आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान

मंगलवार, फ़रवरी 28, 2006


हाल ही मे मै स्टीफन हाकिंस की “ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम” पढ रहा था। ये पुस्तक मै इसके पहले भी कई बार पढ चुका हूं, लेकिन कुछ दिनो बाद फिर से पढने की इच्छा हो जाती है। मुझे ऐसे भी भौतिकी बचपन से पसंद रहा है, जैसे जैसे आगे पढता गया , इस विषय मे रूची बढती गयी। लेकिन इस पर अढंगा तब लगा जब मैने संगणक विज्ञान लेकर अभियांत्रिकी मे प्रवेश लिया।

वैसे संगणक विज्ञान के पाठयक्रम मे भी भौतिकी के काफी सारे विषय थे, जैसे प्रकाश विज्ञान(ओप्टीकस),क्वांटम मेकेनिक्स, विद्युत और चुंबकिय क्षेत्र(इलेक्ट्रिक एण्ड मैगनेटीक फिल्ड) वगैरह। लेकिन अंतर यह था कि ये सभी विषय अनुप्रयोग(एप्लाईड) थे ना कि सैधांतिक (थ्योराटिकल)। और जो चिजे छुट गयी थी वे थी, कास्मोलाजी, खगोल विज्ञान (आस्ट्रोनामी), अणु-परमाणु सरंचना(पार्टीकल फिजीक्स), पदार्थ के गुण(प्रोपेर्टीस आफ मैटर)। ये सभी छुटे हुये विषय हमेशा चुनौती देते लगते रहे है। जब भी समय मिलता है मै इस पर सामग्री ढुंढ कर पढता रहता हूं। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी।

इस पूस्तक मे भगवान(गाड/सुपर नैचुरल पावर) का जिक्र कई बार आया है। इस पुस्तक के मे जहां कुछ जगह भगवान के आस्तिव पर प्रश्नचिन्ह उठाये गये है, वही कुछ जगह अनसुलझे रहस्यो के लिये भगवान का सहारा भी लिया गया है।
हाकिंस कहते है
“बिना भगवान के सिद्धांत के ब्रम्हांड के आरंभ के बारे चर्चा करना मुश्किल है। मेरा ब्रम्हांड के आरंभ पर किया गया शोध कार्य विज्ञान और धर्म की सीमा पर है, लेकिन मै विज्ञान की तरफ रहने का प्रयास करता रहा हूं। यह संभव है कि भगवान के कार्यकलाप विज्ञान के नियमो मे बाण्धे नही जा सकते, लेकिन इस विषय मे हमे अपनी व्यक्तिगत विश्वास को मानना चाहिये।”
लेकिन यह कुछ ऐसा नही लगता कि जब मानव मस्तिष्क कीसी भी सिद्धांत या घटना के रहस्य को नही समझ पाता तब वह धर्म , चमत्कार और भगवान के नाम का सहारा लेता है।
कुछ् ऐसा ही हाकिसं इन पक्तियो मे कहने की कोशीश कर रहे है।
“यदि सिर्फ एक ही एकिकृत सिद्धांत(क्वांटम भौतीकी और गुरूत्वाकर्षन सिद्धांत का एकीकरण) है, पर वह एक नियमो और समीकरणो का समुच्च्य है। लेकिन वह क्या है जो समीकरणो को जिवन देता है और एक ब्रम्हांड को व्याख्या के प्रस्तुत करता है ? “
भगवान और भौतिकी के नियमो के रिश्तो से तो आइंस्टाइन भी नही बच पाये थे। जब उन्हे “थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी” हजम नही हो पायी थी तब उन्होने कहा था ” भगवान पांसे नही खेलता”(God doesn’t play dice)"। ये बात और है कि उन्हे नोबेल पुरस्कार भी इसी क्षेत्र( क्वांटम मेकेनिक्स का मूल थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी है) मे किये गये कार्य के लिये मिला था।

