद पर चर्चा हुई और मुझे अपना अवसाद वाला एपिसोड याद आ गया।

अप्रैल/मई 2012 हम लोग उस समय सिडनी आस्ट्रेलिया मे थे।

मेरा प्रोजेक्ट समाप्त हो गया था, पोस्ट प्रोडक्शन सपोर्ट का काम था, वह भी बैंक का तो कभी भी फोन आ जाते थे। कुल मिलाकर 24x7 अलर्ट रहना होता था। कुल मिलाकर तनाव वाला काम था।

उन्ही दिनो मुझे अचानक गैस, एसीडीटी संबंधित समस्या होने लगी। जैसे ही पेट खाली होता अचानक पेट फूलने लगता, खट्टी डकारे , बैचेनी होती थी। कुछ खाने या एंटासीड लेने पर राहत मिलती थी। यह सिलसिला एक महीने तक चला। डाक्टर से मिला, डाक्टर ने कुछ जांच की और एक दवाई दी। उससे राहत मिली, लेकिन तात्कालिक। इस राहत से डाक्टर को शक हुआ कि मेरे पेट मे कुछ बैक्टेरीया है जो गैस बना रहे है, जिसके लिये एंटीबायोटिक का कोर्स लेना होगा। लेकिन इस कोर्स को प्रारंभ करने से पहले  उन्हे खाली पेट सांस की जांच करनी थी जिससे यह संक्रमण तय हो जाये। दूसरी समस्या यह थी कि मैने जो दवाई ली थी, उसके असर के पूरी तरह समाप्त होने तक यह जांच नही की जा सकती थी, जिसके लिये 30 दिन लगते। डाक्टर ने सीधे कह दिया कि तब तक एंटासीड से काम चलाओ। एंटीबायोटिक पूरी तरह से संक्रमण तय होने के बाद ही दिये जायेंगे।

इतने मे मेरे भारत आने का कार्यक्रम बना। भारत मे एक गैस्ट्रोएंटरोलॉजीस्ट से मिला। उन्होने लक्षणो के आधार पर ही एंटीबायोटिक कोर्स प्रारंभ कर दिया। साथ मे उन्होने एक और दवाई लिओसल्प्राईड भी दे दी। कहा कि पूरा कोर्स होने के बाद दवाईयाँ बंद कर देना। हम खुश।

कुछ दिनो बाद वापिस सिडनी पहुंचे। कोर्स पूरा होने के बाद दवाई बंद कर दी। जिस दिन से दवाई बंद की दूसरे दिन से नींद गायब, मन उदास। एक दिन निकला , दूसरा दिन निकला, समस्या वही! सारी रात जागता था, नींद आने का नाम नही। धीरे धीरे समस्या बढ़ने लगी, अचानक गर्मी लगती थी, घबराहट होती थी, दिल की धड़कन तेज हो जाती थी। मन एकदम उदास रहता था, किसी भी बात मे मन नही लगता था। समझ मे आने लगा था कि यह अवसाद (डीप्रेशन/एंजायटी) के लक्षण है लेकिन सोचा कि कुछ दिनो मे ठीक हो जाउँगा। दो सप्ताह बीत गये हालत और खराब हो गये, ऑफ़िस जा रहा था लेकिन उदास मन से काम भी कर रहा था लेकिन हर बात से डरने लगा था। फ़ोन की घंटी से, इमेल से जैसे इनसे कोई बुरी खबर आ रही हो।

निवेदिता मुझे पैरामेटा के अस्पताल की इमरजेंसी मे लेकर गई। ढेर सारी जांच हुई, सीटी स्कैन हुआ। सारी रिपोर्ट सामान्य। डाक्टर हैरान कि समस्या क्या है। अचानक मेरे मन मे आया कि इन्हे भारत का प्रिस्क्रिप्शन दिखाया जाये। डाक्टरो ने जैसे ही प्रिस्क्रिप्सन देखा, दूसरे डाक्टरो को बुलाया। नये डाक्टर ने कुछ सामान्य प्रश्न पुछे। नया डाक्टर भारतीय ही था। उसके बाद अचानक पूछा कि तुम्हें कोई आत्मा दिखती है, देवी आती है  जो तुम्हें आदेश देती है, बातें करती है ?

मैने कहा नही तो ? आप यह प्रश्न क्यों पुछ रहे है ?

