शिक्षक दिन 2015 : मेरे जीवन को गढ़ने वाले महानुभावो का आभार

शनिवार, सितंबर 05, 2015

आज शिक्षक दिन है। आज मै जो कुछ भी हुं, अपने शिक्षकों की दी हुयी शिक्षा के कारण। मेरे इन शिक्षकों मे मेरे स्कूली शिक्षकों के अतिरिक्त हर वह व्यक्ति शामिल है जिससे मैने कोई सबक प्राप्त किया है।

जब भी मै अपने शिक्षकों के बारे मे सोचता हुं, सबसे पहले मुझे याद आते है मेरे अपने पापा, जो स्वयं एक शिक्षक थे। उन्होने ही मेरी औपचारिक शिक्षा का आरंभ अक्षर ज्ञान कराया था। हाथों मे कलम पकड़कर स्लेट पर अक्षर लिखना सिखाया था, उसके बाद होल्डर पेन से कॉपी पर लिखना भी।

मेरा बचपन एक छत्तीसगढ़, मप्र की सीमा पर स्थित ज़िला गोंदिया महाराष्ट्र के एक गांव झालिया मे बीता है। पास के गांव कावराबांध के ज़िला परिषद हाई स्कूल मे मेरे पापा गणित और विज्ञान के शिक्षक थे। इस क्षेत्र की की कम से कम तीन से चार पीढ़ी को पापा ने गणित और विज्ञान पढ़ाई है। पापा के जाने के लगभग 17 वर्ष बाद भी जब मै उस क्षेत्र से गुजरता हुं, मेरी पहचान मेरे अपने नाम से नही, मेरे पापा के नाम से है, लोग आज भी मुझे श्रीवास्तव गुरूजी का लड़का के नाम से जानते है।

जब से मैने होश सम्हाला था पापा को अपने छात्रों मे मध्य ही पाया था। पापा स्कूल मे तो पढ़ाते ही थे, लेकिन पापा के पास पढ़ने के उनके छात्र सुबह से आ जाते थे। घर के बाहर आंगन मे पापा इन लोगो को चटाई पर बिठाकर हर छात्र को उसकी क्षमता के अनुसार प्रश्न हल करवाते रहते थे। हर छात्र पर पापा का निजी ध्यान रहता था, एक छात्र ज्यामिति के प्रश्न हल कर रहा होता, तो दूसरा बीज गणित के समीकरणों मे उलझा रहता था। शाम को पापा जब स्कूल से लौटते तब भी रात के आठ नौ बजे तक उनके छात्र फिर से आ जाते थे। स्कूल के बाहर पापा का छात्रो को पढ़ाना ट्युशन नही था, पापा इसके किसी से कोई फ़ीस नही लेते थे। होता यह था कि पापा के हाईस्कूल मे जो अधिकतर छात्र पहुंचते थे, उनका गणित का आधार पूरी तरह से गायब रहता था। अधिकतर छात्र किसानो के पुत्र, और स्कूल सरकारी, किसी मे शिक्षक है, तो किसी मे नही। स्कूल मे शिक्षक हो तो भी मातापिता द्वारा प्राथमिक स्कूल और कृषि कार्य मे कृषि कार्यो को प्राथमिकता। अब ऐसे छात्रो स्कूल के समय मे पाठयक्रम संबंधित ही पढाया जाये तो सारा का सारा ज्ञान उनके सर के उपर से चला जाता था, ऐसे छात्रो को पापा घर आने कह देते थे।  अधिकतर छात्र इसके बदले मे कभी सब्ज़ियाँ, कभी गन्ने, कभी हरे चने, या उनके खेतो मे जो भी कुछ उग रहा हो ला देते थे। जब मै छोटा था, स्कूल प्रारंभ नही किया था, इन सभी के साथ पापा मुझे भी पढ़ाते थे।

जब मै चार वर्ष का हुआ तो पापा ने मुझे स्कूल हिंदी पूर्व माध्यमिक शाला झालिया मे पहली कक्षा मे भर्ती करवा दिया। यह 1980 का वर्ष था। यह स्कूल पहली से सांतवी तक था। इस स्कूल के मुख्याध्यापक थे लिल्हारे गुरूजी । छह फ़ीट उंचे, हट्टा कट्टा शरीर, भीड़ मे दूर से नजर आने वाला व्यक्तित्व। पढ़ाने मे सौम्य लेकिन ग़लती करने पर सजा देने मे उतने ही कठोर। जब हमारे कक्षा शिक्षक ना आयें हो तब वे ही पढ़ाते थे। उन्होने औपचारिक शिक्षा सातवी कक्षा तक ही प्राप्त की थी और शिक्षक बन गये थे। बाद मे उन्होने द्सवी कर ली थी। उन्होने हमे पहाड़े कुछ इस तरिके से याद करवाये थे कि मुझे आज तक तीस तक के पहाड़े याद है। वर्ग करना, वर्गमूल निकालना के आसान तरीके भी सिखाये थे।

कक्षा एक से लेकर तीसरी तक मेरे कक्षाध्यापक थे जामुनकर गुरूजी । सुबह ग्यारह बजे से लेकर शाम के पांच बजे तक जामुनकर गुरूजी हमे हिंदी, गणित जैसे विषय पढ़ाते थे। घर मे ही अक्षर ज्ञान हो जाने के कारण मै हिंदी लिख लेता था और सरल वाक्यो को पढ़ भी लेता था। ऐसे मे जामुनकर गुरुजी को जब कक्षा से बाहर जाना होता था मुझे मेज पर खड़ा कर श्यामपट पर लिखने और बाकी कक्षा को अपनी अपनी स्लेट पर नकल करने लगा देते थे। तीन  वर्षो तक जामुनकर गुरूजी ने हमे अक्षरज्ञान, गणित, पहाड़े, हिंदी जैसे विषय पढ़ाये। जामुनकर गुरूजी की एक ख़ासियत थी, वे पिछड़े समाज से आने वाले छात्रो पर विशेष ध्यान देते थे। मुझ पर तो सबसे अलग ही ध्यान रहता था, किसी भी गलती पर वे मुझे अन्य छात्रो से कठोर सजा देते थे, उनका कहना होता था कि तुम एक शिक्षक के पुत्र हो कर गलती करोगे, तो बाकी तुम्हारी नकल करेंगे। उस समय मुझे उन पर क्रोध आता था, अब मै जानता हुं कि वे सही थे।

