प्रगति का मार्ग

शुक्रवार, जून 09, 2006


हमारा देश हमेशा प्रगति के मार्ग पर रहता है, इसका मूल कारण यह है कि मार्ग पर हमेशा कार्य चलते रहता है। मार्ग पर कार्य रूकने का मतलब होता है प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। हर तरफ पहले गहरे गड्डे खोदना, उसमे से अलग अलग तरह के पाईप निकाल कर रख देना। कितने ही तरह की पाईप-लाईन होती है पीने के पानी की, गटर लाईन(ये दोनो पास पास ही होती है, आवश्यकता होने पर एक दूसरे की मदद करती है),टेलीफ़ोन की, बिजली की, गैस की,टाटा की, रिलायंस की… वगैरह वगैरह। इन सभी पाईपलाईने किसी हसीना की चोटी के बालो की तरह एक दूसरे से गुंथी हुयी रहती है। ये गुंथन वे कैसे सुलझाते है, यह प्रश्न मुझसे सुलझाते नही बनेगा। हां तो मै कह रहा था कि रास्ते खोदकर, बाजु मे मिट्टी के पहाड खड़े कर दिये जाते है। अभी स्कूलों मे छुट्टियाँ है। बच्चों के लिये हर जगह शिविर लगे हुये है। रास्ते के किनारे ये मिट्टी के पहाडो का उपयोग पर्वतारोहण के शिवीर के लिये किया जा सकता है। समय भी बचेगा और पैसा भी।

पहले रास्तो के किनारे गढ्ढे खोद कर दुर्घटना से बचने बांस से एक कठघरा बना दिया जाता था। लेकिन इस कठघरों से टकरा कर दुर्घटना ज्यादा होती थी। अब कठघरा ना होने के बावजूद दुर्घटना कम हो गयी है। इसका कारण यह है कि कठघरा ना होने से लोग पूरी सावधानी से चलते है ! रास्ते पर एक समय मे अनेक तरह के कार्य चलते रहते है, साथ मे यातायात भी चलते रहता है। इस कारण अनेक बाधाओं का निर्माण होता है। इन बाधाओ(गढ्ढो और मिट्टी के ढेरो) के बीच से चलना एक चमत्कार है। यदि इस जगह बाधा दौड की तैयारी करवायी जाये तो २००८ मे बीजिंग ओलंपिक का स्वर्ण पदक हमारी झोली मे ही आयेगा। स्वर्ण इतिहास लिखने की यह एक स्वर्ण संधि है यह !

पहले छोटे मोटे कारणो से “रास्ता रोको” आयोजित होता था,पानी के जैसे क्षुद्र कारणो पर भी ! उससे पहले पानी के मुद्दे पर नलो पर सिर्फ झगडे हुआ करते थे। इस ‘रास्ता रोको’ आंदोलनो से आंदोलनकारीयो को छोड़कर सभी को परेशानी हुआ करती थी। अब ये आंदोलन अपने आप बंद हो गये है। कारण यह है कि रास्तो पर चल रहे कार्य के से हर तरफ ट्रैफिक जाम है। सभी वाहन पहले से ही रुके हुये है,अब रास्ता रोक कर क्या करे ?

कोई कहेगा कि ऐसे ट्रैफिक जाम से देश का कीमती समय, शक्ति और पैसा व्यर्थ जाता है। लेकिन इन लोगो यह समझ मे नही आता कि सारी तरफ यातायात रूक जाने से पेटोल की कितनी बचत होती है। कितनी विदेशी मुद्रा बचतीं है। “पेट्रोल की बचत यानी पेट्रोल का निर्माण” ! इस तरह से हम पेट्रोल का निर्माण करते रहे तो एक दिन ऐसा आयेगा की हम अरब राष्ट्रों को पेट्रोल बेचेंगे! वैसे भी हमारी शक्ति व्यर्थ नही जाती है। ट्रैफिक मे फंसकर एक जगह बैठे होने से शक्ति कैसे बर्बाद होगी ? उल्टे लोग सुबह सुबह जागींग कर अपनी शक्ति(कैलरी) बर्बाद करते है !

लोगबाग आजकल काफी सोना(स्वर्ण) ख़रीद रहे हैं ,सोने की किमंते आसमान छूने के बाद भी। इसका असली कारण ट्रैफिक जाम मे छुपा है। इस ट्रैफिक के कारण चोरो की संख्या मे कमी आयी है, खास कर सोने की चेन या मंगलसुत्र खींच के भाग जानेवालों की। बेचारा चोर घट्ना स्थल पर ही माल के साथ बरामद हो जाता है। जिस ट्रैफिक मे हम ढंग से चल नही सकते,चोर भागेगा कैसे ? चोरो और चोरी मे कमी का श्रेय पुलिस का नही ट्रैफीक जाम का है।

पकडे गये चोरो का या अपराधियों का मुंह खुलवाने पुलिस ‘थर्ड डिग्री’ का प्रयोग करती है।(शिक्षण मे ही नही, नौकरी मे, कहीं भी थर्ड डिग्री का ही बोलबाला है !) पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।

कभी कभी ऐसे ट्रैफिक जाम मे रूग्णवाहीनी फंस जाती है, जाने के लिये जगह नही होती। मरीज उपर जाने के मार्ग पर होता हओ। इस परिस्थिती मे रूग्णवाहिनी शववाहिनी मे रूपांतरीत ना हो ऐसी मनोभावना होती है। लेकिन नियति के आगे किसकी चलती है !

