एक अधूरी प्रेमगाथा

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2006

वह अपने अपार्टमेंट की बालकनी मे अकेले खडा़ तारों को घूर रहा था। संजय पीछे कब आया उसे पता ही नही चला।
संजय : "यहाँ अकेले क्या कर रहा है, तु ठीक तो है ना ?"
वह : "सितारो मे अपनी महबूबा ढुंढ रहा हूं! कोई पसंद ही नही आ रही!"
 "बाते मत बना, दो दिन से तु उखड़ा-उखड़ा है, सब दिखता है , तु कितने भी ठहाके लगा ले, तेरी आंखे चुगली कर देती है कि तु परेशान है। क्या हुआ बे?"
"अबे रूम मे इतने सारे दुःखी आत्मा पहले से है, देवदास, पंडित और कमलेश पहले से ईश्क के मारे है, मुझे उन लोगो मे क्यो शामिल कर रहा है?"
 "ठीक है मत बता! आज रविवार है, घर फोन किया होगा ही, और बता तेरी ’वो’ कैसी है?"
वह मुस्कराते हुये: "आज उसकी शादी है!"
संजय झल्लाया "हर बात मे मजाक मत किया कर, बता कब उससे शादी की बात कर रहा है!"
"तुझे नही मानना है, मत मान लेकिन सच यही है कि आज उसकी शादी है।"
संजय : "क्या ? अबे कमीने, तुने कुछ बताया नही! कब हुआ ये सब ?"
वह : "मै क्या बताता? उसके माता पिता ने शादी तय कर दी और आज उसकी शादी है! बस! इसमे नया क्या है? हर लड़की की शादी होती है, उसकी भी हो गयी!"
"तुझे बुरा नही लग रहा है?"
"किस बात का बुरा ? यार जब उसे पाने का प्रयास ही नही किया तो बुरा किस बात का! बूरा तो तब लगता ना जब प्रयास करते और असफलता हाथ लगती!"
संजय : "तु नही सुधरेगा! ज्ञान बांटना शुरू! अबे मै देवदास, पंडित या कमलेश नही हूं! खैर तुझे कब पता चला कि उसकी शादी तय हो गयी है।"
वह : "सुनेगा तो बताता हूं! लेकिन किसी के सामने उगला तो तेरा सर और मेरा 9 नंबर का जूता!"
===1====
वह जा रहा था उससे मिलने । तीन साल, हां पूरे तीन साल बाद । एक उमंग थी, एक उत्सुकता थी । सोच रहा था "कैसी होगी वो ?” वही दुबली-पतली होगी या मोटी हो गयी होगी ?" खिड़की से बाहर पेड़ , बिजली, फोन के खम्भे पीछे भागे जा रहे थे। उसका मन भी पीछे भागा जा रहा था- अपने बचपन मे।
उसका बचपन बीता था,एक छोटे से गांव मे। शहरी चकाचौंध और आधुकनिकता से कोसो दूर। यही कोई 30-40 परिवार। कुल मिला कर 300-400 लोगो की जनसंख्या। शिक्षा की रोशनी तो पहुंच गयी थी, लेकिन अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां कायम थी। कोई बीमार हो जाये तो उपचार के लिये पहले झाड्फूंक होती थी, फिर झोलाछाप, नीम हकीम डाक्टर का इलाज। इन दोनों के बावजूद भी यदि कोई बच जाये तो शहर के अस्पताल पहुंचा देते थे। 
गांव में एक स्कूल ही था जो सातवीं तक था। आगे दसवीं तक पढने के लिये बाज़ू के  गांव मे हाईस्कूल में जाना होता था।गांव को शहर से जोड़ने के लिये पक्की सडक ज़रूर बन गयी थी, लेकिन बिजली पानी की समस्या अपनी जगह थी।
 ऐसे गांव मे रहने आया था उसका परिवार, अपनी जडो और वातावरण से कोसों दूर। पिताजी शिक्षक थे, जो नौकरी के साथ भटकते हुये सूदूर बुंदेलखंड से यहां विदर्भ (महाराष्ट्र) के इस पिछडे हुये क्षेत्र मे आ पहुंचे थे।
 गांव ने पूरा स्वागत किया था इस परिवार का। सम्मान और श्रद्धा जो भारतीय समाज  एक शिक्षक को  देता है, वह भरपूर मिला। गांव की पंचायत हो , हनुमान मंदिर मे होने वाला उत्सव  या चौपाल मे होनेवाली नौटंकी, हर चीज मे भाग लेने के लिये गांव वाले न केवल न्योता देते, बल्कि खुद लिवा ले जाते। कोई सलाह लेनी हो, कोई बीमार हो या शिक्षा हो, हर बात मे उसके पिता की सलाह ली जाती थी। उसके पिताजी अब मास्टर साहब थे और मम्मी मास्टरनी जी। फिर भी   एक अकेलापन, एक सूनापन कचोटता था। सूनापन दूर होने का अपनी जडो से, अपने लोगो से और अपने नाते रिस्तेदारो से, जिनसे भाषा, त्योहारों और रीति- रिवाजों  का साझा था। नाते रिश्तेदार दूर हो गये थे। रिश्तेदारो का आना जाना भी काफी कम हो गया था। बच्चे मामा,चाचा ताऊ और बुवा जैसे रिश्तों को भूल रहे थे ।
 ब्रेको की चरमराहट से वह वापस वर्तमान मे आया। बस रूक गयी थी और यात्री नीचे उतर रहे थे। वह सोच मे पड गया "ये कहां रूक गयी बस ? अभी तो आमगांव भी नही आया।". वह भी भुनभुनाता हुआ नीचे उतरा। पता चला बस का पहिया पंक्चर हो गया था। अभी भी आमगांव आधे घण्टे का रास्ता था। उसे तो आमगांव से आगे और २० की.मी. जाना था...।
वह सडक के किनारे एक पत्थर पर बैठ गया। दिन के बारह बज रहे थे, सूरज सर पर सवार था। सडक के दोनो किनारे खेत थे। यही फरवरी का महिना था -वसंत का। पलाश के फूल तो नही आये थे लेकिन कलियां जरूर आ गयी थी। कहीं-कहीं इक्का-दुक्का फूल भी दिखायी पड जाते थे। खेतो मे गेहूं की और कहीं -कहीं चने की फसल दिखायी दे रही थी। कुछ भी तो नही बदला था ।सब कुछ तो वही था। वही खेत वही वसंत और वही चने -गेहूं की फसल। वही पक्षी उडाते किसान।  वही मस्ती मे गाते हुये चरवाहे। क्या वह भी वैसी ही होगी , जैसे तीन साल पहले थी ? क्या वह भी उसे याद करती होगी ? उसे कैसा लगेगा जब वह अचानक उसके सामने खड़ा हो जायेगा ? वह तो शायद खुशी से पागल हो जायेगी! पूरे घर को सर पर उठा लेगी।