कक्षा चौथी मे हमारे कक्षाध्यापक थे तिवारी गुरूजी। अब हमारे विषय बढ़ गये थे, कक्षा मे हिंदी, गणित, इतिहास, भूगोल और विज्ञान पढ़ाये जाते थे। तिवारी गुरूजी  का पढ़ाने का अंदाज अलग था। वे किसी भी एक छात्र को खड़ा कर पुस्तक पढ़ने लगा देते थे और उसके बाद समझाते थे, साथ मे कापीयों मे महत्वपूर्ण बाते लिखवाते जाते थे। इस वर्ष हमने अपनी कक्षा की दिवारो पर हर विषय की महत्वपूर्ण तथ्यों को चित्रो और आलेखो से सजा दिया गया था। जब हमारे स्कूल का वार्षिक निरीक्षण हुआ था तब हमारी कक्षा को विशेष रूप से प्रदर्शित किया गया था। तिवारी गुरुजी स्कूल मे होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रमो के प्रभारी थे। वे एक अच्छे नाटक लेखक और निर्देशक भी थे। उनके निर्देशन मे हमने स्कूली स्तर पर कई नाटको मे भाग लिया था, इसमे से एक नाटक "शिवाजी द्वारा अफजल खान वध" तथा "भील आदिवासी नृत्य" का मंचन तो काफ़ी बार हुआ था।  तिवारी गुरूजी को इन दो कार्यक्रमो के द्वारा काफ़ी प्रसिद्धी मिली थी।

कक्षा पांचवी मे हम आये शेख बहनजी के अंतर्गत। पांचवी मे दो विषय बढ़ गये थे, अब हिंदी के साथ अंग्रेजी और मराठी भी आ गये थे, गणित, विज्ञान, इतिहास, भूगोल और नागरिक शास्त्र तो थे ही। शेख बहनजी काफी सौम्य शिक्षिका थी। स्कूल का संगीत विभाग उन्ही के अंतर्गत था। मराठी का पहला पाठ मैने शेख बहनजी से ही पढ़ा था। पांचवी मे गणित के अतिरिक्त सभी विषय शेख बहनजी ने ही पढ़ाये थे। इस दौरान स्कूल मे नैकाने गुरूजी आ गये थे, उन्होने पांचवी से लेकर सांतवी तक गणित पढ़ाया। नैकाने गुरूजी की विशेष कृपा मुझ पर रहती थी, वे जानते थे कि मै अपना अपना काम सबसे पहने समाप्त करने के बाद दूसरो को तंग करता हुं, तो वे बाकि सहपाठीयों की तुलना मे दोगुना प्रश्न दे देते थे। पिटाई, मुर्गा बनना या खड़ा रहना बोनस मे रहता था। वैसे गणित की कक्षा समाप्त होने पर शेख बहनजी के आने पर सजा समाप्त हो जाती थी। शेख बहनजी से सब कुछ अच्छे से पढ़ाया लेकिन वे भी अपने सारे प्रयासो बावजूद मेरे गले से सूर नही निकाल पायी, मै हमेशा की तरह बेसुरे तरिके से गाता था, और आज भी वही हाल है।

कक्षा छठी मे टाटी गुरूदेव ने पढ़ाया। टाटी गुरूदेव वे शिक्षक है जिनका प्रभाव मेरे जीवन पर काफी रहा है। पापा को पढ़ने का शौक था ही, बचपन से ही खिलौने से ज्यादा पुस्तके देखी थी। अब टाटी गुरूदेव के साथ, भाषण देना, वाद विवाद प्रतियोगिता मे भाग लेना, सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता मे भाग लेना भी जुड़ गया था। स्वयं स्फूर्त भाषण और वादविवाद प्रतियोगीताओं मे स्कूली दिनो से लेकर कालेज के दिनो तक  भाग लिया, ढेरो इनाम जीते, जिसका पूरा श्रेय टाटी गुरूदेव को जाता है। मेरे स्कूली दिनो मे कक्षा चौथी और सांतवी मे महाराष्ट्र शाषन द्वारा एक बुद्धिमत्ता परिक्षा होती थी, इसमे सफ़ल होने पर शिष्यवृत्ती मिलती थी। टाटी गुरूदेव ने हम लोगो को उसके लिये तैयार करवाया, और मैने चौथी और सांतवी दोनो मे परिक्षा पास की थी। इस कारण मुझे पांचवी से दंसवी तक हर वर्ष शिष्यवृत्ती मिलती थी। स्कूल मे शारीरिक शिक्षण विभाग भी टाटी गुरूदेव के ही जिम्मे था, योग और उसके सभी आयामो का परिचय उन्होने ही करवाया। सुबह उठकर दौड़, योग, स्नान के पश्चात ही कुछ करने की उन्होने जो आदत हम लोगो मे डलवायी थी, वह आज लगभग तीस वर्ष पश्चात आज भी है। टाटी गुरूदेव ने मुझे गायत्री मंदिर आमगांव के पुस्तकालय मे सदस्यता दिलवायी। वेदो से पहला परिचय उसी समय लगभ दस ग्यारह वर्ष की उम्र मे हुआ, शायद यही वह समय था जब मेरे मन मे नास्तिकता का बीज भी पड़ गया था। टाटी गुरूदेव से बहुत कुछ सीखा, जिसे एक पैरा या कुछ पन्नो मे भी व्यक्त करना मुश्किल है। टाटी गुरूदेव  से एक शिकायत भी रही कि वर्ष मे एक संक्षिप्त दौर ऐसा आता था कि कि वे कुछ सप्ताह के लिये शराब के ग़ुलाम हो जाते थे। वे कुछ सप्ताह के दौरान चौबीस घंटे मे नशे मे धुत्त रहते थे, कभी सड़क किनारे नाली मे भी पडे मिलते थे। उस समय उनसे डर भी लगता था लेकिन उस दौर के गुजरने के बाद वे सामान्य हो जाते थे।

