केनेडी क्यों मुस्कराये ?

बुधवार, अगस्त 31, 2005

विक्रम विक्रम विक्रम विक्रम
बेताल बेताल बेताल बेताल

शीर्षक गीत के समाप्त होते ही विक्रम (उर्फ विक्रमादित्य उर्फ विक्की) अपनी तलवार लहराते हुवे, बेताल को कन्धे पर डाल शमशान की ओर चल दिया। काली घनघोर रात थी, हाथ को हाथ सुझाई नही देता था। दिस‍बर की रात की तरह ठंड पड रही थी। ठंड के मारे विक्की के मुंह से एक शब्द बाहर नही आ रहा था। बेताल विक्की की पिठ पर लदे लदे बोर हो गया। बेताल ने बोलना शुरू किया

"विकी क्या तु पागल हो गया है ? सारी दुनिया जहां इस रात मे अपने अपने घरो मे रजाई मे घुस कर सो रहे है और तु इस शमशान मे भटक रहा है ? तेरा ये धिरज, शौर्य और उदारता धन्य है। मै तेरे मनोरंजन के लिये एक किस्सा सुनाता हुं, सुन। "


ऐसा कहते हुवे बेताल ने विक्रम को एक विश्व राजनीती का एक किस्सा सुनाना प्रारम्भ किया।

प्राचीन काल की बात है, उस समय ख्रुश्चेव रूस के तथा केनेडी अमेरीका के राष्ट्रपति थे। काफी बातचीत और वार्ताओं के दौर के बाद शांती समझौते का प्रारूप तैयार हुवा। दोनो पक्षों के हस्ताक्षर की देर थी। सारी शर्तें दोनो पक्षो ने हां ना हा ना करते हुवे मान ली थी। बस अब दोनो को कलम हाथ मे लेकर हस्ताक्षर करना ही बचा हुवा था।

लेकिन अचानक ख्रुश्चेव को पता नही क्या सनक सुझी, उन्होने हस्ताक्षर से पहले ये शर्त लगा दी कि केनेडी को आदम और हव्वा (विश्व के पहले स्त्री और पुरूष) को कम्युनिस्ट होने की मान्यता देनी पडेगी। पल भर के केनेडी भौंचक्के रह गये। लेकिन अगले ही पल मुस्कराते हुवे उन्होने आदम और हव्वा को कम्युनिस्ट होने की मान्यता दे दी।


ये किस्सा सुना कर बेताल ने कहा
""विक्की अब तु मुझे बता कि केनेडी क्यों मुस्कराये और उन्होने आदम और हव्वा को कम्युनिस्ट होने की मान्यता क्यों दी ? अगर तु मेरे प्रश्न का जवाब नही देगा तो तेरे सर के टुकडे टुकडे हो जायेगें !"


"बेताल!"
विक्रम ने कहा
"तुझे कामन सेन्स नाम की कोइ चिज नही है ! जरा दिमाग का उपयोग कर। तेरे सिर्फ जीभ चलती है। तेरे प्रश्न का उत्तर कितना आसान है। केनेडी एक चतुर राजनेता थे। उन्होने हंसी खुशी आदम और हव्वा को कम्युनिस्ट होने की मान्यता दी। क्योंकि उन दोनो(आदम और हव्वा) के पास शरीर पर पहनने के लिये एक सुत तक कपडा नही था, रहने के लिये घर नही था और ज‍गंल ज‍गंल भटकना उनकी नियति थी। खाने के लिये उनके पास सेब के अलावा कुछ नही था लेकिन उन्हे लगता था कि वो स्वर्ग मे है। ऐसा सिर्फ कम्युनिस्म मे हो सकता है। इसिलिये केनेडी मुस्कराये और आदम और हव्वा को कम्युनिस्ट होने की मान्यता दी ।"


इस तरह विक्रम का मौन भंग हुवा। बेताल ने कहा
"विक्की तु बोला और मै चला ! हा हा हा हा हा हा "


बेताल वापिस उडकर अपने पेड पर जाकर उल्टा लटक गया।

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क्या आम इंसान जानवरो से भी गया गुजरा हो गया है ?

सोमवार, अगस्त 22, 2005

अभी हाल ही मे मैं एंजलिना जोली अभिनीत 'सरहदो से बाहर्'(Beyond Border) चित्रपट देख रहा था, इस बार भी मै इसे पुरा नही देख पाया. ऐसा नही कि मेरे पास समय नही था या कोइ जरूरी काम आ गया. मै हिम्मत नही कर पाता, इसे पुरा देख पाने की. ये चित्रपट मैने इसके पहले भी देखा है. जब पहली बार मैने इस चित्रपट को देखा, तब ही इस चित्रपट ने मुझे अंदर से हिला दिया था. आज भी जब ये चित्रपट प्रसारीत होता है, सोचता हुं कि इस बार इसे पूरा देखुंगा लेकिन बिच मे ही मुझे चैनल बदलना पडता है. इस की कहानी ही कुछ ऐसी है. इस चित्रपट का एक भाग केविन कार्टर के इस प्रसिद्ध(?) चित्र पर आधारित है.

