विज्ञान और व्यक्ति पूजा/भक्तिधारा

सोमवार, अक्तूबर 29, 2018

विज्ञान के फ़ोरमो, चर्चा समूहों मे अक्सर यह चर्चा चलते रहती है कि सर्वश्रेष्ठ/महानतम वैज्ञानिक कौन है या था ? इस प्रश्न के कुछ रूपान्तरण भी मिलते है जैसे अब तक का या इस सदी का या पिछली सदी का, या इस देश का वगैरह। इसमे यदि विकल्प दिये हुये है तो दो तीन नाम हमेशा मिलेंगे , दो नाम का उल्लेख मै विशेष तौर पर कर रहा हुँ, वे है स्टीफ़न हाकिंग और निकोला टेस्ला। इन दो नामो के विशेष उल्लेख का कारण है, जिस पर चर्चा आगे करते है।

सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिये कि विज्ञान कोई एक स्थिर या विशिष्ट विचारधारा नही है कि एक सिद्धांत का प्रवर्तक सर्वश्रेष्ठ हो। यह एक सतत ज्ञान अर्जन की वह इमारत है जिसमे हर नया कार्य पिछले कार्यो की नींव पर खड़ा होता है। ऐसे मे नये कार्य को सर्वश्रेष्ठ कैसे घोषित कर दे।

हम पिछली सदी के बेहतरीन मस्तिष्को मे से एक अलबर्ट आइंस्टाइन का उदाहरण लेते है। वे एक ऐसा नाम है जिन्होनें भौतिक विज्ञान की धारा बदलने मे एक क्रांतिकारी भूमिका निभाई थी। प्रश्न है कि हम उन्हे महान माने या महानतम ? इन दो विशेषणो के मध्य एक महीन रेखा है। विज्ञान का हर छात्र जानता है कि अलबर्ट आइंस्टाइन का कार्य  उनके समकालीन या उनसे पूर्व के कम से कम एक दर्जन वैज्ञानिको के कार्यो पर आधारित है। यदि हम आइंस्टाइन को महान कहते है तो हम उनके साथ उन एक दर्जन वैज्ञानिको को भी सम्मान दे रहे होते है। लेकिन जब हम आइंस्टाइन को महानतम कहते है तो कहीं ना कहीं  हम उन एक दर्जन वैज्ञानिको को नीचा दिखा रहे होते है! यह व्यक्ति पूजा के वह दुष्प्रभाव है जो वैज्ञानिक विचारधारा मे उत्पन्न होना ही नही चाहिये।

जब हम निकोला टेस्ला की बात करते है तो लोग निकोला टेस्ला के कार्यो की चर्चा की बजाय एडीसन को गरियाना शुरु कर देते है। निकोला टेस्ला और एडीसन दोनो वैज्ञानिक कम इंजीनियर अधिक थे। दोनो की खोजो के लिये विश्व उनका ऋणी है, लेकिन एडीसन वैज्ञानिक/इंजीनियर से अधिक एक व्यवसायी थे। जिस कंपनी की स्थापना और विकास एडीसन के द्वारा हुआ था , वह एक सदी से अधिक के बाद भी विश्व की सबसे अग्रणी कंपनियों मे से एक है। एडीसन और निकोला टेस्ला मे मतभेद थे लेकिन इसका अर्थ यह नही होता कि टेस्ला महान और एडीसन शैतान थे। निकोला टेस्ला एडीसन की कंपनी मे कार्य करने वाले कर्मचारी थे। जब आप किसी भी कंपनी मे कार्य करते है तो आपके समस्त कार्यो का पेटेंट आपको नही, आपकी कंपनी को मिलता है। यह एडीसन के साथ हुआ, उन्होने प्रतिभाओं को पहचाना, उन्हे कार्य दिया, तो उन प्रतिभाओं का पेटेंट उनकी कंपनी को हासिल हुआ, जिसमे कुछ भी गलत या अनैतिक नही है।