कक्षा सातवी मे आये कुराहे गुरूजी। कुराहे गुरूजी ने हमारी अंग्रेजी सुधारने मे काफी मदत की थी। उन्होने काफ़ी प्रयास किया था कि मै पढ़ाई के अतिरिक्त खेलों मे भी भाग लुं, मुझे जबरन कबड्डी और खो खो टीम मे डाल देते थे, लेकिन हम खेल मे भाग लेने की बजाय मैदान से ही भाग लेते थे।

लिल्हारे गुरूजी, जामुनकर गुरूजी, तिवारी गुरूजी, शेख बहन जी, नैकाने गुरूजी, टाटी गुरूदेव, कुराहे गुरूजी वे शिक्षक थे, जिन्होनें मेरे भविष्य की नींव डाली। इस नींव पर इमारत खड़ी करने का कार्य हाईस्कूल के आंठवी से दसंवी मे शिक्षक तांडेकर सर, मच्छीरके सर, बसोने सर, रहांगडाले सर और दोनोड़े सर ने की। जुनियर कालेज मे यह कार्य बोरकर सर तथा पसिने सर ने किया।


मेरे जीवन को गढ़ने वाले महानुभावो , मै जानता हुं कि आप सब इस लेख को नही पढ़ पा रहे है लेकिन आज शिक्षक दिन पर आप सब की याद आ रही है, मै आप सबका आभारी हुं। पापा और जामुनकर गुरूजी आप दोनो तो चले गये हो, अब तो बहुत से शिक्षको के वर्तमान के बारे मे मेरे पास ज्यादा जानकारी भी नही है लेकिन आशा है कि आप सभी सकुशल और प्रसन्न होंगे। आप सबका आभार और धन्यवाद!

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फोन आया, फोन आया, बैंक वालो का फोन आया

गुरुवार, फ़रवरी 26, 2015

कल आफीस मे बैठा काम कर रहा था, ज्यादा काम नही था, थोड़ा बोर हो रहा था। इतने मे फोन की घंटी बजी, दूसरी ओर से एक मधूर आवाज आयी।

"सर हम लेना-देना बैंक से बोल रहे है। क्या आप हमे दो मिनट का समय दे सकते है?"

हम समझ गये कि ये महोदया या तो हमे लोन देगी या क्रेडिट कार्ड। दोनो की हमे आवश्यकता तो नही है लेकिन बोर हो ही रहे थे, बतियाने मे कोई हर्ज नही था।

"दो मिनट, अजी आप पूरा घंटा लीजिये, हमे कोई परेशानी नही है जी!"

वो थोड़ा हड़बड़ा गयी "ह्म्म म म, सर आपके लिये हमारे लिये एक अच्छी आफर है। हम आपको अत्यंत कम दरो पर पर्सनल लोन दे सकते है।"

"जी, जी, आपने सही समय पर फोन किया, आप हमे लोन दे सकती है जी। 15 लाख मिलने की आशा थी ओ तो मिले नही, बस आप ही बेड़ा पार करवा सकती है।"

"ठीक है सर, आप को कितना लोन चाहिये ?"

"आप कितना दे सकती है जी?"

"सर , वो तो आपके प्रोफ़ाईल को जानने के बाद ही बता सकते है।"

"ठीक है जी, आप पुछीये जी"

"सर आप किस कंपनी मे काम करते है?"

"मेरी कंपनी ? मेरी कंपनी बहुत बड़ी है जी, उसको लोन नही चाहिये जी, लोन मुझे चाहिये।"

"सर आप गलत समझे, लोन आपको ही देंगे, लेकिन उसके लिये आपकी कंपनी की जानकारी चाहिये।"

"मैडम जी, जब लोन मुझे चाहिये, तो आपको मेरी कंपनी की जानकारी क्यों चाहिये ?"

"सर,हमारा बैंक  आपके लोन की राशी आपकी कंपनी के आधार पर तय करेगा।"

"लेकिन मैडम जी, मेरी कंपनी बहुत बड़ी है जी, उसको लोन नही चाहिये, लोन मुझे चाहिये, आप मेरी कंपनी के बारे मे क्यों पुछ रही है?"

"सर आप को लोन देने के बाद आप उसे वापिस कैसे करेंगे, वह जानने के लिये आपकी कंपनी की जानकारी चाहिये।"

"लेकिन मैडम जी, लोन तो मुझे मिलेगा ना, वापिस मै करुंगा, आपको मेरी कंपनी से कुछ लेना देना नही है ना।"

"सर लेकिन बैंक आपको लोन देने के लिये जानना आवश्यक है कि आप उसे वापस कैसे करेंगे ?"

"मैडम जी, पहले आप लोन तो दे दो, वापस करने की बाद मे बात कर लेंगे।"

"सर आप समझ नही रहे है।"

"मैडम जी, आप समझा दिजिये ना।"

"सर मै एक काम करती हुं , आप अपनी कंपनी का पता दिजीये, बैंक का एजेंट आपसे मिलने आयेगा, वो आपको सब समझा देगा।"

"मैडम, आप नही आयेंगी ?"

"धड़ाक!"

मैडम जी ने गुस्से से फोन पटक दिया! अब आप ही बताओं कि हमने क्या गलत कहा था?

