मेरी कल्लो बेगम

शुक्रवार, मई 26, 2006


१९९७-१९९८, संगणक अभियांत्रीकी का अंतिम वर्ष। इस समय तक हम डेनिस रिची के परम भक्त बन चुके थे, यशवंत कान्हेटकर हमारे दूसरे देवता थे । ‘सी’ कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा पर मेरा अच्छा खासा अधिकार हो गया था। मै इस भाषा का उपयोग सामान्य प्रोग्रामिंग के अतिरिक्त ,वायरस बनाने, टी एस आर(टर्मिनेट एंड स्टे रेसीडेन्ट प्रोग्राम), सिस्टम प्रोग्रामिंग के लिये भी करता था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर प्रोग्रामिंग मेरे लिये एक दीवानगी बन चुकी थी, मैं गर्व से कहता था ‘कंप्यूटर’ मेरा पहला प्यार है।

इन्ही दिनो मैं एप्टेक मे पार्ट टाईम नौकरी भी कर रहा था। मुझे शाम की दो बैचो को ‘सी’ पढानी होती थी। अब किस्मत कुछ ऐसी थी कि यहां भी दोनो बैचो मे कन्याओ का प्रतिशत ज्यादा था। दोनो बैच की अधिकांश कन्याये बी एस सी संगणक विज्ञान की छात्राये थी। सामान्यत: प्रोग्रामिंग पढाना एक कठिन कार्य होता है, यह एक ऐसी विधा है, जो पढायी नही जा सकती। ये खुद सीखनी होती है। हमारे पढ़ाने का अंदाज कुछ ऐसा था कि हम यहां भी लोकप्रिय हो गये थे। लोकप्रिय होने का एक कारण ये भी था कि मैं प्रोग्रामिंग के हर पहलू को माईक्रोप्रोसेसर के स्तर तक ले जाकर समझा देता था।

एप्टेक की प्रयोगशाला मे एक ही काला सफेद मानीटर वाला कंप्यूटर था जिस पर सामान्यतः कोई नही बैठता था। मै उसी पर काम करता था। मेरे उल्टे सीधे प्रोग्राम वही पर चलते थे। मैने इस कंप्यूटर का नाम ‘कल्लो बेग़म’ दिया हुआ था। सभी को मेरे पहले प्यार और ‘कल्लो बेग़म’ के बारे मे मालूम था।

मेर छात्रो मे एक कन्या काफी तेज़ थी, उसे भी 'सी' मे सिस्टम प्रोग्रामिंग अच्छी लगती थी। वह हमेशा मेरे प्रोग्रामों के साथ छेड़छाड़ करती रहती थी। मैं उसे मना नही करता था, क्योंकि मैने भी इसी तरह से सीखा था। उसने इस तरह से ‘सी’ पर अच्छा खासा अधिकार कर लिया था। जब मैं प्रोग्रामिंग करता रहता था, तो वह भी साथ मे बैठकर देखते रहती थी कि मैं क्या कर रहा हूं। उसे जब भी समय मिलता था, आ जाती थी और खोद खोद कर पूछते रहती थी। मुझे उसके सवालों का जवाब देना अच्छा लगता था क्योंकि कभी कभी उसके जवाबों के लिए मुझे कॉलेज के ग्रंथालय मे घंटो बैठना होता था।

एक दिन उसने मुझसे कहा
"आप झूठ बोलते हो, आपको ‘कल्लो बेग़म’ से प्यार नही है !”
मैं चकराया
“किसने कहा ? कल्लो बेग़म के बिना मेरी ज़िदग़ी अधूरी है!”
“तो आपका पासवर्ड “Ihatekallo” क्यों है ?”
उस कन्या ने मेरे एक टी एस आर (जो कीबोर्ड की हर कुंजी को एक फाइल मे रीकार्ड करता था), का दुरुपयोग कर मेरा ही पासवर्ड हैक कर लिया था !

मैं उससे काफी प्रभावित हुआ था। लेकिन मेरी उस कन्या से नज़दीकी का कुछ लोगो ने(मेरे एपटेक के सहयोगियों) ने कुछ और मतलब निकाल लिया था।

इस दौरान मेरा जुलाई आ गया था, मेरी बी. ई. पूरी हो गयी थी। मेरे पास एक नौकरी का प्रस्ताव था और मुझे १ अगस्त को अपनी नौकरी के लिये मुंबई जाना था। ये सभी को मालुम हो गया था। जुलाई के पहले सप्ताह मे ‘गुरू पुर्णीमा’ थी। उस कन्या ने मुझे गुरू दक्षिणा मे एक पूस्तक दी थी जिसमे स्वामी विवेकानंद के भाषणो का संग्रह था।

एक दिन मैं उन लोगो को पढाकर कर बाहर आया तब शुभांगी(मेरी सहयोगी) ने मुझे एक बधाई पत्र ला कर दिया और कहा कि ये स्वागत कक्ष मे रखा था।

मैने बधाई पत्र खोला । लिखा था
I love you !
Miss. You Know very Well

मैं चकराया।
“ये कौन है?” 
शुभांगी ने कहा
 ” इतने भोले मत बनो, आपको सब मालूम है !”
“अरे नही यार मै ऐसे भी एप्टेक मे दिन मे सिर्फ २ घंटे रहता हूं, वह भी पढ़ाते रहता हूं !”
” लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है जो उन दो घंटो मे आपके आसपास ही रहते है|”
बाकी जनता भी उसकी हां मे हां मिलाने लगी। मै उन लोगो का इशारा समझ रहा था। मै उस कन्या को जानता था, वो ‘बोल्ड’ लड़की थी। उसे कुछ कहना होता तो शर्तिया वह सीधे कहती। वह कम से कम “Miss You Know very Well” का उपयोग तो नही करती। उसके पास एक तरिका और भी था, मेरे प्रोग्राम ! वह उनमें छेड़छाड़ तो करती ही थी , वह उसमे अपना संदेश छोड़ सकती थी।

मैने सोचा “छोडो यार, जो होगा सामने आयेगा!”

दूसरे दिन शाम को वो लड़की आयी। वो सामान्य थी। हमेशा की तरह वो शुरू हो गयी अपने प्रश्नों की बौछार लिये। मेरा जो बचा खुचा शक था , वो भी चला गया। मैं थोड़ा असामान्य था जो उसने भांप लिया ।
उसने पूछा
“क्या हुआ सर, कल्लो बेगम नाराज़ है क्या ?”
मैने कहा
 “हां, सोच रहा हूं ,मेरे जाने के बाद उसका क्या होगा ?”
” सर उसकी चिंता छोडो, भौजाई और बच्चों (मेरे प्रोग्रामों)की देखभाल मैं करते रहूँगी”
मैने चैन की सांस ली, ये कारनामा(बधाई पत्र) किसी और का है ! इस का तो नही वर्ना वह “भौजाई” तो नही कहती। बाद मे लोगो ने मुझे उकसाने की कोशिश भी की जिसपर मैने ध्यान नही दिया !

३० जुलाई मेरा एप्टेक मे आखिरी दिन, शाम को मैने एप्टेक के सहयोगियों को पार्टी दी । बातों ही बातों मे मैने किसी बात पर कहा
“अभी तक ऐसी कोई कन्या मेरे आसपास नही फटकी है,जो मुझे उल्लु बना सके!”
सोहेल काजी उवाच
“अरे जाने दो ना, शुभांगी ने तो तुम्हे पिछले महीने भर से उल्लु बना रखा है !”
मेरा ट्युबलाईट जला! मैं शुभांगी की ओर मुडा
“तो ये बधाई पत्र तुम ने लिखा था ?”
वो सिर्फ मुस्करायी ! अब मेरा मुंडा(खोपडा) खिसका ! लेकिन मैने धैर्य नही खोया
“अरे यार तुमने मेरी मौज़ लेनी थी वो तो ठीक है, लेकिन तुम लोग उस लड़की की ओर इशारे क्यो कर रहे थे ? मैने उससे कुछ कह दिया होता तो ?”
“हम वही तो चाहते थे कि तुम उससे कुछ कहो ! वो तुम्हे पसंद करती है, तुम तो खैर पत्थर दिल हो। तुम तो कुछ करोगे नही। तो सोचा हम ही कुछ मदद कर दें !”
मैने अपना माथा पिट लिया, अब इन्हे कौन समझाये कि एक लडके और लडकी मे निकटता का मतलब प्रेम नही होता । इच्छा तो हो रही थी कि शुभांगी को एक थप्पड रसीद कर दूं। लेकिन मन मार लिया !

