एक प्रेम (?) कथा

रविवार, जुलाई 30, 2006

निधीजी के चिठ्ठे पर एक मजनू के बारे मे पढा, मेरे आस पास तो मजनूओ की भरमार रही है। सोचा चलो एक के बाद एक मजनूओ के किस्से लिखना शुरू कर दे।

ये किस्सा है उन दिनो का जब मै नया नया दिल्ली पहुंचा था। हम लोग कुल आठ लोग एक ही फ्लैट मे काल्काजी मे रहते थे। सभी के सभी नागपूर और उसके आसपास के क्षेत्र से थे। कुछ नौकरी करते थे, कुछ सघर्ष कर रहे थे। फ्लैट का खर्च नौकरीशुदा लोगो की जिम्मेदारी थी। जो संघर्ष कर रहे थे, उनका एक काम था, दिन मे अपना बायोडाटा बांटना, साक्षात्कार देना और रात मे पढना। मौज मस्ती इन लोगो के लिये वर्जित थी।

राजेश, प्रवीण और कमलेश दोनो नौकरी कर रहे थे, मैने मुंबई की नौकरी छोडकर गुडगांव मे एक कपंनी मे काम शुरू किया था। हम चारो का सप्ताहांत मे मौज मस्ती का कार्यक्रम होता था। दिन भर आवारागर्दी और शाम को किसी अच्छी जगह खाना। मै शराब पीता नही लेकिन मेरे अधिकतर दोस्त अखंड बेवडे रहे है। दारू की पूरी बोतल अंदर कर जाते हैं और हिलते भी नही हैं। शाम को मेरा काम होता था, बैरो को समझा बुझा कर शांत करना। अब क्यों ? अरे दारू पीने के बाद कमलेश और राजेश दोनो मे दिल्ली की सल्तनत के शहनशाहो की आत्मा जो सवार हो जाती थी। उसके बाद टूटी बोतल , गिलास, प्लेटो की किमत के साथ खाने का बील का भुगतान करना। एक एक को लाते मारते हुये कार मे लादना, पुलीसवालो से बचते, हाथ पैर जोडते हुये अपने घर पहुंचना।

एक ऐसी ही शनीवार की शाम मेरी मुलाकात हुयी सुरेश से(नाम् बदला हुआ है)। ६ बोतल बियर पिने के बाद उन्होने कम से कम ‘२० रन’ बनाये थे,मतलब कि खाने की मेज से टायलेट उल्टी करने के लिये। पता चला कि वो भी भंडारा(नागपूर से १०० की मी दूर) से है। उसकी मम्मी दिल्ली मे एक अस्पताल मे काम करती है। वो कभी कभी दिल्ली आता है, महिने दो महिने रह्ता है और वापिस चला जाता है। रात मे सुरेश मे घर जाने की हिम्मत तो थी नही, वो भी हम लोगो के साथ रूक गया। मै सुबह अपनी दौड लगाने के बाद वापिस आया तो वह उठ चुका था। बाकि सभी तो घोडे बेचकर सो रहे थे।

सुरेश ने मुझे कहा कि “ये सभी तो कम से कम दो तिन घंटे बाद सोकर उठेंगे , तु मेरे साथ घर चल। मम्मी से मिल लेना, साथ मे चाय नास्ता भी हो जायेगा“। घर के खाने के नाम पर तो मै काल्का जी से एक शादीशुदा दोस्त के घर रोहीणी तक लगभग ३० किमी दूर भी चला जाता था। मै चल दिया उसके साथ। उसके साथ उसके घर के पास पहुंचे, सामने की फ्लैट की बालकनी पर एक खूबसूरत कन्या खडी थी। मेरी नजरे उसकी तरफ गयीं कि उसने एक उड्ता हुआ चुंबन उछाल दिया। मै चकराया ये क्या ? क्या आज मै इतना जम रहा हूं ? सुरेश ने गलतफहमी जलदी दूर कर दी “उछल मत , वो तेरे लिये नही मेरे लिये था!”
खैर उसके घर गया , ‘काकू’(सुरेश की मम्मी) से मिला। नाश्ता ही नही, दोपहर का खाना भी खाकर वापिस आया। फ्लैट मे आने पर प्रवीण ने पूछा कि मै कहां गया था। मैने बताया कि सुरेश के साथ उसके घर गया था। तब प्रवीण ने मुझे सावधान किया कि उसके घर जाने मे कोई परेशानी की बात नही है, लेकिन उसके साथ घुमना फिरना नही। बात मे मुझे पता चला कि सुरेश का बस एक ही शौक था। लडकीयो को अपने जाल मे फांसना और अपना काम निकालना, मतलब कि अय्याशी करना। काम निकलने के बाद , वह नये शिकार की तलाश मे लग जाता था। अब तक पता नही कि कितनी लडकिया उसके जाल मे फंस चूकी थी, ये किसी को नही मालुम था। पता नही उसमे ऐसा क्या था, लडकिया खिंची चली आती थी।