कुछ जगह पर रास्ता चौडे करने के लिये जगह ही नही बची है,उड्डान पूल बनाना मजबूरी है। लताजी कहती हैं कि इससे उन्हे परेशानी होगी। अब इसमे गलत क्या है ? लोगो ने खिडकी के किनारे गाडी खडी कर आटोग्राफ मांगना शूरू कर दिया तो ? उड्डान पूल पर ही ट्रफिक जाम हो जायेगा ! क्या मतलब रहा पैसे बरबाद कर पूल बनाने का ?

देखा गया है कि शापिंग माल के आसपास ट्रैफिक जाम ज्यादा होता है। वैसे ये नजारा फुटपाथ की दूकानो के बाहर ‘माल′ के कारण भी पैदा होता है। लेकिम ट्रैफिक जाम और शापिंग मे एक अटूट रिश्ता है।आप अपनी सीट पर डमी बिठाकर शान से शापिंग कर के वापिस आ सकते है।

आस्तिको की मदत के लिये लोगो ने फुटफाथ पर छोटे छोटे मंदिर बना दिये है। लोग रास्ते मे चप्पलो जूते सहित खडे खडे पूरे मन से भगवान के दर्शन कर सकते है। पैरो मे चप्पल/जूते होने से मन भगवान प्रतिमा की तरफ ही होता है,चप्पल/जूते चोरी होने का डर जो नही होता है।

सुना है कि रास्ते चौडे हो रहे है। इसके लिये सडक किनारे के पेड काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे होंगे, नये वाहनो के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। ये मालूम होने पर कार कंपनीयां अपना उत्पादन बढा रही हैं। बाजार मे कारो के नये नये माडेल आये हैं। अनेक बैंक लोगो के पीछे हाथ धोकर पिछे लगे है। आप कार लिजिये, हम कर्ज देते है !

कल मुझे एक बैंक से फोन आया। एक कर्णप्रिय मधूर आवाज “मै लेनादेना बैंक से बोल रही हूं”
हम : “हां जी कहिये !”
उसने प्रश्न पूछा “आपके पास गाडी है ?”
हम : ” हांजी है”
वह : “कौनसी गाडी है ?”(जैसे कह रही हो तुम्हारे पास मारूती या होंडा हो तो उसे बेच डालिये और रोल्स रायस , बेण्टले, बी एम डब्ल्यु या मर्सडीज खरीदीये। हम कर्ज देते है।)
हमने उत्तर दिया “बैलगाडी, अभी तो मैने उसे अपने गांव मे ही रखी है।”
उत्तर मे आवाज आयी “भडाक” !

हमारी समझ मे आज तक ये नही आया कि कन्याये फोन को इतनी बेदर्दी से क्यों पटकती है !
****************************************************************
5 टिप्पणीयां “प्रगति का मार्ग” पर

अरे यार क्या लिखते हो माउसतोड़ के! खासकर ये पढ़कर-
पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006

…पिछले कमेंट के आगे
बहुत मजा आया।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006

हकीकत बयान की है आपने।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 10th, 2006

ही ही ही, सही लिखे हो आशीष भाई!!
Amit द्वारा दिनांक जून 10th, 2006

[…] क्या आशीष खाली-पीली चिंता कर रहे हैं? सुना है कि रास्ते चौडे[यथा] हो रहे है[यथा]। इसके लिये सडक[यथा] किनारे के पेड[यथा] काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे[यथा] होंगे, नये वाहनो[यथा] के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। […]
DesiPundit » Archives » प्रगति पर उतारू भारत द्वारा दिनांक जून 11th, 2006

आगे पढे़....

सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’

बुधवार, जून 07, 2006


चेन्नई मे कार्य करते हुये एक वर्ष बीत चुका था । एक ही कार्य की नीरसता से मन उब गया था । किसी परिवर्तन की आवश्यकता महसुस हो रही थी । ऐसे मे प्रदीप ने एक शाम खाने के समय कहा चलो कन्याकुमारी चलते हैं । अंधा क्या चाहे , दो आँखें । बिना सोचे विचारे कह दिया, चलो चलते है । अगले दिन आँफिस आ कर सहकर्मीयों से बात की। तब एक और महाशय श्रीनिवास भी तैयार हो गये । आनन फानन कार्यक्रम बना । चल दिये हम तीनों सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’ ।

हमारा ‘’चेन्नई कन्याकुमारी'’ एक्सप्रेस से आरक्षण था । जो चेन्नई से शाम 5:15 बजे चल कर दूसरे दिन सुबह 8:00 बजे कन्याकुमारी पहुंचती है । रेल नीयत समय पर चेन्नई से रवाना हुई । हमारे डिब्बे मे अधिकतर लोग दक्षिण भारतीय थे , जो अपने अपने कार्यो से मदुरै या किसी और जगह जा रहे थे । पर्यटन की दृष्टि से यात्रा करने वाले सिर्फ हम तीनों थे । चेन्नई से बाहर निकलते ही मन काफी हल्का हो गया । दैनिक जीवन का सारा मानसिक बोझ शहर मे ही छूट गया ऐसा महसूस हो रहा था । हम तीनों काफी देर तक बच्चो की तरह खिड़की के बाहर देखते रहे , और बाते करते रहे । रात्री के 10:00 बजे के आसपास हम लोगो ने भोजन किया और सो गये ।

