मैने एक सपना देखा !

बुधवार, सितंबर 28, 2005


कल रात मैने एक सपना देखा। वैसे कुछ नया नही था, हमेशा की तरह हम एक कन्या से बतिया रहे थे। वैसे हमारे अनुसार कन्यायें दो प्रकार की होती है, कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं। सपने मे देखी कन्या दुसरी श्रेणी(ज्यादा खूबसूरत) की थी।

वैसे हमे आज तक अपने सपनों का मतलब समझ मे नही आया, हमेशा अजीबो-गरीब, उल जलूल किस्म के सपने आते हैं, जिसका ना तो सर होता है ना पैर। सायमंड फ्रायड को भी पढ़कर देख लिया, सपनो का मतलब समझना तो दूर रहा, पूरा का पूरा कन्फुजिया गया। तीसरी कसम के राज कपूर की तरह कसम खा ली, दोबारा सायमंड फ्रायड को हाथ नही लगाएंगे, पुस्तकालय के जिस हिस्से मे उनकी पुस्तक रखी हो, उस हिस्से मे कदम ही नही रखेंगे।


तो हम सपने मे एक खुबसुरत कन्या से बतिया रहे थे। हम रहते ज़रूर अमरीका मे है लेकिन सपनो मे सिर्फ देशी कन्यायें आती है, आखिर फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी। या कुछ इस तरह कह सकते है कि विदेशी कन्यायें हमे सपने मे भी घास नही डालती। तो ये कन्या भी विशुद्ध देशी थी। हम सुबह उठने पर हैरान परेशान ! पूरे सात साल बाद उस कन्या ने हमे दर्शन कैसे दिये ?

हम पुरानी यादों मे खो गये, इस कन्या से हम मिले थे, अपनी पहली नौकरी मे। वह मानव संसाधन/प्रबंधन/स्वागत विभाग मे का एकमात्र स्तम्भ(इकलौती सदस्या) थी और हम कम्पनी के सबसे नये रंगरूट प्रोग्रामर। वह मेरी काफी अच्छे दोस्तों(?) मे से एक थी। पता नही वो मेरी दोस्त थी या दुश्मन? हम लोग कभी भी किसी मुद्दे पर एक मत नही हुये थे। जब भी मिलते थे ,हमेशा लड़ते रहते थे। यह शुरू होता था सुबह कार्यालय मे आने से और जारी रहता था शाम को घर जाते तक।

सुबह वह मेरे से पहले कार्यालय पहुंच जाती थी, जब मैं कार्यालय पहुचंता एक अच्छी मुस्की के साथ गुड मॊर्नींग मिलती थी। अब हम ठहरे थोडे तेड़े जीव, सीधी तरह जवाब देना कभी सिखा नही। कभी अपने पिछे की तरफ देखना शुरू कर देंगे, ये जताने के लिये की वो गुड मॊर्नींग हमे ना बोल कर पिछे वाले को बोल रही है। कभी पूरी अकड़ से जवाब देंगे ठीक है ठीक है, जैसे हम कम्पनी के मालिक है। फिर क्या है, जवाब मिलेगा आज से आपसे कभी बात नही करूंगी। अब हमे शांत रहना तो आता ही नही है, पलट के जवाब देंगे अरे जाओ ना! , तुमसे बात करना ही किसे है ?। वह नाक मुंह बिचका कर चेहरा घूमा लेती थी, और हम चल देते थे, अपनी सीट पर।

लेकिन ठीक 12:00 बजे, फोन बजेगा।

खाने के लिये आ जाओ।
आज मेरा उपवास है !
तुम उपवास रहते हो? किसके लिये ?
ऐश्वर्या राय नामक देवी के लिये!
भडाक(फोन पटकने की आवाज)