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पर्स गाथा : एक फक्कड़ के हाथो पर्स की दुर्दशा महागाथा

मंगलवार, फ़रवरी 24, 2015

वेलेन्टाईन दिवस पर श्रीमती जी ने पर्स उपहार मे दिया। पर्स हमारा लेकिन पसंद उनकी लेकिन हमने ये सोच कर ले लिया कि ऐसे भी हमारा पर्स हमारे पास होता ही कहाँ है? पर्स निकालने की  आवश्यकता तो उनके ही आदेश के अनुसार ही होती है, हमारे पर्स पर 75% हक तो उन्ही का होता है।

पुराने पर्स ने चीजे निकालकर नये पर्स मे डाल रहे थे और सोचने लगे कि पर्स हमारे जीवन मे कब आया। याद आया कि मेरे पापा पर्स नही रखते थे। ऐसा नही कि पापा ने कभी पर्स नही खरीदा हो। उन्होने कुछ दफा पर्स या मम्मी की भाषा मे "मनीबैग" खरीदा अवश्य था। पापा का पर्स जब भी खरीदा गया वो तारीख महीने के पहले सप्ताह मे होती थी और दूसरे सप्ताह ही पर्स घर के किसी कोने मे पड़ा होता था। अब जब पर्स मे पैसे ही ना हो, तो जेब मे पर्स डालकर घूमने वालो मे से तो पापा थे ही नही। उनके जेब मे ऐसे भी चाक के टूकड़ो के साथ पड़े पड़े पर्स उन कुछ गीने चुने दिनो मे भी कसमसाता रहता होगा। सोचता होगा कि इन चाक के टूकड़ो ने मेरे अच्छे श्याम रंग पर सफेदा पोत कर बरबाद कर दिया है।

मेरे स्कूली दिनो मे पर्स रखने का तो प्रश्न ही नही होता। कालेज के दिनो मे भी पर्स नही रखा था, उन दिनो मे ऐसे भी हम एक बड़ा सा पिठ्ठू बैग लटकाये घूमते थे, जिसमे कापी किताबे, कैल्क्युलेटर, पेन, पेंसील तथा रेलवे का मासिक पास रखा होता था, उसी के साथ दोपहर मे खाने के लिये लंचबाक्स। लंचबाक्स मे मम्मी की मेहरबानी से इतने परांठे होते थे कि स्वयं की पेटपूजा के साथ 1-2 होस्टल के दोस्तो की आत्मा भी तृप्त हो जाती थी। इस आत्मातृप्ती के बदले मे शाम को वो भी हमे कालेज की कैंटीन मे या गेट के बाहर की टपरी पर समोसो का भोग लगा देते थे। कालेज आने जाने घर से ट्रेन और साईकल का माध्यम था। खाने के लिये कोई समस्या नही थी तो जेब मे पैसों की भी आवश्यकता नही थी। पर्स रखने का सवाल ही नही था।

कालेज के दिन गुजरे। पहली नौकरी मिली, वेतन भी ज्यादा नही था। यही कोई आठ हजार रूपये मासिक के आसपास। छोटी कंपनी थी, वेतन नगद मे मिलता था। महिने प्रारंभ मे अपने हिस्से का कमरे का किराया, कमरे के खर्च मे अपना हिस्सा, खाने की मेस का पैसा, ट्रेन का मासिक पास देने के बाद जो बचता था, वो घर भेज देते थे। फक्कड़ी के इस दौर मे पर्स की आवश्यकता ही महसूस नही हुयी। ये 1998-2000 का समय था, जेब मे पैसे नही होने के बाद भी किस्मत ऐसी थी कि कभी किसी बात की कमी महसूस नही हुयी। कंपनी मे दो बार चाय आती थी, शाम को कभी बाहर निकलना हुआ तो समोसे, वड़ा पाव के पैसे देने की आवश्यकता नही पड़ी, अपनी जेब मे हाथ डालने से पहले ही कोई सीनीयर हड़का के खुद पैसे दे देता था।

इसी दौर मे भटकते हुये एक मित्र के दिल्ली घुमने के निमंत्रण पर दिल्ली पहुंचे, उसी की कंपनी मे नौकरी के लिये साक्षात्कार दिया। चुन लिये गये। यहाँ पहले से ज्यादा आसानी थी। हम कुछ मित्रो के साथ काल्काजी दिल्ली मे रहते थे, कंपनी गुड़गांव मे थी लेकिन आने जाने के लिये कंपनी की ही बस थी। खाने के लिये भी समस्या नही थी, खाना बनाने के लिये एक कामवाली थी। हम घर से ही नाश्ता कर, दोपहर का खाना लेकर आफीस जाते थे। पर्स की आवश्यकता अब भी महसूस नही हुयी थी। लेकिन नई कंपनी ने एच डी एफ़ सी बैंक मे वेतन खाता खोल दिया था, डेबीट कार्ड नामक मुसीबत मत्थे पड़ गयी थी। लेकिन कार्ड की आवश्यकता भी महिने के पहले सप्ताह मे ही पड़ती थी। सप्ताहांत मे आवारागर्दी भी राजेश के साथ होती थी, सारा खर्च वह करता था, महिने के अंत मे हिसाब लगा कर उसे पैसे दे दिया करता था।

दिल्ली की नई नौकरी मे एक साल गुजरा, मार्च आया। कंपनी ने फ़ार्म 16 दिया, आयकर रीटर्न भरा। इस सारी प्रक्रिया मे पैन कार्ड नामक एक और मुसीबत आ गयी। 2002 चल रहा था, आई टी वालो के बुरे दिन चल रहे थे, डाट काम का बुलबुला फुट चुका था, रही सही कसर ओसामा बीन लादेन ने पूरी कर दी थी। मेरी कंपनी के बुरे हाल थे, वेतन वृद्धि की जगह वेतन मे कटौती हो रही थी। गनिमत थी कि मै जिस प्रोजेक्ट मे था उससे सारी कंपनी की रोजी रोटी चल रही थी। जब वेतन कटौती की बात आयी तो हम अड़ गये कि यदि वेतन मे कटौती हुई तो काम बंद। कंपनी की मजबूरी थी, हमारे वेतन मे कटौती नही हुयी। लेकिन हमे मालूम था कि अभी कंपनी की मजबूरी है तो हमारी सुन रही है, जिस दिन मजबूरी खत्म उस दिन कहेगी  कि बेटा अब घूम जाओ और पीछे से लात देगी। इससे पहले कि कंपनी निकाले, खुद ही भाग जाओ।