मेरी छात्र कन्या HUGES मे है, उसके पास एक Dell का काला कम्प्युटर है, जिसका की बोर्ड, माउस ,मानीटर सब कुछ काला है। वह उसे ‘कल्लो बेगम’ के नाम से बुलाती है। मेरे पास हर ५ सितंबर शिक्षक दिवस पर उसका बधाई पत्र आता है।

हमारे अध्यापन के दौरान के हमारे कुछ सुभाषित :
१.चलो कंप्युटर देव को जोड घटाना सीखाया जाये !
२.पोईन्टर एक प्रेमिका की तरह होता है। प्रेमिका के साथ यदि कुछ भी होता है तो उसका असर प्रेमी पर होता है।
३.संगणक प्रोग्रामर पास्कल की खूबसूरती से प्यार कर बैठते है लेकिन शादी के लिये ‘सी’ जैसे अख्खड का चयन करते है।(यशवंत कान्हेटकर से चुराया हुआ)।
४.सी++, सी के प्रवाह को कक्षा की चारदिवारी मे बांधने का प्रयास है ! एक अनियंत्रित प्रवाह से नियंत्रीत प्रवाह अच्छा होता है ।
५.सी मे पाईंटर को गुढ रहस्य को ना जाने बगैर प्रोग्रामींग करवाना , बंदर के हाथ मे उस्तरा थमाना है।
***************************************************

7 टिप्पणीयां “मेरी कल्लो बेगम” पर
मज़ा आया कल्लो बेगम से परिचय पाकर
pratyaksha द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?
सुनील द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?
आपकी बात में दम तो है सुनील जी।  
Amit द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

कल्लो बेगम के बारे में जान कर खूशी हुई।
SHUAIB द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

अमित जी, सुनील जी, बात में दम है। आशीष जी, इस बार थप्पड पर नियंत्रण के लिये बधाई।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 27th, 2006

हमेशा की तरह लाजवाब संस्मरण !
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 28th, 2006

भाई, तुम कभी कोई ऐसी कहानी भी लिखोगे जिसमें तुम किसी लड़की पर आशिक हुए, कुछ प्यार का इज़हार किया आदि?
वैसे मुझे लगता है कि उस समय भी आपकी ज़िंदगी में कोई लड़की थी। वर्ना किसी लड़की के साथ सामान्य रह पाना कम से कम मेरे बस की बात तो नहीं।
बाकी सब अच्छा है।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

आगे पढे़....

मेरी एक मूर्खता

सोमवार, मई 22, 2006


पिछली पोष्ट मे मैने कहा था:
दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मैं आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लंबा किस्सा है फिर कभी…।
ये चिठ्ठा वही किस्सा है….
ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं ।

सन १९९४, उम्र लगभग १७ वर्ष । वही किशोरावस्था और युवावस्था की संधि पर खड़ा मै । मध्यमवर्ग के आदर्शों के बीच पला बढ़ा आसमान को छूने की आकांक्षाओं रखने वाला , थोड़ा गुस्सैल , थोड़ा विद्रोही मन।

सपने देखे थे मेडिकल के, अच्छे अंकों के बावजूद प्रवेश नही मिल पाया था। निराशा थी पर निराशा से ज्यादा, व्यवस्था पर आक्रोश था। उम्र ही ऐसी थी जो व्यवस्था के अनुसार ढलने की बजाय व्यवस्था को तोड़ने मे विश्वास करती है।

हर असफलता एक नयी शुरूआत को जन्म देती है। मैने भी एक नयी शुरूआत का निश्चय कर लिया। चलो मेडिकल ना सही, विज्ञान मे स्नातक(बी एस सी) कर लेते है। पदवी(Degree) आने के बाद नागरी सेवा(Civil Services) का लक्ष्य निर्धारित किया। अब विषय कौन से चुने जायें ? जवाब आसान था ,भौतिकी और गणित मे तो रूचि बचपन से थी,लेकिन रसायन पसंद नही था। इसलिये इलेक्ट्रानिक्स ले लिया । मेडिकल की असफलता के बाद जीव-शास्त्र का तो प्रश्न ही पैदा नही होता था।

अब हम ठहरे थोडे पढाकू किस्म के जीव, पहले ही दिन से कक्षाओं मे जाना शुरू । बाकी पढाकूओ से सिर्फ अंतर इतना था कि कक्षा मे हम सामने की बेंचो पर ना बैठकर पीछे बैठते थे।

पहले ही दिन जब सभी का परिचय हो रहा था, हमने भी अपना परिचय दिया।
मैं आशीष हुं, मैं ज़िला परिषद स्कूल आमगांव से हुं और मैने १२ वी मे ९४ % अंक प्राप्त किये है !

मैने जैसे ही यह कहा सारी की सारी कक्षा मेरी तरफ देखने लगी, जैसे मै चिडियाघर से छूटा हुआ प्राणी हूं। कक्षा मे फुसफुसाहट शूरू हो गयी, पता नही ये फुसफुसाहटें मेरे सरकारी स्कूल से होने की वजह से थी या एक गांव से होने या मेरे अंकों से या इन सभी से !

कॉलेज जीवन मे नया नया प्रवेश था। एक नया रोमांच था, एक नया माहौल था। भाई लोग पढ़ाई से ज्यादा गपशप, कैण्टीन मे समय गुज़ारते थे। कक्षा से गोल मारकर फ़िल्मे देखना और दूसरे दिन उसकी चर्चा करना। आसपास से गुजरती कन्याओ पर सीटी बजाना, टिप्पणियां करना …………

मेरे लिये ये सब कुछ नया था। मैं परिवार के साथ एक गांव मे रहता था। रोज़ सुबह साईकिल से ६ किमी आमगांव जाता था, वहां से २४ किमी ट्रेन से गोंदिया कालेज । शाम को इसका उल्टा। पढने के अलावा और कोई धुन नही थी। घर से कालेज , कालेज से घर और इसी मे मस्त। मस्ती का समय , रेल का सफर मे होता था। २० मिनट के सफर मे खूब मज़े होते थे। हम लोग टिकट निरीक्षक को देखकर जान बूझकर अपने डिब्बे से दूसरे डिब्बे मे चले जाते थे, वो हमारे पीछे पीछे आता था। उसे पूरी रेल घुमाने के बाद हम उसे अपनी मासिक टिकिट दिखा देते थे ।

कक्षा मे पढाकू और अनुशासित होने के कारण, थोडे लोकप्रिय हो गये थे, विशेषतः कन्याओ मे। हर काम समय से करने की आदत बचपन से डाल दी गयी थी। स्कूल मे कोई काम समय से ना करने की सबसे ज्यादा सजा मुझे ही मिलती थी। जुमला होता था “एक शिक्षक का पुत्र यदि ऐसा करेगा तो बाकी क्या करेंगे ?” घर मे सजा दुबारा मिलती थी , बोनस मे। एक आदत हो गयी थी । इसी से कालेज मे हमारे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका हमेशा पूर्ण रहती थी । रोज कोई ना कोई मेरे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका नकल करने ले जाता था।

एक दिन एक खूबसूरत कन्या ने हमारी प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। [इस कन्या के पीछे सारी कक्षा के लड़के पडे थे। एक अनार और ४० बीमार।] मैं एक प्रयोग मे व्यस्त था,शराफत से उसे कहा मेरे बैग से निकाल ले । दूसरे दिन वह पुस्तिका वापिस ले आई। हम फिर से व्यस्त, उसे बैग मे रख देने कहा। मेरी जगह कोई और होता तो उसके हाथो मे पुस्तिका देकर(या लेकर) धन्य हो जाता और सारी की सारी कक्षा को कैंटीन मे चाय और समोसो की पार्टी दे देता।

इतने मे अशोक आया,उसने भी वही वाली प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। अशोक हमारी कक्षा मे बी बी सी के नाम से जाना जाता था। यदि आपको कोई खबर कालेज मे फैलानी हो तो आपके पास २ रास्ते है; १. किसी कन्या को बता दो और कह दो कि किसी को ना बताए। २. आप अशोक को बता दो।

हमने उससे भी पुस्तिका बैग से निकाल लेने कहा। और ये मेरी बेवकूफी की शुरूवात थी। अशोक ने पुस्तिका निकाली। पुस्तिका के साथ एक सुगंधित गुलाबी लिफाफा भी निकल आया। अशोक ने लिफाफा देखकर मजमून भांप लिया । पूरी कक्षा मे सभी के सामने ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर दिया

प्रिय आशीष,
……………………… ……………………….. ………..
मुझे तुमसे प्यार है, मैं तुम्हारे बिना जी नही सकती
………. ………….. ………….. …………………… ………
तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी
………………

मेरा चेहरा एकदम लाल हो गया था, कुछ शर्म से कुछ क्रोध से। कक्षा की सारी कन्याये मेरी ओर देख कर मुस्करा रहीं थी जैसे कह रही हो बड़े छुपे रूस्तम निकले। लडके मज़े ले रहे थे। ये सब मेरे लिये अजीब सा था। मैने उस कन्या को ढूंढने की कोशिश की। वो कक्षा मे नही थी। मैने अशोक से पत्र छीना और कक्षा से बाहर आया ।