कंडक्टर ने सीटी बजायी। बस का पहिया ठीक हो गया था। यात्री अपनी-अपनी सीट पर जा रहे थे। वह भी वापस अपनी सीट पर जा बैठा। बस धीरे-धीरे धूल उडाते हुये आगे बढने लगी थी।लेकिन वह अपनी सुनहरी यादों पर  से वक्त की धूल को हटा रहा था।
===2====
एक दिन उसके पिताजी शाम को घर एक व्यक्ति के साथ आये। मम्मी से परिचय करवाया- "ये..... है, बाजू के गांव में शिक्षक हैं।" उनका उपनाम सुनकर मम्मी को काफी खुशी हुयी थी, एक और परिवार  से परिचय होने जा रहा था जिसका भाषा, त्योहारों और रीति- रिवाज़ों  का साझा था। उसके पिताजी ने आगे कहा था "रविवार को ये सपरिवार खाने पर आ रहे है।"
वह उस रविवार को कभी नही भूल सकता। उस दिन वह पहली बार उस से मिला था। अपनी बडी बहनों के पीछे,सिमटी, सकुचाई,शरमायी,छुईमुई सी। वो उसकी हम उम्र थी। बाकी सभी या तो उससे बडे थे या छोटे। उनका परिवार अच्छा खासा बडा था चार लडकियां और दो लडके। वह अपने परिवार मे पांचवे नम्बर पर थी । तीन बडी बहनें ,एक बडा भाई और एक छोटा भाई। वैसे उसका खुद का परिवार भी बडा था। उससे छोटी दो बहने और एक सबसे छोटा भाई था।

