अपने अपने आसमां - भाग १ : सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सोमवार, दिसंबर 12, 2005


आज सुबह सुबह मेलबाक्स खोला, एक चिठ्ठी आयी थी।एक पूराने मित्र ने पत्र लिखा था। पढ्कर एक खुश नुमा अहसास हुआ, थोडा अचरज भी। इमेल और इस मित्र से ? जहां तक कम्प्युटर के ज्ञान का प्रश्न है , मेरी जानकारी मे उसे नही था। खैर मैने उसके मेल के उत्तर मे उसे फोन किया। पता चला कि उसने हाल ही मे एक संस्थान मे कंप्युटर सीखना शुरू किया था और उसे इमेल करना सिखाया गया था।

खुशी इस बात की ज्यादा थी कि उसने अपनी जिंदगी का पहला इमेल मुझे किया था और दुःख इस बात का कि मैं शायद अब उसे लगभग भुल चुका था। काफी बाते हुयी, कुछ शिकवे हुये, कुछ शिकायते हुयी। पूराने मुर्दे उखाडे गये। बातो बातो मे मुझे कहीं लगा कि मेरा यह मित्र कही मेरे भाग्य से कहीं इर्ष्या का भाव रखता है। इर्ष्या मेरे भाग्य से , ना कि मेरे से। मै तो ऐसे भाग्य को नही मानता।खैर इस बात पर चर्चा फिर कभी।

पुरानी यादो मे खोना मेरी पूरानी आदत है, मै अपने बचपन मे खो गया। मुझे याद आने लगे अपनी प्राथमिक पाठशाला (कक्षा १ से कक्षा ७) तक के सहपाठी और साथ मे बिताया खट्टा मिठा बचपन। हम कुल जमा ४५-५० सहपाठी साथ पढते थे, जिसमे से शायद २० के आसपास लडकीयां थी, बाकी सारे लफंगे(हमारे मास्टरजी यही कहते थे)। एक ही आसमां के निचे हम साथ साथ खेले कुदे और एक ही छत के नीचे हम पढे। साथ साथ शरारते की, साथ साथ मास्टरजी से मार खायी। दोपहर का भोजन मिल बांट कर खाया, स्कूल के पीछे वाले अमरूदो के बाग से अमरूद तोडे और माली के आने पर उसे उल्लु बनाकर भाग खडे हुये। एक सा बचपन एक सी हरकते, सब कुछ साझा !

इतना सब कुछ सा होने के बाद भी आज हम लोग कितने जुदा है, कितने अलग है। मै यहा एक बहुराष्ट्रिय कम्पनी मे कंप्युटर का कुंजी पटल तोडकर ऐश कर रहा हुं और मेरे सहपाठी आज भी उसी ग्रामीण भारत मे रह रहे है, अधिकतर किसी तरह जीवन चला रहे है। खैर इतना तो संतोष है कि कोई बेरोजगार नही है। मेरा यह सहपाठी जिसका इमेल मुझे मिला था, वह एक औषधालय का मालिक है। वह एक अच्छे संपन्न परिवार से है, अध्ययन मे वह कक्षा मे दुसरे क्रमांक पर रहता था। (पहले क्रमांक पर मेरी बादशाहत थी)।

आगे बढने से पहले मै यह स्पष्ट कर दुं कि मेरा मेरे मित्र के पेशे से कोई दुर्भावना नही है, और ना ही मेरी उस मित्र को नीचा दिखाने की कोई इच्छा है।

आज मेरा वह दोस्त वह एक छोटे से औषधालय का मालिक है और मै एक कम्प्युटर अभियंता ! उसकी दुनिया घर से औषधालय और औषधालय से घर तक और मै सारे विश्व की सैर के साथ अपना काम करने वाला। मै अपने पेशे और भटकती जिन्दगी से पुर्णतया संतुष्ट और उसके मन मे इर्ष्या और अपुर्णता का भाव।
क्या अंतर था हम दोनो मे ? अवसर का अभाव ? नही। उच्च शिक्षा के लिये धन का अभाव ? नही, इस मामले मे तो वह मुझसे ज्यादा भाग्यशाली था। गावों मे औषधालय खोल कर सेवा की भावना ? नही,कदापि नही। मेरा यह मित्र इस पेशे मे पूरी तरह व्यवसायिक दृष्टीकोण रखता है।

