दिसंबर 2014 की छुट्टीयाँ : एक दिन कालेज मे

शुक्रवार, जनवरी 02, 2015

बैंगलोर से हवाई-ट्रेन और टैक्सी यात्रा कर घर पहुंचे। घर पहुंचते तक अहसास हो गया था कि बैंगलोर की तुलना मे गोंदिया मे ठंड ज्यादा है, घर मे थर्मामीटर देखा 6 डीग्री सेल्सीयस। थर्मामीटर देखकर शरीर पर कपड़ो की एक परत और चढ़ा ली। यात्रा से आने के बाद का स्नान वाला इरादा त्याग दिया गया।

गर्मा गरम खाना तैयार था, जिसका भोग घर के सामने के आंगन मे सर्दी की गुनगुनी धूप मे बैठकर लगाया गया। गोंदिया वाले घर मे सबसे ज्यादा खुश गार्गी थी, बैंगलोर के दड़बेनुमा दो कमरे के घर की तुलना मे ये बड़ा सा, बड़े से आंगन वाला घर था। खेलने के लिये ढेर सारी जगह और एक अनुषा दीदी भी थी।

वो रास्ते जिनमे पीठ पर बैग लाद्कर साइकिल चलायी है
दोपहर भोजन पश्चात मेल देखी, पता चला कि 19 दिसंबर को इंजीनीयरींग कालेज मे "एलुमनी मीट" का आयोजन है। दूसरे दिन ऐसे भी घर पर आराम करने का इरादा था, अब कालेज जाकर पुरानी यादें ताजा करने का अवसर था। इसी बहाने निवेदिता को भी अपना कालेज दिखाना हो जाता, गार्गी तो ऐसे भी घर से ज्यादा बाहर खुश रहती है। बस दूसरे दिन कालेज जाना तय हो गया।
मुख्य इमारत
"एलुमनी मीट" कार्यक्रम 11 बजे से था, घर से हम तीनो(मै, निवेदिता और गार्गी) 10:30 बजे चल पड़े। गार्गी पहली बार स्कूटी की सवारी कर रही थी। कालेज के दिनो मे मै साइकल से जाता था और कभी भी कालेज सीधे रास्ते सनही गया था। गली कुचो, मैदानो के बीच से छोटे रास्ते से साइकल चलाते हुये कुछ मिनट बचाने के लिये ये सब कारस्तानी की जाती थी। आज सत्रह बरस बाद स्कूटी भी उसी छोटे रास्ते से ले गया, निवेदिता पीछली सीट से पूछ रही थी कि ये कौनसा रास्ता है? 20 मिनट की स्कूटी की सवारी के बाद हम कालेज के सामने पहुंच गये।

सामने कालेज की वही इमारत थी जिसमे मैने अपने जीवन का स्वर्णीम दौर गुजारा था, 1993-1998 तक इन्ही इमारतो के मध्य अपनी साइकिल और पीठ पर लटकते बैग के साथ भटका करते थे। मैने इंजीनियरींग प्रवेश फ़्री सीट मे लिया था जिसकी फ़ीस 4000 रूपये सालाना थी, जबकि पेमेंट सीट वाले 32000 रूपये सालाना देते थे। उसपर से भी मै इन 4000/- का पूरा सदुपयोग करता था, कक्षाओं से बचा समय पुस्तकालय मे या कंप्युटर प्रयोगशाला मे। तीसरे और चौथे वर्ष मे तो 8-10 घंटे कंप्युटर प्रयोगशाला मे बीतते थे।
हमारा स्वागत

कालेज के मुख्य गेट से प्रवेश करते साथ ही ढोल बजने लगे, पता चला कि वह ढोल हमारे ही स्वागत के लिये बजाये जा रहे थे। स्कूटी खड़ी करने के बाद अंदर पहुचे, छात्राओं ने गुलाब से स्वागत किया, तिलक किया, एक छात्र ने जैकेट पर एक बिल्ला लगा दिया। हम अभीभूत हो गये, बस आंसू टपकना बाकि थे। निवेदिता के सामने कालर खड़ी कर बताया, ये है हमारा कालेज।

