मैने एक सपना देखा !

बुधवार, सितंबर 28, 2005


कल रात मैने एक सपना देखा। वैसे कुछ नया नही था, हमेशा की तरह हम एक कन्या से बतिया रहे थे। वैसे हमारे अनुसार कन्यायें दो प्रकार की होती है, कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं। सपने मे देखी कन्या दुसरी श्रेणी(ज्यादा खूबसूरत) की थी।

वैसे हमे आज तक अपने सपनों का मतलब समझ मे नही आया, हमेशा अजीबो-गरीब, उल जलूल किस्म के सपने आते हैं, जिसका ना तो सर होता है ना पैर। सायमंड फ्रायड को भी पढ़कर देख लिया, सपनो का मतलब समझना तो दूर रहा, पूरा का पूरा कन्फुजिया गया। तीसरी कसम के राज कपूर की तरह कसम खा ली, दोबारा सायमंड फ्रायड को हाथ नही लगाएंगे, पुस्तकालय के जिस हिस्से मे उनकी पुस्तक रखी हो, उस हिस्से मे कदम ही नही रखेंगे।


तो हम सपने मे एक खुबसुरत कन्या से बतिया रहे थे। हम रहते ज़रूर अमरीका मे है लेकिन सपनो मे सिर्फ देशी कन्यायें आती है, आखिर फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी। या कुछ इस तरह कह सकते है कि विदेशी कन्यायें हमे सपने मे भी घास नही डालती। तो ये कन्या भी विशुद्ध देशी थी। हम सुबह उठने पर हैरान परेशान ! पूरे सात साल बाद उस कन्या ने हमे दर्शन कैसे दिये ?

हम पुरानी यादों मे खो गये, इस कन्या से हम मिले थे, अपनी पहली नौकरी मे। वह मानव संसाधन/प्रबंधन/स्वागत विभाग मे का एकमात्र स्तम्भ(इकलौती सदस्या) थी और हम कम्पनी के सबसे नये रंगरूट प्रोग्रामर। वह मेरी काफी अच्छे दोस्तों(?) मे से एक थी। पता नही वो मेरी दोस्त थी या दुश्मन? हम लोग कभी भी किसी मुद्दे पर एक मत नही हुये थे। जब भी मिलते थे ,हमेशा लड़ते रहते थे। यह शुरू होता था सुबह कार्यालय मे आने से और जारी रहता था शाम को घर जाते तक।

सुबह वह मेरे से पहले कार्यालय पहुंच जाती थी, जब मैं कार्यालय पहुचंता एक अच्छी मुस्की के साथ गुड मॊर्नींग मिलती थी। अब हम ठहरे थोडे तेड़े जीव, सीधी तरह जवाब देना कभी सिखा नही। कभी अपने पिछे की तरफ देखना शुरू कर देंगे, ये जताने के लिये की वो गुड मॊर्नींग हमे ना बोल कर पिछे वाले को बोल रही है। कभी पूरी अकड़ से जवाब देंगे ठीक है ठीक है, जैसे हम कम्पनी के मालिक है। फिर क्या है, जवाब मिलेगा आज से आपसे कभी बात नही करूंगी। अब हमे शांत रहना तो आता ही नही है, पलट के जवाब देंगे अरे जाओ ना! , तुमसे बात करना ही किसे है ?। वह नाक मुंह बिचका कर चेहरा घूमा लेती थी, और हम चल देते थे, अपनी सीट पर।

लेकिन ठीक 12:00 बजे, फोन बजेगा।

खाने के लिये आ जाओ।
आज मेरा उपवास है !
तुम उपवास रहते हो? किसके लिये ?
ऐश्वर्या राय नामक देवी के लिये!
भडाक(फोन पटकने की आवाज)

2 मिनट बाद दोनो कैंटीन मे। वो घर से खाना लाती थी, और हम कैटीन से खाना लेते थे। लेकिन मै उसका तीन चौथाई खाना मै खा जाता था। वैसे भी वो पूरा एक परांठा सिर्फ 30 मिनीट मे खाती थी। खाते खाते हर दिन किसी ना किसी बात पर लढाई शुरू हो जाती थी। मुझे या उसे(पता नही किसे) लड़ने का एक बहाना चाहिये होता था, , जो की मिलना मुश्किल नही होता था। वैसे भी मेरे जो सुवचन होते थे वह कन्या जाति के खिलाफ ही होते थे। मेरे सोचने का ढंग ऐसा नही होता था(ना है), सिर्फ उसे चिढाने के लिये पता नही कहां कहां से ऐसे सुवचन ढूंढ लाता था।