हाकिंस के मन की एक दुविधा का वर्णन करती यह पंक्ति
“जब से ब्रम्हांड आ आरंभ हुआ है,हम उसके निर्माता की कल्पना कर सकते है। लेकिन यदि ब्रम्हांड स्वयंमनिर्मित हो, जिसकी कोइ सीमा नाहो, उसका आरंभ और अंत नही हो तब भगवान के लिये जगह कहां होगी ?”
यह पूस्तक खत्म होती है इस वाक्य से
“यदि हम एक पूर्ण सिद्धांत(ग्रैण्ड युनिफाइड थ्योरी) की खोज कर पाये तब हम भगवान के मन को समझ पायेंगे।”
ब्रम्हांड की रचना के लिये महाविस्फोट (बीग बैंग) का सिद्धांत सर्वमान्य है। इस के अनुसार ब्रम्हाण्ड की उतपत्ती एक बिन्दु के महाविस्फोट से हुयी। समय की शूरूवात भी इसी समय से हुयी थी। जब कहीं भी कुछ भी नही था तब समय कैसे हो सकता है ? जब कुछ नही था तब क्या था ? भगवान कहां थे ? ऐसा क्या था कि भगवान ने ब्रम्हाण्ड को बनाया ? या ऐसा क्या हुवा जिससे ब्रम्हांड बना ? और भगवान को किसने बनाया ?
मै आस्तिक हूं या नास्तिक नही जानता। लेकिन पूजा, अर्चना, आरती जैसी चिजो से दूर ही रहता हूं। मै खुद हो कर मन्दीर भी नही जाता, यदि जाता हूं तो पर्यटन के उद्देश्य से या किसी ने साथ चलने कह दिया तो उसके साथ हो लेता हूं।
शाम को जब मै अपना पर्स जब भगवान की मुर्ती के सामने फेंक देता हू, तब अन्ना हमेशा टोकता है
“दादा भगवान के सामने चमडे की चिज मत रखो”। 
मेरा जवाब होता है
“मत पी गालीब शराब मस्जीद मे बैठकर,
तो मुझे वह जगह बता दे जहां ख़ुदा ना हो।”
सूबह जब मै सो कर उठता हूं तब मै भजन नही सुनता जो भी गाने की सीडी सामने मिल जाये बजाता हू। अन्ना नहा धोकर जब आता है और भगवान की मूर्ति से सामने प्रार्थना करता है, सबसे पहले वो संगीत को धीमा करता है। तब मेरी प्रतिक्रिया होती है,
"तेरा भगवान बहरा हो गया है क्या ? तेरे भगवान के पास आज भी पुरानी टेक्नालाजी है जो वायरलेस के जमाने मे भी तुझे प्रार्थना करनी पड रही है।"
जब मन्दीर मे घडियाल बजते है यहां मस्जिद मे अजान होती है तब मेरी प्रतिक्रिया यही होती है
“भगवान तो मन्दिर के पहले घंटे की आवाज सुन कर ही भाग खडे होते है।”
क्या भगवान का आस्तिव है ? यदि है तो क्यो इतनी असमानता है ? भगवान ने तो समानतावादी होना चाहिये ना !


2 टिप्पणीयां “आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान” पर
भई, भगवान है कि नहीं, यह तो एक अंतहीन विवाद का मुद्दा है। मानने वाले मानते हैं, नहीं मानने वाले नहीं मानते(जैसे मैं नहीं मानता)। रही बात समानता की, तो अब यदि एक सच्चे भक्त की दृष्टि से देखा जाए तो वह यही कहेगा कि असमानता ईश्वर में नहीं वरन् मनुष्य में है। उसने तो मात्र मनुष्य को बनाया, धर्म इत्यादि मनुष्य ने बना डाले। अब अकबर को ही ले लो(हाँ भई, मुग़लेआज़म अकबर)। उसने अपना एक नया धर्म दीन-ऐ-ईलाही शुरू कर दिया था, पर वह उसके मरने के बाद ही समाप्त हो गया, भई हिन्दु धर्म और इस्लाम आदि जैसे बड़े धर्मों के साथ कैसे कम्पीट कर सकता था!!
तो मूल सत्य यही है, कि धर्म मनुष्य ने बनाए, अब यदि मनुष्य स्वयं समान नहीं है तो धर्म कैसे समान हो सकते हैं क्योंकि हर धर्म उसके बनाने वाले की विचारधारा आदि का प्रतिबिम्ब है।
Amit द्वारा दिनांक मार्च 1st, 2006

Kaafi achchha post hai. Visay ke upar ant-hin (endless) bahas ho sakti hai. Waise main na dharm na bhautiki kaa koi bade jaankaar hone ka daavaa nahin karunga. Lekin main aapko Swami Vivekanand ke Sanatan dharm (jo aaj hindu dharm se parichit hai) ke utpati par likhe koi bhi achche kitab ko padhne ka salah dunga. Jahan tak brahmand ke utpati kas sawaal hai, mujhe to Stephen Hawkins aur Vivekanand ke vicharaon main kayi saari samaanataayen nazar aati hain. Khas kar is baat ka ki shristi ka na koi aadi hai aur naa ant - bas shristi sankuchit (shrinking) and vistrit (expand or explode) hoti rahati hai. Aur ek baar dohra doon ki ye mere vichaar hai - meri samajh bilkul galat bhi ko sakati hai
Raag द्वारा दिनांक मार्च 2nd, 2006

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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