हम दोनो मे एक ही अंतर था, दोनो के अपने अपने आसमाँ थे। दोनो की सोचो के अपने अपने क्षितीज थे। दोनो मे मन की उडान को अपना अपना दायरा था। बस यही एक अंतर ने आज हम दोनो को इतना अलग कर रखा है।

हम दोनो का बचपन एक साथ एक जैसे वातावरण मे बिताने के बाद भी दोनो की सोचो एक बुनियादी अंतर था, मै उंचे उंचे सपने देखता था और वह सोचता था कि किसी तरह एक ढंग का काम मिल जाये चाहे सरकारी नौकरी हो या कोई व्यवसाय। बचपन मे मैने तो कम्प्युटर अभियंता बनने की तो नही सोची थी लेकिन विमानचालक बनने की अवश्य सपने देखे थे और वह मेरे इन सपनो का मजाक उडाया करता था। वह कहता था
“ज्यादा उंचा मत उड , गिरेगा तो हड्डीया भी नही बचेंगी!”
लेकिन मै किसी और मिट्टी का बना हुआ था, बचपन मे कही पढा था

“नेपोलियन सिकंदर से स्पर्धा करता था, सिकंदर जुलीयस सीझर से, जुलियस सीझर हरक्युलिस से। और ये हरक्युलिस सिर्फ कहानियो मे ही हो सकता है”

मै सोचता था कि यदि आगे बढना है तो अपने से उंचे स्थान पर स्थित व्यक्ति को देखो, अपनी बराबरी से स्पर्धा से क्या मतलब। और वह कहता था कि
 “इंसान ने अपनी कद के अनुरूप उंचाई देखनी चाहिये।”

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है अपने अपने आसमां का। इस पर लिखने के लिये मेरे पास एक और बेहतरीन उदाहरण है वह अगले चिठ्ठे मे !

5 टिप्पणीयां » 
1. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 13, 2005 at 11:05 pm ·
ईष्या का कारण हमारे समझने के लिये छोड़ दिया?
2. Anoop BHargava उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 12:07 am ·
लेख अच्छा है लेकिन अंत में सफ़लता या असफ़लता का मापदंड तो यही होगा ना कि :
जब आप अकेले हों और अपनें आप से पूछें कि “मैं वास्तव में कितना खुश हूँ” ?
अगर आप दोनों के हालातों में अन्तर की बात कर रहे हैं , तब तक तो ठीक है लेकिन जहाँ तक ‘बेहतर’ या ‘अधिक खुश’ होनें की बात है , आप को अपनें ‘मित्र’ से पूछना चाहिये ।
महत्वकाँक्षा का न होना कोई गलत बात नहीं है जब तक आप सन्तुष्ट है और शिकायत न
करें ।
बस यूँ ही बैठे बैठे लिख दिया …।
3. kali उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 10:51 am ·
aur mujhse jo irshyabhav rakhte hain woh H1B per kaam karne wale computer wale jinko idhar udhar ghoomna padta hai, jabki main aaram se sabarbia main baith kar manager banta hun aise contractors per। Irshya mujhe hai mere mitron se jo apne ghar per, apne desh main santosh aur sampannata ka jivan bita rahe hain apne vyavsaya ya sarkari naukri main
4. pratyaksha उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 4:52 pm ·
खुशी एक मनस्थिति है। जरूरी नहीं कि सुख सुविधाओं से घिरे रहने में ही सुख मिल जाये।
शायद शुरुआत में ऐसा लगे लेकिन बाद में हम उन सुविधाओं के आदि हो जाते हैं और इस स्थिति पर पहुंचते ही उनका महत्त्व खत्म हो जाता है।और फिर उनसे मिलने वाला सुख भी।
वैसे भी सुख की परिभाषा अलग अलग लोगों में भिन्न हो सकती है।
प्रत्यक्षा

1 comments:

Anmol Sahu रविवार, मई 13, 2012 5:02:00 am  

इस पोस्ट सहित तीन और पोस्ट पढ़ चुके हैं इस चिट्ठे की...

एक बात बताइए, इतना सुन्दर लिखने कि तकनीक आपने कहाँ से सीखी? इसका रहस्य क्या है? कहीं से सीखा है? किसी ने सिखाया है? या समय के साथ खुद ही आ गया??

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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