एक अकेला इस शहर में, रात मे और दोपहर में। आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है।

मंगलवार, जनवरी 24, 2006

एक अकेला इस शहर में, रात मे और दोपहर में।
आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है।


आज कल हमे यही गाना गाते हुये अपने लिये नया आशियाना ढुंढ रहे है। ऐसा नही है कि मकान मालिक ने हमे निकाल दिया है लेकिन आसार पूरे है।

वैसे तो हमे चेन्नई महानगर आये हुये पूरे चार साल हो चुके है और हम चार आशियाने बदल चुके है। ये बात और है कि इन चार सालो मे हम चेन्नै मे बामुश्किल कुछ ही महीनों रहे है, बाकि तो यायावर जिन्दगी कभी अमरीका तो कभी यूरोप। पहले २ १/२ साल तो होस्टल मे काट दिये थे, होस्टल मालिक काफी खुश रहते थे हम से, आखिर हम उन्हे बिना होस्टेल मे रहे, सिर्फ सामान रखने का पैसा जो देते थे। सामान भी क्या एक बिस्तर, कुछ कपडे और ढेर सारी पुस्तकें!

२००४ के मध्य मे जब अन्ना चेन्नई आया तो हमने सोचा चलो यार एक ढंग का मकान लेकर इंसानो जैसा रहा जाये। बडी मुश्किल से एक मकान मिला। मकान मे प्रवेश किये कुछ दिन ही हुये थे कि हम चल दिये फिर से अमरीका। २००५ के अंत मे वापिस आये।

इस बार सोचा कि अब जिन्दगी को कुछ और नये रंग दिये जाये। एम टी सी (मद्रास ट्रान्स्पोर्ट कार्पोरेशन) से परेशान थे, कार लेने का मुड नही था। कार लेता तो मेरे रूम मेट उसे टेक्सी बना देते। बस एक नयी फटफटिया खरीदी। अब भारत मे हारले डेवीडसन तो मिलने से रही, बुलेट सम्हालना हमारे बस का रोग नही। बजाज एवेन्जर ले ली, पांच गीयर,१८० सी सी की क्रुजर, बोले तो एकदम झक्कास। फटफटिया एकदम मस्त है, जनता मूड मूड कर देखती है। हम भी खुश कि चलो अब हम लोगो की नजरो के केन्द्र बिन्दू है। लेकिन ऐसा लग रहा है यही फटफटिया हमारे लिये अब मुसीबत बन रही है।

ना जी ना हम पेट्रोल की बढ्ती किमतो से परेशान नही है, ना हम अपनी फटफटीया के माइलेज से परेशान है। हमारी परेशानी का कारण वही सनातन युग से चला आया हुवा है…।

रूकिये.. रूकिये.. आगे बढने से पहले हम थोडा अपने बारे मे विस्तार से बता दे। हम थोडे मस्तमौला किस्म के इंसान है। मतलब बोले तो, बिना किसी की परवाह किये अपने तरीके से जिन्दगी जीने वाले। कपडे पहनने के बारे मे ऐसा है कि जो सामने दिख जाये पहन लिये, जूतो के बारे मे वही तरीका। दाढ़ी बनाने मे आलसी, मूड मे आया तो हजामत कर ली, नही आया तो ऐसे ही चल दिये। हर पखवाडे स्टायल भी बदलते है, कभी सफाचट दाढी, कभी फ्रेंच, तो कभी मजनू स्टायल। कुल मिला कर कुछ भी स्थायी नही है। ऐसे मे अपना मानना है कि कोइ भी कन्या ऐसे इसांन को घास नही डालेगी। लेकिन………

अब ऐसा है कि जिस मकान मे हम रहते है, निचे वाले तल्ले पर एक परिवार रहता है। बस हमे इसके अलावा कुछ नही मालूम। अपनी फटफटिया लेने के दूसरे या तीसरे दिन हम कार्यालय जाने से पहले हम नीचे पहुंचे। नयी नयी फटफटिया है इसीलिये कपड़ा मारा। और चल दिये कार्यालय, अन्ना बैठा था पिछली सीट पर। इतने मे हमारी उचटती एक सुंदर सी कन्या पर गयी जो निचले तल्ले के दरवाजे से हमे निहार रही थी। कन्या यही कोइ २०-२१ के आसपास की होगी।