आप देख सकते है कि इस चित्र मे गिद्ध भूख से पिडित इस बालिका के मरने का इंतजार कर रहा है ताकि वह अपनी क्षुधा शांत कर सके. चित्रपट के अन्य हिस्से नैसर्गीक तथा मानव जनित आपदाओ पर ही आधारीत है, इसमे कंबोडिया का गृहयुद्ध है, चेचेन्या का युद्ध है, और सुडान का अकाल है. जब मै इस को देखता हुं तब मुझे याद आती है, कालाहांडी की, छत्तिसगढ की,सुनामी पीड़ित तमिलनाडु, अंडमान की, भूकंप से पिडित गुजरात और लातुर की , और हाल ही मे बारिश से बर्बाद मुंबई की. दिल दहल जाता है, हृदय कांप जाता है? जिस तरह शुतुरमुर्ग अपना मुंह रेत मे छुपा लेता है, उसी तरह मै चैनल बदल लेता हुं. मुझमे सत्य को झेलने की शक्ति नही आ पाती, क्या सच्चाई से दुर भागता हुं मै? हाँ ! शायद मै सच्चाई से दुर भागता हुं !
केविन कार्टर के इस प्रख्यात (कुख्यात ?) चित्र से क्या हुवा ? क्या भूख मिट सकी ? क्या गरीबी मिटी ? नही ! कुछ हुवा तो सिर्फ यही कि आज मै केविन कार्टर को जानता हुं! कुछ हुवा तो ये कि केविन कार्टर को प्रसिद्धी मिली, पैसा मिला ! और वो अभागा बच्चा ? पता नही कहाँ गया ! शायद उसे भूख प्यास से हमेशा के लिये मुक्ती मिल गयी. "Beyond Border" से क्या हुवा ? एंजलिना जोली को अकादमी पुरस्कार मिला, बस. कुछ इसी तरह का चित्रपट था "Once upon in April" जो युगांडा के गृहयुद्ध पर आधारीत था.
आज समाज मे कितनी असमानता है, एक तरफ दूसरों कि मेहनत पर जीने वाले मुठ्ठी भर लोग है, दूसरी ओर कडी मेहनत कर के भी पेट भर खाने को तरसने वाले लोग है ? समुद्र मे अनाज बहा देने वाला अमरीका है, भूख से तडपताअ नाइजर, चाड और युगान्डा है. आसमान से बाते करती इमारतें है, उसी के बाजु मे झुग्गी झोपडीयां है. शादी पार्टियो मे खाना बर्बाद करते हुवे इन्सान है तो कुडेदान मे कुत्तो के साथ खाना ढुंढते इन्सान है.
जब मै धुप मे रिक्शा खिंचते हुवे, एक इंसान द्वारा इसांन को ढोते हुवे, सडक किनारे या चौराहे पर भीख मांगते बच्चो को देखता हुं मन एक वितृष्णा से भर जाता है. क्या अंतर है मुझमे और इनमे ?
मेरा पूरा बचपन एक आम भारतीय गांव मे बिता था. एक आम भारतीय जिन्दगी(८०% भारतीय जनता गांवो मे रहती है) को काफी करीब से देखा है. १० वी की मेरी कक्षा मे १५० छात्र थे. आज उन १५० छात्रो मे से सिर्फ ३(जिसमे से मै एक हुं) आज इस हालत मे है कि अपने बच्चो को अच्छी शिक्षा दे सके. बाकि आज भी जिने के लिये संघर्ष कर रहे है. मै एक शिक्षित परिवार से हुं, मुझे आगे बढने का मौका मिला , जिससे मेरे पास हर सुख सुविधा है. लेकिन इन लोगो तो कोइ मौका ही नही मिला ! क्या सभी कुछ भाग्य पर छोड दिया जाये ? नही, भाग्य और प्रारब्ध पर दोष देना भी तो कायरता है.
मानव मन कितना कायर है, कितना विरोधाभाषी है. ये सब देखकर एक तडप होती है. एक ओर मै सोचता हु क्या कर रहा हुं मै ? सोचता हुं कि छोड दुं ये सब कुछ ! छोड दुं अपनी नौकरी और लग जाउ उसी मिशन मे जो मदर टेरेसा ने शुरू किया था, या संदिप पांडे कर रहे है , जो राजेन्द्र सिंह , बाबा आमटे, मेधा पाटकर और अण्णा हजारे कर रहे है. अगले पल सोचता हुं क्या करना तुझे इन सब चीजों से ? तुझे किस चीज की कमी है. सब कुछ है तेरे पास ! पैसा, गाडी , बंगला और क्या चाहिये ? दुनिया गयी तेल लेने, तु अपनी सोच . रही बात 'समाजसेवा की' कुछ फालतु पैसा दान कर दे, आयकर भी बच जायेगा और यार दोस्तो मे बोल भी सकेगा कि मैने इस बार फलाँ संस्था को इतना पैसा "दान" किया है. और मै स्वार्थी हो जाता हुं.
जब सुबह नहाने के बाद मै इत्र की बोतल की ओर हाथ बढाता हुं तब मुझे याद आता है "Beyond Border" का वो दृश्य जिसमे नायक नायिका से कहता है
"तुमने इत्र लगाया है, इस रेगिस्तान मे ! भूख से मरते हुवे लोगो के बीच , तुमने इत्र लगाया है !".
मेरे हाथ वही ठीठक जाते है! लेकिन क्यों ? मेरे एक के इत्र के लगाने या ना लगाने से क्या होगा ?
जब मै किसी पार्टी मे जाता हुँ, और १० लोगो के खाने के लिये १०० लोगो के खाने की सामग्री देखता हुं, तब दिल के किसी कोने मे दर्द जरूर होता है, सोमालिया, कालाहांडी और बस्तर की याद आती है. लेकिन 'तंदुरी मुर्गे' की सुगन्ध और दोस्तो कि खिलखिलाहट (जिसमे मेरी भी हंसी शामील है) मे ये दर्द पता नही कहा दब जाता है. ये दर्द फिर से उभरता जरूर है, लेकिन जब पेट भरा हुवा हो !

मेरे दोस्त और मेरे घरवाले मुझे एक जिद्दी इंसान के रूप मे जानते हैं. एक बार जो सोच लिया वो सोच लिया. पुनर्विचार का कोई प्रश्न ही नही ! चाहे ये ज़िद स्कुल के दिनो मे "राक शॉक साइकिल" लेने की हो, या प्रोजेक्ट मैनेजर से छोटी सी बहस के कारण पहली नौकरी छोड देने की हो. कभी पीछे मुडकर नही देखा. लेकिन क्या हो जाता है मेरी इस जिद्दी स्वभाव को जब मै निश्चय करता हुं कि इस वर्ष मै इस सामाजिक काम के लिये इतना समय दुंगा और जब विदेश यात्रा का मौका आता है और सारा निश्चय हवा हो जाता है. मै जब भी इस सब के बारे मे सोचता हुं, सिर्फ सोचता रहता हुं, कुछ नही कर पाता . हाँ कभी कभार भुले भटके अनाथालय के एकाध चक्कर जरूर लगा लेता हुं, या सुनामी पिडीतो के कैम्प मे सहयोगियो के साथ चला जाता हुं, किसी भिखारी को खाना खिला देता हुं. (अपराध बोध मे?). लेकिन क्या ये काफी है, एक आम भारतीय से १०-१५ गुना ज्यादा कमाने वाले नागरिक के लिये? जब मै कुछ कर नही पाता सिर्फ सोचता हुं या सिर्फ लिखता हुं, तब ये तडप क्यो होती है ? ये दिल मे चुभन क्यों होती है ? किसी अपंग या बीमार को देख कर क्यों विचलीत हो जाता हुं. सिर्फ मानवता के लिये ? लेकिन ऐसी अपाहिज मानवता किस काम की, जो कुछ कर ना सके, सिर्फ मन मे रहे, या कागजो पर उतर जाये ?
यदी अपनी सोच को को हकीकत मे ना उतार पाना कायरता है, तो यकिनन कायर हुं मै. और शायद यही फर्क है एक आम इसांन मे और एक महान इसांन मे. आम इंसान, जो सुबह उठता है, पेट की भूख शांत करने के लिये कुछ उद्योग करता है और सो जाता है! लेकिन यही तो जानवर भी करते है ! क्या अंतर है जानवर मे और आम इसांन मे ? सिर्फ इतना कि इंसान सोच सकता है ! या इतना भी नही, मैने तो जानवरो को भी वृद्ध और बीमार साथियो की रक्षा और सहायता करते देखा है, ये तो आज इंसान भी नही करते. क्या आम इंसान(मै) जानवरो से भी गया गुजरा हो गया है ?
एक नागरीक का कर्तव्य क्या होता है ? क्या सिर्फ व्यवस्था और समाज पर आक्रोश जताना? हर चीज के लिये नेताओ और सरकार को कोसना? जान एफ केनेडी ने कहा था
"ये मत पुछो कि राष्ट्र आपके लिये क्या कर सकता है, ये पुछो कि आप राष्ट्र के लिये क्या कर सकते है.(Ask not what your country can do for you; ask what you can do for your country)".
मुझे यही लगता है कि आज जो ये समाज मे भूखमरी या अव्यवस्था है, उसके लिये कहीं ना कहीं मेरी भी जिम्मेदारी है. इसे दूर करने के लिये समाज या व्यवस्था को दोष के बजाए ये सोचना जरूरी है कि मै क्या कर सकता हुं. और सोचने से ज्यादा करना. युग निर्माण योजना का नारा भी है
"हम सुधरेगें, जग सुधरेगा!”

