कोरोना और बाबा जी की दवाई

मंगलवार, जून 30, 2020

गुणीजनों, प्रवचन आरंभ करने से पहले कुछ आवश्यक व्याख्या
  1. व्हाटाबाउटइज्म : जब बात केले की हो तो आम को ले आना। पुछना कि तब कहाँ थे ? या तब क्यों नही बोले ? फ़लां के बारे मे क्यों नही बोले!
  2. बाबा का अर्थ योग नही होता ना ही आयुर्वेद होता है। बाबा के दावों का विरोध का अर्थ योग, आयुर्वेद, देश, संस्कृति, परंपरा का विरोध नही होता है।

बाबा ने कोविड-19 के शतप्रतिशत इलाज के दावे के साथ बाजार मे दवा उतारी है। दावे की प्रामाणिकता मे ढेरों संदेह है, जिनका निराकरण आवश्यक है। लेकिन गुणीजन व्हाटाबाउटइज्म पर आ गये। कुछ कहने लगे कि रेमडेसिवीर, फ़ैब-फ़्लु, हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्विन पर क्यों नही बोले, कुछ कहने लगे कि गोरे बनाने की क्रीम पर क्यों नही बोले, हमदर्द साफ़ी, रुह-अफ़्जा पर क्यों नही बोले।
हे विद्वानों, पहले चर्चा करते है रेमडेसिवीर, फ़ैब-फ़्लु ,हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्विन जैसी दवाओं की।
  1. ये दवाये, आज कल मे नही खोजी गई है, बरसो पुरानी दवाये है।
  2. ये सब दवायें वर्षो तक चलने वाली क्लिनिकल ट्रायल की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, हजारो लोगो पर इनके प्रभाव को देखा गया है।
  3. इन सभी दवाओं की कार्यप्रणाली, प्रभाव और दुष्प्रभाव अच्छी तरह से ज्ञात है।
  4. इनमे से कोई भी दवा OTC नही है, अर्थात इन्हे डाक्टर की पर्ची पर, चिकित्सीय निगरानी मे ही लिया जा सकता है।
  5. इन दवाऒं को कोविड-19 के इलाज के रूप मे प्रचारित नही किया जा रहा है, कोविड-19 के इलाज के लिये क्लिनिकल ट्रायल हो रहा है। इनमे से ग्लेन्मार्क की दवा फ़्लु जैसे लक्षणो के इलाज मे प्रयोग मे आती है।
  6. लेकिन कोविड 19 पर इन दवाईयों के प्रभाव के बारे मे अधिक नही पता है, चुनिंदा मामलो मे क्लिनिकल ट्रायल हुआ है। इसी ट्रायल के एक चरण के रूप मे भारत मे भी इन दवाओं को चुनिंदा मामलो मे डाक्टरों की निगरानी मे ट्रायल के लिये अनुमति मिली है।
  7. बिंदु क्रमांक 4,5,6 को दोबारा पढ़े।

अब आते है, गोरे बनाने क्रीम पर क्यों नही बोले, हमदर्द साफ़ी, रुह-अफ़्जा पर
  1. क्या आप सचमे गंभीर है या केवल बाबा के दावे के उल्टे-सीधे बचाव के लिये लगे हुये है?
  2. ये सब दवाये नही है, हो सकता है कि इन सबके दावे गलत हों, लेकिन क्या इनकी तुलना कोविड-19 जैसी उच्च मृत्यु दर वालीे बीमारी की शतप्रतिशत इलाज के दावे वाली दवा से कर सकते है ?

तो गुणीजनों तो आगे क्या हो ?

