ये क्या हो रहा है ?

बुधवार, नवंबर 30, 2005


खबर है अमिताभ बच्चन बिमार हो गये । माना अमिताभ जी एक उतकृष्ट अभिनेता है, उन्होने हिन्दी फिल्म उद्योग को काफी कुछ दिया है। मै उनके स्वस्थ होने और लम्बी उमर की कामना करता हुं।

लेकिन हमारे मिडीया को क्या हो गया है ? हाथ धो कर पिछे पड गया। सीधा प्रसारण शुरू कर दिया, हर मिनिट की जानकारी देना शुरू कर दी। एक बीमार इंसान को यदि घेर लिया जाये तो वह स्वस्थ होने की बजाय और घबरा जायेगा। मरीज तो परेशान ही, मरीज के घरवाले भी परेशान, बाकी मरीज और उनके घरवाले भी परेशान।

समाचार पत्र, टी वी, इंद्रजाल जहा देखो वहा एक ही खबर।

उपर से तुर्रा ये कि अमितजी की बिमारी “आंतो मे सुजन” है, जो एक सामान्य बिमारी है। एक डाक्टर के अनुसार उसके पास आने वाले २०% मरीज इसी बिमारी के होते है। “मीड डे” वाले तो और भी आगे पहुंच गये, अमिताभ जी ने क्या खाया था ये भी पता कर लिया।

कोफ्त तो उस समय होती है जब मिडिया के सामने अभीषेक बच्चन हाथ जोडकर जाने कह रहे है “हट जाओ यहां से” और मिडीया वह फोटो छाप दे रहा है !
बाकी मरीजो के रिश्तेदारो को मजबूरन कहना पड रहा है “इन लोगो के लिये अलग अस्पताल होना चाहिये।

क्या भारतीय मिडीया के पास और कोई खबर नही है या मानसीक रूप से दिवालिया हो गया है ?

वैसे ये हफ्ता मिडिया के लिये काफी अच्छा रहा , काफ़ी मसाला मिल गया। उमा भारती और राज ठाकरे ने कोई कसर नही छोडी।

वैसे इन दोनो खबरो से कोई आश्चर्य तो नही हुवा। अपेक्षीत ही था। उमा भारती का दिमाग सांतवे आसमान पर पहुंच गया था, अब जमीन पर आ गया होगा। परिवारवाद को पानी पी पी कर कोसने वाल बाल ठाकरे ने परिवार को बढाया तो पहले राणे और बाद मे भतिजा ही विरोध मे आ गया।

देखते है आगे क्या होता है।

1 टिप्पणी 
1. eswami उवाच :
दिसम्बर 1, 2005 at 12:17 am ·
बिल्कुल यही विचार मुझे भी आए थे - क्या भारत क्या अमरीका और क्या यूके सब जगह न्यूज़ अब इन्फोटेनमेंट हो गई है। और चाहे जो परोस रहे है मीडिया वाले।

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“दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……..” कहानी पूरी फिल्मी है भाग २

बुधवार, नवंबर 23, 2005


एक सीधी सादी सी लडकी, पढी लीखी लेकिन मध्यम वर्ग से। जिन्दगी बस घर से कार्यालय और कार्यालय से घर। किसी से ज्यादा घुलना मिलना नही, बस काम से मतलब रखना। ज्यादा उंचे ख्वाब नही, जो घर वाले कहे वह पत्थर की लकीर। कोई डांट दे, या किसी की कोई बात बुरी लगे तो रो देना। एक आम भारतीय लडकी।

एक लड़का, वही मध्यम वर्ग से। घर से पहली बार निकला, दुनियादारी क्या होती है नही मालूम। बचपन से लेकर जवानी तक घरवालो की छत्रछाया मे रहा, जिससे थोड़ा लापरवाह। घर मे लड़कों के स्कूल,महाविद्यालय मे पढ़ा और बढ़ा। कभी लड़कियों से बात नही की और करना आता भी नही। वैसे तो बातें बनाने मे कोई जवाब नही लेकिन कन्या राशी के सामने बोलती बन्द।