सुबह 6:00 बजे प्रदीप ने मुझे यह कहते हुये जगाया ‘’भाई साहब , सपने देखना बंद करो और बाहर के नज़ारे देखो'’ । मैने भुनभुनाते हुये आँखें खोलकर बाहर देखा और देखता ही रह गया । रेल उस वक्त पहाड़ों के किनारे किनारे धान के खेतो के बीच से ग़ुज़र रही थी । जिधर नजर उठावो उधर धान के खेत और नारियल के उंचे उंचे पेड नजर आ रहे थे । पृष्ठ-भाग मे पहाड़ों की चोटियों पर अठखेलियां करते बादल हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों सा नज़ारा पेश कर रहे थे । कुदरत ने अपनी खूबसूरती यहां दिल खोल के बाटीं है । थोडा आगे चलने पर रेल मार्ग के दोनो ओर पवन चक्कीयों की कतारे दिखाई देने लगी । पहाड की तलहटी मे धान के खेत और, दोनो ओर से पवन चक्कीयों की कतारो के बीच से होते हुये हमारी रेल गुजर रही थी । कन्याकुमारी के पहले एक स्टेशन है ‘’नागर कोइल′’,इस स्टेशन पर हमारी रेल पुरी खाली हो चुकी थी । हमारे डिब्बे मे हम तीनों ही बचे थे ।

जब हम कन्याकुमारी पहुचें तब हम लोग आश्चर्य मे पड गये । हमे लगा था कि स्टेशन पर उतरते ही हमे कुली , टैक्सी वाले घेर लेगें ज़ैसा कि अन्य पर्यटन स्थलों पर होता आया है। स्टेशन पर चाय , काफी और नाश्ते की आवाज लगाते दुकानदार होंगे । आशा के विपरीत कन्याकुमारी का रेलवे स्टेशन उजाड और वीरान सा था । स्टेशन पर सिर्फ दो प्लेटफॉर्म और एक चाय पान की दुकान थी । हमे सबसे पहले ठहरने के लिये एक होटल या धर्मशाला की तलाश थी । रेलवे स्टेशन पर ही विवेकानंद स्मारक का कार्यालय बना हुवा है जहां से विवेकानंद स्मारक आश्रम मे कमरे किराये से लिये जा सकते है । उस वक्त वो भी बंद पडा हुवा था पुछने पर पता चला कि आज कल वो बंद ही रहता है ।

रेलवे स्टेशन से बाहर आकर हमने विवेकानंद स्मारक आश्रम के लिये आटो किया । ये आटोवाले कन्याकुमारी मे कही भी 20 रू मे पहुंचा देते है । रास्ते मे आटोवाले ने हमसे पूछा कि हम विवेकानंद स्मारक आश्रम ठहरने जा रहे है या देखने । जब हमने उसे कहा कि हम वहां ठहरने जा रहे है तब उसने हमे सलाह दी कि विवेकानंद स्मारक आश्रम मे ठहरने की बजाय हम त्रिवेणी संगम के पास किसी होटल मे ठहरे जिससे सूर्योदय और सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखने मे आसानी होगी । हमने उसकी बात मानते हुवे त्रिवेणी संगम के पास ठहरने का निश्चय किया । आटोवाला हमे एक सस्ते और अच्छे होटल मे छोड़ गया। होटल मे नहा धोकर तैयार होने के बाद हम कन्याकुमारी घूमने निकले ।

कन्याकुमारी एक काफी छोटा सा कस्बा है । कन्याकुमारी मे सारे दर्शनीय स्थल 500 वर्ग मी मे ही है। देवी कुमारी का मंदिर ग़ांधी स्मारक विवेकान्द शिला और ॠषी थिरूवल्लुवर प्रतिमा एक दुसरे से सटे हुवे है ।सिर्फ विवेकानंद स्मारक आश्रम ही थोड़ी दूरी 1 की मी पर स्थित है। हमने देवी कुमारी के मंदिर से शुरूवात की। दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह यहां दर्शन के लिये बदन पर आप अगंवस्त्र या अंगोछा पहन कर ही जा सकते है । मंदिर के पुजारी ने बताया कि कुछ वर्षो पहले तक पुरूषो के लिये धोती या लुंगी तथा अगंवस्त्र और महिलाओ को साड़ी ही पहन कर दर्शन की ही अनुमती थी । अब पुरूषो को पतलुन की छुट मिल गयी है लेकीन बदन उघाडा या अगंवस्त्र से ढंका चाहिये । महिलाओ को साडी या सलवार की अनुमति है। जब हम मदिंर के अंदर पहुचे देवी का स्नान चल रहा था । देवी स्नान के लिये चंदन चुरा, जल और भी काफी सारी चीजों का उपयोग किया जाता है । गर्भगृह मे शहनाई तथा पखावज का वादन हो रहा था । मै खुद को 12 वी सदी मे महसुस कर रहा था । यह मंदिर ज्यादातर दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह चार प्रवेशद्वारों से सुसज्जीत है । पुजारी ने बताया की पूर्व का दवार अब बंद ही रहता है क्योकि समुद्र के नाविक देवी के नाक की हीरे की नथ की चमक से दिशा भ्रमीत हो जाते थे । यह मंदिर काफी पुराना और खूबसूरत है । मंदिर दर्शन के लिये सबसे उपयुक्त समय 11:00 सुबह का है इस समय देवी की आरती होती है । आरती मे दक्षिण भारतीय वादय यन्त्रो का उपयोग होता है। मन तथा वातावरण भक्ती के रस से सराबोर हो जाता है। मेरे जैसा नास्तिक इस गीत ,संगीत, आरती के आल्हादक वातावरण से प्रभावित हुये बिना नही रह सका ।