लेकिन क्यों लिख रहा हु मै ये ? शायद इसीलिये कि कभी भविष्य मे पीछे मुडकर देख सकुं कि कभी मै ऐसा सोचा करता था ! शायद इसीलिये की दिल की भडास निकल सके. आज घर से दुर इस परदेश मे कोई भी तो नही आसपास जिससे अपने विचार साथ बांट सकु.( और जो है उन्हे मेरे ये सोचना एक झक्की का प्रलाप के अलावा और कुछ नही लगता!) लेकिन क्या होगा उससे ?

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ये क्या हो रहा है बी बी सी को ?

शुक्रवार, अगस्त 19, 2005

ये क्या हो रहा है बी बी सी को ? ये शायद नही जानते कि भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री मुरली मनोहर जोशी नही अर्जुन सिंह हैं.

जब बी बी सी ऐसी गलती करेगा तो बाकी का तो भगवान मालिक है.

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हिन्दी सुभाषित सहस्र

मंगलवार, अगस्त 16, 2005

१.मनुष्य के लिये निराशा के समान दुसरा पाप नही है,मनुष्य को पापरूपिणी निराशा को समुल हटाकर आशावादी बनना चाहिये ।- हितोपदेश
२.जीवन एक रहस्य है, जिसे जिया न जा सकता है, जीकर जाना भी जा सकता है लेकिन गणित के सवालो की भांति उसे हल नही किया जा सकता. वह सवाल नही- एक चुनौती है, एक अभियान है। -ओशो
Akshargram Anugunj

३.शोक मनाने के लिए नैतिक साहस चाहिये और आनंद मनाने के लिये धार्मिक साहस। अनिष्ट की आशंका करना भी साहस का काम है, शुभ की आशा करना भी साहस का काम परंतु दोनो मे जमीन आसमान का अंतर है। पहला गर्विला साहस है, दुसरा विनीत साहस। -किर्केगार्द
४.चापलूसी का जहरीला प्याला आपको तब तक नुकसान नही पहुंचा सकता, जब तक कि आपके कान उसे अमृत समझकर पी न जाये। -प्रेमचंद
५.गाली सह लेने के असली मायने हैं गाली देने वाले के वश मे न होना, गाली देनेवाले को असफल बना देना. यह नही कि जैसा वह कहे, वैसा कहना। -महात्मा गांधी.
६.जिसका यह दावा है कि वह आध्यात्मिक चेतना के शिखर पर है मगर उसका स्वास्थ्य अक्सर खराब है तो इसका मतलब है कि मामला कहीं गडबड है । -महात्मा गांधी
७.निराशा मुर्खता का परिणाम है। - डिजरायली
८.सत्य को कह देना ही मेरा मजाक का तरीका है। संसार मे यह सबसे विचित्र मजाक है। -जार्ज बर्नाड शा
९.जो जानता नही कि वह जानता नही,वह मुर्ख है- उसे दुर भगाओ। जो जानता है कि वह जानता नही, वह सीधा है - उसे सिखाओ. जो जानता नही कि वह जानता है, वह सोया है- उसे जगाओ । जो जानता है कि वह जानता है, वह सयाना है- उसे गुरू बनाओ । - अरबी कहावत
१०.सबसे अधिक आंनद इस भावना मे है कि हमने मानवता की प्रगति मे कुछ योगदान दिया है । भले ही वह कितना ही कम, यहां तक कि बिल्कुल तुच्छ क्यो ना हो । - डा. राधाकृष्णन
११.झूठे मोती की आब और ताब उसे सच्चा नहीं बना सकती।
१२.सर्दी-गर्मी, भय-अनुराग, सम्पती अथवा दरिद्रता ये जिसके कार्यो मे बाधा नही डालते वही ज्ञानवान (विवेकशील) कहलाता है ।
१३.ज्ञानीजन विद्या विनय युक्त ब्राम्हण तथा गौ हाथी कुत्ते और चाण्डाल मे भी समदर्शी होते हैं ।
१४.यदि सज्जनो के मार्ग पर पुरा नही चला जा सकता तो थोडा ही चले । सन्मार्ग पर चलने वाला पुरूष नष्ट नही होता।
१५.पशु पालक की भांति देवता लाठी ले कर रक्षा नही करते, वे जिसकी रक्षा करना चाहते हैं उसे बुद्धी से समायुक्त कर देते है । महाभारत -उद्योग पर्व
१६.दुष्टो का बल हिन्सा है, शासको का बल शक्ती है,स्त्रीयों का बल सेवा है और गुणवानो का बल क्षमा है ।
१७.दान देने में किसी प्रकार का भय या प्रतिफल की आकांक्षा की भावना हो तो वह दान नहीं है। -रिचर्ड रेनॉल्ड्स
१८. जिसके पास बुद्धि है, उसके पास बल है। बुद्धिहीन के पास बल कहां? -चाणक्य
१९.इस जन्म में परिश्रम से की गई कमाई का फल मिलता है और उस कमाई से दिए गए दान का फल अगले जन्म में मिलता है। -गुरुवाणी
२०.जब तुम दु:खों का सामना करने से डर जाते हो और रोने लगते हो, तो मुसीबतों का ढेर लग जाता है। लेकिन जब तुम मुस्कराने लगते हो, तो मुसीबतें सिकुड़ जाती हैं। -सुधांशु महाराज
२१.विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से मूढ़ता और बुद्धि भ्रष्टता उत्पन्न होती है। बुद्धि के भ्रष्ट होने से स्मरण-शक्ति विलुप्त हो जाती है, यानी ज्ञान शक्ति का नाश हो जाता है। और जब बुद्धि तथा स्मृति का विनाश होता है, तो सब कुछ नष्ट हो जाता है। -गीता (अध्याय 2/62, 63)
२२.प्यार के अभाव में ही लोग भटकते हैं और भटके हुए लोग प्यार से ही सीधे रास्ते पर लाए जा सकते हैं। ईसा मसीह
२३.जो हमारा हितैषी हो, दुख-सुख में बराबर साथ निभाए, गलत राह पर जाने से रोके और अच्छे गुणों की तारीफ करे, केवल वही व्यक्ति मित्र कहलाने के काबिल है। -वेद
२४.स्वप्न वही देखना चाहिए, जो पूरा हो सके। -आचार्य तुलसी
२५.कोई भी देश अपनी अच्छाईयों को खो देने पर पतीत होता है। -गुरू नानक
२६.धर्म वह संकल्पना है जो एक सामान्य पशुवत मानव को प्रथम इंसान और फिर भगवान बनाने का सामर्थय रखती है । -स्वामी विवेकांनंद
२७.एक साधै सब सधे, सब साधे सब जाये
रहीमन, मुलही सिंचीबो, फुले फले अगाय । -रहीम

