विश्व साइकिल दिवस : 3 जुन

बुधवार, जून 03, 2020

हमारी सबसे पहली साइकिल पापा की हरक्यूलिस साइकिल थी। जो पापा ने हमारे धरातल पर आने से दो साल पहले 1974 में 60 रुपये में ली थी। पापा इसी साइकल से दो किमी दूर स्कूल जाते थे।

इसी हरक्यूलिस साइकल पर हमने पहले कैंची चलाना सीखा। अगले चरण मे कैंची से डंडे पर बैठ कर साइकिल चलाई। सीट से पैडल तक पैर नही पहुंचते थे तो सीट पर से उचक उचक कर साइकिल चलाई। तब तक यह साइकल कबाड़ा हो चुकी थी।

1986-87 में पापा ने इस साइकल को बेचकर साबू साइकिल खरीदी। अंजाना सा ब्रांड था लेकिन साइकिल फ्रेम पर आठ साल की गारंटी दे रहा था। हम अपने स्कूल तब भी पैदल जाते थे। बस पापा के स्कूल जाने से पहले सुबह और शाम को उनके स्कूल से आने के बाद साइकिल हमे मिल जाती थी।

1989 में जब हम पापा के ही हाई स्कूल में पढ़ने पहुंचे तो पापा ने हीरो जेट साइकल ले ली और हमे साबू साइकल दे दी।

यह साबू साइकिल मेरे पास एक लंबे समय रही, हाई स्कूल से लेकर इंजीनियरिंग के पहले दो वर्षों तक । हाई स्कूल में रोज दो किमी दूर स्कूल जाते थे। दोपहर में घर आकर खाना भी खाते थे, जिसमे हम दो किमी की दूरी 5 मिनट से कम मे तय कर लेते थे। यह वह दौर था जब साईकिल पर काफ़ी सर्कस दिखाई। एक साईकिल पर आठ आठ लोग बैठकर गांव मे चक्कर लगाते थे। बिना हैंडल पर हाथ रखे साईकिल चलाने मे महारत हासिल की।

11 वी और 12 वी में दो वर्ष आठ किमी दूर आमगांव स्कूल में साबू का साथ बना रहा। इस दौरान कुछ लंबी साइकिल ट्रिप भी की, जिसमे 24 किमी दूर हाजरा फाल, 60 किमी दूर सिरपुर बांध की सैर भी थी।

स्कूली दिन बीते अब कालेज जाना हुआ, इंजीनियरिंग कालेज गोंदिया में था जो घर से 36 किमी दूर था। सबसे आसान और सस्ता साधन ट्रेन था। अब हम साबू से 8 किमी दूर आमगांव रेल्वे स्टेशन जाते थे। ट्रेन से गोंदिया रेलवे स्टेशन, उसके बाद 4 किमी पैदल कॉलेज। रेलवे स्टेशन से कॉलेज जाना बाद में भारी पड़ने लगा तो पापा ने नई हरक्यूलिस रॉक शॉक्स दिलवा दी। इस साईकिल के अगले पहियो के लिये  शाक अब्जार्बर था, अब मजे थे।

इंजीनियरिंग के अंतिम दो वर्षों में गांव से गोंदिया आना जाना मुश्किल हो गया था, ट्रेन के इंतजार मे घंटो बर्बाद हो जाते थे। गोंदिया में ही छोटे भाई के साथ एक कमरा किराए से लेकर रहने लगे। कमरा कालेज के पास था तो साइकिल की आवश्यकता कम होने लगी थी। रॉक शॉक्स छोटे भाई ने हथिया ली। इस समय पापा को साइकल चलाने में परेशानी होने लगी थी। अब पापा का एक छात्र साबू से पापा को स्कूल ले जाता था और शाम को घर ले आता था।

1998 में पापा के जाने के बाद साबू को उसी छात्र के पास ही रहने दी।

इंजीनियरिंग पूरी हो गई थी। हम नौकरी करने लगे थे। कुछ समय मुंबई, उसके बाद दिल्ली , चेन्नई में रहे। इन तीनों स्थानो पर साइकिल खरीदने का आईडीया नही आया। लेकिन चेन्नई में रहते हुए बसों मे धक्के खाने के बाद  अंतत: 2006 में अपनी पहली बाइक बजाज अवेंजर ले ली।

2007 में पुणे पहुंचे। अब ऑफिस घर से पाँच किमी दूर था।  तमिलनाडु रजिस्ट्रेशन वाली अवेंजर बाइक से जाने पर कभी कभार ट्रैफिक पुलिस वाले परेशान करते थे। और साथ मे वजन बढ़ रहा था। तब हीरो रेंजर ले ली। साईकिल से आफ़िस जाते थे। शुरुवात मे कंपनी मे गार्ड ने परेशान किया, प्रबंधन से शिकायत करने के बाद कंपनी कैंपस मे साईकिल रखने की अनुमति मिल गई।  पुणे में ज्यादा दिन नही रहे। शादी हुई और हम चल दिये हनीमून मनाने अमरीका। जाते समय रेंजर साइकिल वाचमैन को दे दी।

इसके बाद एक लंबे समय हम बेसाइकल रहे। सारी दुनिया देखी। 2013 में बैंगलोर भारत मे स्थाई रूप से बचने की योजना बनी। बजाज अवेंजर अब भी साथ थी। लेकिन अब साथ मे मम्मी, निवेदिता भी थे, गार्गी आने वाली थी। साइकिल या बाईक अब आवश्यकता पूरी नही कर पा रहे थे, कार की आवश्यकता महसूस होने पर पहली कार हुंडई i20 ले ली। लेकिन ऑफिस घर से डेढ़ किमी दूर था। कार या बाइक से जाने का मन नही होता था, तो फिर से साइकल लेने का मन हुआ। इसबार डेकाथलान से BTWIN साइकल लेली जिसमे एक ही गियर है।