शाम को जब हम वापिस पहुंचे, कन्या फिर से बाहर आयी। हम अपनी धुन मे , फटफटिया खडी की, ताला लगाया, खट खट… सीढीयो से चल दिये अपनी पहली मजिंल वाले आशियाने मे। बस कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा। पिछले हफ्ते मै और अन्ना ऐसे ही बैठे गपिया रहे थे। अन्ना बोला
 “दादा आजकल आप काफी स्मार्ट बन रहे हो”
” अबे क्या मतलब है तेरा, हम तो पैदायशी स्मार्ट है…”
” वो बात नही है दादा, आपने एक चीज नोट नही की है…”
“क्या ?”
“आप जब भी बाहर निकलते हो या वापिस आते हो तो निचे वाली कन्या किसी ना किसी बहाने से बाहर निकलती है !”
” अबे क्या बकवास कर रहा है, ये एक संयोग हो सकता है। कल को तु तो ये भी बोलेगा कि हम अमरीका से वापिस आये तो साथ मे तुफान भी ले आये! वहा कैटरीना और रीटा थी यहा फानुस,बाज और माला है।”
” नही दादा, जबसे आपने फटफटिया ली है, मै ये देख रहा हूं…आप तो अभी वापिस आये है, हम इस कन्या को २ साल से देख रहे है”
हम मानने तैयार नही थे।
”चुप बे बकवास मत कर…। साले उसकी उमर देख और हमारी उमर देख…।”
अन्ना हमारी टांग खिचने पर उतारू थे!
“दादा प्यार उम्र नही देखता !”
”अबे तु उसे २ साल से देख रहा है ना, वो तेरे लिये बाहर आती होगी”
“नही ना दादा,मै तो उसके घर भी जा चुका हुं , वो अपने कमरे से बाहर भी नही निकली थी।”
” अब उसका मन बदल गया होगा”
” दादा उसका मन जरूर बदला है लेकिन मेरे लिये नही आपके लिये। दादा क्या बात है, बुढापे मे लडकी लाईन दे रही है !”
अब पानी हमारे सर से उपर , मैने अपना जूता निकाला और अन्ना पर दे मारा। अन्ना बचकर भागा और चिल्लाया
“सच हमेशा कडवा होता है, युगो युगो से सच कहने वाले पर अत्याचार होते रहे है…”
अब हम थोडा गम्भीर हुये, सोचा चलो कल से थोडा अन्ना की बातो पर गौर करते है। हफ्ते भर बाद हमे यकीन हो रहा है कि कहीं ना कही कुछ गडबड है। वो कन्या हमारा ध्यान आकर्षित कराने के लिये कोशीश जरूर करती है, मसलन सुबह जब हम आफिस जाने केलिये बाहर आयेंगे, वो भी किसी ना किसी बहाने बाहर आयेगी। शाम को जब हम वापिस आयेंगे वो दरवाजा खोल कर जरूर देखेगी। वो स्कुटी कुछ इस तरह से खडा करेगी कि हमे अपनी फटफटिया बाहर निकालने से पहले उसे अपनी स्कूटी निकालने की गुहार करनी पडे। सप्ताहांत को यदि हम बालकनी मे बैठे समाचारपत्र या पूस्तक पढ रहे हो तब वो भी बाहर आंगन मे आ जायेगी। जब वह कही से आये तब अक्सीलेटर इस तरह से देगी कि पडोस वालो को भी पता चल जाये।
अन्ना के अनुसार यह सब परिवर्तन मेरे अमरीका से वापिस आने के बाद(या फटफटिया लेने के बाद) हुवा है, नन्दी महाराज भी इस बात की पुष्टी करते है। हम सोच रहे है कि ये भगवान इसे माफ करना ये नही जानती की ये क्या कर रही है।

हम अभी तक खैर मना रहे है कि अभी तक वह सिर्फ आसपास ही घूमते रहेती है। इससे पहले की बात आगे बडे बच के भाग लो। चेन्नई मे पिटे तो कोइ बचाने भी नही आयेगा!

वैसे ये यदि हमारी ग़लतफहमी(खुशफहमी) हो तब भी हम खुश होगें, इस बहाने कम से कम मकान तो बदल लेंगे। बोर हो गया हुं एक ही जगह रहते हुये, पूरे ३ महिने हो गये हैं !

5 टिप्पणीयां “एक अकेला इस शहर में, रात मे और दोपहर में। आबोदाना ढूंढता है, आशियाना ढूंढता है।” पर
हम तो सोचे थे चलो इस बहाने आप एक से दो हो जाओगे, लेकिन लगता है कि आशीष भाई तो मैदान छोडने की तैयारी कर रहे है.
Tarun द्वारा दिनांक जनवरी 24th, 2006

ज़िन्दगी मौका दे रही है आशीष भाई, लिफ़्ट मिल रही है तो चढ़ लो और आबाद हो जाओ!!


Amit द्वारा दिनांक जनवरी 25th, 2006
वाह बेटे क्या स्टाईल है. सही है कूदो सांभर की झील में ईदर से उदर. क्यों बंगालुरू की तरफ नही निकल पडते.
kali द्वारा दिनांक जनवरी 25th, 2006

रणछो्डदास बनने से क्या फ़ायदा? मुसीबत का जी कडा
करके सामना कर बालक.सँसार की सारे मूर्खता तेरे साथ है.
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जनवरी 25th, 2006
[…] [हम इधर आशीष को शादी करने लिये उकसा रहे हैं उधर वे हमें साइकिल यात्रा लिखने के लिये कोंच रहे हैं। कालीचरन भी आशीष की आवाज में हवा भर रहे हैं। तो पढ़ा जाये किस्सा यायावरी का।] […]
फ़ुरसतिया » बिहार वाया बनारस द्वारा दिनांक जनवरी 27th, 2006

आगे पढे़....

मिठ्ठू पूराण

गुरुवार, जनवरी 19, 2006


ये है मेरे घर के सबसे महत्वपुर्ण सदस्य “मिठ्ठूराम”। सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिये कि मम्मी भगवान को भोग लगाने से पहले मिठ्ठूराम को भोग लगाती हैं।

अब थोडा असर हम लोगो का भी है कि हमारे मिठ्ठूराम दुनिया के सबसे ज्यादा आलसियो मे से एक हैं। मिठ्ठू साहब का घर काफी बडा है, आराम से उनके जैसे ३ आ सकते है, बेचारे उसमे चक्कर लगाने मे थक जाते है।