वो कन्या गैलरी से कालेज के बाहर जा रही थी। मैने उसके पीछे जाकर उसे रोका । गुस्से से मेरा दिमाग काम नही कर रहा था। ‘सटाक’ मैने एक थप्पड उसके चेहरे पर रसीद किया और पत्र फाडकर फेंक दिया । उसके मुंह से निकला
“तुम मुझे नही चाहते इसका मतलब ये नही कि तुम मुझे अपनी पसंद के इज़हार से रोक सकते हो।”
मै पैर पटकते हुये कॉलेज से निकला और अगली रेल से घर पहुंचा। रास्ते मे दिमाग ठंडा हुआ। मम्मी परेशान ,आज ये जल्दी कैसे आ गया। शाम को पापा ने कहा “कल से अभियांत्रीकी के प्रवेश शुरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो।” दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । वह दिन मेरा उस कालेज मे आखिरी दिन था, वह कन्या भी मुझे उस दिन के बाद कभी नही मिली।

आज जब मै पीछे मुड़कर देखता हुं तो एक अफसोस होता है कि काश मैने गुस्से को एक दिन के लिये काबू पा लिया होता। उसके प्यार को स्वीकारना या ना स्वीकारना अलग बात थी, लेकिन थप्पड मारना तो किसी भी तरह से सही नही था। उसने सही कहा था,आप किसी को अपनी पसंद के इज़हार से रोक तो नही सकते।
गलती अशोक की थी, उसे पत्र नही पढ़ना चाहिये था। लेकिन मेरा गुस्सा उस लड़की पर निकला। मैं उसे बाद मे प्यार से समझा भी सकता था। नही समझाता तो भी दूसरे दिन तो मैने कालेज ही छोड़ दिया था।
काश……घड़ी की सुईया पिछे की जा सकती…..
***************************************************************

13 टिप्पणीयां “मेरी एक मूर्खता” पर
अरे ये क्या किया आशीष भाई, लड़की को चाँटा मार दिया। अगर आपकी जगह मैं होता तो ….
लेकिन भगवान हमेशा ग़लत इंसान को ग़लत चीज़ देता है। मुझे दी फूटी किस्मत और आपको ……
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

आशीष जी,
मुझे तो बस ये पंक्तियाँ याद आ रही है
“कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता”
सागर चन्द नाहर द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

आशीष तुम्हारी सजा यही है कि तुम उसे जिन्दगी भर याद रखोगे।
तुमने उसे भले ही बुरा भला कहा हो, लेकिन यकीन के साथ कह सकता हूँ, तुम्हारे दिल के किसी ना किसी कोने मे उसने घर बना लिया था। अब भी दिल्ली दूर नही, ढूंढना चाहो तो वो मिल सकती है (अपने रवि रतलामी “जिन खोजा तिन पांइया” सर्विस चलाते है।(मेरी वाली को ढूंढ रहे है, तुम्हारी वाली को भी ढूंढ देंगे)
और हाँ, अशोक टाइप के बन्दो से होशियार रहना: ये खुद तो रायता खाते नही, बस फ़ैला देते है।
बकिया चकाचक,
जीतू द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

:)
जो बीत गई, वो बात गई…भविष्य के लिये शुभकामनाऎं.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

दुःख हुआ पढकर आशीष भाई। भगवान आपके गुस्से को कम करे।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

मैं आपकी मनःस्थिती समझ सकता हूं….. कैसे और क्यों मत पूछो
खैर जो हुआ सो हुआ… वैसे जैसा जीतू जी ने कहा है.. तलाश करवालो..
और मिल जाये तो क्षमा मांग लो.. वैसे बहुत लंबी सजा काट चुके हो….
नितिन द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

दुख हुआ पढ कर! जो हुआ सो हुआ. लेखन में तुम्हारी ईमानदारी का और हिम्मत का कायल हूं -अब बीती ताहीं बिसार दे आगे की सुध ले!
ई-स्वामी द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

लेख पढ़ा अभी-अभी। कन्या अभी भी अनजाने में गाल सहलाती होगी। शायद गाना भी गाती हो:-

‘हमसे का भूल भई जो ये सजा हमका मिली’
आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।
आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं।
अब क्या कहें। आपको कोसने का क्या फ़ायदा, जो बीत गया समय वह वापस नहीं आ सकता, कोस तो आप अपने आपको स्वयं ही रहे होंगे, हमार कोसने से का होगा!! यह भी ज्ञात है कि क्रोध में व्यक्ति अंधा हो जाता है। बस यही कामना है कि भूतकाल में की गई गलतियाँ आप दोहराएँगे नहीं।
Amit द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

:( कोसा तो नहीं आपको पर समझ नहीं आया - लड़की को झापड़ । और तो और आपने अपना सन्काय भी बदल लिया । विचित्र किस्सा है । पहले कभी नहीं सुनी ऐसी बात । हाँ एक सुझाव है, कभी वह कन्या मिल जाय तो माफ़ी मान्ग लीजियेगा | मेरे हिसाब सेे बेचारी ने इतनी बडी़ गलती भी नहीं की थी कि उसे ऐसी सज़ा दी जाती |
Nidhi द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

भाई आशीष, एक बार तो ढूंढना ही चाहिए आपको उन्हें।

रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006
[…] मैने शादी के पहले विद्यार्थी जीवन मे, और शादी के बाद – मुन्ने की मां के विरोध के बावजूद - अनगिनत राते मैदानो मे, खेतों मे, नदी के किनारे बितायीं हैं: कभी पुच्छल तारे को देखने के लिये, कभी लिओनिडस को देखने के लिये, पर अधिकतर आसमान मे तारों को देखने के लिये| मुझे आसमान के तारों को देखना, उनका अध्यन करना हमेशा पसन्द था| पर काश कभी कोई मेरे साथ होती जिससे मै तारों के वर्गीकरण के बारे मे बता पाता| पर क्या मालुम मै भी वही मूर्खता कर बै� ता जो यहां बतायी जा रही है| […]
छुट-पुट » Blog Archive » Oh Be A Fine Girl Kiss Me द्वारा दिनांक मई 24th, 2006

are bhai, chaanta maar diya, kuch bhi ho jaata main kisi ladki ko chaanta naa maar paata, vishwaas ho giya kaa paa bahut hi krodhit rahe honge, gussa sach me ek pahadi nadi ke manid hai, ummeed hai ke ab aap waise mijaz nahi rakhte.
kumar द्वारा दिनांक मई 28th, 2006

आगे पढे़....

मेरे अधूरे सपने

शुक्रवार, मई 19, 2006


सपने, हां सपने तो मैने खूब देखे है, बचपन से लेकर जवानी तक ! सपने देखना कब शुरू किया , याद नही, शायद होश संभालने के साथ ही, सपने देखना शुरू कर दिया था। सपने , खुली आंखों के सपने !

बचपन नंदन ,चंदामामा और इंद्रजाल कामिक्स पढ़ते हुये बीता। परिया, जादू की छडी, चमत्कारी शक्तियों और जादू की छडी से सराबोर वो कहानियां ! इन कहानियो के मायाजाल मे लिपटे सपने ! जो यथार्थ के धरातल पर असंभव थे, लेकिन बाल-मन उन्ही सपनों के मग्न रहता था। इसी दौरान दूर-दर्शन पर विक्रम बेताल और सिहांसन बत्तीसी जैसे धारावाहिक भी देखे ! बस सपनों पर एक तिलिस्मी धुंध छा गयी थी। सपने देखा करता था कि बस एक जादू की छडी मिल जाये और दूनिया मेरे कदमों मे ! इस छडी की आवश्यकता उस समय ज्यादा महसूस होती थी जब सर्दियो मे सुबह सुबह उठकर २ किमी दूर पैदल स्कुल जाना होता था । देर से स्कुल पहुंचने पर मास्टरजी मुर्गा जो बनाते थे।

खैर थोडे बड़े हुये, तिलीस्मी धुंध छटी । धीरे धीरे पता चला परियां, जादू की छडीयां सिर्फ कहानियो मे होती है। हाईस्कूल मे आ गये थे,पापा के ही स्कूल मे पढ़ना शुरू किया । पापा विज्ञान शिक्षक थे, रूचि बदली। अब विज्ञान प्रगति, आविष्कार और चकमक ज्यादा पढ़ते थे। नंदन ,चंदामामा भी पढ़ते थे लेकिन यथार्थ के धरातल पर रहकर। इन्ही दिनो स्टार ट्रेक, सिग्मा और टर्निंग पॊईंट देखना शूरू किया। बस फिर क्या था , सपना देखा कि बड़े होकर वैज्ञानीक बनेंगे। उन दिनो “विज्ञान प्रगति” मे सौर मंडल की उत्पत्ती और ग्रहों की जानकारी पर एक श्रंखला प्रकाशित हो रही थी, जिसके लेखक देवेन्द्र मेवाडी थे। स्टार ट्रेक, सिग्मा और विज्ञान-प्रगति ने, अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना दिखा दिया ! उन्ही दिनो डिस्कवरी अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण भी हुआ था। राकेश शर्मा अब मेरे नायक थे।