२८.जो रहीम उत्तम प्रकृती, का करी सकत कुसंग
चन्दन विष व्यापत नही, लिपटे रहत भुजंग । -रहीम

२९.रहीमन देखि बडेन को , लघु ना दिजिए डारी
जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारी । -रहीम

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अथः कालेज पुराणे संजय कथा

शनिवार, अगस्त 13, 2005

हमारे एक करीबी दोस्त है, जिन्हे हर खबर को सनसनीखेज तरीके से पेश करने मे आनंद आता है. अभी कल ही उनसे बात हो रही थी, बातो का रूख पुरानी यादो की तरफ मुड गया. कालेज की सुनहरी यादे ताजा की गयी,पुराने गडे मुर्दे उखाडे गये. इसी दौरान ये किस्सा याद आया, हमने सोचा एक चटपटा किस्सा है, जिस पर हम एक चिठ्ठा लिख सकते है. बस हमने यह बात अपने दोस्त से कही, वो पुरे हत्थे से उखड गये और हमे धमकी दी कि अगर हमने वो किस्सा अपने चिठ्ठे मे लिखा तो हमे भारत मे एक अवांछीत व्यक्ती घोषित कर दिया जायेगा और भारत मे घुसने नही देगा.
हमने भी सोच लिया हम ये किस्सा तो जरूर लिखेंगे ,लेकिन हम अपने दोस्त का नाम का उल्लेख नही करेगें और एक वैधानीक चेतावनी की सुचना लगा देगें.

नोट : इस कथा के पात्र और स्थान काल्पनीक है, इनका किसी जिवित या मृत व्यक्ति से कोइ संबध नही है.


लेकीन किस्से को आगे बढाने के लिये पात्रो को कोइ नाम तो देना होगा, चलो हम अपने इस यार को "संजय" के नाम दे देते है.

अथः कालेज पुराणे संजय कथा

पात्र : संजय, राजेश, एक गरीब ब्राम्हण(प्रविण पांडेय) और हम
स्थान : गोंदिया(महाराष्ट्र्) और दिल्ली

अध्याय एक : भुमिका

पुराने जमाने की बात है हमारी कथा के सभी पात्र गोंदिया स्थीत अभियांत्रीकी महाविद्यालय मे शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. उन दिनो हमारे महाविद्यालय मे दो तरह के छात्र हुवा करते थे, "दादा" छात्र और सामान्य छात्र. एक मजबुत इमारत के लिये एक मजबुत निंव की जरूरत होती है,ये रहस्य हमारे "दादा" छात्रो को भलिभांती विदित था और वे एक वर्षीय सत्र के लिये लिये दो दो (कभी कभी तिन)वर्ष लगाते थे.इन छात्रो को महाविदयालय के सभी रहस्यो का अच्छा ज्ञान था जैसे आतंरिक परिक्षाओ मे अच्छे अंक कैसे अर्जित किये जायें, बिना प्रायोगिक कक्षा मे उपस्थिती लगाये कैसे उतिर्ण हुवा जाये वगैरह. वो तो बुरा हो नागपुर विश्वविद्यालय का जो हमारे इन महारथींयो को हमेशा अनुतीर्ण कर देता था. ये महारथी महाविदयालय के छात्रावास मे रहना अपना अपमान समझते थे, इन्हे शहर मे मकान लेकर रहना होता था. लेकिन उस काल मे गोंदिया मे बाहरी छात्रो का रहना इतना आसान नही था, खासकर हमारे "दादा" छात्रो का.
ऐसे तो गोंदिया एक अच्छा शहर है आम नागरीको के लिये, लेकिन इस शहर मे सारे काले धन्दे होते थे, गैंगवार होती थी. हर सप्ताह कुछ "विकेट" गिरते थे. और पता नही कैसे हमारे "दादा" छात्र इन सब चिजो से अछुते नही थे.
हम उन दिनो मे महाविदयालय से कुछ दुरी पर "खंडहर" मे रहते थे. हमारा निवासस्थल एक अच्छी इमारत थी, लेकिन राजेश ने उस इमारत का नामकरण "खंडहर्" कर दिया था और सारी "जनता" उसे अब "खंडहर" के नाम से ही जानती थी.इसी इमारत मे मै, राजेश और प्रविण रहते थे. पास मे ही एक "टपरी" थी, और सामने ही "ग़ैलेक्सी बार". पाठकगण को विदीत होगा कि "टपरी" एक ऐसी झोपडीनुमा चाय की दुकान होती है जिसमे चाय के अलावा पकौडे ,समोसे जैसा नास्ता मिलता है. सामान्यतः टपरी महाविदयालय के आसपास होती है. छात्रगण टपरी का उपयोग उदरसुख , मुख शुद्धी तथा "नैन सुख" के लिये करते है.

अध्याय दो : गोंदिया कथा
हमारे संजयजी सही मायनो मे "संज़य" की भुमिका अदा करते थे. गोंदिया शहर की हर घट्ना की उन्हे जानकारी होती, और वे हमे उसका "आंखो देखा" हाल सुनाया करते थे. उनकी प्रवेश कुछ इस तरह हुवा करता था
" आज पता है क्या हुवा, राम नगर मे २ विकेट गिर गये !"
या
"सिविल लाइन मे अलाँ ने फलाँ को चाकु मार दिया".
जब हम लोग "टपरी" नैनसुख मे व्यस्त होते थे, और कोई दादा छात्र(या ऐसा कोइ व्यक्ती जिसकी आपराधिक पृष्ठभुमी हो) वहाँ से गुजरता संजयजी उसकी पुरी जन्मपत्री सुना देते.
"ये 'बाबा' है. पिछले ८ साल से कालेज मे है. एक बार इस पर निर्मल थियेटर मे कुछ गुन्डो ने हमला किया था.ये बाल्कनी मे बैठा फिल्म देख रहा था तब इसको मारने फलाँ गुण्डा, सलाख लेकर आया और वार किया. बाबा ने उसके हाथ से सलाख छिनकर अपने सर पर दोनो हाथो से मोड दिया. फला गुण्डा की ये देखकर '*** फट गयी' और वो भाग गया"
और संजय उस दादा छात्र को सिल्वेस्टर स्टेलोन का बाप बना देते. हमे पता नही होता कितना सच है कितना झुठ !
"ये फलाँ है, इसका फुलचुर मे बार है. इसके पास १० गुण्डे है. वो अलाँ है ना, वो इसके लिए काम करता है. पिछले चुनावो मे इसने वो कखग नेता के लिये १० लोगो को टपकाया था! इसकी चछज से नही बनती, पिछ्ले साल रामनगर मे ४ विकेट गिरे थे ना वो इन दोनो की गैंगवार के कारण गिरे थे"