निकोला टेस्ला एक विलक्षण वैज्ञानिक थे, उनके द्वारा प्रोत्साहित(अविष्कृत नही) AC विद्युत से आज  समस्त विश्व संचालीत हो रहा है। लेकिन वे हद दर्जे के सनकी भी थे। उन्होने कई विचित्र और अव्यवहारिक अवधारणाओं पर भी काम किया है, जिसमे से एक बेतार ऊर्जा संचार प्रणाली, मृत्य किरण(Death Ray) जैसे हथियार का भी समावेश है। उस युग के अन्य प्रसिद्ध वैज्ञानिको जैसे एडीसन, विलियम क्रुक के समान ही टेस्ला भी असामान्य चिजो जैसे आत्माओं की दूनिया, परग्रही का पृथ्वी पर अस्तित्व पर विश्वास करते थे। उनकी कई सनक भरी आदते थी, उन्हे तीन अंक से विशेष प्रेम था। उन्हे बहुत सी चीजो से डर भी लगता था। अब यह माना जाता है कि वे मनोग्रसित-बाध्यता विकार (Obsessive–compulsive disorder /OCD) से पिड़ीत थे, जो कि उन जैसे एकाकी वैज्ञानिको के लिए सामान्य है।  टेस्ला इतने सफल वैज्ञानिक थे कि उनके कुछ ऐसे आइडीये जोकि सैद्धांतिक/वैज्ञानिक/व्यवहारिक रूप से असंभव होने के बावजूद केवल उनके नाम जुड़े होने से विज्ञान की अच्छी शिक्षा ना पाये व्यक्तियो के आकर्षण का केंद्र होते थे और आज भी है। कुछ मामलो मे ऐसा भी पाया गया है कि छद्म विज्ञानीयों और धोखेबाजो ने टेस्ला के नाम का प्रयोग कर उल्टे-सीधे प्रयोगो और उपकरणो से पैसा कमाने का प्रयास किया है।

इन सबसे होता यह है कि टेस्ला कई कांसपिरेसी थ्योरीयों का केंद्र रहे है। और एक विशिष्ट वर्ग उन्हे सबसे महानतम लेकिन उपेक्षित वैज्ञानिक घोषित करता है। जबकि हक़ीकत यह है कि उन्हे वह सम्मान मिला है जिसके वह हक़दार थे।

स्टीफ़न हाकिंग वर्तमान मे सबसे चर्चित सैद्धांतिक भौतिक वैज्ञानिक रहे है। व्याधि से उत्पन्न अपनी शारीरीक विकलांगता के बावजूद उन्होने उस पर विजय पाई और उस पद को हासिल किया जिसपर कभी न्युटन जैसे वैज्ञानिक विद्यमान थे। लेकिन क्या वह सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक है ? वे अपने समय के चोटी के वैज्ञानिक रहे है लेकिन उनके समकालीन और भी ऐसे बहुत से वैज्ञानिक है जिन्होने स्टीफ़न हाकिंग के कार्यो के जैसे ही महत्वपूर्ण कार्य किये है जैसे पीटर हिग्स, स्टीवन वेनबर्ग, कीप थार्न, लिओनार्द सस्किंद  इत्यादि।   क्या व्यक्ति पूजा वास्तविकता मे हमे सम्मान करने की बजाय हमे अन्य का अपमान करना नही सीखा रही है ?

यही बात हम भारत के संदर्भ मे भी देखते है। कितनी ही जगह किसी एक व्यक्ति को भारत का सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक घोषित किया गया है। जब इन जगहो पर चर्चा आरंभ करो तो पता चलता है कि अधिकतर लोगो को प्रफ़ुल चंद्र राय, जगदीश चंद्र बोस, सत्येंद्रनाथ बोस का नाम नही पता, कार्य तो जाने दिजीये। सीवी रामन , सुब्रमन्यम चंद्रशेखर  का नाम इसलिये नही ले रहा क्योंकि वे नोबेल पुरस्कार के कारण उन्हे लोग जानते है, नाही अठारहवी सदी के पहले के कार्यो की चर्चा कर रहा हुं।(नोबेल पुरस्कार भी श्रेष्ठता का पैमाना नही है, उदाहरण के लिये फ़्रेड हायल के किये गये काम पर नोबेल उन्हे ना देकर किसी और को दिया गया था।) प्रश्न यह उठता है कि आप सभी को नही जानते है तो किसी एक को सर्वश्रेष्ठ कैसे घोषित कर सकते है ?

