दीवाली : साफ सफाई और रंगाई पुताई

गुरुवार, नवंबर 05, 2020

 

दीपावली आ रही है। हम घर पेंट करने में जुटे हुए है। इसके पहले चरण में हमने छत पर डैम्प प्रूफ पेंट किया था।


दूसरे चरण में दीवारों पर से कुछ जगह जहाँ दरारें आई थी, पेंट की पपड़ी बन गई थी, उन जगहों को खरोंच कर साफ किया। पुट्टी लगाई और समतल करने घिसाई की।


तीसरे चरण में सारी छतों पर सफेद पेंट किया। एक पाईप में रोलर बांधा और पेंट बाल्टी में डूबा कर छत पर रोल कर दिया। तीन बेड रूम, तीन बाथ रूम, किचन, डायनिंग हाल, बॉलकनी और मेन हॉल की छत पेंट करने में दो दिन लग गए। पूरा दिन पेंट नही करते थे, सुबह के दो घण्टे और रात में दो तीन घण्टे मात्र।


चौथा चरण है दीवारों को पेंट करने का जो अपेक्षाकृत रूप से आसान हैं, दो तीन दिन में निपटा देंगे।


वर्तमान में पेंट करना बहुत आसान काम है, पेंट का डिब्बा खोलो, रोलर डुबाओ और घुमा दो, हो गया पेंट। एक समय था कि हमारे बचपन के छोटे से घर कि पुताई में पूरे 10 दिन लग जाते थे। पुताई होती थी चूने और पेड़ की जड़ से बनी कूची से।


1983-84 में पापा ने झालिया ग्राम में मकान खरीद लिया था, मिट्टी की दीवारों वाला, मिट्टी की खपरैल और बांस से बनी छत वाला मकान। दीवारों की पुताई छुई से हुई थी। छुई चूने के परिवार का सदस्य है, बस रंग पीलापन लिए होता है। पापा ने उसे अब चूने से पुतवाया, चुने में नीला रंग मिलाकर घर पोता गया। यह पुताई पड़ोस जे ही जयलाल नागपुरे ने की थी। अगले चार पांच बरस वही पुताई करते रहे। लेकिन जयलाल साहब थोड़े आलसी, मनमौजी किस्म के इंसान थे। पुताई का काम कभी भी शुरू करे समाप्त दीवाली के दिन ही करते थे। जिससे हम लोग थोड़े चिढ़ जाते थे, दीवाली के दिन घर जमाने का का काम जो करना होता था। 



1990 के आसपास हमने सोचा कि बहुत हो गया, अब पुताई खुद करेंगे और दीपावली से एक सप्ताह पहले समाप्त कर देंगे। बस क्या था, तैयारी शुरू की गई। चूने की बोरी , नीला रंग खरीद कर लाया गया। समस्या थी पुताई की कूची की। एक पलाश के पेड़ की जड़ खोद कर काटी गई। उसके एक सिरे को पत्थर से कुचल कर कूची का रूप दिया।


अब बारी थी चूने को तैयार करने की। चूने को पानी में मिलाने पर ऊष्मा निकलती है, इतनी कि पानी उबलने के तापमान तक पहुंच जाता है। और उस चूने से सीधे पुताई नही कर सकते, हाथ की चमड़ी जल जाती है। तो चूने को एक मटके में डाला गया, उसमें पानी डालकर दो दिनों के लिए छोड़ दिया गया। तीसरे दिन उसमें रंग घोला गया।


और हमने पुताई शुरू की। बांस की सीढी पर चढ़ कर बाल्टी में चूने के घोल में कूची डुबाकर सीधे सीधे ऊपर नीचे वाले स्ट्रोक लगाए गए। जोश जोश में एक दिन में सारी बाहरी दीवार पोत दी।


अब रात में सारी बांहे दुख रही थी, इतनी अधिक कि सो नही पाए। दूसरे दिन पस्त थे। सोचा कि आज ब्रेक ले लेते है। तीसरे दिन फिर जुटे, बाहरी दीवार पोतना आसान था, कमरे मुश्किल। सामान या तो बाहर करो या ढंको, उसके बाद पोतों। दूसरा ढेर सारे व्याधान, कभी मम्मी को कोई चीज चाहिए, कभी पापा को कुछ चाहिए। पूरे दिन में एक कमरा ही हुआ। अगले दिन फिर से पस्त। एक दिन पुताई एक दिन छुट्टी मार कर पूरा घर आखिर कार पोत ही लिया। 


अंतिम दिन जब पूजा का कमरा पोत रहे थे वह दिन दीपावली का ही था।


चित्रों में पेड़ के जड़ से बनी कूची और मेरा घर

आगे पढे़....