2 मिनट बाद दोनो कैंटीन मे। वो घर से खाना लाती थी, और हम कैटीन से खाना लेते थे। लेकिन मै उसका तीन चौथाई खाना मै खा जाता था। वैसे भी वो पूरा एक परांठा सिर्फ 30 मिनीट मे खाती थी। खाते खाते हर दिन किसी ना किसी बात पर लढाई शुरू हो जाती थी। मुझे या उसे(पता नही किसे) लड़ने का एक बहाना चाहिये होता था, , जो की मिलना मुश्किल नही होता था। वैसे भी मेरे जो सुवचन होते थे वह कन्या जाति के खिलाफ ही होते थे। मेरे सोचने का ढंग ऐसा नही होता था(ना है), सिर्फ उसे चिढाने के लिये पता नही कहां कहां से ऐसे सुवचन ढूंढ लाता था।

मेरे कुछ सुवचनो मे से जो उसे अंगारा बना देते थे:
  • नारी मस्तिष्क की बलीहारी, तन हरे मन हरे , मरे नर्क ले जाये।
  • भारतीय इतिहास मे जितने युद्ध हुये है, नारी के कारण हुये है। रामायण शुर्पनखा के कारण, महाभारत द्रौपदी के कारण। और तो और संयोगिता ना होती तो मुगल भी भारत नही आते।
  • हव्वा आदम को सेब खाने नही उकसाती तो, आज सभी लोग स्वर्ग मे होते।
बस हमारा युद्ध शुरू। धीरे धीरे पूरी की पूरी कंपनी(कुल जमा मालिक समेत २० लोगो की ) लडाई का मजा लेती थी। कंपनी की बाकि जनता भी आग लगा कर मजे लेती थी। कभी कोई उसके बारे मे मेरे सुविचार उस तक पहुँचा देता, और वो लड़ने मेरी सीट पर ! या कोई उसके सुविचार मुझे कह देता और मै उसकी सीट पर। या यूं कहे पूरी कम्पनी उत्प्रेरक का काम करती थी। उत्प्रेरकवह तत्व होता है, जो रासायनिक क्रिया मे भाग नही लेता लेकिन प्रतिक्रिया की गति को बढा देता है।

एक दिन लड़ाई मे हमने एक खतरनाक सुविचार व्यक्त कर दिया:
लड़कियों का काम सिर्फ बच्चे और चुल्हा सम्हालना है।

अब हमारी पिटायी के पूरे आसार नजर आ रहे थे, तूफान आ चुका था, बिजली कडकने लगी थी। वो तो भला हो “राजू साहब” का जो एन वक्त पर, ज्वालामुखी का साथ देने पहुंच गये। राजू साहब कंपनी के परीचर(Office Asistant) थे और उनका काम हर जगह टांग अडाना था।

राजू उवाच:
सर आप ये क्या बोल रहे हो, आप देखो कुछ दिनो मे सारे मरद घर मे बच्चा सम्हालेंगे और बाई(महिलाये) लोग ऒफीस मे काम करेंगी!

मादाम अपनी झोंक मे कह गयी
तुम देखते जाओ, मैं ऐसा २ साल मे कर दिखाती हुं !

मेरा बल्ब जला
क्या ?
मुझे जोरो से हंसी आ गयी। अब मादाम की ट्युब लाईट जली और समझ मे आया कि वो क्या कह गयी है। वो शर्म से एकदम लाल हो गयी और मैं हंसते हंसते लोटपोट। राजू साहब की समझ मे आज तक नही आया कि क्या हुवा।

दूसरे दिन 9:00 बजे मैं रिसेप्शन पर:

आपके 2 साल मे एक दिन कम हो गया है, आपका प्लान कहाँ तक पहुंचा ?

उसने मेज पर से एक पेपर वेट उठाया और दे मारा, मै इस हमले के लिये पहले से तैयार था। पीछे दरवाज़े का शीशा शहीद हो गया।

समय का पहीया घूमा, घाट घाट का पानी पीते हम अमरीका आ पहुचे। उससे आखिर बार मिले(लड़े) पूरे ७ साल हो गये। आज वो नजर आयी सपने मे। पता नही कैसे ?