मिठ्ठूराम मे अकल उनकी खोपडी के आकार से भी ज्यादा है। अपने घर का दरवाजा खोलना और बंद करना आता है। जब भूख हो तब तो साहब दरवाजा खोल कर अपने खाने की कटोरी बाहर फेंक देंगे, ये भी नही देखेंगे की नीचे कोई बैठा हुवा है। घर मे कटोरी के गीरने की आवाज आयी की सभी की आवाज एक साथ आती है “बिट्टी, मिठ्ठू को खाना चाहिये!” बिट्टी मेरी छोटी बहन का नाम है। और हमारे मिठ्ठूराम को खाना मिल जायेगा। लेकिन साहब काफी रईस खानदान से है, खाना हमेशा ताजा खायेंगे। मतलब ये कि यदि खाने को उनकी चोंच लग गयी तो जितना खाना हो खा लेंगे,बाद मे उसे छुयेंगे तक नही। और ऐसा भी नही, कि दिन मे ४-५ बार खायेंगे। किसी को भी कुछ भी खाते देख लिया,बस उन्हे वो खाने चाहिये। पहले खाने की कटोरी बाहर फेकेंगे। मिल गया तो ठीक, नही मिला तो अपने घर की एक एक चीज फेकना शुरू कर देंगे जैसे पानी की कटोरी, मिर्च के टुकडे, आम या अमरूद के बचे टुकड़े….. फिर भी आपने ध्यान नही दिया, अब आप की खैर नही… साहब को गुस्सा आ गया है, दरवाजा खुलेगा, साहब बाहर आयेंगे,पूरे शाही अंदाज मे आंखे छोटी किये हुये, सीर फुलाकर और सीधे आप जो भी खा रहे है उस पर झपट्टा मारेंगे। अब किसी की मजाल नही उस चीज को हाथ भी लगा सके सिवाय बिट्टी के। हां यदि बिट्टी सामने है तो साहब पूरी इमानदारी से मिल बांट कर खाने तैयार हो जायेंगे।

लेकिन मिठ्ठूराम को हमेशा भूख लगी हो ऐसा भी नही है, वो तो मूड पर निर्भर करता है। जब मूड ना हो आप कुछ भी दे दो नही खायेंगे। अपनी जगह से हिलेंगे भी नही। मूड ना हो तो पिंटू(मेरा भाई) के चिढाने पर भी नही हिलेंगे। वर्ना तो उनकी पिटू से दुशमनी है। दोनो हमेशा लढते रहते है। पिंटू ने यदि गलती से भी उसके पिंजरे को छू दिया, साहब दौडते हुये हाथ हटाने आ जायेंगे।

मिठ्ठूराम के शब्द्कोष मे यही कोइ ५०-६० के आसपास शब्द है, जो उन्होने पिछले १६ साल मे जमा किये है। दोपहर मे जब सभी सोते है, संत श्री मिठ्ठूराम का प्रवचन शुरू हो जाता है। मतलब ये कि जब मै जाग रहा हुं,  आप सो कैसे सकते है ? लेकिन जब उनके सोने का समय हो किसी की मजाल की उन्हे तंग कर सके। बस अपनी आंख खोलेंगे और गुर्रा कर बंद कर लेंगे जैसे कह रहे हो “अबे दिखता नही क्या, मै सो रहा हूं ?”

वैसे वो बिट्टी को प्यार से आवाज देते है “ए बिट्टी” लेकिन पिंटू को “अबे पिंटू” से बुलायेंगे। मम्मी को शराफत से “मम्मी” ही कहते है। सीटी बजाने मे उनका कोई जवाब नही। आप कैसी भी सीटी बजाये, वो एक बार या दो बार सुनेगा, तीसरी बार वैसी ही सीटी आपको सुनायेगा। मेरे कितने ही दोस्त शर्त लगा कर हार चुके है। मिठ्ठू राम “हर फिक्र को धुंन्वे मे उडाता चला गया” गाने की सीटी भी बजा चुके हैं।

जब घर मे फोन की या दरवाजे की घण्टी बजेगी, मिठ्ठूराम भी अपनी घंटी की आवाज निकालेंगे। दरवाजे से कोई आया तो अपना परिचय देंगे “मेरा नाम मिठ्ठू है। “

अपने मिठ्ठूराम को गाने सुनने का भी शौक है, टीवी पर गाने सुनेगा और सीटी बजायेगा। मम्मी की पूजापाठ मे भी उनका सहयोग रहेगा। मम्मी जब आरती करेंगी तब वो सीटी बजायेगा। जब मम्मी “हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे” गायेंगी तब वो भी साथ मे गायेगा।

कुल मिलाकर वो काफी शरीफ है लेकिन जब बिट्टी की सहेलियाँ आयेंगी, तब लोफर बन जायेगा। उनको देख कर भी सीटी बजायेगा। सभी से तमीज से बाते करेगा लेकिन पिंटू को “अबे पिंटू” ही कहेगा। बिट्टी के साथ यदि बैठा हो पता नही क्या क्या बोलते रहेगा, बिना रूके,लगातार बडबड चलते रहेगी। बिट्टी ने यदि उसको डांटा तो महाराज उसको भी नही छोडते, बोलेंगे “टेटकी“। हम लोग बिट्टी को चिढाने “टेटकी” कहते है, और पता नही कैसे मिठ्ठूराम ये जानता है।

घर मे मिठ्ठूराम का एक और दोस्त है “टामी” हमारा कुत्ता। मिठ्ठूराम टामी को नाम से बुलाते है। जब भी मिठ्ठूराम अपने घर(पिंजरे) के बाहर रहते है टामी उनके आसपास पहरेदारी करते रहते है। घरवालो को छोडकर किसी की क्या मजाल कि मिठ्ठूराम को छू भी सके, टामी घर तक छोडने आयेगा।

