दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 1 मदुरै

मंगलवार, मई 21, 2019

गार्गी की छुट्टीयाँ समाप्त हो रही थी। सारी छुट्टी निकल गई और वो शिकायत करते रह गई कि पापा "हालीडे" जाना है। तो हमने भी सोचा कि चलो तीन चार दिन कहीँ घूम आते है।

अचानक बाहर घूमने का कार्यक्रम था तो ट्रेन या फ़्लाईट से जाने का मौका नही था, अंतिम समय पर ट्रेन आरक्षण नही मिल पाता और फ़्लाईट की तो आसमान छूती कीमत होती। सोचा कि अपनी कार से ही चलते है।

लेकिन अब जायें कहाँ? ऐसी जगह जो तीन चार दिनो मे अच्छे से घूमी जा सके, जेब को अधिक नुकसान ना हो। ऊटी, कोडैकनाल जाना नही चाहता था, भीड़ बहुत रहती है। मैसोर, चेन्नई, पांडीचेरी, महाबलीपुरम पिछले वर्ष ही घूम चूके थे।

योजना आयोग


अपने चेन्नई के दिनो मे मैने अपने सहकर्मीयों के साथ नागरकोईल, त्रिचांदुर, कन्याकुमारी तथा शुछिंद्रम की सैर की थी। प्रदीप नाशीककर के साथ कन्याकुमारी और रामेश्वरम घुमा था। मम्मी, भाई और छोटी बहन के साथ मदुरै और रामेश्वरम की यात्रा की थी। तो हमने इन सभी यात्राओं के अनुभव से मदुरै, कन्याकुमारी, शुछिंद्रम और रामेश्वरम की यात्रा की योजना बना ली।

इस ट्रिप की योजना बनाते समय कुछ नियम बनाये कि सारी ड्राइवींग दिन मे करेंगे, जैसे ही पेट पूजा का समय होगा भोजन या नाश्ता करेंगे। रात के नौ से दस बजे सो जायेंगे जिससे कि दूसरे दिन तरोताजा रहे।

कुल मिलाकर योजना ऐसे बनी कि पहले दिन सुबह छ: बजे बैंगलोर से निकलकर मदुरै पहुंचा जाये। मेरे घर से मदुरै 435 किमी है, गूगल महाराज के अनुसार 6 घंटे लगना थे, रास्ते मे नाश्ता , खाना मिलाकर आठ घंटे, अर्थात दो बजे मदुरै पहुंचेंगे। होटल मे चेक-इन कर मीनाक्षी मंदिर जायेंगे। उसके बाद मदुरै बाजार घुमेंगे। दूसरे दिन सुबह कन्याकुमारी के लिये निकलेंगे, मदुरै से कन्याकुमारी किमी है, गूगलदेव के अनुसार चार घंटे। नाश्ता लेकर पांच घंटे। ग्यारह बजे कन्याकुमारी पहुंच जायेंगे। कन्याकुमारी मे विवेकानंद शिला, थिरुवल्लुवर मूर्ती, कन्याकुमारी मंदिर, गांधी मंडपम, रेल्वे स्टेशन और निकट का शुछिंद्रम मंदिर मे शाम हो जायेगी। शाम को सूर्यास्त दर्शन, गार्गी के लिये बीच पर मस्ती। तीसरे दिन सुबह सूर्योदय दर्शन के पश्चात रामेश्वरम के लिये प्रस्थान। रामेश्वरम कन्याकुमारी से 310 किमी है, गूगल देव के अनुसार पांच घंटे लगेंगे। नाश्ता लेकर 12 बजेंगे। रामेश्वर मे पंबन पुल, अब्दुल कलाम मेमोरीयल, राम झरोखा, विभिषण मंदिर इत्यादि के साथ रामेश्वर मंदिर मे शाम हो जायेगी। समय मिला तो धनुषकोडी जायेंगे, नही तो अगले दिन जायेंगे। चौथे दिन बैंगलोर के लिये वापसी। रामेश्वरम से बैंगलोर मेरा घर  560 किमी है, गूगलदेव के अनुसार 9:30 घंटे, नाश्ता/खाना पीना मिलाकर बारह घंटे। सुबह छ: बजे निकले तो शाम के छ: बजे घर!