नई नौकरी खोजनी प्रारंभ की। एक सप्ताह मे ही दो तीन आफर लेटर लेकर घूम रहे थे। नयी नौकरी के साथ पहुंच गये चेन्नई। लेकिन अब तक पर्स नही खरीदा था। यहां कंपनी ने ICICI बैंक मे खाता खुलवाया, एक डेबीट कार्ड और आ गया। इस मध्य मे एक बहन की शादी थी, सोचा कि आपातकाल के लिये एक क्रेडीट कार्ड ले लो। कुछ दिनो बाद मोटरसाईकल भी ले ली, उसके साथ ड्राइवींग लाइसेंस भी आया। अब मेरे पास दो डेबिट कार्ड, एक क्रेडिट कार्ड, एक पैन कार्ड और एक ड्राइविंग लाइसेंस था। पैसो से ज्यादा इन सभी कार्डो को रखने की समस्या थी। थक हार कर पर्स खरीद लिया गया।

पर्स लेने की यह महान घटना 2004 मे घटित हुयी, अब इस घटना को घटित हुये यही कोई दस ग्यारह वर्ष हो रहे है। आज भी पर्स मे नगद नही होता है। नगद हुआ भी तो यही कोई सौ दो सौ रूपये। श्रीमती जी हमेशा भूनभूनाते रहती है कि पर्स पैसे रखने के लिये होता है, दिखाने के लिये नही। पर्स मे नगद नही रखने की आदत को विदेश यात्राओं मे बढ़ावा मीला जहाँ लगभग हर जगह डेबिट कार्ड से भूगतान किया। वहाँ नगद मे भूगतान करने पर रेजगारी सम्हालने की मुसीबत होती है। अपने कई मित्रो को किलो दो किलो रेजगारी जमा कर वालमार्ट मे नगदी मे बदलने लेजाते देखा है। हमे ऐसा करने की नौबत कभी नही आयी।

अब भारत मे भी अधिकतर जगह कार्ड से भूगतान हो जाता है, जहाँ नही होता है, वह दुकानदार खुद ही पास का एटीएम बता देता है। कभी कभी तो वह स्वयं कह देता है कि मै अपने आदमी को आपके साथ भेज देता हुं, आप इसे पैसा दे दिजिये। महिने की प्रारंभ मे दूधवाले, अखबारवाले, कामवाली के भूगतान और सप्ताहांत की छुटपुट की खरीददारी जैसे सब्जी, फल इत्यादि के लिये नगद की आवश्यकता होती है, तब ही पर्स मे नगद की कृपा होती है। आज भी महिने के पहले सप्ताह के अतिरिक्तपर्स अपने नसीब पर रोते रहता है!

इति श्री पर्स गाथा।

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दिसंबर 2014 की छुट्टीयाँ : एक दिन कालेज मे

शुक्रवार, जनवरी 02, 2015

बैंगलोर से हवाई-ट्रेन और टैक्सी यात्रा कर घर पहुंचे। घर पहुंचते तक अहसास हो गया था कि बैंगलोर की तुलना मे गोंदिया मे ठंड ज्यादा है, घर मे थर्मामीटर देखा 6 डीग्री सेल्सीयस। थर्मामीटर देखकर शरीर पर कपड़ो की एक परत और चढ़ा ली। यात्रा से आने के बाद का स्नान वाला इरादा त्याग दिया गया।

गर्मा गरम खाना तैयार था, जिसका भोग घर के सामने के आंगन मे सर्दी की गुनगुनी धूप मे बैठकर लगाया गया। गोंदिया वाले घर मे सबसे ज्यादा खुश गार्गी थी, बैंगलोर के दड़बेनुमा दो कमरे के घर की तुलना मे ये बड़ा सा, बड़े से आंगन वाला घर था। खेलने के लिये ढेर सारी जगह और एक अनुषा दीदी भी थी।

वो रास्ते जिनमे पीठ पर बैग लाद्कर साइकिल चलायी है
दोपहर भोजन पश्चात मेल देखी, पता चला कि 19 दिसंबर को इंजीनीयरींग कालेज मे "एलुमनी मीट" का आयोजन है। दूसरे दिन ऐसे भी घर पर आराम करने का इरादा था, अब कालेज जाकर पुरानी यादें ताजा करने का अवसर था। इसी बहाने निवेदिता को भी अपना कालेज दिखाना हो जाता, गार्गी तो ऐसे भी घर से ज्यादा बाहर खुश रहती है। बस दूसरे दिन कालेज जाना तय हो गया।
मुख्य इमारत
"एलुमनी मीट" कार्यक्रम 11 बजे से था, घर से हम तीनो(मै, निवेदिता और गार्गी) 10:30 बजे चल पड़े। गार्गी पहली बार स्कूटी की सवारी कर रही थी। कालेज के दिनो मे मै साइकल से जाता था और कभी भी कालेज सीधे रास्ते सनही गया था। गली कुचो, मैदानो के बीच से छोटे रास्ते से साइकल चलाते हुये कुछ मिनट बचाने के लिये ये सब कारस्तानी की जाती थी। आज सत्रह बरस बाद स्कूटी भी उसी छोटे रास्ते से ले गया, निवेदिता पीछली सीट से पूछ रही थी कि ये कौनसा रास्ता है? 20 मिनट की स्कूटी की सवारी के बाद हम कालेज के सामने पहुंच गये।

सामने कालेज की वही इमारत थी जिसमे मैने अपने जीवन का स्वर्णीम दौर गुजारा था, 1993-1998 तक इन्ही इमारतो के मध्य अपनी साइकिल और पीठ पर लटकते बैग के साथ भटका करते थे। मैने इंजीनियरींग प्रवेश फ़्री सीट मे लिया था जिसकी फ़ीस 4000 रूपये सालाना थी, जबकि पेमेंट सीट वाले 32000 रूपये सालाना देते थे। उसपर से भी मै इन 4000/- का पूरा सदुपयोग करता था, कक्षाओं से बचा समय पुस्तकालय मे या कंप्युटर प्रयोगशाला मे। तीसरे और चौथे वर्ष मे तो 8-10 घंटे कंप्युटर प्रयोगशाला मे बीतते थे।
हमारा स्वागत