बाबा की दवा के बाजार मे आने से पहले वह भी क्लिनिकल ट्रायल से गुजरे। बाकायदा उचित लायलेंस के अंतर्गत उत्पादन हो। कोविड-19 जैसी बीमारीयों के इलाज के लिये प्रयोग चिकित्सीय निगरानी मे ही हो। उसके बाद की उसका प्रचार प्रसार हो।
बाकि आपकी अपनी शृद्धा, आपका जीवन आपकी मर्जी कि आप क्या खायें, कौन रोक सकता है।

-इति श्री गुरुघंटाल बाबा श्री श्री 1680 श्री आशिषानंद प्रवचनामृत

डिस्क्लेमर : बिल गेट्स या बड़ी फ़ार्मा कंपनीयों ने हमे चंदा नही दिया है, दे दे तो मना नही करेंगे। बाबा से भी चंदे का स्वागत है, लेकिन पोस्ट वापस नही लेंगे।

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कांसपीरेसी थ्योरी

गुणीजनों, संतजनो ,
आज प्रवचन का विषय है, कांसपीरेसी थ्योरी। कांसपीरेसी का अर्थ है षड्यन्त्र लेकिन थ्योरी का अर्थ यहाँ ग़लत लिया जाता है। विज्ञान के अनुसार थ्योरी का अर्थ होता है, प्रमाणित सिद्धांत या अवधारणा। लेकिन कांसपीरेसी थ्योरी में यह केवल अवधारणा होती है जिनका आधार अधकचरी सूचनाओं, अफ़वाह और उससे निकाले बेहूदा निष्कर्षों पर होता है।
विद्वानों, कांसपीरेसी थ्योरीयों का इतिहास बहुत पुराना है, लेकिन सूचना क्रांति के इस कालिकाल में इसका विस्तार दिन दून रात चौगुना हो रहा है। कोराना काल में इसके कई नए प्रवर्तक उत्पन्न हुए है।
कांसपीरेसी थ्योरी वाली बीमारी मुख्यतः पश्चिम तक थी लेकिन अब इसका बाजार अब अमरीका से भारत भी आ गया है! अमरीका , यूरोप में ढेर सारी कांसपीरेसी थ्योरी का अस्तित्व है, जैसे न्यू वर्ल्ड ऑर्डर, इल्यूमिनटी, ज़ीयोन कांसपीरेसी। अधिकतर कांसपीरेसी थ्योरी की जड़ में पूँजीपतियों द्वारा विश्व नियंत्रण का षड्यन्त्र ही पाया जाता है।
लगता है जल्दी ही X-Files का भारतीय वर्शन भी India TV पर आयेगा!
भारत में प्रचलित कांसपीरेसी थ्योरी में सुभाष चंद्र बोस कांसपीरेसी, इटली माफिया और केजीबी द्वारा भारत पर नियंत्रण (स्वामी वाली)जैसी गाथायें है। कुछ पुरातन प्रवर्तक जैसे पी एन ओक है जो तेजोमहालय बना देते है, वामीयो द्वारा इतिहास को विकृत किए जाने की घोषणा कर नव इतिहास गाड़ने(पढ़े गड़ने) वाले भी है। एक पत्रकार है जो बोस कांसपीरेसी थ्योरी पर ही जीवन यापन कर रहे है।
कोरोंना काल में बिल गेट्स कांसपीरेसी थ्योरी का उद्भव हुआ है। उसके अनुसार सब कुछ बिल गेट्स का किया धरा है। बिल गेट्स चराचर विश्व के स्वामी है। सारी विश्व की सरकार और नेता सुबह उठते साथ बिल गेट्स को फ़ोन कर निर्देश लेते है कि आज क्या करना हैं। बिल्लु भैया बताते है की इलेवन जीनपिंग आज इस लैब से वायरस निकालो, ट्रैम्पू तुम आज इतने मरीज दिखाओ, पूतिनवा तुम आज इतने मरीज़ों को मारोगे, बोरिस आज इतने टेस्ट करो, नरेंद्र आज बाबा की दवाई पर बैन लगाओ।
गुणीजनों, इनके अनुसार बिल्लु भैया की वैक्सीन बनाने वाले समस्त फ़ार्मा कंपनियो से साँठ गाँठ है, वो बोलेंगे तो वैक्सीन बनेगी, जिसको बोलेंगे वही वैक्सीन बनाएगा। बाक़ी सब को ठिकाने लगाया जाएगा। ना खाता ना बही जो बिल्लु बोले वही सही।
ये प्रवर्तक इतने कनफ़्यूज है कि इनके थ्योरी में कोरोना वायरस से अधिक म्यूटेशन है। पहले ये कोरोना को महामारी नही मान रहे थे। जब लाखों मरीज़ देखे तो कहे कि जान लेवा नही है, फ़्लू मात्र है। जब लाखों मरते देखे तो कह रहे है कि डर का बिज़नस है, डरेंगे नही तो दवा या वैक्सीन कैसे बिकेंग़ी। हर नई दवा के ट्रायल में बिल्लु भैया को घुसेड़ दे रहे है। तर्क भी ऐसे की गलेनमार्क में एक एल है, बिल गेट्स के नाम में भी एल है, मतलब कि बिल गेट्स ही इस दवा को सामने ला रहा है।
इनसे पूछो कि बिल्लू भैया और विश्व सरकारे ऐसा क्यों कर रहे है ? उत्तर पुराना मिलता है पूँजीपतियों द्वारा विश्व नियंत्रण का षड्यन्त्र। वही घिसा पिटा दशकों पुराना रिकार्ड,यह भले ही भारत के लिए नया अवश्य है। फिर वही न्यू वर्ल्ड ऑर्डर, इल्यूमिनाती, ज़ीयोन कांसपीरेसी का कूड़ा। पुरानी शराब नई बोतल में।
तो संत जनो, आप पूछेंगे कि ये सब कांसपीरेसी फैलाकर उन्हें क्या मिलाता है। पैसा! या पैसे बनाने के लिए एक प्लेटफ़ॉर्म। ढेरों फ़ॉलोअर। कल एक किताब ठोंक दे हजारों ख़रीदेंगे। बैचेन मानव से, महाबंदर तक सब बिकता है। एक्जाम वारीयर्स बिक सकती है तो कोरोना वारियर्स क्यों नही बिकेग़ी।

