कहानी तो पूरी फिल्मी है !

सोमवार, अक्तूबर 24, 2005

अब मेरी तो समझ मे नही आ रहा है कहां से शुरू करें ! कहानी पूरी फिल्मी है, फ्लैश बैक मे ले जाउं या सीधे शुरूवात से ले जाउं। ऐसे भी इस मामले मे हम थोडे अनाडी है। वैसे ठीक ही है वर्ना अब तक बर्बाद(शादी) हो गये होते !

अब किस्सा कुछ ऐसा है कि चेन्नै मे मै दो और छडो(सुखी/क्वांरो) के साथ रहता हुं। जब इन दोनो महाशयो को मेरी कम्पनी (विप्रो) मे नौकरी मिली थी, तब मै इन दोनो का बास था। तब मै अकेला रह रहा था। इन लोगो की खुशकिस्मती या बदकिस्मती समझे, मैने इन लोगो से पूछा कि क्या वे मेरे साथ रहना पसन्द करेंगे। अब वे तो बास को ना करने से रहे। दोनो मान गये। अब मै बास था तो थोड़ा नाजायज फायदा तो उठा लेता था जैसे खाना मै बनाउंगा, वे तैयारी करेंगे(सब्जी काटना/बर्तन साफ करना वगैरह वगैरह..)। वे बेचारे मेरा बनाया खाना झेल कर भी तारीफ करते थे।

बाद मे पता चला उनमे से एक अन्ना मेरे ही कालेज से है, दुसरा नन्दी है। दोनो बन्दे अपने आप मे मस्त है, थोडे लापरवाह, हर आती जाती कन्या को घुरना उनका जन्मसिद्ध अधिकार। कभी कभी किसी कन्या के कारण अपने बस स्थानक के आगे 4-5 बस स्थानक आगे तक जाकर वापस पैदल आयेंगे। वैसे बन्दे शरीफ है, लेकिन अन्ना का सबसे बडा सपना है कि जिन्दगी मे कम से कम उसकी एक “महिला मित्र” हो जिसके साथ वो कम से कम एक फिल्म देख सके। उससे शादी तक का उसका कोई इरादा नही है क्योंकि उसे मालूम है कि अगर उसने प्रेम विवाह की बात भी की तो उसके मां बाप घर से निकाल देंगे।

नन्दी का फंडा थोडा अलग है, शर्मीला है, बिल्कुल “छोटी सी बात” के अमोल पालेकर के जैसे। वैसे तो बातो का शहंशाह है लेकिन किसी लड़की से बात नही कर सकता।

अन्ना जो मेरा कालेज का कनिष्ठ था, मुझसे कुछ ज्यादा खुल गया था। उसकी नजरो मे मै हर चीज (तकनीकी हो या खेल-कूद या चिड़ीमारी या कुछ भी) मे उसका “बाप” लगता था। और तो और उसने मुझे “पापा” कहना शुरू कर दिया था।

हिन्दी फिल्मो की तरह कहानी मे मोड़ आया, एक कन्या के प्रवेश से। अब कम्पनी की मेरी टीम मे एक ख़ूबसूरत सी कन्या आयी। कन्या सीधी-सादी घरेलु सी थी, मृदुभाषीणी थी। कन्या इन दोनो को भा गयी। एक प्रेम त्रिकोण बन गया जिसमे तीसरा कोण(कन्या) शांत था, मतलब कि उसे कुछ मालूम ही नही था। कभी कन्या ने एक से “हाय” कर दी, उसका सारा दिन अच्छे से गुजरेगा। दूसरा सारा दिन झल्लाता रहेगा। एक बन्दे की मुस्कराहट दूसरे के जख्मो पर नमक का काम करती थी उसपर जिसे “हाय” मीली थी वह शाम को पार्टी दे देगा, जो तेज मिर्च काम करती थी।

