कंठलंगोट गाथा

सोमवार, जून 11, 2018

काजल जी ने गांव मे टाई बांधने वाले की धमक के बारे मे पोस्ट डाली है, हम भी अपना ताजा ताजा किस्सा बताते है। पिछले महिने ही कंपनी ने अमरीका के बिजनेस विजा के लिये चेन्नई भेजा। उन्होने धमका के रखा था कि बिजनेस विजा है, २० साल से काम कर रहे हो शरीफ़ो के जैसे सूट पैंट टाई लगा कर जाना, आफ़िस नही है, जैसे बने वैसे चले आये..!

२०१३ मे आस्ट्रेलिया से लौटने के बाद टाई नही बांधी थी। फ़ोटो मे तो फोटोग्राफ़र फ़ोटो खींचने के बाद फोटो को टाई, कोट पहना कर बाल भी बना देता था। लेकिन यहाँ तो काउंसलेट आफ़िसर के सामने इंप्रेशन मारना था।

खैर कोट पैंट टाई लेकर चेन्नई पहुंचे। काउंसलेट जाने से पहले नहाया धोया, परफ़्युम छिड़का, ढंग से बाल बनाये।इस्त्री कर कपड़े पहिने। अब टाई बांधना शुरु किया। बोलो राम हो गया.. टाई बांधना भूल गये....

समझ मे नही आया गड़बड़ क्या हो रही है... ब्रिटीश चौड़ी टाई को फ़ेंका, अमरीकन दूबली पतली टाई उठाई.. लेकिन किस्सा वही टाई नही बंध रही।

युट्युब उठाया कि टाई कैसे बांधी जाती है... दो तीन विडीयो देखे , फ़िर कोशीश की ... मुहुर्त खराब था... नही बंधना थी.. नही बंधी...

हमने बोला कि भाड़ मे जाये टाई, विजा रिजेक्ट हो जाये अपनी बला से, बास ऐसे भी जबरन भेज रहा है... बस सूट पहना और चल दिये..

किस्मत खराब थी, काउंसलेट आफ़िसर बिना टाई के ऐसे ही इम्प्रेस हो गई और विजा थमा दिया....

वापस होटल आये, सोचा कि चलो एक बार और प्रयास करते है... अब पहली बार मे ही तरिके से टाई बंध गई....

मेरी अभी तक समझ मे नही आया कि पहले मै गड़बड़ क्या कर रहा था!

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मिलना एक जीगरी मित्र से पंद्रह वर्ष बाद

17 बरस! प्रवीण से पिछली बार उसकी शादी में 2002 में मिला था। उसके बाद मे कई बार अमरीका आया, प्रवीण भारत आया लेकिन हम लोग किसी ना किसी वजह से मिल नही पाए। इस बार मेरी योजना दो सप्ताह रिचमंड वर्जीनिया, दो सप्ताह प्लानों टेक्सास की थी।

लेकिन मुझे प्लानों में जिससे मिलना था वह कम्पनी छोड़ गया। मेरी पूरी योजना खटाई में।

लेकिन बाद में सोचा कि एक सप्ताह अपनी टीम से ही मिल लेता हूँ। टिकट बुक कराई औऱ पहुंच गए टेक्सास।

प्रवीण पहले दिन खाना लेकर आया जिसको हमने तीन दिन तक खाया। शुक्रवार को प्रवीण ने ऑफिस से उठा लिया और घर पहुंचगे। भाभी, दोनो बच्चो कबीर और वेदिका से मिला।

तीन सप्ताह बाद अदरक वाली चाय पी। शुद्ध देशी घर का खाना खा कर आत्मा तृप्त हो गई।

उसके बाद गप्पे शुरू हुई, ठाकुर को न्यूजीलैण्ड फोन कर मातादीन की याद दिलाई गई, राजेश को लन्दन सुबह तीन बजे घंटी बजाई, उठाया नही।

