आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन

गुरुवार, अप्रैल 20, 2006


पिछले सप्ताहांत को मैं अपने गृह नगर गोंदिया गया था, हमेशा की तरह द्वितीय श्रेणी शयनयान से। मेरे कुपे मे मेरे अलावा एक तमिळ परिवार था, मम्मी-पापा और एक १६-१७ साल की कन्या।

शाम के १० बजे रेल-यात्रा शुरू हुयी, मैं कमलेश्वर जी का उपन्यास “कितने पाकिस्तान” पढ रहा था। पढ़ते पढ़ते सो गया। सुबह जब मैं सो कर उठा, तब देखा कि वह लड़की कुछ पढ रही थी। मैने मुंह हाथ धोने के लिये चला गया। जब वापिस आया तो पाया कि उस लड़की और उसके माता पिता मे किसी बात पर बहस हो रही है। बहस तमिळ मे थी , मेरी समझ मे नही आ रहा था, लेकिन वे लोग गाँधीजी का नाम ले रहे थे। कुल मिलाकर मामला मेरी समझ से बाहर था।

कुछ समय बाद उसके पापा ने मुझसे पूछा कि ये रेल सेवाग्राम मे रूकेगी क्या ? मैने कहा तमिलनाडु एक्सप्रेस सेवाग्राम मे नही रूकती लेकिन कभी कभार असामान्य कारणों से रूक भी जाती है। तब उन्होने मुझे बताया कि उस लड़की का सेवाग्राम के महात्मा गांधी मेडिकल कॉलेज मे प्री मेडिकल टेस्ट है इसलिये वे यहां आयें है। अब एक बार बाते शुरू हुयी तो चलती गयीं।

इतने मे कन्या ने हाथ मे रखी पुस्तक पटक दी और अपनी मम्मी से कुछ कुनमुनाने लगी। उसकी मम्मी उसे कुछ समझा रही थी। मै थोड़ा असमंजस मे आ गया। उसके पापा ये भाँप गये,उन्होने मुझे बताया कि सेवाग्राम के प्री मेडिकल टेस्ट मे एक प्रश्न पत्र गाँधी दर्शन पर होता है जिसमे ४०% अंक प्राप्त करना अनिवार्य होता है। वह लड़की गांधी दर्शन जैसे नीरस विषय पढ़कर बोर हो रही थी !

मेरी समझ मे नही आया कि आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन का क्या संबंध है ? गांधी दर्शन पर परीक्षा पास करना और उसे जिवन मे अंगीकार करना अलग बाते है। इससे अच्छा तो यह होता कि प्रवेश के बाद आप एक विषय रख दो गांधी दर्शन पर ,लेकिन प्रवेश पात्रता के लिये गांधी दर्शन जानना आवश्यक हो मेरे पल्ले नही पढ रहा था।
लेकिन अब परीक्षा थी तो पढ़ना तो पड़ेगा ही !

मेरे पास एक आइडिया आया, मैने उस लड़की से कहा “तुम्हें इसे पढ़ना नीरस लग रहा है,कोई बात नही मैं पढ़ता हूं और तुम्हें सुनाता हूं।”

वो इसके लिये तैयार हो गयी। अब पढना एक चर्चा मे तब्दील हो गयी। मै पुस्तक पढ रहा था, और अपनी टिप्पणियाँ भी देते जा रहा था। उसके मम्मी पापा भी इसमे शामिल हो गये थे। पढायी की पढायी हो रही थी और मेरे लिये समय काटने का एक बेहतरीन ज़रिया भी हो गया था। इस मे ५ घंटे कैसे बीते पता नही चला और नागपुर आ गया।

मैं उसे परीक्षा मे सफलता की शुभकामना देते हुये चल दिया अगली ट्रेन के लिये !
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2 टिप्पणीयां “आयुर्विज्ञान और गांधी दर्शन” पर
वाह, अच्छा अनुभव बताया आपने। तो क्या यह आज़माया हुआ नुस्खा है कि नीरस विषय पर चर्चा आरम्भ कर दो तो वह रूचिकर बन जाता है? कई विषयों के बारे में यह सही हो सकता है पर कदाचित् गणित पर यह टोटका काम न करे।
Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 21st, 2006

:
अपनी तो सारी रेलयात्रायें एकदम नीरस ही कटी..!!
एक काश हमारे कुपे में भी कोई कन्या - सुकन्या आती,
भाषा की दीवार होती तो हम गिरा देते…….!!!!
:
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक अप्रैल 21st, 2006

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सफल होंगे तेरे प्रयास

मंगलवार, अप्रैल 18, 2006


दरिया किनारे बैठा
कभी उंचे पहाडो पे
विचरता यह मन सोचता है
क्या है तेरी तलाश
क्या है तेरी तलाश
क्या है जो तु खोजता है
भावनाओं से भरा हर क्षण
कभी आशाओ का प्रतिक
कभी निराशाओ से भरा मन
फिरता है ये चंचल
उस समय के ईंतजार मे
जब मिलेगी तुझे तेरी मंजील
होगा तेरे जिवन मे भी प्रकाश
सामना कर इन कठीनाईयो का
रख अपने पर विश्वास
ये ही नियम है संसार का
कि पतझड के बाद ही आता है
मौसम बहार का
और यही है उसकी रीत
कि हार के बाद आती है जीत
ए मन ! रख सिर्फ ये अहसास
कि तुझमे है आत्म विश्वास
इसलिये सफल होंगे तेरे प्रयास
 इस सप्ताहांत पर मै अपने घर “गोण्दिया” महाराष्ट्र मे था। अपनी पूरानी डायरीयां और कागजात देख रहा था। अचानक एक कागज़ बाहर आ गीरा जिसपर यह कविता लिखी थी।
कविता तो मेरी एक मित्र ने लिखी थी, यह तो मुझे अच्छी तरह से याद है। लेकिन मेरे पास यह कविता क्या कर रही है, समझ मे नही आया। सोचा चलो अपने चिठ्ठे पर डाल दो, कभी वह भटकते हुये आ जाये, तो रहस्य खुल जायेगा।

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3 टिप्पणीयां “सफल होंगे तेरे प्रयास” पर

आपके दोस्त की कविता पसंद आई. अच्छा लिखा है.

समीर लाल द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006

कविता कह रही होगी हमारा जन्म सफल हुआ हम दुबारा पढ़े गये।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006

SAhi hai baap. U have kept that Kavita habbit still alive. Wk numer. All the best. Ye site kisme banaye hai?
Sandeep द्वारा दिनांक मई 8th, 2006

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आरक्षण : आर्थिक आधार पर क्यों होना चाहिये ?

गुरुवार, अप्रैल 13, 2006


आज एक अच्छी खासी बहस छिडी हुयी है आरक्षण पर। हर कोई अपने अपने तर्क-कुतर्क दिये जा रहा है। लेकिन क्या किसी ने अपने तर्को तथ्यो और आकंडो से प्रमाणीत करने की कोशीश की है ? पक्ष या विपक्ष मे जितने भी तर्क दिये जा रहे है वह वैज्ञानिक/सांख्यकिक तथ्यो पर आधारीत ना हो कर भावनाओ पर आधारीत है।
जैसा कि आप जानते है , आरक्षण सिर्फ और सिर्फ १० सालो के लिये लागु किया गया था। अब यह आरक्षण ५७ वर्षो से चला आ रहा है। क्या किसी समाज विज्ञानी ने इस आरक्षण व्यवस्था का परिणाम जानने की कोशीश की है ? यहां पर हम समाज विज्ञानी या किसी अर्थशाश्त्री द्वारा किये गये शोध की बात कर रहे जो कि किसी भी पक्षपात से दूर हो ।

बहस की शुरूवात के लिये क्या हमे सभी शिक्षण संस्थानो से जो कि अभी २२.५ % आरक्षण दे रहे है से छात्रो के सामाजिक और आर्थीक प्रोफाईल के आधार पर आंकडे प्राप्त कर सकते हैं ? कितने एस सी या एस टी छात्र कालेज मे है ? कितने छात्र ऐसे है जिनकी परिवार की वार्षिक आय एक लाख रूपये से कम है ? कितने छात्र ग्रामीण है कितने शहरी है ?

