उत्तर विशेषज्ञ : मेरा मुफ्त सलाह केन्द्र

सोमवार, दिसंबर 26, 2005



आजकल मै थोडा परेशान हुं। ना ना अपनी परेशानीयो से नही, लोगो की परेशानीयो से। अब समझ मे नही आता ऐसा क्या है कि जो देखो अपना दुखडा लिये मेरे पास चला आता है। और दुखडे भी ऐसे कि जिसका मुझे कोई अनुभव ही नही है। कुल मिला कर मै दुखियारा मौसा((Agony aunt का पुरूष वाचक शब्द) बन गया हुं आजकल।

हम ठहरे जावा के मास्टर, जावा के हर मर्ज का ईलाज है हमारे पास, लेकिन आजतक किसी ने एक ठो सवाल नही पूछा। तकनीकी समस्या के लिये सबके पास गूगल जो है, लेकिन अपने हर दुखडे के लिये लोगो ने हमे गूगल बना दिया है…

हमारे मद्रासी साथी सुबु की सगाई हो गयी है। कुछ ही दिनो मे बर्बाद होने जा रहे है। काफी बडा मसला है। हम भी थोडे उत्साहित थे, चलो अपना पूराना यार शादी कर रहा है। लेकिन सुबु भाई हर दिन कोई ना कोई समस्या लेकर हाजीर। इस सप्ताहांत मे उससे मिलने कि योजना है कहां जाना चाहिये ? कल उसका जन्मदिन है क्या उपहार देना चाहिये ? लडकियों को क्या पसन्द होता है वगैरहा वगैरहा। अब इन्हे कोई बताये अगर हमे खुद यह सब मालूम होता तो हमारी खुद की शादी ना हो गयी होती ?

अब हमारे साथ हमारे रूम मे रहने वाले नन्दी महाराज को इश्क हो गया। सहायता सलाह के लिये पहुच गये हमारे पास। हमने अपनी तरफ से पूरी कोशीश की, हर तिकडम लगाई, ढेरो जुगत बतायी, नन्दी भाई ने पूरी कोशीश भी की लेकिन नतिजा सिफर रहा। अब तो नन्दी महाराज को समझ आ जाना चाहिये था कि हमारी सलाह से उसका भला होने की बजाये नुकसान हो गया। ना जी ना, मेरा कन्धा जो हाजीर था उनके आंसुओ से भीगने के लिये !

हमारे एक जिगरी दोस्त है राजेश। अंग्रेज हो गये है, मतलब यु के मे काम कर रहे है। हम उनके पूराने परामर्शदाता है। पहले प्यार से लेकर अब तक के दर्जनो प्यार मे हम उनकी नैया पार करा(डुबा) चुके है। उनकी नयी नयी समस्या ये है कि उनका भी शादी का मूड बन गया है। अब समस्या ये है कि उन्हे जो लडकी पसंद है वो पिताश्री और भ्राताश्री को पसन्द नही, लेकिन मम्मी और बहन को पसंद है। घर मे महाभारत छिड़ा हुवा है। पिताश्री और भ्राताश्री एक ओर कौरव पक्ष मे, मम्मी और बहन दुसरी ओर पाडंव पक्ष , बिच मे खडे है राजेश भाई अर्जुन बन कर। हमारे कलयुगी अर्जुन को हम श्रीकृष्ण नजर आते हैं !

एक और यार है संजय। उम्र हो चली है, ३० साल से उपर के है। उनसे बडे भाई भी अब तक सुखी है मतलब क्वारें है। इनकी समस्या ये है कि बडा भाई शादी करने तैयार नही है, पिताश्री का दबाव अब इन पर है कि जब बडा शादी नही कर रहा है तो छोटा ही कर ले। अब दुखडा सुनने के लिये, सलाह देने मै हुं ना । बडे भैया से बात की तो भैया हम पर गुर्राये
 ” ज्यादा अकल आ गयी है क्या ? तु खुद शादी क्यो नही कर रहा ?”
 संजय को समझाया कि भाई तु तो शादी कर ले। संजय भाई बडी दुख भरी आवाज मे बोले
“आशीष तु भी” !”
पूरे जुलियस सीजर के अंदाज मे “ब्रुटस यु टू"

