दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 3 रामेश्वरम

गुरुवार, मई 23, 2019

कन्याकुमारी मे सूर्यास्त के पश्चात हम रामेश्वरम की ओर रवाना हुये। दूरी 310 किमी है और गूगल महाराज ने कहा था कि पांच घंटे लगेंगे। अब तक हम गूगलदेव के समय से कम समय मे ही लक्ष्य तक पहुंच जा रहे थे। लेकिन अब रास्ते मे अंतर था। बैंगलोर-मदुरै-कन्याकुमारी का रास्ता हमने अधिकतर 4 लेन, और कुछ भागो मे 6 लेन वाले रास्ते से किया था। कन्याकुमारी से रामेश्वरम का रास्ता अच्छा है लेकिन दो लेन वाली बिना डीवाईडर की सिंगल सड़क है, गति हम होनी थी।

नाश्ता


कन्याकुमारी से ईस्ट कोस्ट रोड पर आने के बाद गति कम हो गई थी लेकिन 60-80 किमी/घंटा की गति मिल रही थी। सुबह केवल चाय पीकर निकले थे, साढ़े नौ बजे तक भूख लगने लगी थी। सड़क किनारे एक छोटे रेस्तरां मे रूके। नाश्ते के लिये पुछा, पोंगल, इडली और दोसा उपलब्ध था। हमने अपने लिये पोंगल, गार्गी और निवेदिता के लिये इडली मंगवाई। केले के पत्तो मे उन्होने पोगल और इडली परोसी, उपर से सांभर और चटनी डाल दी। कटोरी चम्मच फ़िर से नदारद। उन्होने साथ मे स्वयं ही केले के पत्तो को कचरे के डिब्बे डालने का  निर्देश दे दिया था। नाश्ता किया, सादा पानी पिया और वापस सड़क पर आ गये।

रास्ते मे


अब रास्ते मे एक अजीब नजारा दिखा। बहुत सी महिलाये तेज धूप मे चार पांच घड़ो को एक दुपहीया वाहन पर लाद कर पानी ढोते दिखी। यह नजारा पूरे पचास किलोमीटर के रास्ते मे दिखा। सड़क के किनारे तालाब, बावड़ीया और नाले दिख तो रहे थे लेकिन सूखे। रास्ते मे नमक के खेत भी दिखे। अधिक जानकारी लेने पर पता चला कि ये सारा रास्ता सड़क से अधिकतम एक से दो किमी दूर पर है। साफ़ पानी की कमी है। अधिकतर भूजल बहुत नीचे चला गया है, कुंये सूख चुके है और बोरवेलो मे 200-300 फ़ीट के बाद बमुश्किल पानी मिलता है।

लगभग 11:30 के आस पास हम रामेश्वरम द्वीप के मुहाने पर पहुंचे। जब हम पंबन पुल से गुजर रहे थे तो नीचे वाले ट्रेन ट्रेक से एक रेल भी जा रही थी। खूबसूरत नजारा था।

रास्ते मे अब्दुल कलाम मेमोरीयल दिखा, ये हाल ही मे बना मेमोरीयल है। इस मेमोरीयल को पार करने पर रामेश्वर नगर परिषद हर बाहर से आने वाले वाहनो से 30 रूपये शुल्क ले रही थी। रामेश्वरम प्लास्टीक फ़्री शहर है।

रामेश्वरम के अंदर आते ही गति कम हो गई। रास्तो पर पर्यटक वाहन , बसो की भरमार थी। हमारा होटल रामानाथस्वामी मंदिर के पास ही थी लेकिन 12 बज रहे थे। हमे पता था कि मंदिर बंद हो गया होगा और शाम को चार बजे ही खुलेगा। होटल पहुंचे, सामान रखा और हाथ मुंह धोकर तरोताजा हुये। भूख लग आई थी, बाहर ही एक उत्तर भारतीय रेस्तरां दिखा। तीनो के लिये उत्तर भारतीय थाली का आर्डर दिया। गरमागरम रोटीयों का सब्जी, दाल, कढ़ी और अचार के साथ भोग लगाया गया।

