अथः कालेज पुराणे संजय कथा

शनिवार, अगस्त 13, 2005

हमारे एक करीबी दोस्त है, जिन्हे हर खबर को सनसनीखेज तरीके से पेश करने मे आनंद आता है. अभी कल ही उनसे बात हो रही थी, बातो का रूख पुरानी यादो की तरफ मुड गया. कालेज की सुनहरी यादे ताजा की गयी,पुराने गडे मुर्दे उखाडे गये. इसी दौरान ये किस्सा याद आया, हमने सोचा एक चटपटा किस्सा है, जिस पर हम एक चिठ्ठा लिख सकते है. बस हमने यह बात अपने दोस्त से कही, वो पुरे हत्थे से उखड गये और हमे धमकी दी कि अगर हमने वो किस्सा अपने चिठ्ठे मे लिखा तो हमे भारत मे एक अवांछीत व्यक्ती घोषित कर दिया जायेगा और भारत मे घुसने नही देगा.
हमने भी सोच लिया हम ये किस्सा तो जरूर लिखेंगे ,लेकिन हम अपने दोस्त का नाम का उल्लेख नही करेगें और एक वैधानीक चेतावनी की सुचना लगा देगें.

नोट : इस कथा के पात्र और स्थान काल्पनीक है, इनका किसी जिवित या मृत व्यक्ति से कोइ संबध नही है.


लेकीन किस्से को आगे बढाने के लिये पात्रो को कोइ नाम तो देना होगा, चलो हम अपने इस यार को "संजय" के नाम दे देते है.

अथः कालेज पुराणे संजय कथा

पात्र : संजय, राजेश, एक गरीब ब्राम्हण(प्रविण पांडेय) और हम
स्थान : गोंदिया(महाराष्ट्र्) और दिल्ली

अध्याय एक : भुमिका

पुराने जमाने की बात है हमारी कथा के सभी पात्र गोंदिया स्थीत अभियांत्रीकी महाविद्यालय मे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. उन दिनो हमारे महाविद्यालय मे दो तरह के छात्र हुवा करते थे, "दादा" छात्र और सामान्य छात्र. एक मजबुत इमारत के लिये एक मजबुत निंव की जरूरत होती है,ये रहस्य हमारे "दादा" छात्रो को भलिभांती विदित था और वे एक वर्षीय सत्र के लिये लिये दो दो (कभी कभी तिन)वर्ष लगाते थे.इन छात्रो को महाविदयालय के सभी रहस्यो का अच्छा ज्ञान था जैसे आतंरिक परिक्षाओ मे अच्छे अंक कैसे अर्जित किये जायें, बिना प्रायोगिक कक्षा मे उपस्थिती लगाये कैसे उतिर्ण हुवा जाये वगैरह. वो तो बुरा हो नागपुर विश्वविद्यालय का जो हमारे इन महारथींयो को हमेशा अनुतीर्ण कर देता था. ये महारथी महाविदयालय के छात्रावास मे रहना अपना अपमान समझते थे, इन्हे शहर मे मकान लेकर रहना होता था. लेकिन उस काल मे गोंदिया मे बाहरी छात्रो का रहना इतना आसान नही था, खासकर हमारे "दादा" छात्रो का.
ऐसे तो गोंदिया एक अच्छा शहर है आम नागरीको के लिये, लेकिन इस शहर मे सारे काले धन्दे होते थे, गैंगवार होती थी. हर सप्ताह कुछ "विकेट" गिरते थे. और पता नही कैसे हमारे "दादा" छात्र इन सब चिजो से अछुते नही थे.
हम उन दिनो मे महाविदयालय से कुछ दुरी पर "खंडहर" मे रहते थे. हमारा निवासस्थल एक अच्छी इमारत थी, लेकिन राजेश ने उस इमारत का नामकरण "खंडहर्" कर दिया था और सारी "जनता" उसे अब "खंडहर" के नाम से ही जानती थी.इसी इमारत मे मै, राजेश और प्रविण रहते थे. पास मे ही एक "टपरी" थी, और सामने ही "ग़ैलेक्सी बार". पाठकगण को विदीत होगा कि "टपरी" एक ऐसी झोपडीनुमा चाय की दुकान होती है जिसमे चाय के अलावा पकौडे ,समोसे जैसा नास्ता मिलता है. सामान्यतः टपरी महाविदयालय के आसपास होती है. छात्रगण टपरी का उपयोग उदरसुख , मुख शुद्धी तथा "नैन सुख" के लिये करते है.