तीन वर्ष बाद शहर के बाहर वाले घर मे आ गए। एक ऑफिस 12 किमी दूसरा 24 किमी दूर है, तो ऑफिस कार से जाना शुरू हुआ। इस दौरान कार भी बदल ली। i20 की जगह फोर्ड फिगो आटोमेटिक ले ली। बाइक अब भी वही 2006 वाली अवेंजर है। साइकिल अब सप्ताहांत को आवारागर्दी के काम आती है, 20 से 30 किमी चला लेते है। कभी कभार मूड होने पर इलेक्ट्रॉनिक सिटी ऑफिस चले जाते है। सोशल मिडीया मे कुछ साइक्लिंग ग्रुप के सदस्य है। इन ग्रुप के सदस्य होने के बाद पता चला कि हम पांच हजार वाली साइकिल मे खुश है लेकिन बहुत से लोगो के पास दो लाख तीन लाख वाली साइकिले भी है जिनके पहिये ही दस बीस हजार के आते है। अपना मन भी होता है कि एक अच्छी खासी गियर वाली साइकिल हो, लेकिन बाद मे सोचते है कि सप्ताह मे एक दिन चलाते हो, बाईक महिनो महिनो बाहर नही निकलती तो नया हाथी पालने का कोई अर्थ नही है।

लेकिन मन ने बहुत जोर मारा तो तो इस साइकिल को अपग्रेड कर फोल्डिंग साइकिल लेंगे जो कार की डिक्की में समा सके।

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इंजीनियरींग प्रवेश गाथा

सोमवार, सितंबर 30, 2019

1993-94 यह वह समय था, जब इंजीनियरींग कालेज मे पढ़ना बड़ी बात मानी जाती थी।

जब हमने 12 वी पास कर ली तो इंजीनियरींग मे प्रवेश करने की सोची, इस वर्ष महाराष्ट्र मे इंजीनियरींग कालेजो मे प्रवेश की प्रक्रिया केंद्रीकृत हो गई थी। सारे निजी और सरकारी कालेजो मे प्रवेश एक साथ एक ही जगह से दिया जाने लगा था।

निजी और सरकारी कालेजो मे भी अंतर नही था, विश्वेश्वरैया रीजनल कालेज आफ़ इंजीनियरींग (VRCE अब VNIT) से इंजीनियरींग करो या किसी निजी कालेज से, डीग्री नागपुर विश्वविद्यालय से ही मिलनी थी।

इस प्रवेश प्रक्रिया मे सरकारी कालेजो की 100% सीट्स फ़्री सीट्स थी अर्थात 4000 रूपये सालाना प्रवेश वाली। निजी कालेजो मे 50% फ़्री सीट्स, 50% पेमेंट सीट्स जिनकी फ़ीस 32,000 रूपये सालाना थी।

हमने 50 रूपये वाला प्रवेश फ़ार्म ख़रीदा और भर दिया। इस बीच कोई न्यायालय मे चला गया और प्रवेश प्रक्रिया पर न्यायालय ने रोक लगा दी। तब तक हमने बी एस सी मे प्रवेश ले लिया और पढ़ने लगे। तीन महीने बीते , अंतत: सितंबर मे प्रवेश से रोक हटी और प्रवेश प्रक्रिया आरंभ हुई। हम चल दिये काउंसलिंग और प्रवेश के लिये नागपुर।

पापा का स्वास्थ्य ठीक नही रहता था तो सब कुछ खुद ही करना था। नागपुर मेरे गांव झालिया से 200 किमी दूर था। समीप का शहर गोंदिया था। पास के रेल्वे स्टेशन आमगांव से पैसेंजर ट्रेन ली और काउंसलिंग के एक दिन पहले नागपुर पहुंच गये। पहली बार अकेले घर से निकले थे। पैसो की तंगी तो रहती ही थी। होटल मे रूकने के बारे मे ना तो पता था, ना ही पैसे थे, तो रात के नौ बजे से सुबह तक का समय रेल्वे स्टेशन पर गुजारा। सुबह रेल्वे स्टेशन पर ही नहा धो कर VRCE काउंसलिंग केंद्र पहुंचे।

चार्ट देखा, अपना क्रमांक दोपहर मे तीसरी बैच मे आना था। चाय पी और घर से लाये परांठे खाये। और एक पेड़ के नीचे जाकर बैठ गये। दोपहर मे अपना क्रमांक आने पर काउंसलिंग कराने पहुंचे।

काउंसलिंग डेस्क पर बैठे महानुभाव ने मुझे अकेले देखा, पूछा साथ मे कौन है  ? हमने कहा कि हम अकेले ही है।

अब उसने  पूछा कि कौनसा कालेज चाहिये ?

हमने पूछा कि कौनसा खाली है ?

उसने हमे घूरा! उपर से नीचे देखा और बोला तुम्हारे लिये अभी सारे नागपुर विश्वविद्यालय मे सीट्स खाली है। तुम्हे कौनसा कालेज चाहिये।

हमने सोचा कि नागपुर से आसपास के कालेज घर से दो सौ किमी दूर पड़ेंगे। जबकि गोंदिया केवल तीस किमी। पूछा गोंदिया मे दे दीजिए।

अब पूछा कौनसी ब्रांच चाहिये। अब हम सोच मे पढ़ गये। तो उन्ही महाशय ने कहा कि "कंप्यूटर साईंस एंड इंजीनियरींग" दे दुं ?