देवी दर्शन के बाद हमने शुछिन्द्र मंदिर जाने का विचार किया। यह मंदिर करीब 1300 साल पुराना है । इसे चोल राजाओ ने बनवाया था। मंदिर कन्याकुमारी से 18 कि मी की दुरी पर है। यहां आप बस या टैक्सी से जा सकते है । हम लोगो ने एक टैक्सी तय कर ली । मदिर का मार्ग हरियाली से भरपुर और रमणीक है । हमारा टैक्सी चालक काफी बातुनी था । वो रास्ते मे पडनेवाली हर चीज के बारे मे बताते जा रहा था । हम लोग 20 मी मे मंदिर पहुच गये। टैक्सी चालक ने हमे चप्पलें और कमीज टैक्सी मे ही छोड देने कहा । जैसे ही हम मंदिर परिसर के अंदर पहुचे एक गाइड हमारे साथ लग गया । वो हमे मार्ग दिखाते हुवे हर मूर्ति के बारे मे बताने लगा । मंदिर परिसर काफी विशाल है । सबसे पहले हम हनुमान जी की 80 फीट उचीं एक ही पत्त्थर मे तराशी मुर्ती के पास पहुचे । इस मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया जाता है । कहा जाता है हनुमान जी ने लकां दहन के बाद यहीं पर अपनी पुंछ की आग बुझायी थी । हम लोगो ने भी मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया । पश्चात हम लोग अंदर पहुचे । गाइड हमे मदिर के अंदर घुमाता हुवा हर मूर्ति के बारे मे बताता जा रहा था । यहा एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ नदीं, ग़णेश, क़ार्तीकेय की विशालकाय मूर्तिया है । इन मूर्तियों को देख कर आश्चर्य होता है कि उस काल मे जब तकनीक इतनी विकसित नही थी यह निर्माण किस तरह से कीया गया होगा । हम लो चोल राज की एक मूर्ति के पास पहुंचे देख कर विश्मय मे पड गये ।यह मूर्ति भी एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ है क़ितुं इसमे चोल राजा, रानी, दो दरबान तथा पूरा मडंप संम्मीलीत है । हम शिव मंदिर पहुचे । शिव लिंग के दर्शन किये । यह मदिर सुबह 6:00 से 11:00 तक तथा शाम 4:00 से 6:00 बजे तक ही खुला रहता है । इस मन्दिर परिसर के खम्बो को बजाने पर संगीतमय ध्वनीयां निकलती है । गाइड ने हमे इन खम्बो पर जलतरंग तथा सरगम बजा कर आर्श्चयचकीत कर दिया । गाइड हमे मंदिर परीसर से बाहर ले आया। हमने गाइड को उसका पारिश्रमीक दिया और चल दिये अपने अगले पड़ाव की ओर ।

टैक्सी चालक हमे वापस कन्याकुमारी की ओर ले चला । मार्ग मे उसने एक पहाडी के निचे टैक्सी खडी कर हमे बताया कि यह संजीवनी पर्वत है, उपर एक शिव मंदिर है । यहां पर बाहर यहां काफी कम लोग आते है। हम लोग चल दिये शिव मदिर की ओर । लगभग 500 सीढीया चढने के बाद हम मंदिर तक पहुच गये । यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा मंदिर है । गुफा के अंदर एक शिव लींग है । शिव लींग के दर्शन कर बाहर निकलने पर सामने उचांई से कन्याकुमारी का मनमोहक नजारा दिखाई दिया ।

इसके बाद हमारा अगला पडाव था विवेकानंद आश्रम।यह आश्रम अब उजाड सा है। आश्रम मे एक विश्रामगृह और प्रदर्शनालय है। प्रदर्शनी मे स्वामी विवेकानंद की कुछ वस्तुये रखी हुयी है। यहां पर विवेकानंद साहित्य भी बिक्री के लिये उपलब्ध है। मन आश्रम की हालत को देख कर निराश हो गया था।

वापिस कन्याकुमारी पहुंचने पर हमारे पास देवी कुमारी मंदिर के आसपास के दो तीन स्थल बचे हुये थे। सबसे पहले गांधी स्मारक पहुंचे। महात्मा गांधी की अस्थियां सागर मे विसर्जन से पहले यहां रखी गयी थी। उस जगह एक चबुतरा बना हुआ है। यह मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है कि यह मण्दिर मस्जिद और चर्च सभी का आभास देता है। दो अक्तुबर को दोपहर मे ठीक बारह बजे मंदिर के छत पर बनाये गये एक सूराख से चबुतरे पर सूर्य किरणे पडती है।

अब बारी थी विवेकानंद शीला और थिरूवल्लुवर प्रतिमा की। यहां जाने के लिये आपको नाव से जाना होता है। ये नाव आपको हर २० मिनट मे मिल जायेगी। नाव पहले विवेकानंद स्मारक और उसके बाद थिरूवल्लुवर प्रतिमा जाती है।

विवेकानंद शीला एक काफी बडी सी चट्टान है। इस पर एक देवी कुमारी का मण्दिर और विवेकानंद स्मारक है। इस जगह पहुंचने के बाद सबसे पहले हमने एक कक्षा मे शामिल हुये,। यहां इस स्मारक के बारे मे जानकारी दी जाती है। कक्षा के बाद देवी कुमारी पहुंचे। मण्दिर मे देवी कुमारी के एक पांव का निशान है। कहा जाता है कि देवी कुमारी ने शिव की पति के रूप मे प्राप्ति के लिये यंहा एक पांव पर तपस्या की थी। स्वामी विवेकांनन्द ने जहां पर तीन दिनो के लिये समाधी ली थी, वहां पर एक बड़ा सा कमरा है, लोग वहां पर जाकर कुछ देर तक मौन धारण कर साधना या प्रार्थना करते है। यहां पर से भी आप विवेकानन्द साहित्य खरीद सकते है।