विज्ञान मे व्यक्ति पूजा वैज्ञानिक विचारधारा कतई नही हो सकती है, इसे समझना आवश्यक है। विज्ञान मे चर्चा कार्य की होना चाहिये, सिद्धांत की होना चाहिये, विचारधारा की होना चाहीये, व्यक्ति की नही। तुलना सिद्धांतो, अवधारणाओ की गुणो के आधार पर होना चाहीये, व्यक्ति या प्रवर्तक की नही।

विज्ञान को विचारधारा पर रहने दे, व्यक्ति पूजा कर इसे धर्म ना बनाये!

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ऐसे बीता हमारा 42 वा जन्मदिन

शनिवार, अक्तूबर 20, 2018

19 अक्टूबर को जन्मदिन होने से होता यह है कि हमेशा किसी ना किसी त्योहार के दिन या उसके आसपास आता है। 2017 मे दिवाली को था तो इस बरस दशहरे के दिन।

गार्गी के आने बाद हर बरस दशहरे को रावण का पुतला बनाकर दहन करते है। रावण के बनाने और दहन मे पूरा दिन बीत जाता है, गार्गी के साथ सब का अच्छा खासा मनोरंजन हो जाता है। अब जन्मदिन के साथ रावण दहन मे समय का संयोजन मुश्किल काम। एक दिन पहले ही रावण का ढांचा बना कर रख लिया।

सुबह अलेक्सा की बजाय गार्गी ने जगाया, और पूरा "हैप्पी बर्थडे" गीत गाकर सुनाया।

इसके बाद काफ़ी विरोध के बाद भी हम "Its just an another day" कहते हुये, रोज की तरह हम अपनी जागींग के लिये निकल लिये। लक्ष्य छह किमी का था लेकिन पांच किमी ही दौड़ कर लौट आये। फ़ोन बज रहा था और दौड़ने मे व्याधान आ रहा था। जागींग के समय ही छोटे भाई और दोनो बहनो के फ़ोन आ गये थे।

घर आये, नहाये, वैसे तो रोज नहाते है, जागींग के बाद नहाना ऐसे भी मजबूरी होता है, तो सोचा कि आज भी नहा ही लेते है।



नाश्ते मे मेथी के परांठे बने थे, लाल मिर्च और टमाटर की चटनी के साथ भोग लगाया। नाश्ते के दौरान पता चला कि गार्गी ने निवेदिता से गुब्बारे भी फ़ुलवाये है। हमारे लिये गिफ़्ट मे चाकोमनी लेकर आई है। शाम तक का सारा कार्यक्रम हमसे बिना पुछे दोनो मा बेटी ने तय कर रखा है।

इसके बाद आदेश आया कि मंदिर जाना है। हमने नानकुर की फ़ार्मेलिटी निभाई। पता था कि डांट डपट कर, धकिया कर मंदिर ले जाया ही जायेगा। पास के वेंकेटेश्वरा मंदिर पहुंचे। विजयादशमी होने से अच्छी खासी भीड़ थी। मंदिर के अंदर पहुंचे, कपाट खूले थे लेकिन भगवान पर्दे के पीछे थे। पता चला कि भगवान स्नान कर रहे है। स्नान के बाद अलंकरण , वस्त्र पहनाने के बाद ही पर्दा खुलेगा।

अब पता नही भगवान नहाने मे आलस कर रहे थे या भगवान को नहलाने वाले, पूरा एक घंटा लग गया। एक घंटे बाद पर्दा खुला। एक फ़ुलों का थाल घुमाया गया कि सब उसे छूं ले तो भगवान को चढ़ा देंगे। पुष्पार्पण के बाद आरती हुई। आरती के बाद सभी को एक दूसरे बाजु वाले रास्ते से जाने कहा गया। हम भूनभूना रहे थे कि पूरे दो घंटे लग गये। निवेदिता कह रही थी कि दिन अच्छा है, पूरी पूजा मे रहने का मौका मिला।