इन्ही दिनो मे गर्मियों मे ननीहाल गया, मेरे नाना जी चित्रकार थे। उनके बनाये चित्र देखे। वहाँ चित्र-कला का भूत चढ़ा। नाना तो थे नही लेकिन मामा थे। उन्होने चित्र-कला की बारीकी सिखाया। बिना किसी स्केल या साधन के पेंसील से सरल रेखा खींचना , ये मेरा पहला पाठ था। वापिस घर आने के बाद कुछ दिनो तक चित्र-कला का भूत सवार रहा, कुछ इनाम भी जीते। ये भूत अभियांत्रीकी के दिनो तक रहा ,उसके बाद छूट सा गया।
दसंवी अच्छे अंकों से पास की। हाईस्कूल पास करने के बाद विज्ञान लेना तय था। मेरा सपना भी था, विज्ञान मे ही आगे बढ़ने का। लेकिन मेरे सपनो मे अब मम्मी पापा के भी सपने थे। पापा की इच्छा मुझे डाक्टर बनाने की थी। सच कहूं तो मेरी इच्छा उस समय पता नही क्या बनने की थी , मुझे आज तक नही मालूम। मेरे सपनो मे अंतरिक्ष यात्री, पायलट, चित्रकार और डाक्टर सभी शामिल थे।

पापा ने ११ वी मे मुझे भौतिकी, रसायन , जीव विज्ञान के साथ गणित भी दिलवा दिया था। गणित मेरे खून मे है, मेरे पापा, ताउजी दोनो गणीत मे एम एस सी हैं। मै बिना मेहनत किये इसमे १००% अंक ले लेता था। सिलसिला आगे भी जारी रहा जब मैने बिना किसी विशेष मेहनत के १२ वी मे गणित ने फिर से एक बार शतक लगाया।

१२ वी का परिणाम आया, अच्छे अंक थे लेकिन इतने अच्छे भी नही थे कि मेडिकल मे प्रवेश दिला सकें। ९४% अंक लाने के बाद मुझे एम बी बी एस मे प्रवेश नही मिल पाया। [मेरा एक मित्र जिसे ४२% अंक थे , उसे प्रवेश मिल गया। ये बात और है कि ३ सत्र लगातार असफल होने के बाद वह मेडीकल कॉलेज छोड़ आया]
मेरा डाक्टर बनने का सपना चकनाचूर हो चुका था। मैने निराशा मे बी एस सी मे भौतिकी , गणित और रसायन विषय लेकर प्रवेश ले लिया । अब मेरा सपना स्नातक हो कर नागरी सेवा (सिविल सर्विस) मे जाने का था।

लगभग २ महीनों तक बी एस सी की कक्षा पूरे मन से की। एक दिन शाम को पापा ने कहा कि कल से अभियांत्रिकी के प्रवेश शूरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो। मैं चकराया। पापा ने मुझे बताये बिना अभियांत्रिकी मे प्रवेश के लिये अर्जी डाल दी थी। उन्हे मालूम था कि मैं मेडिकल मे प्रवेश ना मिलने से निराश हूं और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार नही होंउंगा। दो महीने बाद मैं निराशा से उबर चुका था, और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार था।

दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रिकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मै आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लम्बा किस्सा है फिर कभी…।

मैने संगणक विज्ञान क्यो चुना, यह मैं आज भी नही जानता। यह मेरी सूची मे नही था। वैसे भी १९९४ मे यह वरीयता सूची मे यह रसायन अभियांत्रीकी , यांत्रीकी, इलेक्ट्रानिक, दूर संचार अभियांत्रीकी, विद्युत अभियांत्रीकी आदि के बाद आता था। जब मैं प्रवेश के लिये लिपिक के पास खड़ा था तब मेरे सामने सभी विकल्प थे। लेकिन पता नही क्या हुआ और मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया। मेरे सभी मित्रों को आश्चर्य था। मैने उन दिनो एक लेख पढ़ा था “कम्प्युटर रिवोल्युशन“, शायद ये उसका असर था।

अभियांत्रीकी प्रवेश के बाद भी मेरा पढ़ना जारी रहा। राहुल सांकृत्यायन को पढा। “वोल्गा से गंगा तक” ने मुझे काफी प्रभावित किया। राहुल सांकृत्यायन ने मुझे यायावरी का सपना दिखाया ! नागरी सेवा का सपना अपनी जगह था।

खेलो मे मै क्रिकेट खेलता था, लेकिन सचिन बनने का सपना नही देखा था । कालेज की टीम के एक छ्ठे सातवें क्रमांक के बल्लेबाज को सपने देखना भी नही चाहिये। शतंरज मे भी रूची थी लेकिन एक सीमा तक ही ! कुल मिला कर खेलो की दूनिया मे मैने कोई सपना नही देखा था।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा, कालेज के पाठ्यक्रम के साथ और भी बहुत कुछ पढते रहे। अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष मे कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गयी कि मुझे एक नौकरी हर हालत मे चाहिये थी। संगणक अभियांत्रिकी का अच्छा समय आ चुका था, ढेर सारी नौकरियाँ थी। अच्छा खासा वेतन था। बिना किसी संघर्ष के नौकरी मिल गयी।

जिन्दगी के संघर्ष मे कुछ ऐसा फंसा कि नागरी सेवा का सपना, सपना ही रह गया। ऐसे भी मै जो नौकरी कर रहा था वो मुझे पसंद थी। नौकरी छोडकर परिक्षा की तैयारी की हिम्मत नही थी, साथ कुछ आलस भी था। यदि मैने नागरी सेवा की परिक्षा दी होती तो मेरे विषय इतिहास और अर्थशास्त्र होते !

अब मै सोचता हूं कि मैने इतने सपने देखे(अंतरिक्षयात्री, चित्रकार, वैज्ञानिक,डाक्टर,नागरी सेवा) लेकिन करियर ऐसे क्षेत्र (कम्प्युटर प्रोग्रामिंग) मे बना जिसके बारे मे कभी सोचा ही नही था! लेकिन आज मुझे अपने वर्तमान करियर से पूरी संतुष्टि है।

बाकी सपने जो अधुरे है, हो सकता है कि भविष्य के गर्भ मे छिपे है, शायद धीरे धीरे पूरे हो जायें । यायावरी का जो सपना था, आज सपना नही है। हर सप्ताह मेरी यायावरी जारी है। काफी घूम चुका हूं देश मे विदेश मे, लेकिन बहुत कुछ बाकी है। एक और छिपा हुआ सपना पढ़ते रहने का जो कभी ना तो रुका था ना रुकेगा ! चित्रकारी के लिये हो सकता है भविष्य मे कभी समय निकल आयें।
मैने जो सपने देखे, कुछ पूरे हुये। कुछ टूटे लेकिन सपने देखना जारी है…..

आये हो तो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ
इक उम्र गुज़रती है ,इक ख़्वाब सजाने में।

******************************************************
6 टिप्पणीयां “मेरे अधुरे सपने” पर
आशीष, बहुत अच्छा भी लिखा है और दिल भी लिखा है.
सभी सपने पूरे हो जायें और देखने को सपने ही न रहें, उससे बुरा क्या हो सकता है? जो सपने अभी तक पूरे नहीं हुए वे भविष्य के लिए तुम्हारा इंतजार करेंगे.
मैं सोचता था कि ऐसी जादू की छड़ी हो जिससे मुझे गणित आ जाये, पर मुझे भी गणित नहीं आया, जब तक गणित का विषय रहा, उसमें मुश्किल से ही पास हो पाया. शायद इसी लिए मेरे मन में डाक्टर बनने की छायी कि इसमें गणित नहीं पड़ना पड़ेगा!
पर यह सच है कि जीवन की एक राह चुनो तो अन्य सब राहें छोड़नी ही पड़ती हैं!
सुनील द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बहुत ही अच्छा लिखा है। सच में मै खो गया और मजा भी आ गया।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बढ़िया लिखा,हमेशा की तरह!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बहुत अच्छा लिखा है, आशिष भाई.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 21st, 2006

ख्वाब सजते रहें,सपने सवंरते रहें
दुआ है आप आगे बड़ते रहें ।
ratna द्वारा दिनांक मई 21st, 2006

बहुत अच्छा
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

आगे पढे़....

