भारतीय वैज्ञानिक चेतना

शनिवार, फ़रवरी 27, 2021

 आज राष्ट्रीय विज्ञान दिवस है।



विज्ञान से होने वाले लाभों के प्रति समाज में जागरूकता लाने और वैज्ञानिक सोच पैदा करने के उद्देश्य से राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय के तत्वावधान में हर साल 28 फ़रवरी को भारत में राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाया जाता है। 28 फ़रवरी सन् 1928 को सर सीवी रमन ने अपनी खोज की घोषणा की थी। इसी खोज के लिये उन्हे 1930 में नोबल पुरस्कार दिया गया था।


कुछ बरस पहले अनमोल ने एक लिंक दी थी "The Great Debate - The Storytelling of Science", दो भागो मे है। आम लोगो मे विज्ञान को लोकप्रिय करने मे वर्तमान के सभी बड़े नाम है वे सभी इस चर्चा मे है। कुछ मुख्य नाम है बिल ने, निल डीग्रेस टायसन, रिचर्ड डाकिंस, ब्रायन ग्रीन, इरा फ़्लैटो, नील स्टीफ़नसन, ट्रेसी डे तथा लारेंस क्रास।(युट्युब पर दो भागो मे चर्चा है, एक बार अवश्य देखीये।)








इस तरह की चर्चाओं को देखकर हमेशा दु:ख होता है कि इस तरह की उच्च स्तरीय बहस भारत मे क्यों नही होती है! 


भारत मे भी विज्ञान कांफ़्रेंस होती है जिसमे वेंकटरामन रामकृष्णन एक बार भाग लेने के बाद दोबारा भाग लेने से मना कर देते है। वेंकटरामन रामकृष्णन गलत भी नही है, उनके पास वाजिब कारण है इस तरह की कांफ़्रेंस को समय की बर्बादी मानने के लिये। इन कांफ़्रेंसो मे शल्य, जीवक या सुश्रत जैसे प्राचीन भारतीय चिकित्सको की चर्चा ना होकर गणेश पर हाथी मस्तक लगाने की चर्चा होती है। आर्यभट, भास्कर, वराहमिहीर, नागार्जुन, बोधायन जैसो की चर्चा ना होकर फ़र्जी वैमानिक शास्त्र की चर्चा होती है। आधुनिक भारतीय वैज्ञानिको के नाम से अधिकतर लोग अंजान ही है।


हमारे संविधान के अनुसार "भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण , मानववाद और ज्ञानर्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें।" 


लेकिन  इस कर्तव्य की पूर्ति  कौन करता है ? क्या हमारे विश्वविद्यालयों मे इस तरह का वातावरण है कि नये विचार आये, खूली चर्चा हो जिससे वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रसार हो ?


हम रोते रहते हैं कि भारत मे नई खोजे नही होती है, प्रतिभा पलायन होता है ? क्या कारण है ?


हमारे विश्वविद्यालयो को पूर्ण स्वायत्ता क्यों नही दी जाती है? क्यों उनके कार्यप्रणाली मे राजनैतिक हस्तक्षेप होते है ? क्यों उनके पाठ्यक्रमो को राजनैतिक विचारधारा से बांधने का प्रयास होता है ? क्यों शैक्षणिक संस्थानो को किसी विशिष्ट विचारधारा के दायरे मे बांधा जाता है ? उस विचारधारा का विरोध करने पर उनपर हमले क्यों होते है ? विशिष्ट विचारो के समर्थन मे गुंडागर्दी क्यों की जाती है ? अनुदानो पर रोक लगने की या विश्वविद्यालय बंद करने की बात क्यों होती है ?