दूसरे दरवाजे से बाहर आये , तो सामने महाप्रसाद की तैयारी थी। महाप्रसाद के नाम से हम खुश हो गये, कतार मे लगे। एक बड़ी थाली उठाई, और चक्रपोंगल, बेसीबेले बाथ, दहीचावल और पुलीहोरा लिया। महाप्रसाद से मन, आत्मा और पेट तीनो तृप्त हो गये। परोसने वालो ने दोबारा के लिये पुछा, हमने विनम्रता से मना कर दिया। पेट मे थोड़ी जगह और होती तो दोबारा तो लेते ही। अपनी अपनी थाली स्वयं धोने की व्यवस्था थी, थाली धोई। नही होती तो भी अपनी थाली तो स्वयं ही धोते।

अब घर की ओर चले, पता चला कि काम वाली बाई , आधा घंटा इंतजार के बाद वापस चली गई। गनिमत थी कि डीशवाशर था, बर्तन धोने लगा दिये।

इस जन्मदिन हम तीनो ही थे। तो टीका लगाने का काम हुआ। निवेदिता और गार्गी ने टीका लगाया, आरती हुई। फ़ोटोसेसन हुआ। टाईमर वाला कैमरा धन्य हुआ, ऐसे मौको पर ही बाहर निकलता है।

अब अपने अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करना था। इसके बाद आटे की लई बनाई और रावण बनाने मे लग गये। रावण तो बना हुआ था, बस उसे कपड़े पहनाने ने थे। गिफ़्ट रैप काट काट कर चिपकाते गये। फ़ोन आते जा रहे थे, बाते करते हुये काम मे जुटे रहे। कपड़े पहना दिये, मुकुट बना दिया। अब चेहरा बनाना बचा था, वो काम निवेदिता और गार्गी को आउटसोर्स कर दिया। गार्गी ने रावण को लिपस्टिक भी लगा दी।

रावण महाराज अब तैयार थे, सूखने धूप मे रख दिया।


रावण के पेट मे भरने के लिये सारे घर से कबाड़ निकाला। अमेजान और फ़्लिपकार्ट की मेहरबानी , छः फ़ीट के रावण के पेट मे भरने लायक कबाड़ निकल आया।

ऐसे मे शाम हो गई। शाम की चाय बनी। चाय पी रहे थे कि बाहर तेज हवा शुरु हो गई। कुछ ही मिनटो मे बारीश शुरु हो गई। आपातकालीन रावण बचाओ अभियान शुरु करना पड़ा। रावण उठाकर घर मे लाये। 30 मिनट अच्छी खासी बारीश हो गई। हम चिंतित बारीश नही रुकी तो रावण महाराज तो रात भर घर मे ठहरेंगे।  लेकिन ऐसी नौबत नही आई।

हमने आनन फ़ानन मे रावण को बाहर निकाला, उनके पेट मे कबाड़ भरा। और रावण दहन हो गया ...



इसके बाद केक बाहर निकाला गया। केक काटने का कार्यक्रम और फ़ोटोसेसन फ़िर से हुआ। इस बार गड़बड़ यह हुई कि कुछ फ़ोटो मे निवेदिता और कुछ मे गार्गी हिल गई थी। कटा हुआ केक दोबारा काटा गया कि जिससे फ़ोटो दोबारा ढंग से ली जा सके। केक के आर्डर मे भी बहुत सी समस्या आई थी। हम जहाँ से केक लेते है उसने विनम्रता से मना कर दिया था कि उसके पास केक बनाने कोई नही है, सारे लोग विजयादशमी के आर्डर मे व्यस्त है। वो नया केक बना नही पायेगा और हमे पुराना केक तो  देगा नही। एक दूसरे केक की दुकान मे आर्डर दिया तो केवल वनीला केक ही उपलब्ध था।