हम लोग को उसका साथ पसंद नही था लेकिन काकू का स्वभाव काफी अच्छा था। सुरेश जब दिल्ली मे नही होता था तब काकू लिये हम लोग ही सब कुछ थे। बस सांप छछूंदर वाली हालत, ना उगलते बने ना निगलते। उपर से अपना नायक हर हफ्ते नयी लडकी और अय्याशी के किस्से लेकर आ जाता था। उसके किस्से सूनकर कोफ्त होती थी। प्रवीण तो उसे बूरी तरह झाड देता था लेकिन वो बाज नही आता था। उसमे अय्याशी की बूरी आदत होने के बावजूद वो हम लोगो की इज्जत करता था। अपने करीयर के हर निर्णय मे हमसे सलाह लेता था।

२००२ मध्य मे वह भडांरा अपने घर गया। कुछ महिनो बाद मै उससे नागपूर मे एक शादी मे मिला। उसने मुझे एक लडकी की तस्वीर दिखाई। मैने उसे चेतावनी दी “अबे अब तु शूरू हो गया, तो तेरा सर और मेरा जूता। तेरे अय्याशी के किस्सो मे मेरी कोई दिलचस्पी नही।” सुरेश ने कहा “नही यार , ये वैसी लडकी नही है। इस लडकी को मैने छुवा तक नही है।” मुझे विश्वास तो नही हुआ, वह जारी रहा “मै इससे शादी करने वाला हूं।

मैने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह इस लडकी के लिये यदि गंभीर है तो काकू को तैयार करना मेरी जिम्मेदारी होगी। वह खुश हो गया, उसने मुझसे कहा कि संभव हुआ तो वह मुझे उस लडकी से मिलायेगा। बाद मे मुझे ज्ञात हुआ कि दोनो के सामजिक स्तर मे काफी अंतर है। लडकी उंची जाति से है और सुरेश उससे नीची जाति से है। मैने उन लोगो के भविष्य मे आनेवाली समस्याओ का अनुमान लगा लिया था। मुझे मालूम था कि समाज अभी इतने खुले दिल का नही हुआ है।

बाद मे मैने इस विषय पर राजेश और प्रवीण से चर्चा की, किसी ने गंभीरता से नही लिया। सभी को यही लगा कि कुत्ते की दुम सीधी नही हो सकती।

इस बीच मै चेन्नई आ गया था, राजेश लंदन मे था, प्रवीण डलास पहुंच गया था। सभी के सभी अपनी अपनी राह चल दिये थे। संपर्क का माध्यम फोन और ईमेल थे। कुछ दिनो के बाद सुरेश ने राजेश से कुछ आर्थिक सहायता की मांग की। राजेश ने कारण पूछा, जवाब था “शादी करनी है“। हम लोगो (मै, राजेश और प्रवीण) की आपातकालीन चैट पर चर्चा हुयी और निर्णय हुआ कि सुरेश को आर्थिक सहायता नही दी जाये। कारण ये था कि उसका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था और उसके परिवार मे लडकी स्वीकार्य थी। कोई परेशानी थी तो लडकी के घर से। हमने उसे सलाह दी कि अपने घर वालो से बात करे, जरूरत पढने पर हम बात कर सकते है। उसे यह भी कहा गया कि शादी से पहले कम से कम वह कोई नौकरी या काम् करना शुरू करे।

इस घटना को कुछ महीने गुजर गये बात आयी गयी हो गयी। उसका हमसे संपर्क टूट गया। हम लोगो ने भी इसे गंभीरता से नही लिया।

अचानक एक दिन भंडारा से एक दोस्त का मेल आया कि सुरेश ने आत्महत्या कर ली है। हम लोग सन्न रह गये। एकबारगी विश्वास नही हुआ कि सुरेश ऐसा कर सकता है। खोजबीन से पता चला कि इस बार सुरेश को उस लडकी ने गच्चा दिया था। उसके परिवारवालो को सुरेश स्वीकार नही था। उस लडकी ने परिवारवालो के दबाव मे या किसी अन्य कारणवश शादी से इंकार कर दिया। ये झटका सुरेश सहन नही कर पाया और आतमघाति कदम उठा बैठा।

मुझे आज भी विश्वास नही होता कि सुरेश जिसके लिये लडकी की किमत एक खिलौने से ज्यादा नही होती थी, एक लडकी के धोखा देने पर आत्महत्या कर बैठा।

मुझे सुरेश के लिये कोई दुःख नही है, वो तो कायर निकला। दुख है ‘काकू’ के लिये। अब सुरेश तो नही है लेकिन हम लोगो मे से भी कोई  उनके आसपास नही है।

1 comments:

shravan सोमवार, मई 14, 2012 2:46:00 am  

कुछ बाते होती हैँ जो कभी भी पीछा नही छोङती है।

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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