इंजीनियरींग प्रवेश गाथा

सोमवार, सितंबर 30, 2019

1993-94 यह वह समय था, जब इंजीनियरींग कालेज मे पढ़ना बड़ी बात मानी जाती थी।

जब हमने 12 वी पास कर ली तो इंजीनियरींग मे प्रवेश करने की सोची, इस वर्ष महाराष्ट्र मे इंजीनियरींग कालेजो मे प्रवेश की प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई थी। सारे निजी और सरकारी कालेजो मे प्रवेश एक साथ एक ही जगह से दिया जाने लगा था।

निजी और सरकारी कालेजो मे भी अंतर नही था, विश्वेश्वरैया रीजनल कालेज आफ़ इंजीनियरींग (VRCE अब VNIT) से इंजीनियरींग करो या किसी निजी कालेज से, डीग्री नागपुर विश्वविद्यालय से ही मिलनी थी।

इस प्रवेश प्रक्रिया मे सरकारी कालेजो की 100% सीट्स फ़्री सीट्स थी अर्थात 4000 रूपये सालाना प्रवेश वाली। निजी कालेजो मे 50% फ़्री सीट्स, 50% पेमेंट सीट्स जिनकी फ़ीस 32,000 रूपये सालाना थी।

हमने 50 रूपये वाला प्रवेश फ़ार्म ख़रीदा और भर दिया। इस बीच कोई न्यायालय मे चला गया और प्रवेश प्रक्रिया पर न्यायालय ने रोक लगा दी। तब तक हमने बी एस सी मे प्रवेश ले लिया और पढ़ने लगे। तीन महीने बीते , अंतत: सितंबर मे प्रवेश से रोक हटी और प्रवेश प्रक्रिया आरंभ हुई। हम चल दिये काउंसलिंग और प्रवेश के लिये नागपुर।

पापा का स्वास्थ्य ठीक नही रहता था तो सब कुछ खुद ही करना था। नागपुर मेरे गांव झालिया से 200 किमी दूर था। समीप का शहर गोंदिया था। पास के रेल्वे स्टेशन आमगांव से पैसेंजर ट्रेन ली और काउंसलिंग के एक दिन पहले नागपुर पहुंच गये। पहली बार अकेले घर से निकले थे। पैसो की तंगी तो रहती ही थी। होटल मे रूकने के बारे मे ना तो पता था, ना ही पैसे थे, तो रात के नौ बजे से सुबह तक का समय रेल्वे स्टेशन पर गुजारा। सुबह रेल्वे स्टेशन पर ही नहा धो कर VRCE काउंसलिंग केंद्र पहुंचे।

चार्ट देखा, अपना क्रमांक दोपहर मे तीसरी बैच मे आना था। चाय पी और घर से लाये परांठे खाये। और एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गये। दोपहर मे अपना क्रमांक आने पर काउंसलिंग कराने पहुंचे।

काउंसलिंग डेस्क पर बैठे महानुभाव ने मुझे अकेले देखा, पूछा साथ मे कौन है  ? हमने कहा कि हम अकेले ही है।

अब उसने  पूछा कि कौनसा कालेज चाहिये ?

हमने पूछा कि कौनसा खाली है ?

उसने हमे घूरा! उपर से नीचे देखा और बोला तुम्हारे लिये अभी सारे नागपुर विश्वविद्यालय मे सीट्स खाली है। तुम्हे कौनसा कालेज चाहिये।

हमने सोचा कि नागपुर से आसपास के कालेज घर से दो सौ किमी दूर पड़ेंगे। जबकि गोंदिया केवल तीस किमी। पूछा गोंदिया मे दे दीजिए।

अब पूछा कौनसी ब्रांच चाहिये। अब हम सोच मे पढ़ गये। तो उन्ही महाशय ने कहा कि "कंप्यूटर साईंस एंड इंजीनियरींग" दे दुं ?