वो कैसे?

विद्वानों, ये बाज़ार भारत में नया है, लेकिन अन्य देशो में ये पैसे बनाने का आसान उपाय है। एक उदाहरण डैन ब्राउन है, उनके सारे उपन्यास इन्हीं कांसपीरेसी के आसपास घूमते है, करोड़पति है अब। फ़ोक्स टीवी , हिस्टीरिया चैनल जैसे चैनल चलते है। किताबें बिकती है, यूट्यूब चैनल चलते है, डीवीडी बिकती है। भारत में ही कई लेखक सैंकड़ों किताबें बेच चुके है, डिस्कवरी जैसे चैनल पर कार्यक्रम दे चुके है।इन सब ने शुरुआत ऐसे ही की थी।
गुणीजनों पहले ऐसी पुड़ियाओं के खुलने पर मै प्रतिवाद करता था, खंडन करता था। धीरे धीरे मैने पाया कि इंटरनेट पर स्वयं घोषित विद्वानों की भरमार है, इन विद्वानों की तर्क या वैज्ञानिक प्रमाणों से दुश्मनी होती है, बस हमने इन पर अपना समय बरबाद करना छोड़ दिया। हाँ कोई सही मे सच जानना चाहता है तब उसकी सहायता कर देते है।
पिछले पंद्रह वर्ष मे जो ज्ञान और महाज्ञानी लोग मैने इंटरनेट पर देखे है , उनकी एक छोटी सूची आप अपने मनोरंजन के लिए काम में ला सकते है।
  1. सारा विश्व कुछ धनी परिवार के लोग नियंत्रण करते है।(Illuminati)
  2. इलुमिनेती का एक और रूप, इसमे भविष्य मे एक विश्व सरकार बनेगी और सारी आतंकवादी घटनाये उस सरकार के लिये आधार बनाने हो रही है। (New world order)
  3. पृथ्वी चपटी है मानने वाले (http://www.theflatearthsociety.org/cms/)
  4. पृथ्वी स्थिर है, सूर्य चंद्रमा तारे पृथ्वी की परिक्रमा करते है। (http://www.fixedearth.com)
  5. पृथ्वी खोखली है, पृथ्वी के केंद्र मे एक छोटा सूर्य है और पृथ्वी के अंदर भी मानव रहते है। ( http://www.youtube.com/watch?v=RaPtq8F2hUc )
  6. कछुवे, शेषनाग पर पृथ्वी मानने वाले
  7. केवल छह हज़ार वर्ष पुरानी पृथ्वी मानने वाले
  8. डार्विन और विकासवाद को झुठलाने वाले महाविद्वान (Intelligent Design )
  9. पृथ्वी के उद्धार के लिये एक नया अवतार आयेगा, कल्कि, जीसस वग़ैरह (New Age)
  10. पृथ्वी से कोई ग्रह 2003, 2006, 2012, 2015, 2016,2020 .... टकराने वाला है।(Nibiru , Planet X )
  11. घटोक्तच , नेफलीम के कंकाल को खोज निकालने वाले
  12. हनुमान की गदा खोजने वाले
  13. Ancient Aliens वाले महाभक्त लोग, ये नही जानते कि हिस्टेरीया चैनल का ना तो इतिहास से कोई संबंध है नी ही विज्ञान से।
  14. धार्मिक ग्रँथ मे प्रकाश गति खोजने वाले, और ये दावा कमोबेश हर धर्म वालो ने किया है। इसमे आई आई टी के प्रख्यात प्रोफेसर भी है, जिन्होंने भौतिकी पर किताबें लिखी है।
  15. हर नयी खोज सिद्धांत को अपने धर्म मे खोजने वाले(सभी धर्म के महात्मा देखे है)
  16. चंद्रमा पर मानव के अवतरण को झुठलाने वाले