अगला पडाव थिरूवल्लुवर प्रतिमा थी, यह प्रसीद्ध तमिळ कवी की प्रतिमा है । तमिळ्नाडु मे उन्हे वाल्मिकी के बराबर दर्जा दिया जाता है। यह प्रतिमा विशालकाय है। प्रतिमा के अंदर कुछ उंचाई तक चढकर जाया जा सकता है। यंहा हवा इतनी तेज चलती है कि खुद को सम्हालना मुश्किल हो जाता है।

हमारा कन्याकुमारी भ्रमण पूरा हो चुका था, अब इंतजार था शाम का, जब अरब सागर मे डूबते सुरज का मनोहारी दृश्य देखना था। हमारी किस्मत खराब थी। बाद्ल नही छाये थे, सुरज उत्तरायण मे था। सुरज सागर मे डुबते दिखायी देने की बजाये पहाड़ियों के पीछे छुप रहा था ।

कन्याकुमारी की यात्रा पूरी करने के बाद हम चल दिये त्रिवेन्द्रम। यह अगले यात्रा वृतांत मे।


4 टिप्पणीयां “सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’” पर
वाह! आशीष,
बहुत खुब वर्णन किया है, और फ़िर छायाचित्रों के साथ तो यह प्रविष्टी परिपूर्ण ही हो गई है.
वाकई, बहुत अच्छा लिखे हो, बस, मात्राओं की तरफ़ थोड़ा और ध्यान दे देने की आवश्यकता लग रही है.
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

बहुत खूब । बढ़िया लिखा।हमारे पास तो कन्याकुमारी तथा त्रिवेन्द्रम की काली-सफेद फोटो हैं। तुम्हारे फोटो से काम चलाते हुये अपना यात्रा विवरण लिखा जायेगा।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

आशीष भाई, बहुत सुंदर लिखा है आपने। ऐसा लगा कि मै पिछले बीस मिनट तक कन्याकुमारी में विचरता रहा। धन्यवाद।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 8th, 2006

सुन्दर
उन्मुक्त द्वारा दिनांक जून 8th, 2006

आगे पढे़....

रांग नंबर

सोमवार, जून 05, 2006


रांग नंबर” यह फोन पर वार्ता का सबसे मह्त्वपूर्ण शब्द है। ऐसे तो हमारे फोन इतिहास मे ना जाने कितने रांग नंबर आते है ,लेकिन कुछ रांग नम्बर हमेशा याद रह जाते है…
ऐसा ही एक रांग नम्बर मुझे आया था।

एक घनघोर अंधेरी रात, बारिश हो रही थी और बिजली जा चुकी थी। बिजली जाने पर हमेशा की तरह मै मोमबत्ती ढूंढ रहा था।वैसे भी मुझे मोमबत्ती हमेशा बिजली आ जाने के बाद ही मिलती है। मै मोमबत्ती शोध मुहिम मे व्यस्त था कि मेरा फोन बजा। फोन उठाने पर एक कर्णप्रिय मधुर आवाज आयी

“हैलो, बिजली आफिस ”
 “नही, रांग नंबर”

हमने जवाब दिया और अपनी मुहीम जारी रखी। (कर्णप्रिय, मधूर आवाज ! समझ गये ना ? )
एक बार फिर से घंटी बजी, वही प्रश्न और वही उत्तर। मैने फोन रखा और मुझे मोमबत्ती मिल गयी। लेकिन अब नयी शोध मुहीम; माचिस ढूढनी थी।

फिर एक बार फोन बजा , फिर वही मधुर आवाज ।मैने संयम ना छोडते हुये, उसे उत्तर देने का निश्चय किया।

मै : “हां जी कहिये ?”
वह: “क्या कहिये.. हमारी बिजली चली गयी है?”
मै : “बिजली गयी तो क्या ?”
वह: “तो क्या का क्या मतलब ? आप कर क्या रहे है ?” (तब तक मुझे माचिस मिल गयी)
वह: “अरे सो गये क्या ? हम लोगो को अंधेरे मे रखकर सोने के अलावा आप लोगो के पास कोई और काम नही है क्या ?”
मै : “अभी तो मै माचिस जला रहा हूं”
वह : “क्या ? देखिये। ये आपका रोज का नाटक हो गया है। दिन मे लोड शेडीग और अब रात मे भी !”
मै : “देखिये बहन जी….”
वह : “बहन जी, क्या बात करते है आप ?”
मै : “देखिये आप जो भी कोई है, जो नंबर आपने डायल किया है…”
वह : “वह मुझे कुछ नही मालूम , पहले ये बताईये बिजली कब आयेगी”

वह कुछ सुनने के लिये तैयार नही थी। अब मेरा शैतानी दिमाग जाग गया और मैने भी मौज लेना शुरू किया।

मै : “अच्छा, ये बताईये कब गयी ?”
वह : “सात से आठ के बिच”
मै: “साथ मे कोई था?”
वह : “मतलब ?”
मै: “जब गयी तो कौनसे कपडे पहने हुये थी ?”
वह : “क्या बात कर रहे है आप?”
मै : “क्या उमर होगी उसकी ?”
वह : “दिमाग घूम गया है क्या आपका ?”
मै : “वह तो एक्दम ठीक है, मुझे लगा कि आपके घर का कोई सद्स्य कहीं चला गया है ?”
वह : “बिजली गयी है बिजली”(एक चिढी़ हुयी आवाज, सारी मधुरता गायब)
मै: “ऐसा क्या, आपके बोलने से तो ऐसा लगा कि आपकी सास कहीं चली गयी है।”
वह :“मेरी अभी तक शादी नही हुयी है।”

हूर्रे….बल्ले …. बल्ले…….