मेरा दुसरा रूम पार्टनर अन्ना की समस्या और भी विकट है। भाई को नौकरी मिले जुम्मा जुम्मा २ साल हुये है, वेतन ठिकठाक है लेकिन इतना नही कि बीवी के साथ खुश रह सकें। लेकिन माता पिता हाथ धोकर पिछे पड़े है कि अन्ना शादी कर ले। यहां तक तो ठिक है, उन्होने लडकी भी पसन्द कर ली है। वैसे लडकी अपने हीरो(?) को भी पसन्द है। अब अन्ना अपना दुखडा रोने के लिये कहां जाये ?

सुबह शाम एक ही रट :
“दादा , मै क्या करू ?”
 “करना क्या है, मा बाप ने जब सोच लिया है तो शादी कर ले। जब की तब देखी जायेगी”
 “लेकिन दादा मेरे इतने से वेतन मे क्या होगा ? कैसे गुजारा चलेगा ?”
हम मन ही मन मे
” पूछ तो ऐसे रहा है कि मैने २-३ बीवीया कर रखी है।”
प्रत्यक्ष मे
“ भैया लडकी अच्छी होगी इतने वेतन मे संतोष कर लेगी, नही होगी तो तु लाख रूपया भी कमा तो भी संतोष नही होगा !” 
मै एक दार्शनिक सा चेहरा बना लेता हुं।

”दादा लेकिन उसके भी तो कुछ सपने होंगे, कुछ सोच रखा होगा। उसका क्या होगा ?”

मै अपना सीर पिट रहा हुं!
 “कोई बात नही यार शाम को बात करते है!”
शाम को फीर से
“दादा,अगर वो नौकरी करे तो कैसा रहेगा  ?”
मै मन मे
“अबे उसके सपने गये तेल लेने। ” 
प्रत्यक्ष मे
“बढिया आईडिया है, ये तुने पहले क्यों नही सोचा ?”
”लेकिन दादा कौनसी नौकरी अच्छी रहेगी ”
” देख वो संगणक विज्ञान मे एम एस सी है, अपनी कम्पनी मे कोशीश कर लेते है। यहां नही हुवा तो बी पी ओ मे तो आराम से हो जायेगा”
एक सुबह अन्ना:
“दादा , सब घपला हो गया , उसकी अंग्रेजी अच्छी नही है। उसकी नौकरी के वांदे हो जायेंगे”
” क्यों भाई ऐसा क्या हो गया ?”
“आज मैने उससे अंग्रेजी मे बात की, वो जवाब नही दे पा रही थी!”
“अबे अंग्रेज, वो थोडा घबराहट मे नही बोल पा रही होगी। कुछ लोग आत्माविश्वास की कमी से अंग्रेजी नही बोल पाते है”
“नही दादा मेरा मन अब घबरा रहा है”
” एक काम कर उसको याहू चैट पर बुला, और बात कर। वो यदि चैट पर यदि अंग्रेजी मे लिख कर बाते कर सकती है तो इसका मतलब होगा कि उसे अंग्रेजी आती है बोल नही पा रही है। और यदि ऐसा है तो धीरे धीरे ठिक हो जायेगा। और वह अंग्रेजी बोलने का कोर्स भी कर सकती है”
शाम को अन्ना :
“दादा, मैने मामला सेट कर दिया है। वो अगले हफ्ते से अंग्रेजी का कोर्स कर रही है”
आज सुबह अन्ना :
“दादा, शादी के बाद लिये क्या क्या खरीदना चाहिये। किस किस चिज की जरूरत होगी ?”
कोई बात नही यार शाम को आराम से बैठकर बात करते है ”
हम उपरवाले को याद कर रहे है
“हे भगवान यहां तो ठिक है, उपर ऐसे रूम पार्टनर मत देना। “
अब रात हो गयी है, कार्यालय मे कोई नही है लेकिन मै अभी भी कार्यालय मे बैठा हुं। मुझे रूम जाने से डर लग रहा है। रूम पर अन्ना बैठा है अपने सवालो को लेकर !