प्रो मेहता सर
सामने ही प्रो दिक्षित मील गये, उनके साथ कालेज के अंदर "एलुमनी मीट" रजीस्ट्रेशन हाल पहुंचे, हमेशा की तरह कालेज वालो ने चूना लगाना नही छोड़ा था, आज भी 1000/- वसूल लिये। मुख्य कार्यक्रम मे देरी थी, सोचा कि पुरानी यादें ताजा कर ली जायें, कैम्पस का चक्कर लगाना प्रारंभ किया। जैसे ही आगे बढ़े प्रो आई सी मेहता मिले जोकि मेरे कंप्युटर टेक्नालाजी विभाग के प्रमुख थे और अब भी हैं। उन्होने मुझे पहचान तो लिया और ये भी पुछ लिया कि अभी भी विप्रो मे हो क्या ? लेकिन नाम भूल गये थे। वैसे हर साल 50-60 छात्र निकलते है, किस किस के नाम को याद रखें। उनसे चर्चा मे पता चला कि मेरे समय के अधिकतर प्रोफ़ेसर अब कालेज मे नही है। प्रो पठान और प्रो मंडोले तो दुनिया ही छोड़ गये थे, प्रो धारस्कर, प्रो खंडाइत दंपति तथा प्रो दीपक शर्मा कालेज छोड़ किसी अन्य कालेज मे हैं। मेरे पहचान के प्रोफ़ेसर मे केवल वही बचे थे जो इलेक्ट्रानिक्स और कंप्युटर टेक्नालाजी दोनो विभागो के सामान्य विषयो को पढ़ाते थे।

प्रो बाजपेयी और प्रो चौबे
मेहता सर से मिलकर आगे बढ़ने पर प्रो चौबे और प्रो बाजपेयी मीले, थोड़ा आश्चर्य हुआ कि ये दोनो अब भी एक ही साथ पाये जाते है। निवेदिता को अपना विभाग दिखाया। कालेज पहले से काफ़ी बेहतर था, हमारे समय मे 20-30 कंप्युटर की एकमात्र प्रयोगशाला थी, अब सैकड़ो कंप्युटर वाली बड़ी मुख्य प्रयोगशाला थी, दो तीन प्रयोगशाला और भी थी। प्रोफ़ेसरो के कक्ष अब पहले से बेहतर थे लेकिन उनमे अब दरवाजे लग गये थे।

कालेज का कैंपस पहले से ज्यादा हरा था, हम लोगो के समय जो पौधे थे, अब वृक्ष हो चुके थे और सारे कालेज मे छाया दे रहे थे। कैंटीन पहले जैसी थी, लेकिन आज बंद थी, कह नही सकता की उसके खाने की गुणवत्ता मे कोई सुधार हुआ या नही। कालेज मे प्रवेश करते समय गेट पर दो तीन टपरी दिखी थी, उन्हे देखकर लगता तो नही कि कोई सुधार हुआ होगा। पुस्तकालय पहले से बेहतर लगा, ढेरो पुस्तके उपलब्ध थी। कुल मिलाकर कालेज की इमारते और कैम्पस पहले जैसा ही था।

समस्त प्रोफ़ेसर
मुख्य कार्यक्रम प्रारंभ हो चुका था, सारे कालेज का भ्रमण करने के बाद हम आडीटोरीयम पहुचे। आशा के अनुरुप मेरी बैच का कोई भी नही था, ना ही मेरे विभाग के सीनीयर या जुनियर! मेरे विभाग के छात्र जिस तरह की नौकरी करते है, या व्यवसाय मे है, उनसे इस तरह के कार्यक्रमो मे आने की आशा करना व्यर्थ ही है। मै तो मौके पर उसी शहर मे होने से कार्यक्रम मे उपस्थित हो पाया था। अधिकतर पुर्व छात्र 1990 से पहले के बैच के थे  और उनमे से भी लगभग सभी नागरी(Civil), प्रोडक्शन  विभाग के थे। कुछ इलेक्ट्रानीक्स के थे। कुल 100 से भी ज्यादा पुर्व छात्र पहुचे थे, अधिकतर उद्योग-जगत मे अच्छी खासे पदो पर थे, कुछ लोगो ने स्वयं का व्यवसाय किया हुआ था, कुछ सरकारी नौकरीयों मे अच्छे पदो पर थे, एक राजनिती मे उतर गये थे और मप्र विधानसभा मे विधायक थे। सब के परिचय को देखकर लग रहा था मैने तो अब तक कूछ भी हासिल नही किया लेकिन ये मानकर संतोष था कि ये सभी मुझसे 10-15 वर्ष सीनीयर है।