वर्तमान मे अधिकतर खोज, पेटेंट अमरीका या युरोप के विश्वविद्यालय से आते है। गूगल, फ़ेसबुक जैसी कंपनीयाँ की नींव इन्ही विश्वविद्यालयो मे रखी जाती है। क्योंकि ये विश्वविद्यालय खूलापन देते है, विचारों का, रहनसहन का, खाने पीने का, कपड़े पहनने का। यहाँ कोई आदेश नही देता कि छात्रो का ड्रेसकोड क्या हो ? यहाँ छात्रो को कोई नही बताता कि वे क्या खांये क्या नही ? यहाँ के पुस्तकालय को रात मे चालु रखने विद्यार्थीयों को खूले मैदान मे महिनो तक प्रदर्शन नही करना होता है। यहाँ किसी रेस्टारेंट को रात मे बंद रखने का आदेश नही दिया जाता! किसी एक विशिष्ट विचारधारा को थोपा नही जाता है।


इन कालेजो मे खूलापन है लेकिन ऐसा भी नही है कि उन्हे कानून व्यवस्था से खिलवाड़ करने की इजाजत है! कानून के दायरे मे पूरी आजादी है। 


जब तक आप अपने शैक्षणिक संस्थानो को ऐसी आजादी नही देंगे, भूल जाईये कि भारत कभी भी विकसीत राष्ट्रो के बराबर आ पायेगा। जो भारतीय प्रतिभा भारत मे कुछ नही कर पायेगी, वह अपना योगदान इन राष्ट्रो के विकास मे देगी।


अब वह समय नही है कि कोई भाभा, राजा रमन्ना, विक्रम साराभाई या सतिश धवन भारत वापसी करेगा। राष्ट्र की सीमायें नई पीढी के वैज्ञानिको को नही बांध पाती है, वे उत्थान के लिये आजाद वातावरण चाहते है, वे वहीं काम करेंगे जो उन्हे ऐसा वातावरण देगा।


भारतीय संविधान के भाग - 4 क के अनुच्छेद - 51 क ( ज ) के अनुसार


" भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वह वैज्ञानिक दृष्टिकोण , मानववाद और ज्ञानर्जन तथा सुधार की भावना का विकास करें "

( It shall be the duty of every citizen of India to develop the scientific temper , humanism and the spirit of inquiry and reform )।


लेकिन क्या हम इस कर्तव्य की पूर्ति कर रहे है ?


नोट : इस चर्चा मे अधिकतर लोगो के शोध कार्य सरकारी सहायता पर ही होते है लेकिन उन्होने सरकारो की बखिया उधेड़ने मे कोई कसर नई छोड़ी है। ये लोग अमरीकी रिपब्लीकन पार्टी के विरोधी रहे है। रिचर्ड डाकिंस के प्रहारों से कोई भी धर्म नही बच पाया है।



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चाय पुराण

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2021


हाल ही मे एक शादी मे गया था, तीन दिन की घुमक्कड़ी मे कुल मिलाकर छह कप चाय पी गई। खुद पर आश्चर्य हुआ कि एक समय ऐसा था कि ठंड के दिनो मे शादी/ब्याह या घुमक्कड़ी के समय एक दिन मे ही दर्जनो कप चाय पी जाते थे।


बचपन मे 10 वी तक एक दिन मे दो कप चाय मिलती थी, एक सुबह और एक दोपहर मे, वह भी यदि चाय के समय पर घर पर हो तो। यदि किसी दोस्त के घर गये तो कभी कभी तीसरा कप भी हो जाता था।  बाद मे जब 11 वी/12 वी मे साईकिल से 8-10 किमी आमगांव जाना होता था, तो दोपहर मे मित्रों के साथ एक दो कप और हो जाती थी। इन दिनो पूरा हिसाब रखते थे कि कल मैने पैसे दिये थे, आज तू दे...


यही दिन मे तीन चार कप का किस्सा कालेज के दिनो मे भी चला। कालेज के दिनो के बाद जब नौकरी करने लगे, रेल/बस यात्राये बढ़ गई तो चाय की मात्रा मे आश्चर्यजनक रूप से बढोत्तरी हो गई। एक दिन मे चाय की मात्रा आठ दस कप तक पहुंच गई। कभी कभी तो 15-16 कप भी। इन्ही दिनो पैसो की समस्या भी नही रही, खुद ही कमाने लगे थे तो शीतल पेय की संख्या जो किसी समय महीने दो महीने मे एक होती थी, अब रोजाना एक-दो पर आ गई थी। कभी कभी एक दिन मे तीन चार भी।


विदेश यात्राओं का दौर शुरु हुआ। विदेश यात्राओं मे चाय की जगह काफ़ी ले लेती। कप की जगह लोटा भर काफ़ी.. दिन मे तीन चार बार...