कालेज के मुख्य गेट से प्रवेश करते साथ ही ढोल बजने लगे, पता चला कि वह ढोल हमारे ही स्वागत के लिये बजाये जा रहे थे। स्कूटी खड़ी करने के बाद अंदर पहुचे, छात्राओं ने गुलाब से स्वागत किया, तिलक किया, एक छात्र ने जैकेट पर एक बिल्ला लगा दिया। हम अभीभूत हो गये, बस आंसू टपकना बाकि थे। निवेदिता के सामने कालर खड़ी कर बताया, ये है हमारा कालेज।

प्रो मेहता सर
सामने ही प्रो दिक्षित मील गये, उनके साथ कालेज के अंदर "एलुमनी मीट" रजीस्ट्रेशन हाल पहुंचे, हमेशा की तरह कालेज वालो ने चूना लगाना नही छोड़ा था, आज भी 1000/- वसूल लिये। मुख्य कार्यक्रम मे देरी थी, सोचा कि पुरानी यादें ताजा कर ली जायें, कैम्पस का चक्कर लगाना प्रारंभ किया। जैसे ही आगे बढ़े प्रो आई सी मेहता मिले जोकि मेरे कंप्युटर टेक्नालाजी विभाग के प्रमुख थे और अब भी हैं। उन्होने मुझे पहचान तो लिया और ये भी पुछ लिया कि अभी भी विप्रो मे हो क्या ? लेकिन नाम भूल गये थे। वैसे हर साल 50-60 छात्र निकलते है, किस किस के नाम को याद रखें। उनसे चर्चा मे पता चला कि मेरे समय के अधिकतर प्रोफ़ेसर अब कालेज मे नही है। प्रो पठान और प्रो मंडोले तो दुनिया ही छोड़ गये थे, प्रो धारस्कर, प्रो खंडाइत दंपति तथा प्रो दीपक शर्मा कालेज छोड़ किसी अन्य कालेज मे हैं। मेरे पहचान के प्रोफ़ेसर मे केवल वही बचे थे जो इलेक्ट्रानिक्स और कंप्युटर टेक्नालाजी दोनो विभागो के सामान्य विषयो को पढ़ाते थे।

प्रो बाजपेयी और प्रो चौबे
मेहता सर से मिलकर आगे बढ़ने पर प्रो चौबे और प्रो बाजपेयी मीले, थोड़ा आश्चर्य हुआ कि ये दोनो अब भी एक ही साथ पाये जाते है। निवेदिता को अपना विभाग दिखाया। कालेज पहले से काफ़ी बेहतर था, हमारे समय मे 20-30 कंप्युटर की एकमात्र प्रयोगशाला थी, अब सैकड़ो कंप्युटर वाली बड़ी मुख्य प्रयोगशाला थी, दो तीन प्रयोगशाला और भी थी। प्रोफ़ेसरो के कक्ष अब पहले से बेहतर थे लेकिन उनमे अब दरवाजे लग गये थे।

कालेज का कैंपस पहले से ज्यादा हरा था, हम लोगो के समय जो पौधे थे, अब वृक्ष हो चुके थे और सारे कालेज मे छाया दे रहे थे। कैंटीन पहले जैसी थी, लेकिन आज बंद थी, कह नही सकता की उसके खाने की गुणवत्ता मे कोई सुधार हुआ या नही। कालेज मे प्रवेश करते समय गेट पर दो तीन टपरी दिखी थी, उन्हे देखकर लगता तो नही कि कोई सुधार हुआ होगा। पुस्तकालय पहले से बेहतर लगा, ढेरो पुस्तके उपलब्ध थी। कुल मिलाकर कालेज की इमारते और कैम्पस पहले जैसा ही था।

समस्त प्रोफ़ेसर
मुख्य कार्यक्रम प्रारंभ हो चुका था, सारे कालेज का भ्रमण करने के बाद हम आडीटोरीयम पहुचे। आशा के अनुरुप मेरी बैच का कोई भी नही था, ना ही मेरे विभाग के सीनीयर या जुनियर! मेरे विभाग के छात्र जिस तरह की नौकरी करते है, या व्यवसाय मे है, उनसे इस तरह के कार्यक्रमो मे आने की आशा करना व्यर्थ ही है। मै तो मौके पर उसी शहर मे होने से कार्यक्रम मे उपस्थित हो पाया था। अधिकतर पुर्व छात्र 1990 से पहले के बैच के थे  और उनमे से भी लगभग सभी नागरी(Civil), प्रोडक्शन  विभाग के थे। कुछ इलेक्ट्रानीक्स के थे। कुल 100 से भी ज्यादा पुर्व छात्र पहुचे थे, अधिकतर उद्योग-जगत मे अच्छी खासे पदो पर थे, कुछ लोगो ने स्वयं का व्यवसाय किया हुआ था, कुछ सरकारी नौकरीयों मे अच्छे पदो पर थे, एक राजनिती मे उतर गये थे और मप्र विधानसभा मे विधायक थे। सब के परिचय को देखकर लग रहा था मैने तो अब तक कूछ भी हासिल नही किया लेकिन ये मानकर संतोष था कि ये सभी मुझसे 10-15 वर्ष सीनीयर है।

पापा के साथ गार्गी
कार्यक्रम के प्रारंभ मे गणित के प्रोफ़ेसर बाजपेयी सर ने अपनी ओजस्वी आवाज मे एक छोटा सा भाषण दिया, वे अस्सी पार कर चुके है लेकिन वाणी मे वही ओज है। प्रो दिक्षित सर इस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता थे लेकिन वे भी अधिकतर पुर्व छात्रो से जुनियर थे, उनके भाषण के बीच काफी खिंचाई हुयी।