पापा के साथ गार्गी
कार्यक्रम के प्रारंभ मे गणित के प्रोफ़ेसर बाजपेयी सर ने अपनी ओजस्वी आवाज मे एक छोटा सा भाषण दिया, वे अस्सी पार कर चुके है लेकिन वाणी मे वही ओज है। प्रो दिक्षित सर इस कार्यक्रम के कर्ता-धर्ता थे लेकिन वे भी अधिकतर पुर्व छात्रो से जुनियर थे, उनके भाषण के बीच काफी खिंचाई हुयी।

सबसे पहले पुर्व छात्रो ने प्रोफेसरो के लिये स्मृति चिन्ह लाये थे, वे प्रदान किये। धीरे धीरे पता चल रहा था कि मेरे समय के अधिकतर प्रोफ़ेसर जा चुके है, प्रथम वर्ष के प्रोफ़ेसरो मे भौतिकी के डा .चद्रायन, रसायन शास्त्र के डा धोटे के अतिरिक्त किसी भी प्रोफ़ेसर को मै जानता नही था। इलेक्ट्रानीक्स मे भी प्रिंसीपल डा राठौर के अतिरिक्त कीसी को मै पहचान नही पाया। कुछ चेहरे पहचाने नजर आ रहे थे लेकिन मै नाम भूलचुका था, सत्रह बरस का एक लंबा अरसा स्मृतियों को ढकने मे सफ़ल था।

कालेज के लान मे गार्गी
इसके बाद पुर्व छात्रो को मंच से कहने का अवसर मिला। सभी पुर्व छात्रो ने कालेज और प्राध्यापको की प्रशंसा तो की ही लेकिन खींचाई का कोई मौका नही छोड़ा। कीसी भी कोने से लग नही रहा था कि इन सबने पंद्रह बीस वर्ष पहले  कालेज से विदा ली थी और सभी के सभी उद्योग जगत मे अच्छे पदो पर है। उनके शब्दो मे वही कालेज के दिन आ गये थे, वही बिदांस अंदाज! एक महाशय ने कहा कि
 "इस कालेज की नींव हम लोगो ने रखी है, क्योंकि हर इमारत की नींव से लेकर छत मे हमारी फ़ीस और डोनेशन का पैसा लगा है।" 
सारा सभागार ठहाको के गुंज उठा था।

पुराने दिनो को याद करते हुये छात्र कह रहे थे कि

"इंटरनल मे 20 मे से 20 मिल जाते थे लेकिन बचे 80 मे से 20 अंक प्राप्त करना कठिन होता था। और अंत मे ATKT ही सहारा होता था।"
"सुना है कि अब तो सिवील/मेकेनिकल मे भी लड़कीयाँ होती है, हमारे समय मे तो इलेक्ट्रानिक्स भी बजरंग दल होता था। वो तो भला हो कंप्युटर टेक्नालजी का कालेज मे खूबसूरती का प्रवेश हुआ।" 

छात्र संबोधित करते रहे और सभागार ठहाको से गुंजता रहा। दोपहर के 2 बज रहे थे, गार्गी को भूख लग आयी थी। कैंटीन मे गार्गी के खाने लायक कुछ नही था, हम लोगो ने कालेज के प्रोफ़ेसरो से विदा ली।

जब मै अपनी स्कूटी लेने पहुंचा तब पुर्व छात्रो के वाहनो को देख कर दंग रह गया, आडी, बी एम डब्ल्यु से लेकर स्कार्पीयो तक मौजूद थी वहाँ पर। हमने अपनी स्कूटी उठायी और चल पडे घर की ओर।

ससुराल यात्रा अगले अगले भाग मे।


मेरे बारे मे

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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