सब मित्र मंडली 40 पार है, एक जमाने मे सब मूंछे रखते थे, अब केवल मेरी मूंछे बची है। पंडित के सर पर उतने ही बाल है जितने 17 साल पहले थे।

पुरानी यादें टटोली गई, भाभी ने पंडित की भंडारा वाले किस्सो के बारे में पूछा , हम बता नही पाए, किसी का नाम ही याद नही आया :(

सुबह जोर का झटका लगा जब पता चला कि पंडित शादी के बाद खाना बनाना सीख गया है, भाभी ने इडली और पंडित ने सांभर और चटनी बनाई।

जाते समय भाभी ने चाय के लिए पूछा और हम मना नही कर पाए, इस चाय के चक्कर मे रिचमंड की फ़्लाइट छूटते बची।

पंडित ने भंडारा वरठी में स्कूटर चलाने के अंदाज में कार चलाई और जब देख लिया कि बंदा सुरक्षा जांच पूरी कर चुका है, वापिस आने का खतरा नही है तभी वापस गया।

पंडित, मानेगा या नही लेकिन फ्लाइट में तुझे sms भेजते समय आंखे नम थी।

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जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु. लील्यो ताहि मधुर फल जानू..

श्रीवास्तव जी, इनबॉक्स में प्रकट हुए , कहने लगे कि तुम कायस्थ हो, पढ़े लिखे हो, अपने धर्म और पूर्वजो के ज्ञान का मजाक उड़ाते हो। चित्रगुप्त वंशजो को शोभा नही देता। पश्चिम में जो भी खोज हो रही है हमारे ग्रंथो में पहले से मौजूद है।

हम उनके आशय को समझ गए और उनका शिकार उन्ही के हथियार से करने की सोची।

हम बोले: आप भी कायस्थ है, घर मे किताबे तो होंगी ही।

वे : बहुत सी है..

हम : वेद तो आपने पढ़े ही होंगे..

वे: ....

हम : अच्छा वेदों का भाष्य, अनुवाद पढ़ा ही होगा।

वे: ....

हम : छोड़िए वेदों को, उपनिषद, पुराण तो अवश्य ही पढ़े होंगे।

वे : ....

हम: अच्छा रामायण, महाभारत

वे: हम महाभारत घर मे नही रखते, रामायण घर पर है।

हम: संस्कृत में या हिंदी अनुवाद ?

वे: तुलसी दास वाली।

हम: महाराज वो रामचरित मानस है। चलो जाने दो उसमे विज्ञान बता दो।

वे: तुलसीदास ने सूर्य की दूरी बताई है।

हम : महाराज व्हाट्सएप ज्ञान मत पेलो। सबसे पहले वह तथाकथित विज्ञान मानस में नही हनुमान चालीसा में है।

हमने पूछा : आप इसकी बात कह रहे है ना
जुग (युग) सहस्त्र जोजन (योजन) पर भानु. लील्यो ताहि मधुर फल जानू..

वे : जी हां ऐसा ही कुछ है..

हम : अच्छा यह बताइये कि व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी वाले इसमे

एक युग = 12000 वर्ष
एक सहस्त्र = 1000
एक योजन = 8 मील बताते है।
एक योजन याने 8 मील कैसे तय हुआ ?

युग समय की इकाई है, मील दूरी की इकाई, तो किस वैज्ञानिक हिसाब से इन दोनों को गुणा किया गया ?

वे : ...

हम : मालिक आपने भी इंजीनियरिंग की है। रिवर्स इंजीनियरिंग भी जानते होंगे ?

वे : मतलब ?

हम : प्रयोगों मे निरीक्षण से परिणाम की बजाय उल्टे परिणाम से निरीक्षण लिखने की कला। ये बताओ कि कालेज प्रयोगों में g का मान हमेशा 9.8 m/s2 या कांच का रेफ्रेक्टीव इंडेक्स 1.5 कैसे लाते थे?