मै हैरान इसलिये हुं, क्योंकि सपने तो उन्ही चीज़ो के आते है जिनके बारे मे हम सोचते है। ये कन्या मेरी सुनहरी यादों कि एक प्रमुख पात्र ज़रूर है, लेकिन मेरे यादों पर तो समय की सुनहरी धूल की एक मोटी परत जम चुकी थी? क्या ये निकट भविष्य मे उससे मिलने(लडने) का संकेत है ?
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4 टिप्पणीयां

1.अनूप शुक्ला उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:01 am

बालक हम खुश हुये तुम्हारा सपना देख के। जब हम पढ़ रहे थे तो सारा समय हमारी नजरों के सामने से गुजर रहा था। सपना में कन्या आई है तो कुछ प्लान भी लायेगी । तब तक बाकी कन्याओं से के भी सपने देख लो। ज्याद कन्याओं की संगति पाने के लिये उचित होगा कि आगे से कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें खुबसुरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों की असहमति तथा आपसे बात नहीं करूंगी ये दो पतली गलियां हैं जो बातें करते कब समय गुजर गया कि पता ही नहीं चला के राजमार्ग से जुड़ता है।इन गलियों से लगातार जुड़े रहो बालक । खुशनुमा समय तुम्हें देख के मुस्कराये जा रहा है।

2.अनूप शुक्ला: उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:04 am
भूल सुधार:
कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें बदसूरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों

3. Atul उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 11:12 pm

आशा है आपको आपकी स्वप्नसुँदरी जब भी मिले विभा की तरह न मिले जिसने रवि के सपने के गुब्बारे में सुई भोंक दी थी।

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जब मेरे घर पुलिस पहुंची!

शुक्रवार, सितंबर 23, 2005


यह किस्सा उस समय का है जब मैं अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष(1998) मे था। उन दिनो हम एक छोटे से गांव झालीया मे रहते थे। दिखावे की दुनिया से कोसों दूर विदर्भ (महाराष्ट्र), छत्तीसगड़ और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा एक आम भारतीय गांव "झालीया"। सीधे सादे किसानों का गांव, जिनमे से कुछ ही लोग शहरी सभ्यता और रीती-रिवाज़ों से परिचित थे। और जो लोग कुछ पढ लिख गये थे, वो गांव से पलायन कर शहरों मे बस गये थे।

गांव का जीवन आम बुराइयो से दूर था, कभी लड़ाई झगड़ा, दंगा फसाद, चोरी-चकारी जैसे मामले मैने नही सुने। कभी कोई कहा-सुनी या विवाद हो भी जाता तो लोग आपस मे बैठ कर मामला सुलझा लेते थे। पुलिस का आम जीवन मे कोई हस्तक्षेप नही था। पुलिस का दर्शन गांव मे सिर्फ चुनावों के समय ही होता था, वह भी शासकीय नियमो से बंधे होने के कारण। अन्यथा उसकी भी जरूरत नही थी।

मैं अपने गांव से यही कोई २४ किमी दूर गोंदिया(जिला मुख्यालय) मे इंजीनियरींग कर रहा था। हर सप्ताह शनिवार को घर आता था और सोमवार सुबह वापिस चला जाता था। मैं गांव वालो के लिये “आशीष” से “आशीष भैया” मे तब्दील होते जा रहा था। कभी कभार गांव वाले पूछ लिया करते थे कि अपने कॉलेज मे मैं क्या पढ़ता हुं, जिसका जवाब देना मेरे लिये काफी मुश्किल हो जाता था। अब सीधे साधे गांव वालो को कैसे बताये कि हम कम्प्युटर प्रोग्रामिंग सीख रहे है! उन्हे तो टीवी और कम्प्युटर सब एक ही लगता है।