कजलियां (भोजली)

सोमवार, अगस्त 03, 2020


गांव मे बरसात का मौसम कृषिकार्य से जुड़ा होता है। इसी मौसम मे आते है ढेर सारे त्योहार। हरियाली तीज, नागपंचमी, कजलीया(भोजली), पोला, जन्माष्टमी और गणेशोत्शव।  गांवो मे ये त्योहार इस तरह से रचे बसे है कि यदि गांव के किसी किसान से पुछो कि परहा(धान के रोपे लगाना)  हो गया तो उत्तर आयेगा कि भोजली तक या पोला तक समाप्त होगा।

गांव मे बरसात के मौसम मे कृषि कार्य के मध्य मे आने वाले त्योहारों मे से एक मुख्य त्योहार था कजलीया/भोजली। यह त्योहार राखी के दूसरे दिन मनाया जाता है। गांव मे राखी त्योहार केवल बच्चो और पुरोहितों के लिये था। आम लोगो का त्योहार तो कजलीया/भोजली ही था। इस त्योहार मे गेहुं को छोटी टोकरीयों मे बोया जाता है। अंधेरे मे गेंहुं के पौधे सूर्यप्रकाश की कमी से पीलापन लिये उगते है, इन्ही पौधो को कजलीयाँ कहा जाता है।

राखी के दूसरे दिन शाम को इन कजलीयों की टोकरी को हर घर के आंगन मे रखा जाता है। उनकी पूजा होती है। उसके पश्चात गांव के किसी एक छोर से गांव की भजनमंडली शोभायात्रा शुरु करती। भजनमंडली हर घर के सामने खड़ी होती, उस घर की महिलायें अपने सर पर कजलीयाँ रखे जुलुस मे शामिल होते जाती। सारे गांव से कजलीयों को जमा करने के बाद यह यात्रा गांव के छोर पर तालाब के पास रुकती। 

इस जुलुस मे सारे गांव वाले अच्छे कपड़े पहन कर होते थे। बच्चे रंग बिरंगी राखी बांधे हुये मिलते थे। कुछ बच्चे और युवा उंची उंची गेड़ी(पावड़ी) पर सवार होकर साथ रहते थे।

गांव के छोर पर तालाब था, पूजा के बाद महिलाये टोकरी धोकर उससे कजलीयों को निकाल कर ले आती थी। अब इन कजलीयों को एक दूसरे को बांटा जाता था। हम उम्र एक दूसरे को कजलीयों को देकर गले मिलते है, बड़ो के चरणस्पर्श करते है। 


यह त्योहार यहीं पर समाप्त नही होता था, इसके बाद सब का एक दूसरे के घर जाना शुरु होता था। एक दूसरे के घर जाकर कजलीयों का आदानप्रदान, गले मिलना, चरणस्पर्श जारी रहता था।


बाद मे देखा कि शहरी जीवन मे राखी का त्योहार प्रमुख होता है लेकिन ग्रामीण जीवन के परिप्रेक्ष्य मे कजलीया ही प्रमुख था।

आगे पढे़....

सर्वप्रथम कम्यूटर दर्शन

मंगलवार, जुलाई 14, 2020

गार्गी इस वर्ष दूसरी कक्षा मे है, कल उसकी कंप्यूटर विषय की पुस्तक देखी, उसके पाठ्यक्रम मे माइक्रोसाफ़्ट वर्ड और एक्सेल भी है। हम थोड़े चकराये कि ये विषय इतनी जल्दी कैसे?  लेकिन जब गार्गी को आसानी से वर्ड मे टाईप कर सलीके से फ़ॉर्मेट करते देखा तो लगा कि नई पीढ़ी तकनीक जल्दी और आसानी से सीख लेती है।

मै स्वयं कंप्यूटर इंजीनियर हुं। कंप्यूटर का प्रयोग करते हुये लगभग एक चौथाई सदी बीत गई है, लेकिन मैने पहली बार कंप्यूटर के दर्शन नौवीं कक्षा मे किये थे। दूसरा दर्शन इंजीनियरींग मे प्रवेश के समय हुआ था। कंप्यूटर पर सबसे पहला ढंग से कार्य इंजीनियरींग के दूसरे वर्ष से शुरु हुआ था। अर्थात शिक्षा के चौदहवें वर्ष मे जबकि अगली पीढ़ी उसे दूसरे बरस से ही सीख रही है।