जब ये दोनो मिले तो हिन्दी फिल्मो की तरह कुछ तो होना ही था। लडके को लडकी भा गयी। लेकिन लडकी अपनी दुनिया मे गुम जिसे अपने काम और घरवालो के अलावा किसी से मतलब ही नही। सहकर्मी से सिर्फ हाय-हेलो का रिश्ता।

कहते हैं कि इंसान प्यार मे अन्धा हो जाता है, अब तो यह मै भी मानता हुं। हमार इस कहानी के नायक भी इसी सुर दास की श्रेणी मे आ गये। अकल से काम लेना बन्द कर दिया। जहां लडकी वहा पर हीरो। चाहे वो दोपहर का भोजन हो या शाम की चाय जहां लडकी जाये वहा अपने भाई साहब किसी ना किसी बहाने पहुंच जायेंगे। ये बात और है कि भाई ने कोई बेहुदा हरकत तो दूर उस लडकी से कोइ बात तक ही नही की !

शाम को कमरे पर मेरा और मेरे एक और दोस्त (अन्ना) का दिमाग चाटना शुरू। अब क्या करना चाहिये, अब क्या करूँ वगैरह वगैरह…।। हम लोग उसे प्यार से सब कुछ समझाते, भईया कम से कम उस लडकी से बात तो करो … भाई साहब बाकायदा शान से छाती फुलाकर कहेंगे, कल बात करता हुं…। और ये कल आज मे कभी तब्दील नही हो पाया।

अब दोनो साथ मे काम करते थे तो लड़की धीरे धीरे सहज हो गयी, कभी कभार हाय हेलो कर देती, कभी चाय पीने जाते समय औपचारीकतावश वक्त पूछ लेती थी। भाई को लगा कि बात आगे बड रही है, और ख़याली पुलाव पकाने लगे थे… अब हम ठहरे थोडे पुराने खिलाड़ी, सब समझ रहे थे, कि लड़की सिर्फ एक सहकर्मी( दोस्त भी नही) की तरह बर्ताव कर रही है।

धीरे धीरे हमने सोचा कि चलो अब मुझे एक उत्प्रेरक की भूमीका मे आना होगा। पहले सोचा चलो कि दोनो मे बात कराते है, साथ मे घूमने फिरने का मौका देते है और देखते है कि बात कहां तक बढती है। बाद मे सोचते हैं कि अगला कदम क्या होगा। जबवह लड़की अपने एक सहकर्मी सहेली की शादी मे जा रही थी, तो मौका देखकर हम ने लड़के को साथ मे चिपका दिया और प्रतियोगिता की जो भी सम्भावना थी उसको खत्म कर दिया। सोचा था दोनो शादी के बहाने पूरे २ दिन साथ मे रहेंगे प्यार तो नही , कम से कम दोस्ती तो ज़रूर हो जायेगी।

हम चल दिये २ सप्ताह की छुट्टी पर घर, वापिस आने पर हमने लड़के को निराशावस्था मे पाया। हमारा माथा ठनका, ये क्या हुवा ! पूछा तो पता चला कि लड़की अब उससे कटने लगी है, चाय पर जाते समय उससे बात भी नही करती(साथ मे बुलाना बन्द) है। हमने थोड़ी जासूसी की तो पता चला, अपने भाई जब शादी मे गये थे, तब २ दिनो तक दोनो साथ मे अच्छे दोस्तों की तरह रहे थे और अच्छा समय काटा था। लेकिन विघ्नसतोंषी सहकर्मियो ने बात का बतंगड बना दिया है और कानाफुसी चालू कर दी है। और ये सब उस लड़की को पता चल गया है।

ऐसे तो ये सभी लोग मेरे से २ पद स्तर निचे है(कार्यालय के) लेकिन मेरी छवि काफी अच्छी है, और मुझे काफी सम्मान मिलता है। किसी को को व्यक्तिगत परेशानी होने पर भी वह मुझसे विचार विमर्श कर लेता है। कुल मिलाकर इन लोगो के लिये मै “बास कम एक मार्गदर्शक ज्यादा हुं”। मैने सोचा चलो लडकी के मन की बात पता की जाये। ऐसे ही उससे मैने बात करने लगा। उसने मुझसे पूछा
और आप शादी कब कर रहे हो ?” 