हमने सर हिला दिया। हो गया हमारा इंजीनियरींग मे प्रवेश।

20 अक्टूबर, कालेज मे पहला दिन! इंजीनियरींग पाठयक्रम मे प्रथम वर्ष सभी के लिये एक जैसा होता है तो कालेज प्रबंधन ने चार सेक्सन बना दिये  थे। साठ छात्रो वाले सेक्सन ए मे सारी लड़कीया और अल्फ़ाबेटीक आर्डर से कुल 12 लड़के थे। जिसमे से एक हम, एक अशोक था जो मेरे साथ बी एस सी मे भी साथ मे था। मेरे दूसरी ओर एक और आशीष थे, जोकि मध्यप्रदेश के बड़े ठेकेदार के बेटे थे। उसने हमसे Production की स्पेलिंग पूछी। हमने पूछा क्यों तो बताया कि उसकी ब्रांच "प्रोड्क्शन इंजीनियरींग" है। पता चला कि भाई साहब ढाई लाख डोनेशन और बत्तीस हजार फ़ीस देकर मेनेजमेंट कोटा से आये है। एक भाई साहब अनूप मिले, पता चला कि जो फ़ार्म हमने पचास रूपये मे खरीदा था, वो उन्हे सत्तर हजार मे मिला था। पड़ोस के बालाघाट से एक अभिनव थे, जो कि ऐसे ही नजराना देकर आये थे।

खैर सबसे दोस्ती हो गई। तीन चार महीने बाद अपने बालाघाटी अभिनव सर्दी खांसी से परेशान हो गये, गोंदिया का मौसम या होस्टल का खानपान रहन सहन रास नही आया और बोरिया बिस्तर लपेट कर वापस चल दिये। हम सोच रहे थे कि कम से कम दो लाख का चूना लगा होगा जोकि मेरे पापा कि पांच साल की कुल कमाई होगी।

साल भर बीता, दूसरे आशीष भाई इंजीनियरींग ड्राईंग को छोड़ हर विषय मे फ़िसड्डी। अनूप भाई साहब सुबह से लेकर देर रात तक ट्युशन अटेंड करते रहते थे। मार्च आया, परिक्षायें हुई। गर्मीयो मे सब अपने अपने घर गये।

जुलाई मे कालेज शुरु हुये, हमने द्वितिय वर्ष मे प्रवेश लिया। नतीजे नही आये थे, लेकिन क्लासे आरंभ हो गई थी। आशीष और अनूप दोनो ने प्रवेश नही लिया था, ना ही गोंदिया आये थे। अगस्त मे परिणाम आये। आशीष ड्राईंग छोड़ हर विषय मे फ़ेल थे, जबकि अनूप सारे विषयों मे।

अशोक से चर्चा की। वो बोला कि चिंता मत कर, ये सब भी इंजीनियरींग कर लेंगे, चार साल मे नही तो छह आठ बरस मे लेकिन कर लेंगे। उन्हे हमारी तुम्हारी तरह नौकरी थोड़े खोजना है। वे इंजीनियरींग की डीग्री खरीदने आये है और उन्हे मिल जायेगी।

अशोक सही था, जब हम कालेज छोड़ कर निकल रहे थे तो आशीष मिला था, प्रथम वर्ष निकाल लिया था, द्वितिय वर्ष के कुछ विषय भी। कुल मिलाकर तृतीय वर्ष मे प्रवेश की पात्रता हासिल हो गई थी। अनूप महाराज अब भी संघर्षरत थे।

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भागमभाग : छुटपुट दौड़ से अर्ध मेराथन तक

सोमवार, सितंबर 23, 2019

पिछले चार वर्ष से अर्ध मैराथन मे भाग ले रहा हुं। साल मे कम से कम दो अर्ध मैराथन हो ही जाती है। इससे अधिक कभी कोशिश नही की।