स्थान : जिला परिषद हाई स्कूल कावराबांध/ देवरी
वर्ष : 1989/90

यह वह समय था जब सरकारी स्कूलों मे भी कंप्यूटर आना शुरु हो गये थे। मै जिला परिषद हाई स्कूल कावराबांध मे कक्षा नवमी मे पढ़ता था। उसी समय पास के एक अन्य सरकारी स्कूल जिला परिषद हाई स्कूल देवरी मे दो कंप्यूटर दिये गये थे। यह स्कूल मेरे स्कूल से 45 किमी दूरी पर था। मेरे स्कूल के विज्ञान शिक्षकों मे योजना बनाई की कुछ छात्रों को देवरी स्कूल ले जाकर कंप्यूटर दर्शन करायें जाये। इन शिक्षको मे एक मेरे पापा ही थे जो हमे गणित और भौतिकी पढ़ाते थे। छात्रों का चयन हुआ, कक्षा आठ, नौ और दस से कुल तीस छात्र चुने गये।

योजना बनी कि अगले सप्ताह सुबह छः बजे बस से छात्रों के साथ तीन शिक्षक देवरी जायेंगे। सभी को कंप्यूटरो के दर्शन करा कर दोपहर तक लौट आयेंगे। सरकारी स्कूल था, अधिक बजट नही था तो छात्रो से कहा गया कि अपना नाश्ता और खाना स्वयं लेकर आये, स्कूल केवल आने जाने का किराया देगा।

सोमवार की सुबह साढ़े पांच बजे सारे छात्र कावराबांध बस स्टाप पर जमा हुये और छः बजे की महाराष्ट्र राज्य परिवहन की बस से देवरी की ओर चल दिये। स्कूल से दिये गये कुछ दस्तावेजो  की सहायता से छात्रों का टिकट एक चौथाई हो गया था। इतनी सुबह बस सामान्यत: खाली रहती थी, अब वह हम छात्रों से खचाखच भरी हुई थी। देवरी कुल 45 किमी दूर था, लेकिन बस आमगांव होते हुये रास्ते के हर गांव मे रूकते जाने वाली थी, इस दूरी को तय करने मे दो घंटे लग गये। सुबह आठ बजे देवरी पहुंचे, बस ने हमे देवरी स्कूल के सामने ही उतार दिया था।

सब देवरी स्कूल पहुंचे। हमारे शिक्षक देवरी स्कूल के शिक्षको से इस तरह मिले कि पुराने बिछड़े हुये मित्र मिल रहे है। शिक्षको मे चर्चा हुई, पता चला कि कंप्यूटर रूम मे इतनी जगह नही है कि तीस छात्रों को एक साथ कंप्यूटर दर्शन कराया जा सके। तय हुआ कि दस दस छात्रों के तीन समूह बनायेंगे और एक के बाद एक समूह को दर्शन कराया जायेगा। हमारा नाम तीसरे समूह मे आया।

उन दिनो मे कंप्यूटर नाजूक हुआ करते थे, उन्हे वातावनाकुलित कमरो मे रखा जाता था, धुल से बचाया जाता था। इसलिये कंप्यूटर दर्शन से पहले मंदिर के जैसे ही चप्पल जूते बाहर उतारे जाते थे।

पहला समूह चप्पल जूते उतार कर अंदर गया, देड़  घंटे बाद लगभग साढ़े दस बजे वह बाहर आया तो उनके चेहरे पर लगभग वही भाव थे जो यशोदामाता के चेहरे कृष्ण मे मुख मे ब्रह्मांड के दर्शन करने पर आये थे। इसके बाद दूसरा समूह अंदर गया, हम बचे छात्र स्कूल के बाहर मैदान पर बैठकर अपने शिक्षको के साथ घर से लाया नाश्ता करने लगे। बारह बजे के बाद दूसरा समूह बाहर आया। जब हमारी बारी आयी तो पता चला कि बारह से तीन बिजली गुल रहेगी, स्कूल मे UPS नही है, तो कंप्यूटर दर्शन तीन बजे के बाद ही होंगे।

हमारे शिक्षको मे आपातकालीन चर्चा हुई कि अब क्या किया जाये ?  तय हुआ कि बारह किमी दूर पर बाघ नदी पर सिरपुर बांध है। तीन घंटो मे सिरपुर बांध जाकर वापस आया जा सकता है। 

