मौज-मस्ती एक लम्बे अरसे के बाद

मंगलवार, जनवरी 10, 2006


पिछले सप्ताह मे कंपनी के व्यावसायिक कार्य से बैंगलोर जाना हुआ। यों तो काम कम्पनी के एक ग्राहक के कार्यालय मे था, उन्हे अपने कार्यालय के कार्य को स्वचालित करना था, जिसके लिये मुझे उनकी आवश्यकताओ को समझना(Requirement Analysis) था। मतलब यह कि मै “आनसाईट” मे था ,मेरी पूरी टीम चेन्नई मे है यानी कि “आफशोर“। अच्छा रहा यह भी, भारत के अंदर ही “आनसाईट” और “आफशोर”।
एक अरसा हो गया था मौज मस्ती किये हुये। मेरा मौज मस्ती से मतलब होता है, बेफिक्री से बाजार शापिंग-माल मे मटरगश्ती करना, शोर मचाते, फब्ती कसते फिल्मे देखना, आटो या बस से शहर मे या शहर से बाहर घुमना। जहां भुख लगे खाना।

ये सब हरकते मै चेन्नई मे नही कर पाता, इज्जत का जो सवाल होता है। हर जगह फिक्र लगी होती है कि कोई पहचान का या मातहत ना मिल जाये। अब बैंगलोर मे मुझे तो कोई जानने से रहा, सब कुछ कर सकते हैं।बस आ गये अपनी औकात पर………

सुबह ८ से शाम ६ बजे तक ग्राहक के ओफिस मे उसका दिमाग चाटो, वापस होटल पहुचों , बैग होटेल मे फेंको और चल दो। जिधर मुंह उठा चल दिये। पहले दिन फोरम माल पहुचें, आंखे तृप्त हो गयी। चेन्नई के रेगिस्तान से बैंगलोर के नखलिस्तान मे पहुंचने के बाद आंखे चौन्धिया गयी थी। किसी अंधेरे कमरे मे महिनो रखे गये किसी व्यक्ति को यदि अचानक उजाले मे ला दिया जाये तब उसकी जो हालत होगी वही हमारी हालत थी। बैंगलोर खूबसूरती से भरा शहर है।

पहले दिन थाई खाना खाया, कुछ हटकर लगा, रसम , सांभर चावल खाने के आदी है, अचानक तीखा थाई खाना खाया, आंख नाक मुंह हर जगह से धुंवा निकल रहा था लेकिन खा रहे थे। और जमके खाया। अब क्या करें। सोचा चलो फिल्म देखते है। कौनसी देंखे ? जिसकी टिकट मिल जाये ! “ब्लफमास्टर” देखी, अच्छी है, हलकी फुल्की, मजेदार। दिमाग घर पर रख आओ और मजे करो टाईप। मेरे बाजु मे एक अभिषेक कि काफी बडी “पंखी” बैठी थी। उसके हर सम्वाद पर चिख रही थी, और हम आदत से मजबूर उसे अंधेरे मे भी घूर रहे थे। अब हम कम थोडे ही है, दिमाग खूब चलता है, लेकिन थोडा सा ते़डा। जैसे ही प्रियंका चोपड़ा का प्रवेश हुवा, हम चिखे

“ भूत………………।”

आसपास सारी पब्लिक जोरो से हंस रही थी, बाजु वाली कन्या , अब हमे घूर रही थी, पता नही क्यों ?


दूसरे दिन “मेक्सीकन” खाया। ऐसे तो अमरीका मे खुब “मेक्सीकन” खाना खाते थे, लेकिन भारतीय मेक्सीकन खाना, एक अलग अंदाज से बना होता है। एक अलग स्वाद।
एक अजनबी” देखी। मानना पडेगा, बुढउ मे काफी दम है, लेकिन हमे तो वो प्यारी बच्ची की अदाकारी पसंद आयी।
तीसरा दिन रहा चाईनीज के नाम। अब आप इस दिन की फिल्म के बारे मे ना ही पुछो तो अच्छा है। किसी और फिल्म की टिकट नही मिली, मजबूरन “जवानी दिवानी” देखी। ३ घन्टे सर पकड के बैठे रहे, वो भी इसी लिये कि किसी को मिलने के लिये हमने ३ घंटे बाद का समय दे रखा था, उसी थियेटर मे। उपर से वो अपना फुनवा बन्द किये बैठे थे। जैसे तैसे फिल्म झेली किसी से दुश्मनी निकालनी हो, इस फिल्म की टिकट खरीद के उसे दे दो, और गेट कीपर से बोल दो कि इसे बाहर निकलने ना दे।

वैसे फिल्म देखने के बाद हमारा मुड फ्रेश हो गया, अरे कैसे नही होता ३ घन्टे उन्ही के चक्कर मे तो फिल्म झेली…

आगे का किस्सा हम नही बतायेंगे…..

चौथा दिन शनीवार…छुट्टी का दिन.. हम पहुंचे बैगलोर के दिल महात्मा गांधी रोड पर .. पूरा दिन आवारागर्दी की..
शाम को लौटकर बुद्धु घर(चेन्नई) को आये...


3 टिप्पणीयां “मौज-मस्ती एक लम्बे अरसे के बाद” पर
मत बताओ। हम सबको तो यही लग रहा है कि मानसी जी की शुभकामनाऐं और अनूप भईया की शुभेच्छाऐं जल्द रँग लाने वाली हैं।
Atul द्वारा दिनांक जनवरी 10th, 2006

अब बता भी दीजिए कि ‘जवानी दीवानी’ जैसे टॉर्चर के बाद किससे मिले कि मूड फ़्रेश हो गया?
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 10th, 2006

हे आसीश् !
तेरी ‘दस पैसा की मिलावट’ कहानी कहा् है भैया ?
Btw, a sher in ur honour: (Pls. fill in the Hindi words for the English ones as I am know Hindi badly)
Aaj fir use mila……
Dil mein wahi dard…..
Paet mein wahi bhari ‘feel’
Kant mein fir ‘keech keech’
(mere aankhon mein wahi mohabbat
Uski aankon mein wahi purani ‘contempt’ muj pei
Bas, amrutanjan abhi amrutanjan strong ban gaya
kya karoon mein: Abort, Retry, Ignore?
;-)
Friends if any of you could not get what is going on, find out from Ashish Mahan his great experiences in Bangalore.
Btw, Ashish, uski beta kaa naam bhi ‘Asis’ hai kya?
bzee द्वारा दिनांक जनवरी 12th, 2006


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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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