पता चला कि नये डाक्टर मनोचिकित्सक (साइकियाट्रीस्ट) थे। उन्होने कहा कि तुम्हें भारत मे लिओसल्प्राईड क्यों दी थी ?

मैने कहा एसीडीटी/गैस के कारण!

डाक्टर :  तुम्हे डाक्टर ने इसे बंद कैसे करना है बताया था ?

हम : नही! आप ये क्यों पुछ रहे है ?

डाक्टर : लिओसल्प्राईड स्क्रिजोफ़ेनिआ के मरीज़ो को भी देते है। यह मानसिक रोगों के लिये प्रयुक्त होने वाली दवा है। तुम्हें इस दवा के अचानक बंद करने से उसने डिप्रेसन/एंजायटी को ट्रिगर कर दिया है।

इस मनोचिकित्सक ने अपने सिनियर को फोन किया, वे उस समय उपलब्ध नही थे। ऐसे भी रात के बारह बज गये थे। डाक्टर ने कहा कि आपको कम से कम एक दिन भरती रहना होगा। कल एक डॉक्टरों की एक टीम आपसे चर्चा करेगी उसके बाद आगे का इलाज तय होगा।

इस अस्पताल मे भर्ती थे हम
हम बोले ठीक है। उन्होने मेरे उस अस्पताल से दूसरे अस्पताल मे भेजने की तैयारी शुरु कर दी। जिंदगी मे पहली बार एंबुलेंस की सवारी की। जब दूसरे अस्पताल पहुंचे तो पता चला कि वह मनोचिकित्सालय था। एडमीशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्होने निवेदिता को वापिस भेज दिया और दूसरे दिन आने कहा।

उन्होने मुझे अंदर वार्ड मे भेजा, अंदर जाते साथ एक महिला को देखा, वह टहल रही थी, मुझे देखते साथ बोली "एक और आ गया..."

मनोचिकित्सालय का अनुभव बहुत बुरा होता है। इसमे हर कमरे मे सीसीटीवी होते है, ताले मुख्य नियंत्रण कक्ष से खुलते और बंद होते है। अब तक मै सामान्य था, लग रहा था कि अस्पताल मे हुं ठीक हो जाउंगा। लेकिन मनोचिकित्सालय के पहले दो घंटो के अनुभव ने डरा दिया। तय कर लिया कि कल डाक्टरो से बात कर इस अस्पताल से तो निकलना ही है।

नर्स आई, उसने मुझे नींद की दवाई दी। जीवन मे पहली बार नींद की दवाई ली, दो सप्ताह बाद नींद के आगोश मे पहुंचा। चार पांच घंटे ही सोया था कि सबको जगा दिया गया। नहाने का आदेश हुआ, नाश्ता मिला। पता चला कि अब पूरा दिन बाहर बिताना है, वार्ड का दरवाजा बंद हो गया है। इन सबमे दस बज गये।

दस बजे मुझे एक कमरे मे बुलाया गया। दो डाक्टर थे। सारा इतिहास पूछा गया। इस बार प्रश्न कुछ इस तरह से थे कि वे जानना चाह रहे थे कि मुझ मे आत्महत्या वाले या हिंसक लक्षण तो नही दिख रहे। सब कुछ होने के बाद उन्होने बताया कि मुझे एंजायटी और डीप्रेशन है जिसके लिये तीन महीने एंटी डीप्रेशन की दवायें लेनी होगी और इस दौरान हर सप्ताह मनोचिकित्सक से मिलना होगा। साथ मे उन्होने यह भी कहा कि मेरा विटामीन डी स्तर कम है, और रक्त जांच मे हायपोथायराइड्ज्म के लक्षण दिख रहे है। ये दो कारक भी अवसाद के लिये जिम्मेदार हो सकते है।

उसके बाद उन्होने निवेदिता को बुलाया, उसका लंबा इंटरव्यू लिया। यह इंटरव्यू यह जानने था कि वह मेरी देखभाल कर पायेगी या नही। पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद उन्होने मुझे डीस्चार्ज कर दिया। दो सप्ताह के लिये नींद की दवायें दी गई, और साथ मे एंटीडीप्रेशन की दवाई। कहा कि नींद की दवाये एडीक्टीव होती है, उन्हे जितनी जल्दी हो सके बंद कर दो।  चाय/काफ़ी कम कर दो। अच्छी नींद के लिये "स्लीप हायजीन" का पालन करो। जीम जाओ, दौड़ लगाओ , इन गतिविधियों से अवसाद रोधी हार्मोन निकलते है।