मै इन सब चीजो से अंजान था, लेकिन मुझे कुछ शक हो रहा था। एक दिन ऐसे ही जब रूम पर हम लोग बाते कर रहे थे, उस कन्या का जिक्र निकल आया। मैने ऐसे ही कह दिया “अच्छी लड़की है”। मेरा मतलब था, लड़की काम मे अच्छी है। लेकिन अन्ना को लगा कि मै अपना नंबर लगा रहा हुं और मैने अपना नंबर लगाया तो उन दोनो को पत्ता साफ ! वो छूटते ही बोला:


“पापा! आप ये क्या बोल रहे हो, आप अपनी उमर देखो और उसकी उमर देखो। वो आपके बेटी जैसी है।”

और अन्ना ने अपनी जिन्दगी की सबसे भयानक भुल कर दी। मैने कहा

“अबे मै उसको लाईन नही मार रहा, तु बोल रहा है तो ठीक है वो मेरी बेटी है।” 

नन्दी को मौका मिल गया। ऐसे भी बाल की खाल निकालने मे उस्ताद। बोला

“तब तो वह लडकी अन्ना की बहन हो गयी क्योकि बास(मै) तो अन्ना और कन्या दोनो के बाप है”। 

नन्दी उछलने लगा,और रूम मे नाचना शुरू कर दिया। बेचारा अन्ना सर पीट रहा था, कहां मुझे फंसाने चला था खुद ही अपने जाल मे फंस गया।

कुछ ही दिनो बाद मै चल दिया, एक दुसरे प्रोजेक्ट मे मिनियापोलिस, उसके बाद क्लीवलैण्ड पूरे ८ महीने बाहर रहा। जब भारत वापिस आया तो नया नजारा देखने मिला। अन्ना की उस दिन की गलती उसके लिये गले का फांस बन चुकी थी। नन्दी उसे ब्लैकमेल कर रहा था और कहते रहता था,

“अबे अन्ना अपनी बहन को बूरी नजर से मत देख”।

मैने पाया कि नन्दी कुछ ज्यादा ही गम्भीर है, उसने अपनी मां को उस लड़की के बारे मे बता रखा है। लेकिन बन्दा पूरा “छोटी सी बात” वाला अमोल पालेकर है, अपनी मां से बात कर ली, लेकिन उस लड़की से नही। प्रेम प्रस्ताव तो दूर की बात साधारण रोज़ाना के काम वाली प्रोग्रामिंग की तकनीकी बात भी नही की है ! लेकिन महाशय ने उस लड़की के बारे मे हर चीज पता कर रखी है, उसके खाने के समय पर खाना खाने जायेगा, उसके पिछले वाली सीट पर बैठेगा।ऒफीस मे सबसे पहले पहुँचेगा ताकि वह जब आये तो हाय बोल सके। अन्ना उससे यदि बात करने की कोशिश भी करे तो शाम को उसे धमकायेगा। बोलेगा
“अबे , साले बहन पर लाइन मारता है”। 

अन्ना को तो साला बना लिया है लेकिन वाह रे नन्दी महाराज , लड़की सामने आयी  कि बोलती बन्द !

उसका जन्मदिन आया नन्दी सुबह छः बजे आफीस मे , अन्ना को बाथरूम मे बंद करने के बाद ! सुबह सबसे पहले उसको जन्मदिन की बधाई दी, हाथ मिलाया। उसके बाद सारे दिन उसने वो हाथ किसी से नही मिलाया और शाम को अन्ना को एक रेस्तरां मे डीनर पार्टी दे डाली। अन्ना शायद पिछले जन्म मे कालाहांडी मे पैदा हुवा था, खाने के नाम से सब भुल जाता है ! जन्मदिन किसी और का, पार्टी  दे रहा है नंदी और वह भी किसी और को!

