ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?

बुधवार, जनवरी 18, 2006


मकरसक्रान्ति के लिये अपने गृहनगर गया हुवा था। हमेशा की तरह रेल से इस बार भी यात्रा की। मेरी आदत है कि मै हमेशा रेल से द्वितीय श्रेणी मे सफर करता हुं, ऐसा नही है कि मै कंजुस हुं और पैसे बचाने वातानुकूलित श्रेणी मे सफर नही करता। कारण यह है कि मै वातानुकूलित श्रेणी मे बोर हो जाता हुं। लोग अपने आप को सभ्रांत या गंभीर किस्म की प्रजाति के दिखाने के लिये किसी से बाते करना पसन्द नही करते,जब देखो तब पत्रिकाओ या पुस्तको मे खोये रहते है। अपनी दुनिया मे मस्त रहते है, मै इस प्रजाति के प्राणियो से दूर भागता हुं।

मुझे अपनी खिडकी खोल कर हवा खाने मे, बाहर का मनोहारी दृश्य देखने मे मजा आता है। खिड़की के बाहर पीछे भागते शहर और गांव, जानवर चराते बालक, पानी के नल पर कतार मे खडी महिलाये, खेतो मे काम करते किसान , जंगलो से गुजरते हुये जानवरो को देखना, बहते झरने और नदीयां, पूल से गुजरते वक्त की खटखट और धड्धड,पर्वत और पहाड, सुरंगो से गुजरना……..

और भी ना जाने कितनी चिजे है जिसका आप वातानुकूलित श्रेणी मे आनद नही ले सकते, परदे जो लगे रहते है। और यदि आपने परदे हटा कर बाहर देखने की कोशीश की तो कुपे के सभी लोग आपको ऐसे घुरते है जैसे आप मंगल ग्रह से आये हैं।

रेलों मे सफर करते समय सहयात्रियो से गपियाने का अलग ही मजा है। कुछ लोगो की सुनो कुछ अपनी सुनाओ,काफी कुछ सीखने मिलता है। यदि आपको साथ मे यात्रा मे छात्रो का दल मिल गया तो क्या कहने। पूरा सफर कैसे कटेगा पता ही नही चलेगा। अंताक्षरी , हंसी मजाक के बीच मे अपनी जवानी (कालेज जीवन)याद आ जाती है!

१५ जनवरी को मुझे अपने गह नगर गोंदिया से अपनी बहन से मिलने भडांरा जाना था जो ६५ कि मी दूर था। ये यात्रा भी रेल से करनी थी। मै समय से कुछ पहले स्टेशन पहुंच गया। मेरे पास २ ट्रेने थी, एक साधारण यात्री और दुसरी एक्सप्रेस। साधारण यात्री रेल १ घन्टा ३० मिनिट लेती है और एक्सप्रेस १ घन्टा। मैने एक्सप्रेस का टिकट लिया था। यहां तो मुझे साधारण श्रेणी(जनरल बोगी) से सफर करना था। प्लेटफार्म पर रेल का ईंतजार कर रहा था।
एक लडका १९-२० साल की उम्र का, मैले से शर्ट और पैन्ट पहने मेरे पास आया। उसने मुझसे पूछा
 “साब नागपूर जाने वाली गाडी कहां आयेगी ?”
मैने उत्तर दिया
“१५ मिनिट मे, यही पर आयेगी “
“साब एक्स्प्रेस ना ?”
“हां एक्सप्रेस ही की बात कर रहा हुं।”
“साब जनरल डब्बा कहां आयेगा ?”
 “यही पर सामने ही आयेगा, मै भी उसी गाड़ी से जा रहा हुं, मेरे साथ आ जाना!”
लड्का “ठीक है साब” कहते हुये मेरे बाजु मे बैठ गया।