ये मेरे लिये कभी अनपेक्षित प्रश्न नही रहा है, हर कोई पूछता है। और हमने यही सवाल मानोशीजी से भी पूछा था कि हमारी शादी की कितने प्रतिशत संभावना है लेकिन कोई जवाब नही आया !

“मुझे छोडो मुझसे शादी करने कोई तैयार नही है, मेरी जन्मकुडली मे सन्यास योग है तो हर कोई मुझे अस्वीकार कर देता है।” 
मैने उससे पलट के पूछा
“तुम बोलो तुम्हारा अपना शादी क्या इरादा है ?”
लडकी ने थोडा शर्माते सकुचाते जवाब दिया
“अगले हफ्ते उसके घर लडके वाले देखने आ रहे है”।
मै मन ही मन मे
” गयी भैंस पानी मे, अब अपना हीरो अताउल्लाह खान के गाने गायेगा।”
मै प्रकट मे
 “कौन है वो बदनशीब?” ये मेरा अपना तरीका है सभी जानते है।
लडकी (पूरी बीर बहुटी हो कर )
“मेरे पापा के एक बचपन के दोस्त का लड़का, बंगलोर मे काम कर रहा ह॥”
मै मन मे ही
“आज वापिस जाते समय किशोर के दर्द भरे नग्मो की कैसेट ले लेता हुं , अपने हीरो को भेंट दे दूंगा।”

मैने पूछा
” तुम्हे पसन्द है?”
“मेरी पसन्द या नापसन्द का सवाल ही नही है, जो पापा कहेंगे वो मै करूंगी।”
मैने सोचा चलो थोडी उम्मीद है, अगला सवाल दागा
” मानलो यहां कोई दिवानगी की हद तक तुम्हे चाहता हो और तुम से शादी करने को तैयार हो तो तुम क्या करोगी ?”

“इसका कोई चांस ही नही है। मेरी मम्मी की मौत मेरे बचपन मे हो गयी थी। पापा ने मुझे और छोटे बहन और भाई को बडा किया है। मै ऐसा कोई कदम नही उठा सकती जिससे मेरे पापा के दिल को ठेस पहुंचे और मै तो अपने छोटे भाई बहनो के लिये एक आदर्श भी रखना है”

मै कितना भी आधुनिकतावादी बनने की कोशीश कंरू, लेकिन मै भी एक मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखता हुं और मेरे पास लडकी की इस बात का कोई जवाब नही था। और मैने कई बार महसुस भी किया था कि वह अपने पापा को कितना चाहती है। वह दिन मे कमसे कम ५-६ बार अपने पापा को फोन कर भोजन, चाय और दवाईयो के बारे मे निर्देश देते रह्ती थी।

”वैसे मै जानती हुं कि आप किसकी बात कर रहे हैं, मैने कभी भी किसी भी लड़के को कभी उस नजर से नही देखा है ना देख पाउंगी, मै अपने पापा को कभी नीचा नही दिखा सकती।”
“तुम काफी सुलझे विचारों वाली लड़की हो, वही करो जो तुम्हारे दिल को अच्छा लगे। एक बात ध्यान मे रखना कि ऐसा कोई कदम मत उठाना कि तुम्हें भविष्य मे पछताना या पीछे मुड़कर देखना पढ़े।”
अगले हफ्ते लड़की कार्यालय मे सगाई की मिठाई लेकर आ गयी। एक दिल और टूटा !

