विप्रो से माइक्रो फोकस की ओर

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2020

 22 वर्षो के अपने करियर में मैंने अब तक चार कम्पनियों में नौकरी की है। इस इंडस्ट्री में यह आंकड़ा बहुत कम है। जिसमे पहली नौकरी मजबूरी की थी, जो पैसे दे दिए उसी में नौकरी ले कर ली थी। जैसे ही हालात ठीक हुए दूसरी नौकरी खोजी, अपनी शर्तो पर, लेकिन मुंबई से दूर दिल्ली में।


दूसरी नौकरी ने बहुत कुछ सिखाया। मेरे करियर की नींव बनाई। हमने भी एक साल में ऐसा काम किया कि डेढ़ बरस तक तीन बार वेतनवृद्धी मिली, वेतन दोगुने से अधिक हो गया था। लेकिन मैनेजमेंट के कुछ ग़लत निर्णय, डाट काम बबल के फूटने , खाज में कोढ़ 9/11 के कारण कम्पनी के हालात बुरे हो गए। लोगो के वेतन में कटौती हुई, बहुत से लोग निकाले गए, लेकिन हम जो काम कर रहे थे उससे कम्पनी की रोजी रोटी चल रही थी। हम अड़ गए कि अपने वेतन से कटौती नहीं होने देंगे। एक समझौता हुआ कि मेरे वेतन में ऑफिशियली कटौती होगी, लेकिन कटौती की राशि नगद रूप से मिल जाएगी। उस समय हमे केवल पैसो से मतलब था तो मान गए। लेकिन यह पता था कि अभी कम्पनी हम पर निर्भर है तो हमारे नखरे झेल गई। लेकिन पहला मौका मिलते ही कहेगी कि पीछे मुड़ और एक लात देकर बाहर कर देगी।


हमने नौकरी खोजना शुरू किया, महीने बीतते बीतते तीन ऑफर हाथ में थे। दो ऑफर दिल्ली के ही थे, तीसरा ऑफर विप्रो का था लेकिन चेन्नई का। विप्रो तीनों में बड़ी कम्पनी थी, पैसा भी बेहतर था। लेकिन चेन्नई डरा रहा था। लेकिन चेन्नई से आए दिल्ली में साथ में काम कर रहे सुब्बु ने डर दूर किया। हमने भी सोचा कि चलो एक बडी कम्पनी विप्रो का ठप्पा लगा लेते है। एक दो बरस के बाद निकल लेंगे।


यह एक दो बरस अठारह बरस में बदल गए। चार महाद्वीप घूमे, दर्जन भर देशों में काम किया। भारत में ही चेन्नई, पुणे, बैंगलोर में रहे।


पिछले दो तीन बरस से काम में एकरसता से मन नहीं लग रहा था। सोचा कि बदलाव चाहिए। जून 2019 में एक ऑफर आई और विप्रो से त्यागपत्र दे दिया। बॉस से बात हुई, बॉस ने कुछ बदलाव की बात की, हमने अपनी शर्तो पर त्यागपत्र वापस ले लिया। लेकिन कुछ समय बीतते ही बहुत से परिवर्तन हुए, हमने सोचा कि अब और नहीं। 


फिर से नौकरी खोजनी शुरू की, फिर से महीने भर में तीन ऑफर। अब हमने सोच रखा था कि साफ्टवेयर सर्विस में नहीं जाएंगे, इसलिए माइक्रो फोकस ऑफर स्वीकार कर लिया।


विप्रो में रहते हुए इतनी टीम , स्थान, ऑफिस बदले थे कि विप्रो से निकल कर नई कम्पनी मे आने में कोई झिझक, दुःख तो नहीं हुआ। लेकिन विप्रो में मेरे सामान्य कार्य के अतिरिक्त मै एक और कार्य करता था, बस उस कार्य का छूट जाना  थोड़ा अखर गया।


यह काम था कालेज से आए रुकीयो को ट्रेनिंग देना, उनकी मेंटरशिप करना। 2002 से 2020 तक यह काम अतिरिक्त रूप से करता आया था। हर बरस कुछ नए रूकी मिलते थे, मेरी  मेंटरशिप मे एक दो साल काम करने के बाद, किसी दूसरे प्रोजेक्ट में चले जाते थे। मेरी मेंटरशिप से निकले बहुत से लोग विप्रो के बाहर भी अच्छी कम्पनियों मे अच्छी नौकरियां कर रहे है। वर्तमान टीम में भी ऐसे  चार रुकी थे। मेरे वर्चुवल फेयरवेल मे इन मे से कुछ रों पड़े। पता चला कि इनमें से एक ने मेरा नाम ही "डैड" रखा हुआ था।


फेयर वेल में अधिकतर जूनियर ने मेरी प्रोफेशनल भूमिका, कार्य से अधिक मेंटरशिप भूमिका के बारे में ही बात की। मेरे लिए यह थोड़ा आश्चर्य जनक था, क्योंकि मै अपने आप को तकनीकी रूप से मजबूत मानता हूं, एक मैनेजर की भूमिका में अपने आपको अधिक सक्षम नहीं पाता हूं। लेकिन मेंटर के रूप में इतना प्रभावी होना मुझे स्वयं को ही नहीं पता था।


नई कम्पनी मे नई भूमिका है। बहुत सी चीजे जानता हूं, बहुत सी चीजे सीखना है। सेवा प्रदाता कम्पनी से उत्पाद निर्माता कम्पनी के माहौल में ढलना है। देखते है कि यह दौर कैसा रहेगा ...

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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