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और रवि मामा चले गए ....


भारतीय भाषाओं में कम्प्यूटिंग पर मेरी रुचि कालेज के दिनो से थी। यूनिकोड से पहले यह सब फॉन्ट का खेल होता था, डेटा (text) अंग्रेजी में होता था , उसे फ़ॉन्ट्स के जरिए हिंदी में दिखाते थे। सारे हिंदी और अन्य भारतीय भाषा के अखबार यही करते थे। DTP कार्य, पुस्तके, कार्ड्स, मुद्रण यही तरीके अपनाते थे। इंटरनेट पर आपको भारतीय भाषा में पढ़ना हो तो उस वेबसाइट वाला फॉन्ट डाउनलोड करो और पढ़ो। लेकिन भारतीय भाषाओं में आम लोगो के लिए लिखना आसान नहीं था।

फिर आया यूनिकोड का जमाना। लेकिन यह लोकप्रिय नही था क्योंकि यूनिकोड में लिखना आसान नहीं था। मोबाइल फोन कीपैड वाले थे। यूनिकोड में लिखना लगभग असंभव था। जो कुछ था वह कम्प्यूटर से था। लेकिन समस्या वही थी। ऑपरेटिंग सिस्टम में यूनिकोड समर्थन था जरूर लेकिन उसे प्रयोग करने से पहले बहुत कुछ इंस्टाल करना होता था।

2004 के दौरान पता चला कि इंटरनेट पर हिंदी में लिखने के लिए एक पूरी टीम लगी हुई है। ये लोग हिंदी में ना केवल लिखते थे, लोगों को पकड़ पकड़ कर हिंदी में लिखना, ब्लॉग बनाना सिखाते थे। हिंदी में लिखने के ट्यूटोरियल देते थे। जो खुद तकनीकी रूप से सक्षम ना हो, उनके हिंदी कंटेंट को स्वयं के ब्लॉग, सामुदायिक ब्लॉग/पोर्टल पर जगह देते थे। इन स्वयंसेवकों में से एक थे रवि रतलामी या रविशंकर श्रीवास्तव। ये "नौ दो ग्यारह" वाले आलोक जी, "फुरसतिया" वाले अनूप शुक्ल जी, "चिट्ठा चर्चा" वाले देवाशीष, "नारद" वाले जीतू भाई, मिर्ची सेठ, रमण कौल, ईस्वामी, "जिंदगी के मेले" वाले पाबला जी, ब्लॉग वाणी वाले मैथिली गुप्त जी ...... जैसे निस्वार्थ स्वयंसेवकों का समूह था। 

रवि जी, विद्युत यांत्रिकी में स्नातक की डिग्री लेने वाले इन्फार्मेशन टेक्नॉलाजी क्षेत्र के वरिष्ठ तकनीकी लेखक भी थे। इनके सैंकड़ों तकनीकी लेख भारत की प्रतिष्ठित अंग्रेज़ी पत्रिका आई.टी. तथा लिनक्स फॉर यू, इलेक्ट्रोनिकी फॉर यू से प्रकाशित हो चुके हैं। हिंदी कविताएँ, ग़ज़ल, एवं व्यंग्य लेखन इसका शौक है और इस क्षेत्र में भी इनकी अनगिनत रचनाएँ हिंदी पत्र-पत्रिकाओं दैनिक भास्कर, नई दुनिया, नवभारत, कादंबिनी, सरिता इत्यादि में प्रकाशित हो चुकी हैं। हिंदी दैनिक चेतना के पूर्व तकनीकी स्तंभ लेखकर रह चुके हैं।

रवि जी,  लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम के हिंदी-करण के अवैतनिक - कार्यशील सदस्यों में से एक थे और उनके द्वारा गनोम डेस्कटाप के ढेरों प्रोफ़ाइलों का अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद किया गया था, तथा इन्हीं प्रयासों से लिनक्स का हिंदी संस्करण मिलन (http://www.indlinux.org) 0.7 जारी हो चुका है।

वे रचनाकार(rachanakar.org) पोर्टल का संचालन करते थे, जिस पर हिंदी कथा, कहानी, लेखों और पद्य का संकलन है।

2004-2005 के मध्य मैं रवि जी के संपर्क में आया। इसी दौरान मैंने अपने ब्लॉग खालीपिली और विज्ञान विश्व पर काम शुरू किया। 2006 में मेरी छोटी बहन का विवाह तय हुआ, मैने शादी का निमंत्रण रवि जी को भेजा। उसके प्रत्युत्तर में मुझे रवि जी ने निवेदिता का रिश्ता भेजा जो उनकी भांजी (बड़ी बहन की बेटी) है।

और 2007 में रवि जी मेरे लिए रवि मामा हो गए।



2004 से शुरू हुआ यह संपर्क 7 जनवरी की रात बारह बजे थम गया जब सौरभ ने मुझे फोन किया और कहा कि मामा की पल्स नही मिल रही है। जब तक मैं घर पहुंचा तब तक सब कुछ समाप्त हो चुका था।

नौ जनवरी की सुबह उन्हें अंतिम विदाई दे आए।

रवि मामा अब "रचनाकार" और "छींटे और बौछारें" के द्वारा हमारे साथ है। जब भी आप लिनक्स ऑपरेटिंग सिस्टम में हिंदी इंटरफेस देखें तो याद रखें इसके पीछे एक व्यक्ति रवि रतलामी भी थे।

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