रामानाथस्वामी मंदिर चार बजे खुलने वाला था तो सोचा कि रामेश्वर के बाकी आकर्षण पहले घूम लेते है। उसके बाद रामानाथस्वामी मंदिर। समय बचा तो धनुषकोटि और उसके पश्चात अब्दुल कलाम मेमोरीयल जायेंगे। रामेश्वरम मे कार से घुमना आसान नही है इसलिये एक आटोरिक्शा कर लिया, उसने 300 रूपये मे सारे स्थान घुमा देने की कही।

गंधामाथाना पर्वत


सबसे पहले हम गंधामाथाना पर्वत पहुंचे, यह  एक छोटा सा शिखर है जो श्री रंगनाथस्‍वामी मंदिर के उत्‍तर में स्थित है। यह मंदिर पैदल दूरी पर 3 किमी. की दूरी पर स्थित है और इसे रामेश्‍वरम का सबसे ऊंचा प्‍वाइंट माना जाता है। गंधामाथाना पर्वतम के रास्‍ते पर एक हॉल है जिसमें दो मंजिले है, इस कक्ष में आप भगवान राम के पैरों की खडाऊ के चिन्‍ह् देख सकते है। इसके अलावा, इस पर्वत के रास्‍ते पर एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है, पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह मंदिर उसी स्‍थान पर बना है जहां रावण के हरण करने पर माता सीता ने अपना गहना गिराया था। पर्यटक इस शिखर पर जाना इसलिए भी पसंद करते है क्‍योंकि यहां से रामेश्‍वरम द्वीप का दृश्‍य बेहद शानदार नजर आता है। यहां से आप समुद्र के नीले चमकते पानी को भी देख सकते है। यह वास्‍तव में अनोखी जगह है।

साक्षी हनुमान मंदिर

अगला पड़ाव साक्षी हनुमान मंदिर था, श्री रामनाथेश्‍वर मंदिर से 3 किमी. की दूरी पर स्थित है जो गंधामथाना पर्वथम के रास्‍ते पर पड़ता है। किंवदंतियों के अनुसार, हनुमान जी ने भगवान राम को सूचना दी थी कि माता सीता, रावण के कब्‍जे में है। उन्‍होने इस सूचना को साक्ष्‍य के साथ प्रस्‍तुत किया था, साक्ष्‍य के रूप में उन्‍होने माता सीता की अंगूठी दिखाई थी। ऐसा भी माना जाता है कि इसी स्‍थान पर भगवान राम अपनी पत्‍नी को याद करके रोए थे। हनुमान जी को भगवान राम का भक्‍त माना जाता है। भगवान राम और हनुमान के भक्‍त, इस मंदिर में हर साल दर्शन करने आते है। कई तीर्थयात्री, गांधामथान पर्वतम जाने के रास्‍ते में यहां दर्शन आते है।

विलुंदी तीर्थम 


इसके बाद हम  विलुंदी तीर्थम पहुंचे, 24 मुख्‍य तीर्थमों में से एक है जो हिंदू धर्म में प्रमुख माने जाते है। यह तीर्थम उस दौरान बना था, जब भगवान राम ने अपनी पत्‍नी सीता की प्‍यास बुझाने के लिए समुद्र में तीर मारा था। तीर चलाने के फलस्‍वरूप, समुद्र से पीने योग्‍य पानी की एक धारा निकली थी। हर वर्ष, इस तीर्थम की यात्रा करने सैकड़ों भक्‍त आते है और इसमें स्‍नान करके अपने पाप धुलने की कोशिश करते है। यह तीर्थम, पंबन के नजदीक एक गांव थागाचिमदम में स्थित है। धार्मिक महत्‍व के अलावा, यह जल स्‍त्रोत, स्‍थानीय लोगों के लिए पीने योग्‍य पानी भी प्रदान करता है। स्‍थानीय लोगों के लिए पीने के पानी का प्रबंन करने की दृष्टि से 1979 में यहां एक निर्माण भी करवाया गया था। हालांकि, वर्तमान में यह संरचना टूट चुकी है क्‍योंकि यहां ही हवा में भी नमक की मात्रा बहुत ज्‍यादा है। सरकार ने कई और संरचनाओं को बनाने का प्रयास भी किया है।