मैने नोट किया कि वो लडकी दोनो को पसंद है लेकिन अन्ना अपने सपने तक के लिये ही गम्भीर है। जबकि नन्दी ने अपने घर मे भी बात कर रखी थी, मेरा झुकाव नन्दी के लिये हो गया था। अब उनकी टीम(मेरी भूतपूर्व टीम) से एक कन्या की शादी तय हुयी। उस लड़की ने भी अपनी सहेली की शादी मे जाने का तय किया। शादी चेन्नई से ५ घंटे की दूरी पर कुंभकोणम मे थी। शादी रविवार की थी, लेकिन वह कन्या शुक्रवार को जा रही थी ताकि वह वहां पर शनिवार को आसपास घूम-फिर सके। अपने दोनो हीरो ने शनिवार को जाने कि योजना बनाई।

अब गुरूवार की रात को हम लोग ऐसे ही बाते कर रहे थे, उन लोगो ने मेरे से पूछा आप इस स्थिति मे क्या करते, मैने कहा

”करना क्या है? जब वह शुक्रवार को जा रही है, तब मै भी उसी दिन जाता । उसके साथ मे पूरे दिन घूमने फिरने का पूरा जुगाड तो कर ही लेता। आखिर पहले बातें होगी साथ मे घूमेंगे, तब ही तो मामला आगे बढ़ेगा”

अन्ना थोड़ा निश्चिंत था, उसे अपने पर तो नही लेकिन नन्दी पर पूरा भरोसा था, कि ये कुछ नही कर सकता। अब नन्दी ने पूरी योजना बदल दी और अन्ना को हवा नही लगने दी। शुक्रवार शाम को 9 बजे बस के समय 15 मिनट पहले उसने अन्ना को जोर का झटका धीरे से दिया। कहा

”मै आज ही उसी बस से, उसके साथ ही जा रहा हूं।”

और हीरो ने अपना बैग उठाया और चल दिया। बेचारा अन्ना ऐन वक्त पर कुछ नही कर पाया। पूरी रात भुनभुनाता रहा और नन्दी को गालियां देता रहा। और मै अपने लैपटोप पर “हम -तुम” देखता रहा और अन्ना के मजे लेते रहा अभी तक तो नन्दी है अभिषेक बच्चन और अन्ना सैफ अली खान। यहां तो अभिषेक बच्चन मेहमान भूमिका मे नही, नायक की भूमिका मे नजर आ रहा है।

और हां इस “अमोल पालेकर” को “अशोक कुमार” तो नही लेकिन ‘आशीष कुमार” जरूर मिल गया है। आगे देखते है क्या होता है।
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3 टिप्पणीयां »
1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 24, 2005 at 11:56 pm
कहानी तो बढ़िया है लेकिन भइये ये मन शक के घेरे में आ रहा हैकि
कहीं नंदी के बहाने अपनी कहानी तो नहीं कह रहे हो।

2.आशीष श्रीवास्तव उवाच :
अक्तुबर 25, 2005 at 7:11 pm
अनुप भईया,
इस कथा मे जितनी भी घटनायें घटी है, उसमे से अधिकांश घटनाओ के समय हम भारत भुमी पर थे ही नही !
आशीष

3.सारिका सक्सेना उवाच :
अक्तुबर 26, 2005 at 6:55 pm
कहानी के साथ-साथ कहने का अंदाज़ भी अच्छा है। आगे की कहानी का इंतज़ार रहेगा।


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ऐसे बीता मेरा जन्मदिन

बुधवार, अक्तूबर 19, 2005

आज मैने अपनी जिन्दगी के उन्तीस साल पूरे कर लिये। बचपन मे मेरा जन्मदिन काफी धुमधाम से बनता था। घर मे सबसे बड़ा था उपर से पूरे मुहल्ले मे अकेला लड़का। काफी आनन्द आता था। हमेशा इंतजार रहता था, हम एक दिन के शंहशाह होते। हर फरमाईस पूरी की जाती। घर मे उपहारो का ढेर लग जाता था। पापा मम्मी और बहने तो रह्ते ही थे, साथ पापा के स्कुल से सभी शिक्षक सहकर्मी भी आते थे।