होटल बुकींग


योजना बन गई। अब होटेल की बुकींग की जाये। सस्ते बजट होटेल के लिये ओयो रूम्स की ओर नजर डाली, 700-2000 रूपये के कमरे दिखा रहा था। होटेल बुक करने के लिये हमे गार्गी का ध्यान रखना होता है, हम गरीब मास्टर के बेटे है लेकिन वो साफ़्टवेयर इंजीनियर की बेटी है। उसे साफ़सुथरा बिस्तर और साफ़सुथरा चमचमाता टायलेट चाहीये। ओयोरूम्स ने निराश किया, सारे होटलो के रिव्यु बकवास थे। यात्रा डाट काम पर नजर डाली, पता चला कि वह पहली बुकींग पर 450 रूपये का डिस्काउंट दे रहा है, मदुरै मे मीनाक्षी मंदिर से एक किमी दूर होटेल विजय बुक किया, डिस्काउंट मिलाकर मुझे 1200 रूपये मे अच्छा कमरा मिल गया। कन्याकुमारी छोटी जगह है लेकिन पर्यटकों की भीड़ रहती है। होटेल महंगे होने की संभावना थी। यात्रा, आईबीबो, ओयोरूम्स, मेकमाईट्रीप सब छान लिया। इस बार मेकमाईट्रीप से होटेल मदिनी बुक किया, कारण पहली बुकिंग पर 20% छुट। 1800 रूपये मे सागर की ओर बालकनी वाला वातावनुकुलित कमरा मिल गया। रामेश्वरम मे बड़े और अच्छे होटेल कम है और जो भी है, वे पर्यटन स्थलो से दूर है। इस बार आइबीबो से 1200 रूपये मे वातावनुकुलित कमरा मीला, वही पुरानी ट्रिक, पहली बुकिंग और 600 रूपये का कुपन! सारी सर्कस मे एक बात तय हो गई कि ओयोरूम्स भले ही सस्ते कमरो की बात करता है लेकिन मिलते नही है। जो भी मिलते है वो यातो घटिया होंगे या दूरी पर!

तय हुआ था कि 16 मई गुरुवार को प्रस्थान करेंगे और 19 मई रविवार शाम घर आ जायेंगे। तैयारी कुछ खास करनी नही थी, गर्मी है तो हल्के फ़ुल्के कपड़े रखने थे। गार्गी ने अपने बैग मे बीच पर रेत से खेलने एक बाल्टी और दो तीन प्लास्टिक के फ़ावड़े, सांचे रख लिये थे। आवश्यकता नही थी, लेकिन हमने अपना टेंट रख लिया। रास्ते मे गार्गी का मुंह बंद रखने बिस्किट, चाकलेट, दही और चिप्स रख लिया। पानी की चार पांच बोतले रख ली गई। कारे मे शेल पेट्रोल से टैंक फ़ुल करा लिया। हमारा सारा सफ़र तमिळनाडु मे होना था जहाँ पर पेट्रोल कर्नाटक से दो रूपये प्रति लिटर अधिक है।

पहला दिन -16 मई- मदुरै



गुरुवार सुबह छ: बजे निकलना था लेकिन भारतीय स्टैंडर्ड समय का पालन करते हुये हम आठ बजे निकले। सेलम तक रास्ता छ: लेन है, हम बड़े आराम से 100-120 किमी/घंटा से चल रहे थे। दस बजे सेलम पहुंचे। भूख लग गई थी तो सेलम से ठीक पहले एक रोड किनारे के रेस्तरां मे रुके। नास्ता पुछा, पता चला कि केवल दोसा और पुरी उपलब्ध है, इडली नही है। तीनो के लिये दोसा आर्डर किया और भोग लगाया। जब पानी पीने की बारी आई तो देखा कि रेस्तरां मे यु वी वाला आर ओ लगा है, साफ़ सुथरा दिख रहा है। बेहिचक सादा पानी पिया और बोतलो मे भी भर लिया। मतलब कि बोतलबंद पानी नही लिया। नाश्ता कर आगे चले।

रास्ता खाली था, अधिक ट्रेफ़िक नही था। सेलम के पास से गुजरे, रास्ते मे येरकाड जाने का रास्ता दिखा। याद आया कि चेन्नई दिनो मे अपनी टीम की एक लड़की की शादी मे सेलम आये थे, तब येरकाड भी घूमे थे। पहाड़ो मे उपर एक छोटा सा कस्बा, जिसमे एक रेसीडेंशीयल इंटरनेशनल स्कूल है, एक खूबसूरत झील है।



मदुरै पहुंचते पहुंचते दो बज गये, दो घंटे देरी से निकले तब भी समय पर पहुंचे।  मदुरै मे तापमान चालीस डीग्री था बैंगलोर के 32 से आठ डीग्री अधिक। होटल पहुंचे, चेक इन किया। हाथ मुंह धोकर ताजा हुये। मीनाक्षी मंदिर इस समय बंद हो जाता है और दोबरा शाम को चार बजे खुलेगा। हमारे पास दो घंटे थे तो सोचा कि पहले खाना खा लेते है। होटल वाले ने बाजु वाली एक गली मे एक अच्छे रेस्तरां का पता बताया। खाने मे हमने दक्षिण भारतीय थालीयाँ मंगवाई। एक चपाती, सांभर, रसम, दो करी, दही, पायसम, पापड़ , अचार, तली सूखी दही वाली मिर्चे, अचार, पोड़ी घी और पेट भर भात। आत्मा तृप्त हो गई। पानी फ़िर से सादा वाला लिया, बोतलबंद पानी की आवश्यकता महसूस नही हुई।