कभी कभी मिठ्ठूराम की कुछ हरकते हमे लोटपोट कर देती है। अभी १४ जनवरी को हम लोग घर मे बैठे थे। मिठ्ठूराम और टामी भी साथ मे थे। बिट्टी ने पूलाव बनाया था। सबसे पहले मिठ्ठूराम को भोग लगाया गया,साहब का मूड नही था एक कोने मे बैठे रहे। उन्होने पुलाव की ओर देखा तक नही। पिंटू ने उसे चिढाने के लिये दुसरे कोने मे हाथ रख दिया। मिठ्ठू को गुस्सा आ गया, दौड कर पिंटू का हाथ पिंजरे से हटाने आये। रास्ते मे पुलाव की कटोरी से टकरा गये। अब टकराये भी कुछ इस तरह से की उनकी चोंच मे पुलाव के कुछ चावल आ गये। मिठ्ठूराम पिण्टू को भुल पुलाव खाने मे जुट गये। पिंटू मिठ्ठू के आक्रमण का इंतजार कर रहा था और साहब खाने मे जुट गये थे।

हम लोगो का हंसी के मारे बूरा हाल हो गया था। टामी हम लोगो को हंसते देख कर हैरान था, ये क्या हो रहा है ?

4 टिप्पणीयां “मिठ्ठू पूराण” पर

आशीष भाई
बहुत खूब। लगे हाथ यह भी सुनो , कल ट्रेन में एक दोस्त ने सुनाया।
एक घर में चोर घुसा। अँधेरे में सामान तलाश रहा था कि आवाज आई Jesus is watching
चोर हड़बड़ाया, आसपास कोई दिखा नही। समझा कोई इलेक्ट्रानिक किलौना वगैरह होगा। फिर अपनी ढ़ुड़ाई में लग गया। कि फिर आवाज आई Jesus is watching”
चोर ने ध्यान से देखा तो कोने में एक पिंजरे में एक मिठ्ठू बैठे उवाच रहे थे कि Jesus is watching
चोर को सूझी तफरी, बोला Who are you?
मिठ्ठू बोले I am Moses
चोर ने फोर चुहल करके कहा Who the hell will name a parrot “Moses”
मिठ्ठू बोले Same person, who named our Doberman - “Jesus”
चोर बिल्कुल वैसे चौंका जैसे भूत में उर्मिला मातोंडकर। पीछे मुड़कर देखा , वाकई खूँखारमुखी Jesus the Doberman अपनी जुड़वाँ आँखो से चोर महाशय को फाड़ खाने से पहले घूर रहे थे।
अतुल द्वारा दिनांक जनवरी 19th, 2006

बहुत ही मजेदार लगते हैं आपके मिट्ठू राम जी। उनका वर्णन भी आपने बहुत अच्छे ढंग से किया है।
सारिका सक्सेना द्वारा दिनांक जनवरी 20th, 2006

आशीष भाई, मिट्ठूराम जी का रोचक विवरण पढ़कर मज़ा आ गया। तोता-कुल-शिरोमणि मिट्ठूराम जी काफ़ी अक़्लमंद जान पड़ते हैं।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 20th, 2006

बडा बढिया लेख लिखा है।कुछ मात्रा वगैरह पर भी ध्यान दे दिया करो।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जनवरी 20th, 2006

आगे पढे़....

ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?

बुधवार, जनवरी 18, 2006


मकरसक्रान्ति के लिये अपने गृहनगर गया हुवा था। हमेशा की तरह रेल से इस बार भी यात्रा की। मेरी आदत है कि मै हमेशा रेल से द्वितीय श्रेणी मे सफर करता हुं, ऐसा नही है कि मै कंजुस हुं और पैसे बचाने वातानुकूलित श्रेणी मे सफर नही करता। कारण यह है कि मै वातानुकूलित श्रेणी मे बोर हो जाता हुं। लोग अपने आप को सभ्रांत या गंभीर किस्म की प्रजाति के दिखाने के लिये किसी से बाते करना पसन्द नही करते,जब देखो तब पत्रिकाओ या पुस्तको मे खोये रहते है। अपनी दुनिया मे मस्त रहते है, मै इस प्रजाति के प्राणियो से दूर भागता हुं।

मुझे अपनी खिडकी खोल कर हवा खाने मे, बाहर का मनोहारी दृश्य देखने मे मजा आता है। खिड़की के बाहर पीछे भागते शहर और गांव, जानवर चराते बालक, पानी के नल पर कतार मे खडी महिलाये, खेतो मे काम करते किसान , जंगलो से गुजरते हुये जानवरो को देखना, बहते झरने और नदीयां, पूल से गुजरते वक्त की खटखट और धड्धड,पर्वत और पहाड, सुरंगो से गुजरना……..

और भी ना जाने कितनी चिजे है जिसका आप वातानुकूलित श्रेणी मे आनद नही ले सकते, परदे जो लगे रहते है। और यदि आपने परदे हटा कर बाहर देखने की कोशीश की तो कुपे के सभी लोग आपको ऐसे घुरते है जैसे आप मंगल ग्रह से आये हैं।

रेलों मे सफर करते समय सहयात्रियो से गपियाने का अलग ही मजा है। कुछ लोगो की सुनो कुछ अपनी सुनाओ,काफी कुछ सीखने मिलता है। यदि आपको साथ मे यात्रा मे छात्रो का दल मिल गया तो क्या कहने। पूरा सफर कैसे कटेगा पता ही नही चलेगा। अंताक्षरी , हंसी मजाक के बीच मे अपनी जवानी (कालेज जीवन)याद आ जाती है!