हमने सर हिला दिया। हो गया हमारा इंजीनियरींग मे प्रवेश।

20 अक्टूबर, कालेज मे पहला दिन! इंजीनियरींग पाठयक्रम मे प्रथम वर्ष सभी के लिये एक जैसा होता है तो कालेज प्रबंधन ने चार सेक्सन बना दिये  थे। साठ छात्रो वाले सेक्सन ए मे सारी लड़कीया और अल्फ़ाबेटीक आर्डर से कुल 12 लड़के थे। जिसमे से एक हम, एक अशोक था जो मेरे साथ बी एस सी मे भी साथ मे था। मेरे दूसरी ओर एक और आशीष थे, जोकि मध्यप्रदेश के बड़े ठेकेदार के बेटे थे। उसने हमसे Production की स्पेलिंग पूछी। हमने पूछा क्यों तो बताया कि उसकी ब्रांच "प्रोड्क्शन इंजीनियरींग" है। पता चला कि भाई साहब ढाई लाख डोनेशन और बत्तीस हजार फ़ीस देकर मेनेजमेंट कोटा से आये है। एक भाई साहब अनूप मिले, पता चला कि जो फ़ार्म हमने पचास रूपये मे खरीदा था, वो उन्हे सत्तर हजार मे मिला था। पड़ोस के बालाघाट से एक अभिनव थे, जो कि ऐसे ही नजराना देकर आये थे।

खैर सबसे दोस्ती हो गई। तीन चार महीने बाद अपने बालाघाटी अभिनव सर्दी खांसी से परेशान हो गये, गोंदिया का मौसम या होस्टल का खानपान रहन सहन रास नही आया और बोरिया बिस्तर लपेट कर वापस चल दिये। हम सोच रहे थे कि कम से कम दो लाख का चूना लगा होगा जोकि मेरे पापा कि पांच साल की कुल कमाई होगी।

साल भर बीता, दूसरे आशीष भाई इंजीनियरींग ड्राईंग को छोड़ हर विषय मे फ़िसड्डी। अनूप भाई साहब सुबह से लेकर देर रात तक ट्युशन अटेंड करते रहते थे। मार्च आया, परिक्षायें हुई। गर्मीयो मे सब अपने अपने घर गये।

जुलाई मे कालेज शुरु हुये, हमने द्वितिय वर्ष मे प्रवेश लिया। नतीजे नही आये थे, लेकिन क्लासे आरंभ हो गई थी। आशीष और अनूप दोनो ने प्रवेश नही लिया था, ना ही गोंदिया आये थे। अगस्त मे परिणाम आये। आशीष ड्राईंग छोड़ हर विषय मे फ़ेल थे, जबकि अनूप सारे विषयों मे।

अशोक से चर्चा की। वो बोला कि चिंता मत कर, ये सब भी इंजीनियरींग कर लेंगे, चार साल मे नही तो छह आठ बरस मे लेकिन कर लेंगे। उन्हे हमारी तुम्हारी तरह नौकरी थोड़े खोजना है। वे इंजीनियरींग की डीग्री खरीदने आये है और उन्हे मिल जायेगी।

अशोक सही था, जब हम कालेज छोड़ कर निकल रहे थे तो आशीष मिला था, प्रथम वर्ष निकाल लिया था, द्वितिय वर्ष के कुछ विषय भी। कुल मिलाकर तृतीय वर्ष मे प्रवेश की पात्रता हासिल हो गई थी। अनूप महाराज अब भी संघर्षरत थे।

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भागमभाग : छुटपुट दौड़ से अर्ध मेराथन तक

सोमवार, सितंबर 23, 2019

पिछले चार वर्ष से अर्ध मैराथन मे भाग ले रहा हुं। साल मे कम से कम दो अर्ध मैराथन हो ही जाती है। इससे अधिक कभी कोशिश नही की।

पहली बार अर्ध मैराथन मे 38 वर्ष उम्र मे भाग लिया था, उसके पहले 2015 मे एक बार दस किमी मे भाग लिया था। 2006 मे पहली बार स्पिरिट ऑफ़ विप्रो मे 5 किमी की दौड़ मे भाग लिया था। उसके बाद हर वर्ष 5 किमी वाली श्रेणी मे भाग ले ही लेता था। स्पिरिट आफ़ विप्रो  मे 5 किमी वाली श्रेणी दौड़ कम सेल्फ़ीदौड़ होती है, लोग केवल मनोरंजन और दोस्तों, परिवार के साथ टहलते, दौड़ते या चलते हुये  ही भाग लेते है।

मेरा बचपन महाराष्ट्र के विदर्भ मे एक छोटे गांव झालीया मे बीता है। खेलकुद मे ज्यादा सक्रियता नही रही थी, लेकिन जब भी मौका मिले खेल कूद लेते थे। साल मे कम से कम दो तीन बार यह होता था कि हम सुबह की दौड़ शुरु करते थे। सुबह पांच बजे उठकर सारे गांव मे शोर मचाते हुये , चौक पर जमा होते थे। उसके बाद दौड़ते हुये कावराबांध गांव की ओर दौड़ लगाते हुये जाते थे। कावराबांध गांव से पहले एक किमी का पत्थर है, सारे लोगो की हालत उस एक किमी मे पश्त हो जाती थी। वहाँ से लौट कर रास्ते मे एक नहर के पास  मे ठहरते थे। पहले किसी खेत मे निपट कर, वहीं नहर मे नहा धो कर वापस घर पहुंचते थे। कभी नहर मे कूद कर नहाते थे, कभी किसी किसान के खेत मे चल रहे पानी के पंप की तेज धार के सामने खड़े हो कर नहाते थे। ये सुबह की दौड़ कार्तिक माह के अंत तक चलती थी, उसके बाद ठंड तेज होना शुरु होती थी। धीरे धीरे शीत के कारण एक के एक बाद एक लोग गायब होते जाते और सुबह की दौड़ बंद हो जाती।