पहली बार अर्ध मैराथन मे 38 वर्ष उम्र मे भाग लिया था, उसके पहले 2015 मे एक बार दस किमी मे भाग लिया था। 2006 मे पहली बार स्पिरिट ऑफ़ विप्रो मे 5 किमी की दौड़ मे भाग लिया था। उसके बाद हर वर्ष 5 किमी वाली श्रेणी मे भाग ले ही लेता था। स्पिरिट आफ़ विप्रो  मे 5 किमी वाली श्रेणी दौड़ कम सेल्फ़ीदौड़ होती है, लोग केवल मनोरंजन और दोस्तों, परिवार के साथ टहलते, दौड़ते या चलते हुये  ही भाग लेते है।

मेरा बचपन महाराष्ट्र के विदर्भ मे एक छोटे गांव झालीया मे बीता है। खेलकुद मे ज्यादा सक्रियता नही रही थी, लेकिन जब भी मौका मिले खेल कूद लेते थे। साल मे कम से कम दो तीन बार यह होता था कि हम सुबह की दौड़ शुरु करते थे। सुबह पांच बजे उठकर सारे गांव मे शोर मचाते हुये , चौक पर जमा होते थे। उसके बाद दौड़ते हुये कावराबांध गांव की ओर दौड़ लगाते हुये जाते थे। कावराबांध गांव से पहले एक किमी का पत्थर है, सारे लोगो की हालत उस एक किमी मे पश्त हो जाती थी। वहाँ से लौट कर रास्ते मे एक नहर के पास  मे ठहरते थे। पहले किसी खेत मे निपट कर, वहीं नहर मे नहा धो कर वापस घर पहुंचते थे। कभी नहर मे कूद कर नहाते थे, कभी किसी किसान के खेत मे चल रहे पानी के पंप की तेज धार के सामने खड़े हो कर नहाते थे। ये सुबह की दौड़ कार्तिक माह के अंत तक चलती थी, उसके बाद ठंड तेज होना शुरु होती थी। धीरे धीरे शीत के कारण एक के एक बाद एक लोग गायब होते जाते और सुबह की दौड़ बंद हो जाती।

मित्र मंडली पर सुबह की दौड़ का अगला दौरा, होली के बाद स्कूल की परिक्षाओं के बाद पड़ता था, यह दौरा भी एकाध महिने चलता, जैसे ही गर्मीओं की छुट्टी चालू होती, आधी मित्र मंडली गायब हो जाती। ना, गर्मीओं की छुट्टी मे ननीहाल जाने का सुख उठाने वाले दोस्त कम थे। कुछ दोस्त अपने बूढ़े दादा दादी के साथ रहते थे, उनके मातापिता नागपुर या रायपुर मे मजदूरी या कोई काम करते थे तो वे गर्मियों मे उनके पास चले जाते थे। कुछ दोस्त छुट्टीयों मे खुद मजदूरी करने नागपुर/रायपुर चले जाते थे। बचे हम तो, तो या तो ननीहाल दुर्ग चले जाते या ताउजी के घर भोपाल!

साल मे कुल मिला कर एक दो महीने एक से दो किमी से अधिक दौड़ने की आदत नही रही। स्कूल मे खेल कूद मे हम भाग कम ही लेते थे। गांव मे कबड्डी, खोखो, वालीबाल और 1986-87 के बाद क्रिकेट खेल लेते थे। गुल्ली डंडा, कंचे, होलापाती, लुकाछिपी, नदी पहाड़ जैसे ठेठ गंवई खेल तो थे ही। बाद मे गर्मीयों की दोपहर मे कैरम, ताश का भी चस्का चढ़ा था।

स्कूल जीवन बीता, कालेज पहुंचे। अब तो खेल कूद से बहुत दूर हो गये थे। खेल मे कम से कम कभी कभार क्रिकेट खेल लेते थे, लेकिन दौड़ना एकदम से बंद हो गया था। इंजीनियरींग पूरी की, नौकरी करने लगे, खेल कूद भी छूट गया।

1998-2005 यह एक ऐसा दौर रहा, जब खेल कूद पूरी तरह से बंद हो गया, दौड़ने का तो नाम ही नही। इन्ही दिनो मे गोंदीया से मुंबई, दिल्ली होते हुये हम चेन्नई पहुंच गये थे। चेन्नई मे चावल-सांभर खा खा कर वजन बढ़ने लगा था। विक्रम की संगत मे ऑफ़िस मे जिम जाने लगे। जिम मे 20 मिनट दौड़ लेते थे। यह भी नियमित नही था, मूड हुआ तो जाओ नही हुआ तो नही।