१५ जनवरी को मुझे अपने गह नगर गोंदिया से अपनी बहन से मिलने भडांरा जाना था जो ६५ कि मी दूर था। ये यात्रा भी रेल से करनी थी। मै समय से कुछ पहले स्टेशन पहुंच गया। मेरे पास २ ट्रेने थी, एक साधारण यात्री और दुसरी एक्सप्रेस। साधारण यात्री रेल १ घन्टा ३० मिनिट लेती है और एक्सप्रेस १ घन्टा। मैने एक्सप्रेस का टिकट लिया था। यहां तो मुझे साधारण श्रेणी(जनरल बोगी) से सफर करना था। प्लेटफार्म पर रेल का ईंतजार कर रहा था।
एक लडका १९-२० साल की उम्र का, मैले से शर्ट और पैन्ट पहने मेरे पास आया। उसने मुझसे पूछा
 “साब नागपूर जाने वाली गाडी कहां आयेगी ?”
मैने उत्तर दिया
“१५ मिनिट मे, यही पर आयेगी “
“साब एक्स्प्रेस ना ?”
“हां एक्सप्रेस ही की बात कर रहा हुं।”
“साब जनरल डब्बा कहां आयेगा ?”
 “यही पर सामने ही आयेगा, मै भी उसी गाड़ी से जा रहा हुं, मेरे साथ आ जाना!”
लड्का “ठीक है साब” कहते हुये मेरे बाजु मे बैठ गया।

इतने मे एक यही कोई ४०-४५ साल की उमर का यात्री ,जो कपडो से खेतीहर मजदूर या किसी कारखाने मे मजदूर लग रहा था आया। उसने भी वही सवाल दोहराया।
“साब नागपूर जाने वाली गाडी कहां आयेगी ?” 
मेरे कुछ कहने से पहले ही वो लडका
” तेरेको कहां जाना है ?”
वो इंसान
” नागपुर “
लड़का
“कौनसी गाडी का टिकट है तेरे पास ? यहां पर एक्सप्रेस आयेगी !”
वो इंसान
“मुझे भी एक्सप्रेस से जाना है।”
इससे पहले कि वो लडका मुंह खोले मै :
“भाई, अभी वो गाड़ी आ रही है। जब आयेगी तो मेरे साथ चढ जाना। मैने भी उसी गाड़ी से जाना है।”

मै सोचता रह गया कि ये लड्का अभी तक मुझसे तमीज से बात कर रहा था, उस देहाती को देखकर तु-तडाक पर उतर आया। जबकि दोनो के जीवन स्तर मे मुझे ज्यादा अंतर नही नजर आया।

इतने मे घोषणा हुई कि मेरी रेल २० मिनट विलम्ब से आयेगी। मैने समाचारपत्र खरीद लिया और पढ़ना शुरू किया। इतने मे देखा कि सामने से एक मेरा हम उम्र मुझे घुरते आ रहा है, मुझे भी वो कुछ जाना पहचाना लगा। वो मुझे घुरते हुये आगे चला गया। मै सोचता रह गया कि हो ना हो इसे मै जानता हुं। लेकिन वो भाई पलट कर आया और पूछा
“भाई क्षमा करना तुम आशीष तो नही हो ?”
मेरा ट्युब लाईट जला ” अबे कटरे तु ?”
दोनो गले मिले… वो मेरा पूराना सहपाठी था। हमने कक्षा ११ और १२ साथ मे पढी थी। वो अब एक कनिष्ठ महाविद्यालय मे व्याख्याता है। वही पूरानी बाते हुयी, कौनसा सहपाठी कहा है, कौन क्या कर रहा है वगैरहा वगैरहा…

इतने मे ट्रेन आ गयी, हम दोनो साधारण श्रेणी के डिब्बे मे चढे। अंदर पहुचने पर पता चला कि हमारे कटरे महाशय के कुछ छात्र भी वहां है, जिन्होने अपनी जगह हमे बिठा दिया। आजभी शिक्षक का पेशा ऐसा है कि सम्मान मिलता है। लेकिन इस चक्कर मे मेरा नुकसान हो गया। मेरा काफी मन कर रहा था चटपटे निबु मिर्च वाले उबले चने खाने का। हमने कटरे गुरूदेव की इज्जत का ख्याल कर अपनी इच्छा का गला घोंट दिया।
हम दोनो अपने भुतकाल मे खो गये। कटरे महोदय के छात्र मुझसे उसके भुतकाल के गढे मुर्दे उखडवाना चाहते थे, लेकिन हमने उनके कपडे नही उतरने दिये।

भविष्य मे मिलने का वादा कर हम दोनो जुदा हुये।

शाम को जब मै वापिस गोण्दिया चला तब मुझे यात्रा साधारण यात्री गाडी से करनी थी। कम पैसे मे ज्यादा सफर। हर छोटे बडे स्टेशनो पर रूकती ट्रेन। ट्रेन समय पर थी, रास्ता काटने मैने एक पत्रिका ले ली थी, जिसकी मुझे कोई जरूरत नही पडी।

जिस डिब्बे मे मै चडा उस डिब्बे मे कुछ रोजाना आवागमन करने वाले यात्री थे। उन लोगो मे एक गरमा गरम बहस चल रही थी। पहले पहल तो मुझे लगा कि राजनितिक बहस होगी इसिलिये अलग रहा। लेकिन पता चला कि वो सिर्फ समय काटने बहस कर रहे है। ये उनका रोजका काम था और बहस का विषय था
ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?
और हम भी बहस मे शामिल हो गये। हम कहते है कि “बोतल के बिना ढक्कन बेकार”
है कोई तैयार बहस के लिये ?