मित्र मंडली पर सुबह की दौड़ का अगला दौरा, होली के बाद स्कूल की परिक्षाओं के बाद पड़ता था, यह दौरा भी एकाध महिने चलता, जैसे ही गर्मीओं की छुट्टी चालू होती, आधी मित्र मंडली गायब हो जाती। ना, गर्मीओं की छुट्टी मे ननीहाल जाने का सुख उठाने वाले दोस्त कम थे। कुछ दोस्त अपने बूढ़े दादा दादी के साथ रहते थे, उनके मातापिता नागपुर या रायपुर मे मजदूरी या कोई काम करते थे तो वे गर्मियों मे उनके पास चले जाते थे। कुछ दोस्त छुट्टीयों मे खुद मजदूरी करने नागपुर/रायपुर चले जाते थे। बचे हम तो, तो या तो ननीहाल दुर्ग चले जाते या ताउजी के घर भोपाल!

साल मे कुल मिला कर एक दो महीने एक से दो किमी से अधिक दौड़ने की आदत नही रही। स्कूल मे खेल कूद मे हम भाग कम ही लेते थे। गांव मे कबड्डी, खोखो, वालीबाल और 1986-87 के बाद क्रिकेट खेल लेते थे। गुल्ली डंडा, कंचे, होलापाती, लुकाछिपी, नदी पहाड़ जैसे ठेठ गंवई खेल तो थे ही। बाद मे गर्मीयों की दोपहर मे कैरम, ताश का भी चस्का चढ़ा था।

स्कूल जीवन बीता, कालेज पहुंचे। अब तो खेल कूद से बहुत दूर हो गये थे। खेल मे कम से कम कभी कभार क्रिकेट खेल लेते थे, लेकिन दौड़ना एकदम से बंद हो गया था। इंजीनियरींग पूरी की, नौकरी करने लगे, खेल कूद भी छूट गया।

1998-2005 यह एक ऐसा दौर रहा, जब खेल कूद पूरी तरह से बंद हो गया, दौड़ने का तो नाम ही नही। इन्ही दिनो मे गोंदीया से मुंबई, दिल्ली होते हुये हम चेन्नई पहुंच गये थे। चेन्नई मे चावल-सांभर खा खा कर वजन बढ़ने लगा था। विक्रम की संगत मे ऑफ़िस मे जिम जाने लगे। जिम मे 20 मिनट दौड़ लेते थे। यह भी नियमित नही था, मूड हुआ तो जाओ नही हुआ तो नही।

2005 मे क्लिवलैंड के पास एक्रान मे छह महीने रहे। यहाँ पर कम से कम यह हुआ कि शाम को एक घंटा वालीबाल खेल लेते थे।

2007 मे शादी हुई, शादी के बाद हम पहुंच गये फ़िलाडेल्फ़िआ। वजन बढ़ना जारी था लेकिन इतना अधिक भी नही था। फ़िलाडेल्फ़िआ मे शाम को छ: बजे खाना खाने के बाद नौ बजे के आसपास जिम जाने लगे। कुछ देर ट्रेडमिल पर दौड़ते,  अन्य उपकरणों पर हाथ आजमाते और वापिस आ जाते।

फ़िलाडेल्फ़िआ से भारत आये, कुछ दिनो के बाद सिडनी आस्ट्रेलिया जा पहुंचे। यहाँ पर खेलकुद या अन्य शारीरीक गतिविधि के नाम पर नार्थ सिडनी से पैदल हार्बर ब्रिज  पार करते हुये मार्टिन प्लेस जाना था। सप्ताहांत को आवारागर्दी करते हुये सिडनी के आसपास के सभी बीच, जंगल, पहाड़ घूमना था। दौड़ना अब भी नही।

ऐसे मे आया 2012। जुन 2012 मे हम लोग स्नोवी माउंन्टेन घूमने गये। बर्फ़ मे स्किइंग की योजना बनी। स्की किराये पर लेने से पहले वजन किया, पता चला कि 90 किलो! अब हम चकराये, वजन कम करने के लिये योजना बनाई। सोचा कि खाने पीने मे कटौती कर वजन कम करते है। लेकिन यह योजना बैकफ़ायर कर गई। खाने पीने मे कटौती से एसीडीटी की समस्या हो गई। एसीडीटी की दवाईयाँ शुरु हुई। उन दवाईयों को बंद करने पर विथड्राल प्रभाव ने अवसाद और एन्जाईटी की ओर धकेल दिया। इस अवसाद और एन्जाईटी के दौर 15 दिनो तक सो नही पाये थे। मनोचिकित्सक से मिले, उन्होने अवसादरोधी दवायें दी और कहा कि इन समस्याओं मे दौड़ना मदद करता है। दौड़ने से जो हार्मोन निकलते है वे अवसाद दूर करते है।