ये सिलसीला खत्म हुवा मेरे कालेज मे पहुंचने के बाद। उसके बाद तो कुछ ऐसा हुवा कि जन्मदिन पर घर पहुंचना मुश्किल जाता था। लेकिन मै कैसे भी , हर हालत मे शाम तक घर पहुंच जाता था। पांरपरिक तरिके से टिका किया जाता था,। कुल मिला कर परिवार मे मेरा जन्मदिन एक तरह से त्योहार ही था।

कालेज के बाद जब नौकरी की जद्दोजहद मे ऐसा हुवा कि जन्मदिन मनाना  लगभग बंद हो गया। ऐसे भी जब से पापा नही रहे थे तो कोई उत्साह नही रहता था। बस यदि दोस्तो को याद रहा तो शाम को पार्टी हो जाती थी, किसी होटल/रेस्टारेंट मे जाकर शाम का खाना खा लिया बस।

वैसे भी मै पिछले 7-8 सालो से अकेला रह रहा हुं, एक जगह पर टिक कर कभी नही रहा तो मम्मी को साथ मे रखने की सोच नही पाया छोटा भाई सरकारी नौकरी मे जमा हुवा है तो मम्मी और छोटी बहन उसी के साथ रहते है। बस तब से तो जन्मदिन पर उन लोगो से बात कर लो बस दिल खुश हो जाता है।

जब मैने चेन्नई मे विप्रो मे काम करना शुरू किया था, यहां भी कुल मिला कर हाल वही था, वही भटकती जिन्दगी, कभी भी 3-4 महीनो से ज्यादा एक जगह ना रह पाना। साल मे 6 महिने से ज्यादा बाहर। जन्मदिन तो दूर किसी भी त्योहार मनाने के लिये तरस जाता था। नये दोस्त बन नही पाये, एक जगह टिक कर रहो तभी तो दोस्त बनेंगें!

लेकिन इस साल बात कुछ और थी। पिछले प्रोजेक्ट के लिये मुझे दिसंबर 2004 मे कुछ रूकी(नये कालेज स्नातक प्रोग्रामर) दिये गये थे। उन लोगो ने अपना कैरीयर की शुरूवात मेरे मार्गदर्शन मे की थी, और मैने उन लोगो को एक अच्छी शुरूवात देने की कोशीश की थी। इन लोगो को मै मस्ती मे मेरे बच्चे ही कहता था। और वे मुझे बास इन बच्चो का मुझे बास कहना, अपने मार्गदर्शक/गाईड/मेंटर को सम्मान देने के जैसा ही था।

इस टीम के साथ मैने 3-4 महीने कार्य किया। बच्चो का कार्य अच्छा रहा था, मेरा यह प्रोजेक्ट अब कंपनी के लिए एक उत्पाद बन चुका था। मेरा कार्य समाप्त था, मेरे बच्चे अब इसे आगे बढ़ाने मे सक्षम थे। प्रोजेक्ट का ठोस आधार खडा कर मै चल दिया फिर से अमरीका, अगले प्रोजेक्ट के लिये।

और मैं वापिस पहुचां अपने जन्मदिन(19 अक्टूबर) से 2 दिन पहले। 19 अक्टूबर आया। सुबह मंदिर जाकर भगवान जी को पिछले साल के लिये धन्यवाद बोला और अगले साल के आने के लिये समय ले लिया। घर फोन कर मम्मी , छोटी बहन और भाई से बाते की और सोचा हो गया अपना जन्मदिन !