वे अंतर्ध्यान हो गए, अब शायद ब्लॉक ही कर देंगे ...

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बचपन और विचारधारा का विकास

1986-87 का समय होगा, रिलायंस क्रिकेट विश्वकप के आसपास का समय। हम कक्षा 6 में थे। स्कूल से वापिस आने के बाद अंधेरा होते तक झालिया गांव में चौक के पास खेलते थे।
चौक पर एक बड़ा बरगद का पेड़ है, वही बसे रुकती है, कुछ चायपान की दुकान, साइकल मरम्मत केंद्र थे।
खेलो में वालीबॉल, कबड्डी प्रमुख होते थे, लेकिन अब विश्वकप बुखार की चपेट में आकर क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया था। अंधेरा होने के बाद सारी मंडली बतियाते हुए तालाब या पास की नहर तक जाते थे, वहां मित्र मंडली नहाने , शौच जैसे काम निपटाती थी। वापस आने के बाद सब अपने अपने घर।
गांव में एक पटले गुरुजी थे, जो आमगांव में संघ से जुड़े स्कूल में अध्यापक थे। उन्हें शायद निर्देश था कि गांव मे शाखा लगाई जाए। उनकी बहुत दिनों से हमारी मंडली पर नजर थी, क्योंकि गांव में कोई और उन्हें गंभीरता से लेता नही था।
एक दिन हम क्रिकेट खेल रहे थे, पटले गुरुजी ने क्रिकेट की जमकर बुराई की। जैसे ये बच्चो का खेल नही है, बॉलर के कंधे खराब होते है, बैट्समैन की कमर वगैरह बगैरह। बाल मन डर गया, पुछा कि क्या करे। उनको मौका मिल गया, कहा कि देशी खेल खेलना चाहिए, वैचारिक विकास के लिए बौद्धिक चर्चा करना चाहिए वगैरह। कल इसी समय आओ, मैं सब सीखाता हूँ।
दूसरे दिन सब जमा हुए। गुरुजी ध्वज लेकर आये थे, साथ में एक पूर्णकालिक सेवक को भी लाये थे। पूरे विधि विधान से शाखा लगी। कुछ खेल खेले गए, बौद्धिक(?) चर्चा के अंतर्गत कथाकथान हुआ, जिसकी प्रस्तावना आतातायी, आक्रमणकारीयो के अत्याचारों से रखी गई। पुरे गांव में आक्रमणकारी समाज से संबधित दो शिक्षिकाये थी, जो स्कूल मे सरस्वती पूजा, व्यास पूजा भी कराती थी, तो मित्र मंडली में किसी को हजम नही हुई। मित्र मंडली क्रिकेट ना खेले जाने से भुनभुना रही थी अलग से।
अगले दिन शाम को पटले गुरुजी , और वाघाये(पूर्णकालिक) महोदय फिर से आ गए। क्रिकेट की बलि चढ़ी। कुछ खेलो के बाद कथाकथन आरंभ हुआ। आज का विषय विश्वगुरु प्राचीन भारत और वेदों मे विज्ञान था। वाघाये साहब ने महानता के गीत गाये, वैमॉनिक शास्त्र, परमाणु बम के असली स्रोत बताये, मैक्समूलर, मैकॉले निन्दा पुराण का वाचन किया। हम ज्ञान के ओवरडोज से अभिभूत थे।
