“दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……..” कहानी पूरी फिल्मी है भाग २

बुधवार, नवंबर 23, 2005


एक सीधी सादी सी लडकी, पढी लीखी लेकिन मध्यम वर्ग से। जिन्दगी बस घर से कार्यालय और कार्यालय से घर। किसी से ज्यादा घुलना मिलना नही, बस काम से मतलब रखना। ज्यादा उंचे ख्वाब नही, जो घर वाले कहे वह पत्थर की लकीर। कोई डांट दे, या किसी की कोई बात बुरी लगे तो रो देना। एक आम भारतीय लडकी।

एक लडका, वही मध्यम वर्गिय। घर से पहली बार निकला, दुनियादारी क्या होती है नही मालुम। बचपन से लेकर जवानी तक घरवालो की छत्रछाया मे रहा, जिससे थोडा लापरवाह। घर मे लडको के स्कुल,महाविद्यालय मे पढा और बढा। कभी लडकीयो से बात नही की और करना आता भी नही। वैसे तो बाते बनाने मे कोई जवाब नही लेकिन कन्या राशी के सामने बोलती बन्द।

जब ये दोनो मिले तो हिन्दी फिल्मो की तरह कुछ तो होना ही था। लडके को लडकी भा गयी। लेकिन लडकी अपनी दुनिया मे गुम जिसे अपने काम और घरवालो के अलावा किसी से मतलब ही नही। सहकर्मी से सिर्फ हाय-हेलो का रिश्ता।

कहते हैं कि इंसान प्यार मे अन्धा हो जाता है, अब तो यह मै भी मानता हुं। हमार इस कहानी के नायक भी इसी सुरदास की श्रेणी मे आ गये। अकल से काम लेना बन्द कर दिया। जहां लडकी वहा पर हिरो। चाहे वो दोपहर का भोजन हो या शाम की चाय जहां लडकी जाये वहा अपने भाई साहब कीसी ना कीसी बहाने पहुंच जायेंगे। ये बात और है कि भाई ने कोई बेहुदा हरकत तो दूर उस लडकी से कोइ बात तक ही नही की !

शाम को कमरे पर मेरा और मेरे एक और दोस्त (अन्ना) का दिमाग चाटना शुरू। अब क्या करना चाहिये, अब क्या करूं वगैरह वगैरह…।। हम लोग उसे प्यार से सब कुछ समझाते, भईया कम से कम उस लडकी से बात तो करो … भाई साहब बाकायदा शान से छाती फुलाकर कहेंगे, कल बात करता हुं…। और ये कल आज मे कभी तबदील नही हो पाया।

अब दोनो साथ मे काम करते थे तो लडकी धीरे धीरे सहज हो गयी, कभी कभार हाय हेलो कर देती, कभी चाय पीने जाते औपचारीकतावश वक्त पूछ लेती थी। भाई को लगा कि बात आगे बड रही है, और ख्याली पुलाव पकाने लगे थे… अब हम ठहरे थोडे पूराने खिलाडी, सब समझ रहे थे, कि लडकी सिर्फ एक सहकर्मी( दोस्त भी नही) की तरह बर्ताव कर रही है।

धीरे धीरे हमने सोचा कि चलो अब मुझे एक उत्प्रेरक की भुमीका मे आना होगा। पहले सोचा चलो कि दोनो मे बात कराते है, साथ मे घुमने फिरने का मौका देते है और देखते है कि बात कहां तक बढती है। बाद मे सोचते हैं कि अगला कदम क्या होगा। जबवह लडकी अपने एक सहकर्मी सहेली की शादी मे जा रही थी, तो मौका देखकर हम ने लडके को साथ मे चिपका दिया और प्रतियोगीता की जो भी सम्भावना थी उसको खत्म कर दिया। सोचा था दोनो शादी के बहाने पूरे २ दिन साथ मे रहेंगे प्यार तो नही , कम से कम दोस्ती तो जरूर हो जायेगी।