इंटरनेट पर ज्ञान और ज्ञानी बिखरे पढ़ें है, लपेटते चलो ......
-इति श्री गुरुघंटाल बाबा श्री श्री 1680 श्री आशिषानंद प्रवचनामृत

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घड़ी के कांटो में फंसी जिंदगी

रविवार, जून 28, 2020

रोज सुबह दो काम होते है गार्गी को स्कूल के लिए तैयार करना और जॉगिंग। सुबह 5:30 उठ जाते है।

अलेक्सा को बता रखा है कि सुबह जगा दे लेकिन हम उससे पहले उठ जाते है।

सोमवार से शुक्रवार तक तक ठीक है। शनिवार , रविवार छूट्टी रहती है तो सोते समय सोचते है कि कल सुबह देर से उठेंगे। अलेक्सा को भी मना कर देते है।

लेकिन 5:30 हुए कि नींद खुल जाती है। बाजू से आवाज आती है सो जाओ। करवट बदलते है, चादर खींचते है कि पेट से आवाज आती है कि उठ जाओ।

मजबूरन उठना पड़ता है। अब बाथरूम में सोचते है कि आज जॉगिंग नही जाएंगे।

नीचे आकर पानी पीते है, चाय बनाते है कि बाहर का नजारा देख कर लगता है चलो यार एक किमी दौड़ लेते है। वो एक किमी कब पांच छह किमी हो जाता है, पता ही नही चलता।

ये भी एक लत है। मशीनी घड़ी के साथ जैविक घड़ी के कांटो में फंसी जिंदगी। साथ में जॉगिंग से निकलने वाले हार्मोनों का नशा, जो ना मिले तो लगता है कि आज कुछ मिसिंग है।

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22 बरस बाद एक फोन

शनिवार, जून 06, 2020

रात के दस बजे, अचानक फोन बजा। फोन उठाने से पहले कट गया। नम्बर देखा, अनजाना था। फोन में इतिहास देखा , पता चला कि पिछले सप्ताह तीन मिस कॉल थे। आम तौर पर अनजाने नम्बर से आये मिसकॉल पर मैं वापस काल नही करता। अपनी जासूसी आरम्भ की, दो मिनट में पता कर लिया कि महाराष्ट्र से किसी राम का फोन है। नाम से फिर भी ढंग से याद नही आया।