वो पूरा दिन उसे घूरता रहा था, जबकि वह उससे नजरें मिलते ही  झुका लेती थी। घर के सभी बडे लोग खाने के बाद बातों मे मशगूल हो गये थे और बच्चे खेल में।धीरे धीरे दोनों परिवारों मे नजदीकियां बढी और दोनों परिवार एक दूसरे के काफी करीब आ गये। हर त्योहार, पारिवारिक समारोहों में दोनों परिवारों की उपस्थिति अनिवार्य सी हो गयी थी।
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"आमगांव वाले उतरो" कंडक्टर  चिल्लाया। उसकी तन्द्रा भंग हुयी। वह वर्तमान मे आ गया। बस से नीचे उतरा।दोपहर का एक बज रहा था, भूख लग आयी थी। लेकिन उसे कुछ खाने की इच्छा नही हो रही थी। पूछताछ काउन्टर पर जाकर उसने पूछा "भैया, ........ के लिये बस कब जायेगी ?"  जवाब आया "2 बजे...।"

एक घंटा और ! इन्तजार की घडियां लम्बी होते जा रही थी। उससे अब इन्तजार  सहन नही हो रहा था। लेकिन कोई और चारा भी नही था। उसने सोचा चलो चाय पी लेते है। आमगांव उसका अपना कस्बा रहा है । यहां की हर गली, हर चौक की तमाम यादें मन में समायी हुयी है । पूरी किशोरावस्था यहीं गुजारी थी। यहीं के सिनेमाघर मे फिल्मे देखी है। एक जमाना था, जब आमगांव से अपने गांव जाने की इच्छा नही होती थी और आज एक घन्टा जान पर आ रहा था।

चाय की दूकान पर जाकर चाय के लिये कहा, चायवाला उसे पहचान गया था ।लेकिन वह जानबूझकर अनदेखा कर गया। वह किसी से बात करने के मूड मे नही था। चाय पीकर वह अपनी बस के इन्तजार मे खडा हो गया।

धीरे -धीरे उन दोनों में अच्छी खासी दोस्ती हो गयी थी। दोनो एक ही स्कूल मे पढते थे, वह एक कक्षा आगे था। दोनो पढने लिखने  के साथ अन्य गतिविधियो मे भी बढ़ चढ़कर भाग लेते थे। विद्यालयी या अन्तर-विद्यालयी स्पर्धाओ मे दोनों ही पूरस्कारों की झडी लगा देते थे। वह एक कक्षा आगे था, तो वह उसे पढ़ा भी दिया करता था। जहां दोनो एक दूसरे के साथ रहना पसंद करते थे, लड़ाई भी उतनी ही हुआ करती थी। नोकं झोंक, एक दूसरे को तंग करना , खिंचाई करना चलता रहता था। वह उसकी चोटी खींचता रहता था और वह उसे चिकोटी काटते रहती। उन दोनों का एक दूसरे के लिये लगाव किसी से छुपा भी नही था, दोस्तों और दोनो के घरवालों से भी। जब उसके घर जाता उसकी बहने कहती "तू हमसे मिलने तो आया नही होगा। जा वो वहां पर है।" यही किस्सा दोहराया जाता जब वह उसके घर आती।