स्कूल के बाहर बस स्थानक था। सारे छात्र और शिक्षक लगी बस पर सवार हुये और 30 मिनट मे सिरपुर बांध पहुंच गये। यह बांध अधिक बड़ा नही है लेकिन इसका जल भराव क्षेत्र इतना अधिक है कि दूर दूर तक पानी ही नजर आ रहा था। बांध के उपर शिक्षको ने बांध के पानी को नदी मे छोड़ने के लिये बने विशाल गेट दिखाये। कृषि सिंचाई के लिये पानी की नहरे दिखाई। उसके बाद पास के एक पार्क मे जाकर सब लोगो ने घर से लाया खाना खाया। इस सब मे दो बज गये थे। हम वापस देवरी के लिये बस पकड़ने के लिये खड़े हो गये। कुछ देर मे बस आई और हम देवरी स्कूल पहुंचे।

अब बारी हमारी थी। चप्पल उतार कर कंप्यूटर रूम मे पहुंचे। कंप्युटर रूम मे दो रंगीन मानीटर वाले कंप्यूटर रखे थे। ये साढ़े पांच इंच वाली फ़्लापी से बूट होने वाले DOS ऑपरेटिंग सीस्टम पर काम करने वाले कंप्यूटर थे, शायद PC AT या PC XT थे। उस समय इनमे हार्ड डिस्क नही थी। एक फ़्लापी डाल कर कंप्यूटर बूट किया गया। उसके बाद कंप्यूटर शिक्षक ने हमे कार्यप्रणाली समझाना आरंभ किया। सबसे पहले उन्होने एक वर्ड प्रोसेसर पर टाईप करना दिखाया, अब अच्छे से याद नही लेकिन शायद वर्ड स्टार था। उसके बाद किसी कैल्कुलेटर प्रोग्राम से आसान गणनाये दिखाई। हर प्रोग्राम को दिखाने के लिये वे एक फ्लापी निकालते थे और नये प्रोग्राम की फ़्लापी डालते थे। उन्होने एक पेंटींग वाला प्रोग्राम चलाया और कुछ चित्रकारी कर के दिखाई। उस कंप्यूटर मे माउस नही था, तो सारी चित्रकारी एरो कुंजी, एंटर और स्पेस बार कुंजीयों से कर रहे थे। एक फ़ूल बनाने के लिये उन्हे दस मिनट लग गये। एक पिआनो वाले प्रोग्राम से उन्होने सारेगामा बजा कर सुनाया। आखिरी बारी आई कंप्यूटर गेम की, इस गेम मे एक गेंद को उछालते रहना था, उछालने वाला ब्लाक एरो कुजींयो से नियंत्रित होता था, उसे गिरती गेंद के नीचे लाना होता था, गेंद ब्लाक से टकराकर उपर जाती और वापस नीचे गिरती थी। हमे इस आखिरी भाग मे सबसे अधिक मजा आया।

कंप्यूटर दर्शन हो गये और हम प्रफ़ुल्लित हो गये थे। बाहर आये। देवरी स्कूल ने हमारे लिये नाश्ते का इंतजाम कर रखा था। हम लोगो ने नाश्ते मे समोसो का भोग लगाया, चाय का इंतजाम केवल शिक्षकों के लिये था, छात्रो को पानी से ही संतोष करना पड़ा। इस सब मे छह बज गये थे।

स्कूल से बस स्थानक पहुंचे। बस पर सवार हुये। सारे छात्र उत्साहीत लेकिन थके हुये थे। कावराबांध तक पहुंचने मे साढ़े सात बज गये। अंधेरा हो गया था। शिक्षको ने छात्रो को सावधानी से अपने अपने गांव जाने के लिये निर्देश दिये, समूह मे आयु मे बड़े छात्रो को बाकी छात्रो की जिम्मेदारी दी।

हम झालिया गांव वाले छात्रो के साथ वापस घर आये, साथ मे पापा तो थे ही।

आगे पढे़....

