गुरु पूर्णिमा

मंगलवार, जुलाई 11, 2006


आज गुरु पूर्णिमा है, वेद व्यास का जन्मदिन ! गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें हम अपने गुरुजनों, श्रेष्ठजनों व माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा उनका आदर करते है।

इस दिन के साथ बचपन की काफी सारी खट्टी मीठी यादे जुड़ीं हुयी हैं। मुझे याद है कि मेरा स्कूल मे प्रवेश इसी दिन कराया गया था। सुबह कलम -पाटी पूजा हुयी थी, तिलक लगाया गया था। पाटी पर एक बड़ा सा ॐ बनाया गया था। एक मंत्र भी पढ़ा गया था
ॐ नमः सिद्धम ।
ॐ नमः सिद्धम । इस मंत्र से याद आया कि हमारे गांव मे एक बुजुर्ग हुआ करते थे, वे इस मंत्र को बिगाड़ कर कहते थे
आनामाशी धम, ना बाप पढ़े ना हम ।
पापा ने उसके बाद मुझे स्कूल लेकर गये थे। हंसते हंसते पापा की साईकिल पर बैठकर स्कूल गये थे और रोते रोते वापिस आये थे। अब रोते हुये इसलिये आये थे कि पापा तो नाम लिखा कर हमे झांसा देकर खिसक लिये थे। कुछ देर बाद पापा दिखायी नही दिये तब रोना शुरू! वो तो गनीमत थी (शिक्षिका बहनजी के लिये) कि मेरे पड़ोस की प्रभा दीदी भी उसी स्कूल मे पढ़ती थी। उन्होने हमे सम्हाला और शाम को घर वापिस लेकर आयी थी।

स्कूल मे हर साल यह दिन धूमधाम से मनाया जाता था। हम पाटी पर , बाद मे पूस्तिका पर ॐ बनाकर स्कूल जाते थे। स्कूल मे वेदव्यासजी और ॐ की पूजा होती थी। शिक्षकों के भाषण होते थे और छुट्टी। मेरी शिक्षिकाओ मे से दो मुस्लिम थी (छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी)। स्कूल मे हर शुक्रवार सरस्वती पूजा भी होती थी, लेकिन उन्होने हमेशा हर पूजा मे सक्रिय रूप से भाग लिया था। उस समय मुझे सब कुछ सामान्य लगता था। आज जब मै स्कूलों मे पूजा पाठ, प्रार्थना और तो और राष्ट्रगान(वंदे मातरम) पर विवाद के बारे मे पढ़ता हूं तो आश्चर्य होता है कि मेरे बचपन मे सरस्वती और वेद व्यास की पूजा छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी ने करवाई है।

समझ मे नही आता कि ऐसा धार्मिक सौहार्द पता नही क्यो राजनिति की बली चढ जाता है !

मेरे एक शिक्षक थे टाटी गुरू(जी), मै उनके प्रिय छात्रो मे से एक था। उन्हे मुझसे काफी आशायें थी। वे मुझसे पूछा करते थे कि “मै तेरा क्या हूं,गुरू या गुरुजी”। उस समय मेरी समझ मे नही आता था कि उनका इस अजीब से प्रश्न का मतलब क्या है ? मै जवाब देता था “गुरु जी”। हमारी आदत थी कि सम्मान देने के लिये हर वाक्य के बाद ‘जी’ लगा दो और हम ‘गुरु’ के बाद ‘जी’ लगा देते थे। वे थोडे निराश हो जाते थे। बाद मे जब बडे हुये और इस प्रश्न का मतलब समझ मे आया तबसे हम उन्हे टाटी गुरुदेव ही कहते हैं। उन्होने हमे गुरू का अर्थ बताया था जो आज भी याद है
जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर सके वही गुरु है।
उनका एक और कथन मुझे याद आ रहा है
“गुरु मे वह शक्ति होती है जो एक चरवाहे को मगध सम्राट बना सकती है।“
समस्त गुरुजनो को सादर नमन !
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5 टिप्पणीयां “गुरु पूर्णिमा” पर

हमारा भी नमन शामिल है गुरुजन के लिये!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

संसार के समस्त गुरुओं को मेरा नमन्
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

बहुत बढिया लिखा. गुरु पूर्णिमा पर इससे बेहतर लेख नहीं हो सकता था
pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

ज्ञान की जगह शायद अज्ञान हो।(भूले से लिखा गया) ज्ञान का प्रकाश होता है। लेख बहुत ही अच्छा है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

अब ठीक है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 13th, 2006

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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