यह सभी आंकडे उपलब्ध है, लेकिन इन आंकडो का उल्लेख अपने तर्को मे कोई नही कर रहा है ! एक अच्छा, सामयिक और प्रामाणिक शोध इस पुस्तक मे उपलब्ध है ‘’Reservation and Private Sector: Quest for Equal Opportunity and Growth’

त्रुटीपूर्ण आंकडो का मायाजाल

आरक्षण पर आधारीत सारी बहस इस (कु)तर्क पर आधारीत है कि भारत की जनसंख्या का ५२% भाग “ओ बी सी” है। ईंडियन एक्स्प्रेस मे एक लेख “ABC of OBC” के अनुसार ११ श्रेणीयो का उपयोग करने के बाद , आयोग ने ३७४३ जातियो को “ओ बी सी” पाया । सन १९३१ के बाद जातिगत आधार पर जनसंख्या के आंकडे उपलब्ध नही होने से आयोग ने उन्ही आंकडो का प्रयोग कर “ऒ बी सी” की जनगणना की। इस तरह से हिन्दू और गैर हिन्दू “ओ बी सी” की जनसंख्या कुल जनसंख्या का ५२ % निर्धारित की गयी।

यह सब मेरी समझ से बाहर है ! ६० साल से ज्यादा पूराने आंकडो का प्रयोग इतना महत्वपूर्ण निर्णय लेने मे कैसे किया जा सकता है ? और जब इस तरह से निर्णय लेना था तब १९९१ या २००१ मे जातिगत आधार पर जनगणना क्यों नही की गयी ?

२००१ की जनगणना के आंकडो से उम्र, लिंग, धर्म , वैवाहिक स्थीती, शैक्षिक स्थिती और विकलांगता की जान्कारी प्राप्त की जा सकती है। लेकिन जातिगत आधार पर सिर्फ SC/ST के ही आंकडे है !

खैर एक और संस्थान है। “National Commission for Backward Classes” ध्यान दे यहां पर CLASS शब्द का उपयोग किया गया है, CASTE का नही। वर्ग का मतलब जाति नही होता है।

NCBC पिछ्डे वर्गो को परिभाषीत करने के लिये एक नयी परिभाषा का प्रयोग कर सकता था। (उदाहरण के लिये कच्चे मकान मे रह रहा परिवार, भूमीहीन, पिने की पानी की अनुप्लब्धता = १, जाति व्यवस्था से दूर) लेकिन नही, उन्होने विशेष जातियो को पिछडे वर्गो मे परिभाषीत करना जारी रखा ।

NCBC के आंकडो मे से गुजरात की जातिसूची को देखें| यदि मैने ठीक समझा है तो ठाकुर, नायक, पूरी, और गोस्वामी पिछडे वर्गो मे आते है ! इस सूची को तैयार करने के लिये क्या NCBC ने जनगणना की तरह पूरी विशाल प्रक्रिया दोहरायी है ? इसमे कितना विज्ञान है और कितनी राजनिती ?

जे एन यू के प्रोफेसर प्रदिप्त चौधरी के इस विषय की जटीलता को रेखांकित करने वाले इस शोधपत्र को देखें। यह निरीक्षण इस सदी की शुरूवात का नही पिछली सदी की शूरूवात का है।

“सोनार, हलवाई और कलवार इन तिन ओ बी सी जातियो की साक्षरता की दर राजपूत, टागा, भट और कन्डू इन अगडी जातियो से काफी ज्यादा है। उसी तरह से आर्थीक आधार पर ओ बी सी की पांच जातिया सोनार, जाट, गुज्जर, किसान और माली अगडी जातियो राजपूत और ब्राम्हण जो कि हिन्दू जनसंख्या का पांचवा भाग है से बेहतर है । दो SC जातियां खटीक और दूसाध मे साक्षरता दर अधिकतर ओ बी सी जातियो से ज्यादा है।”
लेखक ने अंत मे लिखा है

“२० वी सदी की शूरूवात मे उत्तर प्रदेश जैसे पिछ्डे इलाको मे भी, साक्षरता दर और आर्थीक स्थीती मे जातिगत आधार पर काफी असमानता थी। उंची जातिया का मतलब अधिक साक्षरता या आर्थीक संपन्नता नही था। उसी तरह निची जातिया जैसे गुज्जर, सोनार,किसान,और माली आर्थीक रूप से संपन्न थी।
जाति ने पिछडी जातियो को आर्थिक आधार पर बढने के मार्ग पर कोई अवरोध नही खडा किया था। ५००० साल तक शिक्षण परंपरा के बाद भी उत्तर प्रदेश की ब्राम्हण जनसंख्या मे १९११ तक साक्षरता दर १२% थी; जो कि सबसे ज्यादा शिक्षीत जाति समझी जाती है।”

मै चाहता हु कि इन जैसे विद्वान जो तथ्य आधारीत तर्क देते है भावनात्मक नही को टी वी शो मे बहस के लिये आमण्त्रीत किया जाना चाहिये।
लेकिन तथ्य एक अच्छा टी वी शो नही बना सकते जो कि भावनात्मक ड्रामे बाजी से बनता है। प्रदीप्त चौधरी ने लिखा है
“जातिगत राजनिती के पक्षधर कहते है कि OBC और SC पिछ्डेपन के मानक पर क्रम से रख कर पिछडा, अति पिछडा जैसे वर्गो मे विभाजीत किया जाये। आरक्षण के कुल कोटे मे हर वर्ग के लिये कोटा निर्धारित किया जाये। यह सभी समस्याओ का हल है।
लेकिन एक जाति के मे भी परिवारो की आर्थीक स्थीतियो मे काफी विचलन है, दूसरे शब्दो मे काफी असमानता है। एक जाति मे भी काफी सारे आर्थीक वर्ग है।”
छोटे भूमी वाले किसान या छोटे व्यव्सायी, भूमीहिन मजदूर हर जाति का एक बडा भाग है। उसी तरह हर जाति आर्थीक रूप से संपन्न , छोटा या बडा एक वर्ग है।
क्या पिछडी जाति के सभी लोग शैक्षणीक या आर्थीक रूप से विकलांग है ? सही मायनो मे पिछ्डी जातियो मे भी एक अच्छा खासा विभाजन या वर्गीकरण है। इस पिछ्डी जातियो मे भी अंतर्जातिय सामाजिक और आर्थीक भेदभाव है। पिछडी जातियो मे भी आर्थिक रूप से संपन्न परिवार अगडी जातियो की परंपराओ की नकल करते है, जैसे बाल विवाह, विधवा पूनर्विवाह का विरोध , दहेज इत्यादि”
अब आप खुद सोचिये जातिगत बिभाजन कितना तर्क संगत है ?

हमारा भविष्य कैसा होना चाहिये ? जाति व्यवस्था पर विभाजित भारत या पिछ्डे वर्गो के उत्थान मे लगा भारत ?