संजय की इन कहानियो का एक प्रमुख पात्र होता था "मा**न".(उस गुण्डे का नाम , मैने जानबुझकर सेंसर कर दिया है) सप्ताह के सात किस्सो मे मा**न के पांच किस्से जरूर हुवा करते थे. ऐसा नही की सन्जय ये किस्से सिर्फ मुझे सुनाता था, प्रविण, राजेश सभी संजय भाइ साहब के पसंदिदा श्रोता थे. राजेश भी खुद एक बहुत बडा गप्पबाज है, इन साहब को तो ३ घन्टे की फिल्म की कहानी को सुनाने के लिये ६ घन्टे भी कम है. बात को रबर की तरह खिंन्चे जायेगा.
लेकिन संजय साहब तो संजय है. किसी ने किस्से के बिच मे कुछ बोला कि संजय भाई कहेंगे
" अबे आगे तो सुन! वो अभी वहां पर जो हत्या हुइ थी ना वो इसने ही करवायी थी."
हम कहेगे
"पोलीस उसे गिरफ्तार क्यो नही करती ?"
संजय उवाच
" किसकी इतनी हिम्मत कि मा**न को पकड ले, बावन गज की छाती चाहिये".
हम मन ही मन मे "जय हो मा**न और संजय साहब की"

समय आगे बढता रहा और हम मा**न के नये नये किस्सो के बिच मे हम लोगो ने अभियांत्रिकी शिक्षा समाप्त की. सभी अपने अपने रास्तो पर लग गये.

अध्याय तिन : दिल्ली कथा
समय ने रूख बदला. प्रविण दिल्ली मे एक साफ्ट्वेयर कंपनी मे काम करता था. कुछ दिनो बाद राजेश भी दिल्ली पहुंच गया और उसके पिछे मै भी. सभी एक साथ काल्काजी मे रहने लगे. मै ग़ुडगांव मे काम करता था, प्रविण और राजेश ओखला मे. फिर पुराने दिन लौट आये अंतर इतना था महाविद्यालय की जगह कंपनी थी,गोंदिया की जगह दिल्ली. वही मस्ती, वही आवरागर्दी, वही रात को देर रात तक बाते करना, कालेज के किस्से याद करना. लेकिन संजय साहब नही थे !
कुछ दिनो बाद संजय दिल्ली आया लेकिन प्रविण मुंबई चला गया. जिन्दगी अपनी रफ्तार से चल रही थी. रात मे देर तक बातें होती थी लेकिन संजय साहब बदल चुके थे अब वो मा**न के किस्से नही सुनाते थे. ऐसा नही कि वो सुधर गया था, कारण ये था कि राजेश उसे अब मौका नही देता था, वो अपनी प्रेमकहानी सुना सुना कर सबको पकाते रहता था.
प्रविण को दिल्ली किसी काम से आना था. सभी लोग खुश थे,काफी अरसे के बाद चारो यार बैठेंगे. प्रविण के आने से एक दिन पहले मा**न का किस्सा निकला. मैने संजय से पुछा
"तेरा दाँया हाथ मा**न का क्या हाल है ?"
राजेश ने भी संजय की खिंचायी शुरू कर दी कि कालेज के दिनो मे संजय को मा**न के अलावा किसी के बारे मे कुछ कहता ही नही था. लेकिन ये क्या संजय भाई मानने तैयार नही कि वो मा**न के किस्से सुनाया करते थे. मै और राजेश दोनो हैरान ! आखिर काफी बहस के बाद तय हुवा कि प्रविण आ रहा है उससे पुछा जायेगा. वो जो कहेगा उसे सभी मानेंगे.
दुसरे दिन प्रविण आया, सबसे गले मिला. संजय से भी गले मिला और और मिलते ही पुछा
"और मा**न क्या बोलता है ?

मै और राजेश दोनो फर्श पर लोट गये, हम दोनो का हंसते हंसते बुरा हाल था. संजय साहब प्रविण से कह रहे थे (जुलियस सिज़र के अंदाज मे)
"प्रविण , तु भी !"(Brutus! You too!)

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एक पत्रकार की मौत

मंगलवार, अगस्त 09, 2005

ABC TV के प्रमुख पत्रकार और उदघोषक पिटर जेनिगंस की फेफडो के कर्क रोग से मृत्यु हो गयी. ABC के अलावा सभी चैनलो(CNN/NBC/BBC...) ने इस खबर को प्रमुखता दी.

मै सोच रहा था कि हमारे देश मे एक पत्रकार या किसी लेखक की मौत की खबर पता नही किस कोने मे चली जाती है ! आश्चर्य़ तो इस बात पर होता है कि हमारे प्रसार माध्यम जिसके बलबुते से चलते है वही उन पत्रकारो लेखको को भुल जाते है. हां यदि प्रकाशक या मालिक की मौत हो तो वह जरूर सुर्खियो मे रहती है.

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प्रपंच ?

गुरुवार, अगस्त 04, 2005

मेरे पिछले चिठ्ठे "क्या ऐसा कोई काम है जो आप नही कर सकते ?" के जवाब मे "इ-स्वामीजी" ने लिखा


अमरीकी समाज ने जो हासिल किया है वे उसका मूल्य समझते हैं और अपनी सत्ता,संपन्नता को किसी भी कीमत पर खोना नही चाहते. हाँ उनके पास खोने के लिए बहुत कुछ है , खोने का भय ही उन्हे आगे बढाता रहता है. मेरे दृष्टीकोण मे इसीलिए यह एक बौद्धिकतावादी प्रपंचवादी समाज है,प्रपंच एक अच्छे मतलब मे नकारात्मक मतलब मे नही! साम-दाम-दण्ड-भेद से पाया और बचाया है. भय का उत्तर है संकट खडा करने वाली परिस्थितोयों की समझ और उनके प्रतिकार की जुगत उपलब्ध साधनो से, और ना हो तो नए साधन खडे करने का पहले से किया गया प्रपंच या तैयारी इन फिल्मों का यही संदेश होता है.