एक और रेल यात्रा

गुरुवार, मई 11, 2006


मैं एक घुमक्कड किस्म का व्यक्ति हूं, एक जगह पर रहना पसंद नही आता। यायावरी का ऐसा भूत सर पर सवार है कि तकरीबन हर सप्ताह कही ना कही चला जाता हूं। यायावरी भी ऐसी कि कभी रेल से , कभी बस से, कभी अपनी फटफटिया से । कुछ यात्राये मेरी पूर्व नियोजित होती है जो कि मै रेल से करता हूं लेकिन अधिकांश पूर्व नियोजित नही होती है।

मेरी यात्राये जो पूर्व नियोजित नही होती अच्छी खासी रोमांचक होती है। एन समय पर रेल आरक्षण मिल गया तो ठीक , नही मिला तो बस से, वह भी नही हुआ तो रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा। जी हां रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा ! मेरे अधिकांश दोस्त ये नही मानते कि मै रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा कर सकता हूं। इसके पिछे कारण यह है कि मेरे दोस्त मुझे एक नाजुक किस्म का इंसान समझते है। मेरी इस छवि के लिये मै ही जिम्मेदार हूं। मै घर के बाहर हमेशा बोतलबंद पानी पीता हुं, अच्छे होटल/रेस्तरां (साफ सुथरे) मे खाना/नास्ता करता हूं। खुली चीजें या सडक किनारे नही खाता। मै ऐसा पहले(कालेज के दिनो मे) नही था, हर जगह हर चीज खा लेता था। बिना साफ सफाई की परवाह किये लेकिन कुछ नही होता था, सब कुछ हजम कर जाता था। शायद शरी्र की प्रतिरोधक क्षमता अच्छी थी लेकिन अब ऐसा नही है । अब तो कभी गलती से यहां वहां का पानी पी लिया तो गला खराब हो जाता है, बाहर खाने के बाद पेट खराब हो जाता है। शायद यह सब रहन सहन के इस आधुनिक जीवन अंदाज के कारण है जहां प्रतिरोधक क्षमता दिनोदिन कम होते जा रही है।

हां तो मै कह रहा था कि मै आज भी रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा करने का हैसला रखता हूं। पिछले दिनो मै अपने गृहनगर गोंदिया से दुर्ग अपनी ननीहाल जा रहा था, एक्सप्रेस रेल से कुल २ घन्टे का सफर था। आरक्षण का तो सवाल ही नही था। बैग उठाया और चल दिये। स्टेशन पहुंचे, रेल आयी। देखा तो होश उड गये, अनारक्षित डिब्बे मे पैर रखने जगह नही। याद किया अपने भूतकाल को, जिस तरह सिनेमाहाल मे नयी फिल्म के जारी होने पर भीड़ भाड़ मे घुस कर टिकट ले आते थे, वह अनुभव यहां काम आया। ना केवल अंदर घुस गये, बल्कि उपर वाली सीट ( पता नही सीटे होती है या सामान रखने के लिये) पर कब्जा कर लिया।

अब आप अपनी कल्पना शक्ति के घोडे दौडाइये, इस दृश्य की कल्पना किजीये। मई के महिने की एक गर्म दोपहर, तापमान ४५ से उपर। विदर्भ/छत्तिसगड के पिछ्डे क्षेत्र से गुजरती हुयी रेल का एक अनारक्षित डिब्बा, जिसमे अपनी क्षमता से तीन गुने यात्री सवार है। रेल के चलने के बाद कोलाहाल शांत हो गया है। किसी के हिलने के लिये भी जगह नही है लेकिन सभी शांत है । अधिकांश यात्री मज़दूर या ग्रामीण है, कुछ मध्यमवर्ग के लोग भी है। यात्रीयो के सामान के नाम पर सूटकेस कम, गठरीया और पोटलियां ज्यादा है ! मै टी-शर्ट और ऐसे पैंट मे हूं, जिसके पांयचे घुटनो से निचे अलग कर बरमुडा बना सकते है। पिठ पर एक पिठ्ठू बैग है, साथ मे आई-पोड है और हाथो मे एक अंग्रेजी उपन्यास (”Five Point Someone”)। उपर की सीट पर मै अपनी दूनिया मे मस्त बैठा हुआ हूं, संगीत और उपन्यास मे मग्न, सारी दूनिया से बेखबर।

रेल अपनी रफ्तार से जा रही थी, मुझे गर्मी महसूस होने लगी थी। सोचा कि चलो अपने पैंट को बरमुडा बना लिया जाये। घुटने पर से चेन खोल कर मैने दोनो पायचे अलग कर दिये और बैग मे रख दिये। इतने मे नीचे से एक हंसी का फव्वारा छुटा मैने नीचे देखा क्या हुआ ? सब मेरी तरफ देख कर हंस रहे थे ! जनता मेरा करामाती पैंट देख के हैरान थी ! एक ग्रामीण ने कहा
“आपका पैंट बढिया है जी, पैंट का पैंट , गर्मी लगी तो हाफ पैंट !”
हंसी का एक और फव्वारा छूटा । इस बार मेरा ठहाका भी शामील था।

इतने मे एक १८-१९ साल का लडके ने कहा
“आप नीचे मेरी जगह पर बैठ जाओ , मै आपकी जगह बैठ जाता हूं।” 
उसे मेरा उपर बैठना अजिब लग रहा होगा, या सोच रहा होगा पता नही ये बेचारा यहां कहां आकर फंस गया है। उसे मुझ पर दया आ गयी थी, मैने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मै सोच रहा था कि पढा लिखा होना(दिखना) चलो कहीं तो काम आया !

नीचे आकर बैठा रेल “हाजरा प्रपात” के पास से गुजर रही थी। यह सतपुडा पर्वत श्रंखला की एक प्राग- ऐतिहासिक जगह है जिसकी गुफाओ मे आदिमानव रहा करता था। इस जगह के बारे मे तस्वीरो के साथ पूरा एक चिठ्ठा फीर कभी..

अब जनता की नजर मेरे आईपोड पर थी।
एक ने पूछ ही लिया
“ये क्या है जी? टेप रिकारडर है क्या जी ?”
मैने कहा
“जी, ये टेप रिकार्डर जैसा ही है, लेकिन इसमे कैसेट नही होती है। इसमे ४००० गाने रिकार्ड कर सकते है !”
वह
“बताओ साला क्या जमाना आ गया है,पहले इत्ता बडा ग्रामोफोन आता था, और इत्ता बडा रेकाड आता था ५-६ गाने वाला। अब इसको देखो माचिस का डिब्बे के अंदर ४००० गाने ”
मै मन मे
“अबे मेरे आईपॊड को माचिस का डिब्बा बोला, तेरी तो !”
लेकिन सारी जनता फिर से दिल खोल के हंसी, और हम भी ।

अब मेरा आईपोड हर कीसी के हाथो से गुजर रहा था, सब उलट पूलट के देख रहे थे। मैने इयरफोन उन लोगो को थमा दिये, और आईपोड के बारे मे बताने लगा ! सभी को आश्चर्य हो रहा था। मै शरारत मे कभी कभी आवाज तेज कर देता था ।

“चाय गरम !” 
एक चाय वाला आया। उन लोगो मे से किसी ने चाय ली और एक कप मुझे भी थमा दिया। एक आम भारतीय कितना सरल हृदय होता है, दो मिठे बोल बोल लो और जो चाहे करवा लो। कुछ देर की पहचान और दो मिठे बोल , बदले मे उनके प्यार से भरी वो चाय ।

दुर्ग पास आ गया था, मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे, फिर हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !
मै रेल से उतर के चल दिया था, एक और सुहानी याद लिये, जिसमे ना तो मई की गर्मी की तपिस थी, ना सफर की परेशानी, जिसमे थी वही आम भारतीय हृदय की निश्छलता !
***********************************


12 टिप्पणीयां “एक और रेल यात्रा” पर
वाह आशीष भाई,
बडा सुहाना सफ़र रहा आपके साथ, वो भी गरमी की दोपहर मे. बहुत रोचक लेखनी होती है आपकी सदा.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 11th, 2006

आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.
e-shadow द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

सच में जनता डिब्बे में सब को गले लगाती भारतियता दिखती है और a.c first में स्वंय में सिमटी ,गर्दन टेड़ी किए अँग्रेज़ियत ।
ratna द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

मज़ा आ गया. ऐसी स्थितियों से अनेकों बार गुजरा हूँ, लेकिन शायद इतना अच्छा वर्णन एक बार भी न कर पाऊँ. धन्यवाद!
Hindi Blogger द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