3 टिप्पणीयां “उत्तर विशेषज्ञ : मेरा मूफ्त सलाह केन्द्र” पर
बबुआ, तुम भी सलाहकार खोजो न कोई। अपना भी कुछ हिसाब बनाओ। कब तक दूसरों को डुबाते रहोगे?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक दिसम्बर 27th, 2005

Ashish tumko shadi karne ki koi jaroorat nahi hai, jaab doston ne hi saari samasyein gift main de di hain to phir tum shadi karke kaise apna swasthya bigadoge.
kali द्वारा दिनांक दिसम्बर 27th, 2005

भई, पढ़कर मज़ा आ गया। आप यह प्रविष्टि अपने सभी दोस्‍तों को पढ़वा दीजिए। इससे आपका और आपके दोस्‍तों का, सबका ही फ़ायदा होगा। आपका फ़ायदा यह होगा फिर कोई आपसे सलाह नहीं मांगेगा, क्‍योंकि सब जान जाएंगे कि आपने जिसे जो भी सलाह दी है उसका परिणाम उल्‍टा ही निकला है। ऐसी सलाह से वंचित रहना तो आपके दोस्‍तों के लिये भी लाभदायक साबित होगा।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक दिसम्बर 28th, 2005

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आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे

गुरुवार, दिसंबर 22, 2005



किस्मत ऐसी पायी है कि मुझे अलग अलग जगह भिन्न भिन्न लोगो के साथ काम करने का सौभाग्य मिलता है। एक अलग ही आनन्द आता है । ऐसे भी मै सुचना तकनीक के क्षेत्र मे काम कर रहा हुं, यह एक ऐसा क्षेत्र है कि आप को भारत के हर कोने से आये हुये सहकर्मियो के साथ काम करने का मौका मिल जायेगा, चाहे आप जहां हो।


अब जब ऐसे वातावरण मे काम करते हों जहां अलग अलग संस्कृति और अलग अलग भाषा भाषी साथ हो तब कभी कभी कुछ मनोरंजक परिस्थितियां पैदा हो जाती है।


मै उस समय दिल्ली मे रहता था और गुडगांव मे काम करता था। कंपनी की बस से गुडगांव आना जाना होता था। हमारी बस का ड्राइवर काफी रंगीले मिजाज का हुवा करता था। बस चालू करने से पहले बस का थका हुवा डिब्बा( म्युझिक सिस्टम ) चालू करता था। आम बस ड्राइवरो के जैसे उसके गानो की पसन्द हुवा करती थी। उसका सबसे ज्यादा पसन्दीदा गाना था
चल चमेली बाग मे
मेरे साथीयो मे एक सुबु था, जो मद्रासी(तमील) था। हम लोग बस मे साथ ही बैठा करते थे। सुबु कभी शांत ना बैठने वालो मे से था। उसे हिन्दी नही आती थी, लेकिन दिल्ली मे हिन्दी के बिना जीना मुश्किल है। वह धीरे धीरे हिन्दी सीख रहा था। अब वो काम चलाउ हिन्दी बोल लेता था लेकिन हिन्दी गाने उसके समझ से बाहर थे। मै अक्सर उसे गानो का मतलब भावानुवाद कर बता देता था। लेकिन सुबु भाई अड गये उन्हे भावानुनाद नही हर शब्द का अनुवाद चाहिये जिससे वो अपने हिन्दी का शब्द्कोष बढा सके। वाजिब मांग थी, मै मना भी नही कर सकता था।
अब मेरी परेशानी सुनिये,एक दिन गाना बजा
उड जा काले कांवां तेरे मूविच खंडपावाले जा तु संदेशा मेरा मै सदके जांवा
और हमारा अनुवाद था
“O Black Crow You Fly, I Will Put Sugar In Your MouthTake My Message, I Will Be Gracefull”
सुबु उवाच
 “तुम हिन्दी लोगो का गाना कितना गन्दा, कोइ मतलब का नई। गाने मे कुच बी बोलता। कौवा मेसेज थोडे ले जाता, वो क्या बोलते पिण्जन वो मेसेज ले जाता। तुम लोग कौवा को शक्कर खिलाता, वो कित्ता गन्दा रहता, छे छे…।।”