गांव मे जब मन्दिर की पक्की इमारत बनी, तब कुछ लोगो ने मुझसे सलाह लेनी चाही थी कि मंदिर का नक्शा, संरचना कैसी हो। मैं परेशान कि इन्हे कैसे समझाउं कि मैं नागरी(civil) अभियन्ता नही, संगणक अभियन्ता (Computer Engineer) बनने जा रहा हूं ! उनके लिये तो “इन्जीनर साब” याने पुल और इमारत बनाने वाला! उन लोगो को शायद शक हो रहा था कि मैं कॉलेज मे पढ़ाई लिखाई नही करता, नही तो इन्जीनीर कालेज मे पढ़ने वाले को एक मंदिर के नक्शे बनाने मे क्या परेशानी?

कुछ पीठ पीछे पिछे कहते

"अरे जब चौथी पास कल्लु मिस्त्री नक्शा बना सकता है, तो ‘इन्जीनीर कॉलेज’ मे पढने वाला कैसे नही बना सकता ?"

मेरे कॉलेज मे मेरे सहपाठी काफी दूर दूर से थे, मेरी कक्षा एक तरह से छोटा भारत ही थी। मेरे कुछ सहपाठी(विशेषतया कन्याओं) की ग्रामीण जीवन मे काफी दिलचस्पी होती थी। कभी कभी वे मेरे साथ मेरे गांव आ जाते थे। जब कन्यायें गांव आती थी, तब पूरे गांव के लिये एक चटपटी खबर बन जाती थी। गांव वालो को कन्याऒ का पहनावा (जिंस-टी शर्ट) अजीब लगता था, ये सब उन्होने सिर्फ फिल्मों मे ही देखा होता था। हद तो उस समय हो जाती थी, जब वे उन कन्याऒं को मेरे कंधे पर हाथ रखे देख लेते थे। फुसफुहाटो का एक दौर शुरू हो जाता था। बाद मे वे मेरे से पूछते थे कि


“तुम्हारे साथ आने वाली ये लड़कियाँ इतनी बेशरम क्यों है ?”
"तुम उन लोगो को ढंग के कपड़े पहनने क्यों नही कहते ?"

मैं मुस्कराकर रह जाता था। ऐसा था मेरा गांव।

एक दिन गांव मे “महाराष्ट्र राज्य परिवहन” की बस रुकी। बस से एक हवलदार उतरा। सारा गांव सन्न, ये क्या ? गांव मे पुलिस !

बस स्थानक के पास चाय दुकान वाले धनलालजी दौड़ते दौड़ते हवलदार के पास पहुचे, बैठने कुर्सी दी। पानी पेश किया और “दारोगा साहब” के लिये चाय बनाना शुरू किया। हवलदार ने चाय-पानी पिया, गाल मे बढ़िया पान दबाया, तब तक पूरे गांव मे खबर हो चुकी थी कि गांव मे पुलिस आयी है। सारा का सारा गांव चौक पर इक्कठा हो गया था। हवलदार शायद इन सब बातों का आदि था, उस पर भीड़ देखकर कोई फर्क नही पडा था, शान से पान चबा रहे थे।

पान खा कर पीक थुकने के बाद मे उन्होने प्रश्न दागा,

“इस गांव मे कोई ‘आशीष श्रीवास्तव’ रहता है क्या ?”
बस सारा गांव सन्न! ये क्या हो गया ?

धनलाल जी जोकि मैट्रिक पास है, उन्होने गांव वालो का नेतृत्व सम्हाला:
“जी दारोगा जी ! रहता है जी ! वो श्रीवास्तव गुरूजी का लड़का है जी”