अब शुरु हुआ गंभीरता से दौड़ने का दौर। दो किमी रोज से पांच छह किमी रोजाना दौड़ना आरंभ किया। 2013 मे भारत वापिस आये। चार-पांच किमी रोज दौड़ते रहे। स्पिरिट आफ़ विप्रो 2013,2014 मे पांच किमी दौड़ लगाई। रोजाना दौड़ लगाने वालो के संपर्क मे आये। 2015 मे पहली बार दस किमी की दौड़ लगाई।

2016 मे पहली अर्ध मैराथन पूरी की, उसके बाद अब तक दौड़ ही रहे है। अब हालात यह है कि यदि किसी दिन दौड़ ना लगाओ तो कुछ खोया खोया सा लगता है। दौड़ने की लत लग गई है। लेकिन शारीरिक क्षमता ऐसी है कि चार पांच किमी तो कुछ नही, दस किमी भी आराम से दौड़ जाते है।

जब अर्ध मैराथन दौड़ते है तो लक्ष्य रहता है कि बिना रूके दौड़ना है और मैराथन पूरी करना है। समय पर या स्पर्धा जितने का तो सोचते ही नही है। लेकिन यह संतोष रहता है कि अपने से आधी उम्र वालों से बेहतर समय निकाल लेता हुं!

अब अगला लक्ष्य है, एक बार पूरी मैराथन दौड़ने का .....



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रविवारीय भोजन गाथा

रविवार, जुलाई 14, 2019

2000-2002 दिल्ली युग

हम कालकाजी में अलकनंदा अपार्टमेंट्स के पास एक 1 BHK फ्लैट में छह मित्रो के साथ रहते थे। इनमें से तीन कमाने वाले तीन नौकरी की तलाश में लगे थे। रहने, खाने और बेरोजगार दोस्तो की नौकरी तलाश का खर्च कमाने वाले ही सम्हालते थे।

एक मेड रखी थी जो सुबह नाश्ता, दोपहर का खाना और शाम को रात का खाना बनाने के साथ बर्तन, और घर की सफाई कर जाती थी।

समस्या यह थी कि वह रविवार को छूट्टी लेती थी। उस अपार्टमेंट में हमारे आविर्भाव से पहले रविवार को खाना बनाना का काम अरविंद लाल के पास था, बाकी बर्तन धोने का काम करते थे।

अरविंद लाल का खाना बनाना बड़ी नफासत का काम था। पूरी फुरसत में नफासत से सब्जी काटेगा, क्या मजाल की सब्जी के दो टूकड़ो का आकार अलग हो। उसके बाद धीमी आंच में खाना पकाएगा। धीमी आंच में प्याज भूनेगा, नापकर तेल मसाले डालेगा, प्यार से चम्मच चलाएगा। छह व्यक्ति के लिए दाल, चावल, सब्जी बनाने में तीन से चार घण्टे लगते थे। ऊपर से तुर्रा यह कि उन्हें खाना बनाने में किसी का दखल बर्दाश्त नही। कहता था कि मैं दिल से खाना बनाता हूँ।

हम पहुंचे तो पहले रविवार को 12 बजे तक खाना बनने का इंतजार करना पड़ा। लाल साहब आठ बजे से किचन में घुसे हुए थे। हमे बैचेन देख राजेश ने बोला कि चिंता मत कर लाल खाना अच्छा बनाता है। खैर खाना मस्त था, लपेट कर खाया गया।

ऐसा तीन चार सप्ताह चला। उसके बाद हमारा धैर्य चूक गया। एक शनिवार की शाम हमने लाल साहब को बोला कि कल खाना हम बनाएंगे। लाल साहब का हम पर भरोसा नही था। राजेश मेरे साथ कालेज में भी पढ़ा था, कॉलेज के दिनों में उसने मेरे बनाया खाना भी खूब खाया था। उसने अब लाल को कहा कि एक बार इसके हाथ का खाना खा कर देख ले। लाल कुनमुनाते हुए माने।

दूसरे दिन हम आठ बजे उठे। नहा धोकर सब्जी लाने गए। नौ बजे वापस आये। उसके बाद मटरगस्ती के लिए निकले। लाल साहब परेशान खाना कब बनाएगा। हमने लाल को कहा टेंशन मत ले 12 बजे तक खाना बन जायेगा।

साढ़े दस बजे वापिस आये और किचन में घुसे। लाल के लिए 'नो एंट्री' का बोर्ड लगाया।

बारह बजे तक रोटी, दाल, चावल, सब्जी और सलाद तैयार था। सबको ख़ाने के लिए बुलाया। लाल साहब चौंक गए, इतनी जल्दी खाना कैसे बन गया। किचन में देखा, दाल, रोटी सलाद भी था। चावल, सब्जी की मात्रा देखी तो बोले कि सारा मोहल्ले को न्योता है क्या ?

हम और राजेश मुसकराये। खाना शुरू हुआ। आम दिनों से लगभग दुगुना खाना सफाचट हो गया था।

इसके बाद लाल साहब का नाम भी बर्तन साफ करने वालो में आ गया था।

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दख्खन की ओर : मदुरै, रामेश्वर और कन्याकुमारी यात्रा - भाग 3 रामेश्वरम

गुरुवार, मई 23, 2019

कन्याकुमारी मे सूर्यास्त के पश्चात हम रामेश्वरम की ओर रवाना हुये। दूरी 310 किमी है और गूगल महाराज ने कहा था कि पांच घंटे लगेंगे। अब तक हम गूगलदेव के समय से कम समय मे ही लक्ष्य तक पहुंच जा रहे थे। लेकिन अब रास्ते मे अंतर था। बैंगलोर-मदुरै-कन्याकुमारी का रास्ता हमने अधिकतर 4 लेन, और कुछ भागो मे 6 लेन वाले रास्ते से किया था। कन्याकुमारी से रामेश्वरम का रास्ता अच्छा है लेकिन दो लेन वाली बिना डीवाईडर की सिंगल सड़क है, गति हम होनी थी।