मै परेशान ,कि मेरे दोस्तो मे दिल टुटने का रिवाज अभी तक कायम है। मेरे साथ अब तक ऐसा हुवा है कि किसी का कोई प्रेम प्रसंग हो चाहे एक तरफा या दो तरफा, यदि गलती से भी मुझे पता चल गया तो वह एक या दो महीनो से ज्यादा नही टिका है। इसमे से एक मामला तो आत्महत्या का भी है।

अपना हीरो आजकल किशोर के दर्द भरे नग्मे सुन रहा है “दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……।।”

6 टिप्पणीयां » 
1 kali उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 8:16 pm ·
Isi per yeh joke yaad aa gaya:
Pagal khane main
patient # 1 : “Rupa”, “Rupa”।
New Doctor: Sir isse kya hua?
Old Doctor: Poor Chap, Rupa ke pyaar main pagal ho gaya, Rupa ki kahin aur shadi ho gayi thi।
Patient #2: “Rupa”, “Rupa”
New Doctor: Sir yeh bhi usi Rupa ke pyaar main nirash premi hai kya।
Old Doctor: Oh no, young man, yeh jyaada pagal hai, Rupa ki isse hi shadi hui thi।
2 Nitin Bagla उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 10:25 pm ·
बहुत खतरनाक इंसान हैं मतलब आप…।।:)
3 मानोशी उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 11:14 pm ·
अब लगता है तुम्हरी पत्रिका देखनी ही पडेगी| तुम्हारी शादी हो जाये तो शायद लोगों के भी घर बसने लगें|
4 अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 24, 2005 at 5:22 pm ·
अब कहां बच के जाओगे? मानसी तुम्हारी शादी करा के ही मानेंगी।
5 आलोक कुमार उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 11:54 am ·
अधिकतर प्रेम कहानियाँ इसीलिए नहीं आगे बढ़ती हैं क्योंकि लोग मौजूदा हालत को बदलने की हिम्मत नहीं कर पाते - यानी कि अभी बोलचाल है, सलाम नमस्ते है, बाद में शायद ये भी न बचे? पर हाथ मलने से अच्छा है ओखल सर में डाल दो। मान लो कि जनाब की मोतरमा से शादी हो जाती तो भी क्या ज़िन्दगी भर सुखी रहते? या दुखी रहते? पता नहीं। उनका जीवन भी बाकियों जैसा होता। पर अब एक सान्त्वना है कि एक सच्चा प्यार था। सपना हकीकत नहीं बना, इसलिए मधुर रहा। वास्तविकता की कर्कशता इसमें नहीं आई।
6 pratyaksha उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 5:32 pm ·
मानसी और अनूप की टिप्पणी के संदर्भ में…
“अब कहां बच के जाओगे”
आशीष बचना चाहते हैं क्या ?
प्रत्यक्षा

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अनुगूँज (15) : हम फिल्मे क्यों देखते है !

बुधवार, नवंबर 16, 2005



हम फिल्मे क्यों देखते है ? अरे भाई मै तो सिर्फ अपने बारे मे बता सकता हुं कि मै फिल्मे क्यों देखता हुं। भगवान की दया से अब तक क्वांरा हु और कोई महिला मित्र है नही, इसलिये अकेले ही देखता हुं। एक जमाना था जब हम यारो के साथ फिल्मे देखा करते थेहै। वैसे यारो के साथ फिल्मे कहां देखते थे, हंगामा करते थे, नैन सुख लेते थे, पॊप कार्न खाते थे और ठंडा पीते थे। मतलब कुल जमा चित्रपट गृह मे फ़िल्म देखने के अलावा हर वो हरकत करते थे जो नयी नयी जवानी मे की जाती है।

फिल्मे अब भी देखते है लेकिन अकेले देखते हैं। अब क्यो देखते है ? यह तो निश्चित ही शोध का विषय है, फुर्सत मिले तो पी एच डी कर सकते हैं। लेकिन कम्बख्त हर सप्ताह कम से कम २-४ फिल्मे आ जाती है, फुरसत मिले तो कहां से। वैसे भी फुरसत पर तो अब फुरसतियाजी का एकाधीकार हो गया है।