जब दोनो गप्पे मारना शूरू करते समय कैसे जाता पता ही नही चलता था। दोनो एक दूसरे के पूरक भी थे। उसे गाना सुनना अच्छा लगता था, जबकी वह अच्छा गाती थी। वह खाने का शौकीन था, वह खाना अच्छा बनाती थी। उसे को घर सजाने का शौक था, तो वह पेंटिग कर लेता था।

"पीं पीं..." बस की आवाज सुनायी दी। उसकी बस आ चुकी थी। टिकट खरीदी और बस मे जा बैठा। बस ने अपनी आगे की यात्रा जारी की और उसने अपनी पीछे की।
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दिन ऐसे ही गुजरते रहे । धीरे-धीरे जहां वह अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष मे आ गया था, वह अपना स्नातकोत्तर कर चुकी थी। उसकी तीनों बडी बहनों की शादी हो गयी थी और वह अकेली बची थी। दोनो एक दूसरे की भावनाओ को समझते थे लेकिन किसी ने प्यार का इजहार नही किया था, न जरूरत समझी थी। वैसे भी दोनो को मालूम था कि दोनो के परिवार वाले सब कुछ जानते है. बस सही समय ही की देर है...।

समय ! समय बडा बलवान होता है. अच्छे -अच्छे साम्राज्यों को हिला देता है समय। और इसी समय ने साथ नही दिया था उसका।हिला के रख दिया उसे भी...।

उसकी  अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष की परीक्षायें चल रही थीं और उसके पिता का देहांत हो गया था। सारे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उसके कंधो पर आ गयी थी। तब उसके पिताजी ने सम्हाला था उसे। सारे रीति-रिवाज कर्मकाण्ड पूरे करवाये थे। तेरहवी तक साथ रहे थे। तेरहवी के बाद प्यार से बिठा कर समझाया था "बेटा, जो होना था वो हो गया। होनी को कोई नही टाल सकता। अब तुम घर के सबसे बडे हो। तुम्हें ही सब कुछ सम्हालना है। तुमसे छोटी बहनों की शादी करनी है, भाई का कैरियर बनाना है।"

"बेटा, याद रखो तुम्हारे रिश्तेदार आयेंगे, सभी सहानुभूति दिखायेंगे लेकिन जहां मदद की जरूरत होगी, सभी भाग जायेंगे। ये दुनिया की रीत है। तुम पहले सारी चिन्ता छोडकर अपनी पढाई पर ध्यान दो। फ़िर  नौकरी ढूढो ।ये ज्यादा जरूरी है।"

वह सोच रहा था कितना सच कहा था उन्होने ! उसे सारी लड़ाई अकेले लडनी पडी थी। कोई हाथ मदद् के लिये सामने नहीं आया था सिवा उसके पिता के। किसी रिश्तेदार ने मदद तो दूर हाल तक नही पूछा था। मामा,मौसी, ताऊ सब तेरहवीं के बाद चले गये थे। उसके पिताजी रिटायर हो गये थे। उसके हर काम के लिये उसका मार्गदर्शन करते रहते थे मम्मी को मिलने वाली पिताजी की पेशनं के, ग्रेच्युटी और बाकी सारे कामों के लिये। उसने सरकारी कार्यालयो के धक्के खाना, अपनी पढाई और मम्मी के आंखों का आपरेशन , सभी अकेले सम्हाला था। उसके पिताजी ने उसे सम्बल दिया था वह उनका अहसानमंद हो गया था लेकिन उसका उसके घर जाना बन्द हो गया था।

इन सब में डेढ साल गुजर गया, और उस पर इधर -उधर का अच्छा खासा कर्ज हो गया था। पिताजी की पेंशन और ग्रेच्युटी का पैसा जरूर मिला था लेकिन उसे उसने हाथ नही लगाया था। वह बहनों की शादी और भाई के भविष्य के लिये सुरक्षा राशि की तरह बचा रखा था।