मेरे प्रायमरी के शिक्षक :जांभुळकर गुरुजी

सोमवार, जुलाई 06, 2020

समय : 1980-1983
स्थान : झालीया (गोंदिया जिला, महाराष्ट्र का एक गांव)

इस गांव का स्कूल हिंदी पूर्व माध्यमिक शाला झालीया जहाँ कक्षा 1 से 7 वी तक पढ़ाई होती थी। आस पास के चार पांच गांव और टोलो के लिये एक मात्र स्कूल।

स्कूल  मे हर कक्षा मे यही कोई पचास साठ छात्र, कहने को तो एक से अधिक सेक्सन होते थे, लेकिन सारे बच्चे एक की कमरे मे बैठते थे। एक ही शिक्षक सारे बच्चो को सारे विषय पढ़ाते थे।

कक्षा एक से तीसरी तक हमे जांभुळकर गुरुजी ने पढ़ाया। एक दम श्याम वर्ण के घुंघराले बालो वाले जांभुळकर गुरुजी जो पास से एक टोले साखरीटोला से आते थे। अक्सर साईकिल से आते थे, कभी कभार पैदल भी आते थे।

शिक्षक अच्छे थे, लेकिन थोड़े कड़क मिजाज। उनके मिजाज को समझना मुश्किल होता था, बच्चो के साथ मुस्कराते नही देखा था। गलती होने पर विद्यादायनी से सजा दिया करते थे। गलती पढ़ाई लिखाई से संबधित हो आवश्यक नही, सजा देने के लिये बढे हुये बाल, नाखून, मैले हाथ पैर, मैले कपड़े पर भी धुनाई कर देते थे। कपड़े पुराने, फ़टे चलेंगे लेकिन मैले नही चाहीये। स्कूल मे युनिफ़ार्म थी, सफ़ेद शर्ट, नीला पैट/स्कर्ट, स्कूल मे युनिफ़ार्म ना पहनने पर सजा शायद ही कभी मिली हो।

मुझे उनसे बहुत डर लगता था, कभी भी किसी भी कारण से धुनाई कर देते थे। कारण बहुत अजीब देते थे कि तु मास्टर का लड़का है, तेरी धुनाई होगी तो बाकी  सब सीधे रहेंगे।

मेरे पापा बाजू के एक दूसरे गांव के हाई स्कूल मे गणित और विज्ञान के शिक्षक थे। पापा और जांभुळकर  गुरुजी मे एक आदत समान थी, पढ़ने की। दोनो मे पुस्तको का आदान प्रदान मेरे माध्यम से होते रहता था। हर सप्ताह जांभुळकर गुरुजी आदेश देते थे, कि अपने पापासे किताब मांगकर ले आना। अब पापा के पास नई किताब ना हो और उन्होने ना दी तो आज्ञा के पालन ना करने मेरे कान उमेठे जाते। और किताब दे देते तो शाबाश कहते हुये जोरो से पीठ ठोंकी जाती।

झालिया और उसके आसपास के गांवो के अधिकतर लोग कृषक थे। गिने चुने ब्राह्मण परिवार थे, 80% कृषक और शेष दलित जातियों से  जुडे़ परिवार। यह अनुपात शिक्षको मे भी था। गांव अपने टोलो सहित पिछड़ा था, शिक्षित लोग बहुत कम थे, सारे गांव मे मुश्किल से चार या पांच ग्रेड्युट रहे होंगे। मेरे स्कूल के अधिकतर शिक्षक भी दसंवी/बारहंवी के बाद शिक्षक हो गये थे, बाद मे उनमे से कुछ ने धीरे धीरे गेड्युएशन कर लिया था। अधिकतर शिक्षको का छात्रो से व्यवहार उनकी पृष्ठभूमी पर निर्भर करता था। वे संपन्न परिवार, उंची जाति वाले परिवार से आनेवाले छात्रो और होनहार छात्रो से अच्छा व्यवहार करते थे। जबकि अन्य से उनका व्यवहार तिरस्कार करने वाला ही होता था। 

जांभुळकर गुरुजी  छात्रो से व्यवहार मे अन्य शिक्षको से भिन्न थे। वे होनहार छात्रो या संपन्न परिवार, उंची जाति वाले परिवार से आनेवाले छात्रो पर ध्यान कम देते थे। शायद वो मानते थे कि ये लोग तो पढ़ लिख जायेंगे ही। लेकिन कमजोर और दलित परिवारों से आने वाले छात्रों के साथ कड़ाई से पेश आते थे। उन्हे अधिक और कठिन सजा देते थे।

मेरी कक्षा मे एक उद्दंड छात्र था, नाम था राजेंद्र। उसके परिवार का पेशा मृत पशुओं से खाल उतारना, खाल पकाना और उससे जुते चप्पल और कृषि कार्य मे प्रयुक्त होने वाली चमड़े की वस्तुयें बनाना था। राजेंद्र के शरीर से एक अजीब सी गंध आती थी, कपड़े और हाथ पैर मैले रहेते  थे। राजेंद्र  पढ़ने लिखने मे तो कमजोर था ही, साथ ही हर ओर से मिलने वाले तिरस्कार से वह उधमी, उद्दंड भी हो गया था। जांभुळकर गुरुजी उसे सुधारने मे लगे रहते थे। अन्य लोगो से दुगनी सजा देते थे। बाकि छात्रो से अधिक ध्यान राजेंद्र पर रहता था।

