कल शाम कुछ फोन आये।

बुधवार, फ़रवरी 08, 2006


फोन न १
“एक समस्या है यार”
“पता चल गयी !”
“कैसे”
“तेरे फोन से ही।”
“सुन”
“सुना”
“तेरे आसपास कोइ है तो नही ?”
“तुझे कोइ आसपास चाहिये क्या ?”
“नही”
‘’तब नही है, बोल″
“यार पर्सनल समस्या है, किसी को बताना मत”
“नही बताता यार,सभी को यही समस्या है। काम की बात कर”
“मै टूर से आया हूं और भूखा हूं।”
“तो किसी होटल फोन करना ! ”
“नही यार, ये बोल रही है ।।”
“ये यानी कौन।”
“बीबी, और कौन”
“किसकी ?”
“मेरी और किसकी बीबी मेरे से बात करेगी।”
“ठीक है , काम की बात बोल″
“ये लो, विषय मै बदल रहा हू कि तू !”
“ठीक है ठीक है आगे बढ”
“वो मायके जाने की बात कर रही है”
“अरे बधाई हो, साले तू इसे समस्या बोल रहा है ?”
“अरे मै अकेला अनाथ हो जाउंगा ना !”
“कितने दिनो के लिये जा रही है ?”
“१५ दिनो के लिये”
“तो भाई मै क्या कर सकता हूं”
“वो रात मे नही रहेगी ! क्या करू ?”
“अबे क्या मतलब है तेरा मै ऐसे वैसे कोई काम नही करता!”
“तू मेरी सुनेगा क्या कि अपनी हांके जायेगा ?”
“झगडा किस बात पर हुआ ?”
“झगडा किस बात का, मै तो अभी टूर से वापिस आया !”
“तो वो जा क्यों रही है ?”
“मै जब टूर पर गया था तब उसकी मां यहा साथ मे थी। अब उसकी मां उसे लेकर जा रही है”
“अब तेरी बीवी के पिताजी भी टूर पर गये है क्या ?”
“वो कभी वापिस नही आनेवाले टूर पर गये है !”
“ओह″
“मेरी बीवी को रोकना है”
“सास को चार दिन बाद जाने के लिये बोलना , उसमे क्या है”
“नही, मेरी सास को जाना चाहिये”
“नही रे बाप मै ऐसा कोई काम नही करता। तू किसी भाई को पकड”
“अबे हमेशा हमेशा के लिये नही।। अब तूझे कैसे बतांउ, तेरी शादी नही हुयी, तू कैसे समझेगा।”
“जाने दे यार तू बोल।, मुद्दा ये है कि तेरी बीवी ने घर पर रहना चाहिये और सास ने वापिस जाना चाहिये। ठीक ?”
“ठीक। बोल क्या कर सकते है।”
“अच्छा कब निकलने वाले है ?”
“दोपहर मे खाने के बाद”
“यानी की चार घन्टे है।”
“लेकिन सास घर पर है”
“अबे मै प्लान के लिये बोल रहा हूं”
“प्लान क्या है ?”
“तेरे घर मे काम वाली बाई है क्या ?”
“वो छूट्टी पर है इसलिये तो बीवी मायके जा रही है”
“ठीक है, मै सब ठीक करता हू। सास जायेगी लेकिन तेरी बीवी तेरे बोलने पर भी नही जायेगी।”
“थैंक्यु वेरी मच”
“सूखा सूखा नही चलेगा !”
“ठीक है यार”
“तूने बीवी को नही जाने के लिये मनाया या नही”
“वो असफल होने के बाद ही तो मैने तूझे फोन किया”
“तू अपनी बीवी को बोल कि ठीक है जाओ मै सम्हाल लेता हूं। १५-२० दिन रह कर आना”
“ओके लेकिन तू क्या करने वाला है ?”
“तू आम खा पेड मत गीन”
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फोन न. २
“शांताबाई”
“नमस्कार साहब, आ जाउ क्या ?”
“नही, एक पता देता हू वहां जा”
“साहब, ठीक है पता दे दो”
“पता बाद मे पहले क्या बोलना है वो सून”
“बोलो साहब”
“वहां जाकर बोलना कि आपकी पूरानीवाली काम वाली ने भेजा है, और कहा है कि अगले १५ दिन काम करने को बोला है।”
“साहब मै ऐसे लोअर डाउन काम नही करती”
“काम नही करना है, सिर्फ ये वाक्य बोलना है”
“ठीक है”
“एक बात और ये बात साहब से मत करना, मालकिन से करना। साहब थोडा सर्किट है”
“ठीक है साहब”
“और हा साहब थोडा मार्डन है, कपडे वपडे अच्छे पहन कर जाना।”
“साहब उसने किचन दिखा दिया तो ?”
“अरे नही, तू मेमसाहब को नही जानती।”
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फोन न. ३
“मर गया यार !”
“क्या हुआ ? बीवी मायके जा रही है क्या ?”
“नही जा रही लेकिन तूने किया क्या?”
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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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