सोचा काल बैक करते है, नम्बर पहुँच के बाहर। दोबारा मिस कॉल आई। काल बैक की तो नम्बर फिर से पहुंच के बाहर। तीसरी बार में रिंग गई।

बन्दे ने फोन उठाया। हमने पूछा भाई कौन ?
वो : आशीष हो ना।
हम : आशीष ही हूं, आप कौन ?
वो : पहचान , आवाज से पहचान !
हम : अरे भाई नही पहचान पा रहा हूँ।
वो : मैं राम प्रसाद
हम : अबे साले, 25 साल बाद मिस कॉल दे रहा है और पहचानने कह रहा है...
वो: तू बड़ा आदमी हो गया है, अब कैसे पहचानेगा ?
हम : अबे मुझे तो पता ही नही था कि तू जिंदा है या मर गया , ऐसे अचानक कैसे पहचानूंगा ?
वो : तू गांव आता है तब भी भी मिलने नही आता है। कल राधे मिला था, उसने तेरा नम्बर दिया। उसी ने मम्मी के बारे में बताया।
हम : .....
वो : अबे कम से कम एक फोन तो कर देता
हम : तेरा फोन नम्बर नही था यार, राधे को ही मैंने सभी लोगो को खबर करने कहा था।

जिला परिषद हाई स्कूल कावराबांध
ये फोन मेरे हाई स्कूल के समय के दोस्त का था। मेरे गाँव के पास के एक गाँव मे रहता था। बड़े किसान परिवार से था। किसी दिन स्कूल से देर हो जाती थी और वह घर नही जा पाता था तो हमारे घर ही रुक जाता था। मम्मी-पापा को बहुत मानता था। पापा स्कूल में हम लोगो को गणित पढ़ाते थे तो उन्हें वह गुरुजी कहता था लेकिन मम्मी को  मम्मी ही कहता था।

जब हम कक्षा दस में थे, उसकी शादी हो गई थी। अगले बरस एक बच्ची भी। वह दसवीं में फेल हो कर पास के ही एक आदिवासी क्षेत्र में खेती में लग गया था। हम आगे पढ़ने निकल गए। इंजीनियरिंग के बाद नौकरी के चक्कर मे घूमते रहे, और अपने गांव से बहुत दूर निकल आये थे।

इससे आखिरी बार मिलना 1998 में पापा के जाने पर हुआ था, जब वह घर आया था। आज पूरे 22 वर्ष बाद उसने फोन किया था।

काफी देर बाते होते रही, उसे मेरे बारे में सब पता था। यह भी पता था कि कब मैं अमरीका में, कनाडा में, यूके में, आस्ट्रेलिया में रहा। कब मुंबई से दिल्ली, दिल्ली से चेन्नई, चेन्नई से पुणे पहुंचा और अंततः बैंगलोर में डेरा डाला। उसे गार्गी के बारे में भी सब पता था। बस वह संपर्क इसलिए नही कर रहा था कि उसे लगता था कि शायद मैं उसे भूल गया हूं।

हम थोड़े शर्मिंदा थे। मेरे साथ मुश्किल यह थी कि मेरे गांव में घर के सिवाय कुछ नही है। मैं गाँव भी साल दो साल में एक बार कुछ घण्टो के लिए जाता हूँ, गाँव मे बचे खुचे दो तीन मित्रो से मिल आता हूं। जबकि यह मित्र मेरे गांव से 20 किमी दूर वाले दूसरे गाँव मे बसा है।

बातों में पता चला कि उसकी बेटी की शादी हो गई है और बेटा भी ग्रेड्यूशन कर चुका है।

अब यह सोचा है कि अगली बार जब गाँव जाऊँगा तो कुछ घण्टो के लिए नही एक दो दिन के लिए जाऊँगा। जितने अधिक मित्रों से मिल सकूं मिलूंगा। इससे तो मिलना बनता ही है।