शादी हुई। चाय की मात्रा कम होने की बजाय बढ़ गई। अब रात के खाने के बाद भी चाय की आदत हो गई।


इन्ही दिनो शादी के बाद छुट पुट  विदेश यात्राओं से तंग आकर लंबी विदेश यात्रा पर निकल गये। अब घर मे चाय और बाहर लोटा भर काफ़ी। दिन मे तीन चार कप चाय, दो तीन लोटा काफ़ी और एक देड़ लिटर शीतल पेय...


अमरीका , यूरोप से तंग आकर जब आस्ट्रेलिया गये, तो ग्रीन टी और गर्म चाकलेट भी जुड गया, मात्रा नही बढ़ी। बस दिन के किसी एक चाय के कप की जगह ग्रीन टी आ जाती, किसी काफ़ी के लोटे का स्थान गर्म चाकलेट ले लेती। लेकिन आस्ट्रेलीया मे शीतल पेय पीना अचानक कम हो गया, बिना किसी कारण के


भारत वापिस आये, सोचा। वजन 90 किलो के आसपास था। वजन कम करने के लिये व्यायाम के साथ, खाने पीने की आदतों मे बदलाव लाया गया। सोचा कि चलो अगले तीन महीने शर्करा पूरी तरह से बंद कर दी जाये। चाय के कप की मात्रा दिन मे दो कप कर दी गई। कभी कभी चाय की जगह काफ़ी का कप ले लेता। शीतल पेय पूरी तरह से बंद।


अब चार पांच वर्ष हो गये है। दिन मे दो तीन कप से अधिक चाय या काफ़ी नही होती। इच्छा ही नही होती। शीतल पेय का तो ये हाल है कि साल मे एक दो से अधिक नही पी है।


बहुत से लोगो से सुना है कि उन्हे चाय ना मिले तो सरदर्द होता है या पेट साफ़ नही होता है, वगैरह। मैने दिन के दर्जनो कप से दो कप तक ले आया। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि पूरे दिन चाय नही पी, इस तरह की कोई समस्या नही आई।


हाँ, इन दिनो  सप्ताह मे पांच छः बार नारियल पानी पी जाते है, बस इस चक्कर मे कभी कभार निक्कर की बली चढ जाती है। नारियल खुद ही जो तोड़ लाते है ...

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विनीत बाजपेयी और हड़प्पा सभ्यता का कत्ल श्रृंखला(तीन किताबे हड़प्पा, काशी और प्रलय) :पोस्टमार्टम रूपी समीक्षा

सोमवार, जनवरी 11, 2021


विनीत बाजपेयी का नव मत्स्य पुराण तीन किताबों की शक्ल में पढ़ा।





किताब लिखने के लिए सामग्री 

  • थोड़ा डैन ब्राउन को पढ़िए, नाइट टेम्पलर, न्यू वर्ल्ड आर्डर, इल्युमिनाटी, फ्री मेसान्स वगैरह से जुड़ी कांस्पिरेसी निकालिये।
  • अब आचार्य चतुरसेन शास्त्री की ओर रुख कीजिए, उनकी शैली, कल्पनाशीलता को समझिये।
  • पी एन ओक महाराज के तथाकथित इतिहास का अध्ययन करें।
  • अब अमिश त्रिपाठी की ओर मुड़े। उनके द्वारा छोड़े गए विषयो को देखे, वो नव शिव पुराण रच चुके है, नव रामायण लिख रहे है। कुछ और देखिए। कुछ और सस्ते डैन ब्राउन नुमा लेखकों पर नजर दौड़ाईये।
  • हिस्टीरिया चैनल पर एसेंट एलियन देख लीजिए।
  • दक्षिणपंथी कांस्पिरेसी , मैकाले गाथा, आर्य मिथक जैसे मसाले खोजीये।