इतने मे एक यही कोई ४०-४५ साल की उमर का यात्री ,जो कपडो से खेतीहर मजदूर या किसी कारखाने मे मजदूर लग रहा था आया। उसने भी वही सवाल दोहराया।
“साब नागपूर जाने वाली गाडी कहां आयेगी ?” 
मेरे कुछ कहने से पहले ही वो लडका
” तेरेको कहां जाना है ?”
वो इंसान
” नागपुर “
लड़का
“कौनसी गाडी का टिकट है तेरे पास ? यहां पर एक्सप्रेस आयेगी !”
वो इंसान
“मुझे भी एक्सप्रेस से जाना है।”
इससे पहले कि वो लडका मुंह खोले मै :
“भाई, अभी वो गाड़ी आ रही है। जब आयेगी तो मेरे साथ चढ जाना। मैने भी उसी गाड़ी से जाना है।”

मै सोचता रह गया कि ये लड्का अभी तक मुझसे तमीज से बात कर रहा था, उस देहाती को देखकर तु-तडाक पर उतर आया। जबकि दोनो के जीवन स्तर मे मुझे ज्यादा अंतर नही नजर आया।

इतने मे घोषणा हुई कि मेरी रेल २० मिनट विलम्ब से आयेगी। मैने समाचारपत्र खरीद लिया और पढ़ना शुरू किया। इतने मे देखा कि सामने से एक मेरा हम उम्र मुझे घुरते आ रहा है, मुझे भी वो कुछ जाना पहचाना लगा। वो मुझे घुरते हुये आगे चला गया। मै सोचता रह गया कि हो ना हो इसे मै जानता हुं। लेकिन वो भाई पलट कर आया और पूछा
“भाई क्षमा करना तुम आशीष तो नही हो ?”
मेरा ट्युब लाईट जला ” अबे कटरे तु ?”
दोनो गले मिले… वो मेरा पूराना सहपाठी था। हमने कक्षा ११ और १२ साथ मे पढी थी। वो अब एक कनिष्ठ महाविद्यालय मे व्याख्याता है। वही पूरानी बाते हुयी, कौनसा सहपाठी कहा है, कौन क्या कर रहा है वगैरहा वगैरहा…

इतने मे ट्रेन आ गयी, हम दोनो साधारण श्रेणी के डिब्बे मे चढे। अंदर पहुचने पर पता चला कि हमारे कटरे महाशय के कुछ छात्र भी वहां है, जिन्होने अपनी जगह हमे बिठा दिया। आजभी शिक्षक का पेशा ऐसा है कि सम्मान मिलता है। लेकिन इस चक्कर मे मेरा नुकसान हो गया। मेरा काफी मन कर रहा था चटपटे निबु मिर्च वाले उबले चने खाने का। हमने कटरे गुरूदेव की इज्जत का ख्याल कर अपनी इच्छा का गला घोंट दिया।
हम दोनो अपने भुतकाल मे खो गये। कटरे महोदय के छात्र मुझसे उसके भुतकाल के गढे मुर्दे उखडवाना चाहते थे, लेकिन हमने उनके कपडे नही उतरने दिये।

भविष्य मे मिलने का वादा कर हम दोनो जुदा हुये।

शाम को जब मै वापिस गोण्दिया चला तब मुझे यात्रा साधारण यात्री गाडी से करनी थी। कम पैसे मे ज्यादा सफर। हर छोटे बडे स्टेशनो पर रूकती ट्रेन। ट्रेन समय पर थी, रास्ता काटने मैने एक पत्रिका ले ली थी, जिसकी मुझे कोई जरूरत नही पडी।

जिस डिब्बे मे मै चडा उस डिब्बे मे कुछ रोजाना आवागमन करने वाले यात्री थे। उन लोगो मे एक गरमा गरम बहस चल रही थी। पहले पहल तो मुझे लगा कि राजनितिक बहस होगी इसिलिये अलग रहा। लेकिन पता चला कि वो सिर्फ समय काटने बहस कर रहे है। ये उनका रोजका काम था और बहस का विषय था
ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?
और हम भी बहस मे शामिल हो गये। हम कहते है कि “बोतल के बिना ढक्कन बेकार”
है कोई तैयार बहस के लिये ?