ये मेरे स्कूली जीवन के वो दोस्त है जो तकनीक से अब भी बहुत दूर है। खास कर वे जो पहली से दसवीं तक साथ पढ़े है। साठ-सत्तर लोगो की कक्षा रही होगी जिसमें से मुश्किल से सात आठ लोगो ने ग्रेड्यूशन किया, जिसमे से केवल दो लड़कीयां थी। जब तक हमने ग्रेड्यूशन किया अधिकतर बाल बच्चे वाले हो चुके थे।

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विश्व साइकिल दिवस : 3 जुन

बुधवार, जून 03, 2020

हमारी सबसे पहली साइकिल पापा की हरक्यूलिस साइकिल थी। जो पापा ने हमारे धरातल पर आने से दो साल पहले 1974 में 60 रुपये में ली थी। पापा इसी साइकल से दो किमी दूर स्कूल जाते थे।

इसी हरक्यूलिस साइकल पर हमने पहले कैंची चलाना सीखा। अगले चरण मे कैंची से डंडे पर बैठ कर साइकिल चलाई। सीट से पैडल तक पैर नही पहुंचते थे तो सीट पर से उचक उचक कर साइकिल चलाई। तब तक यह साइकल कबाड़ा हो चुकी थी।

1986-87 में पापा ने इस साइकल को बेचकर साबू साइकिल खरीदी। अंजाना सा ब्रांड था लेकिन साइकिल फ्रेम पर आठ साल की गारंटी दे रहा था। हम अपने स्कूल तब भी पैदल जाते थे। बस पापा के स्कूल जाने से पहले सुबह और शाम को उनके स्कूल से आने के बाद साइकिल हमे मिल जाती थी।

1989 में जब हम पापा के ही हाई स्कूल में पढ़ने पहुंचे तो पापा ने हीरो जेट साइकल ले ली और हमे साबू साइकल दे दी।

यह साबू साइकिल मेरे पास एक लंबे समय रही, हाई स्कूल से लेकर इंजीनियरिंग के पहले दो वर्षों तक । हाई स्कूल में रोज दो किमी दूर स्कूल जाते थे। दोपहर में घर आकर खाना भी खाते थे, जिसमे हम दो किमी की दूरी 5 मिनट से कम मे तय कर लेते थे। यह वह दौर था जब साईकिल पर काफ़ी सर्कस दिखाई। एक साईकिल पर आठ आठ लोग बैठकर गांव मे चक्कर लगाते थे। बिना हैंडल पर हाथ रखे साईकिल चलाने मे महारत हासिल की।

11 वी और 12 वी में दो वर्ष आठ किमी दूर आमगांव स्कूल में साबू का साथ बना रहा। इस दौरान कुछ लंबी साइकिल ट्रिप भी की, जिसमे 24 किमी दूर हाजरा फाल, 60 किमी दूर सिरपुर बांध की सैर भी थी।

स्कूली दिन बीते अब कालेज जाना हुआ, इंजीनियरिंग कालेज गोंदिया में था जो घर से 36 किमी दूर था। सबसे आसान और सस्ता साधन ट्रेन था। अब हम साबू से 8 किमी दूर आमगांव रेल्वे स्टेशन जाते थे। ट्रेन से गोंदिया रेलवे स्टेशन, उसके बाद 4 किमी पैदल कॉलेज। रेलवे स्टेशन से कॉलेज जाना बाद में भारी पड़ने लगा तो पापा ने नई हरक्यूलिस रॉक शॉक्स दिलवा दी। इस साईकिल के अगले पहियो के लिये  शाक अब्जार्बर था, अब मजे थे।