अब सवाल उठ ही गया है तो सोचते है कि हम(मै) फिल्मे क्यों देखते हैं।

जब हम कालेज मे थे और मार्च अप्रैल का विकट काल चल रहा होता था, मतलब की परिक्षायें चल रहे होती थी। तब यदि किसी विषय का प्रश्नपत्र अच्छे से हल कर आ गये तो हम खुश हो कर फिल्म देखने जाते थे।भाई इतना इस प्रश्नपत्र मे सफल होने के लिये फलां दादा को पूरे ५ प्रयास करने पडे थे, अब हम तो पहली बार मे निकाल रहे है, थोडा उत्सव तो होना चाहिये। अब यदि प्रश्नपत्र अंग्रेजी मे आ गया है(मतलब कि सारे के सारे प्रश्न समझ से बाहर हो) और असफल होने के पूरे आसार हो, तब मुड ठिक करने फिल्म देखते थे। आखिर अगले प्रश्नपत्र की भी तो तैयारी करनी है, अब मुड खराब हो तो अगला प्रश्नपत्र भी तो ठुक जायेगा ना।
जब यह विकट काल बीत जाता था, तब कुछ करने तो होता नही था अब क्या करे फिल्मे देखों।
कालेज जमाने मे हमारे फिल्म देखने के कुछ कारण :


  • वो अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने जा रही है।
  • राजेश अपनी महिला मित्र के साथ फिल्म देखने जा रहा है।(हम थोडे विघ्न संतोषी जीव ! जब राजेश ने हमारे साथ फिल्म देखने से मना कर दिया तो उसके साथ कैसे देख सकता है ?)
  • आज पहली तारीख है, घर से धनादेश आया है।
  • रविद्रकांत आज घर से वापिस आया है। (अब खाली हाथ थोडे ही आया होगा)
  • आज सुमित का जन्मदिन है, सभी को फिल्म दिखायेगा।
  • नन्दी जिस पर मरता है उसका जन्मदिन है। (अब वो लड्की नन्दी महाराज को घास नही डालती तो इसमे हमारी क्या गलती ?)
  • उसने साथ मे फिल्म देखने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सारा मुड खराब हो गया।
  • उसने साथ मे फ़िल्म देखने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। (ये बात और है कि अपने साथ अपनी दोनो छोटी बहनो को भी ले आयी।)

वगैरह वगैरह…।।
अब कालेज के दिन गये, उज्जड जवानी गयी ! ना भईया हम अभी बुढे नही हुये है, मै तो अभी भी जवान हुं। अब हमारी जवानी मे परिपक्वता आ गयी है, अब हम विघ्न सतोषी नही है। किसी दोस्त को अपनी महिला मित्र (पत्नी) के साथ फिल्मे देखते हुये हम गाते है

लाखों तारे आसमा मे एक मगर ढुढें से ना मिला
देख के दुनिया की दिवाली दिल मेरा चुपचाप जला !

जब ऐसा मुड हो तब हम बेखटके ‘देवदास’ देख आते है।

जब हम अपने रहने के लिये आशियाना ढुण्ढ रहे होते है और मकान मालिक हमारे क्वारेपन के कारण इकार कर देता है, तब हमे “घरौंदा” जैसी फिल्मे देख लेते है। अब नौकरी अच्छी है, अच्छा खासा कमा लेते है,लेकिन ‘दिल है कि मानता ही नही’ और पैसा चाहिये ! मन बहलाने के लिये “कांटे”, “आंखे” जैसी फिल्म देख आते है।
अभी जहा हम काम कर रहे है, वहा पर नये रंगरूटो के आने का समय है। हर सोमवार को नये नये खूबसूरत चेहरे दिखाई दे जाते है, कार्यालय की खूबसूरती मे हर हफ्ते इजाफा होते जाता है। हमारे मुरझाई उमगों की जडो मे पानी पड जाता है, दिल मे नयी लहरे उठना शुरू होती है। और हमारा रोमांटिक फिल्मे देखने का मौसम आ जाता है।