4 टिप्पणीयां “ढक्कन के बिना बोतल बेकार या बोतल के बिना ढक्कन बेकार ?” पर
आशीष,
बढिया लिखा है, पढ कर मुझे याद आया की कभी मै भी तुम्हारे समान उन चीजो को इन्जोय कर लेता था जिन्हे तुम कर लेते हो। अब तो मै भी ए। सी। मे कोई किताब पढने वालों मे से हो गया हूँ - पिछले कुछ सालोँ से यहाँ छोटे शहरो मे रह रहा हूँ इसलिए भीड भाड से बचता हूँ।
ई-स्वामी द्वारा दिनांक जनवरी 18th, 2006

आशीष भाई, यह तो उसी तरह का सवाल है कि पहले मुर्गी आयी या अण्‍डा। ऐसे ही आपके बोतल-ढक्‍कन के इस सवाल का भी जवाब देना ज़रा टेढ़ी खीर है। वैसे, मेरा मानना है कि बोतल और ढक्‍कन, दोनों ही एक-दूसरे के बिना बेकार हैं।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 18th, 2006

लोग कहते हैँ कि ढक्कनोँ की सँख्या बोतलोँ से ज्यादा होती है।
ढक्कन से वार्तालाप स्थापित किया जा सकता है-अबे ओय ढक्कन
कहकर।ढक्कन अगर बडा हो जाये तो बोतल बन सकता है।
बोतल अगर छोटी हो जाये तो ढक्कन।दोनोँ एक दूसरे के पूरक।
चँगू-मँगू टाइप।क्या बोलते हो?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जनवरी 19th, 2006

सही कहा, भीड़ में अपना एक अलग ही मज़ा है, चाहे वह बस हो या ट्रेन। लेकिन यह भी सही है कि आज की दुनिया ढ़ोंग पर ही चलती है, आडम्बर जीवन का मूल है और जिसने इन्हें अपना लिया, वही आज सुखी है!!
मै सोचता रह गया कि ये लड्का अभी तक मुझसे तमीज से बात कर रहा था, उस देहाती को देखकर तु-तडाक पर उतर आया। जबकि दोनो के जिवन स्तर मे मुझे ज्यादा अंतर नही नजर आया।
भईये, लोग दूसरे की औकात उसके पहनावे से जाँचते हैं और उसी के अनुसार उससे बर्ताव करते हैं। मेरी आदत है कि मैं साधारण पहनावे में रहता हूँ, बन ठन के रहना पसंद नहीं। एक बार मैं हमारे यहाँ के बाज़ार में एक उच्चस्तरीय जूतों की दुकान में गया और जब जूते पसंद करके उसके पैसे देने काउँटर पर पहुँचा, तो बाजू में खड़ी एक हाई-फ़ाई महिला ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं कोई कीड़ा हूँ। परन्तु जब मैंने अपना क्रेडिट कार्ड निकाला, तो तब उसके चेहरे के सड़े हुए भाव काफ़ुर हो गए!!
ठीक ऐसा ही कुछ दिन पहले हमारे यहाँ की एक बढ़िया मिठाई कि दुकान में हुआ। मैं दोस्तों के साथ खेलकर घर जा रहा था, कपड़ों पर थोड़ी धूल थी और जूते धूल में अटे पड़े थे। मन में आया कि मिठाई ले ली जाए। जब पैक करा के पैसे देने पहुँचा, तो काउँटर पर बैठे व्यक्ति के भाव ठीक न लगे क्योंकि उसने मुझे एक बार उपर से नीचे तक देखा, मानो सोच रहा हो कि आजकल तो ऐरे-गैरे भी महंगी मिठाई खरीदने लगे हैं!! जब उसे हज़ार रूपये का नोट दिया और अंग्रेज़ी में कहा कि मेरे पास छुट्टे नहीं हैं, तब उसके चेहरे पर मुस्कान आई कि उसका अनुमान मेरे बारे में गलत था!!
Amit द्वारा दिनांक जनवरी 20th, 2006

आगे पढे़....

मौज-मस्ती एक लम्बे अरसे के बाद

मंगलवार, जनवरी 10, 2006


पिछले सप्ताह मे कंपनी के व्यावसायिक कार्य से बैंगलोर जाना हुआ। यों तो काम कम्पनी के एक ग्राहक के कार्यालय मे था, उन्हे अपने कार्यालय के कार्य को स्वचालित करना था, जिसके लिये मुझे उनकी आवश्यकताओ को समझना(Requirement Analysis) था। मतलब यह कि मै “आनसाईट” मे था ,मेरी पूरी टीम चेन्नई मे है यानी कि “आफशोर“। अच्छा रहा यह भी, भारत के अंदर ही “आनसाईट” और “आफशोर”।
एक अरसा हो गया था मौज मस्ती किये हुये। मेरा मौज मस्ती से मतलब होता है, बेफिक्री से बाजार शापिंग-माल मे मटरगश्ती करना, शोर मचाते, फब्ती कसते फिल्मे देखना, आटो या बस से शहर मे या शहर से बाहर घुमना। जहां भुख लगे खाना।