किताब लिखने की विधि

अब इन सबको को घोट कर एक नया पुराण लिखिए। इन उपन्यासों में बाजपेयी साहब ने नव मत्स्य पुराण लिखा है। हड़प्पा संस्कृति में प्रलय लाई है। तिरपाठी जी जहां अपने पात्रों को मानवीय रखते है, यहाँ पर वे अर्ध मॉनव, अर्ध देवता, अर्ध दानव भी है। कहीँ कहीँ पर एलीयन होने के सङ्केत भी है।

कहानी में हड़प्पा संस्कृति की नई व्याख्या है, भारत मे पुर्तगाल , ब्रिटिश आक्रमण के नए कारण है। मैकॉले शिक्षा पद्धति की बुराई है। डैन ब्राउन के उपन्यासों के सारे विलेन जैसे इल्युमिनाटी, न्यू वर्ल्ड ऑर्डर, फ्री मेसान आ जाते है। पुनर्जन्म गाथा है। अघोर पंथ है।

सबसे बड़ी बात इस कहानी में अब्राहमीक धर्म भी आते है, उन्हें असुरो से जोड़ा गया है। अब्राहमीक धर्मो की बुराई से बचा गया है , प्रशंसा भी है लेकिन इस धर्म से जुड़े संघठनो को खलनायक बनाया है और व्यक्तियों को षडयंत्रकारी।

कहानी वैसे सारी दुनिया की सैर करती है लेकिन मुख्य स्थल हड़प्पा और काशी है। काशी में गैंगवार हो रही है, हत्या हो रही है लेकिन पुलिस और प्रशासन गायब है।

निष्कर्ष

  1. यदि आप कट्टर दक्षिण पंथी, सनातनी है तो आपकी भावनाये आहत हो सकती है दूर रहे।
  2. यदि आप पी ए ओक साहब के प्रशंसक है, राजीव दीक्षित को मानते है, दक्षिण पंथी है लेकिन कट्टर नही तो ये आपके लिए ही है।
  3. वामपंथी ना पढ़े, रक्तचाप बढ़ सकता है, मस्तिष्क को क्षति सम्भव है।
  4. यदि आप मनोरंजन चाहते है, एसेंट एलियन जैसे कॉमेडी सीरियल पसंद करते है तो पढ़ सकते है। बस आपातकालीन स्तिथि के लिए एक ग्लास पानी और दो पैरासिटामोल टेबलेट पास में रखें।

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विप्रो से माइक्रो फोकस की ओर

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2020

 22 वर्षो के अपने करियर में मैंने अब तक चार कम्पनियों में नौकरी की है। इस इंडस्ट्री में यह आंकड़ा बहुत कम है। जिसमे पहली नौकरी मजबूरी की थी, जो पैसे दे दिए उसी में नौकरी ले कर ली थी। जैसे ही हालात ठीक हुए दूसरी नौकरी खोजी, अपनी शर्तो पर, लेकिन मुंबई से दूर दिल्ली में।


दूसरी नौकरी ने बहुत कुछ सिखाया। मेरे करियर की नींव बनाई। हमने भी एक साल में ऐसा काम किया कि डेढ़ बरस तक तीन बार वेतनवृद्धी मिली, वेतन दोगुने से अधिक हो गया था। लेकिन मैनेजमेंट के कुछ ग़लत निर्णय, डाट काम बबल के फूटने , खाज में कोढ़ 9/11 के कारण कम्पनी के हालात बुरे हो गए। लोगो के वेतन में कटौती हुई, बहुत से लोग निकाले गए, लेकिन हम जो काम कर रहे थे उससे कम्पनी की रोजी रोटी चल रही थी। हम अड़ गए कि अपने वेतन से कटौती नहीं होने देंगे। एक समझौता हुआ कि मेरे वेतन में ऑफिशियली कटौती होगी, लेकिन कटौती की राशि नगद रूप से मिल जाएगी। उस समय हमे केवल पैसो से मतलब था तो मान गए। लेकिन यह पता था कि अभी कम्पनी हम पर निर्भर है तो हमारे नखरे झेल गई। लेकिन पहला मौका मिलते ही कहेगी कि पीछे मुड़ और एक लात देकर बाहर कर देगी।