सबसे पहले पुर्व छात्रो ने प्रोफेसरो के लिये स्मृति चिन्ह लाये थे, वे प्रदान किये। धीरे धीरे पता चल रहा था कि मेरे समय के अधिकतर प्रोफ़ेसर जा चुके है, प्रथम वर्ष के प्रोफ़ेसरो मे भौतिकी के डा .चद्रायन, रसायन शास्त्र के डा धोटे के अतिरिक्त किसी भी प्रोफ़ेसर को मै जानता नही था। इलेक्ट्रानीक्स मे भी प्रिंसीपल डा राठौर के अतिरिक्त कीसी को मै पहचान नही पाया। कुछ चेहरे पहचाने नजर आ रहे थे लेकिन मै नाम भूलचुका था, सत्रह बरस का एक लंबा अरसा स्मृतियों को ढकने मे सफ़ल था।

कालेज के लान मे गार्गी
इसके बाद पुर्व छात्रो को मंच से कहने का अवसर मिला। सभी पुर्व छात्रो ने कालेज और प्राध्यापको की प्रशंसा तो की ही लेकिन खींचाई का कोई मौका नही छोड़ा। कीसी भी कोने से लग नही रहा था कि इन सबने पंद्रह बीस वर्ष पहले  कालेज से विदा ली थी और सभी के सभी उद्योग जगत मे अच्छे पदो पर है। उनके शब्दो मे वही कालेज के दिन आ गये थे, वही बिदांस अंदाज! एक महाशय ने कहा कि
 "इस कालेज की नींव हम लोगो ने रखी है, क्योंकि हर इमारत की नींव से लेकर छत मे हमारी फ़ीस और डोनेशन का पैसा लगा है।" 
सारा सभागार ठहाको के गुंज उठा था।

पुराने दिनो को याद करते हुये छात्र कह रहे थे कि

"इंटरनल मे 20 मे से 20 मिल जाते थे लेकिन बचे 80 मे से 20 अंक प्राप्त करना कठिन होता था। और अंत मे ATKT ही सहारा होता था।"
"सुना है कि अब तो सिवील/मेकेनिकल मे भी लड़कीयाँ होती है, हमारे समय मे तो इलेक्ट्रानिक्स भी बजरंग दल होता था। वो तो भला हो कंप्युटर टेक्नालजी का कालेज मे खूबसूरती का प्रवेश हुआ।" 

छात्र संबोधित करते रहे और सभागार ठहाको से गुंजता रहा। दोपहर के 2 बज रहे थे, गार्गी को भूख लग आयी थी। कैंटीन मे गार्गी के खाने लायक कुछ नही था, हम लोगो ने कालेज के प्रोफ़ेसरो से विदा ली।

जब मै अपनी स्कूटी लेने पहुंचा तब पुर्व छात्रो के वाहनो को देख कर दंग रह गया, आडी, बी एम डब्ल्यु से लेकर स्कार्पीयो तक मौजूद थी वहाँ पर। हमने अपनी स्कूटी उठायी और चल पडे घर की ओर।

ससुराल यात्रा अगले अगले भाग मे।


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दिसंबर 2014 की छुट्टीयाँ : घर की ओर

शनिवार, दिसंबर 27, 2014

सामान्यत: दिसंबर मे मेरे पास काम कम होता है, इसलिये पहले से योजना बना कर रखी थी कि इस वर्ष छुट्टीयाँ दिसंबर मे ली जायेंगी। वैसे भी मै जिस प्रोजेक्ट मे काम कर रहा था उसमे दिसंबर मे क्रिसमस के आसपास दो सप्ताह तक काम बंद रहता है और सभी को छुट्टीयाँ लेनी होती है। सब कुछ योजना के अंतर्गत ही चल रहा था लेकिन अक्टूबर मे मेरे पास अपना प्रोजेक्ट बदलने का अवसर आया, नया प्रोजेक्ट चुनौती पुर्ण और करीयर के लिये महत्वपूर्ण था तो सोचा कि इस चुनौती को स्वीकार कर लिया जाये। अब दिसंबर की छुट्टीयों की सारी योजना पर पानी फिरते नजर आया क्योंकि दिसंबर के मध्य मे ही इसी प्रोजेक्ट के सीलसीले मे कुछ दिन हैद्राबाद जाना था। अंत मे एक मध्यमार्ग निकाला गया कि सभी के सभी पहले गोंदिया गृहनगर जायेंगे, उसके पश्चात मै अकेले हैद्राबाद आ जाउंगा, तीन दिन हैद्राबाद मे बिताने के पश्चात मै वापिस गोंदिया आ जाउंगा।

बैंगलोर एअरपोर्ट
अठारह दिसंबर की सुबह निकल पढ़े, पहला चरण बैंगलोर से नागपुर हवाई यात्रा, उसके पश्चात ट्रेन से गोंदिया। उड़ान सुबह 6:30 की थी, इस उड़ान के लिये घर से 3:30 को निकलना पड़ा। सुबह सुबह हम लोगो के स्नान और तैयार होने मे कोई समस्या नही थी लेकिन गार्गी को नींद से उठाकर तैयार करना एक बड़ी समस्या थी। आखीर मे उसे रात मे तैयार कर ही सुला दिया गया ताकि सुबह उसकी नींद तोड़े बीना ही गोद मे लेकर चल दें। सुबह ठीक 3:00 बजे टैक्सी हाजीर थी, हम लोग भी तैयार थे। गार्गी को उठाया और लगभग 3:30 को चल पड़े हवाई अड्डे की ओर। हवाई अड्डे पहुंचते तक पांच बज गये थे, गार्गी अभी तक सो रही थी, जैसे ही टैक्सी से उतरे और गार्गी जाग गयी। नींद पूरी होने से गार्गी तरोताजा थी और हम परेशान क्योंकि अब गार्गी हवाई अड्डे पर दौड़ लगाना शुरु कर देगी।

गार्गी के साथ होने से कुछ फायदे तो होते ही है, कतार मे लगे बीना ही बोर्डींग पास मिल गये, सुरक्षा जांच मे भी कतार मे नही लगना पड़ा और विमान मे चढ़ने के लिये गेट पर पहुंच गये। विमान के अंदर जाने मे पूरे 45 मिनट बाकी थे, गार्गी सभी लोगो के पास जाकर उनके सामान की जांच कर रही थी। शायद हम लोगो की उड़ान के सभी यात्री तो अब गार्गी को जान ही गये थे।