नाश्ता


कन्याकुमारी से ईस्ट कोस्ट रोड पर आने के बाद गति कम हो गई थी लेकिन 60-80 किमी/घंटा की गति मिल रही थी। सुबह केवल चाय पीकर निकले थे, साढ़े नौ बजे तक भूख लगने लगी थी। सड़क किनारे एक छोटे रेस्तरां मे रूके। नाश्ते के लिये पुछा, पोंगल, इडली और दोसा उपलब्ध था। हमने अपने लिये पोंगल, गार्गी और निवेदिता के लिये इडली मंगवाई। केले के पत्तो मे उन्होने पोगल और इडली परोसी, उपर से सांभर और चटनी डाल दी। कटोरी चम्मच फ़िर से नदारद। उन्होने साथ मे स्वयं ही केले के पत्तो को कचरे के डिब्बे डालने का  निर्देश दे दिया था। नाश्ता किया, सादा पानी पिया और वापस सड़क पर आ गये।

रास्ते मे


अब रास्ते मे एक अजीब नजारा दिखा। बहुत सी महिलाये तेज धूप मे चार पांच घड़ो को एक दुपहीया वाहन पर लाद कर पानी ढोते दिखी। यह नजारा पूरे पचास किलोमीटर के रास्ते मे दिखा। सड़क के किनारे तालाब, बावड़ीया और नाले दिख तो रहे थे लेकिन सूखे। रास्ते मे नमक के खेत भी दिखे। अधिक जानकारी लेने पर पता चला कि ये सारा रास्ता सड़क से अधिकतम एक से दो किमी दूर पर है। साफ़ पानी की कमी है। अधिकतर भूजल बहुत नीचे चला गया है, कुंये सूख चुके है और बोरवेलो मे 200-300 फ़ीट के बाद बमुश्किल पानी मिलता है।

लगभग 11:30 के आस पास हम रामेश्वरम द्वीप के मुहाने पर पहुंचे। जब हम पंबन पुल से गुजर रहे थे तो नीचे वाले ट्रेन ट्रेक से एक रेल भी जा रही थी। खूबसूरत नजारा था।

रास्ते मे अब्दुल कलाम मेमोरीयल दिखा, ये हाल ही मे बना मेमोरीयल है। इस मेमोरीयल को पार करने पर रामेश्वर नगर परिषद हर बाहर से आने वाले वाहनो से 30 रूपये शुल्क ले रही थी। रामेश्वरम प्लास्टीक फ़्री शहर है।

रामेश्वरम के अंदर आते ही गति कम हो गई। रास्तो पर पर्यटक वाहन , बसो की भरमार थी। हमारा होटल रामानाथस्वामी मंदिर के पास ही थी लेकिन 12 बज रहे थे। हमे पता था कि मंदिर बंद हो गया होगा और शाम को चार बजे ही खुलेगा। होटल पहुंचे, सामान रखा और हाथ मुंह धोकर तरोताजा हुये। भूख लग आई थी, बाहर ही एक उत्तर भारतीय रेस्तरां दिखा। तीनो के लिये उत्तर भारतीय थाली का आर्डर दिया। गरमागरम रोटीयों का सब्जी, दाल, कढ़ी और अचार के साथ भोग लगाया गया।

रामानाथस्वामी मंदिर चार बजे खुलने वाला था तो सोचा कि रामेश्वर के बाकी आकर्षण पहले घूम लेते है। उसके बाद रामानाथस्वामी मंदिर। समय बचा तो धनुषकोटि और उसके पश्चात अब्दुल कलाम मेमोरीयल जायेंगे। रामेश्वरम मे कार से घुमना आसान नही है इसलिये एक आटोरिक्शा कर लिया, उसने 300 रूपये मे सारे स्थान घुमा देने की कही।

गंधामाथाना पर्वत


सबसे पहले हम गंधामाथाना पर्वत पहुंचे, यह  एक छोटा सा शिखर है जो श्री रंगनाथस्‍वामी मंदिर के उत्‍तर में स्थित है। यह मंदिर पैदल दूरी पर 3 किमी. की दूरी पर स्थित है और इसे रामेश्‍वरम का सबसे ऊंचा प्‍वाइंट माना जाता है। गंधामाथाना पर्वतम के रास्‍ते पर एक हॉल है जिसमें दो मंजिले है, इस कक्ष में आप भगवान राम के पैरों की खडाऊ के चिन्‍ह् देख सकते है। इसके अलावा, इस पर्वत के रास्‍ते पर एक छोटा सा मंदिर भी स्थित है, पौराणिक कथाओं के अनुसार, यह मंदिर उसी स्‍थान पर बना है जहां रावण के हरण करने पर माता सीता ने अपना गहना गिराया था। पर्यटक इस शिखर पर जाना इसलिए भी पसंद करते है क्‍योंकि यहां से रामेश्‍वरम द्वीप का दृश्‍य बेहद शानदार नजर आता है। यहां से आप समुद्र के नीले चमकते पानी को भी देख सकते है। यह वास्‍तव में अनोखी जगह है।