अध्याय दो : गोंदिया कथा
हमारे संजयजी सही मायनो मे "संज़य" की भुमिका अदा करते थे. गोंदिया शहर की हर घट्ना की उन्हे जानकारी होती, और वे हमे उसका "आंखो देखा" हाल सुनाया करते थे. उनकी प्रवेश कुछ इस तरह हुवा करता था
" आज पता है क्या हुवा, राम नगर मे २ विकेट गिर गये !"
या
"सिविल लाइन मे अलाँ ने फलाँ को चाकु मार दिया".
जब हम लोग "टपरी" नैनसुख मे व्यस्त होते थे, और कोई दादा छात्र(या ऐसा कोइ व्यक्ती जिसकी आपराधिक पृष्ठभुमी हो) वहाँ से गुजरता संजयजी उसकी पुरी जन्मपत्री सुना देते.
"ये 'बाबा' है. पिछले ८ साल से कालेज मे है. एक बार इस पर निर्मल थियेटर मे कुछ गुन्डो ने हमला किया था.ये बाल्कनी मे बैठा फिल्म देख रहा था तब इसको मारने फलाँ गुण्डा, सलाख लेकर आया और वार किया. बाबा ने उसके हाथ से सलाख छिनकर अपने सर पर दोनो हाथो से मोड दिया. फला गुण्डा की ये देखकर '*** फट गयी' और वो भाग गया"
और संजय उस दादा छात्र को सिल्वेस्टर स्टेलोन का बाप बना देते. हमे पता नही होता कितना सच है कितना झुठ !
"ये फलाँ है, इसका फुलचुर मे बार है. इसके पास १० गुण्डे है. वो अलाँ है ना, वो इसके लिए काम करता है. पिछले चुनावो मे इसने वो कखग नेता के लिये १० लोगो को टपकाया था! इसकी चछज से नही बनती, पिछ्ले साल रामनगर मे ४ विकेट गिरे थे ना वो इन दोनो की गैंगवार के कारण गिरे थे"

संजय की इन कहानियो का एक प्रमुख पात्र होता था "मा**न".(उस गुण्डे का नाम , मैने जानबुझकर सेंसर कर दिया है) सप्ताह के सात किस्सो मे मा**न के पांच किस्से जरूर हुवा करते थे. ऐसा नही की सन्जय ये किस्से सिर्फ मुझे सुनाता था, प्रविण, राजेश सभी संजय भाइ साहब के पसंदिदा श्रोता थे. राजेश भी खुद एक बहुत बडा गप्पबाज है, इन साहब को तो ३ घन्टे की फिल्म की कहानी को सुनाने के लिये ६ घन्टे भी कम है. बात को रबर की तरह खिंन्चे जायेगा.
लेकिन संजय साहब तो संजय है. किसी ने किस्से के बिच मे कुछ बोला कि संजय भाई कहेंगे
" अबे आगे तो सुन! वो अभी वहां पर जो हत्या हुइ थी ना वो इसने ही करवायी थी."
हम कहेगे
"पोलीस उसे गिरफ्तार क्यो नही करती ?"
संजय उवाच
" किसकी इतनी हिम्मत कि मा**न को पकड ले, बावन गज की छाती चाहिये".
हम मन ही मन मे "जय हो मा**न और संजय साहब की"

समय आगे बढता रहा और हम मा**न के नये नये किस्सो के बिच मे हम लोगो ने अभियांत्रिकी शिक्षा समाप्त की. सभी अपने अपने रास्तो पर लग गये.

अध्याय तिन : दिल्ली कथा
समय ने रूख बदला. प्रविण दिल्ली मे एक साफ्ट्वेयर कंपनी मे काम करता था. कुछ दिनो बाद राजेश भी दिल्ली पहुंच गया और उसके पिछे मै भी. सभी एक साथ काल्काजी मे रहने लगे. मै ग़ुडगांव मे काम करता था, प्रविण और राजेश ओखला मे. फिर पुराने दिन लौट आये अंतर इतना था महाविद्यालय की जगह कंपनी थी,गोंदिया की जगह दिल्ली. वही मस्ती, वही आवरागर्दी, वही रात को देर रात तक बाते करना, कालेज के किस्से याद करना. लेकिन संजय साहब नही थे !
कुछ दिनो बाद संजय दिल्ली आया लेकिन प्रविण मुंबई चला गया. जिन्दगी अपनी रफ्तार से चल रही थी. रात मे देर तक बातें होती थी लेकिन संजय साहब बदल चुके थे अब वो मा**न के किस्से नही सुनाते थे. ऐसा नही कि वो सुधर गया था, कारण ये था कि राजेश उसे अब मौका नही देता था, वो अपनी प्रेमकहानी सुना सुना कर सबको पकाते रहता था.
प्रविण को दिल्ली किसी काम से आना था. सभी लोग खुश थे,काफी अरसे के बाद चारो यार बैठेंगे. प्रविण के आने से एक दिन पहले मा**न का किस्सा निकला. मैने संजय से पुछा
"तेरा दाँया हाथ मा**न का क्या हाल है ?"
राजेश ने भी संजय की खिंचायी शुरू कर दी कि कालेज के दिनो मे संजय को मा**न के अलावा किसी के बारे मे कुछ कहता ही नही था. लेकिन ये क्या संजय भाई मानने तैयार नही कि वो मा**न के किस्से सुनाया करते थे. मै और राजेश दोनो हैरान ! आखिर काफी बहस के बाद तय हुवा कि प्रविण आ रहा है उससे पुछा जायेगा. वो जो कहेगा उसे सभी मानेंगे.
दुसरे दिन प्रविण आया, सबसे गले मिला. संजय से भी गले मिला और और मिलते ही पुछा
"और मा**न क्या बोलता है ?

मै और राजेश दोनो फर्श पर लोट गये, हम दोनो का हंसते हंसते बुरा हाल था. संजय साहब प्रविण से कह रहे थे (जुलियस सिज़र के अंदाज मे)
"प्रविण , तु भी !"(Brutus! You too!)

1 comments:

अनूप शुक्ला शनिवार, अगस्त 13, 2005 1:01:00 pm  

बहुत अच्छा लगा पढ़कर। मजा आ गया। वाह!

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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