कार होटल मे ही छोड़ी और मंदिर की ओर आटो रिक्शा से निकले। रास्ते मे एक हस्तकला प्रदर्शनी दिखी। उसमे एक चीनीमिट्टी की अचार रखने वाली बरनी दिखी। एक जमाने से खोज रहा था। किमत पता की, 580 रूपये, ठीक ठाक लगी। पैक करवाया और दूकानवाले को कहा कि लौटते समय ले जायेंगे। गार्गी ने अपने लिये एक लकड़ी की बनी सीटी ले ली।

मंदिर पहुंचे। हम अपनी हमेशा वाली ड्रेस, मतलब बरमूडा और टीशर्ट मे थे। मंदिर से पहले एक दूकानदार ने आवाज लगाई और कहा कि इस कपड़े मे मंदिर मे घुसने नही देंगे। उसी से हमने मुंडू खरीदा। खतरा लेने के मूड मे नही थे, मुंडु को उपर से लपेटा और बरमूडा मे खोंच लिया। गार्गी को यह सब पसंद नही आ रहा था, वो बोली पापा इसको उतारो! बड़ी मुश्किल से उसे मनाया।

मंदिर के बाहर मोबाईल चप्पल जुते जमा कराये और मंदिर के अंदर प्रवेश किया। मंदिर के अंदर घुटनो तक मुड़ा मुंडु/लुंगी/वेस्टी की अनुमति है लेकिन घुटनो तक के बरमूडा की नही। अब मंदिर मे दो कतारे थी, स्पेशल दर्शन और फ़ोकटीया दर्शन। हमने तो पहले से ही सोच रखा था कि एक पैसा फ़ालतु खर्च नही करना है तो फ़ोकटीया कतार मे खड़े हो गये। कतार तेजी से आगे बढ़ रही थी तो हमे अपने निर्णय पर खुशी भी थी कि पैसे बचा लिये। 30 मिनट मे हम गर्भगृह के सामने भी आ गये। इतने मे कपाट बंद हो गये, पता चला कि स्नान हो रहा है, उसके पश्चात शृंगार के बाद ही कपाट खुलेंगे। कतार मे 30 मिनट तक हम भुनभुनाते रहे , साथ मे गार्गी भी भुनभुनाते रही कि मंदिर नही जाना है, लाईन मे नही लगना है। कपाट खूले, कतार आगे बढ़ी। गर्भगृह के सामने तक पहुंचे। मूर्ती के सामने पहुंचने पर पंडे ने माथे पर तिलक किया, दक्षिणा की उम्मीद से हमे देखा, हम उसे अनदेखा कर आगे बढ़े, लेकिन पीछे से निवेदिता ने उसे पैसे थमा ही दिये!

मीनाक्षी मंदिर के बाजु मे ही शिव मंदिर है लेकिन भीड़ अपेक्षाकृत कम थी। उसकी कतार मे लगे। इस बार माथे पर भस्म पुतवाई।

मीनाक्षी मंदिर बहुत बड़ा है। पूरा मंदिर ढंग से देखने के लिये कम से कम 3-4 घंटे चाहिये। बाहर आते तक सात बज गये थे। गर्मी, पसीने और कतार मे सब थक गये थे। सोचा कि होटल पहुंच कर थोड़ा आराम कर बाजार घूमते है। 7:30 शाम को दोबारा होटल से बाहर निकले। बरनी उठाई। कुछ कपड़ो की दुकानो मे गये और सिल्क साड़ीयों की कीमत सुन कर मुंह लटकाकर वापिस आये।

वापस आते समय तक नौ बज गये थे, सोचा खाना खाकर होटल जायेंगे। दोबारा उसी होटल मे पहुंचे। खाने का मेनु पुछा, पता चला कि शाम को थाली उपलब्ध नही है, चाईनिज मेनु है, फ़्राईड चावल के कई व्यंजन उपलब्ध है। हमारे साथ समस्या यह है कि गार्गी को चावल मे केवल सफ़ेद उबले चावल चाहिये होते है, बिरयानी, पुलाव, फ़्राईड चावल नही खाती है। अब वेटर की ओर देख कर पुछा तो उसने कहा कि इडली है, घी इडली है। तब हमारी बांछे खिल गई। घी ईडली मे 24 छोटी छोटी इडली, सांभर मे डूबी रहती है, उसपर से घी की प्रचुर मात्रा होती है। इसके पहले मैने घी इडली चेन्नई मे 2006 के आसपास ही खाई थी। अपने लिये घी इडली, गार्गी के लिये सादी इडली और निवेदिता के लिये चाईनिज फ़्राईड राईस का आर्डर दिया। तीनो ने भोग लगाया।

वापिस होटल आये, सुबह पांच बजे का अलार्म लगाया और सो गये...

कन्याकुमारी और रामेश्वर आगे ....

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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