भारतीय वैज्ञानिक चेतना

शनिवार, फ़रवरी 27, 2021

 आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है।



विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में हर साल 28 फ़रवरी को भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। 28 फ़रवरी सन् 1928 को सर सीवी रमन ने अपनी खोज की घोषणा की थी। इसी खोज के लिये उन्हे 1930 में नोबल पुरस्कार दिया गया था।


कुछ बरस पहले अनमोल ने एक लिंक दी थी "The Great Debate - The Storytelling of Science", दो भागो मे है। आम लोगो मे विज्ञान को लोकप्रिय करने मे वर्तमान के सभी बड़े नाम है वे सभी इस चर्चा मे है। कुछ मुख्य नाम है बिल ने, निल डीग्रेस टायसन, रिचर्ड डाकिंस, ब्रायन ग्रीन, इरा फ़्लैटो, नील स्टीफ़नसन, ट्रेसी डे तथा लारेंस क्रास।(युट्युब पर दो भागो मे चर्चा है, एक बार अवश्य देखीये।)








इस तरह की चर्चाओं को देखकर हमेशा दु:ख होता है कि इस तरह की उच्च स्तरीय बहस भारत मे क्यों नही होती है! 


भारत मे भी विज्ञान कांफ़्रेंस होती है जिसमे वेंकटरामन रामकृष्णन एक बार भाग लेने के बाद दोबारा भाग लेने से मना कर देते है। वेंकटरामन रामकृष्णन गलत भी नही है, उनके पास वाजिब कारण है इस तरह की कांफ़्रेंस को समय की बर्बादी मानने के लिये। इन कांफ़्रेंसो मे शल्य, जीवक या सुश्रत जैसे प्राचीन भारतीय चिकित्सको की चर्चा ना होकर गणेश पर हाथी मस्तक लगाने की चर्चा होती है। आर्यभट, भास्कर, वराहमिहीर, नागार्जुन, बोधायन जैसो की चर्चा ना होकर फ़र्जी वैमानिक शास्त्र की चर्चा होती है। आधुनिक भारतीय वैज्ञानिको के नाम से अधिकतर लोग अंजान ही है।


हमारे संविधान के अनुसार "भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण , मानववाद और ज्ञानर्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।" 


लेकिन  इस कर्तव्य की पूर्ति  कौन करता है ? क्या हमारे विश्वविद्यालयों मे इस तरह का वातावरण है कि नये विचार आये, खूली चर्चा हो जिससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार हो ?


हम रोते रहते हैं कि भारत मे नई खोजे नही होती है, प्रतिभा पलायन होता है ? क्या कारण है ?


हमारे विश्वविद्यालयो को पूर्ण स्वायत्ता क्यों नही दी जाती है? क्यों उनके कार्यप्रणाली मे राजनैतिक हस्तक्षेप होते है ? क्यों उनके पाठ्यक्रमो को राजनैतिक विचारधारा से बांधने का प्रयास होता है ? क्यों शैक्षणिक संस्थानो को किसी विशिष्ट विचारधारा के दायरे मे बांधा जाता है ? उस विचारधारा का विरोध करने पर उनपर हमले क्यों होते है ? विशिष्ट विचारो के समर्थन मे गुंडागर्दी क्यों की जाती है ? अनुदानो पर रोक लगने की या विश्वविद्यालय बंद करने की बात क्यों होती है ?


वर्तमान मे अधिकतर खोज, पेटेंट अमरीका या युरोप के विश्वविद्यालय से आते है। गूगल, फ़ेसबुक जैसी कंपनीयाँ की नींव इन्ही विश्वविद्यालयो मे रखी जाती है। क्योंकि ये विश्वविद्यालय खूलापन देते है, विचारों का, रहनसहन का, खाने पीने का, कपड़े पहनने का। यहाँ कोई आदेश नही देता कि छात्रो का ड्रेसकोड क्या हो ? यहाँ छात्रो को कोई नही बताता कि वे क्या खांये क्या नही ? यहाँ के पुस्तकालय को रात मे चालु रखने विद्यार्थीयों को खूले मैदान मे महिनो तक प्रदर्शन नही करना होता है। यहाँ किसी रेस्टारेंट को रात मे बंद रखने का आदेश नही दिया जाता! किसी एक विशिष्ट विचारधारा को थोपा नही जाता है।


इन कालेजो मे खूलापन है लेकिन ऐसा भी नही है कि उन्हे कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत है! कानून के दायरे मे पूरी आजादी है। 


जब तक आप अपने शैक्षणिक संस्थानो को ऐसी आजादी नही देंगे, भूल जाईये कि भारत कभी भी विकसीत राष्ट्रो के बराबर आ पायेगा। जो भारतीय प्रतिभा भारत मे कुछ नही कर पायेगी, वह अपना योगदान इन राष्ट्रो के विकास मे देगी।


अब वह समय नही है कि कोई भाभा, राजा रमन्ना, विक्रम साराभाई या सतिश धवन भारत वापसी करेगा। राष्ट्र की सीमायें नई पीढी के वैज्ञानिको को नही बांध पाती है, वे उत्थान के लिये आजाद वातावरण चाहते है, वे वहीं काम करेंगे जो उन्हे ऐसा वातावरण देगा।


भारतीय संविधान के भाग - 4 क के अनुच्छेद - 51 क ( ज ) के अनुसार


" भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण , मानववाद और ज्ञानर्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें "

( It shall be the duty of every citizen of India to develop the scientific temper , humanism and the spirit of inquiry and reform )।


लेकिन क्या हम इस कर्तव्य की पूर्ति कर रहे है ?