केक काटने का कार्यक्रम निपटा। रात का खाना बाहर खाने का प्लान था। सुबह एक नया रेस्तरां देखा था, सोचा कि नया रेस्तरां है तो खाना अच्छा होगा। उसी रेस्तरां की ओर चल दिये। पहुंचे तो पता चला कि रेस्तरां खुला तो है लेकिन आज बंद है।

अब क्या करें ? चल दिये पुराने भरोसे वाले रेस्तरां रागीनाडु की ओर। यह रेस्तरां अच्छा है लेकिन इसमे कोयले की आंच मे खाना बनता है तो रेस्तरां मे धुंआ भर जाता है। तो हमने आंध्रा की दो तीन डीश का आर्डर दिया और पैक करने बोल दिया। खाना लेकर घर आये। सारा खाना उठाकर छत पर पहुंच गये।

छत पर खूले आसमान के नीचे चांद की रोशनी मे खाना खाया।  सोचा था कि चलो फ़ेसबुक पर आये संदेशो का जवाब दे दे, लेकिन दिन भर की सर्कस के बाद बहुत थक गये थे। सुबह ही उत्तर देने की सोची और सोने के लिये चल दिये।

सूरज महाराज की 42 परिक्रमा पूरी हो गई है, अब 43 वी आरंभ कर दी है ....



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रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं ..

बुधवार, सितंबर 26, 2018

अक्सर लोग मुझसे पुछ लेते है कि कहाँ से हो ? हम सोच मे पड़ जाते है कि इसका उत्तर क्या दे!

पापा बुंदेलखंड से थे, मम्मी छत्तीसगढ़ से। जन्म दुर्ग छत्तीसगढ़ यानी ननीहाल मे हुआ। लेकिन सारा बचपन झालिया जिला गोंदिया महाराष्ट्र मे बीता। हाईस्कूल आमगांव , गोंदिया से, इंजीनियरींग गोंदिया महाराष्ट्र से की।

बंजारा जिंदगी विरासत मे मिली थी, पापा भी बुंदेलखंड से भटकते हुये महाराष्ट्र मे नौकरी करते हुये भटक रहे थे। वही बंजारा जिंदगी हमारे नसीब मे।

लेकिन हमने इस बंजारा जीवन को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया। पहली नौकरी मे ही मध्यभारत से दूर उत्तर भारत गुड़गांव दिल्ली पहुंच गये। रहना दिल्ली मे, नौकरी गुड़गांव मे। अगला डेरा उत्तर से एक दम दक्षिण चेन्नई मे। चेन्नई से निकाला हुआ, पहुंच गये पश्चिम भारत पुणे!

पुणे की जिंदगी रास नही आई, झोला उठाया और आ गये बैंगलोर!

ये तो एक झांकी ही थी, भारत मे सूटकेसो को खोलने और वापिस पैक करने के ठीहे।

जब चेन्नई मे थे तब से एक पैर भारत मे एक अमरीका मे रहता था। हालात तो यह थे कि भारत पहुंचते साथ बास फ़ोन कर बोल देता था कि सूट केस मत खोलना, अगले सप्ताह इस जगह जाना है। शादी से पहले अकेले भटके, शादी के बाद सप्त्निक भटके। अमरीका मे ही मिलफ़र्ड, मिनियापोलीस, न्युयार्क, स्टैमफ़र्ड, क्लिवलैंड, फ़िलाडेल्फ़िआ और रिचमंड मे डेरा रहा। कनाडा मे मांट्रीयल मे फ़्रेंच भाषीयो को अंग्रेजी सीखाई, साउ पाउलो ब्राजील मे मुश्किल से अंग्रेजी मे शाकाहारी खाने का जुगाड़ किया। लंदन मे न्युटन की कब्र पर मत्था टेकने के बहाने तीन महीने बिताये।

पश्चिम से बोर होने के बाद चल पड़े पूरब की ओर। आस्ट्रेलिया मे कंगारु दर्शन के नाम पर तीन साल काट लिये।

इस सूची मे एक दिन दो दिन, एक सप्ताह वाले डेरों का समावेश नही है, उन्हे जोड़े तो "ग्वानझाउ" का फ़्राईड राईस के नाम पर पोर्क फ़्राईड राईस भी आ जाता है!