2005 मे क्लिवलैंड के पास एक्रान मे छह महीने रहे। यहाँ पर कम से कम यह हुआ कि शाम को एक घंटा वालीबाल खेल लेते थे।

2007 मे शादी हुई, शादी के बाद हम पहुंच गये फ़िलाडेल्फ़िआ। वजन बढ़ना जारी था लेकिन इतना अधिक भी नही था। फ़िलाडेल्फ़िआ मे शाम को छ: बजे खाना खाने के बाद नौ बजे के आसपास जिम जाने लगे। कुछ देर ट्रेडमिल पर दौड़ते,  अन्य उपकरणों पर हाथ आजमाते और वापिस आ जाते।

फ़िलाडेल्फ़िआ से भारत आये, कुछ दिनो के बाद सिडनी आस्ट्रेलिया जा पहुंचे। यहाँ पर खेलकुद या अन्य शारीरीक गतिविधि के नाम पर नार्थ सिडनी से पैदल हार्बर ब्रिज  पार करते हुये मार्टिन प्लेस जाना था। सप्ताहांत को आवारागर्दी करते हुये सिडनी के आसपास के सभी बीच, जंगल, पहाड़ घूमना था। दौड़ना अब भी नही।

ऐसे मे आया 2012। जुन 2012 मे हम लोग स्नोवी माउंन्टेन घूमने गये। बर्फ़ मे स्किइंग की योजना बनी। स्की किराये पर लेने से पहले वजन किया, पता चला कि 90 किलो! अब हम चकराये, वजन कम करने के लिये योजना बनाई। सोचा कि खाने पीने मे कटौती कर वजन कम करते है। लेकिन यह योजना बैकफ़ायर कर गई। खाने पीने मे कटौती से एसीडीटी की समस्या हो गई। एसीडीटी की दवाईयाँ शुरु हुई। उन दवाईयों को बंद करने पर विथड्राल प्रभाव ने अवसाद और एन्जाईटी की ओर धकेल दिया। इस अवसाद और एन्जाईटी के दौर 15 दिनो तक सो नही पाये थे। मनोचिकित्सक से मिले, उन्होने अवसादरोधी दवायें दी और कहा कि इन समस्याओं मे दौड़ना मदद करता है। दौड़ने से जो हार्मोन निकलते है वे अवसाद दूर करते है।

अब शुरु हुआ गंभीरता से दौड़ने का दौर। दो किमी रोज से पांच छह किमी रोजाना दौड़ना आरंभ किया। 2013 मे भारत वापिस आये। चार-पांच किमी रोज दौड़ते रहे। स्पिरिट आफ़ विप्रो 2013,2014 मे पांच किमी दौड़ लगाई। रोजाना दौड़ लगाने वालो के संपर्क मे आये। 2015 मे पहली बार दस किमी की दौड़ लगाई।

2016 मे पहली अर्ध मैराथन पूरी की, उसके बाद अब तक दौड़ ही रहे है। अब हालात यह है कि यदि किसी दिन दौड़ ना लगाओ तो कुछ खोया खोया सा लगता है। दौड़ने की लत लग गई है। लेकिन शारीरिक क्षमता ऐसी है कि चार पांच किमी तो कुछ नही, दस किमी भी आराम से दौड़ जाते है।

जब अर्ध मैराथन दौड़ते है तो लक्ष्य रहता है कि बिना रूके दौड़ना है और मैराथन पूरी करना है। समय पर या स्पर्धा जितने का तो सोचते ही नही है। लेकिन यह संतोष रहता है कि अपने से आधी उम्र वालों से बेहतर समय निकाल लेता हुं!

अब अगला लक्ष्य है, एक बार पूरी मैराथन दौड़ने का .....



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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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