गांव वालो मे कानाफुसी शुरू हो गयी। एक ने कहा

आशीष भैया तो शरीफ लगते है, कभी कोई उल्टी सीधी हरकत नही की, अचानक पुलिस उनको ढुंढते कैसे पहुंच गयी?”
दूसरे का शक अब यकीन मे बदल रहा था:
“आशीष भैया शहर मे जाकर बिगड़ गये है ! पढाई लिखाई नही करते हैं !”
लेकिन किसी की हिम्मत नही हुई कि हवलदार से पूछ ले कि वो मेरे बारे मे क्यों पूछ रहे हैं। हवलदार साहब ने ड्न्डा फटकारते हुये आदेश दिया
“मुझे उसके घर का रास्ता दिखाओ।”
धनलाल जी बोले
“जी साहब जी, मेरे साथ चलो जी !”
बस क्या था, धनलाल जी आगे आगे, हवलदार पीछे पीछे , और उनके पीछे सारा गांव ! एक जूलूस की शक्ल मे हवलदार मेरे घर पहुंचा। अब मेरे घर के सामने पूरा गांव जमा था। जितने मुंह थे उतनी बातें। सब अपनी अपनी अटकलें लगा रहे थे।

अब घर मे मम्मी थी, पापा उस समय स्कूल गये थे।(मेरे पापा एक अध्यापक थे)। मेरी मम्मी भी परेशान कि पुलिस घर क्यों आयी है। हवलदार ने मम्मी से मेरे बारे मे पूछा। मम्मी ने कहा कि मैं गोंदिया मे हुं और शनिवार को वापिस आउंगा। हवलदार ने पापा के बारे मे पूछा। मम्मी ने कहा:

“गुरूजी तो स्कूल गये हैं। आप थोड़ी देर बैठ जाईये, मैं किसी को भेज कर गुरूजी को स्कूल से बुला लेती हुं।” 
(पापा को गांव मे गुरूजी के नाम से ही जानते है)

अब पुलिस वाले इतनी आसानी से मान जाये तो पुलिस वाले कैसे ! आदेश फरमाया

“जब आशीष घर आयेगा उसको पुलिस ‘ठेसन’ भेज देना।”

हवलदार साहब चल दिये,सब को परेशान छोड कर। शाम को पापा घर आये, मम्मी ने सारा किस्सा सुनाया। पापा ने शांति से किस्सा सुना, उन्हे सारा किस्सा घर आते समय ही पता चल चुका था। पापा ने कहा

“चिंता मत करो, कल आशीष आयेगा सब पता चल जायेगा।”

दूसरे दिन गांव पहुँचा। जैसे ही मैं बस से उतरा एक कोलाहल मच गया।

 “आशीष आ गया।”

मै चकराया ये क्या है, मै तो हर सप्ताह आता हुं, लेकिन इस सप्ताह ऐसा क्या खास है।

धनलाल जी ने एक कोने मे ले जाकर कहा :
“कल तुम्हे ढुढंते हुये पुलिस आयी थी, क्या घपला किया है? किसी लड़की का चक्कर है क्या ?”

मैने सोचा कोई “घपला” किया होता तो किसी लड़की का बाप घर आता, शायद मुझे अस्पताल जाना होता। लेकिन पुलिस ?

खैर लोगो से बचते हुये घर पहुँचा। सारा का सारा गांव घूर कर देख रहा था, कानाफुसी हो रही थी। और मै भी परेशान ये क्या चक्कर है।

घर पहुँचते ही मम्मी ने सवाल दागना शुरू कर दिये। पापा शांत थे। पापा ने कहा

” नहा धो लो, कुछ खा लो, उसके बाद पुलिस स्टेशन चलते है”।

मेरे पापा का मुझ पर भरोसा था, लेकिन मामला उनकी भी समझ से बाहर था। हम दोनो १० कि मी दूर पुलिस स्टेशन पहुँ। पुलिस स्टेशन मे वो हवलदार नही था, लेकिन दारोगा था। दारोगा पापा को जानता था। उसने पापा से पूछा

“गुरूजी आप यहां कैसे ? सब कुछ खैरियत से तो है?”
पापा ने कहा
“ये तो आपको बताना चाहिये कि सब कुछ खैरियत से है या नही। कल आपका एक हवलदार आशीष को पूछते हुये मेरे घर पहुँचा था”
दारोगा :
“अच्छा अच्छा, वो आशीष ये है !”