बस एक अफ़्रीकी महाद्वीप बचा है जहाँ पर कदम नही पड़े है.. वो भी हो जाता बस जोहानिसबर्ग के नाम पर हिम्मत नही हुई।

कुछ अनोखे रिकार्ड भी बनाये। पिछले सप्ताह वाली "स्पिरिट आफ़ विप्रो हाफ़ मैराथन" चार महाद्विपो मे दौड़ चुके है, उत्तरी अमरीका, यूरोप, एशिया और आस्ट्रेलिया।

 गार्गी के आने के बाद जिंदगी मे एक ठहराव आया था, 2013-2017 तक एक ही स्थान बैंगलोर मे टिके रहे। इस साल उसपर भी नजर लगी, वापिस दो सूटकेसो मे कैद जिंदगी का आरंभ हो गया..

 अरे हम भूल ही गये थे कि प्रश्न था कि हम कहाँ से है ?

 उत्तर :
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
 रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
 पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
 अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं।
 वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
 किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं ।
 जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
 कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं।
 चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
 सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं ।
 गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
 हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं ।
-निदा फ़ाज़ली

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मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

सोमवार, सितंबर 03, 2018

2 सितंबर 2015, सोमवार शाम मै वापिस बैंगलोर आने के लिये सपरिवार नागपुर एअरपोर्ट पहुंचा। एअरपोर्ट के अंदर आने पर पीछे से आवाज आई "आशीष भैया!"
पीछे मुडकर देखा एक बीस बाईस साल का युवक चला आ रहा है। पास आने पर उसने कहा "पहचाना ? मै ....."! थोड़ा समय लगा उसे पहचानने मे, आखीर मै उसे 17 वर्ष बाद देख रहा था। आखीरी बार जब मैने उसे देखा था तब वो और उसके मित्र गांव की गलियो मे कंचे, गुल्ली डंडा खेलते थे और नहर मे नंग धड़ंग नहाते थे।
उसे एअरपोर्ट पर देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। मै उसकी पृष्ठभूमी से परिचित था। उसके दोनो चाचा मेरे सहपाठी रह चुके थे, मै आगे बढ़ता गया था और वे एक कक्षा मे एक साल, दो साल करते जैसे तैसे हाई स्कूल पहुंचने के बाद पढ़ाई छोड़ कर खेती-किसानी और मजदूरी मे लग गये थे। उसके पिता भी कृषि मजदूर ही थे।
मै पिछले सप्ताह ही गांव गया था। गांव मे सड़क पक्की हो गयी थी, जहाँ तहाँ डिश एंटीना भी दिख रहे थे, लोगो के हाथ मे मोबाईल भी दिख रहे थे। लेकिन यह सारी प्रगति एक छलावा सी लग रही थी, क्योंकि गांव का चौक जहाँ पर बसे रूकती थी अब वीरान हो चुका था। जिस जगह पर देर शाम तक रौनक रहती थी, कई दुकानें थी, अब उजाड़ था। गांव के अंदर भी लोगो को घरो के बुरे हाल थे। मेरे अधिकतर सहपाठी जिन्होने आगे पढ़ाई की थी वे अच्छी जिंदगी की तलाश मे गांव छोड़ चुके थे, और जो आगे नही पढ़ पाये थे वो तो हमारे कालेज के ही दिनो मे गांव छोड़ कर रोजगार की तलाश मे निकल लिये थे। केवल एक ही मित्र मिला था जो दर्जी का काम कर रहा था, मुझसे केवल दो तीन वर्ष बड़ा था लेकिन पचास से उपर का लग रहा था।
अपने इस गांव के ऐसे हालात देखे थे कि संपन्न परिवारों के लड़के ही पढ़ लिख कर आगे बढ़ रहे थे, बाकी केवल मजदूर ही बन रहे थे, चाहे कृषि मज़दूर हो या कारखाना मजदूर। ऐसे मे एक आर्थिक/शैक्षणिक दोनो तरह से पिछड़े परिवार की नयी पीढ़ी का एक नवयुवक हवाई यात्रा कर रहा है, मेरे लिये सुखद आश्चर्य से कम नही था।
मेरी दसंवी कक्षा (सन 1991) मे कुल 152 साथी थे। उसमे से केवल पांच ही आगे बढ़ पाये। दो इंजीनियर(मुझे लेकर) क्योंकि दोनो के पिता शिक्षक थे, तीन शिक्षक, जिसमे से दो के पिता धनी किसान थे और तिसरे के पिता मजदूर थे। इसमे से मजदूर पिता का पुत्र मेहनती था और एक डाक्टर के घर पर काम करता था तो उसे वातावरण अच्छा मिला, पढ़ाई के लिए अपना खर्च निकाल लेता था, जिससे उसे समस्या नही आयी। लेकिन बाकी 147 (40 लड़कीयाँ समेत) वहीं के वहीं रह गये। इनमे से सात-आठ परिवार के पास इतनी भूमि थी कि वे तरीके से कृषि कर पायें, बाकी केवल मजदूर बन कर रह गये। 