प्रपंच ? हाँ अमरीकी समृद्धी एक प्रपंच ही तो है, दुनिया के बडे कर्ज़दार देशो मे से एक , दुनिया का सबसे बडा समृद्ध और सबसे शक्तीशाली देश है. कितना बडा विरोधाभाष है लेकिन सच है !
अमरीकी अर्थव्यवस्था चलती कैसे है ? सारे विश्व मे व्यापार के लिए डालर का उपयोग होता है, जिससे हर देश अपना विदेशी मुद्राकोष मे डालर का भंडार रखता है. सारी दुनिया के देश अपने मुद्रा कोष के लिये अमरीकी बाण्ड खरीदते है, या दुसरे शब्दो मे अमरीकी बैंको मे अपना पैसा रखते है. इसी उधार के पैसो से अमरीकी अर्थव्यवस्था चलती है.
क्या होगा अगर बाकी देश अमरीकी बैको से पैसा निकाल ले ? वे चाह कर भी ऐसा नही कर सकते, क्योंकि ऐसा कर के वो खुद बरबाद हो जाएंगे. कारण ये है कि अमरीका सबसे बडा आयातकर्ता भी है. दुनिया के अधिकांश देशो की अर्थव्यवस्था अमरीकी आयात पर टिकी हुइ है, जिसके लिए अमरीका के पास पैसा चाहीये. ये पैसा आयेगा कहाँ से ? जाहिर है जब दुसरे देश अमरीकी बाण्ड खरीदेंगे. मतलब सिधा और साफ है सारी दुनिया बचत करे और अमरीका ऐश करे. निन्यानबे का फेर. ये सीधा चार्वाक निती है "ऋण कृत्वा, घृत पिबेत"(चाहे कर्ज लेना पडे , घी पियो)

अमरीकी स्वार्थनीति का एक और उदाहरण. अमरीका तेल का सबसे बडा आयातकर्ता भी है. सारे तेल उत्पादक देश उसके पिछलग्गु. नही है तो इराक और इरान. इराक को तो उसने सारी दुनिया को ठेंगा दिखाते हुवे, अमरीकी जनता को "Weapon of mass destruction" का हौवा दिखा कर सिधा कर दिया अब इरान की बारी है.

अमरीकी प्रसार माध्यम भी पिछे नही है. "CNN" पर रोज शाम को "Broken Border" आता है. "Outsourcing" पर अच्छी बहस होती है. भारत को संगणक प्रोद्योगीकी की महाशक्ती बना कर चने के झाड पर चढाया जाता है. और हम चढ भी जाते है. लेकिन वास्तविकता ये है हमारा कुल संगणक प्रोद्योगीकी के व्यापार मे हिस्सा कितना है सिर्फ २% !

जब अमरीका को लगता है कि चीन अब एक महाशक्ती बनने जा रहा है, यदि भारत और चीन मिल गये(?) तो उसको चुनौती मिल सकती है. बस भारत को चने के झाड पर चढा दो, परमाणु शक्ती बोल दो(बोलने मे क्या जाता है). बस एक को तो फोड लिया. लेकिन जब हथियार देने की बारी आती है F16 पाकिस्तान को दे दो, "लाक हिड मार्टिन" की नौकरीयां बच जायेगी. एक बार विमान बिक गये, तब पुर्जो के लिये जांएगे कहाँ ? भारत कुछ बोला तो F18 का लालीपाप दे दो. कुछ नौकरी और बच जायेंगी. वो तो भला हो हमारे नेताओ को सदबुद्धी आ गयी और इस चक्कर मे नही पडे.

कुल मिला कर अमरीका सामदाम दंड भेद की निती से समृद्ध तो है लेकिन किस किमत पर ? कुछ और सवाल है .
१.आज अमरीकी नागरीक कहां सुरक्षित है? शायद अमरीका मे भी नही !
२.क्या ये स्थिती हमेशा बनी रहेगी ? एक समय था अंग्रेजी राज्य मे सुरज नही डुबता था और आज !
३.उधार के पैसो पर कब तक अमरीकी अर्थ व्यवस्था चलेगी ?
४.हम कब सुधरेंगे(कब अमरीकी जाल से निकल पायेंगे ?). क्या मौर्य काल का स्वर्ण युग़ आयेगा ?( जी हां हम तब से लेकर आज तक परतंत्र है, आज भी !. हमारी नितीया विश्व बैंक और अतंराष्ट्रिय मुद्रा कोष निर्धारीत करता है,अप्रत्यक्ष रूप से अमरीका !)

मेरे पास तो इन सवालो का जवाब नही है, शायद आपके पास हो !

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क्या ऐसा कोई काम है जो आप नही कर सकते ?

बुधवार, अगस्त 03, 2005

आज मैं "The Core" हॉलीवुड का एक चलचित्र देख रहा था. उसमे एक सवांद है जो मुझे काफी अच्छा लगा. नौकरी के लिए साक्षात्कार के लिये ये संवाद उपयोगी हो सकता है.

नायक : "Is there anything that you can not do ?" (क्या ऐसा कोई काम है जो आप नही कर सकते ?)
नायिका :"Not I am aware of !"(ऐसा कोई काम मेरी जानकारी मे तो नही है)

ये चलचित्र देखते समय मन अचानक भटक गया और अचानक सोचने की दिशा कहीं और मुड़ गयी. कहानी कुछ इस तरह है, किसी प्रयोग के कारण पृथ्वी के कोर मे स्थित पिघला हुआ लोहा जो हमेशा घूमते रहता है, अचानक घूमना बंद कर देता है. यह घूमता हुवा लोहा पृथ्वी को एक चुबंकिय शक्ति प्रदान करता है जिससे पृथ्वी के उत्तर और दक्षिणी ध्रुव बनते है. यही चुबंकिय शक्ती पृथ्वी को सौर ज्वाला तथा कास्मीक विकिरण से बचाती है. इसी शक्ति के कारण वातावरण की स्थैतीक उर्जा का संतुलन बना होता है, अन्य हर जगह हर समय बिजली गिरने का खतरा बना रहेगा. विमान तथा पक्षी इसी चुबकिंय शक्ती का उपयोग कर दिशा तय करते हैं.

अब इस पृथ्वी के कोर मे स्थीत इस रुके हुवे पिघले हुवे लोहे को फिर से कैसे घूमती हुई स्थिति मे  लाया जाये ? जवाब काफी आसान है, पृथ्वी के कोर मे जाकर नाभिकिय विस्फोट किया जाये. मै सोच रहा था की अमरीका के फिल्मकारो को हर समस्या का जवाब नाभीकिय शक्ति क्यों लगती है ? ये तो सिर्फ एक उदाहरण था. कुछ और चलचीत्र है "The Volcano" मे भूकंप रोकना हो,"The asteroid", मे उल्कापिंड नष्ट करना हो नाभिकिय विस्फोट कर दो. या फिर कहानी कुछ इस तरह होगी की आतंकवादियो के हाथो मे परमाणु हथीयार पहुच जायेगे.

