चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये

रविवार, जुलाई 23, 2006


अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
घर से मस्जिद है बहुत दूर ,चलो यू टर्न ले
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
निदा फाजली की ये गजल मै कल फिर एक बार “वाह वाह″ मे सुनी। जब उन्होने ये शेर पाकिस्तान मे एक मुशायरे मे पढे थे,उसके बाद कुछ श्रोताओ ने उनसे पूछा कि
“मस्जिद किसी बच्चे से बडी कैसे हो सकती है।
उनका जवाब था
"मस्जिद तो इंसान के हाथ बनाते है, लेकिन बच्चो को तो खुदा के हाथ बनाते है !"
ये पंक्तिया फिर याद आ गयी जब गढ्ढे मे गिरे बच्चे प्रिंस को बचाने के लिये मंदिर, मस्जिद और गुरुद्बारे मे प्रार्थना की गयी और सेना ने उसे बचा भी लिया !
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5 टिप्पणीयां “चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये” पर
मुंबई धमाकों की गूंज का जवाब देश के नागरिकों ने अपने जयघोष से आतंकियों और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को दिया है. ये क़ौमी एकता का जयघोष है जो प्रिंस के पुनर्जीवन के साथ आपके और मेरे सामने मीडिया के ज़रिए सुनाई दिया.
निदा साहब ने उक्त दो लाइनों में सारा निचोड़ दे दिया.
नीरज दीवान द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

मेरे खयाल से शब्द कुछ ऐसे हैंः
घर से मसजिद है बड़ी दूर चलो यूँ कर लें
रोते हुए किसी बच्चे को हँसाया जाये
anunad द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

“यू टर्न ले!” पे हंसते हंसते हाल खराब.
आशीष तुम्हारे खोपडी भी बडी फ़र्टाईल है!
क्या इसे मन-बोल मे डाला जा सकता है?
eswami द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

आशीष जी और अनुनाद जी, सही शब्द यह हैं :
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
….
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
Nidhi द्वारा दिनांक जुलाई 26th, 2006

आशीष जी…. ‘ यू टर्न लें ‘ वाक़ई आपकी रचनात्मकता की हद हो गई! फ़ाज़ली साहब को सजेस्ट किया किसी ने?
अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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