हम चल दिये २ सप्ताह की छुट्टी पर घर, वापिस आने पर हमने लडके को निराशावस्था मे पाया। हमारा माथा ठनका, ये क्या हुवा ! पूछा तो पता चला कि लडकी अब उससे कटने लगी है, चाय पर जाते समय उससे बात भी नही करती(साथ मे बुलाना बन्द) है। हमने थोडी जासुसी की तो पता चला, अपने भाई जब शादी मे गये थे, तब २ दिनो तक दोनो साथ मे अच्छे दोस्तो की तरह रहे थे और अच्छा समय काटा था। लेकिन विघ्नसतोंषी सहकर्मियो ने बात का बतंगड बना दिया है और कानाफुसी चालु कर दी है। और ये सब उस लडकी को पता चल गया है।

ऐसे तो ये सभी लोग मेरे से २ पद स्तर निचे है(कार्यालय के) लेकिन मेरी छवि काफी अच्छी है, और मुझे काफी सम्मान मिलता है। किसी को को व्यक्तिगत परेशानी होने पर भी वह मुझसे विचार विमर्श कर लेता है। कुल मिलाकर इन लोगो के लिये मै “बास कम एक मार्गदर्शक ज्यादा हुं”। मैने सोचा चलो लडकी के मन की बात पता की जाये। ऐसे ही उससे मैने बात करने लगा। उसने मुझसे पूछा
और आप शादी कब कर रहे हो ?” 

ये मेरे लिये कभी अनेपेक्षीत प्रश्न नही रहा है, हर कोई पूछता है। और हमने यही सवाल मानोशीजी से भी पूछा था कि हमारी शादी की कितने प्रतीशत संभावना है लेकिन कोई जवाब नही आया !

“मुझे छोडो मुझसे शादी करने कोई तैयार नही है, मेरी जन्मकुडली मे सन्यास योग है तो हर कोई मुझे अस्वीकार कर देता है।” 
मैने उससे पलट के पूछा
“तुम बोलो तुम्हारा अपना शादी क्या इरादा है ?”
लडकी ने थोडा शर्माते सकुचाते जवाब दिया
“अगले हफ्ते उसके घर लडके वाले देखने आ रहे है”।
मै मन ही मन मे
” गयी भैंस पानी मे, अब अपना हीरो अताउल्लाह खान के गाने गायेगा।”
मै प्रकट मे
 “कौन है वो बदनशीब?” ये मेरा अपना तरीका है सभी जानते है।
लडकी (पूरी बीर बहुटी हो कर )
“मेरे पापा के एक बचपन के दोस्त का लडका, बंग्लोर मे काम कर रहा ह॥”
मै मन मे ही
“आज वापिस जाते समय किशोर के दर्द भरे नग्मो की कैसेट ले लेता हु , अपने हिरो को भेंट दे दुंगा।”

मैने पूछा
” तुम्हे पसन्द है?”
“मेरी पसन्द या नापसन्द का सवाल ही नही है, जो पापा कहेंगे वो मै करूंगी।”
मैने सोचा चलो थोडी उम्मीद है, अगला सवाल दागा
” मानलो यहां कोई दिवानगी की हद तक तुम्हे चाहता हो और तुम से शादी करने को तैयार हो तो तुम क्या करोगी ?”