मै : “ऐसा क्या, तब तो ये रांग नंबर लग रहा है.. मै तो गुमशूदा विभाग से बोल रहा हूं!”
वह : “रांग नंबर… तो आपने पहले क्यो नही बताया?”

येल्लो और कर लो बात…

वह : “सारी…”
मै : “कोई बात नही, ऐसे ही रांग नंबर लगा दिया किजिये।”
भडाक(फोन पटकने की आवाज आयी)। बिजली भी आ गयी थी !
******************************************

एक और किस्सा। पता नही क्यो, मुझे आने वाले अधिकतर रांग नंबर कन्याओं के क्यो होते है?
घंटी बजी, मैने फोन उठाया। आवाज आयी “हैलो सुरेश !” मैने फोन नही रखा, मालूम था कि अधिकतर रांग नंबर दोबारा कम से कम एक बार और आते है।

वह : “हैलो सुरेश !”
मै : “आधा चाहिये या पूरा ?”
वह : “आप कहां से बोल रहे है ?”
मै : “पृथ्वी नामक ग्रह से ”
वह : “हां हां वह ठीक है, लेकिन आप बोल कहां से रहे है?”
मै : “क्या मैडम, आप भी। सभी तो मुंह से ही बोलते है ना !”
वह : “ज्यादा होशियारी मत दिखाओ, आप है कौन ?”
मै : “एक भारतिय प्राणी”
वह : “लेकिन इस प्राणी का कोई नाम तो होगा”
मै : “नाम मे क्या रखा है , शेक्सपीयर ने कहा था”
वह : “तुम सीधे सीधे बताते हो या फोन रखूं”
मै : “ये हुयी ना अकलमंदी की बात,’रांग नंबर’ पर इतनी देर तक बात कर रही थी आप”
वह : “ओह नो,रांग नंबर क्या ?”

अब ऐसे होते है रांग नंबर….
*******************************************


9 टिप्पणीयां “रांग नंबर” पर
रांग नंबर का चस्का लग गया है तुम्हें। अब कभी सही नंबर लग गया तो बात करने में तकलीफ होगी।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

लगता है कि बहुत प्रार्थना करते होगे कि कोई रोंग नम्बर लगे और कोई मधुर आवाज़ में कुछ पूछे. होशियार रहना, कभी कभी पत्नी या प्रेमिका भी रंगीनदिल आदमी की जाँच करने के लिए सहेलियों से फ़ोन करवा देतीं हैं, इसलिए तमीज़ से बात करने में ही भला है!
सुनील द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

हा हा मजेदार वाकये थे !
Manish द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

मुँह से बोलते हैं क्या ः)) अच्छा लगा
e-shadow द्वारा दिनांक जून 6th, 2006

या ईलाहि, हम ना हुये!!!
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 6th, 2006

हा हा हा मज़ेदार लेख है
अब चुटकुला सुनें
पत्नी आधे घंटे तक फोन से लगी रही। पती ने पूछा किसका फोन है? पत्नी ने कहाः रांग नंबर था।
SHUAIB द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

दिल्लचस्प वाकिये हैं|
हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|
rhythums द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

दिल्लचस्प वाकिये हैं|
हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|
संगीता मनराल द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

Very interesting Story,
did electrick Lady called has came after that,
Ab kabhi bhi esa phone aye tu kahena telephone exchange se bool laha ho, apna no bataye
Rohit द्वारा दिनांक जून 15th, 2006

आगे पढे़....

अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

गुरुवार, जून 01, 2006


बहुत पुरानी बात है, जब हम प्राथमिक स्कूल के छात्र थे। हमारा एक सहपाठी था मुन्नाभाई!

मुन्नाभाई हमारी कक्षा का नेता था, मतलब कि कक्षा कप्तान था। स्कूल के उसके दैनिक कार्यो मे होता था, सुबह सबसे पहले पहुंच कर दरीयों पर कब्जा करना। जी हां आपने सही पढा दरीयों पर कब्जा करना। हमारे स्कूल मे डेस्क बेंच नाम की वस्तुएँ नही हुआ करती थी। १०-१२ फुट लंबी और एक फुट चौडी दरीयां, दरीयां छात्रों की संख्या के हिसाब से उसी तरह कम हुआ करती थी, जिस तरह आई आई टी और आई आई एम की सीटें कम होती है। मुन्नाभाई एक साधारण परिवार से ही था, लेकिन उसके पिताजी सरकारी सेवा मे थे। उसके पास कोई और काम नही होता था,सो स्कूल सबसे पहले पहुँचता था। बाकी जनता का तो ऐसा था पालतू जानवरो को नहला धुला कर, चारा देकर, खेती के मौसम मे खेतो मे कुछ देर काम करने के बाद स्कूल आने का मौका मिल पाता था। जब तक वे पहुंचते ,स्कूल मे दरीयो पर मुन्नाभाई और मित्र मंडली का कब्जा होता था।