हमने नौकरी खोजना शुरू किया, महीने बीतते बीतते तीन ऑफर हाथ में थे। दो ऑफर दिल्ली के ही थे, तीसरा ऑफर विप्रो का था लेकिन चेन्नई का। विप्रो तीनों में बड़ी कम्पनी थी, पैसा भी बेहतर था। लेकिन चेन्नई डरा रहा था। लेकिन चेन्नई से आए दिल्ली में साथ में काम कर रहे सुब्बु ने डर दूर किया। हमने भी सोचा कि चलो एक बडी कम्पनी विप्रो का ठप्पा लगा लेते है। एक दो बरस के बाद निकल लेंगे।


यह एक दो बरस अठारह बरस में बदल गए। चार महाद्वीप घूमे, दर्जन भर देशों में काम किया। भारत में ही चेन्नई, पुणे, बैंगलोर में रहे।


पिछले दो तीन बरस से काम में एकरसता से मन नहीं लग रहा था। सोचा कि बदलाव चाहिए। जून 2019 में एक ऑफर आई और विप्रो से त्यागपत्र दे दिया। बॉस से बात हुई, बॉस ने कुछ बदलाव की बात की, हमने अपनी शर्तो पर त्यागपत्र वापस ले लिया। लेकिन कुछ समय बीतते ही बहुत से परिवर्तन हुए, हमने सोचा कि अब और नहीं। 


फिर से नौकरी खोजनी शुरू की, फिर से महीने भर में तीन ऑफर। अब हमने सोच रखा था कि साफ्टवेयर सर्विस में नहीं जाएंगे, इसलिए माइक्रो फोकस ऑफर स्वीकार कर लिया।


विप्रो में रहते हुए इतनी टीम , स्थान, ऑफिस बदले थे कि विप्रो से निकल कर नई कम्पनी मे आने में कोई झिझक, दुःख तो नहीं हुआ। लेकिन विप्रो में मेरे सामान्य कार्य के अतिरिक्त मै एक और कार्य करता था, बस उस कार्य का छूट जाना  थोड़ा अखर गया।


यह काम था कालेज से आए रुकीयो को ट्रेनिंग देना, उनकी मेंटरशिप करना। 2002 से 2020 तक यह काम अतिरिक्त रूप से करता आया था। हर बरस कुछ नए रूकी मिलते थे, मेरी  मेंटरशिप मे एक दो साल काम करने के बाद, किसी दूसरे प्रोजेक्ट में चले जाते थे। मेरी मेंटरशिप से निकले बहुत से लोग विप्रो के बाहर भी अच्छी कम्पनियों मे अच्छी नौकरियां कर रहे है। वर्तमान टीम में भी ऐसे  चार रुकी थे। मेरे वर्चुवल फेयरवेल मे इन मे से कुछ रों पड़े। पता चला कि इनमें से एक ने मेरा नाम ही "डैड" रखा हुआ था।


फेयर वेल में अधिकतर जूनियर ने मेरी प्रोफेशनल भूमिका, कार्य से अधिक मेंटरशिप भूमिका के बारे में ही बात की। मेरे लिए यह थोड़ा आश्चर्य जनक था, क्योंकि मै अपने आप को तकनीकी रूप से मजबूत मानता हूं, एक मैनेजर की भूमिका में अपने आपको अधिक सक्षम नहीं पाता हूं। लेकिन मेंटर के रूप में इतना प्रभावी होना मुझे स्वयं को ही नहीं पता था।


नई कम्पनी मे नई भूमिका है। बहुत सी चीजे जानता हूं, बहुत सी चीजे सीखना है। सेवा प्रदाता कम्पनी से उत्पाद निर्माता कम्पनी के माहौल में ढलना है। देखते है कि यह दौर कैसा रहेगा ...