जांभुळकर गुरुजी का यह व्यवहार अन्य दलित छात्रो के साथ भी रहता था, वे राजेंद्र को तो नही सुधार पाये लेकिन इन दलित छात्रो मे से कुछ अच्छी तरह से पढ़ पाये और आगे भी बढ़े।

स्कूल के उन दिनो मे मुझे लगता था कि जांभुळकर गुरुजी ऐसा पक्षपात क्यों करते है। इन नाकारा छात्रो पर अधिक ध्यान क्यों देते है?  बाद मे बड़े होने पर और समझ विकसित होने पर पता चला कि पक्षपात जांभुळकर गुरुजी नहीं अन्य शिक्षक करते थे। जांभुळकर गुरुजी तो उनकी सहायता मे लगे रहते थे जिन्हे उसकी आवश्यकता अधिक है।

हम स्कूल से निकले, गांव छूटा, जड़े छूटी। झालिया स्कूल तो 1987 मे छूट गया था। गांव 1998 मे, फ़िर भी साल मे एक दो बार स्कूल चला जाता था। 1998 के बाद वह भी छूट गया। एक लंबे अरसे के बाद जब 2004 मे गांव गया था तो स्कूल भी गया। पता चला कि जांभुळकर गुरुजी रिटायर हो गये थे और उसके कुछ दिनो बाद जीवन से भी।

कक्षा 1 से 3, वर्णमाला से लेकर बारहखड़ी, शुरुवाती अंकगणित से नींव बनाने वाले जांभुळकर गुरुजी  चले गये थे।

#गुरु_पुर्णीमासमय : 1980-1983
स्थान : झालीया (गोंदिया जिला, महाराष्ट्र का एक गांव)

इस गांव का स्कूल हिंदी पूर्व माध्यमिक शाला झालीया जहाँ कक्षा 1 से 7 वी तक पढ़ाई होती थी। आस पास के चार पांच गांव और टोलो के लिये एक मात्र स्कूल।

स्कूल  मे हर कक्षा मे यही कोई पचास साठ छात्र, कहने को तो एक से अधिक सेक्सन होते थे, लेकिन सारे बच्चे एक की कमरे मे बैठते थे। एक ही शिक्षक सारे बच्चो को सारे विषय पढ़ाते थे।

कक्षा एक से तीसरी तक हमे जांभुळकर गुरुजी ने पढ़ाया। एक दम श्याम वर्ण के घुंघराले बालो वाले जांभुळकर गुरुजी जो पास से एक टोले साखरीटोला से आते थे। अक्सर साईकिल से आते थे, कभी कभार पैदल भी आते थे।

शिक्षक अच्छे थे, लेकिन थोड़े कड़क मिजाज। उनके मिजाज को समझना मुश्किल होता था, बच्चो के साथ मुस्कराते नही देखा था। गलती होने पर विद्यादायनी से सजा दिया करते थे। गलती पढ़ाई लिखाई से संबधित हो आवश्यक नही, सजा देने के लिये बढे हुये बाल, नाखून, मैले हाथ पैर, मैले कपड़े पर भी धुनाई कर देते थे। कपड़े पुराने, फ़टे चलेंगे लेकिन मैले नही चाहीये। स्कूल मे युनिफ़ार्म थी, सफ़ेद शर्ट, नीला पैट/स्कर्ट, स्कूल मे युनिफ़ार्म ना पहनने पर सजा शायद ही कभी मिली हो।

मुझे उनसे बहुत डर लगता था, कभी भी किसी भी कारण से धुनाई कर देते थे। कारण बहुत अजीब देते थे कि तु मास्टर का लड़का है, तेरी धुनाई होगी तो बाकी  सब सीधे रहेंगे।

मेरे पापा बाजू के एक दूसरे गांव के हाई स्कूल मे गणित और विज्ञान के शिक्षक थे। पापा और जांभुळकर  गुरुजी मे एक आदत समान थी, पढ़ने की। दोनो मे पुस्तको का आदान प्रदान मेरे माध्यम से होते रहता था। हर सप्ताह जांभुळकर गुरुजी आदेश देते थे, कि अपने पापासे किताब मांगकर ले आना। अब पापा के पास नई किताब ना हो और उन्होने ना दी तो आज्ञा के पालन ना करने मेरे कान उमेठे जाते। और किताब दे देते तो शाबाश कहते हुये जोरो से पीठ ठोंकी जाती।

