रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं ..

बुधवार, सितंबर 26, 2018

अक्सर लोग मुझसे पुछ लेते है कि कहाँ से हो ? हम सोच मे पड़ जाते है कि इसका उत्तर क्या दे!

पापा बुंदेलखंड से थे, मम्मी छत्तीसगढ़ से। जन्म दुर्ग छत्तीसगढ़ यानी ननीहाल मे हुआ। लेकिन सारा बचपन झालिया जिला गोंदिया महाराष्ट्र मे बीता। हाईस्कूल आमगांव , गोंदिया से, इंजीनियरींग गोंदिया महाराष्ट्र से की।

बंजारा जिंदगी विरासत मे मिली थी, पापा भी बुंदेलखंड से भटकते हुये महाराष्ट्र मे नौकरी करते हुये भटक रहे थे। वही बंजारा जिंदगी हमारे नसीब मे।

लेकिन हमने इस बंजारा जीवन को अंतराष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया। पहली नौकरी मे ही मध्यभारत से दूर उत्तर भारत गुड़गांव दिल्ली पहुंच गये। रहना दिल्ली मे, नौकरी गुड़गांव मे। अगला डेरा उत्तर से एक दम दक्षिण चेन्नई मे। चेन्नई से निकाला हुआ, पहुंच गये पश्चिम भारत पुणे!

पुणे की जिंदगी रास नही आई, झोला उठाया और आ गये बैंगलोर!

ये तो एक झांकी ही थी, भारत मे सूटकेसो को खोलने और वापिस पैक करने के ठीहे।

जब चेन्नई मे थे तब से एक पैर भारत मे एक अमरीका मे रहता था। हालात तो यह थे कि भारत पहुंचते साथ बास फ़ोन कर बोल देता था कि सूट केस मत खोलना, अगले सप्ताह इस जगह जाना है। शादी से पहले अकेले भटके, शादी के बाद सप्त्निक भटके। अमरीका मे ही मिलफ़र्ड, मिनियापोलीस, न्युयार्क, स्टैमफ़र्ड, क्लिवलैंड, फ़िलाडेल्फ़िआ और रिचमंड मे डेरा रहा। कनाडा मे मांट्रीयल मे फ़्रेंच भाषीयो को अंग्रेजी सीखाई, साउ पाउलो ब्राजील मे मुश्किल से अंग्रेजी मे शाकाहारी खाने का जुगाड़ किया। लंदन मे न्युटन की कब्र पर मत्था टेकने के बहाने तीन महीने बिताये।

पश्चिम से बोर होने के बाद चल पड़े पूरब की ओर। आस्ट्रेलिया मे कंगारु दर्शन के नाम पर तीन साल काट लिये।

इस सूची मे एक दिन दो दिन, एक सप्ताह वाले डेरों का समावेश नही है, उन्हे जोड़े तो "ग्वानझाउ" का फ़्राईड राईस के नाम पर पोर्क फ़्राईड राईस भी आ जाता है!

बस एक अफ़्रीकी महाद्वीप बचा है जहाँ पर कदम नही पड़े है.. वो भी हो जाता बस जोहानिसबर्ग के नाम पर हिम्मत नही हुई।

कुछ अनोखे रिकार्ड भी बनाये। पिछले सप्ताह वाली "स्पिरिट आफ़ विप्रो हाफ़ मैराथन" चार महाद्विपो मे दौड़ चुके है, उत्तरी अमरीका, यूरोप, एशिया और आस्ट्रेलिया।

 गार्गी के आने के बाद जिंदगी मे एक ठहराव आया था, 2013-2017 तक एक ही स्थान बैंगलोर मे टिके रहे। इस साल उसपर भी नजर लगी, वापिस दो सूटकेसो मे कैद जिंदगी का आरंभ हो गया..

 अरे हम भूल ही गये थे कि प्रश्न था कि हम कहाँ से है ?