मैं और परेशान ! दारोगा अब मेरे से मुखातिब हुये
” तुमने पासपोर्ट के लिये अर्जी दी है ?”
मेरी जान मे जान आयी
” हां जी दी है।”
दारोगा :
“कोई खास बात नही है, नये पासपोर्ट के लिये जो पुलिस जाँच होती है, बस उसी के लिये कल हवलदार को भेजा था।”

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टिप्पणीयाँ
1. Atul उवाच :
सितम्बर 23, 2005 at 6:25 pm ·
सही है। पते की सत्यता जाँचने के लिए हवलदार आया होगा। पूरे गाँव को देख कर शकोशुबह की कोई गुँजाइश न बची होगी कि आप गांव में ही रहते हैं। अब आपके गांव पहुँचने पर क्या नजारा होता है?
2. सुनील उवाच :
सितम्बर 24, 2005 at 9:48 am ·
उस हवालदार को मालूम था कि लोग तो कुछ और ही सोचेंगे, तरह तरह की बातें बनायेंगे. यह भी मालूम होगा कि घर वाले परेशान होंगें. जब आ कर घर देख लिया तो उसने बताया क्यों नहीं कि पासपोर्ट की चेकिंग के लिए आया था ? यह सच है कि बाद में जरुर ऐसी बात सुनाने वाला किस्सा हो जाती है, पर उतना ही सच है कि इन पुलीस वालों को सताना अच्छा लगा है.
सुनील
3. anunad उवाच :
सितम्बर 24, 2005 at 12:14 pm
आनन्द आ गया , पढकर ।
सचमुच , सत्य को कह देना ही मजाक का सबसे अच्छा तरीका है ।

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न्यु आरलेन्स और मुम्बई

मंगलवार, सितंबर 06, 2005

मै अपने आपको मुम्बई और न्यु आरलेन्स से तुलना करने से रोक नही पाया

१. कुल बारिश
मुम्बई मे (२७ जुलाई) ३७.१ इंच
न्यु आरलेन्स - १८ इंच

२.जनसंख्या
मुम्बई .... १२,६२२,५००
न्यु आरलेन्स .... ४८४,६७४

३.कुल मौत (४८ घन्टो मे)
मुम्बई .....३७
न्यु आरलेन्स ..... १००(?)

४.सुरक्षित बाहर निकाले गये लोग
मुम्बई .....१०,०००
न्यु आरलेन्स ..... उफ ?

५. हिन्सा और गोलीबारी को घटनायें
मुम्बई ..... ०(शुन्य)
न्यु आरलेन्स ..... गिनती नही

६. सेना को घटना स्थल पर पहुंचने मे लगा समय
मुम्बई ..... १२ घन्टे
न्यु आरलेन्स ..... ४८ घन्टे

७. ४८ घन्टे बाद की स्थीती
मुम्बई .....वापिस अपने पैरो पर खडा
५ दिनो बाद तक न्यु आरलेन्स ..... मदद के लिये इ‍तजार, अराजकता, खाना पानी कुछ नही.....

८. सयुंक्त राज्य अमरीका --- विश्व का सबसे ज्यादा अमीर और विकसीत देश
भारत -- एक विकासशिल देश

इस चिठ्ठे से मेरा ये मतलब नही कि भारत आपदा नियत्रंण् मे काफी कुशल है. मेरा ये कहना है कि दुनिया को उपदेश देने वाले अपने गिरेबान मे झांक कर देख ले।

मानवाधिकार के दारोगा को अपने नागरीको के मानवाधिकार नही दिख रहे है, ८ दिन बाद भी पानी पर लाशे तैर रही है।

केन्द्रीय सरकार और सेना राहत कार्य के लिये लिये औपचारिक निमंत्रण का इंतजार कर रही है, जैसे इराकी जनता अमरीका को सद्दाम हुसैन से बचाने के लिए भेजा था !