शाम तक काम मे लगा रहा। ऐसे भी काफी काम पडा था… भारत वापिस आने के बाद नये वातावरण मे, फिर से सब कुछ व्यवस्थित करना मुश्किल हो जाता है। हर बार जब भी वापस आता हुं सब कुछ बदल चुका होता है। नये लोग, नया वातावरण, नये सहकर्मी…। पूरा दिन कैसे गया पता नही चला…।

शाम को जब घर(मेरा कमरा, घर तो वो होता है जिसमे घरवाले हों) जाने की तैयार था, एक मिटिंग के लिये बुलाया गया। अंदर पहुंचा तो पता चला कि मेरे जन्मदिन मनाने की पूरी तैयारी है। केक, बधाई पत्र लेकर पूरी जनता तैयार थी। दिल खुश हो गया। बचपन के सारे जन्मदिन याद आ गये।

मैने तो सपने मे भी नही सोचा था कि भारत आने के बाद कार्यालय मे मेरा जन्मदिन इतने अच्छे से मनाया जायेगा। और मेरे साथ काम करने वाले मेरे ये बच्चे, मेरे लिये ये सब ताम झाम करेंगे।

कुल मिला कर याद रहेगा ये जन्मदिन!


5 टिप्पणीयां »

1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 21, 2005 at 6:43 am
जन्मदिन मुबारक हो मेरे बच्चे। दुआयें कि भगवान तुझे टिकाकर रहने वाली साथी टिकायें।

2.eswami उवाच :
अक्तुबर 21, 2005 at 6:55 am
जन्मदिन की बहुत-बहुत मुबारकबाद आशीष!

3.जीतू उवाच :
अक्तुबर 22, 2005 at 6:23 pm
भई आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। देर से ही सही, लेकिन हम आ ही गये।
अक्सर होता ये था, कि जो परमालिंक आपका बनता था, वो काम नही करता था, पता नही क्यों। लेकिन आज कर गया, इसलिय सारी पिछली पोस्ट एक साथ पढ रहा हूँ।

4.पंकज नरुला उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 3:36 am
आशीष भाई,
थोड़ा लेट कह रहा हूँ पर बधाईयाँ तो समय की मोहताज नहीं होती। जिंदगी के नए साल की बहुत बहुत बधाईयाँ। आशा करते हैं कि आपका नया प्रोजेक्ट इधर सैन होज़े साइड लगे व आप कम से कम चार अटैची लेकर यहाँ पधारे।
पंकज




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चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना

मंगलवार, अक्तूबर 11, 2005

चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना
खतम हुवे उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था
आज यहां और कल हो वहां ये जोगी वाला फेरा था
सदा रहा है इस दुनिया मे किसका आबो दाना
चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना

भारत वालो मै आ रहा हुँ, अमरीका वालो मै जा रहा हूँ। यहाँ क्लीवलैंड मे मेरा काम खत्म हो गया है, और हमने अपना बोरीया बिस्तर बांध लिया है। बस कुछ दिनो का और इंतजार 15 अक्तुबर को हम चल दिये वापिस।

वैसे मै अमरीका अक्सर आते जाते रहता हुं लेकिन ज्यादा समय के लिये नही, 6 सप्ताह से लेकर 8 सप्ताह तक। इस बार कुछ ज्यादा ही खिंच गया पूरे 8 महीने हो गये। जैसे ही हाथ का काम निपटाता , दुसरा काम हाजिर हो जाता। लग जाओ फिर से। इस बार भी फिर से नया काम आ गया था, लेकिन मै अड़ गया, बहुत हो गया अब हर हाल मे वापिस जाना है। रही काम की बात भारत जा कर अपनी जगह किसी को भेज दुंगा। वैसे भी मेरा विसा नवम्बर मे खत्म हो रहा था।

वैसे भी मालुम है कि कम्पनी भारत पहुचने के बाद चैन से नही रहने देगी, कहीं ना कहीं भेज देगी। वो तो भला हो अमरीकी दुतावास का अगले 3 महीनो तक विसा साक्षात्कार के लिये समय उपलब्द्ध नही है, अमरीका वापिस आने का कम से कम मार्च तक कोई मौका ही नही है। ऐसे भी सर्दियो मे कौन आना चाह्ता है यहां ? और यदि युरोप जाने का अवसर आया तो क्या कहने ! काफी कुछ है घुमने के लिये, वेनिस, रोम ,प्राग , पेरीस…