अब मै सर पिट रहा हुं। बडी मुश्किल से उसे समझाया कि उत्तर भारत मे यदि कौवा मुंडेर पर बोले तो उसे किसी मेहमान के आने का सगुन माना जाता है। उसे मुडेंर और सगुन का भी मतलब समझाया। तब उसकी अकलदानी मे बात आयी।
अगले दिन गाना बजा
आंखो मे क्या जी, रूपहला बादलबादल मे क्या जी, किसी का आंचलआचंल मे क्या जी, अजब सी हलचल
मैने अनुवाद शुरू किया
“What’s in your eye, Silver Cloud”
सुबु उवाच 
“कितना अच्चा लाइन है जे”
“What’s In the Cloud, somebody’s आंचल″
“ये आंचल याने ?”
अब मेरा माथा ठनका,आसपास देखा। और सोचा कि गाने की अगली पंक्ति का यदि अनुवाद किया तो चारो ओर से चप्पले पडेंगी। मैने सुब्बु के हाथ जोडे और कहा 
“मेरे भाई ,रहम कर आगे मै अनुवाद नही कर सकता “
” गन्दा गाना क्या ?, ड्राईवर को समजता नइ क्या, इतना लडकी लोग बैठा फिर बी गन्दा गाना बजाता”
अगले दिन मै पिछे की सीट पर बैठा, सुबु की सीट से ३ कतार पिछे।
गाना बज रहा था


आ सजदा करूँ मै तेरे बातों मे,

 आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे"


अब सुबु बस मे मुझे ढुंढ रहा था, मै बचने की कोशीश कर रहा था। लेकिन उसने मुझे देख लिया। पास आकर शुरू हो गया।
“तुम लोग प्यार मे दुसरो पर थूकता क्या ?”
“अबे ये क्या बोल रहा है ?, पागल हो गया क्या ?”
“ये गाना सुन वो बोलता थूक मलूं मै तेरे हाथो मे “


मेरी समझ मे नही आया कि मै हंसू या रोउं ।
सुबु भाई “धूप” को “थूक” समझ रहे थे।



4 टिप्पणीयां “आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे” पर
बहुत दिलचस्प। फिल्मी गानों को लोग किस तरह उल्टा-पुल्टा सुनते हैं, इस के लिए अपने विनय भाई ने मनबोल नामक साइट बनाई है। धूप मलूँ को थूक मलूँ सुनने वाले और भी हैं।
Raman Kaul द्वारा दिनांक दिसम्बर 23rd, 2005


बहुत ही मजेदार लगा आपका ये संस्मरण।
सारिका सक्सेना द्वारा दिनांक दिसम्बर 23rd, 2005


अच्छा लगा ये सँस्मरण | याद आ गई अपने एक दोस्त की जिन्हे छोटे से शहर मे रहते हुए अँग्रेज़ी फ़िल्में देखनें का बहुत शौक था । जब कभी कोई फ़िल्म लगी बस पहुंच गये देखनें (समझ में आना ज़रूरी नहीं था) ।
एक बार ज़ल्दी में बस पोस्टर देख कर घुस लिये फ़िल्म Jane Anjane (जेन ऐन्जेन) देखनें के लिये । बड़ी निराशा हुई जब अन्दर जानें पर ‘जाने अन्जाने’ निकली ।
Anoop BHargava  द्वारा दिनांक दिसम्बर 24th, 2005


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अपने अपने आसमां भाग २ : एक असफल गाडफादर

गुरुवार, दिसंबर 15, 2005


ये कहानी शुरू होती है मेरे अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष से। अंतिम वर्ष और कालेज का प्रोजेक्ट दोनो का एक दूसरे से गहरा नाता है। मै ठहरा कंप्युटर विज्ञान का छात्र, मतलब प्रोजेक्ट याने एक साफ्टवेयर बनाओ। चार साल की मेहनत इसी प्रोजेक्ट पर निर्भर होती है क्योंकि २०% अंक प्रोजेक्ट पर दिये जाते है। प्रोजेक्ट के लिये महाविद्यालय की कंप्युटर प्रयोगशाला मे जो समय मिलता था, पर्याप्त नही होता था। मेरी कक्षा के अधिकांश छात्रो के पास खुद के कंप्यूटर थे या उन्होने किसी कंप्यूटर संस्थान मे प्रवेश लिया था। मै कंप्युटर खरीदना तो दूर किसी कंम्प्युटर संस्थान मे प्रवेश ले कर प्रोजेक्ट बनाने की हालत मे नही था। मेरे परिवार की आर्थिक स्थिती उस समय काफी डांवाडोल चल रही थी।