हर दूसरी फिल्म की कहानी होगी , अमरीका पर हमला. अब ये हमला आतंकी कारवायी हो, या दुश्मन देश का हमला वो भी नही तो दूसरे ग्रह से.
साहित्य की तरह , फिल्मे भी समाज का आईना होती है, अमरीकी समाज इतना भयभीत क्यों रहता है ?

कहा जाता है की इस देश क इतिहास ही हिन्सा से भरा हुवा है. वो रेड इंडीयनो से संघर्ष हो, या उसके बाद का खूनी स्वतंत्रता सन्ग्राम. विश्व युद्ध और उसके बाद शीत युद्ध्. और आंतक के खिलाफ युद्ध. ये सभी कारण है इस भय का.

लेकिन क्या ये सच है ? पता नही. नियती की विडंबना दुनिया का सबसे शक्तीशाली राष्ट्र और सबसे ज्यादा भयभीत जनता !

विचारों की धारा कहां से कहां पहुँच गयी !

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श्रद्धाजंली :प्रेमचन्द जी की जयंती

सोमवार, अगस्त 01, 2005

आज प्रेमचन्द जी की जयंती है. मैने कुछ दिनो पहले गुगल पर प्रेमचन्द पर खोज की थी, परिणाम मे मुझे सिर्फ २ पृष्ठ मिले थे. आज जब खोज की तो पूरे ४ पृष्ठ मिले. हिन्दी चिठ्ठाकारो ने तो उन्हे याद किया ही, साथ मे बी बी सी ने एक विशेष पृष्ठ ही उन्हे समर्पित कर दिया.

मैने प्रेमचन्द को कबसे पढ्ना शुरू किया ठीक से याद नही, लेकिन जब से भी शुरू किया उनकी हर रचना ने मेरे दिल को छुवा. मैने उनमे एक ऐसा लेखक मह्सुस किया था जिसने जिन्दगी के हर पहलु को चित्रीत किया था. चाहे वो उफनता प्यार मोहब्ब्त हो(प्रेमपचिसी), चाहे वो जंग के मैदान मे बहता खुन हो, बचपन की मासुम बचकाना हरकते हो(गुल्ली-डंडा), या बचपन मे आयी परिपक्वता हो(ईदगाह)., बुढापे का असहाय जिवन(बुढी काकी), धर्म के नाप पर लुट(गोदान, सवा सेर गेंहु) , हास्य व्यंगय(पं मोटेराम शास्त्री की डायरी)………
"ईदगाह" शायद मेरी सबसे पहली प्रेमचन्द रचित कहानी थी, जो मैने कक्षा ४ मे पढी थी.

हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द हे।


औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाऍंगी। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों?


उसके बाद अगली कहानी भी मैने अपने पाठ्यक़्रम मे ही पढी "गुल्ली डंडा". और ये तो कहानी नही तो मेरा खुद का बचपन है.

वह प्रात:काल घर से निकल जाना, वह पेड़ पर चढ़कर टहनियॉँ काटना और गुल्ली-डंडे बनाना, वह उत्साह, वह खिलाड़ियों के जमघटे, वह पदना और पदाना, वह लड़ाई-झगड़े, वह सरल स्वभाव, जिससे छूत्-अछूत, अमीर-गरीब का बिल्कुल भेद न रहता था, जिसमें अमीराना चोचलों की, प्रदर्शन की, अभिमान की गुंजाइश ही न थी, यह उसी वक्त भूलेगा जब .... जब ...।


इसी कहानी का ये भी हिस्सा भी मेरा अपना अतीत है,मै भी तो एसे ही गप्प हाँका करता था(शायद आज भी)

लड़कों में जीट उड़ा रहा था, वहॉँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं। ऐसे-ऐसे ऊँचे घर हैं कि आसमान से बातें करते हैं। वहॉँ के अँगरेजी स्कूल में कोई मास्टर लड़कों को पीटे, तो उसे जेहल हो जाए। मेरे मित्रों की फैली हुई ऑंखे और चकित मुद्रा बतला रही थी कि मैं उनकी निगाह में कितना स्पर्द्घा हो रही थी! मानो कह रहे थे-तु भागवान हो भाई, जाओ। हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी।


आप भी अपने स्कुली जिवन की ओर झांकिये क्या आपको "बडे भाई साहब" का ये अंश आपका अतीत(वर्तमान) नही लगता ?
मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्‍तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता।


क्या आपको अपने आसपास ऐसे विद्यार्थी नही मिले
मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्‍ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।


जब मै कक्षा ८ मे पहुंचा तब तक मुझे पढने का चस्का लग चुका था. पापा ने मुझे मानसरोवर ला कर दी. प्रेमचन्द के लेखन की कुछ और झलकिँया देखीए. इटली के महान स्वतंत्रता सेनानी "मेज़ीनी" की प्रेमकथा "सांसारिक प्रेम और देशप्रेम".
मैजिनी पर भी उस वक्त जवानी छाई हुई थी, देश की चिन्ताओं ने अभी दिल ठंडा नहीं किया था। जवानी की पुरजोश उम्मीदें दिल में लहरें मार रही थीं, मगर उसने संकल्प कर लिया था कि मैं देश और जाति पर अपने को न्यौछावर कर दूंगा। और इस संकल्प पर कायम रहा। एक ऐसी सुंदर युवती के नाजुक-नाजुक होंठों से ऐसी दरख्वास्त सुनकर रद्द कर देना मैजिनी ही जैसे संकल्प के पक्के, हियाब के पूरे आदमी का काम था।


क्या प्रेमचन्द के इस्लामी जेहाद पर विचार देखिये
तू इन को कापिर कहता है और समझाता है कि तू इन्‍हें कत्‍ल करके खुदा और इस्‍लाम की खिदमत कर रहा है ?

क्‍या इस्‍लाम जंजीरों में बंधे हुए कैदियों के कत्‍ल की इजाजत देता है खुदाने अगर तूझे ताकत दी है, अख्‍ितयार दिया है तो क्‍या इसीलिए कि तू खुदा के बन्‍दों का खून बहाए क्‍या गुनाहगारों को कत्‍ल करके तू उन्‍हें सीधे रास्‍ते पर ले जाएगा।


प्रेमचन्द पर लिखने के लिए तो काफी कुछ है, बाकी फीर कभी ..........

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शादी की वजह : एक श्रद्धाजंली मुंशी प्रेमचंद जी के लिए

जब मैने अपना पिछला चिठ्ठा लिखा था "एक कुंवारे की व्यथा" ,मुझे याद आ रहा था कि मैने पहले कभी शादी करने की वजहो की एक सुची कहीं पढी है. लेकीन कहाँ और लेखक का नाम याद नही आ रहा था. मै सोच रहा था हो ना हो इस सुची के जनक शरद जोशी जी या परसाई जी होंगे. यदी ये महानुभाव इस सुची के लेखक नही है, तो रवीन्द्रनाथ त्यागी जी होंगे.