पंच - मुखी हनुमान


इसके पश्चात हम पंच - मुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। यह श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम, माता सीता और भक्‍त हनुमान की मूर्ति स्थित है। इस सभी मूर्तियों को धनुषकोडी से लाया गया था, 1964 के दौरान ये सभी मूर्तियां धनुषकोडी गांव में आएं साइक्‍लोन में नष्‍ट हो गई थी।  यही कारण है कि पूरे देश से भक्‍त यहां दर्शन करने आते है। इस मंदिर की अन्‍य विशेषता यह है कि इस मंदिर के बाहर बहुत से तैरता हुआ पत्‍थर भी रखे  है। यह पत्‍थर रामसेतू पुल का हिस्‍सा माना जाता है जिसे हनुमान जी और उनकी वानर सेना के द्वारा बनाया गया था। इस पुल की सहायता से ही भगवान राम लंका तक पहुंचे थे और माता सीता को रावण की कैद से छुड़ा पाएं थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर में हनुमान जी ने अपने पंच मुख के दर्शन करवाएं थे। हनुमान जी को इस मंदिर में भगवान राम के द्वारा सिंदुर से लेप भी लगाया गया था।

इसी मंदिर परिसर मे हमने रामसेतु का एक पत्थर भी खरीदा।

रामानाथस्वामी मंदिर 

इन सारी जगहो के घुमने तक चार बज गये थे तो हम मुख्य मंदिर रामानाथस्वामी मंदिर पहुंचे। मंदिर मे अधिक भीड़ नही थी। हम लोगो का इस मंदिर मे कुंडो मे स्नान का भी इरादा नही था। मंदिर मे मूर्ती के दर्शन किये। यह मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्‍योर्तिलिंगों में से एक है। इसे सभी मंदिरों में भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति पूजा नहीं होती है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि इस मंदिर की स्‍थापना पांडवों ने की थी, लेकिन वर्तमान मंदिर लगभग 12 वीं सदी में स्‍थापित किया गया था। इस मंदिर की स्‍थापत्‍य कला काफी प्राचीन है जो इसे संगमरमर से बनाया गया है। हर साल लाखों की संख्‍या में भक्‍त इस मंदिर में दर्शन करने आते है।

मंदिर से बाहर आते आते पांच बज गये थे। गर्मीयों के दिन है, सूर्यास्त देर से होता है, तो सोचा कि दो घंटे मे धनुषकोटि से आ जायेंगे। होटल से कार उठाई और धनुषकोटि की ओर चल दिये। लेकिन रामेश्वरम से बाहर निकलते ही पुलिस वालो ने रोका और कहा कि पांच बजे के पश्चात धनुषकोटि मे पर्यटक नही जा सकते है। उन्होने दूसरे दिन सुबह छ: बजे आने कहा।

अब्दुल कलाम मेमोरीयल 


हमने सोचा कि अब्दुल कलाम मेमोरीयल चलते है जोकि छ: बजे तक खुला रहता है। इस स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की समाधि है। मेमोरियल अच्छा बनाया गया है। अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी चीजों और राकेटो, मिसाइलो के माडल रखे हुये है। प्रवेश निशुल्क है। हम छ: बजे तक मेमोरीयल मे घुमते रहे है गार्गी को राकेट, मिसाईल की जानकारी देते रहे।

हम सब पूरे दिन की आवारागर्दी से थक गये थे। वापस होटल पहुंचे। सारे दिन मंदिर देखते देखते हालत यह हो गई थी कि मैने होटल के सामने भी चप्पल उतार दी थी। गार्गी ने चप्पल के लिये याद दिलाया कि पापा ये मंदिर नही है। दोबारा स्नान किया और बाहर खाना खाने निकले। खाना खाकर सो गये।

सुबह छ: बजे उठे। होटल से चेक आउट किया। और धनुषकोटि की ओर चल दिये।

कोथानदारामार मंदिर 

रास्ते मे कोथानदारामार मंदिर है। सबसे पहले वहीं पर रूके। यह मंदिर उस स्‍थान पर बना है जहां भगवान राम ने रावण के वध के बाद विभीषण को लंका का राजा बना दिया था। इस मंदिर को सेतुसमुद्रम शिप कैनाल परियोजना के बाहर रखा गया, ताकि इसका अस्तित्‍व खतरे में न आएं। यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों से हमेशा भरा रहता है जिसके कारण स्‍थानीय मछुआरों को काफी लाभ मिलता है और वह अपनी मछलियां बेच पाते है।  वर्तमान में, इस मंदिर की देखभाल श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के प्रशासन के द्वारा किया जाता है क्‍योंकि यह मंदिर श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के 31 उप - मंदिरों में से एक है।