इंजीनियरिंग के अंतिम दो वर्षों में गांव से गोंदिया आना जाना मुश्किल हो गया था, ट्रेन के इंतजार मे घंटो बर्बाद हो जाते थे। गोंदिया में ही छोटे भाई के साथ एक कमरा किराए से लेकर रहने लगे। कमरा कालेज के पास था तो साइकिल की आवश्यकता कम होने लगी थी। रॉक शॉक्स छोटे भाई ने हथिया ली। इस समय पापा को साइकल चलाने में परेशानी होने लगी थी। अब पापा का एक छात्र साबू से पापा को स्कूल ले जाता था और शाम को घर ले आता था।

1998 में पापा के जाने के बाद साबू को उसी छात्र के पास ही रहने दी।

इंजीनियरिंग पूरी हो गई थी। हम नौकरी करने लगे थे। कुछ समय मुंबई, उसके बाद दिल्ली , चेन्नई में रहे। इन तीनों स्थानो पर साइकिल खरीदने का आईडीया नही आया। लेकिन चेन्नई में रहते हुए बसों मे धक्के खाने के बाद  अंतत: 2006 में अपनी पहली बाइक बजाज अवेंजर ले ली।

2007 में पुणे पहुंचे। अब ऑफिस घर से पाँच किमी दूर था।  तमिलनाडु रजिस्ट्रेशन वाली अवेंजर बाइक से जाने पर कभी कभार ट्रैफिक पुलिस वाले परेशान करते थे। और साथ मे वजन बढ़ रहा था। तब हीरो रेंजर ले ली। साईकिल से आफ़िस जाते थे। शुरुवात मे कंपनी मे गार्ड ने परेशान किया, प्रबंधन से शिकायत करने के बाद कंपनी कैंपस मे साईकिल रखने की अनुमति मिल गई।  पुणे में ज्यादा दिन नही रहे। शादी हुई और हम चल दिये हनीमून मनाने अमरीका। जाते समय रेंजर साइकिल वाचमैन को दे दी।

इसके बाद एक लंबे समय हम बेसाइकल रहे। सारी दुनिया देखी। 2013 में बैंगलोर भारत मे स्थाई रूप से बचने की योजना बनी। बजाज अवेंजर अब भी साथ थी। लेकिन अब साथ मे मम्मी, निवेदिता भी थे, गार्गी आने वाली थी। साइकिल या बाईक अब आवश्यकता पूरी नही कर पा रहे थे, कार की आवश्यकता महसूस होने पर पहली कार हुंडई i20 ले ली। लेकिन ऑफिस घर से डेढ़ किमी दूर था। कार या बाइक से जाने का मन नही होता था, तो फिर से साइकल लेने का मन हुआ। इसबार डेकाथलान से BTWIN साइकल लेली जिसमे एक ही गियर है।

तीन वर्ष बाद शहर के बाहर वाले घर मे आ गए। एक ऑफिस 12 किमी दूसरा 24 किमी दूर है, तो ऑफिस कार से जाना शुरू हुआ। इस दौरान कार भी बदल ली। i20 की जगह फोर्ड फिगो आटोमेटिक ले ली। बाइक अब भी वही 2006 वाली अवेंजर है। साइकिल अब सप्ताहांत को आवारागर्दी के काम आती है, 20 से 30 किमी चला लेते है। कभी कभार मूड होने पर इलेक्ट्रॉनिक सिटी ऑफिस चले जाते है। सोशल मिडीया मे कुछ साइक्लिंग ग्रुप के सदस्य है। इन ग्रुप के सदस्य होने के बाद पता चला कि हम पांच हजार वाली साइकिल मे खुश है लेकिन बहुत से लोगो के पास दो लाख तीन लाख वाली साइकिले भी है जिनके पहिये ही दस बीस हजार के आते है। अपना मन भी होता है कि एक अच्छी खासी गियर वाली साइकिल हो, लेकिन बाद मे सोचते है कि सप्ताह मे एक दिन चलाते हो, बाईक महिनो महिनो बाहर नही निकलती तो नया हाथी पालने का कोई अर्थ नही है।

लेकिन मन ने बहुत जोर मारा तो तो इस साइकिल को अपग्रेड कर फोल्डिंग साइकिल लेंगे जो कार की डिक्की में समा सके।

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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