आज की नयी पिढी के लिये जाति अर्थहिन होना चाहिये। लेकिन आज वह फिर से सबके सिर चढकर बोल रहा है। और इस व्यवस्था मे भारत का पहले ही काफी नुकसान कर दिया है । अब और नही । जाति अब मुद्दा नही होना चाहिये !
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4 टिप्पणीयां “आरक्षण : आर्थिक आधार पर क्यों होना चाहिये ?” पर
गम्भीर विषय पर एक अच्छा गम्भीर लेख.
sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 13th, 2006

बढ़िया लिखे हो आशीष भाई। समस्या होती है तब जब नेता लोग वोट बटोरने के लिए इन तथाकथित पिछड़ी जातियों को प्रसन्न करने की कोशिश करते हैं और ये लोग भी बड़े समझदार होते हैं, आखिर अपना भला होता किसे अच्छा नहीं लगता!! आरक्षण का अर्थ इनके लिए बिना मेहनत किए मेहनती लोगों को अंगूठा दिखा के सफ़लता प्राप्त करना मात्र रह गया है। यह समस्या तब तक नहीं सुलझती जब तक प्रशासन को ज्ञान प्राप्त नहीं होता!!
Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 14th, 2006

अर्जुन सिन्ह ऐक हारा हुआ ईन्सान है सोनिया का पालतू है। पिछले दस सालो मे ऐक चुनाव नही जीत सका। जिन्दगी भर जमकर किया कुकाम और बुढापे मे हुआ जुकाम। चुरहट लाटरी हो या भोपाल गैस कान्ड या फिर हो सीधी मे चुनाव मे गडबड, ईनके पाप का ठीकरा कब फूटेगा भगवान
raj द्वारा दिनांक अप्रैल 18th, 2006

एक सरकारी अफसर का बेटा (ST Class का ), जो कभी पहले मेरे क्लास में कभी पहले १० में भी नही था Engineering Entrance Exam के जरिये अच्छे college admission मिल गया, वहीं के गरीब ब्राह्मन का बेटा Exam ही नही दे पाया क्यों कि उसके पास fees के लिये पैसे नही थे। आप इसे क्या कहेंगे।
पंकज कुमार द्वारा दिनांक अप्रैल 28th, 2006


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आधुनिक अर्जुन की ज्ञान प्राप्ति

बुधवार, अप्रैल 12, 2006


आधुनिक अर्जून कुरूक्षेत्र मे निराश बैठे थे। अर्जुन ने अपनी युवावस्था मे अनेको युध्द लडे थे और जीते थे। जिवन के संध्याकाल मे उनका पराक्रम चुक गया था और ये हालत हो गयी थी की महारथी अर्जुन को एक पैदल भी हरा देता था। महाराजा के दरबार मे उनकी पहले जैसी इज्जत नही बची थी, लोग अब उनकी उम्र का लिहाज कर चुप रहते थे।

आधुनिक अर्जुन ने एक सपना देखा था, धर्मराज को उनका खोया राज्य दिलाने का नही, अपने लिये चक्रवर्ती राज्य प्राप्त करने का। इसके लिये उन्होने अथक परिश्रम भी किया था, अपने छोटे से राज्य का बलीदान कर वह हस्तिनापूर नगर मे आये थे। यह बात और है कि जिसे वह अपनी राज्य की बागडोर सौंप कर आये थे, वह उनसे बडा महारथी दिगविजयी साबीत हुआ और उसने उनकी वापसी के रास्ते बंद कर दिये।

अर्जुन के सत्ता प्राप्ति के मार्ग मे अनेक अवरोध थे, उनके पास जब सबसे पहले महाराजा की कुर्सी प्राप्त करने का अवसर आया, तब उन्होने पाया मौनीबाबा नामक महारथी ने उनहे टंगडी मारकर सत्ता प्राप्त कर ली। अर्जुन निराश नही हुये, उन्होने अपने प्रयत्न जारी रखे। उनकी पूरी कोशीश रही की मौनी बाबा का राज मे प्रजा संतुष्ट ना रहे। इतना ही नही उन्होने मौनीबाबा के मंत्रीयो की भी आलोचना जारी रखी, उनकी नितीयो को जनविरोधी बता कर असतोंष की चिंगारी फैलायी । महारथी अर्जुन का मौनीबाबा को एक साधु समझना भारी साबित हुआ, मौनी बाबा ने अपना रूद्र रूप दिखाकर उन्हे अपने राज्य से निर्वासीत कर दिया।

मौनीबाबा की राज्य के अवसान के बाद जब महारथी अर्जुन के सामने महाराजा बनने का अगला अवसर दिखायी दिया, वे एक पैदल सैनीक से मात खा गये। उनका सपना फिर से अधुरा रह गया। महारथी अर्जुन निराश हो चुके थे। एक साधारण सा राज्य का सेवक महाराजा बन चुका था, और महारथी अर्जुन भिष्म पितामह की तरह महाराजा की कुर्सी की सेवा करने से बंधे हुये थे।

अपनी दूरावस्था पर अर्जुन क्रंदन कर रहे थे, तब एक आकाशवाणी हुयी। अर्जुन ने आंखे खोल कर देखा सामने जग के स्वामी पार्थसारथी खडे थे।

पार्थसारथी उवाच ” हे पार्थ, तुम्हारे जैस महारथी योद्धा को ऐसे क्रंदन करना शोभा नही देता। तुम अपने दुखो का वर्णन करो , हम उसका निवारण करेंगे”


अर्जुन उवाच “हे विश्वनाथ आप तो जग के स्वामी है। आपको हमारे कष्टो का ज्ञान है। पिछ्ले युद्ध मे जित मे हमारा योगदान नगण्य था, जिस कारण हमारी हालत दयनिय हो गयी है। हमारी स्थिती गली के कुत्ते से गयी गुज़री हो गयी है, जिस पर तो कोई भी पत्थर मार जाता है। मुझे तो कोई भी उस लायक नही समझता ।”

पार्थसारथी उवाच “हे पार्थ , तुम्हे निराश होने की जरूरत नही है। तुम अपना खोया हुवा वैभव प्राप्त कर सकते हो।”

अर्जुन उवाच “हे स्वामी मुझे इसके लिये क्या करना होगा?”

पार्थसारथी उवाच “तुम्हारी दूरावस्था का कारण है कि वर्तमान महाराज के शाशन मे प्रगती हो रही है. विकास दर बढ रही है। पार्थ, तुम्हे संकंट मोचक बनना होगा।”

अर्जुन उवाच “हे विश्वानाथ मै संकट्मोचक कैसे बन सकता हूं।”

पार्थसारथी मुस्कराये और कहा ” इसके लिये सबसे पहले जरूरी है संकट पैदा करना|”

अर्जुन उवाच ” हे भगवन मै आपका मंतव्य नही समझा।”

पार्थसारथी उवाच “हे पार्थ तुमने इतिहास से कुछ नही सीखा है। कुछ वर्षो पहले एक फतेहगढ राज्य के एक राजा थे, जिन्होनें तत्कालीन हस्तिनापूर के महाराजा राजीव का सिंहासन पलट दिया था। तदोपरांत वह खुद उस सिहांसन पर आसीन हुये थे। जब उनका खुद का सिंहासन एक सहयोगी राजा की रथयात्रा से डोलने लगा था तब उन्होने मंडल रूपी समाज विघटक अस्त्र चलाया था।”

अर्जुन उवाच ” लेकिन भगवन उस अस्त्र के कारण अनेको युवा जलकर मर गये थे।”

पार्थसारथी उवाच “अर्जुन तुम कर्म करो फल की चिन्ता मत करो। लोगो को जीवन मै देता हूं, लोगो का जीवन मै लेता हूं, तुम तो एक निमित्त मात्र हो। तुम्हे याद होगा कि उस अस्त्र के चलाने के बाद तत्कालिन महाराज ने कुछ नही किया था।”

अर्जुन उवाच “लेकिन महाराज इस शस्त्र का प्रयोग किया जा चुका है, शासन की नौकरीयो मे जातिगत वैमन्श्य फैल चुका है। शासन मे अब प्रतिभा की कद्र नही होती है। शासन मे उन्नति के लिये अब जाति विशेष के होना ही आवश्यक है किसी प्रतिभा को होना नही।”

पार्थसारथी उवाच “हे पार्थ तुम मे दूरदृष्टी का अभाव है। अभी भी काफी सारे ऐसे क्षेत्र है, जंहा प्रतिभा का सम्मान किया जाता है। जंहा जातिगत वैमन्श्य नही है। तुम्हे हर ऐसे क्षेत्र का चुनाव करना होगा जंहा पर समानता और उन्नति मे भेदभाव नही होता है। हर ऐसी जगह पर तुम्हे मडंल अस्त्र का प्रयोग करना होगा।”

अर्जुन उवाच ” लेकिन भगवन ऐसे क्षेत्र तो राज्य की शान है, कुछ क्षेत्रो से अलौकीक प्रतिभाये निकलती है, कुछ क्षेत्र शासन की उन्नती के लिए विदेशी मुद्रा का प्रंबध करते है, यह वह क्षेत्र है जिन पर सारा राज्य गर्व करता है।”

पार्थसारथी उवाच ” हे अर्जुन गर्व पतन का कारण है। उसे तुम्हे नष्ट करना होगा। अर्जुन तुम अपने लक्ष्य पर ध्यान दो, बाकि सब मिथ्या है, माया है।”

अर्जुन उवाच ” भगवन मै ऐसा ही कंरूंगा। भगवन क्या आप मुझे कुछ ऐसे क्षेत्र का वर्णन दे सकते है, जंहा मै इस शस्त्र का प्रयोग कर सकता हूं?”