साक्षी हनुमान मंदिर

अगला पड़ाव साक्षी हनुमान मंदिर था, श्री रामनाथेश्‍वर मंदिर से 3 किमी. की दूरी पर स्थित है जो गंधामथाना पर्वथम के रास्‍ते पर पड़ता है। किंवदंतियों के अनुसार, हनुमान जी ने भगवान राम को सूचना दी थी कि माता सीता, रावण के कब्‍जे में है। उन्‍होने इस सूचना को साक्ष्‍य के साथ प्रस्‍तुत किया था, साक्ष्‍य के रूप में उन्‍होने माता सीता की अंगूठी दिखाई थी। ऐसा भी माना जाता है कि इसी स्‍थान पर भगवान राम अपनी पत्‍नी को याद करके रोए थे। हनुमान जी को भगवान राम का भक्‍त माना जाता है। भगवान राम और हनुमान के भक्‍त, इस मंदिर में हर साल दर्शन करने आते है। कई तीर्थयात्री, गांधामथान पर्वतम जाने के रास्‍ते में यहां दर्शन आते है।

विलुंदी तीर्थम 


इसके बाद हम  विलुंदी तीर्थम पहुंचे, 24 मुख्‍य तीर्थमों में से एक है जो हिंदू धर्म में प्रमुख माने जाते है। यह तीर्थम उस दौरान बना था, जब भगवान राम ने अपनी पत्‍नी सीता की प्‍यास बुझाने के लिए समुद्र में तीर मारा था। तीर चलाने के फलस्‍वरूप, समुद्र से पीने योग्‍य पानी की एक धारा निकली थी। हर वर्ष, इस तीर्थम की यात्रा करने सैकड़ों भक्‍त आते है और इसमें स्‍नान करके अपने पाप धुलने की कोशिश करते है। यह तीर्थम, पंबन के नजदीक एक गांव थागाचिमदम में स्थित है। धार्मिक महत्‍व के अलावा, यह जल स्‍त्रोत, स्‍थानीय लोगों के लिए पीने योग्‍य पानी भी प्रदान करता है। स्‍थानीय लोगों के लिए पीने के पानी का प्रबंन करने की दृष्टि से 1979 में यहां एक निर्माण भी करवाया गया था। हालांकि, वर्तमान में यह संरचना टूट चुकी है क्‍योंकि यहां ही हवा में भी नमक की मात्रा बहुत ज्‍यादा है। सरकार ने कई और संरचनाओं को बनाने का प्रयास भी किया है।

पंच - मुखी हनुमान


इसके पश्चात हम पंच - मुखी हनुमान मंदिर पहुंचे। यह श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के बाद दूसरा सबसे प्रसिद्ध मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम, माता सीता और भक्‍त हनुमान की मूर्ति स्थित है। इस सभी मूर्तियों को धनुषकोडी से लाया गया था, 1964 के दौरान ये सभी मूर्तियां धनुषकोडी गांव में आएं साइक्‍लोन में नष्‍ट हो गई थी।  यही कारण है कि पूरे देश से भक्‍त यहां दर्शन करने आते है। इस मंदिर की अन्‍य विशेषता यह है कि इस मंदिर के बाहर बहुत से तैरता हुआ पत्‍थर भी रखे  है। यह पत्‍थर रामसेतू पुल का हिस्‍सा माना जाता है जिसे हनुमान जी और उनकी वानर सेना के द्वारा बनाया गया था। इस पुल की सहायता से ही भगवान राम लंका तक पहुंचे थे और माता सीता को रावण की कैद से छुड़ा पाएं थे। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस मंदिर में हनुमान जी ने अपने पंच मुख के दर्शन करवाएं थे। हनुमान जी को इस मंदिर में भगवान राम के द्वारा सिंदुर से लेप भी लगाया गया था।

इसी मंदिर परिसर मे हमने रामसेतु का एक पत्थर भी खरीदा।

रामानाथस्वामी मंदिर 

इन सारी जगहो के घुमने तक चार बज गये थे तो हम मुख्य मंदिर रामानाथस्वामी मंदिर पहुंचे। मंदिर मे अधिक भीड़ नही थी। हम लोगो का इस मंदिर मे कुंडो मे स्नान का भी इरादा नही था। मंदिर मे मूर्ती के दर्शन किये। यह मंदिर, भगवान शिव के 12 ज्‍योर्तिलिंगों में से एक है। इसे सभी मंदिरों में भगवान शिव की आराधना की जाती है। इस मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति पूजा नहीं होती है। इस मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है, माना जाता है कि इस मंदिर की स्‍थापना पांडवों ने की थी, लेकिन वर्तमान मंदिर लगभग 12 वीं सदी में स्‍थापित किया गया था। इस मंदिर की स्‍थापत्‍य कला काफी प्राचीन है जो इसे संगमरमर से बनाया गया है। हर साल लाखों की संख्‍या में भक्‍त इस मंदिर में दर्शन करने आते है।

मंदिर से बाहर आते आते पांच बज गये थे। गर्मीयों के दिन है, सूर्यास्त देर से होता है, तो सोचा कि दो घंटे मे धनुषकोटि से आ जायेंगे। होटल से कार उठाई और धनुषकोटि की ओर चल दिये। लेकिन रामेश्वरम से बाहर निकलते ही पुलिस वालो ने रोका और कहा कि पांच बजे के पश्चात धनुषकोटि मे पर्यटक नही जा सकते है। उन्होने दूसरे दिन सुबह छ: बजे आने कहा।

अब्दुल कलाम मेमोरीयल 


हमने सोचा कि अब्दुल कलाम मेमोरीयल चलते है जोकि छ: बजे तक खुला रहता है। इस स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की समाधि है। मेमोरियल अच्छा बनाया गया है। अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी चीजों और राकेटो, मिसाइलो के माडल रखे हुये है। प्रवेश निशुल्क है। हम छ: बजे तक मेमोरीयल मे घुमते रहे है गार्गी को राकेट, मिसाईल की जानकारी देते रहे।