नेतागिरी


इसके पश्चात शुरू होती थी उसकी नेतागिरी। हर किसी से कुछ ना कुछ लेने के बाद वह दरीयो मे कुछ हिस्सा आंवटीत कर देता था।अब इस कुछ ना कुछ मे किसी से अमरूद लाने का वादा, किसी से आम का, किसी से मोरपंख लेना, किसी से गृहकार्य करवाना वगैरह वगैरह.. । कुल मिला कर ऐश होती मुन्नाभाई की इस नेतागिरी की वजह से। भारत सरकार की तरह उसने भी दरियो के आंवटन मे एक कोटा निर्धारित किया हुआ था, एक दरी पर वह और उसकी मित्रमडलीं बैठती थी। यह मुन्नाभाई का ऐस वोट बैंक था जो कभी उससे विमुख नही हो सकता था। जिस तरह बिहार और उत्तरप्रदेश मे आपको सत्ता मे रहने के लिये डी पी यादव, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन जैसे लोग चाहिये होते है वैसे ही उसने एक दरी दादा किस्म के लडको के लिये आरक्षित रखी थी। लेकिन वह भारत सरकार से एक मामले मे बेहतर था, उसने कुल लडकियो मे से ३३% को आरक्षण दे रखा था, एक दरी लडकियो के उस समुह के लिये आरक्षित होती थी, जिसमे उसकी वो होती थी। बाकी बचती थी एक दरी और बाकी दरीयो पर बची रिक्त जगह जिसके लिये उसी तरह मारामारी होती थी , जिस तरह से अनारक्षित सीटो लिये होती है। मुन्नाभाई का कोई विरोध इसलिये नही करता था क्योंकि वह कक्षा का कप्तान भी हुआ करता था। अपने वोट बैंक (लडकीया और दादाओ) के बदौलत वह हर साल कप्तान चुना जाता था। कुल मिलाकर इस तरह से कोटा और दादागिरी के भरोसे मुन्नाभाई की नेतागिरी चल रही थी।
मुन्नाभाई की तरह से हम स्कूल पहुंचने वालो मे सबसे पहले हुआ करते थे, लेकिन हमे बैठने के लिये मुन्नाभाई जी की मेहरबानीयो पर रहना होता था। वह मुझे ईमानदारी से जगह दे देता था क्योंकि मै उसे परीक्षा मे नकल जो करवाता था। अब हम सौरभ गांगूली तो थे नही कि ग्रेग चैपल से पंगा लेकर टीम से लतिया दिये जाये। अब ऐसा था कि जमिन पर बैठने की बजाये उसकी दादागिरी सहन करो और टीम मे बने रहो, मेरा मतलब है कि दरी पर बैठो।

राजनीति

अब हम कक्षा १ से १० तक साथ मे पढे। कक्षा ११ से हम दोनो ने अलग अलग स्कूल मे जाना शुरू किया। पढाई लिखायी तो वो ऐसे भी नही करते थे। उसके पिताजी भी उम्मीद छोड चुके थे। लेकिन मैने नही छोडी थी,मुझे मालूम था कि ये बहुत आगे जायेगा। ये कलयुग है, कलयुग मे आगे बढने के लिये जिन गुणो की जरूरत होती है,वह सभी गुण मुन्नाभाई मे हैं। हर किसी से अपने मतलब का काम निकालना उसे अच्छे से आता था। जिस तरीके से अमरीका ने दूसरे के पैसो पर अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत कर रखी है उसी तरह मुन्नाभाई भी इसकी टोपी उसके सर कर ऐश कर रहा था।

इन्ही दिनो ग्रामपंचायत के चुनाव हुये। जिस तरह कांशीराम ने मायावती को राजनिती मे ले आये थे, उसी तरह तत्कालीन सरपंच ने मुन्नाभाई को भी राजनिती मे खिंच लिया। लेकिन मुन्नाभाई की उम्र चुनाव लढने की नही हुयी थी, उन्होने अपनी माताश्री को चुनाव मे खडा कर दिया। अब भारत मे कोई भी काम हो चाहे चुनाव हो या आई आई एम मे प्रवेश, जाति बताये बिना कार्य थोडे ही होता है ? आपकी योग्यता गयी तेल लेने, सबसे महत्वपूर्ण है आपकी जाति। मुन्नाभाई दलित तो नही लेकिन ओ बी सी जरूर था। विरोधी उम्मीदवार एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे, जिसने अपनी सारी जिन्दगी गांव से बुराईयों को दूर करने मे लगायी(बरबाद की) थी। कोई बीमार हो,किसी का स्कूल /कालेज मे प्रवेश हो, कोर्ट कचहरी का काम हो, कोई नयी शासकीय योजना हो, सभी दौडे जाते उनके पास। वे भी बिना किसी स्वार्थ के लोगो का काम करते थे। गांव की शराब की दूकान उन्होने बंद करवाना, झाडफुंक वाले ओझा को गांव से भगाने जैसे समाजिक काम उन्होने किये थे। परंतु उनने ब्राम्हण जाति मे पैदा होने का जुर्म भी किया था। उन्हे विश्वास था कि सारी जिन्दगी के सद्कर्मो का फल उन्हे मिलेगा। वे भी निश्चिंत थे और हम भी। लेकिन चुनाव के एक दिन पहले, मुन्नाभाईजी को अपनी जाति याद आ गयी। रात मे शराब की पेटी भी आ गयी। मास्टर जी हार गये। और मुन्नाभाई ने राजनिती का पहला पाठ पढ लिया ।

