माजरा क्या है ?

मंगलवार, जून 28, 2005

भई, हम तो समझ ही नही पा रहे हैं माजरा क्या है ? ये क्या हो रहा है हमारे इडिया दैट इज भारत मे ? युँ ही चलता रहा तो हम तो बाल नोंच नोंच के गन्जत्व को प्राप्त हो जायेगें! कोइ हमे समझाए माजरा क्या है ?
Akshargram Anugunj

अभी कल ही कपिलदेव जी बतीया रहे थे, क्या कहा कौन कपिलदेव ? अरे वही कपिल पाजी जो दूरदर्शन पर बिना ग्लीसरीन के रो रहे थे. याद आया कुछ ? हाँ तो कपिलदेव जी बतीया रहे थ कि सचिन को क्रिकेट से सम्मानजनक विदाई ले लेना चाहिये. अब ये मत पुछना ये सम्मानजनक विदाई क्या होती है? ये तो पाजी ही बतायेंगे. आपकी जानकारी के लीये बता दें पाजी ने क्रिकेट से सम्माजनक विदाई ली थी. क्या कहा पाजी ने अपने बयान का खंडन कर दिया, पाजी राजनीती मे कब से आ गये. माजरा क्या है?

बान्गलादेश इस्लामीक आन्तकवादीयों को समर्थन दे रहा है और भारत मे भेज रहा है. ना जी ना, ये गृह मन्त्रालय की रपट नही है. ये बयान बाल ठाकरे का भी नही है. तो फीर सजंय निरूपम ने कहा होगा. ना जी सजंय निरूपम तो अब कांग्रेस मे है, उनके लिये तो अब सारे बांग्लादेशी तो भारतीय हैं जी. और मैडम बुरा मान गयी तों ? अजी अब बता भी दो? क्या ? बुद्धादेव भट्टाचार्य ? पानी पानी.... कोई पानी पीलाओ... ये माजरा क्या है ?

रामु(रामगोपाल वर्मा) की "सरकार" को प्रदर्शन की अनुमती मिल गयी. ना जी सेंसर् बोर्ड की कौन सुनता है. ऐसे भी सेंसर बोर्ड को दिखाओ या न दिखाओ क्या फरक पडता है, 'फिलीम' तो जैसे के वैसे बीना कैंची चले प्रदर्शन के लीए आ जाती है. अपनी फिल्मे भी भारत महान की गरीबी का कितना सच्चा चित्रण करती है, अपनी हिरोइनो के पास पहनने के लिए कपडे ही नही होते. बेचारा सलमान सबसे ज्यादा गरीब है,बेचारा एक शर्ट भी नही पहन पाता. अजी एश के प्यार ने उसको निकम्मा कर दिया, वर्ना वो भी किसी काम का था. क्या कहा अब विवेक ने भी शर्ट पहनना बंद कर दिया? ......अरे बातो बातो मे हम तो भुल गये की बात "सरकार" हो रही थी. सुपर सरकार "बाल ठाकरे" ने "सरकार" के प्रदर्शन की अनुमती दी है? माजरा क्या है ? अजी कुछ नही है, जब लालु "पद्म्श्री लालु प्रसाद यादव" की अनुमती दे सकते है, तो ठाकरे क्यो नही ?

मुशरर्फ साहब फरमा रहे थे, कश्मीर समस्या का समाधान एक सप्ताह मे सम्भव है. माजरा क्या है ? अजी कुछ नही. मर्ज भी वही है दवा भी. या शायद बाप(दरोगा जी) ने कान उमेठ दियें होंगे.

अभी इरान मे चुनाव हुवे, कोंडलीजा राइस ने कहा "चुनाव मे पारदर्शिता का अभाव था", माजरा क्या है ? अजी पारदर्शिता तो तब आती है जब अमरीकी सेना की निगरानी मे चुनाव हों. जैसा अफगानिस्तान मे हुवा था, इराक मे हुवा था.

और चलते चलते .....
आड्वाणी जी की पाकिस्तान मे जिन्ना की मजार पर वाणी "जीन्ना धर्मनिरपेक्ष थे". इसमे गलत क्या है? हाँ जी आडवाणी जी भी तो धर्मनिरपेक्ष है. संघ भी धर्मनिरपेक्ष है.

लेकिन चुनाव तो अभी काफी दूर हैं ! माजरा क्या है ?