घर आये, पहली रात नींद की गोली से चार पांच घंटे सो पाया। मानसीक दृढता इतनी थी कि दो गोली की बजाय एक ही गोली लेकर सोया था।

सुबह दस बजे घर की घंटी बजी, पता चला कि अस्पताल वालो ने मेरी जांच के लिये दो वालींटीयर भेजे थे। वो सब कुछ देखकर पूरी तरह संतुष्ट हो कर गये।

अगले कुछ दिन संघर्ष के थे, मन उचाट तो रहता था, नींद केवल दवाई से आती थी। लेकिन निवेदिता मुझे व्यस्त रखती थी। दोपहर मे माल ले जाते थी, शाम को पैरामैटा नदी के किनारे के पार्क मे। इस सबसे यह हुआ कि नींद की दवाई एक सप्ताह बाद ही बंद कर दी।

दूसरे सप्ताह से हालात सुधरे। सुबह के कुछ घंटे भारी होते थे लेकिन शाम को मन ठीक हो जाता था। दस दिन बाद ऑफ़िस जाना आरंभ कर दिया। डाक्टर से दोबारा मिला, वह मेरी प्रगति देख कर खुश हो गया था।

मेरा कोर्स तीन महीने का था लेकिन छः सप्ताह के बाद डाक्टर ने मेरी प्रगति को देखकर दवा आधी कर दी और आठ सप्ताह बाद बंद कर दी।

अवसाद का यह एपिसोड इतना भयावह था कि दवा के बंद होने के बाद मै दो साल तक गिनता था कि दवाई बंद किये आज एक सप्ताह हुआ, आज एक महिना हुआ, आज एक साल हुआ।

अवसाद के इस एपिसोड से मुझे पता चला कि इससे प्रभावित लोगो की हालत क्या होती है, वे चाहकर भी खुश नही हो पाते है। आनंद उत्पन्न करने वाले रसायन ही नही बनते है या कम बनते है। यह वह दौर होता है जब उन्हे बाह्य सहारे की आवश्यकता होती है। लेकिन भूलकर भी उन्हे भाषण ना पिलाये, लेक्चर ना दे, उन्हे भावनात्मक सहारा दे। यह वह दौर है जो उन्होने निमंत्रित नही किया है।

अवसाद(डिप्रेशन) ना तो फैशन है, ना ही नौटंकी। यह माना जाता है कि अवसाद हर व्यक्ति को जीवन मे कम से कम एक बार अवश्य घेरता है, अधिकतर मामलो मे व्यक्ति इससे कुछ समय मे स्वयं ही उबर जाता है लेकिन कुछ मामलो मे चिकित्सीय सहायता की आवश्यकता होती है।

मै कभी भी नही चाहुंगा कि अवसाद की छाया किसी पर भी पड़े, इसके परिणाम ना केवल उस व्यक्ति के लिये, साथ ही उसके निकट के लोगो के लिये भयावह हो सकते है। अवसाद कई वजहो से हो सकता है, किसी दुर्घटना से, किसी नीजी, व्यवसायिक हानि से, किसी निकट के व्यक्ति से दुराव से, किसी दवा के दुष्प्रभाव से।

अवसाद केवल असफ़ल प्रेम प्रसंगो से, महत्वाकांक्षा के पूरे ना होने से ही नही होता है, इसके पीछे कई अन्य कारण हो सकते है।

कुछ कारणो मे शामील है

  1.  विटामीन डी की कमी जो कि सूर्य प्रकाश ना मिलने से होती है और यह कमी सर्दी-बरसात के दिनो मे भी हो सकती है, आपको बिना किसी मानसिक कारण के अवसाद मे धकेल सकता है।
  2. हायपोथायराईड - थाईराइड हार्मोन के उचित मात्रा मे नही बनने से भी अवसाद आ सकता है। तंत्रिका तंत्र, हृदयरोग की कुछ दवाईयाँ भी अवसाद को आमंत्रित कर सकती है।


ऐसा भी नही है कि आधुनिक जीवन शैली, नाभिकिय परिवार , आत्मकेंद्रित जीवन ही अवसाद के लिये उत्तरदायी हो, भरे पूरे परिवार मे भी अवसाद से आत्महत्या होते रही है।