पार्थसारथी उवाच “तुम अपने युद्ध की आरंभ आई आई टी और आई आई एम से करो। उसके बाद निजी क्षेत्र पर संधान करो। चित्रपट सृष्टी मे भी आजकल प्रतिभा का सम्मान होता है जो कि प्रगतिशील समाज के लिये अपमान है। तुम्हारा अगला निशाना वह होना चाहिये। इसके बाद सशस्त्र सेना है। अर्जुन लक्ष्य की कमी नही है।”

और आगे क्या हुवा आप सब जानते है।


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4 टिप्पणीयां “आधुनिक अर्जुन की ज्ञान प्राप्ति” पर
आशीष भाई
बहुत जबरदस्त व्यंग और सुंदर लेखनी के लिये बहुत बधाई।
वर्णन और बहाव ने समा बांध दिया।
समीर लाल
समीर लाल द्वारा दिनांक अप्रैल 12th, 2006

बड़ा बढ़िया लेख लिखा।बधाई!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 12th, 2006

छींटे और बौछारें » आरक्षण - वैचारिक संघर्ष द्वारा दिनांक अप्रैल 15th, 2006

बहुत बढ़िया।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक अप्रैल 30th, 2006

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पुस्तक समीक्षा : वन नाईट एट काल सेंटर

सोमवार, अप्रैल 10, 2006



आज ही चेतन भगत की “वन नाईट एट काल सेंटर” खत्म की।
पढने के बाद समझ मे आया कि यह उपन्यास “इंडियन एक्स्प्रेस” की लोकप्रिय पुस्तको मे पिछ्ले तीन महिनो से क्रमांक एक पर क्यो हैं। चेतन भगत के लिखने का तरीका बेहतरीन है, कथा मे एक निरंतरता और उत्सुकता बनी रहती है। यही निरंतरता और उत्सुकता उपन्यास की जान है।

यह कहानी एक कुछ ऐसे नौजवानो ( २ युवक और ३ युवतीयां) की है, जो एक “काल सेंटर” मे काम करते है। पूरा कथानक एक रात का है जो शाम से शूरू होकर सुबह खत्म हो जाता है।

यह कथानक काल सेंटर से जुडा है, जबकि मै सुचना तकनीकी क्षेत्र मे कार्यरत हूं। दोनो क्षेत्रो के वातावरण मे जमीन आसमान का अंतर है,लेकिन ना जाने मुझे इसके सारे के सारे पात्र अपने आसपास के ही लगे।

उपन्यास की शूरूवात कुछ ऐसी है कि लेखक को अपनी एक रेलयात्रा मे एक युवती मिलती है। वह युवती लेखक को यह कहानी इस शर्त पर सुनाती है कि वह इस कहानीको उपन्यास के रूप मे प्रकाशीत करवायेगा। एक अजीब सी शर्त लेकिन लेखक इसे मान लेता है।

इस कहानी के प्रमुख पात्र है श्याम, प्रियकां,व्रूम, राधिका, इशा,मिलट्री अंकल और खलनायक मैनेजर ‘बक्शी’। सभी के अपने अपने सपने है, और अपनी अपनी परेशानियाँ। लेकिन सब मे एक समानता है, सभी किसी ना किसी तरह से विद्रोही है ,लेकिन अपना आत्मविश्वास खो चुके है।

कहानी की रात मे घटनाये कुछ इस तरह से घटना शूरू होती है कि सबकी जिंदगीयो मे तुफान आना शूरू हो जाता है । सबके सपने एक के बाद एक टूटने लगते है, एक उथलपुथल सी मच जाती है। सभी की जिदंगी के सूत्र इस तरह से उलझ जाते है जिसे सुलझाना कठीन हो जाता है ।

इतने मे कहानी के पात्रो को एक फोन काल आती है ,“भगवान” से। जी नही , भगवान किसी पात्र का नाम नही है, यह वही ईश्वर, अल्लाह , गाड है। भगवान उन्हे अपनी मुसीबतो से निकलने का रास्ता बताते है।

लेखक ने कहानी का तानाबाना काफी अच्छा बुना है। सभी पात्र और घटनायें कहानी के चरमोत्कर्ष से पहले तक स्वभाविक लगती है। लेकिन भगवान के द्वारा फोन सारे उपन्यास को एक नाटकीय मोड दे देता है, और आगे का सारा का सारा कथानक नाटकीय हो जाता है। मेरी राय मे यही इस उपन्यास की सबसे बडी कमजोरी है । अंत मे लेखक ने “भगवान के फोन”की अवश्यकता को सही ठहराने की कोशीश जरूर की है,जो तर्क संगत नही लगती है।

उपन्यास की एक बात जो सबसे ज्यादा चुभने वाली लगी वह यह कि आज भी पता नही क्यों काल सेंटर मे नौकरी को एक सम्माननीय दॄष्टी से नही देखा जाता है । मेरे कुछ अभियंता(इंजीनियर  दोस्त है जो आज भी ५-६ हजार रूपयो की नौकरी कर रहे है, वह भी दिन और और रात की पालियो मे। जब मै इन्हे काल सेंटर की नौकरी की सलाह देता हूं, नाक भौ सिकोड्ना शूरू कर देते है, जबकि इस काल सेंटर की नौकरी मे कम से कम १०-१५ हजार महीने के आसानी से मिल जाते है और काम सिर्फ ८ घंटे का होता है।

लेखक ने युवावर्ग को उपदेश देने का प्रयास किया है । आत्म विश्वास को वे सफलता की कुंजी बताते है, साथ मे वे ये बताना नही भुलते की नयी शुरूवात करने कभी भी देर नही होती है। युवा वर्ग या जो अपने करियर से संघर्ष कर रहे है, इसे जरूर पढना चाहिये।

कुल मिलाकर उपन्यास पठनिय है। उपन्यास मे कुछ “एक लाईना” है जो हंसाते है और गुदगुदाते है।
मेरी पसंद का एक लाईना
“Girls handbags have enough to make a survival kit for Antarctica.”
उपन्यास का खलनायक बख्सी भी मैनेजर है, जो हमेशा “मैनेजमेंट गुरूओ” के कोट देते रहता है। हर बात को समझाने के लिये ग्राफ या आकृतीयां बनाता है, यह सब मै आज से बंद करने जा रहा हूं।

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6 टिप्पणीयां “पुस्तक समीक्षा : वन नाईट एट काल सेंटर” पर
इनकी इसके पहले वाली पुस्तक ‘Five point someone: what not to do at IIT’ भी बहुत अच्छी है|
Unmukt द्वारा दिनांक अप्रैल 10th, 2006

मजा आया ना। मै तो पहले से ही कह रहा था, झकास है। अभी पिछली बार इन्डिया गया था(दिसम्बर में) तब यूं ही बुक स्टाल पर उलटते पलटते किताब ले ली। लेकिन किताब पढने के बात तो मै चेतन भगत का मुरीद हो गया। पिछली किताब भी ढूंढ रहा हूँ, यहाँ कुवैत मे नही मिल रही।वो भी सुना है बहुत झकास थी, आई आई टी स्टूडेन्ट्स के ऊपर थी।
जीतू द्वारा दिनांक अप्रैल 10th, 2006

इस ऊपन्यास के बारे में इस बार के विश्व पुस्तक मेले में बहुत सुना था, पर बेपर की हाईप समझ कोई भाव न दिया था। लगता है कि अब पढ़कर देखना होगा कि यह कैसा है!!
और चिट्ठे का प्रकरण बदलकर बहुत अच्छा किया, वह पुराना प्रकरण अब बोरिंग लगने लगा था!!
Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006