इस बार भारत मे ज्यादा टिक गया तो इतना निश्चित है कि भविष्य मे इतनी स्वतत्रंता से आवारागर्दी नही कर पाउंगा ! इस बार घरवाले छोडेगे नही। मेरा सुख चैन छीन जायेगा।

कैसी दुविधा है? एक तो घर जाने की जल्दी है और घर से भागने की योजना भी तैयार ।

चलो कोई बात नही पहले भारत तो पहूचों !
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टिप्पणीयाँ

1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 11, 2005 at 12:52 pm
आओ स्वागत है तुम्हारा.लगन-साइत बडी जोरदार चल रही है.


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मैं हिन्दी मे क्यों लिखता हुं ?

शुक्रवार, अक्तूबर 07, 2005

जब बात छेड( सुनील जी, इस्वामी जी, जितु जी, अतुल जी……)दी गयी है तो हम भी आ जाते है मैदान मे।

मै हिन्दी क्यों लिखता हुं ?

ये प्रश्न ही गलत है ! जबकि होना ये चाहिये मैं हिन्दी क्यों ना लिखुं ?



मेरा दिमाग ही हिन्दी मे चलता है। अंग्रेजी तो उसी वक्त याद आती है, जब सुनने वाले को हिन्दी ना आती हो। मेरे रगो मे हिन्दी रची बसी है। हिन्दी माध्यम से पढा हुं। बचपन से लेकर अब तक हिन्दी सुनी है, देखी है।

मैं हिन्दी मे लिखता हुं, पढ़ता हुं, बात करता हुं क्योंकि मुझे अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि मै अपनी जडो से जुडा हुवा हुं ! मै अपनी मिट्टी के पास हुं।

भाषा किस लिये होती है ? लोगो से संपर्क के लिये, विचारों के आदान प्रदान के लिये ? जब वो मैं हिन्दी मे कर सकता हुं, तब मैं किसी और भाषा का प्रयोग क्यो करूँ ? किसी और भाषा का प्रयोग करना आपकी व्यावसायिक मजबूरी हो तो समझ मे आता है लेकिन बाकी निजी कार्यो मे ?

दक्षिण भारत विशेषतया तमिलनाडु हिन्दी विरोध के लिये जाना जाता है। मैं चेन्नई मे २ साल रहा, लेकिन मुझे हिन्दी को लेकर कभी कोई परेशानी नही गयी ! होटल, आटो, रिक्शा यहां तक कि सब्जी वाला, दुधवाला, किराणावाला सभी से मैं हिन्दी मे बात कर लेता था। हां उन्हे हिन्दी मे बात करते परेशानी जरूर होती थी लेकिन इतनी भी नही कि मैं उनसे बात ना कर सकुं। और हां आप इन लोगो से अंग्रेजी मे बात करने की उम्मीद नही रख सकते।

भारत मे या भारत के बाहर मैं जहां भी गया, जहां भी भारतीय मिले चाहे दक्षिण भारतीय हो, गुजरती, बंगाली हो हिन्दी ही संपर्क का माध्यम रही। मैने हिन्दी मे शुरूवात की और मुझे जवाब हिन्दी मे ही मिला। जब मै हिन्दी मे अपने लोगो से संपर्क कर सकता हुं अपनी बात समझा सकता हुं तो मै हिन्दी क्यो ना लिखुं ?

जिसे हिन्दी आते हुये भी हिन्दी नही पढना हो या हिन्दी पढना लिखना पिछडापन लगता हो, नही चाहिये ऐसे लोग मुझे ! मै नही चाहता कि ऐसे लोग मेरा चिठ्ठा देखें भी। मै चाहता हुं कि मेरे चिठ्ठे को पढने वाले वही लोग को हो जो अपनी मातृभाषा से प्यार हो, सम्मान हो चाहे वे मुठ्ठीभर ही क्यों ना हो। और है मेरे पास ऐसे लोग !