भारतीय समाज अवसाद को गंभीरता से नही लेता। वह मनोचिकित्सको को पागलो का डाक्टर मानता है।

अवसाद ग्रस्त व्यक्ति हताशा मे क़दम नही उठाता है, वह सब जानता है , समझता है। उसका मस्तिष्क किसी स्वस्थ व्यक्ति के जैसे ही सक्रिय होता है। कई मामलों मे जैसे किसी आपदा, दुर्घटना से निपटने मे अवसाद ग्रस्त व्यक्ति किसी अन्य व्यक्तियों से बेहतर होते है क्योंकि वे सबसे बुरी परिस्तिथि , बुरे परिणाम की कल्पना कर चूके होते है।

अवसाद ग्रस्त व्यक्तियों मे आनंद की अनुभूति , जीने की ललक उत्पन्न करने वाले हार्मोन कम बनते है। यह किसी दुर्घटना, स्वास्थ्य कारणों, मानसिक तनाव या किसी ड्रग, नशे के कारण भी हो सकता है। हार्मोनों के प्रभाव के कारण उसे किसी भी बात मे आनंद नही आता है, जीने की ललक समाप्त हो जाती है।

उन्हे भाषण की नही चिकित्सक , परिवार के सहारे की आवश्यकता होती है। जब भी आप अपने आसपास के किसी व्यक्ति के व्यवहार मे अचानक परिवर्तन देखे, वह अकेला रहना पसंद करने लगे, शांत रहने लगे, चिड़चिड़ा हो जाये तो उसपर ध्यान दे। हो सकता है कि वह आपके इस सहानुभूति वाले व्यवहार से भी चिढ़ जाये , लेकिन आपको ही , परिवार को ही उसे सम्हालना है। उसे भाषण ना दे, बस कारण जानने का प्रयास करे, मनोचिकित्सक की सहायता ले।

इसके बाद भी आप इसे फैशन या नौटंकी मानते है तो अवसाद ग्रस्त व्यक्ति को मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता हो या नही, आपको अवश्य है।

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रिवर्स इंजीनियरींग

बुधवार, जुलाई 04, 2018

1993: कालेज मे इंजीनियरींग का प्रथम वर्ष। भौतिकी प्रयोगशाला, प्रयोग कांच का रिफ़्रेक्टीव इंडेक्स ज्ञात करना। एक टीम मे चार लोग थे। हम लीडर..
परिणाम पहले से ज्ञात था, उत्तर 1.5 आना चाहिये था। टीम के बाकी लोगो को कहा कि तुम लोग शुरु हो जाओ, हम रीडींग(निरिक्षण) तैयार करते है। रिफ़्रेक्ट्रीव इंडेक्स गणना के सुत्र से उल्टा चलते हुये रीडींग के तीन सेट तैयार कर लिये।
उपकरणो से थोड़ी देर खेल कुद छेडछाड़ की, प्रेक्टीकल जरनल अपडेट किया और प्रफ़ेसर के पास पहुंच गये। प्रफ़ेसर ने रीडींग देखी , परिणाम देखा उसके बाद हम लोगो को देखा। मुसकराये बोले 
"बच्चो तुम जैसे सैकड़ो हर साल मेरे पास आते है। मै भी पूरे ध्यान से, पूरी सतर्कता से प्रयोग करुंगा ना, तो परिणाम इतने सटिक नही आयेंगे। ये रिवर्स इंजीनियरींग भविष्य मे करना, यहाँ पूरे ध्यान से प्रयोग करो।"
हम फ़ंस गये। प्रफ़ेसर ने कहा, चलो हम तुम्हारे साथ आते है। प्रफ़ेसर ने हमारे साथ पूरे फ़ंडे समझाते हुये विधिविधान से प्रयोग कराया। रीडींग के तीन सेट लिये। फ़ार्मूले मे रीडींग डाली, गणना की उत्तर आया : 1.420
1 घंटे का प्रयोग होशियारी दिखाने के चक्कर मे तीन घंटो का हो गया था। प्रफ़ेसर को परिणाम दिखाया। वो फ़िर से मुस्कराये और कहा, बढीया। इस परिणाम मे दशमलव के बाद वाली संख्या तुम लोगो के लिये ही है।
लेकिन हम सुधरे तो नही, लेकिन सावधानी बरतनी शुरु कर दी, अब हम सटीक परिणाम नही लाते थे, उसके आसपास ही लाते थे!

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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