झालिया और उसके आसपास के गांवो के अधिकतर लोग कृषक थे। गिने चुने ब्राह्मण परिवार थे, 80% कृषक और शेष दलित जातियों से  जुडे़ परिवार। यह अनुपात शिक्षको मे भी था। गांव अपने टोलो सहित पिछड़ा था, शिक्षित लोग बहुत कम थे, सारे गांव मे मुश्किल से चार या पांच ग्रेड्युट रहे होंगे। मेरे स्कूल के अधिकतर शिक्षक भी दसंवी/बारहंवी के बाद शिक्षक हो गये थे, बाद मे उनमे से कुछ ने धीरे धीरे गेड्युएशन कर लिया था। अधिकतर शिक्षको का छात्रो से व्यवहार उनकी पृष्ठभूमी पर निर्भर करता था। वे संपन्न परिवार, उंची जाति वाले परिवार से आनेवाले छात्रो और होनहार छात्रो से अच्छा व्यवहार करते थे। जबकि अन्य से उनका व्यवहार तिरस्कार करने वाला ही होता था। 

जांभुळकर गुरुजी  छात्रो से व्यवहार मे अन्य शिक्षको से भिन्न थे। वे होनहार छात्रो या संपन्न परिवार, उंची जाति वाले परिवार से आनेवाले छात्रो पर ध्यान कम देते थे। शायद वो मानते थे कि ये लोग तो पढ़ लिख जायेंगे ही। लेकिन कमजोर और दलित परिवारों से आने वाले छात्रों के साथ कड़ाई से पेश आते थे। उन्हे अधिक और कठिन सजा देते थे।

मेरी कक्षा मे एक उद्दंड छात्र था, नाम था राजेंद्र। उसके परिवार का पेशा मृत पशुओं से खाल उतारना, खाल पकाना और उससे जुते चप्पल और कृषि कार्य मे प्रयुक्त होने वाली चमड़े की वस्तुयें बनाना था। राजेंद्र के शरीर से एक अजीब सी गंध आती थी, कपड़े और हाथ पैर मैले रहेते  थे। राजेंद्र  पढ़ने लिखने मे तो कमजोर था ही, साथ ही हर ओर से मिलने वाले तिरस्कार से वह उधमी, उद्दंड भी हो गया था। जांभुळकर गुरुजी उसे सुधारने मे लगे रहते थे। अन्य लोगो से दुगनी सजा देते थे। बाकि छात्रो से अधिक ध्यान राजेंद्र पर रहता था।

जांभुळकर गुरुजी का यह व्यवहार अन्य दलित छात्रो के साथ भी रहता था, वे राजेंद्र को तो नही सुधार पाये लेकिन इन दलित छात्रो मे से कुछ अच्छी तरह से पढ़ पाये और आगे भी बढ़े।

स्कूल के उन दिनो मे मुझे लगता था कि जांभुळकर गुरुजी ऐसा पक्षपात क्यों करते है। इन नाकारा छात्रो पर अधिक ध्यान क्यों देते है?  बाद मे बड़े होने पर और समझ विकसित होने पर पता चला कि पक्षपात जांभुळकर गुरुजी नहीं अन्य शिक्षक करते थे। जांभुळकर गुरुजी तो उनकी सहायता मे लगे रहते थे जिन्हे उसकी आवश्यकता अधिक है।

हम स्कूल से निकले, गांव छूटा, जड़े छूटी। झालिया स्कूल तो 1987 मे छूट गया था। गांव 1998 मे, फ़िर भी साल मे एक दो बार स्कूल चला जाता था। 1998 के बाद वह भी छूट गया। एक लंबे अरसे के बाद जब 2004 मे गांव गया था तो स्कूल भी गया। पता चला कि जांभुळकर गुरुजी रिटायर हो गये थे और उसके कुछ दिनो बाद जीवन से भी।

कक्षा 1 से 3, वर्णमाला से लेकर बारहखड़ी, शुरुवाती अंकगणित से नींव बनाने वाले जांभुळकर गुरुजी  चले गये थे।

#गुरु_पुर्णीमा

आगे पढे़....