बढ़िया !
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006

लगता हैं अब तो यह किताब पढनी ही पङेगी. मैने भी काफी सुना था इसके बारे में, लेकिन अंग्रेजी साहित्य को सिडनी-सेल्डन के उपन्यासों से आगे कभी पढा ही नहीं (अपना अंग्रेजी-ज्ञान ही इतना हैं  )
sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006

नया ब्लोग-आवरण अच्छा हैं.
sanjay | joglikhi द्वारा दिनांक अप्रैल 11th, 2006

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मेरे जीवन पर धर्म का प्रभाव

मंगलवार, अप्रैल 04, 2006


इस विषयपर लिखने के लिये मूझे किसी चेतावनी या नोटीस देने की जरूरत नही है। धर्म पर लिखा गयी कोई भी लेख आपत्तिजनक नही हो सकता है। यदि वह लेख धर्म मानने वालो को आपत्तीजनक लगता है, इसका अर्थ यह है लेखक और पाठक दोनो मे से किसी एक को या दोनो को धर्म की जानकारी नही है। अज्ञान की कोई सजा नही होती है।

मेरे जिवन पर धर्म का क्या प्रभाव है, इस विषय पर मेरे अलावा भी मेरे आसपास के हर क़रीबी व्यक्ति का भी अलग मत हो सकता है। मेरे मित्र मुझे नास्तिक मानते है। मेरे परिवार के व्यक्ति मुझे नास्तिक तो नही लेकिन आडंबरो से दूर रहने वाला मानते है।

धर्म क्या होता है ? मेरे लिये इसकी परिभाषा क्या है ? मेरा धर्म क्या है ? ये सब ऐसे प्रश्न है जिनका उत्तर आगे बढ़ने से पहले देना आवश्यक है।

मेरा धर्म क्या है ?


इसे मेरे धर्म की महानता कही जाये या विडंबना मेरे धर्म का कोई नाम ही नही है ! काका कालेलकर ने अपने ग्रंथ “समन्वय संस्कृति की ओर'’ में धर्म का सुन्दर विश्लेषण किया है। वे लिखते हैं कि धर्म शब्द का वही अर्थ नहीं है, जो पश्चिम में रिलीजन का माना जाता है। धर्म का अर्थ है न्यायपूर्ण ढंग से काम करना। वे कहते हैं कि धर्म या धम्म एशिया की सांस्कृतिक विरासत का मर्म है। एक स्थान पर इन्होंने लिखा है- “हम कहने लगे `सनातन धर्म’ और परदेशी लोगों ने इसको नाम दिया ’हिन्दू धर्म'’ (पृ. ९)। हिन्दू एक फ़ारसी शब्द है। ऋग्वेद में कई बार सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है–वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे । संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं–पहला, सिन्धु नदी क नाम और दूसरा, कोई भी नदी या जलराशि । आर्य भाषाओं की [ स ] ध्वनि ईरानी भाषाओं की [ ह ] ध्वनि में लगभग हमेशा बदल जाती है (ऐसा भाषाविदों का मानना है) । इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हप्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया । इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया । जब अरब मुसल्मान सुल्तान भारत में शासन करने लगे, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया । इस देश का दुर्भाग्य है कि हमने परदेशियों के द्वारा दिये गए नाम को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया।

मेरा धर्म रीलीजन या मजहब का पर्यायवाची शब्द नही है, मेरा धर्म एक जीवन पद्धति है, एक विचारधारा है । मेरे धर्म की स्थापना किसी ने नही की है, ना यह किसी विशेष समय से प्रारंभ हुआ है। मेरा धर्म सनातन है, और युगो युगो से चला आ रहा है। यह एक विशाल नदी के प्रवाह की भांति है जिसमे ना जाने कितने पंथ, परपंराये, मान्यताये मिलती गयी है। भारत में एक के बाद एक न जाने कितने सम्प्रदायों का उदय हुआ और उन्होंने वैदिक(सनातन/हिन्दू) धर्म को जड़ से हिला दिया ; परन्तु भयंकर भूकम्प के समय समुद्रतट का जल पिछे हट जाता है, कुछ समय पश्चात् हजार गुना बलशाली होकर सुनामी के रूप मे सर्वग्रासी आप्लावन के रूप में पुनः लौट आता है ;उसी तरह जब यह सारा कोलाहल शान्त हो गया, तब इन समस्त धर्म-सम्प्रदायों को उनकी धर्ममाता ( सनातन धर्म ) की विराट् काया ने आत्मसात् कर अपने में विलीन् कर लिया ।

ये वह धर्म है जिसकामूल मन्त्र है अपना ध्यान रखते हुए दूसरों का भी ध्यान रखना - “आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्'’। इसका महत्त्वपूर्ण तत्त्व विश्वभावना है। “आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति'’ और “वसुधैव कुटुम्बकम्'’ इसकी शिक्षा है। स्वामी विवेकांनद ने कहा था कि मुझे ऐसे धर्म मे जन्म लेने का गर्व है जो ये दावा नही करता कि वह सर्वश्रेष्ठ् है। गीता मे कृष्ण कहते है

‘प्रत्येक धर्म में मैं , मोती की माला में सूत्र की तरह पिरोया हुआ हूँ ।’ — गीता ॥७.७॥

‘जहाँ भी तुम्हें मानवसृष्टि को उन्नत बनानेवाली और पावन करनेवाली अतिशय पवित्रता और असाधारण शक्ति दिखाई दे, तो जान लो कि वह मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुआ हैं ।’ –गीता ॥१०.४१॥

व्यास कहते हैं,

‘हमारी जाति और सम्प्रदाय की सीमा के बाहर भी पूर्णत्व तक पहुँचे हुए मनुष्य हैं ।’ –वेदान्तसूत्र ॥३.४.३६॥

सनातन धर्म वेदों पर आधारीत है। वेद अनादि और अनन्त हैं। सम्भव हैं, यब बात हास्यास्पद लगे कि कोई पुस्तक अनादि और अनन्त कैसे हो सकती हैं । किन्तु वेदों का अर्थ कोई पुस्तक हैं ही नहीं । वेदों का अर्थ हैं , भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष । ये वेद किसी भगवान की पूजा या स्तुती नही करते हैं। वेद प्राकृतिक शक्तियो की स्तुति करते है। प्राकृतिक शक्तियो की अवहेलना का परिणाम आज सुनामी या विश्वव्यापी तापमान वृद्धी (ग्लोबल वार्मींग) के रूप मे आज सामने आ रहा है।

वेद हमें यह सिखाते हैं कि सृष्टि का न आदि हैं न अन्त । बिग बैंग का सिद्धांत यही कहता है कि ब्रह्मांड एक बिन्दू के रूप मे था जो एक महाविस्फोट के बाद आज के इस रूप मे आया है। यह एक सीमा तक विस्तारित होने के बाद सकुंचित होना शूरू हो जायेगा। अंत मे वापिस एक बिन्दू के रूप मे बदल जायेगा । यह एक संकुचन और विस्तार का अन्तहिन चक्र है ! स्टीफन हांकिस की “ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाईम” पढे, उन्होने यही सभी कथनो को अनुमोदित किया है।
सृष्टि से पहले सत नहीं था, असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं, आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या कहाँ, किसने देखा था
उस पल तो अगम, अटल जल भी कहाँ था
सृष्टि का कौन है कर्ता कर्ता है यह वा अकर्ता
ऊंचे आसमान में रहता सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता, या नहीं भी जानता
हैं किसी को नहीं पता नहीं है पता
सनातन धर्म पर यह आरोप लगता है कि इसमे ना जाने कितने देवी देवता है। यही तो मेरे धर्म की महानता है हर किसी को अपने आप मे आत्मसात कर लेने की। शिव एक प्रमुख हिन्दू देवता माने जाते है लेकिन यह भी एक तथ्य है कि हिन्दू(सनातन /वैदिक) धर्म मे शिव का प्रवेश आर्य और द्रविड संस्कृति के मिलाप के पश्चात हुआ है। यही होता गया और नये नये देवी देवता सनातन धर्म मे आते गये और देवता बढते गये । यह वह धर्म है जिसने हर जाति , हर समुदाय, हर व्यवसाय विशेष के देवी-देवता को जगह दी है। जिसे जिस देव को मानना है माने, किसी देव को मानने या ना मानने की कोई बंदिश नही है। लेकिन इस के दुरुपयोग भी हुये है जैसे एक चलचित्र मे कल्पित देवी “संतोषी माता” को भी भगवान बना दिया । लेकिन इसमे मेरे धर्म का क्या दोष ? ये तो उसके मानने वालो को दोष है/था जो जान बुझकर आंख मूंद्कर पडों के पीछे चल रहे है ! अंधविश्वास धर्म का दोष नही है , मानने वालो का है!