मेरे कुछ सुवचनो मे से जो उसे अंगारा बना देते थे:
  • नारी मस्तिष्क की बलीहारी, तन हरे मन हरे , मरे नर्क ले जाये।
  • भारतीय इतिहास मे जितने युद्ध हुये है, नारी के कारण हुये है। रामायण शुर्पनखा के कारण, महाभारत द्रौपदी के कारण। और तो और संयोगिता ना होती तो मुगल भी भारत नही आते।
  • हव्वा आदम को सेब खाने नही उकसाती तो, आज सभी लोग स्वर्ग मे होते।
बस हमारा युद्ध शुरू। धीरे धीरे पूरी की पूरी कंपनी(कुल जमा मालिक समेत २० लोगो की ) लडाई का मजा लेती थी। कंपनी की बाकि जनता भी आग लगा कर मजे लेती थी। कभी कोई उसके बारे मे मेरे सुविचार उस तक पहुँचा देता, और वो लड़ने मेरी सीट पर ! या कोई उसके सुविचार मुझे कह देता और मै उसकी सीट पर। या यूं कहे पूरी कम्पनी उत्प्रेरक का काम करती थी। उत्प्रेरकवह तत्व होता है, जो रासायनिक क्रिया मे भाग नही लेता लेकिन प्रतिक्रिया की गति को बढा देता है।

एक दिन लड़ाई मे हमने एक खतरनाक सुविचार व्यक्त कर दिया:
लड़कियों का काम सिर्फ बच्चे और चुल्हा सम्हालना है।

अब हमारी पिटायी के पूरे आसार नजर आ रहे थे, तूफान आ चुका था, बिजली कडकने लगी थी। वो तो भला हो “राजू साहब” का जो एन वक्त पर, ज्वालामुखी का साथ देने पहुंच गये। राजू साहब कंपनी के परीचर(Office Asistant) थे और उनका काम हर जगह टांग अडाना था।

राजू उवाच:
सर आप ये क्या बोल रहे हो, आप देखो कुछ दिनो मे सारे मरद घर मे बच्चा सम्हालेंगे और बाई(महिलाये) लोग ऒफीस मे काम करेंगी!

मादाम अपनी झोंक मे कह गयी
तुम देखते जाओ, मैं ऐसा २ साल मे कर दिखाती हुं !

मेरा बल्ब जला
क्या ?
मुझे जोरो से हंसी आ गयी। अब मादाम की ट्युब लाईट जली और समझ मे आया कि वो क्या कह गयी है। वो शर्म से एकदम लाल हो गयी और मैं हंसते हंसते लोटपोट। राजू साहब की समझ मे आज तक नही आया कि क्या हुवा।

दूसरे दिन 9:00 बजे मैं रिसेप्शन पर:

आपके 2 साल मे एक दिन कम हो गया है, आपका प्लान कहाँ तक पहुंचा ?

उसने मेज पर से एक पेपर वेट उठाया और दे मारा, मै इस हमले के लिये पहले से तैयार था। पीछे दरवाज़े का शीशा शहीद हो गया।

समय का पहीया घूमा, घाट घाट का पानी पीते हम अमरीका आ पहुचे। उससे आखिर बार मिले(लड़े) पूरे ७ साल हो गये। आज वो नजर आयी सपने मे। पता नही कैसे ?

मै हैरान इसलिये हुं, क्योंकि सपने तो उन्ही चीज़ो के आते है जिनके बारे मे हम सोचते है। ये कन्या मेरी सुनहरी यादों कि एक प्रमुख पात्र ज़रूर है, लेकिन मेरे यादों पर तो समय की सुनहरी धूल की एक मोटी परत जम चुकी थी? क्या ये निकट भविष्य मे उससे मिलने(लडने) का संकेत है ?
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4 टिप्पणीयां

1.अनूप शुक्ला उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:01 am

बालक हम खुश हुये तुम्हारा सपना देख के। जब हम पढ़ रहे थे तो सारा समय हमारी नजरों के सामने से गुजर रहा था। सपना में कन्या आई है तो कुछ प्लान भी लायेगी । तब तक बाकी कन्याओं से के भी सपने देख लो। ज्याद कन्याओं की संगति पाने के लिये उचित होगा कि आगे से कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें खुबसुरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों की असहमति तथा आपसे बात नहीं करूंगी ये दो पतली गलियां हैं जो बातें करते कब समय गुजर गया कि पता ही नहीं चला के राजमार्ग से जुड़ता है।इन गलियों से लगातार जुड़े रहो बालक । खुशनुमा समय तुम्हें देख के मुस्कराये जा रहा है।

2.अनूप शुक्ला: उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:04 am
भूल सुधार:
कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें बदसूरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों

3. Atul उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 11:12 pm

आशा है आपको आपकी स्वप्नसुँदरी जब भी मिले विभा की तरह न मिले जिसने रवि के सपने के गुब्बारे में सुई भोंक दी थी।

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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