अब जब हम भारत मे रह रहे है, देर सबेर कभी ना कभी सरकारी दफ्तरो से तो पाला पड्ता ही है। अव्यवस्था, रिश्वतखोरी से चिढ होती है, तब हमे नाना पाटेकर की फिल्मो(प्रहार जैसी) का भुत चढता है। भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच मे भारत के हारने पर जब पडोस के मुहल्ले मे पटाखे छुटते है तब हम सन्नी दयोल की “गदर” या “मिशन कश्मीर ” नुमा फिल्मे देखते है।

कभी कभी घर मे बिजली गुम हो जाती है, और गर्मी के मारे बूरा हाल हो जाता है तब हम मिथुन दा की फिल्म देख आते है। क्या मीठी निंद आती है , मिथुन दा की फिल्मो मे। मेरे ख्याल से मिथुन दा को तो अनिद्रा के रोगीयो के लिये एक चिकित्सालय खोल ही लेना चाहिये।

कुल मिला के हाल यह है कि मुड कोई भी हो, हमारे मुड के अनुसार फिल्मे मिल ही जाती है।

वैसे हमे समानांतर सिनेमा से कोई दुश्मनी नही है, लेकिन हमारा मानना है कि फिल्मे हल्के फुल्के मनोरंजन का साधन है। जिंदगी मे ऐसे भी परेशानीयो की, दुखो की कमी तो नही है जो सिनेमागृह मे भी जाकर वही सब कुछ देखे। मै ज्यादातर ऐसी फिल्मे देखता हुं जिसमे सोचने की जरूरत ना हो, दिमाग घर पर रख कर आओ। सारी दुनिया जहान को भुल्कर २-३ घन्टे फिल्म का आनंद लो, खुल कर हंसो। अब आप ही बताये “जाने भी दो यारो” से बढ्कर कोई यथार्थ वादी फिल्म हो सकती है, हास्य और यथार्थ का कितना सुंदर संगम है !

हां जब मुझे अपने आप को जब बुद्धीजिवी(इंट्लैक्चुवल) साबीत करना होता है या दिमाग पर जोर देना होता है तब मै घर पर ही(सिनेमाघर मे नही) समानांतर सिनेमा देख लेता हुं।

बस हम ऐसे ही फिल्म देख लेते है !


4 टिप्पणीयां 
1. Atul उवाच :
नवम्बर 16, 2005 at 7:24 pm ·
फिल्मे देखने के कारण तो सुँदर है पर मिथुन दा की फिल्मे इतनी बुरी तो नही होती थी बँधु, याद करो मृगया, डिस्को डाँसर और एक फिल्म का नाम भूल रहा हूँ जिसमें वह हिरोईन के हाथ कटे भाई बनकर विनोद मेहरा से पँगा लेते थे, वगैरह। किसी जमाने में मिथुन दा गरीब निर्देशकों के अमिताभ कहलाते थे।


2. अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 17, 2005 at 6:50 am ·
बढ़िया पिक्चर है। हमें तुम्हारी बनाई पिक्चर का इंतजार रहता है।जहां तक बात रही फ़ुरसत की तो भइये हम सारी की सारी भेज देते हैं। जी भर मौज करो।
3. अक्षरग्राम » Blog Archive » अवलोकन अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं उवाच :
दिसम्बर 2, 2005 at 1:35 pm ·

[…] विषय तो सभी को प्रिय होगा इतना पता था पर अपने आशीष जी खालीपीली के उत्साह की दाद देनी पड़ेगी पहली प्रविष्टि भेजने के लिए बधाई। लिखी भी एकदम फक्कड़ स्टाइल से है और “छड़यां दी जून बुरी” के बारे में बताना नहीं भूले। जिंदगी के हर मूड के लिए उनके पास फिल्में हैं - […]