ईस्वामी जी ने सही कहा था कि
““ऐसा ही हूं मैं - कर लो जो करते बने”, “हम नहीं सुधरेंगे” वाला ये भाव मुझे कहीं ना कहीं हर हिंदी के ब्लागर मे दीखता है”।

हां मैं भी अडियल हुं, मुझे हिन्दी मे ही लिखना अच्छा लगता है, एक सुकून मिलता है। नही लिखना मुझे किसी
और भाषा मे।

याद आती है कुछ साल पहले घटीत एक छोटी सी घटना ! कुछ साल पहले मै और मेरे कुछ सहकर्मी ओसाका, जापान गये थे। जब हम पहले दिन कार्यालय गये तब हमारे स्वागत के लिये संबधीत विभाग का व्यवस्थापक स्वागत कक्ष मे मौजूद था। उसने हम लोगो से हाथ ना मिलाते हुवे पूरे भारतीय अंदाज़ मे हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। बाद मे पता चला कि जब उन लोगो को पता चला कि भारत से कुछ लोग उनके साथ काम करने आ रहे है तब पूरे विभाग ने एक हिन्दी शिक्षक से भारतीय अभिवादन और शिष्टाचार सीखा था।

मैं जापान मे कुछ ही सप्ताह रहा और देखा कि जापानी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति से कितना प्यार करते हैं। विडंबना है मैने अपनी भाषा के लिये सम्मान विदेश जा कर सिखा। तब मैने सोच लिया था कि जहां भी मै जाउँगा अभिवादन के लिये “नमस्ते” और आभार के लिये “धन्यवाद” का प्रयोग करूंगा।

मैं क्लीवलैंड मे जिस कपनीं के लिये काम कर रहा हुं आज उस कंपनी के लगभग हर व्यक्ति को ‘नमस्ते’ तथा ‘धन्यवाद’ का अर्थ मालूम है। और जब मैं उनके पास से गुजरता हुं वो मुझे “हाय” या “हैलो” की बजाय “नमस्ते” कहते हैं।

इन दो घटनाओं से मैने देखा है कि यदि आप अपनी भाषा को सम्मान देते है तो आप के आस पास के लोग आपकी भाषा को सम्मान देना शुरू कर देंगें। आखिर सारी दुनिया जापान मे काम करने के लिये या जापान के साथ व्यवसाय करने के लिये जापानी क्यों सिखती है ? ये जर्मनो से साथ भी देखा गया है। जापानीयो को तो अंग्रेजी अच्छे से नही आती, लेकिन जर्मन तो अंग्रेजी जानते हुये भी अंग्रेजी बोलना पसंद नही करते !

सबसे पहले जब मैने “अभिव्यक्ति” देखी थी, काफी खुशी हुयी थी कि हिन्दी मे एक अच्छी पत्रिका इन्द्रजाल पर उपलब्ध है। बाद मे “वेब दुनिया” देखा, उसके बाद तो एक श्रंखला ही शुरू हो गयी। मै आभारी हुं हिन्दी चिठ्ठाकार समुह का जिन्होने हिन्दी को इन्द्रजाल मे लाने के लिये इतनी मेहनत की है। मैने तो चिठ्ठा “ब्लाग” शब्द ही रवी रतलामी जी के अभिव्यक्ति मे एक लेख मे पढा था। उसके बाद सभी को पढना शुरू किया। इसके पहले तो मुझे मालूम था सिर्फ उन्ही लोगो के बारे मे जो अभिव्यक्ति और अनुभूति मे लिखते थे। मुझे पता चला कि और भी धुरंधर बैठे है। बस क्या था चलो , हम भी लिखेंगे और शुरू हो गये।

पढने का शौक है, अब तो हिन्दी मे काफी कुछ पढने के लिये इन्द्रजाल मे उपलब्ध है, और इस तरह उत्साह बना रहा तो जल्द ही और भी काफी कुछ होगा। बस कोई कारण ही नही है हिन्दी मे ना लिखने के लिये !