आज जब मै अपने सहपाठीयों से मिलता हुं तो वे आंख मिलाकर बात नही कर पाते है, मुझे साहब कह कर बुलाते है और मै शर्म से गड़ जाता हुं। ऐसे वातावरण मे मुझसे अगली पीढ़ी हवाई यात्रा कर पा रही है एक आशा जगा रही थी। मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

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स्पाईवेयर गाथा : हमारा ज्योतिष साफ़्टवेयर

मंगलवार, जुलाई 24, 2018

2001-2002 हम गुड़गांव मे एक कंपनी मे काम करते थे। छोटी कंपनी थी, करीब 400 लोग। साफ़्टवेयर कंपनी और वह समय साफ़्टवेयर सेवा कंपनीओ के लिये सुनहरा समय था। औसत आयु लगभग 22-25 वर्ष।

कंपनी मे माहौल किसी कालेज के जैसे ही होता था। काम के साथ मौज मस्ती खूब चलती थी। महाराष्ट्र से होने के बावजूद भी मेरी एक अच्छी खासी मित्र मंडली बन गई थी, जिसमे कुछ लड़कीयाँ भी थी।

हमारी छवि उन दिनो मे भी एक टेकी, नर्डी बंदे की थी। हमारे क्षेत्र मे कोई भी समस्या का तुरंत हल रहता था हमारे पास, जिससे सारी कंपनी मे सभी मुझे अच्छे से जानते थे, हर किसी से मित्रवत संबध थे।

एक दिन कपिल महाशय आये, बोले "यार तेरे से एक काम है ? बोल करेगा क्या ?"

कपिल महाशय दिलफ़ेंक इंसान थे, कन्याओं के आगे पीछे घूमते रहते थे। लेकिन मुझे लगा कि मेरे पास आया है तो किसी टेकी समस्या के लिये ही आया होगा। हमने बोला, काम बताओ, हमारे बस का होगा तो कर देंगे।

कपिल : "मुझे सुनयना की जन्म तारीख पता करनी है ?" (*नाम बदल दिया है।)
हम : "यार इसमे मै क्या करुंगा ? तु सीधे जाकर उससे पुछ ले ना!"
कपिल : "नही यार , बड़ी अकडु लड़की है! नही बतायेगी। एच आर को बता दिया तो मेरी लग जायेगी!"
हम :"अबे तो मेरी क्यों वाट लगा रहा है ?"
कपिल : " यार तु उससे पुछेगा तो बता देगी, तेरी उससे अच्छे से बनती है!"
हम :"अबे तो जन्मतारीख कैसे पुछुंगा ? उसको क्या लगेगा ?"
कपिल :"कुछ कर यार!"
हम : "ठीक है, कुछ सोचते है!"