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वो ४८ घन्टे

रविवार, नवंबर 06, 2005

अमरीका से वापिस आये हुये २ सप्ताह हो चुके थे, दीपावली पर घर जाने की पूरी तैयारी थी।  भला हो भारतीय रेलवे का जो उन्होने इन्द्रजाल के द्वारा यात्रा टिकट उपलब्ध करवा दिये है| अमरीका से निकलने से पहले ही मै अपने टिकट खरीद चुका था। वापिस चेन्नई आने पर टिकट मेरा ईंतजार कर रहे थे। सोचा था कि अब घर जाकर कुछ आराम किया जाये। मेरे साथ मुसीबत यह है कि यदि मै रेल से घर जाउं तो 18 घन्टे लगते है और वायुयान से 14 घन्टे ! चेन्नई से नागपुर सीधी उड़ान नही है, जिससे मुझे मुम्बई होते हुये जाना होता है। नागपुर से मुझे मार्ग बदल कर मुम्बई हावडा मार्ग पर गोंदिया जाना होता है जो मेरा गृह नगर है। इसलिये मै रेलमार्ग ही पसन्द करता हुं। कम पैसो मे ज्यादा सफर।

लेकिन मुसीबत मेरा पीछा कर रही थी, मुझे क्या मालूम था कि अमरीका के हरीकेन(कैटरीना/रीटा/विल्मा) अब नाम बदल कर मेरे साथ चेन्नई चक्रवात के रूप मे पहुंच गये है। मुझे 28 अक्तूबर शुक्रवार को तमिलनाडु एक्सप्रेस से निकलना था, लेकिन बारिश बुधवार से ही शुरू हो गयी। चेन्नई मे बारिश एक आश्चर्य होता है। लेकिन इस बार बारिश मुसलाधार हो रही थी, बिना रुके लगातार। मैने चेन्नई मे इतनी बारीश कभी देखी और सुनी नही थी जो अब देख ली। मै अड्यार मे रहता हुं, जो ऊंचाई पर स्थित है, बारिश का पानी जमा नही होता। इस बार मेरे कमरे(घर नही) के सामने 4 फुट पानी था।

गुरूवार सुबह दोस्तो ने फोन कर बता दिया कि आज कार्यालय बन्द है, सडको पर पानी जमा हो गया था। कार्यालय जाने के लिये नाव के अलावा और कोई साधन नही था। मै और मेरे साथी परेशान क्या करें ! कमरे मे खाने और पीने के लिये कुछ नही। इससे ज्यादा परेशान इसलिये कि सभी का घर जाने का कार्यक्रम पर पानी फिर रहा था। मै सबसे ज्यादा परेशान,मुझे हर हालत मे घर जाना था। मै पहली बार घर से पूरे ८ महिने के लिये दूर था।

शाम तक बारिश नही रूकी ,पता चला चेन्नई आनेवाली और जानेवाली सारी की सारी रेले रद्द कर दी गयी है। मै और परेशान। हवाईअड्डे पहुंचा, उडान पट्टी पर पानी, उड़ाने रद्द। फिर भी मैने सोचा शुक्रवार ना सही, शनिवार, रविवार या सोमवार का टिकट मिल जाये ताकि मै मंगलवार दीपावली से पहले घर पहुंच जाउंगा। लेकिन जेट/सहारा तो दूर ढक्कन वाले(एअर डेक्कन) भी भाव खा रहे थे। फरमाया कि 5 नवंबर तक किसी भी विमान सेवा मे किसी भी श्रेणी मे स्थान उपलब्ध नही है !

शुक्रवार सुबह, बारीश रूक गयी और धुप निकल आयी। थोडी आशा जगी। सडको पर से पानी छंट गया था। मै अपना सामान बांध चुका था। रेलवे पूछ्ताछ फोन किया पता चला कि दोपहर तक की सारी रेले रद्द है और बाकी रेलो के बारे मे शाम को विचार किया जायेगा। विमान सेवा के बारे मे पता किया, हालात वही थे, कोई जगह खाली नही थी। मेरा एक रूममेट शाम 4:30 की जीटी से जा रहा था उसने पता किया की जीटी और तमिलनाडु दोनो जा रही है लेकिन मार्ग बदल दिया गया है। मैने सोचा ठीक है,कैसे भी पहुंचाओ लेकिन पहुंचाओ तो !