मैने सोचा चलो कुछ सोध की जाए. घर (भारत फोन किया), छोटे भाई को अपनी आलमारी खोल कर सभी पुस्तको के सारणी पढने का आदेश दिया. वैसे मेरी उस आलमारी को हमारे कोप के डर से कोई हाथ नही लगाता. मेरे पास हिन्दी साहित्य का एक छोटा सा लेकिन अच्छा संग्रह है. हिन्दी के लगभग सभी नामी साहित्यकारो की प्रतिनिधी रचना उसमे है.
जब मैने भाई को जब "शादी की वजह" ढुंढने का तब उसने मुझसे दोबारा पुछकर अपना शक दुरूस्त किया. वो समझ नही पा रहा था कि "बडे भाई साहब" को अचानक ये क्या सनक सुझी ?

खैर हम दोनो याहु पर आ गये. हम उसे आदेश देते रहे.
हम :"अब शरद जोशी के के खाने देखो"
भाई :"उसमे नही है"
हम: "फिर से एक बार देख, हिन्दी पढना भुल गया क्या ?"
भाई :" एक बार कह दिया ना नही है, विश्वास नही है तो खुद आ कर देख लो !"
हम :"ठीक है, परसाई के खाने की पुस्तके देखो "
भाई :"उसमे भी नही है"
हम :"क्या ? उसमे भी नही है , त्यागी के खाने को देखो"
भाई :"उसमे भी नही है"
हम :"भाई एक काम कर एक एक पुस्तक देखना शुरू कर दे !"
भाई :"मेरे पास उतना समय नही है"
हम :"भाई जरा ये काम कर दे, मै तेरे लिये एप्प्ल आई पोड ले आउंगा!"

बस आई पोड के नाम से भाई ने गूगल की गती से १५ मिनिट बाद हमे बताया "वो सुची मुंशी प्रेमचंद ने लिखी थी".
हमे जोर का झटका और भी जोर से लगा. हमे याद था कि ३१ जुलाई इस महान लेखक का जन्मदिन है. सोचा चलो अपने कुछ चिठ्ठो को "प्रेमचंद जी" के नाम समर्पित कर दिया जाये.

अब आप भी इस सुची (शादी की वजह) को पढीये. टंकण की गलती के लिए क्षमा चाहुंगा.

१—मेरे ससुर एक दौलत मन्द आदमी थे और उनकी यह इकलौती बेटी थी इसलिए मेरे पिता ने शादी की।
२—मेरे बाप-दादा सभी शादी करते चले आए है इसलिए मुझे भी शादी करनी पड़ी।
३—मै हमेशा से खामोश और कम बोलने वाला रहा हूं, इनकार न कर सका।
४—मेरे ससुर ने शुरू मे अपने धन-दौलत का बहुत प्रदर्शन किया इसलिए मेरे मां-बाप ने फौरन मेरी शादी मंजूर कर ली।
५—नौकर अच्छे नही मिलते थे ओर अगर मिलते भी थे तो ठहरते नही थे। खास तौर पर खाना पकानेवाला अच्छा नही मिलता। शादी के बाद इस मुसीबत से छुटकारा मिल गय।
६—मै अपना जीवन-बीमा कराना चाहता था और खानापूरी के वास्ते विधवा का नाम लिखना जरूरी था।
७—मेरी शादी जिद मे हुई। मेरे ससुर शादी के लिए रजामन्द न होते थे मगर मेरे पिता को जिद हो गई। इसलिए मेरी शादी हुई। आखिरकार मेरे ससुर को मेरी शादी करनी ही पड़ी।
८—मेरे ससुरालवाले बड़े ऊंचे खानदान के है इसलिए मेरे माता-पिता ने कोशिश करके मेरी शादी की।
९—मेरी शिक्षा की कोई उचित व्यवस्था न थी इसलिए मुझे शादी करनी पड़ी।
१०—मेरे और मेरी बीवी के जनम के पहले ही हम दोनो के मां-बाप शादी की बातचीत पक्की हो गई थी।
११—लोगो के आग्रह से पिता ने शादी कर दी।
१२—नस्ल और खानदान चलाने के लिए शादी की।
१३—मेरी मां को देहान्त हो गया था और कोई घर को देखनेवाला न था इसलिए मजबूरन शादी करनी पड़ी।
१४—मेरी बहने अकेली थी, इस वास्ते शादी कर ली।
१५—मै अकेला था, दफ्तर जाते वक्त मकान मे ताला लगाना पड़ता था इसलिए शादी कर ली।
१६—मेरी मां ने कसम दिलाई थी इसलिए शादी की।
१७—मेरी पहली बीवी की औलाद को परवरिश की जरूरत थी, इसलिए शादी की।
१८—मेरी मां का ख्याल था कि वह जल्द मरने वाली है और मेरी शादी अपने ही सामने कर देना चाहती थी, इसलिए मेरी शादी हो गई। लेकिन शादीको दस साल हो रहे है भगवान की दया से मां के आशीष की छाया अभी तक कायम है।
१९—तलाक देने को जी चाहता था इसलिए शादी की।
२०—मै मरीज रहता हूं और कोई तीमारदार नही है इसलिए मैने शादी कर ली।
२१—केवल संयाग स मेरा विवाह हो गया।
२२—जिस साल मेरी शादी हुई उस साल बहुत बड़ी सहालग थी। सबकी शादी होती थी, मेरी भी हो गई।
२३—बिला शादी के कोई अपना हाल पूछने वाला न था।
२४—मैने शादी नही की है, एक आफत मोल ले ली है।
२५—पैसे वाले चचा की अवज्ञा न कर सका।
२६—मै बुडढा होने लगा था, अगर अब न करता तो कब करता।
२७—लोक हित के ख्याल से शादी की।
२८—पड़ोसी बुरा समझते थे इसलिए निकाह कर लिया।
२९—डाक्टरो ने शादी केलिए मजबूर किया।
३०—मेरी कविताओं को कोई दाद न देता था।
३१—मेरी दांत गिरने लगे थे और बाल सफेद हो गए थे इसलिए शादी कर ली।
३२—फौज मे शादीशुदा लोगों को तनख्वाह ज्यादा मिलती थी इसलिए मैने भी शादी कर ली।
३३—कोई मेरा गुस्सा बर्दाश्त न करता था इसलिए मैने शादी कर ली।
३४—बीवी से ज्यादा कोई अपना समर्थक नही होता इसलिए मैने शादी कर ली।
३५—मै खुद हैरान हूं कि शादी क्यों की।
३६—शादी भाग्य मे लिखी थी इसलिए कर ली।

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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इस चिठ्ठे के बारे मे

बस युं ही जो मन मे आये इस चिठ्ठे मे छपेगा!

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