मुझे अपना एक पुराना ज्योतिष साफ़्टवेयर याद आया। ये साफ़्टवेयर जन्मकुंडली बनाता था। नाम, जन्मतिथि समय, लिंग, जन्मस्थान की जानकारी देने पर कुंडली बना देता था। साथ मे भविष्य भी बताता था। जन्मकुंडली तो सही बनाता था लेकिन भविष्यवाणी मे कुछ भी रैंडम बना कर दिखा देता था।

उसकी भविष्यवाणी मे सब कुछ मीठा मीठा ही होता था, जैसे -  " आप बहुत मेहनती है, लेकिन मेहनत का पूरा फ़ल नही मिलता है। आप सब पर विश्वास करते है लेकिन लोग आपके विश्वास का गलत फ़ायदा उठाते है। आप का वर्तमान समय कठिन है लेकिन अगले एक-दो वर्षो मे सुनहरा समय आपका इंतजार कर रहा है!"

इस साफ़्टवेयर का सोर्स कोड खोज निकाला। उसमे कुछ बदलाव किये जैसे कि प्रेमसंबधो और वैवाहिक जीवन की भविष्यवाणी। ये भी सब मनबहलाव वाला था, मतलब कि कुछ भी बना कर दिखा दो, बस ध्यान रखो की सब कुछ मीठा मीठा ही हो। लेकिन इस भविष्यवाणी के लिये उपयोगकर्ता को अपने प्रेमी/प्रेमिका/पति/पत्नि का नाम भी देना होगा।

दूसरा बदलाव यह किया कि उपयोग कर्ता की सारी जानकारी वह मेरे कंप्युटर पर भेज देगा। उपयोगकर्ता को केवल जन्मकुंडली और भविष्यवाणी दिखेगी, उसे पता भी नही चलेगा कि पीठ पीछे उसकी सारी जानकारी मेरे पास पहुंच चुकी है।

नये साफ़्टवेयर को अच्छी तरह से टेस्ट किया। सब कुछ ठीक ठाक लगा तो उस साफ़्टवेयर को उस लड़की के साथ कुछ और मित्रो को भेज दिया। साफ़्टवेयर भेजने के पंद्रह मिनट मे ही उस लड़की का सारा कच्चा चिठ्ठा मेरे पास था।

लेकिन जनता रूकी नही, उन लोगो ने साफ़्टवेयर अपने मित्रो के पास भेजा। शाम तक यह हाल था कि मेरे पास कंपनी की 90% लड़कीयों का बायोडाटा था और 50% लड़को का। लड़के पता नही केवल इसे अग्रेषित कर रहे थे, प्रयोग नही कर रहे थे। जबकि लड़कीया प्रयोग कर रही थी लेकिन आगे नही भेज रही थी।

शाम को कपिल आया! पूछा काम हो गया! हमने कहा हो गया लेकिन पहले पार्टी! पित्जा मंगवाया गया, भोग लगाया गया। उसके बाद हमने डाटाबेस खोला। उस कन्या की जन्मतिथि देखी कपिल को बताई। अचानक मेरी नजर प्रेमी/प्रेमिका/पति/पत्नि पर पड़ी, वह कालम खाली नही था और उसमे कपिल का नाम होने की कोई संभावना तो थी ही नही।

उस कालम को कपिल से बचाने की कोशिश की लेकिन उसकी भी नजर पड़ गई। भाई साहब का मूड आफ़ हो गया।

बोले :"आशीष! ये काम तुने अच्छा नही किया!"

हम :" अबे इसमे मै क्या कर सकता हुं। मैने थोड़े ही डाटा डाला है!"

कपिल महाशय का 400 रूपये का चूना लग गया था, भूनभूनाते हुये पैर पटकते हुये चले गये।

दस कदम गया होगा कपिल वापिस आया। बोला "यार ये डाटाबेस मुझे दे दे ?"

हम :" अबे तु इसका क्या करेगा ?"

कपिल :"अबे इसमे सारी सिंगल लड़कीयो की जानकारी भी है, वो गई तो क्या हुआ बाकी की जानकारी काम आयेगी!"

हम :"आंय़!"

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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