दूसरे दिन हमारे प्रिय शिक्षक टाटी गुरूदेव विज्ञान की कक्षा ले रहे थे आक्सीजन के बारे में पढ़ा रहे थे, विदेशी वैज्ञानिक जोसेफ प्रिशले द्वारा आक्सीजन की खोज के बारे में बताया। नव प्राप्त ज्ञान के ओवरडोज से अभीभूत और भारतीय ज्ञान की चोरी से किसी विदेशी को श्रेय दिए जाने से हम भड़क गए। और पूरी कक्षा में नव प्राप्त ज्ञान का वमन कर दिया। गुरुदेव थोड़े हत्प्रभः होगये। कक्षा समाप्त होने पर बुलाया, बाहर लेकर गए और सारी जानकारी ली। हम थोड़े डरे हुए थे, गुरुदेव से नही, उनकी तीन फुट वाली हरे बांस से बनी विद्यादायनी से। लेकिन गुरुदेव ने कुछ नही कहा, मुस्कराते हुए चले गए।
हमारा शाम को ध्वज तले विश्वगुरु माहात्म्य, आतातायी निन्दापुराण का श्रवण जारी रहा। मित्र मंडली क्रिकेट ना खेलने और ज्ञान के ओवरडोज से अब कसमसाने लगी थी, लेकिन हमारे कारण विद्रोह नही कर रही थी।
अगले रविवार को सुबह 6 बजे टाटी गुरुदेव अपनी साइकिल से घर आये। पापा से मीले , सामान्य हाल चाल पूछा गया। मैं डर रहा था कि टाटी गुरुदेव शिकायत करेंगे और उसके बाद पापा सुताई करेंगे। लेकिन आशंका निर्मूल निकली। टाटी गुरुदेव ने पापा को कहा कि मैं आशीष को आज आमगांव ले जा रहा हूँ, दोपहर तक घर छोड़ दूंगा। पापा ने क्यो कैसे कुछ नही पूछा, बोले ठीक है ले जाइए।
टाटी गुरुदेव की साइकल के कैरियर पर बैठकर आमगांव पहुंचे। गुरुदेव एक पुस्तकालय ले गए। पुस्तकालय की वार्षिक फी 12 रूपये देकर मुझे सदस्य बनाया। ऋग्वेद की भारीभरकम पुस्तक मेरे नाम पर इश्यू करवाई। और कहा कि कल से आधा घण्टा पहले स्कूल आ जाना।
दूसरे दिन से गुरुदेव ने पाठ्यक्रम की रट्टू संस्कृत के बाहर संस्कृत पढ़ाना शुरू किया। हम ऋग्वेद हिंदी अनुवाद के सहारे पढ़ रहे थे। तीन चार महीने बीतते बीतते सीधे संस्कृत से समझने लगे थे, गुरुदेव सहायता के लिए थे ही। लेकिन गुरुदेव ने कभी भी अपने विचार नही थोपे, कहते थे पढो और जानो कि वेदो में क्या है। नही समझो तो मुझसे सहायता लो , मैं अनुवाद में सहायता करूँगा, व्याख्या नही। गुरुदेव ने पूरे दो साल संस्कृत सिखाई।
अब वापिस आते है हमारी शामो पर। सुबह सुबह टाटी गुरुदेव द्वारा मतिभ्रष्ट होने के रास्ते पर भेज दिए जाने का असर अब शाम को दिखने लगा था, हम अब प्रतिवाद करने लगे थे। मित्र मंडली पर क्रिकेट विश्वकप का बुखार था। वाघाये महोदय पर अन्य स्थानों पर ज्ञान प्रासार का दबाव था, मंदिर आंदोलन भी आरम्भ हो रहा था। आजकल कम आते थे। बस एक दिन विद्रोह हो ही गया, सारी मंडली ध्वज के नीचे ना आकर बाजू के खेत मे क्रिकेट खेलने लगी।
पटले गुरुजी ने हार नही मानी, वे हमारे शाम नहर/तालाब के विहार में हमारा साथ देने लगे। उनका बौद्धिक कथाकथन कार्यक्रम जारी रहा...
मैंने गुरुजी और गुरुदेव शब्द का प्रयोग किया है वह अनायास नही है। इस कथा के सारे पात्र वास्तविक है। पटले गुरुजी रिटायर हो चुके है। 

टाटी गुरुदेव अब हमारे मनमस्तिष्क में ही है।

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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