मेरा एक और सहयोगी जो मेरे साथ मेरी ही रेल से जा रहा था, उसने फोन किया कि तमिलनाडु एक्सप्रेस रद्द कर दी गयी है और वो अपने टिकट रद्द करवा चुका है। मेरा दिमाग चकराया। मैने फिर से रेलवे मे पूछताछ की , जवाब आया की स्थिति पूर्ववत है, याने बदले हुये मार्ग से तमिलनाडु एक्सप्रेस जा रही है। बस समझ मे आ गया कि हमेशा की तरह अफवाहो का बाजार गर्म है। समझ मे नही आता, कि हम लोग अफवाहे फैलाने मे सबसे आगे कैसे रहते है ! अब तो विश्वव्यापी अफ़वाह भी(गणेश जी का दूध पीना) फैलाते है !

सोचा रेल के समय पर स्टेशन पहुंच जाओ, जो होगा देखा जायेगा। कमरे से निकल कर वापिस नही आऊंगा। रेल रद्द तो बस से हैद्राबाद और वहा से घर जाउंगा। वो नही हुवा तो कार किराये से लेकर जाउंगा, बस घर जाना है। कैसे भी।


4:30 शाम, मेरा रूममेट रेल्वे स्टेशन पहुंचा, पता चला उसकी रेल जी टी रद्द कर दी गयी है ,लेकिन मेरी तमिलनाडु एक्सप्रेस जा रही है। मन थोडा घबराया, लेकिन आशा अभी जवान थी। राम राम करते 9 बजे रेलवे स्टेशन पहुंचा। 9:30को को रेल प्लेटफार्म पर आ गयी। थोडी आशंका अभी भी थी। लेकिन ठिक 10 बजे रेल चल दी। अब मन शांत हुवा, चलो चल तो दिये , देर से सही पहुंच तो जायेंगे।

हर डिब्बा खचाखच भरा हुवा था, एक एक शायिका पर 5-5 लोग यात्रा कर रहे थे। 2 दिनो का कम से कम 5 रेलो के यात्री एक रेल से जा रहे थे। लेकिन सभी खुश थे, कोई किसी से शिकायत नही कर रहा था। जिसे जहां जगह मिल गयी वहां जम गया था। मेरी कुपे मे 7-8 आइ आइ टी के छात्र जा रहे थे, एक के पास वैध टिकट था, बाकि उस के भरोसे जा रहे थे। ऐसा हर जगह था। मेरी साथ कोई नही था, लेकिन वो लोग हो लिये।

रेल चल तो दी, रेल की पैन्ट्री का दो दिन का खाना एक दिन मे साफ हो गया! दुसरे दिन 2 बजे दोपहर मे नागपूर पहुंचने वाली रेल शाम के 8 बजे सिकंदराबाद पहुंची थी। मै भूख से परेशान था। मै सामन्यतः रेल यात्रा मे कुछ नही खाता। सिकंदराबाद मे कुछ केले खाये। आइ आइ टी के छात्र साथ मे थे जिससे लम्बी और उबाउ यात्रा मनोरंजक हो गयी थी। वो लोग मस्ती कर रहे थे, हर किसी को छेड रहे थे। जिसका सभी आनंद उठा रहे थे। और मुझे अपना कालेज जमाना याद आ रहा था। 16 घन्टो का सफर 32 घन्टो मे तय कर मै नागपूर पहुंचा। थका था लेकिन खुश था कि घर पहुंच गया।
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1 टिप्पणी »
1.अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 6, 2005 at 11:41 pm • संपादन करें
बधाई, लौट के घर आये।

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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