दोस्त, आनंद आ गया आपकी यह पोस्ट पढ़कर। छत्तिसगढ़ की स्मृतियां भी ताज़ा हो गईं।
आशा है आने वाले समय में अन्य संस्मरणों को पढ़ने का आवसर भी प्राप्त होगा।
आभिनव द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

यात्रा विवरण बढिया था !
pratyaksha द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

वाह आशीष भाई, बढ़िया अनुभव वर्णित किया है। मैंने तो कभी अपने लोअर की टखनों वाली ज़िप खोल उसे बरमुडा नहीं बनाया, अच्छा ही हुआ!!
और वो हाजरा प्रपात वाली तस्वीरों की पोस्ट के बारे में भूलना नहीं, जल्द ही लिखना।
आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.
अजी आम जनता तो भोली भाली ही होती है, चाहे भारतीय हो या कहीं और की, और कुछ अति स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए उनके साथ खिलवाड़ करते हैं।
Amit द्वारा दिनांक मई 13th, 2006

बढ़िया बयान किया! तुम्हारे सारे लेख बहुत अच्छे लगते हैं। जनता के पास ऐसे-ऐसे धाँसू डायलाग मिलते हैं कि लगता है क्या अभिव्यक्ति क्षमता है! हमारे एक स्टाफ ने एक दिन दूसरे की बुराई करते हुये कहा-साहब,वो तो ससुरा हैंडपंप है,एकफिट ऊपर तो सौ फिट अंदर। समय के संपन्न होने की प्रक्रिया में लोग जनसामान्य से कटने लगते हैं तथा ऐसे तमाम सहज अनुभवों से वंचित होते जाते हैं। बहरहाल बधाई !लिखने के लिये।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 14th, 2006

आशीष भाई, मैं पूरा लेख पढ़ने से पहले पूछना चाहता हूँ कि आप अक्सर ी तो ि क्यों लिखते हैं। जैसे पिछे, ठिक, चिज़ आदि
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006

बहुत अच्छा लिखा है आशीष भाई। आप तो उल्टा भी वैसा ही बिना ग़ल्ती किए लिखते हो
‘मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे,फीर हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !’
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006

[…] सांय 5 बजे के करीब मेरे मोबाईल का अलार्म बज उ� ा और मैंने उ� के देखा कि मैं लगभग पाँच घंटे सोया हूँ, इसलिए काफ़ी हद तक तरोताज़ा महसूस कर रहा था। बाकि लोग पहले ही उ� गए थे। तत्पश्चात नीचे गंगा स्नान के लिए जाने का निर्णय हुआ। अब डुबकी लगाने के लिए मैं तैराकी के वस्त्र आदि तो लाया न था, इसलिए जो कपड़े रात को पहने सफ़र किया था, वो ही पहन लिए। जो लोअर पहन रखा था, घुटनों से उसकी ज़िप खोल दो तो वह बरमुडा बन जाता था, � ीक आशीष भाई की पैन्ट की तरह!! तो बस टखने से निचले हिस्से को अलग किया और चल दिए नीचे गंगा स्नान के लिए। […]
world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!! » ए वीकेन्ड इन � षिकेश - भाग २ द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

[…] अब रविरतलामी के तथा अन्य दोस्तों के फरमाइशी आदेश ,अमित की हरिद्वार-श्रषिकेश यात्रा विवरण,आशीष के रोचक हाफ पैंट-फुल पैंट विवरण तथा इससे पहले विजय वडनेरे के सिंगापुर विवरण तथा सुनील दीपक जी के इधर-उधर भ्रमण के विवरण ने फिर से हमें अपने यात्रा विवरण लिखने के पानी पर चढ़ाया है। […]
फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है… द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

आगे पढे़....

अस्पतालो के कुछ विज्ञापन

मंगलवार, मई 09, 2006


आज का युग विज्ञापन और बाजार का है, इसे सभी मानेंगे. अस्पताल भी अब अपना विज्ञापन दे रहे है । अस्पतालो के कुछ विज्ञापन ऐसे भी हो सकते है :-

  • आईये आईये हमारे अस्पताल मे “बाय-पास” करवाईये। आपके द्वारा दो बायपास करवाने पर तिसरा मुफ्त ! बायपास के बाद यदि आप अपने संसमरण ना लिखने का वादा करे तो बिल मे १०% छूट।
  • प्रतिस्पर्धी अस्पताल की स्कीम : आईये आईये , हमारे पास से अपना ईलाज करवायीये। अस्पताल मे बिताये दिन पर संस्मरण लिखने के लिये सात दिन की कार्यशाला मुफ्त मे ! आप लिख सकते हैं एक हृदयस्पर्शी लेखमाला “पथरी के दिन” या “मेरे दिल का दर्द” !
  • कोई भी शल्यचिकित्सा कराईये, टांके मुफ्त मे ! सुंदरीयो के लिये विशेष योजना, डिजाईनर टांके ! भारत मे पहली बार डिजाईनर टांके !
  •  आपका बिल ५०,००० से ज्यादा होने पर आप लकी ड्रा के पात्र होंगे। आपका चयन होने पर आप अस्पताल मे ८ दिन बिना मुल्य के रह सकते है ।
  • पेशंट गेट ए पेशंट स्कीम : एक मरीज द्वारा दूसरा मरीज लाने पर बिल मे १०% विशेष छुट !
  • हमारी तरफ से आपको ठिक करने मे कोई कसर नही छोडी जायेगी, दुर्भाग्य से मृत्यु होने पर लकडी मुफ्त !
  • पुलिस अधिकारी, राजनेता है ? गिरफ्तारी पुर्व जमानत के लिये सबूत नही है ? गिरफ्तारी के बाद होने वाली बिमारियों, जुर्म के अनुसार बिमारियों के लिये विशेष मार्गदर्शन !
  • टी वी इंटरनेट, एसी युक्त रूम । आप यहां बार बार आना चाहेंगे ! आजीवन सदस्यता योजना के सदस्य बनिये और भारी छुट का लाभ पायें।
**************************************
4 टिप्पणीयां “अस्पतालो के कुछ विज्ञापन” पर

हां सही है। कुछ दिन बाद शव यात्रायें भी स्पांसर होंगीं। गोल चौराहे से तिकोने पार्क तक की शव यात्रा स्पांसर्ड बाई नगरनिगम अस्पताल….। इसी तरह के तमाम स्पांसर होंगे।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

एक विज्ञापन आइडिया हमारी तरफ़ से:
क्या आप गर्भवती है? सेफ़ और सिक्योर डिलीवरी चाहती है: आइये ना फ़लाना नर्सिंग होम, सभी पाँच सितारा सुविधाओं से लैस( नोट:हमारे यहाँ सामने वाले अस्पताल की तरह बच्चे नही बदले जाते)
ये जीवन तो मोह माया है, क्या इससे छुटकारा पाना चाहते है, मिलिए डा झटका से, बीमारी तो बीमारी, जीवन भी शिफ़्ट करवा दें।
एक चुटकुला याद आ गया: रेलवे लाइन के आसपास दीवारों पर अक्सर विज्ञापन लिखे होते है: “फ़लाना दवाखाना, हकीम XXYY etc etc ”
एक सचमुच मे दीवार पर लिखा हुआ था:
सेक्स रोगी अकेले मे मिले, डाक्टर मिसेज मालपानी,काम ना होने पर पैसे वापस की गारंटी।
बस फिर क्या था, भाई लोगों ने बस सेक्स को “सेक्सी” कर दिया। बदलकर फिर से पढें।
जीतू द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

जितनी मजेदार पोस्ट, वैसे ही टिप्प्णियां भी.रीड वन, गेट टू फ़्री की तर्ज पर.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

0% ब्याज वाली फाइनेंश स्कीम भी अस्पताल वाले ला सकते हैं. पङोसी को जलाने के लिए आप भी हमारे यहां महंगा ईलाज करवाईये और भुगतान किजीये आसान किश्तो में. स्क्रेच कार्ड तो अलग से हैं ही.
संजय बेंगाणी द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

आगे पढे़....

फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना

सोमवार, मई 08, 2006


“गलती से हमारे हत्थे फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना लग गया । हमने बिना सेंसर किये हुये इस ज्यों का त्यों छाप दिया है!”