उसने अभियांत्रिकी की पढाई पूरी की और जा पहुंचा मुंबई- नौकरी की तलाश में। किस्मत ने साथ दिया, बिना धक्के खाये नौकरी मिल गयी। छ्ह महीनों बाद वह जा पहुंचा अमरीका जहां से वह पूरे एक साल बाद वापस आ रहा था। अब जा रहा था उससे मिलने तीन साल बाद।
===5===
बस अचानक रूकी, कंडक्टर आकर बोला "साहब आपका स्टाप आ गया"।

वह बस से नीचे उतरा। दोपहर के ढाई बज रहे थे। उसके दिल की धडकन तेज हो गयी थी। वह धीरे-धीरे उसके घर की ओर जा रहा था। घर के सामने पहुंचा। देखा कि वह बरामदे मे बैठे-बैठे सो गयी थी। सोते हुये वह काफी खूबसूरत लग रही थी। उसके मन मे छुपा बचपन जाग उठा। दबे पांव उसके करीब पहुंचा और जोर से उसकी चोटी खींच दी। वह जाग गई और चीखी '...... के बच्चे , अब तो सुधर जाओ"। वह हतप्रभ खडा रह गया। इसे मालूम भी नही था कि वह आज आनेवाला है, लेकिन वह जान गयी थी कि चोटी उसी ने खिंची है।

वह उठकर बैठी। पूछा- "कब आये"?

 उसने अपनी सारी कहानी सुनायी। गिले-शिकवे हुये। वह आज घर मे अकेली थी। आज पता नही उसे क्या हुआ था, आमतौर पर शांत रहने वाली लडकी तीन साल की भडास निकाल रही थी। वह बोल रही थी और ये सुन रहा था।वह बचपन से लेकर अब तक की सारी कहानी दोहरा रही थी, और वह तीन वर्षों की आंखो की प्यास बुझा रहा था। अचानक उसने पूछा "क्या देख रहे हो"! वो झेंप गया। दोनो एक दूसरे के मन की बात समझ रहे थे, लेकिन आज भी किसी के ओठों पर बात नही आ रही थी।

उसने कहा "तुम्हे मालूम है, पापा मेरे लिये लडका देख रहे है ?" उसके चेहरे पर एक उदासी आ गयी थी।

वह सोच मे पड गया।वह किस मुंह से उसके पिता से कहे कि क्या वह उसका इंतजार कर सकते है। उसके पिता क्या इसे मानेंगे! क्या वह ये नही सोचेंगे कि ये लडका अपनी जिम्मेदारियों से मुख मोडकर, स्वार्थी हो गया है।वे उस पर कैसे विश्वास करें? वह अपनी मजबूरी जानता था। उसकी दो बहनें बिन ब्याही बैठी थीं, भाई पढ रहा था।  एक जवान लडकी का घर पर बिन ब्याहे बैठे रहना सेवानिवृत पिता के लिये कितना बडा बोझ होता है, इसका अहसास उसे भी तो था। अगर वह आज शादी भी कर ले, तो उसकी बहनें, भाई और मां क्या सोचेंगे उसके बारे मे। यही कि इसे अपनी बहने और भाई के भविष्य की चिन्ता नही है, बस अपनी फिक्र है। उसका खुद का तो ठीक है, लेकिन क्या वे लोग इस परिस्थिति मे उसेको स्वीकार कर पायेंगे?

"किस सोच मे पड गये ?" उसने टहोका " लो चाय पियो"।

"कुछ नही, बस ऐसे ही सोच रहा था, कितना बदनसीब होगा वह?"
"कौन" उसने पूछा।

"जिससे तुम्हारी शादी होगी" उसने छेडा "तुम्हे चाय बनाना भी तो नही आता !"