मुर्तीपूजा पर ये आरोप लगते है कि जो पत्थर का भगवान खुद की रक्षा नही कर सकता वह दूनिया की रक्षा कैसे करेगा । सनातन धर्म मूर्तिपूजक नही था वह तो प्रकृतिपूजक था लेकिन सनातन धर्म ने मूर्तिपूजा को भी स्वीकार किया। कोई हिन्दू यदि आराधना के समय बाह्य प्रतीक का उपयोग करता हैं ; वह आपको बतलाएगा कि यह बाह्य प्रतीक उसके मन को ध्यान के विषय परमेश्वर में एकाग्रता से स्थिर रखने में सहायता देता हैं ।(मै यहां पूजा/घंटा बजाना/आरती आदि आडंबरो की बात नही कर रहा हूं।) वह भी यह बात उतनी ही अच्छी तरह से जानता हैं, जितना आप जानते हैं कि वह मूर्ति न तो ईश्वर ही हैं और न सर्वव्यापी ही । क्या ईश्वर का भी कोई परिमाण हैं ? यदि नहीं, तो जिस समय हम सर्वव्यापी शब्द का उच्चारण करते हैं , उस समय विस्तृत आकाश या देश की ही कल्पना करने के सिवा हम और क्या करते हैं ? अपनी मानसिक सरंचना के नियमानुसार, हमें किसी प्रकार अपनी अनन्तता की भावना को नील आकाश या अपार समुद्र की कल्पना से सम्बद्ध करना पड़ता हैं; उसी तरह हम पवित्रता के भाव को अपने स्वभावनुसार गिरजाघर या मसजिद या क्रूस से जोड़ लेते हैं । हम पवित्रता, नित्यत्व, सर्वव्यापित्व आदि आदि भावों का सम्बन्ध विभिन्न मूर्तियों और रूपों से जोड़ते हैं ? मूर्तियाँ, मन्दिर , गिरजाघर या ग्रन्थ तो धर्मजीवन में केवल सहायकमात्र हैं । लेकिन मूर्तिपूजा जो आज की जाती है वह प्राचिन मुर्तिपूजा का विकृत रूप है । मुर्ति जो एक प्रतिक मात्र हुआ करती थी, उसे भगवान बना दिया गया हौ। और यह तो किसी ने भी नही कहा है कि आपको मुर्तिपूजा करनी चाहिये ? आर्यसमाज मुर्तिपूजा का विरोधी है।

मेरा धर्म क्या नही है?


मंदिरों मे जाकर घंटे बजाकर चीख चीख कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है। मेरा ईश्वर सर्व शक्तिमान है, जो इस सृष्टी का संचालन कर रहा है। उसे किसी पूजा या आराधना की आवश्यकता नही है। जब वह सर्वशक्तिमान है तो वह जानता है मुझे क्या चाहिये ! मेरे लिये जो भी उचित होगा वह मुझे देगा।मुझे जरूरत है अपने कर्मो की। “कर्म करो फल की चिन्ता ना करो“। मेरे कर्म यदि फल प्राप्ति के योग्य है तो वह मुझे मिलेगा ही, इसके लिये किसी पूजा, आराधना या आरती की आवश्यकता नही है। उसे किसी रिश्वत(चढावे) की जरूरत नही है। मंदिरो मे मुर्ति की स्थापना का उद्देश्य यह नही था कि घण्टे घड़ियाल बजाकर पूजा की जाये। वह तो शांत वातावरण मे साधना करने के लिये बनाये गये थे,जितने भी तिर्थस्थल है या माने हुये मंदिर है सभी दूर्गम या पहाडी लेकिन मनोरम और शांत स्थल पर स्थित है।

मेरे ईश्वर को किसी मंदिर की आवश्यकता नही है, वह सर्वव्यापी है। गालिब ने कितना सही कहा था
मत पी शराब गालिब मस्जिद मे बैठकर , तो मुझे वह जगह बता दे जहां खुदा ना हो|
मेरा धर्म जाति/छुवा-छुत नही मानता। राम ने शबरी के बेर खाये थे, वानरो के साथ मिल कर युद्ध लडा था। भारतिय वर्ण/जाति प्रथा यह श्रम विभाजन पर आधारित थी। छुवा छुत, परदाप्रथा तो मध्ययुग की देन है।
मेरा धर्म मनुस्मृती नही मानता क्योंकि यह भी मध्य युग की देन है। किसी वेद, पूराण, रामायण अथवा महाभारत मे इस ग्रंथ का उल्लेख नही है।

मेरा धर्म श्राद्ध, मृत्युभोज का विरोधी है, यह सब कर्मकांड तो पंडो के द्वारा अपना पेट भरने के लिये धर्म से चिपकाये हुये है।

मेरा धर्म अपने या किसी और धर्म की निंदा करना नही है। आलोचना और निण्दा दोनो अलग अलग है।
पाप करने के बाद उन्हे धोने के लिए गंगा स्नान या उपवास करना मेरा धर्म नही है, यह तो एक आडंबर है।
निक्कर वाले जिसे धर्म कहते है वह मेरा नही है। मेरे धर्म को किसी रथयात्रा की जरूरत नही है।

अंत मे
जीवन में मानव मूल्यों का एक महत्वपूर्ण स्थान है। मानव जीवन को उदारता, उच्चता और श्रेष्ठ आदर्शो के द्वारा उन्नत बनाने का लक्ष्य भी यही है। उदारता, सहिष्णुता समरसता, क्षमा, त्याग, मानवता आदि इसी लक्ष्य की धरोहर हैं। इन मुल्यो का पालन ही मेरा धर्म है । बहुत प्राचीन काल से अपनी प्रारम्भिक अवस्था में धार्मिक साहित्य के रूप में विकसित हुए वेद, पुराण, उपनिषद, गीता, कुरान, बाईबल, अवेस्ता, त्रिपिटिक आदि शास्त्र और ग्रन्थ अपने में धर्म के तत्वों को समेटे हुये हैं। इन सभी में एकत्व बोध को स्वीकार कर समभावना का विकास करना ही मेरा धर्म है। कोई भी धर्म किसी भी दूसरे धर्म से ऊंचा या नीचा नहीं है। सभी धर्मों की मंजिल व ध्येय एक ही मानव मात्र का कल्याण है और यही मेरा धर्म है।

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18 टिप्पणीयां “मेरे जीवन पर धर्म का प्रभाव” पर



बहुत सुन्दर!
बहुत ही अच्छे ढंग से तुमने अपने विचार रखे।लेख थोड़ा लम्बा जरुर हो गया है लेकिन लेख की निरन्तरता कंही नही खोई। एक अच्छे लेख के लिये मेरी बधाई स्वीकार करो।
जीतू द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

एक के बाद एक सुन्दर लेख आ रहे हैं इस विषय पर. बहुत अच्छा लिखा हैं आपने.
छुआ-छुत महाभारत काल में मोजुद थी, कर्ण को याद करे.
आपके लेख से सनातन धर्म कि महानता उभर कर आती हैं, क्योंकि आप चाहे जिसमें विश्वास या अविश्वास करे आप सनातनी तो रहते ही हैं.
sanjay Bengani द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

आशीष भाई, बहुत ही सुन्दर लेख लिखा है आपने अपने इस लेख में धर्म के मूलतत्वों को दर्शाया है, वरना अभी तक तो चिट्ठा जगत् में आडम्बरों और लोकाचार को ही धर्म का नाम दे कर प्रकारान्त से धर्म को कोसा जा रहा था।
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006


लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि शिव का प्रवेश द्रविड़ और आर्य संस्कृतियों के मिलन के बाद हुआ। वेदों में शिव को समर्पित कई सूक्त हैं। लाखों हिन्दुओं द्वारा हर रोज़ पढ़ा जाने वाला महामृत्युंजय मंत्र ऋग्वेद और सामवेद, दोनों ही संहिताओं में मिलता है; जिसमें शिव की स्तुति की गयी है।
साथ ही वैदिक संहिताओं से कहीं भी यह इंगित नहीं होता कि भारत में आर्य और द्रविड़ नामक दो समानान्तर सभ्यताएँ थीं या फिर आर्य भारत के बाहर से यहाँ पर आए। मेरा मानना है कि भारत में आर्यों के आगमन का सिद्धान्त अपेक्षाकृत बहुत ही अर्वाचीन है। इस बारे में आपके क्या विचार हैं?
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

प्रतिक,
मै यह नही कह रहा कि आर्य बाहर से आये थे, यह मै भी नही मानता । लेकिन आर्य और द्रविड यह दोनो अलग सभ्यतायेँ जरूर थी जो बाद मे एक दूसरे मे विलीन हो गयी|
यह इससे भी साबीत होता है कि सँस्कृत एक आर्य भाषा है जो अन्य द्रविड भाषाओ (तमिळ, मलयालम, कन्नड और तेलगु) से पूरी तरह अलग है। यह अंतर अन्य देवो मे भी है, जैसे कार्तिकेय (मुरूगण) जो दक्षिण भारत मे पूजे जाते है उत्तर मे नही(या कम)।
वेदो मे शिव का जिक्र नही है, रूद्र का जिक्र है । रूद्र , शिव, शंकर एक ही देव के भिन्न नाम है ये एक विवाद का विषय हो सकता है ।
आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

सभी धर्मों में ये सिखाया जाता है “एक और नेक बनो” भारत में ९० फीसद फसाद मज़हब के नाम पर होता है ये बात अलग है के लडवाता कोन है? आशीष भाई ने धर्म पर बहुत ही सुन्दर लेख लिखा है मगर हम ने अपने धर्मों के चारों तरफ दीवारें खडी करली हैं, हमें अपना धर्म छोड कर दूसरा कोई धर्म पसंद नहीं, अपने धर्म को कोई गाली दे तो हम उसकी ज़ुबान काट लेते हैं, सभी धर्म में ये सिखाया जाता है कि हम दूसरे धर्मों का भी एहतराम करें। पर ये सब खाली पीली बातें हैं। इस विशय पर चाहें तो बहुत कुछ लिख सकते हैं और कोई बडा भाशन भी दे सकते हैं, भारत में कहीं “हिन्दू मुसलिम भाई-भाई” के नारे? ये एक घटिया मज़ाक है। जहां तक मेरी बात हैः मुझे नहीं चाहिये ये धर्म जिसकी वजे से मुझे दूसरे धर्मों से नफरत हने लगती है, किया ज़रूरत है ऐसे मज़हब की जो हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए नफरत पैदा करती है। चाहे तो हम सब को एक धर्म में होना चाहिए वरना नहीं चाहिए धर्म।
SHUAIB द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

आशीष, बहुत सुन्दर! बहुत ही अच्छे ढंग से तुमने अपने विचार रखे। आपने अपने इस लेख में धर्म के मूलतत्वों को दर्शाया है, जो कि ज्ञान वर्धन करता है।
Tarun द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

अछ्छी तरह से संशोधन करके लिखा गया ये लेख बधाइ के पात्र है। आपके सारे विचारों से में सहमत नहीं हु फिर भी आप बधाइ के काबिल है क्योकि आपने अपने विचार बहुत सोच कर और होमवर्क करके व्यक्त किये है।
आप चाहे तो अपने फाज़ल समय का उपयोग ओर धर्मो को समज़ने मे कर सकते है ताकी पता तो चले एक जेसे इंसानो की इतनी सारी मान्यता क्यो है और उसमे से कोइ सही है या नही। क्योकि यह सारे धर्मो के इजाद होने से पहले भी जीवन चलता था।
फिर से, लेख अछ्छा लगा।
Ravi Kamdar द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

आर्य और द्रविड़ सभ्यताएँ अलग-अलग थीं, मेरी समझ में यह मानने का कोई पुख़्ता आधार नहीं है। हाँलाकि भाषा के दृष्टिकोण से ऐसा ज़रूर कहा जा सकता है, लेकिन कई सारे तथ्य ऐसे भी हैं जिन्हें नज़रअन्दाज़ करना मुमक़िन नहीं है। जैसे कि द्राविड़ भाषाओं के मुत्ता (मोती या संस्कृत में मुक्ता) आदि अनेक ऐसे शब्द हैं, जिनका व्युत्पत्ति-मूलक अर्थ केवल संस्कृत के आधार पर ही स्पष्ट किया जा सकता है और मूल रूप से वे सभी पदार्थ दक्षिण के ग़ैर-संस्कृतभाषी क्षेत्रों में ही होते हैं। यह तर्क भी उतना ही मज़बूत है कि एक ही मुख्य जाति की दो उपशाखाएँ संस्कृत और द्राविड़ भाषाओं का इस्तेमाल करती थीं।
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

पहले तो एक बढ़िया लेख लिखने पर बधाई(वैसे तो आपके अधिकतर सारे ही लेख बढ़िया होते हैं)!!  पर एक बात तो बताओ भई, विषय है “मेरे जीवन पर धर्म का प्रभाव” परन्तु वह तो आपने बताया ही नहीं, बल्कि धर्म की अच्छी खासी व्याख्या कर डाली!!  और मज़े की बात यह है कि अभी तक जिसने भी लिखा है उसने धर्म की परिभाषा ही लिखी है, न कि विषय पर!!
मुर्तीपूजा पर ये आरोप लगते है कि जो पत्थर का भगवान खुद की रक्षा नही कर सकता वह दूनिया की रक्षा कैसे करेगा
यह तो मात्र करने के लिए कटाक्ष किया जाता है अन्यथा जो अल्पबुद्धि नहीं है उन्हें इस बात का ज्ञान होता है कि मूर्ति ईश्वर नहीं है, वरन् मात्र एक चिन्ह है जिसको ईश्वर स्वरूप मानकर अराधना की जाती है क्योंकि मनुष्य स्वभाव ऐसा है कि वे किसी चीज़ के बजाय शून्य में ध्यान केन्द्रित कर अराधना करना अत्यधिक कठिन होता है, इसलिए साधारण मनुष्य के अराधना करने के लिए मूर्तियों का प्रचलन बढ़ा। परन्तु समय के साथ साथ विचार और मान्यताएँ विकृत होती गई और लोग मूर्ति को ही ईश्वर मानने लगे। (कम से कम मेरा तो ऐसा ही सोचना है कि यही हुआ होगा)
मण्दिरो मे जाकर घंटे बजाकर चिख चिख कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है।
यह भी एक गलत प्रथा चल पड़ी कि घंटे आदि बजाते हुए ही पूजा-अर्चना होनी चाहिए। एक बार मैंने एक विद्वान से पूछा कि ऐसा क्यों कि हम शोर शराबे में अर्चना करते हैं, ईश्वर की अराधना तो शांत माहौल में होनी चाहिए, तो मुझे उन्होंने उत्तर दिया कि लोगों का मानना है कि ईश्वर सो रहा होता है इसलिए उसे जगाकर पूजा की जाती है!! तो मैंने उनसे फ़िर यह न पूछा कि यदि ईश्वर सो रहा है तो फ़िर सृष्टि की देखरेख क्या ईश्वर की सहायिका कर रही है!!
मेरे कर्म यदि फल प्राप्ति के योग्य है तो वह मुझे मिलेगा ही, इसके लिये किसी पूजा, आराधना या आरती की आवश्यकता नही है।
भाई, कर्म का फल तो मिलता ही है, चाहे मीठा मिले, खट्टा मिले या कड़वा मिले। आईन्स्टीन का नियम “every action has an equal and opposite reaction” सही है।
छुवा छुत, परदाप्रथा तो मध्ययुग की देन है।
जहाँ तक मुझे ज्ञात है, परदाप्रथा इस्लाम के साथ आई थी, उससे पहले यहाँ परदाप्रथा न थी।
छुआ-छुत महाभारत काल में मोजुद थी, कर्ण को याद करे.
संजय भाई, वह छूत-अछूत न था, वह तो ऊँची और नीची जाती का मसला था। प्राचीन भारत में कर्म के अनुसार चार जातियाँ थी। जो ज्ञान देता था तथा ईश्वर की साधना करता था, वह ब्राह्मण था, जो समाज की रक्षा करता था वह क्षत्रिय था, जो व्यापार करता था वह वैश्य था तथा जो बाकि अन्य कार्य करता था(जैसे रथ आदि चलाना, सफ़ाई आदि करना) वह शूद्र था। इनमें ब्राह्मण का दर्जा सबसे ऊँचा था, फ़िर क्षत्रिय, उसके बाद वैश्य तथा अन्त में शूद्र। इनके अलावा एक और समुदाय था, वह था दासों का। दास को कोई अधिकार नहीं होता था, वह मनुष्य न होकर एक वस्तु होता था, इसलिए उसका कोई धर्म भी नहीं होता था, उसका कर्म अपने स्वामी की प्रत्येक आज्ञा का पालन करना होता था।
वेदो मे शिव का जिक्र नही है, रूद्र का जिक्र है । रूद्र , शिव, शंकर एक ही देव के भिन्न नाम है ये एक विवाद का विषय हो सकता है ।
रूद्र एक परमशक्ति के रूप में माना गया है, आदि भी वही हैं और अन्त भी। कई अन्य हिन्दु ग्रन्थ आदि में यह पढ़ा है कि रूद्र ने विष्णु की उत्पत्ति की और विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। ब्रह्मा रचियता बनें जिनका कार्य सृष्टि की रचना करना है, विष्णु पालनहार हैं जो सृष्टि की देखभाल करते हैं और रूद्र संहारक हैं जो समय आने पर संहार करते हैं।
Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