ये सब हरकते मै चेन्नई मे नही कर पाता, इज्जत का जो सवाल होता है। हर जगह फिक्र लगी होती है कि कोई पहचान का या मातहत ना मिल जाये। अब बैंगलोर मे मुझे तो कोई जानने से रहा, सब कुछ कर सकते हैं।बस आ गये अपनी औकात पर………

सुबह ८ से शाम ६ बजे तक ग्राहक के ओफिस मे उसका दिमाग चाटो, वापस होटल पहुचों , बैग होटेल मे फेंको और चल दो। जिधर मुंह उठा चल दिये। पहले दिन फोरम माल पहुचें, आंखे तृप्त हो गयी। चेन्नई के रेगिस्तान से बैंगलोर के नखलिस्तान मे पहुंचने के बाद आंखे चौन्धिया गयी थी। किसी अंधेरे कमरे मे महिनो रखे गये किसी व्यक्ति को यदि अचानक उजाले मे ला दिया जाये तब उसकी जो हालत होगी वही हमारी हालत थी। बैंगलोर खूबसूरती से भरा शहर है।

पहले दिन थाई खाना खाया, कुछ हटकर लगा, रसम , सांभर चावल खाने के आदी है, अचानक तीखा थाई खाना खाया, आंख नाक मुंह हर जगह से धुंवा निकल रहा था लेकिन खा रहे थे। और जमके खाया। अब क्या करें। सोचा चलो फिल्म देखते है। कौनसी देंखे ? जिसकी टिकट मिल जाये ! “ब्लफमास्टर” देखी, अच्छी है, हलकी फुल्की, मजेदार। दिमाग घर पर रख आओ और मजे करो टाईप। मेरे बाजु मे एक अभिषेक कि काफी बडी “पंखी” बैठी थी। उसके हर सम्वाद पर चिख रही थी, और हम आदत से मजबूर उसे अंधेरे मे भी घूर रहे थे। अब हम कम थोडे ही है, दिमाग खूब चलता है, लेकिन थोडा सा ते़डा। जैसे ही प्रियंका चोपड़ा का प्रवेश हुवा, हम चिखे

“ भूत………………।”

आसपास सारी पब्लिक जोरो से हंस रही थी, बाजु वाली कन्या , अब हमे घूर रही थी, पता नही क्यों ?


दूसरे दिन “मेक्सीकन” खाया। ऐसे तो अमरीका मे खुब “मेक्सीकन” खाना खाते थे, लेकिन भारतीय मेक्सीकन खाना, एक अलग अंदाज से बना होता है। एक अलग स्वाद।
एक अजनबी” देखी। मानना पडेगा, बुढउ मे काफी दम है, लेकिन हमे तो वो प्यारी बच्ची की अदाकारी पसंद आयी।
तीसरा दिन रहा चाईनीज के नाम। अब आप इस दिन की फिल्म के बारे मे ना ही पुछो तो अच्छा है। किसी और फिल्म की टिकट नही मिली, मजबूरन “जवानी दिवानी” देखी। ३ घन्टे सर पकड के बैठे रहे, वो भी इसी लिये कि किसी को मिलने के लिये हमने ३ घंटे बाद का समय दे रखा था, उसी थियेटर मे। उपर से वो अपना फुनवा बन्द किये बैठे थे। जैसे तैसे फिल्म झेली किसी से दुश्मनी निकालनी हो, इस फिल्म की टिकट खरीद के उसे दे दो, और गेट कीपर से बोल दो कि इसे बाहर निकलने ना दे।

वैसे फिल्म देखने के बाद हमारा मुड फ्रेश हो गया, अरे कैसे नही होता ३ घन्टे उन्ही के चक्कर मे तो फिल्म झेली…

आगे का किस्सा हम नही बतायेंगे…..

चौथा दिन शनीवार…छुट्टी का दिन.. हम पहुंचे बैगलोर के दिल महात्मा गांधी रोड पर .. पूरा दिन आवारागर्दी की..
शाम को लौटकर बुद्धु घर(चेन्नई) को आये...


3 टिप्पणीयां “मौज-मस्ती एक लम्बे अरसे के बाद” पर
मत बताओ। हम सबको तो यही लग रहा है कि मानसी जी की शुभकामनाऐं और अनूप भईया की शुभेच्छाऐं जल्द रँग लाने वाली हैं।
Atul द्वारा दिनांक जनवरी 10th, 2006

अब बता भी दीजिए कि ‘जवानी दीवानी’ जैसे टॉर्चर के बाद किससे मिले कि मूड फ़्रेश हो गया?
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 10th, 2006

हे आसीश् !
तेरी ‘दस पैसा की मिलावट’ कहानी कहा् है भैया ?
Btw, a sher in ur honour: (Pls. fill in the Hindi words for the English ones as I am know Hindi badly)
Aaj fir use mila……
Dil mein wahi dard…..
Paet mein wahi bhari ‘feel’
Kant mein fir ‘keech keech’
(mere aankhon mein wahi mohabbat
Uski aankon mein wahi purani ‘contempt’ muj pei
Bas, amrutanjan abhi amrutanjan strong ban gaya
kya karoon mein: Abort, Retry, Ignore?
;-)
Friends if any of you could not get what is going on, find out from Ashish Mahan his great experiences in Bangalore.
Btw, Ashish, uski beta kaa naam bhi ‘Asis’ hai kya?
bzee द्वारा दिनांक जनवरी 12th, 2006


आगे पढे़....