“इसका कोई चांस ही नही है। मेरी मम्मी की मौत मेरे बचपन मे हो गयी थी। पापा ने मुझे और छोटे बहन और भाई को बडा किया है। मै ऐसा कोई कदम नही उठा सकती जिससे मेरे पापा के दिल को ठेस पहुंचे और मै तो अपने छोटे भाई बहनो के लिये एक आदर्श भी रखना है”

मै कितना भी आधुनिकतावादी बनने की कोशीश कंरू, लेकिन मै भी एक मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखता हुं और मेरे पास लडकी की इस बात का कोई जवाब नही था। और मैने कई बार महसुस भी किया था कि वह अपने पापा को कितना चाहती है। वह दिन मे कमसे कम ५-६ बार अपने पापा को फोन कर भोजन, चाय और दवाईयो के बारे मे निर्देश देते रह्ती थी।

”वैसे मै जानती हु कि आप किसकी बात कर रहे हैं, मैने कभी भी किसी भी लडके को कभी उस नजरो से नही देखा है ना देख पाउंगी, मै अपने पापा को कभी निचा नही दिखा सकती।”
“तुम काफी सुलझे विचारो वाली लडकी हो, वही करो जो तुम्हारे दिल को अच्छा लगे। एक बात ध्यान मे रखना कि ऐसा कोई कदम मत उठाना कि तुम्हे भविष्य मे पछताना या पिछे मुडकर देखना पढे।”
अगले हफ्ते लडकी कार्यालय मे सगाई की मिठाई लेकर आ गयी। एक दिल और टुटा !

मै परेशान ,कि मेरे दोस्तो मे दिल टुटने का रिवाज अभी तक कायम है। मेरे साथ अब तक ऐसा हुवा है कि किसी का कोई प्रेम प्रसंग हो चाहे एक तरफा या दो तरफा, यदि गलती से भी मुझे पता चल गया तो वह एक या दो महीनो से ज्यादा नही टिका है। इसमे से एक मामला तो आत्महत्या का भी है।

अपना हीरो आजकल किशोर के दर्द भरे नग्मे सुन रहा है “दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……।।”

6 टिप्पणीयां » 
1 kali उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 8:16 pm ·
Isi per yeh joke yaad aa gaya:
Pagal khane main
patient # 1 : “Rupa”, “Rupa”।
New Doctor: Sir isse kya hua?
Old Doctor: Poor Chap, Rupa ke pyaar main pagal ho gaya, Rupa ki kahin aur shadi ho gayi thi।
Patient #2: “Rupa”, “Rupa”
New Doctor: Sir yeh bhi usi Rupa ke pyaar main nirash premi hai kya।
Old Doctor: Oh no, young man, yeh jyaada pagal hai, Rupa ki isse hi shadi hui thi।
2 Nitin Bagla उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 10:25 pm ·
बहुत खतरनाक इंसान हैं मतलब आप…।।:)
3 मानोशी उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 11:14 pm ·
अब लगता है तुम्हरी पत्रिका देखनी ही पडेगी| तुम्हारी शादी हो जाये तो शायद लोगों के भी घर बसने लगें|
4 अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 24, 2005 at 5:22 pm ·
अब कहां बच के जाओगे? मानसी तुम्हारी शादी करा के ही मानेंगी।
5 आलोक कुमार उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 11:54 am ·
अधिकतर प्रेम कहानियाँ इसीलिए नहीं आगे बढ़ती हैं क्योंकि लोग मौजूदा हालत को बदलने की हिम्मत नहीं कर पाते - यानी कि अभी बोलचाल है, सलाम नमस्ते है, बाद में शायद ये भी न बचे? पर हाथ मलने से अच्छा है ओखल सर में डाल दो। मान लो कि जनाब की मोतरमा से शादी हो जाती तो भी क्या ज़िन्दगी भर सुखी रहते? या दुखी रहते? पता नहीं। उनका जीवन भी बाकियों जैसा होता। पर अब एक सान्त्वना है कि एक सच्चा प्यार था। सपना हकीकत नहीं बना, इसलिए मधुर रहा। वास्तविकता की कर्कशता इसमें नहीं आई।
6 pratyaksha उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 5:32 pm ·
मानसी और अनूप की टिप्पणी के संदर्भ में…
“अब कहां बच के जाओगे”
आशीष बचना चाहते हैं क्या ?
प्रत्यक्षा

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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