कोरोना और बाबा जी की दवाई

मंगलवार, जून 30, 2020

गुणीजनों, प्रवचन आरंभ करने से पहले कुछ आवश्यक व्याख्या
  1. व्हाटाबाउटइज्म : जब बात केले की हो तो आम को ले आना। पुछना कि तब कहाँ थे ? या तब क्यों नही बोले ? फ़लां के बारे मे क्यों नही बोले!
  2. बाबा का अर्थ योग नही होता ना ही आयुर्वेद होता है। बाबा के दावों का विरोध का अर्थ योग, आयुर्वेद, देश, संस्कृति, परंपरा का विरोध नही होता है।

बाबा ने कोविड-19 के शतप्रतिशत इलाज के दावे के साथ बाजार मे दवा उतारी है। दावे की प्रामाणिकता मे ढेरों संदेह है, जिनका निराकरण आवश्यक है। लेकिन गुणीजन व्हाटाबाउटइज्म पर आ गये। कुछ कहने लगे कि रेमडेसिवीर, फ़ैब-फ़्लु, हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्विन पर क्यों नही बोले, कुछ कहने लगे कि गोरे बनाने की क्रीम पर क्यों नही बोले, हमदर्द साफ़ी, रुह-अफ़्जा पर क्यों नही बोले।
हे विद्वानों, पहले चर्चा करते है रेमडेसिवीर, फ़ैब-फ़्लु ,हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्विन जैसी दवाओं की।
  1. ये दवाये, आज कल मे नही खोजी गई है, बरसो पुरानी दवाये है।
  2. ये सब दवायें वर्षो तक चलने वाली क्लिनिकल ट्रायल की प्रक्रिया से गुजर चुकी है, हजारो लोगो पर इनके प्रभाव को देखा गया है।
  3. इन सभी दवाओं की कार्यप्रणाली, प्रभाव और दुष्प्रभाव अच्छी तरह से ज्ञात है।
  4. इनमे से कोई भी दवा OTC नही है, अर्थात इन्हे डाक्टर की पर्ची पर, चिकित्सीय निगरानी मे ही लिया जा सकता है।
  5. इन दवाऒं को कोविड-19 के इलाज के रूप मे प्रचारित नही किया जा रहा है, कोविड-19 के इलाज के लिये क्लिनिकल ट्रायल हो रहा है। इनमे से ग्लेन्मार्क की दवा फ़्लु जैसे लक्षणो के इलाज मे प्रयोग मे आती है।
  6. लेकिन कोविड 19 पर इन दवाईयों के प्रभाव के बारे मे अधिक नही पता है, चुनिंदा मामलो मे क्लिनिकल ट्रायल हुआ है। इसी ट्रायल के एक चरण के रूप मे भारत मे भी इन दवाओं को चुनिंदा मामलो मे डाक्टरों की निगरानी मे ट्रायल के लिये अनुमति मिली है।
  7. बिंदु क्रमांक 4,5,6 को दोबारा पढ़े।

अब आते है, गोरे बनाने क्रीम पर क्यों नही बोले, हमदर्द साफ़ी, रुह-अफ़्जा पर
  1. क्या आप सचमे गंभीर है या केवल बाबा के दावे के उल्टे-सीधे बचाव के लिये लगे हुये है?
  2. ये सब दवाये नही है, हो सकता है कि इन सबके दावे गलत हों, लेकिन क्या इनकी तुलना कोविड-19 जैसी उच्च मृत्यु दर वालीे बीमारी की शतप्रतिशत इलाज के दावे वाली दवा से कर सकते है ?

तो गुणीजनों तो आगे क्या हो ?

बाबा की दवा के बाजार मे आने से पहले वह भी क्लिनिकल ट्रायल से गुजरे। बाकायदा उचित लायलेंस के अंतर्गत उत्पादन हो। कोविड-19 जैसी बीमारीयों के इलाज के लिये प्रयोग चिकित्सीय निगरानी मे ही हो। उसके बाद की उसका प्रचार प्रसार हो।
बाकि आपकी अपनी शृद्धा, आपका जीवन आपकी मर्जी कि आप क्या खायें, कौन रोक सकता है।

-इति श्री गुरुघंटाल बाबा श्री श्री 1680 श्री आशिषानंद प्रवचनामृत

डिस्क्लेमर : बिल गेट्स या बड़ी फ़ार्मा कंपनीयों ने हमे चंदा नही दिया है, दे दे तो मना नही करेंगे। बाबा से भी चंदे का स्वागत है, लेकिन पोस्ट वापस नही लेंगे।

आगे पढे़....

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें

इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

  © Hindigram Khalipili by Hindigram 2011

Back to TOP