धनुषकोडी 



इसके बाद हम धनुषकोडी पहुंचे। धनुषकोडी एक गांव है ( वर्तमान में यह एक महत्‍वपूर्ण गांव है ) जो रामेश्‍वरम द्वीप पर स्थित है। यह गांव, द्वीप के दक्षिणोत्‍तर हिस्‍से के पूर्वी भाग में स्थित है। यह गांव, श्रीलंका में स्थित तलाईमन्‍नार से 31 किमी. की दूरी पर स्थित है। किवंदंतियों के अनुसार, विभीषण, रावण के भाई ने इसी स्‍थान पर भगवान राम से सेतू तोड़ने के लिए कहा था और भगवान राम ने एक ही बाण से सेतू को तोड़ दिया था। इसीकारण, इस स्‍थान का नाम धनुषकोड़ी रखा गया। वास्‍तव में, आज भी यहां पुल की एक रेखा देखी जा सकती है जिसके बारे में मानना है कि इसे भगवान राम ने वानर सेना के साथ मिलकर बनाया था।  इस स्थान पर सागर एक दम साफ़ है, बीच का पानी और रेत इतनी साफ़ है कि आस्ट्रेलिया, न्युजीलैंड के बीच याद आ जाते है।

गार्गी के साथ बीच पर रेत पर हम काफ़ी देर तक खेलते रहे। गार्गी ने अपना एक हिप्पोपोटामस रेत मे दफ़ना दिया और बाद मे असली जगह भूल गई। बहुत देर तक हम उसे रेत मे खोद खोद कर खोजते रहे। अंत मे थक कर उसे वहीं छॊड़ दिया और वापसी की तैयारी की।

नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर


रास्ते मे नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर पड़ा। यह मंदिर, रामेश्‍वरम के मुख्‍य मंदिर से 8 किमी. की दूरी पर स्थित है। धनुषकोडी से श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर की ओर जाने पर इस मंदिर में दर्शन किए जा सकते है। यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है और हर साल दशहरे के दिन यहां भारी संख्‍या में दर्शनार्थी दर्शन करने आते है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 14 वीं शताब्‍दी में हुआ था और इसे स्‍थानीय स्‍तर के रामांद ने स्‍वंय बनाया था। यही कारण है कि यह मंदिर, रामेश्‍वरम से काफी दूर स्थित है। मंदिर के आसपास का क्षेत्र वास्‍तव में बेहद सुंदर है। थके - हारे पर्यटक यहां के घने वृक्षों के नीचे आराम कर सकते है। मंदिर के आसपास स्थित सुंदर गार्डन, वंसत के मौसम में बेहद खूबसूरत लगते है।

पंबन पुल


वापसी मे हम पंबन पुल पर रूके। इस पुल की खासियत यह है कि इसे पाल्‍क स्‍ट्रेट पर एक कैंटीलिवर ब्रिज के रूप में मनाया गया है। यह पुल , रामेश्‍वरम को देश के अन्‍य हिस्‍सों से जोड़ता है। यह पुल , समुद्र पर बना अपनी तरह का अनोखा पुल है। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री पुल है जिसकी लम्‍बाई 2.3 किमी. है। इसके बाजु मे एक रेल्वे पुल  है जिसे पुल को दक्षिण भारतीय रेलवे परियोजना के हिस्‍से के रूप में बनाया गया था।



लौट के बुद्धु घर को आये


सुबह के आठ बज गये थे, हम रामेश्वर द्वीप से बाहर आ गये थे और बैंगलोर का रास्ता ले लिया था। रास्ता 560 किमी था लेकिन अच्छा रास्ता होने से खाने और नाश्ते के 1 घंटा को जोड़ते हुये भी हम शाम के सात बजे घर पहुंच गये।

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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