रोज़ सुबह भगवान का नाम लेना चाहिये ऐसा बुजुर्ग कहते है। मैं नास्तिक नही हूं लेकिन भगवान की याद किसी और कारण से आती है। भगवान ने हाथ पैर, कान नाक, आँख वगैरह अंग दिये जिसके लिये मैं उनका आभारी हूं । मनुष्य इन सभी का उपयोग(दुरुपयोग) कर खुद का जीवन ज्यादा से ज्यादा सुखी(मतलब आलसी) करने के लिये करता है। लेकिन भगवान ने दाढ़ी ये मनुष्य के मत्थे क्यो मढ़ दी है, समझ मे नही आ रहा है ?
अब कल ही की बात ले लिजिये। सुबह जल्दी सो कर उठने का निश्चय करने के बाद भी उठने मे देर हो गयी। अब उठते साथ “फावडा” चलाने का मतलब “ए बीग बोअर”। साथ मे समाचारपत्र भी चाटना होता है। आज भी रोज की तरह टावेल ढूंढने मे समय गया।

इतना ही नही रसोई से बम वर्षा हो रही थी
” आज गैस लाना भूलना नही!” 
“भैया को फोन करना भूलना नही”
“वापस आते समय सब्जी लाना नही भूलना वर्ना शाम का खाना नही बनेगा”।
दूसरी तरफ रेडियो से गाना बज रहा था “धूम मचा ले धूम“! अब ऐसे शोर शराबे मे शांति से दाढ़ी बनाना आसान है क्या ?
अंत मे जैसे तैसे दाढ़ी बनाने के सभी आवश्यक चीज़े मैने एक स्टूल पर जमा कर ली थी। पर याद आया कि कल दाढ़ी अच्छे से नही बनी थी, क्योंकि ब्लेड पूरा घिस गया है। अब नया ब्लेड कौन ढूंढे ?

इतने मे रसोई से आवाज़ आयी “जल्दी नहा लो, पानी चला जायेगा !” हमेशा की तरह चेतावनी ! हमेशा की तरह आज भी अनसुनी कर दी !

जैसे केक पर क्रीम लगाते है वैसे चेहरे पर क्रीम लगायी। अब ज़रा स्टाईल से दाढ़ी बनायी जाये सोच कर पहली बार ब्लेड घुमाया कि फोन की घंटी बजी। २ बार रिंग नही बजती कि अंदर से आवाज आयी
“फोन उठाओ कब से बज रहा है ?” 
अब इतने सबेरे फोन बजा मतलब कुछ गडबड ! हडबडाहट मे फोन उठाया तो पता चला कि अपने बेरोजगार(स्वरोजगार) मित्र है। शुरू हो गये
“यार काफी दिन हो गये साथ बैठे हुये,आज शाम का प्लान करते है ! “ 
मै मन मे ही
 “अबे तुझे ये समय ही मिला था क्या ?” 
लेकिन जैसे तैसे फोन रखा। इतने मे दाढ़ी बनाने का पानी ठंडा हो गया था और देर होने की लक्षण दिखने लगे थे ! अब जल्दी जल्दी मे दाढ़ी मन से नही होते है। कभी कही कट छील जाता है, तो कभी ब्रश हाथ से छुट जाता है। इतने मे “उन्होने” शब्द-पहेली मे एक सरल सा शब्द पूछा , जो हमे आया नही। उन्होने कुछ ऐसे हमे देखा कि हम शर्म से पानी पानी होगये। सारा का सारा मूड खराब कर दिया ! अब जैसे तैसे बचे हुये समय मे बची हुयी दाढ़ी आडी-तेडी, उल्टी-सीधी दाढ़ी बनायी और कौवा स्नान करने स्नानघर मे घुस गया ! रोजकी तरह निश्चय किया कि कल जल्दी उठकर अच्छी तरह से दाढी बनाउंगा।

आफीस दौड़ते हुये पहुचने पर भी “लेट मार्क” हो गया, बास जल्दी आ गया था ! ये बास भी ना ! जब भी मै लेट होता हुं जल्दी आ जाता है, जिस दिन समय पर आओ घंटो लेट आता है ! मैने रोज़ की तरह देर से आने का अपना घीसा-पिटा रिकार्ड बजाया, बास ने भी हमेशा की तरह अगले दिन समय पर आने की ताकिद दे दी।
शाम को थक कर घर आया तब बीवी ने (हमेशा की तरह) आंखे छोटी करके चेहरे को घूरा और चेहरा बना लिया !
 “अब क्या हुआ ?”
पूछा तो जवाब आया
“ये क्या है, दाढ़ी के खुंटे कितने बढ़े हुये है, तुम्हें दाढ़ी भी ढंग से बनाना नही आती ! हमारी औरतों के जैसे काम तुम लोगो को करने पढ़े तो नानी याद आयेगी !”
बीवी से सहानुभूति की उम्मीद बची नही थी । अब मैं सारा दोष भगवान को देता हूँ, तो इसमे मेरी क्या ग़लती है ?

*********************************************************

6 टिप्पणीयां “फुरसतिया जी की डायरी का एक पन्ना” पर
कहाँ से हाथ लगा यह पन्ना गुरू? सही आईटम है।
अतुल द्वारा दिनांक मई 8th, 2006

डायरी जरूर हमारी थी। हम खोज रहे थे कहां खो गयी। लेकिन हम जानकारी के लिये बता दें कि यह लेख हमने जीतेंदर के बारे में लिखा था-उनके तमाम दुखड़े सुनने के बाद। कुछ लेख जो तुमने और हमारी डायरी से उड़ा के अपने ब्लाग में लिख दिये उसके बारे में भी बताना चाहिये थे। सारा का सारा हमारा मसाला उड़ाया हुआ है सिर्फ जीतेंदर की जगह अन्ना लिख दिया है।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 8th, 2006

अच्छा लगा पढकर, हम तक पँहुचाने का धन्यवाद आशीष भाई
e-shadow द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

अरे फुरसतिया जी, काहे अपने कर्म हमारे गले बान्ध रहे हो। जब डायरी तुम्हारी है तो है, इसमे इत्ता उखड़ काहे रहे हो। अब मान भी लो, भौजी कुछ नही बोलेगी, हम फुनवा कर देंगे। बकिया कमेन्ट हम समय लिखते ही अपने ब्लॉग पर लिख देंगे, अभी तो रुकावट के लिये खेद है।
जीतू द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

वाह आशीष भाई, और भी कुछ चटपटे वाले फ़ुरसतिया जी की डायरी के पन्ने धरे हो क्या? जो भाई साहब संकोच के मारे पोस्ट ना कर पाये हों.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

पोस्ट बढ़िया है पर मामला कुछ समझ में नहीं आया।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

आगे पढे़....

अथ श्री फटफटिया पूराण

शनिवार, मई 06, 2006


फटफटीया लिए हुये पूरे छह महीने गुज़र चुके हैं, लेकिन दिल की सबसे बड़ी तमन्ना अभी तक अधूरी है। कल हम हमेशा की तरह पिछली सीट पर अन्ना को बिठाये हुये कार्यालय से अपने दडबे की ओर जा रहे थे । रास्ता वही पुराना था, शोलींगनल्लुर से पुराने महाबलीपूरम मार्ग द्वारा एन आई एफ टी(राष्ट्रीय फैशन तकनीकी विद्यालय) के पास से होते हुये अपने दडबे अड्यार तक। रास्ता अच्छा नही है, गड्डो मे सडक ढूंढनी पड़ती है। लेकिन एन आई एफ टी के पास रास्ता खूबसूरत हो जाता है। अजी नही गढ्ढे खत्म नही होते, वे तो अपनी जगह ही रहते है लेकिन सड़कों पर एन आई एफ टी की खूबसूरती उतर आती है । कमर का दर्द आंखों के रास्ते दिल मे उतर आयी खूबसूरती की ठंडक से छूमंतर हो जाता है।

कल ऐसे ही हम अपने अलग मूड मे थे, धीरे धीरे चले जा रहे थे। इतने मे सामने जो नज़ारा हमने देखा, आंखों पर भरोसा नही हुआ। ऐसा लगा कि हम सपना देख रहे हैं। फटफटिया और धीमी हो गयी। इतने मे सामने से आ रहे भीमकाय ट्रक ने भोंपू बजाया, तब हमे जा कर विश्वास हुआ कि हम सपना नही देख रहे है, और जो कुछ हम देख रहे है वह माया नही है, यथार्थ है । सामने एक कन्या हमसे लिफ्ट लेने के लिये अंगूठा दिखा रही थी । हम खुश हुये, इच्छा हुयी की फटफटिया खड़ी कर पहले जोरो से बीच सडक मे ही भांगड़ा किया जाये और बाद मे कन्या को लिफ्ट दी जाये।

लेकिन हाय री हमारी बदकिस्मती, पिछली सीट पर अन्ना बैठा हुआ था। देर से ही कन्या की नजर अन्ना पर पडी और उसने अंगूठा निचे कर लिया। अब इसमे उस लडकी का दोष नही है, अन्ना को उजाले मे देखने के लिये भी भरपूर रोशनी चाहिये होती है । वैसे मेरा पूरा इरादा तो था ही कि अन्ना को निचे उतार कर उसे बिठा लेने का। लेकिन कन्या अगली फटफटीया को लिफ्ट के लिये अंगूठा दिखा रही थी। हम अपना माथा पिट रहे थे और अन्ना चंद्रकांता वाले क्रूरसिंह की तरह मुस्करा रहा था। यहां हमारा दिल जल रहा था और वो हमारे जले पर नमक छिडक रहा था ।

अख्खी जिंदगी मे पहली बार किसी ने लिफ्ट मांगी थी, और काले कलुटे अन्ना के कारण ये मौका भी हाथ से जाता रहा !