नागपुर एअरपोर्ट
इस उड़ान मे गेट से सीधे ही विमान के अंदर जाना था, बस और सीढीयो वाली परेशानी नही थी, चैन आया। गेट से बस से विमान तक जाना और उसके पश्चात सीढीयों से विमान मे जाने मे मेरी आफत हो जाती है। निवेदिता गार्गी को सम्हालती है और मुझे अपने बैग के साथ मम्मी, निवेदिता और गार्गी के बैग भी सम्हालने होते है। खैर विमान के अंदर पहुंचे, अब मुझे लग रहा था कि विमान के उड़ान भरने के समय गार्गी थोड़ा परेशान कर सकती है, उसके कानो मे दर्द हो सकता है, उसके लिये मैने एक लालीपाप जेब मे रखा था लेकिन जैसे ही विमान ने टैक्सींग प्रारंभ की गार्गी सो गयी और नागपुर तक सोते रही। नागपुर मे विमान के उतरने के बाद थोड़ी भाग दौड़ करनी थी क्योंकि हम लोगो को 9:15 को गोंदिया के लिये ट्रेन लेनी थी। मैने निवेदिता और मम्मी को बहर निकल कर टैक्सी बुक करने कहा और स्वयं सामान के आने का इंतजार करने लगा। सामान आया लेकर बाहर टैक्सी मे लादा गया और चल पड़े रेल्वे स्टेशन की ओर। सुबह का समय था, रास्ता खाली था, जल्दी ही स्टेशन पहुंच गये।

नागपुर रेल्वे स्टेशन
मैने सामान एक ओर रखा और स्वयं टिकट की कतार मे लग गया। टिकट लेकर जैसे ही कतार से बाहर आया कि घोषणा हुयी कि हमारी ट्रेन प्लेटफार्म 4 पर आ रही है। अब हमे सारे सामान को लादकर प्लेटफार्म एक से चार पर जाना था। ट्रेन आकर खड़ी हो गयी थी, सारे सामान को लेकर कुली ढुंढकर लेजाने का समय नही था, बस निवेदिता और मम्मी को कहा कि तुम लोग प्लेटफार्म चार पर पहुंचो, मै सामान ले कर आता हु। पिठ्ठू बैग पीठ पर लादा, लैपटाप बैग कंधे पर, चार छोटे वाले सुटकेस थे, एक के उपर एक सुटकेस रख कर दो समूह बनाये और दोनो हाथो से खींचकर चलना शुरु, शुरुवात मे कुछ कदम परेशानी हुयी लेकिन एक बार लाय मे आ गये तो सब कुछ ठीक। ओवरब्रीज पर चढ़ भी आसानी से गये, लेकिन अब उतरे कैसे ? दिमाग चलाया और अब सामान खींचने की बजाये उन्हे सामने कर दिया और स्वयं पीछे होकर चलना शुरु कर दिया, ढलान होने से कुछ करना नही था, बस गति नियंत्रण करना थी। नीचे उतर गए, सोचा था कि सब लोग किसी डिब्बे मे बैठ गये होंगे लेकिन वे सब मेरा इंतजार कर रहे थे, वे तय नही कर पा रहे थे कि किस डिब्बे मे चढें।

ये ट्रेन विदर्भ एक्सप्रेस थी, इस ट्रेन मे अधिकतर यात्री नागपुर मे उतर जाते है और शयनयान श्रेणी के डिब्बे मे यात्रा की जा सकती है, टिकट निरिक्षक प्रति यात्री 50 रूपये अतिरिक्त लेकर टिकट बना देते है। बस सामने जो डिब्बा था उसी मे घुस गये। सीट मील गयी।

ये गार्गी की पहली ट्रेन यात्रा थी, इसके पहले वह विमान मे, कार मे यात्रा कर चुकी है लेकिन पहली बार ट्रेन मे यात्रा कर रही थी। सोचा कि गार्गी के लिये खिड़की के पास वाली सीट तलाशी जाये। लेकिन गार्गी ने अपने लिये सीट खुद ही तलाश, खिड़की के पास वाली सीट पर बैठे अंकल के पास जा कर उसने पता नही किस भाषा मे क्या कहा, उसे सीट मील गयी। गार्गी के लिये हर चीज नयी थी, ट्रेन के बाहर , गाय, बकरी, पक्षी सभी पहली बार दिख रहे थे उसे, वह हर चीज के लिये उंगली दिखाकर खुशीयाँ व्यक्त कर रही थी।

वैनगंगा नदी, ट्रेन से ली तस्वीर, तुमसर
कुल डेढ घंटे का सफर था। गार्गी के नाश्ते का समय हो गया था, उसके लिये हम लोगो ने अपने साथ दलिया रखा था, उसे नाश्ता कराया। खुद पूरी और अचार का भोग लगाया। सुबह से चाय नही पी थी, चायवाले आवाज लगा रहे थे। लेकिन इस रास्ते पर इतनी बार चला हुं कि इन विक्रेताओं की चाय पीकर मुंह का स्वाद बिगाड़ने की हिम्मत नही हुयी। वैसे भी एक घंटे का सफर ही बचा था।

भंडारा रोड और उसके बाद तुमसर आया। तुमसर के बाद वैनगंगा नदी और उसपर बना लंबा पुल। यह वैनगंगा रुडयार्ड किपलींग के उपन्यास जंगल बुक मे वर्णित वैनगंगा ही है। जंगलबुक का सारा कथानक इसी नदी के आसपास घुमता है। गार्गी खीड़की के पास खड़ी होकर बाहर देख रही थी, उसके लिये हर चीज नयी थी।

गोंदिया रेल्वेस्टेशन
कुछ ही देर मे गोंदिया आ गया। एक बार फिर से सारा सामान लादकर स्टेशन से बाहर लेजाने की जद्दोजहद थी। नागपुर स्टेशन वाले तरिके से सारा सामान लादा और चल पढे स्टेशन के बाहर। बाहर आकर आटो रिक्शा किया और चल पले घर की ओर....

शेष अगले भाग मे

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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