 उत्तर :
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
 रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।
 पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
 अपने ही घर में, किसी दूसरे घर के हम हैं।
 वक़्त के साथ है मिट्टी का सफ़र सदियों से
 किसको मालूम, कहाँ के हैं, किधर के हम हैं ।
 जिस्म से रूह तलक अपने कई आलम हैं
 कभी धरती के, कभी चाँद नगर के हम हैं।
 चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
 सोचते रहते हैं, किस राहगुज़र के हम हैं ।
 गिनतियों में ही गिने जाते हैं हर दौर में हम
 हर क़लमकार की बेनाम ख़बर के हम हैं ।
-निदा फ़ाज़ली

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मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

सोमवार, सितंबर 03, 2018

2 सितंबर 2015, सोमवार शाम मै वापिस बैंगलोर आने के लिये सपरिवार नागपुर एअरपोर्ट पहुंचा। एअरपोर्ट के अंदर आने पर पीछे से आवाज आई "आशीष भैया!"
पीछे मुडकर देखा एक बीस बाईस साल का युवक चला आ रहा है। पास आने पर उसने कहा "पहचाना ? मै ....."! थोड़ा समय लगा उसे पहचानने मे, आखीर मै उसे 17 वर्ष बाद देख रहा था। आखीरी बार जब मैने उसे देखा था तब वो और उसके मित्र गांव की गलियो मे कंचे, गुल्ली डंडा खेलते थे और नहर मे नंग धड़ंग नहाते थे।
उसे एअरपोर्ट पर देखकर एक सुखद आश्चर्य हुआ। मै उसकी पृष्ठभूमी से परिचित था। उसके दोनो चाचा मेरे सहपाठी रह चुके थे, मै आगे बढ़ता गया था और वे एक कक्षा मे एक साल, दो साल करते जैसे तैसे हाई स्कूल पहुंचने के बाद पढ़ाई छोड़ कर खेती-किसानी और मजदूरी मे लग गये थे। उसके पिता भी कृषि मजदूर ही थे।
मै पिछले सप्ताह ही गांव गया था। गांव मे सड़क पक्की हो गयी थी, जहाँ तहाँ डिश एंटीना भी दिख रहे थे, लोगो के हाथ मे मोबाईल भी दिख रहे थे। लेकिन यह सारी प्रगति एक छलावा सी लग रही थी, क्योंकि गांव का चौक जहाँ पर बसे रूकती थी अब वीरान हो चुका था। जिस जगह पर देर शाम तक रौनक रहती थी, कई दुकानें थी, अब उजाड़ था। गांव के अंदर भी लोगो को घरो के बुरे हाल थे। मेरे अधिकतर सहपाठी जिन्होने आगे पढ़ाई की थी वे अच्छी जिंदगी की तलाश मे गांव छोड़ चुके थे, और जो आगे नही पढ़ पाये थे वो तो हमारे कालेज के ही दिनो मे गांव छोड़ कर रोजगार की तलाश मे निकल लिये थे। केवल एक ही मित्र मिला था जो दर्जी का काम कर रहा था, मुझसे केवल दो तीन वर्ष बड़ा था लेकिन पचास से उपर का लग रहा था।
अपने इस गांव के ऐसे हालात देखे थे कि संपन्न परिवारों के लड़के ही पढ़ लिख कर आगे बढ़ रहे थे, बाकी केवल मजदूर ही बन रहे थे, चाहे कृषि मज़दूर हो या कारखाना मजदूर। ऐसे मे एक आर्थिक/शैक्षणिक दोनो तरह से पिछड़े परिवार की नयी पीढ़ी का एक नवयुवक हवाई यात्रा कर रहा है, मेरे लिये सुखद आश्चर्य से कम नही था।
मेरी दसंवी कक्षा (सन 1991) मे कुल 152 साथी थे। उसमे से केवल पांच ही आगे बढ़ पाये। दो इंजीनियर(मुझे लेकर) क्योंकि दोनो के पिता शिक्षक थे, तीन शिक्षक, जिसमे से दो के पिता धनी किसान थे और तिसरे के पिता मजदूर थे। इसमे से मजदूर पिता का पुत्र मेहनती था और एक डाक्टर के घर पर काम करता था तो उसे वातावरण अच्छा मिला, पढ़ाई के लिए अपना खर्च निकाल लेता था, जिससे उसे समस्या नही आयी। लेकिन बाकी 147 (40 लड़कीयाँ समेत) वहीं के वहीं रह गये। इनमे से सात-आठ परिवार के पास इतनी भूमि थी कि वे तरीके से कृषि कर पायें, बाकी केवल मजदूर बन कर रह गये। 

आज जब मै अपने सहपाठीयों से मिलता हुं तो वे आंख मिलाकर बात नही कर पाते है, मुझे साहब कह कर बुलाते है और मै शर्म से गड़ जाता हुं। ऐसे वातावरण मे मुझसे अगली पीढ़ी हवाई यात्रा कर पा रही है एक आशा जगा रही थी। मेरी पीढ़ी जो नही कर पायी, मेरी अगली पीढ़ी कर रही है....

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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