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दीवाली : साफ सफाई और रंगाई पुताई

गुरुवार, नवंबर 05, 2020

 

दीपावली आ रही है। हम घर पेंट करने में जुटे हुए है। इसके पहले चरण में हमने छत पर डैम्प प्रूफ पेंट किया था।


दूसरे चरण में दीवारों पर से कुछ जगह जहाँ दरारें आई थी, पेंट की पपड़ी बन गई थी, उन जगहों को खरोंच कर साफ किया। पुट्टी लगाई और समतल करने घिसाई की।


तीसरे चरण में सारी छतों पर सफेद पेंट किया। एक पाईप में रोलर बांधा और पेंट बाल्टी में डूबा कर छत पर रोल कर दिया। तीन बेड रूम, तीन बाथ रूम, किचन, डायनिंग हाल, बॉलकनी और मेन हॉल की छत पेंट करने में दो दिन लग गए। पूरा दिन पेंट नही करते थे, सुबह के दो घण्टे और रात में दो तीन घण्टे मात्र।


चौथा चरण है दीवारों को पेंट करने का जो अपेक्षाकृत रूप से आसान हैं, दो तीन दिन में निपटा देंगे।


वर्तमान में पेंट करना बहुत आसान काम है, पेंट का डिब्बा खोलो, रोलर डुबाओ और घुमा दो, हो गया पेंट। एक समय था कि हमारे बचपन के छोटे से घर कि पुताई में पूरे 10 दिन लग जाते थे। पुताई होती थी चूने और पेड़ की जड़ से बनी कूची से।


1983-84 में पापा ने झालिया ग्राम में मकान खरीद लिया था, मिट्टी की दीवारों वाला, मिट्टी की खपरैल और बांस से बनी छत वाला मकान। दीवारों की पुताई छुई से हुई थी। छुई चूने के परिवार का सदस्य है, बस रंग पीलापन लिए होता है। पापा ने उसे अब चूने से पुतवाया, चुने में नीला रंग मिलाकर घर पोता गया। यह पुताई पड़ोस जे ही जयलाल नागपुरे ने की थी। अगले चार पांच बरस वही पुताई करते रहे। लेकिन जयलाल साहब थोड़े आलसी, मनमौजी किस्म के इंसान थे। पुताई का काम कभी भी शुरू करे समाप्त दीवाली के दिन ही करते थे। जिससे हम लोग थोड़े चिढ़ जाते थे, दीवाली के दिन घर जमाने का का काम जो करना होता था। 



1990 के आसपास हमने सोचा कि बहुत हो गया, अब पुताई खुद करेंगे और दीपावली से एक सप्ताह पहले समाप्त कर देंगे। बस क्या था, तैयारी शुरू की गई। चूने की बोरी , नीला रंग खरीद कर लाया गया। समस्या थी पुताई की कूची की। एक पलाश के पेड़ की जड़ खोद कर काटी गई। उसके एक सिरे को पत्थर से कुचल कर कूची का रूप दिया।


अब बारी थी चूने को तैयार करने की। चूने को पानी में मिलाने पर ऊष्मा निकलती है, इतनी कि पानी उबलने के तापमान तक पहुंच जाता है। और उस चूने से सीधे पुताई नही कर सकते, हाथ की चमड़ी जल जाती है। तो चूने को एक मटके में डाला गया, उसमें पानी डालकर दो दिनों के लिए छोड़ दिया गया। तीसरे दिन उसमें रंग घोला गया।


और हमने पुताई शुरू की। बांस की सीढी पर चढ़ कर बाल्टी में चूने के घोल में कूची डुबाकर सीधे सीधे ऊपर नीचे वाले स्ट्रोक लगाए गए। जोश जोश में एक दिन में सारी बाहरी दीवार पोत दी।


अब रात में सारी बांहे दुख रही थी, इतनी अधिक कि सो नही पाए। दूसरे दिन पस्त थे। सोचा कि आज ब्रेक ले लेते है। तीसरे दिन फिर जुटे, बाहरी दीवार पोतना आसान था, कमरे मुश्किल। सामान या तो बाहर करो या ढंको, उसके बाद पोतों। दूसरा ढेर सारे व्याधान, कभी मम्मी को कोई चीज चाहिए, कभी पापा को कुछ चाहिए। पूरे दिन में एक कमरा ही हुआ। अगले दिन फिर से पस्त। एक दिन पुताई एक दिन छुट्टी मार कर पूरा घर आखिर कार पोत ही लिया। 


अंतिम दिन जब पूजा का कमरा पोत रहे थे वह दिन दीपावली का ही था।


चित्रों में पेड़ के जड़ से बनी कूची और मेरा घर

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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