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कहां से शुरु करुं ?(

शनिवार, जून 25, 2005

कहां से शुरु करुं ?
तो भैया हमने अपने चीठ्ठे का श्रीगणेश कर दिया. लेकीन विधीवत शुरुवात अभी शेष है .जिन्दगी के २८ वसन्त गुजार दीये हैं. यादो के झरोखे से देखो तो पता चलता है कि यदी लिख्नना शुरु कर दिया तो शायद एक पुरा ग्रन्थ बन जाएगा,शायद महाभारत से भी बडा.लीखना तो सब कुछ् है. लेकीन कहां से शुरु करुं ?
जब कुछ होश सभांला था, तब खुद को प्राथमिक पाठ्शाला मे पाया था. बचपन की उन खट्टी मिठि यादो की काफी स्मृतीयां शेष हैं. मेरा बचपन महाराष्ट्र के गोंदिया जनपद के एक छोटे से गाँव झालिया मे बीता था. यह १९८० के आस पास की बात है, जब मैं ४-५ वर्ष का था. क्रिकेट् का भुत उस व्क्त देहातो मे नही पहुन्चा था, पुरा बचपन हमने गुल्ली-ड्न्डा, कन्चे, लुका छीपी खेलते, लडते झगडते बीताया था. वो सुबह उठ्कर यार दोस्तो के साथ खेलने भाग जाना. १-२ घन्टे खेलने के बाद घर आना,नहा कर पाठशाला जाना. ए बात और है की मम्मी को हमे नहलाने के लिए कम से कम १ घन्टे मेहनत करनी होती थी, जिसमे १/२ घन्टा हमे नहाने के लिए मनाने,पकडने मे जाता था. यदि पापा आसपास हो तो हमारा नहाने का कार्यक्रम १० मिनिट मे निपट जाता था. लेकिन ऐसा काफी कम होता था,क्योकि पापा सुबह से ही अपने छात्रो को पढाने मे व्यस्त हो जाते थे. पापा पास के ही एक गावँ कावराबाँध मे उच्च माध्य्मीक शाला मे विज्ञान, गणित के शिक्षक थे. पापा का स्कुल आसपास के २०-२५ गावोँ के लिए ईकलौता हाई स्कुल था. और पापा ईकलौते विज्ञान, गणित के शिक्षक. पापा का अपने छात्रो को पढाना घर मे सुबह ७ बजे से १०.३० तक चलत्ता था(ट्युशन नही). उसके बाद स्कुल मे ११.०० से शाम के ५ बजे तक्. पापा के ईस एक सुत्री कार्यक्रम से कभी कभी मम्मी-पापा की झडप जाती थी, लेकिन जब मम्मी को सब्जिँया , फल, दुध और दही पापा के छात्र मुफ्त दे जाते मम्मी का गुस्सा शाँत हो जाता. मुझे याद नही आता कि हम लोगो ने कभी गाँव मे होने वाली कोई भी चीज खरीदी हो. सभी कुछ् गाँव वाले या पापा के छात्र बीना बोले दे जाते थे. गाँव और आस पास के गाँवो मे हम लोगो( मै और मेरे भाई बहन) को काफी प्यार और सम्मान मिलता था, और आज भी मिलता है,शायद ये मेरे पापा की सबसे बडी कमाई और हम लोगो को दिया गया सबसे बडा उफहार है.मेरा ये प्यारा सा गाँव् ज्यादा बडा नही था, शायद ३००-४०० लोगो की आबादी, मीट्टी के मकान्. हर घर मे आगन और एक तुलसी का पौधा. गाँव् के मध्य मे एक हनुमानजी का मन्दिर्. शाम को हनुमान जी का मन्दिर चौपाल बन जाता था. जँहा गान्व वाले या तो चर्चा करते या भजन गाते.गाँव के सामने सडक किनारे एक बडा सा बरगद का पेड जिसके नीचे राज्य परिवहन की सुबह और शाम चलने वाली बसे रुका करती थी. बरगद के नीचे नन्दु पटेल की चाय की दुकान,जहाँ पीपरमीन्तट और बीस्कुट भी मीलते थे.बरगद के पेड के पिछे एक तालाब. जहाँ हम गर्मियों मे पुरे दिन घरवालो की नजर बचा कर घुसे रह्ते. उसपर तालाब के किनारे कुछ आम के पेड, ग़र्मियो मे खाली पडे खेत . और अब क्या चाहीये? गर्मियो की छुट्टियो मे कच्चे आम खाना, गुल्ली -डन्डा खेलना और तालाब मे नहाना, बस और कुछ नही. पुरी छुट्टिया पलक झपकते बीत जाती.
मेरा स्कुल गाँव के दुसरे कोने मे था, स्कुल के पिछे एक छोटी सी पहाडी थी. दोपहर मे पहाडी के उपर्,एक चट्टान से दुर से जाती हुई रेल दिखाई देती थी. रेलजाते हुवे देखना हम लोगो के लिए एक बहुत बडी बात होती थी. पूरे दोस्तो मै अकेला था जिसने रेल का सफर किया था. और मै अपने उन रेल यात्राओ की कहानीया नमक मिर्च लगा कर सुनाया करता था, मेरे दोस्त मुन्ह खोले हुवे सुनते रहते . स्कुल की दिनचर्या काफी साधारण थी,एक कक्षा एक शिक्षक जो सभी विषय पढाया करते थे. हर कालांश के बाद एक पुस्तक बंद कर दुसरी खोल कर पढाई होती थी. किसी दिन यदि कक्षाध्यापक नही आये तो पुरा दिन मस्ती. शाम के अंतिम २ कालांश खेलकुद के होते थे. हमारे स्कुल का प्रागण काफी बडा था, जहाँ हम लोग कब्ड्डी और खोखो खेला करते थे. जब खेलकुद के कालाश खत्म होत और छुट्टी की घन्टी बजती तब स्कुलका माहौल देखने लायक होता. खेलकुद के कालांश मे सभी छात्र प्रांगण मे होते, घन्टी बजते साथ ही सभी के सभी एक साथ बस्ते लाने कक्षा मे दौड लगाते थे. जो क्क्षा मे होते वो बाहर आने की कोशिश करते जो बाहर होते वो अन्दर जाने की. बस एक कोलाहल और अफरातफरी मच जाती थी, जो मुख्याध्यापक के द्वारा एक दो छात्रो की पिटाई के बाद शान्त होती थी. लेकीन अगले दिन वही ढाक के तिन पात !
आह वो बचपन की वो यादे.....खैर ये किस्सा तो अन्तहीन है, बाकी फिर कभी.कीसने सोचा था कि ये सब यादे मै कभी लिखुन्गा वो भी अपने वतन से ईतने दुर,अमरीका मे ! लगता है लौट जाउ फिर अपने गांव , फीर से सुनाउ किस्से दोस्तो कों, इस बार रेल के नही, विमान यात्रा के नही, अपनी मिट्टी के, अपने वतन के.. अपनी बचपन की यादों के...
याद आ रही है जगजीत की वो गजल्
कोई लौटा दे वो मेरे बचपन के वो दिन , वो कागज की कश्ती , वो बारीश का पानी ...........