नेता

अब मुन्नाभाई अपने विकास मार्ग पर अग्रसर था। गांव मे होने वाले हर विकास कार्य मे वह सहकारी होने लगा था। गांव के विकास कम उसका विकास ज्यादा हो रहा था।

मुन्नाभाईजी बारहवीं मे नकल करते हुये पकड़े गये। अब हुआ ऐसा कि दसवी मे तो मेज़ पर चाकु गडा हुआ था, तो किसी की हिम्मत नही हुयी थी , उसे नकल से रोकने की। एक शिक्षक ने हिम्मत कर कहा भी
 “भाई सबके सामने नकल तो मत करो ?” 
मुन्नाभाई गुर्राये
“ए मास्टर, गांव मे रहना है कि नही ?” 
लेकिन इस बार परीक्षा बोर्ड का उडन दस्ता आया था, पुलिस बंदोबस्त के साथ। मुन्नाभाई जी २ साल परीक्षा देने से वंचित कर दिये गये। इसके साथ मुन्नाभाई नेता बन गये।

मैने गांव छोड़ दिया था, अपनी अभियांत्रीकी के लिये, मुन्नाभाई से कभी कभार मिलना होता रहता था। वह कभी कभार कहता भी था,
“रास्ते पर एक पत्थर भी फेंको तो किसी कुत्ते की जगह इंजीनियर को लगेगा”।
हम मुस्करा देते थे। वो अपनी राजनीति और पहुंच की बाते करते थे। कोई भी मोर्चा हो या आंदोलन अपने चमचो को लेकर बिना टिकट यात्रा करते, वो भी आरक्षित डिब्बे मे। भाई नेता जो ठहरे, उनका तो आरक्षण जन्मसिद्ध अधिकार है, हर जगह। कभी हम कहते भी

“भाई, गांव के विकास के लिये भी कुछ कर ले यार, कितनी समस्या है गांव मे”
वह कहता
“अबे गांव के लोग विकास कर लेंगे तो मुझे वोट कौन देगा ? मुझे पहले अपना विकास करना है, विधायक बनना है, बाद मे सांसद बनना है……”
“यार ऐसे मे तुझे अगली बार वोट कौन देगा ?”
“वही जिसने पिछली बार दिया था, देख गांव मे मेरी जाति के लोग ज्यादा है। ऐसे भी मतदान के एक दिन पहले दारू की पेटी खोल दो। दो घुंट लगाने के बाद सब लाइन पर आ जाते है।”

वही हुआ अगले चुनाव मे मुन्नाभाई गांव का सरपंच बन गया। एक और खबर मिली की उसने बी एस सी और बी एड(शिक्षा स्नातक) भी कर ली है। कैसे नही मालूम। किसी ने उसे किसी भी कॉलेज जाते नही देखा। एक स्कूल खोल दिया है,जिसके संचालक वही हैं।.

कैसा रहा सफर ? नेतागिरी,राजनीति से नेता तक का ? टिप्पणी देना ना भुलें !

ताज़ा खबर यह है कि अपने मुन्नाभाई इस बार ग्रामपंचायत चुनाव हार गये हैं! लेकिन हमे इसका कोई फायदा नजर नही आरहा है। अर्जुन सिंह भी तो पिछले दो चुनाव हार चुके है , लेकिन केंद्र सरकार मे मानव संसाधन मंत्री है।

इस हार के बावजूद हमारा पूरा विश्वास है कि एक ना एक दिन नेता मुन्नाभाई अपनी नेतागिरी और राजनीति की बदौलत काफी उपर जायेगा। सुनील पाल उवाच
“इस देश का हाल ऐसा है कि जो चुनाव जितता है वो एम पी बनता है और जो हारता है वो देश का पी एम बन जाता है”
………………………………………………………………………………………
नोट :इस लेख के सभी पात्र वास्तविक है, सिर्फ नाम बदल दिये गये है।


4 टिप्पणीयां “अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता” पर


आशीष भाई आपने जो लिखा है, शब्दशः सच है। देश को ऐसे हजारों मुन्नाभाई खा रहे हैं। हर गॉव, हर नेता की लगभग यही कहानी है। जो सब जगह से लतियाये गये वो आज नेता हैं और देश का भाग्यनिर्धारण कर रहे हैं।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

आशीष बहुत सही वास्‍तविक बातें लिखी हैं हों भी क्‍यों नही आखिर वास्‍तविक पात्रों के जो बारे में है। और सही मायने में विषय के छुपे अर्थ को बहुत अच्‍छे ढंग से व्‍यक्‍त किया है। तीनों बातें एक ही वक्‍त में आपस में अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़ी हैं। सबसे पहले लिखने की बधाई भी स्‍वीकार करें।
Tarun द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

पुरातन काल में जब वाल्मिकिजी ने मरा मरा का जाप किया तो रामजी सचमुच सहाय हो गये..
आज कल के सद्पुरूष ताने खा खा कर नेता बन जाते है
nitin द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

मेरे भी हाल ही में एक ऐसे ही महानिभाव से परिचय हुआ था। दरअसल राजनीति, और ऐसी कितनी ही बातें हमें पढ़ाई नहीं जातीं। अगर पढ़ाई जाएं, तो फिर कुछ हो सकता है।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

आगे पढे़....

मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

  © Hindigram Khalipili by Hindigram 2011

Back to TOP