सारा दोष मनुस्मृति का है,
मनुस्मृति ही सब भ्रष्ट लोकाचार की कारक है धर्म नहीं।
युगल मेहरा द्वारा दिनांक अप्रैल 4th, 2006

“आईन्स्टीन का नियम ‘every action has an equal and opposite reaction’ सही है।”
अमित भाई, यह आइन्स्टीन का नहीं न्यूटन का नियम है। और आपने जो शिव के बारे में ज़िक्र किया है, वह पौराणिक ही है। वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्) में उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इसलिये उसे इतना प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है।
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006

अभी पूरा नहीं पढ़ा, बहुत लंबा है, गहरा भी। लगता है प्रिंट करके आफ़िस में बैठ कर आराम से पढ़ना पड़ेगा।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006

बहुत खूब ।बढ़िया लिखा।बधाई।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006

अमित भाई, यह आइन्स्टीन का नहीं न्यूटन का नियम है।
ओह, गलती सुधारने के लिए धन्यवाद, ध्यान नहीं रहा!!
और आपने जो शिव के बारे में ज़िक्र किया है, वह पौराणिक ही है। वेदों (संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद्) में उनका कहीं कोई उल्लेख नहीं है। इसलिये उसे इतना प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता है।
मैंने तो कहा ही नहीं भाई कि यह प्रामाणिक है, मैंने भी तो यही कहा कि पौराणिक हिन्दु कथाओं में यह कहा गया है।  वैसे भी, जहाँ तक मुझे ज्ञात है, न तो रामायण प्रामाणिक है और न ही महाभारत, और न ही महर्षि व्यास के अस्तित्व का प्रमाण है जो कि महाभारत काव्य के लेखक हैं।
Amit द्वारा दिनांक अप्रैल 5th, 2006

[…] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल नि� ल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्� ा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल […]

जोगलिखी » चिट्� ाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये द्वारा दिनांक अप्रैल 16th, 2006
[…] अनुगूंज 18 के लिए इन्होने लिखा हैं : दुनियाँ मेरी नजर से (अमित) (30 मार्च) जोगलिखी (संजय बेंगाणी) दिनांक 1 अप्रैल दस्तक (सागर चन्द नाहर ) दिनांक 2 अप्रैल खाली-पीली (आशीष श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल नि� ल्ला चिंतन (तरूण) दिनांक 4 अप्रैल छींटे और बौछारें (रविशंकर श्रीवास्तव) दिनांक 4 अप्रैल निनाद गाथा (अभिनव) दिनांक 5 अप्रैल मेरा पन्ना (जितेन्द्र चौधरी) दिनांक 5 अप्रैल बीच-बजार (परग कुमार मण्डले) दिनांक 5 अप्रैल उन्मुक्त (उन्मुक्त) दिनांक 9 अप्रैल झरोखा (शालिनी नारंग) दिनांक 10 अप्रैल उडन तश्तरी (समीरलाल) दिनांक 11 अप्रैल फ़ुरसतिया (अनूप शुक्ला) दिनांक 12 अप्रैल मन की बात (प्रेमलता पाण्डे) दिनांक 12 अप्रैल (ई-स्वामी) दिनांक 14 अप्रैल मेरा चिट्� ा (आशीष) दिनांक 14 अप्रैल इधर उधर की (रमण ) दिनांक 14 अप्रैल […]
चिट् ाकारों द्वारा लगभग 18,000 शब्द लिखे गये at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक अप्रैल 17th, 2006

[…] सागर चन्द नाहर कुछ युं दस्तक देते हैं धर्म के द्वार पर� “धर्म का मतलब हैं “मानवता“, और हमारे देश और समाज की उन्नती”. साथ ही उन लोगो के प्रति असंतोष व्यक्त करते हैं जिन्हे हर बात में नुक्स निकालने की आदत होती है ओर अपने बै-सिर पैर के तर्कों से कभी धर्म तो कभी समाज को बदनाम करते रहते है, उन्हे अपना जैन धर्म उसके सिद्धान्तों ‘सत्य ओर अहिंसा’ की वजह से बहुत पसन्द है, � लेकिन आडम्बर उन्हे पसन्द नहीं, हाँ परिवार कि खुशी के लिए वे धार्मिक अनुष्� ानों में हिस्सा जरूर लेते हैं. चलिये सागर चन्दजी आप अपने तर्को के साथ धर्म को बदनाम करने वालो से लोहा लिजीये, हम आपके साथ हैं. � आशीष श्रीवास्तव साहब ने तो काफी विस्तार से लिखा हैं और आवश्यक हुआ वहां काका कलेल्कर, विवेकानन्द, कृष्ण आदी को उधृत किया हैं, गीता के श्लोक भी रखे हैं. लेख कि शुरूआत हिन्दू धर्म का नामांकरण कैसे हुआ� से करते हुए इस सनातन धर्म के आधार वेद ग्रंथो का अर्थ भी समझाते हैं � “भिन्न भिन्न कालों में भिन्न भिन्न व्यक्तियों द्वारा आविष्कृत आध्यात्मिक सत्यों का संचित कोष”. सनातन धर्म कि विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं “सनातन धर्म पर यह आरोप लगता है कि इसमे ना जाने कितने देवी देवता है। यही तो मेरे धर्म की महानता है हर किसी को अपने आप मे आत्मसात कर लेने की।“ बावजुद इसके कि वे स्वीकरते हैं “मण्दिरो मे जाकर घंटे बजाकर चिख चिख कर आरती करने वाला धर्म मेरा नही है।“ तब उनका धर्म कौनसा हैं? इसका भी सुन्दर जवाब हैं उनके पास, पढिये “कोई भी धर्म किसी भी दूसरे धर्म से ऊंचा या नीचा नहीं है। सभी धर्मों की मंजिल व ध्येय एक ही मानव मात्र का कल्याण है और यही मेरा धर्म है।“ यानी मानवता ही आपका धर्म हैं. � […]
अवलोकन : अनुगूजँ 18- मेरे जीवन में धर्म का महत्व at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक अप्रैल 24th, 2006

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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