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कहाँ से शुरु करुँ ?

सोमवार, जून 20, 2005

युं तो मै इद्रंजाल पर हिंदी की लगभग सभी पत्रीकाओ का नियमीत पाठक था, समाचार भी बी बी सी या अमर उजाला पर ही पढता था । ब्‍लागर का नाम तो सुन रखा था, लेकिन ये होता क्‍या है इससे पुरी तरह अजांन था । अभिव्‍यक्‍ति पर चलो चिठ्‍ठा लिखें पढा । अब हमारे ज्ञानचक्षु खुले और हम चिठ्‍ठा की महिमा से अवगत हुवे। उसके बाद हमने आरभं किया , इद्रंजाल को खंगालना । पता चला हम इस तीव्र सुचना तकनीक के युग मे रहते हुवे( काम करते हुवे) भी कितने अज्ञान थे , ठीक उसी तरह जीस तरह प्रमोद महाजन लोकसभा चुनाव के पहले थे । खैर देर से आये दुरूस्‍त आये । एक के बाद एक चिठ्‍ठा पढा फुरसतिया को फुरसत से,ईस्‍वामी को श्रद्‍धा से(नोट किया जाए कि श्रद्‍धा नामक किसी कन्‍या से हमारा कोई सबंध नही है !),रोजनामचा तेज गली की रफ्‍तार से,ठेलुवा को ठेलवयी करते हुवे पढा । हम पढते रहे और सीर धुनते रहे कि हमने अपना खाली समय ऐसे ही अपनी टीम को डाटंने फटकारने मे बरबाद कर दिया ।(बदां गलती से प्रोजेक्‍ट मैनेजर है।)
हमने भी सोच लीया कि हम भी चिठ्‍ठा लिखेगे । चिठ्‍ठा लिखने कई फायदे हमे नजर आये ,अव्‍वल तो हमारी टिम शांती के साथ काम करेगी (वैसे तो शांती हमारे कक्ष मे महत्‍वपुण चचा मे व्‍यस्‍त रहती थी)। दुसरा कंपनी को भी लगेगा कि हम कुछ काम करते भी हैं (मगर क्‍या ? ये तो आजतक हमे खुद नही मालुम कि हम करते क्‍या है ?)
तो भाई लोगो हमने भी विश्‍वजाल पर अपना चिठ्‍ठा बना तो लिया, अब चिठ्‍ठा के नामकरण का सवाल ? ये यक्ष प्रश्‍न हल किया बालाजी ने,उसने हमे चितांग्रस्‍त पा कर पुछ लिया "ए खाली-पीली क्‍या कर रहा है ?" आपकी जिज्ञासा की शातीं के लिए बता दें बालाजी भी खाली-पीली यानी प्रोजेक्‍ट मैनेजर है । मुझे अपने चिठ्‍ठे का नाम मील गया ।

अब रहा सवाल हिंदी मे टकंण का, अतुल भाई के रोजनामचा से छहारी का पता चला । शुरुवात मे कुछ तकलीफ हुई पर छहरी कुजींपटल का प्रयोग भी सीख लिया ।

अब सबसे बढा सवाल इस चिठ्‍ठे मे लिखा क्‍या जाए ? कहाँ से शुरु करुँ ? इस सवाल का जवाब अगले अकं मे । मिलते हैं एक लघु अतंराल के बाद ।

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

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