खैर हम मुंह लटकाये हुये अपने रूम पर पहुंचे ! खा-पीकर (पानी) सो गये !

सपने मे नारदजी अवतरित हुये, पूछा “वत्स इतने दूखी क्यों लग रहे हो , अपने दुख का कारण कहो हम उसका निवारण करेंगे”

हमने अपनी सारी व्यथा कथा कह सुनाई। साथ मे ये भी जोड़ दिया कि पिछले छह महीनों मे नयी फटफटिया लेने के बावजुद किसी कन्या ने हमे लिफ्ट नही मांगी है !

नारदजी बोले ” हे मूढ बालक , सारी समस्या की जड़ तुम्हारी फटफटीया है, तुमने ऐसी फटफटीया ली है कि जिस पर कोई भी खुबसूरत कन्या बैठना पसंद नही करती है”

हम “महाराज आप यह क्या कह रहे है ! हमारी फटफटिया तो सबसे ज्यादा स्टायलिस फटफटिया है ! पांच गियर वाली १८० सी सी की बजाज एवेन्जर है। जब हम इस पर निकलते है,तो लोग मुड़ मुड़ कर देखते है !”

नारद जी बोले “वत्स दिखावे पर मत जाओ, अपनी अक्ल लगाओ। हम तुम्हारे दुखो के निवारण के लिये फटफटिया पूराण सुनाते है!”

अथ श्री फटफटिया पूराण
फटफटिया यह एक यंत्र चालित द्विचक्री वाहन होता है ! इस वाहन का प्रयोग कलयुग मे अश्व या हाथी के स्थान पर किया जाता है। इस वाहन की महिमा अपरंपार है। अमरीका देश मे यह वाहन विलासीता का प्रतीक है, वहीं भारत देश मे यह मध्यमवर्ग का प्रमुख वाहन है। इस वाहन के प्रयोग के लिये लायसेंस रूपी पत्र की जरूरत होती है। यह आपको सरकारी कार्यालय मे कुछ पत्रपूष्प अर्पण करने के बाद मिल जाता है। यदि आपके कुटुंब मे कोई पुलिस मे या राजनीति मे है तब आप को इस पत्र की कोई आवश्यता नही होती है।

फटफटिया वाहनो को भिन्न भिन्न श्रेणियों मे विभाजित किया जा सकता है। कुछ प्रमुख श्रेणीया इस प्रकार है:-
पारिवारिक फटफटिया : इस श्रेणी के वाहन पर पूर्ण परिवार के साथ यात्रा की जा सकती है। इस वाहन की सीट सपाट(समतल) होती है। वाहन चालक की पत्नी पिछली सीट पर अपने दोनो पैर वाहन के एक ओर कर गोद मे बच्चा लिये स्थान ग्रहण करती है। पेट्रोल की टंकी पर दुसरे बच्चे(बच्चों) को बिठाया जाता है। यह वाहन अत्यंत धीमी गति से चलाया जाता है। तेज़ गति से चलाने पर पारिवारिक शांति के भंग होने की सम्भावना होती है। यह भी संभव है कि इस वाहन को तेज़ चलाने से रात मे भोजन की प्राप्त ना हो। यह वाहन शादीशुदा श्रेणी के मानवों मे लोक प्रिय होते है । इस श्रेणी के वाहनो मे प्रमुख है, हीरो होण्डा के सी डी १००, डॊन, बजाज के सभी स्कूटर तथा सी टी १०० इत्यादि.

महिला मित्र फटफटिया : इस श्रेणी के वाहन की सीट वाहन चालक के लिये निची और पिछ्ली सीट पर उंची होती है। पिछली सीट पर बैठने वाला हमेशा सामने चालक पर झुका हुआ रहता है। इस श्रेणी के वाहन मे पिछली सीट पर वाहन के एक ओर पैर रख कर बैठना शोभनीय नही होता है, इसे पिछड़े पन की निशानी माना जाता है। इसके गतिरोधक तीव्र होते है, जिनका उपयोग वाहन रोकने के लिये कम, सवारीयों मे निकटता बढ़ाने के लिये ज्यादा किया जाता है। इस तरह के वाहनों की लोकप्रियता नयी पीढ़ी के लोगो मे होती है, कालेज छात्रो इसे ज्यादा पसंद करते है। इस श्रेणी के वाहनों मे प्रमुख है, बजाज पल्सर, हीरो होण्डा की एम्बीशन, ग्लैमर, करीझ्मा इत्यादि.

मस्तमौला फटफटिया: यह एक अलोकप्रिय श्रेणी का वाहन है। इसमे चालक की सीट और पिछली सीट एकदम अलग होती है।चालक और सवारी सामाजिक प्रेम भावना के विपरीत, एक दूसरे से अलग अलग आराम से बैठ सकते है। इस श्रेणी के वाहनो मे गतिअवरोधक के उपयोग से भी प्रेमभाव नही बढता है। यह वाहन तीव्र गति से चलाया जा सकता है, लेकिन वाहन ईंधन की खपत ज्यादा करने से परिवार और मित्रगण पैसा उड़ाने का आरोप लगाते है। इस श्रेणी के वाहनो मे प्रमुख है, बजाज एवेन्जर, बुलेट थण्डरबर्ड और यामहा एंटाइजर !

हे वत्स इस पुराण का श्रवण करने के पश्चात तुम्हें अपनी ग़लती का अहसास हो गया होगा। इतना कहकर नारद जी अंतर्धान हो गये।
अब हम सोच रहे है कि बजाज एवेन्जर बेचकर हीरो होण्डा की करीझ्मा लेंगे.
**************************************************************

6 टिप्पणीयां “अथ श्री फटफटिया पूराण” पर
“हम खुश हुये, इच्छा हुयी की फटफटिया खड़ी कर पहले जोरो से बिच सडक मे ही भांगड़ा किया जाये और बाद मे कन्या को लिफ्ट दी जाये।”
Excellent!  हीरो होन्डा स्लीक बननी बन्द हो गई क्या देस में?
ई-स्वामी द्वारा दिनांक मई 6th, 2006

अरे भाई अन्ना को कोसने के बजाय उसका धन्यवाद दो. यह तो नया तरीका निकाला है जेबकतरों ने, सुंदर लड़कियों को खड़ा कर देते हैं बीच सड़क पर तुम जैसे भोले भाले लड़कों की जेब काटने के लिए. वह तो भला हो अन्ना का जिसने तुम्हे बचा लिया. आगे से बिना अन्ना के फटफटिया मत चलाना क्योकि यह जान कर भी, किसी सुंदर कन्या को देखोगे तो यह बात भूल जाओगे. सुंदर कन्या के सामने दिमाग काम ठीक नहीं करता, और तुम फिर से यही गलती कर सकते हो.
सुनील द्वारा दिनांक मई 7th, 2006

लोगों की बातों में आये बिना अपने इरादे पर अमल करो! जो होगा देखा जायेगा।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 8th, 2006

सही राह है, गुजर जाओ.बाद की बाद मे.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 8th, 2006
आशीष भाई, ईमानदारी से कहूँ तो शादी कर लो भाई, पर उसके लिये किसी कन्या को पहले लिफ्ट देनी होगी। और उसके लिये अन्ना को कुछ दिन लेफ्ट-राइट करा दो ना।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 9th, 2006

भई मैं आपकी बात से पूर्ण इत्तिफ़ाक नहीं रखता। कारण यह है कि मेरे पास तो “महिला मित्र फ़टफ़टिया” है पर फ़िर भी डेढ़ साल होने को आया, किसी कन्या ने लिफ़्ट नहीं दी(मतलब है नहीं दी)!! दूसरे, मैंने बहुत सी “पारिवारिक फ़टफ़टियाओं” तथा उससे भी निचले दर्जे की फ़टफ़टियाओं(कभी हीरो होन्डा की एस.एस. आई थी) पर खुशनसीबों की लॉटरी निकलते देखा है।
तो अंत पंत तो मैं यही कहूँगा जो कि आम भाषा में ऐसे टैम कहा जाता है, “खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान”!!
Amit द्वारा दिनांक मई 10th, 2006

आगे पढे़....

मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

  © Hindigram Khalipili by Hindigram 2011

Back to TOP