हम सब पूरे दिन की आवारागर्दी से थक गये थे। वापस होटल पहुंचे। सारे दिन मंदिर देखते देखते हालत यह हो गई थी कि मैने होटल के सामने भी चप्पल उतार दी थी। गार्गी ने चप्पल के लिये याद दिलाया कि पापा ये मंदिर नही है। दोबारा स्नान किया और बाहर खाना खाने निकले। खाना खाकर सो गये।

सुबह छ: बजे उठे। होटल से चेक आउट किया। और धनुषकोटि की ओर चल दिये।

कोथानदारामार मंदिर 

रास्ते मे कोथानदारामार मंदिर है। सबसे पहले वहीं पर रूके। यह मंदिर उस स्‍थान पर बना है जहां भगवान राम ने रावण के वध के बाद विभीषण को लंका का राजा बना दिया था। इस मंदिर को सेतुसमुद्रम शिप कैनाल परियोजना के बाहर रखा गया, ताकि इसका अस्तित्‍व खतरे में न आएं। यह मंदिर यहां आने वाले पर्यटकों से हमेशा भरा रहता है जिसके कारण स्‍थानीय मछुआरों को काफी लाभ मिलता है और वह अपनी मछलियां बेच पाते है।  वर्तमान में, इस मंदिर की देखभाल श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के प्रशासन के द्वारा किया जाता है क्‍योंकि यह मंदिर श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर के 31 उप - मंदिरों में से एक है।

धनुषकोडी 



इसके बाद हम धनुषकोडी पहुंचे। धनुषकोडी एक गांव है ( वर्तमान में यह एक महत्‍वपूर्ण गांव है ) जो रामेश्‍वरम द्वीप पर स्थित है। यह गांव, द्वीप के दक्षिणोत्‍तर हिस्‍से के पूर्वी भाग में स्थित है। यह गांव, श्रीलंका में स्थित तलाईमन्‍नार से 31 किमी. की दूरी पर स्थित है। किवंदंतियों के अनुसार, विभीषण, रावण के भाई ने इसी स्‍थान पर भगवान राम से सेतू तोड़ने के लिए कहा था और भगवान राम ने एक ही बाण से सेतू को तोड़ दिया था। इसीकारण, इस स्‍थान का नाम धनुषकोड़ी रखा गया। वास्‍तव में, आज भी यहां पुल की एक रेखा देखी जा सकती है जिसके बारे में मानना है कि इसे भगवान राम ने वानर सेना के साथ मिलकर बनाया था।  इस स्थान पर सागर एक दम साफ़ है, बीच का पानी और रेत इतनी साफ़ है कि आस्ट्रेलिया, न्युजीलैंड के बीच याद आ जाते है।

गार्गी के साथ बीच पर रेत पर हम काफ़ी देर तक खेलते रहे। गार्गी ने अपना एक हिप्पोपोटामस रेत मे दफ़ना दिया और बाद मे असली जगह भूल गई। बहुत देर तक हम उसे रेत मे खोद खोद कर खोजते रहे। अंत मे थक कर उसे वहीं छॊड़ दिया और वापसी की तैयारी की।

नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर


रास्ते मे नाम्‍बू नायागी अम्‍मान मंदिर पड़ा। यह मंदिर, रामेश्‍वरम के मुख्‍य मंदिर से 8 किमी. की दूरी पर स्थित है। धनुषकोडी से श्री रामनाथस्‍वामी मंदिर की ओर जाने पर इस मंदिर में दर्शन किए जा सकते है। यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है और हर साल दशहरे के दिन यहां भारी संख्‍या में दर्शनार्थी दर्शन करने आते है। ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण लगभग 14 वीं शताब्‍दी में हुआ था और इसे स्‍थानीय स्‍तर के रामांद ने स्‍वंय बनाया था। यही कारण है कि यह मंदिर, रामेश्‍वरम से काफी दूर स्थित है। मंदिर के आसपास का क्षेत्र वास्‍तव में बेहद सुंदर है। थके - हारे पर्यटक यहां के घने वृक्षों के नीचे आराम कर सकते है। मंदिर के आसपास स्थित सुंदर गार्डन, वंसत के मौसम में बेहद खूबसूरत लगते है।

पंबन पुल


वापसी मे हम पंबन पुल पर रूके। इस पुल की खासियत यह है कि इसे पाल्‍क स्‍ट्रेट पर एक कैंटीलिवर ब्रिज के रूप में मनाया गया है। यह पुल , रामेश्‍वरम को देश के अन्‍य हिस्‍सों से जोड़ता है। यह पुल , समुद्र पर बना अपनी तरह का अनोखा पुल है। यह देश का दूसरा सबसे बड़ा समुद्री पुल है जिसकी लम्‍बाई 2.3 किमी. है। इसके बाजु मे एक रेल्वे पुल  है जिसे पुल को दक्षिण भारतीय रेलवे परियोजना के हिस्‍से के रूप में बनाया गया था।



लौट के बुद्धु घर को आये


सुबह के आठ बज गये थे, हम रामेश्वर द्वीप से बाहर आ गये थे और बैंगलोर का रास्ता ले लिया था। रास्ता 560 किमी था लेकिन अच्छा रास्ता होने से खाने और नाश्ते के 1 घंटा को जोड़ते हुये भी हम शाम के सात बजे घर पहुंच गये।

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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