उसे उसकी बनायी चाय अच्छी लगती थी, वह तो बस अपने मजबूरी को छिपा कर हंसने की कोशिश कर रहा था। ऐसा नही की वो इससे अनजान थी, उसे सब समझ मे आ रहा था।

"किचन मे चलो, तुम्हारे लिये खाना बनाया जाये"
रसोई मे पहुंचने पर उसने पूछा "और तुम्हे कोई लडकी पसंद आयी"?
उसने  जवाब दिया “मुझे तो बहुत सारी पसंद आईं, लेकिन मुझे भी तो कोई को पसंद करे !”
वह बोली “ऐसा क्यों, तुम्हे पसंद करने वाली लडकियों की तो कमी नहीं होगी ?”
उसने जवाब दिया  “ अरे मेरे जैसे मस्तमौला, बेफिकरे को कौन पसन्द करेगा? और तुम तो जानती हो मेरा गुस्सा !”
वह ” तुम अपने बारे मे खुद नही जानते हो, तुम्हारे साथ कोई भी उदास नही रह सकता। तुम हमेशा हंसते रहते हो और हंसाते रहते हो। तुम हर चीज पर हंसना जानते हो, खुद पर भी। उसके साथ तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास भी रहता है। कौन ऐसी बेवकूफ लडकी होगी जो तुम्हे पसंद नही करेगी?"
इतने मे उसके पिता आ गये।
"और बेटा अमरीका से कब आये ?"
"जी, दो दिन पहले ही आया, यहां पर थोडी देर पहले ही आया।"
"और बहनों की शादी का देखना शुरू कर दो, दो बहनों के लिये कम से कम २-३ साल तो लग ही जायेंगे। कुछ लड़को के पते मुझसे ले जाना। "
"जी"
"तुम पर जिम्मेदारी काफी बडी है, जिम्मेदारी से पहले मुक्त हो जाओ।" उसके पिता ने उसे कुछ कहने से पहले ही उसकी जिम्मेदारियां फ़िर से याद दिला दीं।
"जी"
"मै भी इसकी शादी इस साल निपटा कर मुक्त हो जाना चाहता हूं। दो तीन अच्छे रिश्ते है..।"
उसने आखों के कोने से देखा वह रसोई के दरवाजे के पीछे खडी थी। उसकी आंखे भीगी हुयी थी और चेहरे पर उदासी थी।
===6===
संजय: "तो तु अब क्या करेगा?"
वह : "परसो चेन्नई जा रहा हूं, नयी नौकरी, नयी जगह!"
"अबे तुने ये भी नही बताया, बहुत बड़ा कमीना है बे तु!"
वह मुस्कराया : "दो सप्ताह पहले ही यहाँ त्यागपत्र दे दिया था। बस कल यहाँ आफीस मे आखिरी दिन है।"
"अबे लेकिन हम लोगो को तो बताया होता ?"
"किसे ? तुझे? तु अपनी नौकरी की तलाश मे व्यस्त है! देवदास को जब भी अपनी पारो की याद आती है उसे रोने के लिये मेरा कंधा चाहिये, , पंडित को अपनी महबूबा याद आती है तो दारू मे डूब जाता है, उसे बार से घर लाने काम भी मेरे जिम्मे! कमलेश की तो बात ही मत कर। सब दिलजले है यहाँ। और ऐसे भी सब मजनूओं की टांग खिंचने का काम मेरा है! मेरी टांग खिंचाई शुरु हो जाती तब!"
"लेकिन .... "
"लेकिन क्या ? अरे यार सबको उपदेश मै ही देता हूं कि वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है! बस वही मरहम खुद पर लगा रहा हूं! चेन्नई, नयी जगह है, नयी कंपनी है, नये लोग होंगे, समय कैसे बितेगा पता ही नही चलेगा। आज तुने पकड़ लिया, कल देवदास पकड़ लेगा। जिस चीज से मै आजतक बचता रहा हूं, वह हर किसी के सामने दोहराना तो नही चाहता ना!"
"लेकिन इतने कम समय मे तु सब कुछ छोड़ छाड़ के जा रहा है...."
"यार , समय ही तो नही चाहिये मुझे.... जग्गू दा की गजल याद है ?
कोई दोस्त है ना रक़ीब है तेरा शहर कितना अजीब है,

मै किसे कहूँ मेरे साथ चल, यहाँ सब के सर पे सलीब है"

मेरे बारे मे

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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