नोट : इस चर्चा मे अधिकतर लोगो के शोध कार्य सरकारी सहायता पर ही होते है लेकिन उन्होने सरकारो की बखिया उधेड़ने मे कोई कसर नई छोड़ी है। ये लोग अमरीकी रिपब्लीकन पार्टी के विरोधी रहे है। रिचर्ड डाकिंस के प्रहारों से कोई भी धर्म नही बच पाया है।



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चाय पुराण

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2021


हाल ही मे एक शादी मे गया था, तीन दिन की घुमक्कड़ी मे कुल मिलाकर छह कप चाय पी गई। खुद पर आश्चर्य हुआ कि एक समय ऐसा था कि ठंड के दिनो मे शादी/ब्याह या घुमक्कड़ी के समय एक दिन मे ही दर्जनो कप चाय पी जाते थे।


बचपन मे 10 वी तक एक दिन मे दो कप चाय मिलती थी, एक सुबह और एक दोपहर मे, वह भी यदि चाय के समय पर घर पर हो तो। यदि किसी दोस्त के घर गये तो कभी कभी तीसरा कप भी हो जाता था।  बाद मे जब 11 वी/12 वी मे साईकिल से 8-10 किमी आमगांव जाना होता था, तो दोपहर मे मित्रों के साथ एक दो कप और हो जाती थी। इन दिनो पूरा हिसाब रखते थे कि कल मैने पैसे दिये थे, आज तू दे...


यही दिन मे तीन चार कप का किस्सा कालेज के दिनो मे भी चला। कालेज के दिनो के बाद जब नौकरी करने लगे, रेल/बस यात्राये बढ़ गई तो चाय की मात्रा मे आश्चर्यजनक रूप से बढोत्तरी हो गई। एक दिन मे चाय की मात्रा आठ दस कप तक पहुंच गई। कभी कभी तो 15-16 कप भी। इन्ही दिनो पैसो की समस्या भी नही रही, खुद ही कमाने लगे थे तो शीतल पेय की संख्या जो किसी समय महीने दो महीने मे एक होती थी, अब रोजाना एक-दो पर आ गई थी। कभी कभी एक दिन मे तीन चार भी।


विदेश यात्राओं का दौर शुरु हुआ। विदेश यात्राओं मे चाय की जगह काफ़ी ले लेती। कप की जगह लोटा भर काफ़ी.. दिन मे तीन चार बार...


शादी हुई। चाय की मात्रा कम होने की बजाय बढ़ गई। अब रात के खाने के बाद भी चाय की आदत हो गई।


इन्ही दिनो शादी के बाद छुट पुट  विदेश यात्राओं से तंग आकर लंबी विदेश यात्रा पर निकल गये। अब घर मे चाय और बाहर लोटा भर काफ़ी। दिन मे तीन चार कप चाय, दो तीन लोटा काफ़ी और एक देड़ लिटर शीतल पेय...


अमरीका , यूरोप से तंग आकर जब आस्ट्रेलिया गये, तो ग्रीन टी और गर्म चाकलेट भी जुड गया, मात्रा नही बढ़ी। बस दिन के किसी एक चाय के कप की जगह ग्रीन टी आ जाती, किसी काफ़ी के लोटे का स्थान गर्म चाकलेट ले लेती। लेकिन आस्ट्रेलीया मे शीतल पेय पीना अचानक कम हो गया, बिना किसी कारण के


भारत वापिस आये, सोचा। वजन 90 किलो के आसपास था। वजन कम करने के लिये व्यायाम के साथ, खाने पीने की आदतों मे बदलाव लाया गया। सोचा कि चलो अगले तीन महीने शर्करा पूरी तरह से बंद कर दी जाये। चाय के कप की मात्रा दिन मे दो कप कर दी गई। कभी कभी चाय की जगह काफ़ी का कप ले लेता। शीतल पेय पूरी तरह से बंद।


अब चार पांच वर्ष हो गये है। दिन मे दो तीन कप से अधिक चाय या काफ़ी नही होती। इच्छा ही नही होती। शीतल पेय का तो ये हाल है कि साल मे एक दो से अधिक नही पी है।


बहुत से लोगो से सुना है कि उन्हे चाय ना मिले तो सरदर्द होता है या पेट साफ़ नही होता है, वगैरह। मैने दिन के दर्जनो कप से दो कप तक ले आया। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि पूरे दिन चाय नही पी, इस तरह की कोई समस्या नही आई।


हाँ, इन दिनो  सप्ताह मे पांच छः बार नारियल पानी पी जाते है, बस इस चक्कर मे कभी कभार निक्कर की बली चढ जाती है। नारियल खुद ही जो तोड़ लाते है ...

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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