4 टिप्पणीयां “ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?” पर
आशीष,
बढिया लिखा है, पढ कर मुझे याद आया की कभी मै भी तुम्हारे समान उन चीजो को इन्जोय कर लेता था जिन्हे तुम कर लेते हो। अब तो मै भी ए। सी। मे कोई किताब पढने वालों मे से हो गया हूँ - पिछले कुछ सालोँ से यहाँ छोटे शहरो मे रह रहा हूँ इसलिए भीड भाड से बचता हूँ।
ई-स्वामी द्वारा दिनांक जनवरी 18th, 2006

आशीष भाई, यह तो उसी तरह का सवाल है कि पहले मुर्गी आयी या अण्‍डा। ऐसे ही आपके बोतल-ढक्‍कन के इस सवाल का भी जवाब देना ज़रा टेढ़ी खीर है। वैसे, मेरा मानना है कि बोतल और ढक्‍कन, दोनों ही एक-दूसरे के बिना बेकार हैं।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 18th, 2006

लोग कहते हैँ कि ढक्कनोँ की सँख्या बोतलोँ से ज्यादा होती है।
ढक्कन से वार्तालाप स्थापित किया जा सकता है-अबे ओय ढक्कन
कहकर।ढक्कन अगर बडा हो जाये तो बोतल बन सकता है।
बोतल अगर छोटी हो जाये तो ढक्कन।दोनोँ एक दूसरे के पूरक।
चँगू-मँगू टाइप।क्या बोलते हो?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जनवरी 19th, 2006

सही कहा, भीड़ में अपना एक अलग ही मज़ा है, चाहे वह बस हो या ट्रेन। लेकिन यह भी सही है कि आज की दुनिया ढ़ोंग पर ही चलती है, आडम्बर जीवन का मूल है और जिसने इन्हें अपना लिया, वही आज सुखी है!!
मै सोचता रह गया कि ये लड्का अभी तक मुझसे तमीज से बात कर रहा था, उस देहाती को देखकर तु-तडाक पर उतर आया। जबकि दोनो के जिवन स्तर मे मुझे ज्यादा अंतर नही नजर आया।
भईये, लोग दूसरे की औकात उसके पहनावे से जाँचते हैं और उसी के अनुसार उससे बर्ताव करते हैं। मेरी आदत है कि मैं साधारण पहनावे में रहता हूँ, बन ठन के रहना पसंद नहीं। एक बार मैं हमारे यहाँ के बाज़ार में एक उच्चस्तरीय जूतों की दुकान में गया और जब जूते पसंद करके उसके पैसे देने काउँटर पर पहुँचा, तो बाजू में खड़ी एक हाई-फ़ाई महिला ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कोई कीड़ा हूँ। परन्तु जब मैंने अपना क्रेडिट कार्ड निकाला, तो तब उसके चेहरे के सड़े हुए भाव काफ़ुर हो गए!!
ठीक ऐसा ही कुछ दिन पहले हमारे यहाँ की एक बढ़िया मिठाई कि दुकान में हुआ। मैं दोस्तों के साथ खेलकर घर जा रहा था, कपड़ों पर थोड़ी धूल थी और जूते धूल में अटे पड़े थे। मन में आया कि मिठाई ले ली जाए। जब पैक करा के पैसे देने पहुँचा, तो काउँटर पर बैठे व्यक्ति के भाव ठीक न लगे क्योंकि उसने मुझे एक बार उपर से नीचे तक देखा, मानो सोच रहा हो कि आजकल तो ऐरे-गैरे भी महंगी मिठाई खरीदने लगे हैं!! जब उसे हज़ार रूपये का नोट दिया और अंग्रेज़ी में कहा कि मेरे पास छुट्टे नहीं हैं, तब उसके चेहरे पर मुस्कान आई कि उसका अनुमान मेरे बारे में गलत था!!
Amit द्वारा दिनांक जनवरी 20th, 2006

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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