मैने अपना टी वी बन्द कर दिया है कुछ दिनो के लिये !

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कैटरीना का कहर !

शुक्रवार, सितंबर 02, 2005

तूफान गुज़र गया है, छोड़ गया है अपने पीछे जलमग्न शहर, उजड़े मकान, पानी मे तैरती लाशे, भूखे प्यासे लोग !
तुफान गुजरे हुये आज पाँचवाँ दिन है| लेकिन आज भी हजारो लोगो के पास रहने के लिये छत नही है, पिने के लिये पानी नही है, खाने के लिये कुछ नही है| एक छत के निचे हजारों लोग रह रहे है, जहा ना मूलभूत सुविधाओं का अभाव है| एक बुढ़िया व्हील चेयर पर बैठे हुये ही मर गयी ,किसी को चिन्ता नही है| बस किसी ने उसके उपर एक कंबल डाल दिया|

भुखे बच्चे कुडे के ढेर मे खाना ढूंढ रहे है| हजारों लोग प्रशासन से सहायता ना मिलने पर पैदल ही चल कर खाने पिने की वस्तुए जमा कर रहे है|
बिमार लोगो के इलाज के लिये जगह नही है, लोगो को जमीन पर ही लिटा दिया गया है| खाने-पीने वस्तुओ के लिये लबीं लंबी कतार लगी हुई है| हज़ारों लोग अब भी भोजन-पानी का इंतज़ार कर रहे हैं|
शहर मे लुट मार मची हुई है| जिसके हाथ मे जो बन रहा है वो लेकर चल रहा है| हथियार बंद लोगो के दल ने लुट मचा दी है| अभी तक शहर में लूटमार करने वालों पर भी नियंत्रण नहीं पाया जा सका है|
ये चित्र है तीसरी दुनिया के किसी पिछड़े देश का नही है, ये चित्र है दुनिया के सबसे शक्तिशाली और समृद्ध देश अमरीका का !
कैटरीना के कारण सबसे ज़्यादा प्रभावित न्यू ऑर्लियंस में अभी भी हज़ारों की संख्या में लोग शहर के निकाले जाने की बाट जोह रहे हैं|
शहर के फ़ुटबॉल स्टेडियम सुपरडोम के बाहर बड़ी संख्या में लोग मौजूद हैं और उनकी हालत बदतर है|
लोगों का कहना है कि समुद्री तूफ़ान कैटरीना के कारण तबाही बड़े पैमाने पर हुई है लेकिन राहत कार्य उस गति से नहीं हो रही|
सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा उन लोगों में है तो तबाही के कारण दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं| लेकिन फ़ेडेरल इमरजेंसी मैनेजमेंट एसोसिएशन ने लोगों से संयम की अपील की है|
एसोसिएशन का कहना है कि उनके पास सहायता सामग्री की कमी नहीं| लेकिन तबाही इतने बड़े पैमाने पर हुई है कि इसे प्रभावित लोगों तक पहुँचने में समय लगेगा|

कैटरीना तुफान से उठे कुछ प्रश्न
१. जब ये मालुम था कि तूफान का स्तर ५ है जो की सबसे खतरनाक है, पहले से व्यापक तैयारी क्यो नही की गयी ?
२. तूफान के तिसरे दिन जब लुट मार की शुरूवात हुइ तब कुल जमा १५०० सुरक्षाकर्मी थे. जिन्हे ये समझ नही आ रहा था कि लोगो बचाये या कानुन व्यवस्था बनाये रखे ?
३. सेना को तुरंत राहत कार्यो पर क्यों नही लगाया गया ?
४. स्वयंसेवको का अभाव क्यो है ?
५. संवेदनशीलता का अभाव भी देखने मे आ रहा है. अन्य भागो से तूफान प्रभावित लोगो को उनके दोस्तो ने इमेल भेजा कि वे उनके घर पर रहने आ सकते है ! जहां बिजली नही, संचार माध्यम नही वहा ईमेल भेजा गया !

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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