ईकबाल ने कहा था

हिन्दी है हम , हिन्दी है हम, हिन्दी है हम
वतन है हिन्दोस्तां हमारा !

7 टिप्पणीयां »
1. eswami उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 4:50 am • संपादन करें
मित्र तुम तो बहुत काम का आईडिया लाए! ये नमस्ते और धन्यवाद वाला विचार मेरे दिमाग में क्यों नही आया! लेख पढ कर मजा आ गया!

2. अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 5:58 pm • संपादन करें
लेख हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है। बधाई।

3. सुनील उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 9:11 pm • संपादन करें
आशीष जी लेख बहुत अच्छा लगा क्योंकि सीधे दिल से लिखा लगता है. सुनील

4. जीतू उवाच :
अक्तुबर 8, 2005 at 11:25 am • संपादन करें
अच्छा लिखे हो बन्धु, लगता है दिल की आवाज या कहो गुबार है।
सच ही है, जब हम सोचते हिन्दी मे है, तो लिखे दूसरी भाषा मे क्यो, ये तो विचारो का अनुवादीकरण हुआ, यानि डुप्लीकेशन। ओरीजनल हमेशा डुप्लीकेट से बेहतर होता है।

5. रजनीश मंगला उवाच :
अक्तुबर 10, 2005 at 12:49 am • संपादन करें
मैंने जीतू जी के ब्लाग पर भी अपना विचार छोड़ा है। जर्मनों के बारे में बहुत लोगों के मन में गलत धारनाएं हैं। लगभग सब व्यवसायिक जर्मन अंग्रेज़ी के महत्व को समझते हैं और अंग्रेज़ी सीखने बोलने का प्रयत्न करते हैं। शुरू शुरू में मुझे हर जर्मन कहता था कि चलो मैं तुम्हारे साथ थोड़ा अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास कर सकता हूं। पहले एक दो साल मैंने उनके साथ अंग्रेज़ी बोली क्योंकि मुझे भी इतनी अंग्रेज़ी बोलने का अवसर भारत में नहीं मिला था। लेकिन इस चक्कर में मैं जर्मन नहीं सीख पाया। अब यहां दफ़्तरी भाषा जर्मन है तो कभी न कभी तो जर्मन अच्छी तरह सीखनी ही पड़ेगी। अब मैं किसी जर्मन के साथ अंग्रेज़ी नहीं बोलता।
लेकिन यहां अंग्रेज़ी का बोलबाला है। अंतरराष्ट्रिय व्यापार के चलते अंग्रेज़ी सीखना अनिवार्य हो गया है। अंग्रेज़ी सीखे बिना ये लोग अमेरिका जाकर काम नहीं कर सकते। FM radio पर, Disco में लगातार अंग्रेज़ी गाने चलते हैं। ये अंग्रेज़ी फिल्में dub कर सकते हैं लेकिन संगीत नहीं।
भईया ये politics और business है ना कि देशप्रेम, भाषाप्रेम या सांस्क्रिति प्रेम।

6. आशीष श्रीवास्तव उवाच :
अक्तुबर 11, 2005 at 2:22 am • संपादन करें
रजनीश जी,
मैने जो लिखा था वह अपने अनुभव से लिखा था. मैने कुछ समय Deutsche Post के लिये काम किया था (भारत तथा फ्रेंकफर्ट दोनो जगह) तब मैने महसुस किया था कि जर्मन अग्रेंजी जानते हुये भी बोलना नही चाहते.
हो सकता है आपका अनुभव अलग रहा हो.
आशीष

7. Sachin Shinde उवाच :
अक्तुबर 28, 2005 at 7:35 pm • संपादन करें
आशीष श्रीवास्तव जि,
आप के चिथे को देख कर बोहोत खुशि हुई| आप ये उपक्रम ऐसे हि चालु रखे येहि आप से विनति है धन्यवाद|


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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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