कुछ प्रतिक्रियायें : विवाह समारोह का निमंत्रण मिलने के बाद

मंगलवार, जनवरी 03, 2006


विवाह समारोह का निमंत्रण मिलने के बाद मित्रो, रिश्तेदारो और परिचितो की प्रतिक्रियायों के कुछ उदाहरण

1.बास की लडकी या परिवार मे किसी की विवाह पत्रिका मिलने के बाद उसका मातहत
” साला विवाह मे नही गया तो प्रमोशन या वेतन वृद्धी का मौका हाथ से जायेगा, यदि गया तो कम से कम 1000 रू का चुना लगेगा. ऐसे भी आज 25 तारीख है. पता नही कौन उधार देगा ?”

2.किसी मित्र की विवाह पत्रिका मिलने पर विवाहित मित्र
” कमाने की अकल तो आयी नही है लेकिन घोडे पर चढने की जल्दी है. बीवी को खिलायेगा क्या ?”

3.किसी मित्र की विवाह पत्रिका मिलने पर अविवाहित मित्र
” लो एक और गया, मेरा नंबर कब आयेगा ?”

4. किसी बुजुर्ग मित्र के पुत्र के विवाह पत्रिका मिलने पर बुजुर्गवार
“ बच्चों ने आपस मे “लव मैरीज” तय करली और बाप को मालुम नही|”

5.अचनाक कीसी मित्र(कन्या) की विवाह पत्रिका मिलने पर कालेजवीर
” जया गयी तो क्या हुआ जुही बचकर जायेगी कहां ? अभी विवाह मंडप मे उसको पटाता हुं !”

6.कालोनी मे शर्मा आंटी की लडकी की विवाह पत्रिका मिलने पर सिन्हा आंटी
” ए जी सुनते हो ? शर्मा जी ने हमारी छुटकी की विवाह पर क्या ‘गीफ्ट’ दिया था ?”

7.छोटे भाई की विवाह पत्रिका को निहारते हुये अविवाहीत बडा भाई
” अरे जिन्दगी मे थोडा फ्रीडम का मजा लो, शादी का क्या कभी भी कर सकते हैं. नौकरी नही है तो क्या हुवा हरा सिगनल देने लायक बडा दिल है अपने पास ”

8.बडे भाई की विवाह पत्रिका को निहारते हुये छोटा भाई
” अपना रास्ता साफ हो गया, कल ही निशा से मिलकर आगे की योजना बनाता हुं”

9. सामने वाली बिल्डींग की श्वेता और अपनी बिल्डींग के राहुल के विवाह का निमंत्रण देखते हुये शर्मा आंटी
” ये लडका इसीलिये बारबार हमारे घर आता था, अब पता चला. श्वेता तो एक्टींग एक्सपर्ट हवा ही नही लगने दी, क्या जमाना आ गया है राम राम”

10. अपनी मौसेरी बहन की विवाह पत्रिका देखते हुये
” ये लडका कालेज मे तो मेरे आगे पिछे घुमता था ! लेकिन पिठ पिछे क्या गुल खिल रहा है ये समझने मे थोडी देर लग गयी।”

अंत मे

11. किसी परिचित कन्या की विवाह पत्रिका मिलने पर हम
“ये भी गयी, कोई बात नही. जिन्दगी मे तीन चिजो के पिछे नही भागना चाहिये बस , ट्रेन और लडकी, एक गयी तो दूसरी आती है.”

हमारे इस उदगार पर राजेश
“अबे तेरी तो आखरी बस भी छुटेगी, और तु पैदल जायेगा”

12. किसी परिचित कन्या की विवाह पत्रिका मिलने पर बालाजी
“जो नाम अंदर होना चाहिये था, वो बाहर हो गया” [ मतलब जो नाम वर की जगह होना चाहिये था लिफाफे के उपर निमंत्रीत मे हो गया”]

13. किसी मित्र की विवाह पत्रिका मिलने पर हम
“साला बडा आदर्शवादी बनता था, पता करना पडेगा कितने मे बिका|”
“नौकरी मिले जुम्मा जुम्मा ६ महिने नही हुये और चले शादी करने|”
“कल तक तो शादी के नाम से बिदक रहा था, लडकी का चेहरा देखा और फिसल पडा|”
“अबे इसे कौन लडकी देने तैयार हो गया ?, जरूर साले ने ससुराल वालो को कोई बडी गोली दी होगी !”

3 टिप्पणीयां “कुछ प्रतिक्रियायें : विवाह समारोह का निमंत्रण मिलने के बाद” पर
मुझे तो जब भी कोई कार्ड मिलता है तब मैँ यह सोचता हूँ
कि जब ऐसे-ऐसे लोगोँ की शादी हुई जा रही है तो हमारे आशीष मेँ
क्या खो है जो अभी तक सिर्फ़ दूसरोँ की शादी का गवाह बन रहा है?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जनवरी 3rd, 2006

आशीष भाई, बिना विवाह किये ही आपको शादी-ब्‍याह और उससे जुड़े पहलुओं का इतना ज्ञान हो चुका है, कि अब आप इस पर पीएचडी भी कर सकते हैं।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक जनवरी 3rd, 2006

Aashish miyan pratikriya karte reh gaye,
yaar dost saare sabhi ladkiyan le gaye|
isliye jara dusro ke liye pratikriya me kam aur apni shaadi ki disha me jyada dhyan diya jaaye.
Tarun द्वारा दिनांक जनवरी 4th, 2006

आगे पढे़....

मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

  © Hindigram Khalipili by Hindigram 2011

Back to TOP