समस्या ! क्या किया जाये ? इसी उधेड्बुन मे मै एक कंप्यूटर संस्थान (एप्टेक) पहुंच गया, इरादा था कि तीन महिनो के लिये फीस की जानकारी ली जाये, उसके बाद मे कुछ तिकडम लगा कर फीस का जुगाड करें। लेकिन ऐसा कोई मौका नही आया। जब मै पहुंचा पता चला उन्हे C और C++ पढाने के लिये कुछ शिक्षक चाहिये ! मेरी बांछे खिल गयी, हम तो ठहरे डेनीश रीची के भक्त, मतलब C और C++ के मास्टर। उसी समय साक्षात्कार दिया और चुन भी लिये गये। मुझे अब शाम ६-८ बजे तक की दो कक्षाये लेनी थी और ८-९ कंप्युटर प्रयोगशाला मे छात्रो की प्रायोगिक कक्षा लेनी थी। और क्या चाहिये बदले मे मुझे २००० रू महिने के मिलने थे, साथ मे अपना काम करने के लिये पूरी की पूरी कंप्युटर प्रयोगशाला। सोचा क्या किस्मत है, छात्र बनने गये थे, मास्टर बन कर आ गये !

अब हम बन गये मास्टर , पढाते तो थे, साथ मे पढते भी थे, अपना कालेज का प्रोजेक्ट भी बनाते थे। उम्र थी यही कोई २१ साल। भरी पूरी नौजवानी। एप्टेक मे मेरी कक्षा मे आधे से भी ज्यादा खूबसूरत कन्यांये थी, सोने पर सुहागा। हम भी पूरा मन लगा कर पढाते थे, कुछ इज्जत का सवाल होता था और कुछ रोब जमाना (स्टाईयल मारना) होता था। पढाने मे काफी आनंद आ रहा था और पैसा भी।

एक दिन बारिश हो रही थी, कक्षा मे सिर्फ ५-६ कन्याये आयी थी और बाकी सब गायब थे, किसी का पढने का मूड नही था। हम भी लग गये इधर उधर की बतियाने। ऐसे भी हमे बातों का बादशाह कहा जाता है। जब अच्छे श्रोता हो, वो भी कन्याये तो फिर क्या कहने। हांकना शुरू कर दी। अब बात चली करीयर से और दोस्ती-रिश्ते-जीन्दगी तक जा पहुंची। अब पता नही ऐसा क्या है “दोस्ती-रिश्ते-जीन्दगी” जैसी फिलासफाना बातो मे कन्याओ का मन अच्छे से लगता है, हम लपेटते रहे और वे सुनते रहे। अब बातों का बादशाह अपने पूरे सरूर मे था, झोंक झोंक मे कह गया


“पता नही मै तुम लोगो के साथ कब तक रहुंगा, लेकिन जिन्दगी मे तुम्हे कभी मेरी आवश्यकता मह्सुस हो , मुझसे संपर्क कर लेना मै मदद के लिये उपलब्ध रहुंगा।” 

पता नही ये शब्द दिल से निकले थे या नही, आज जब मै पिछे मुडकर देखता हुं तब यह सब कुछ बचकाना लगता है।

खैर मेरी बातों का एक कन्या का तत्काल ही कुछ ज्यादा ही असर हुआ। कन्या ज्यादा खूबसूरत वाली श्रेणी की थी। जब कक्षा खत्म हुयी, और मै अपने कंप्युटर पर अपना कार्य कर रहा था वह बाजु मे आ कर बैठ गयी। मुझे लगा कि उसे कोई तकनीकी शंका होगी। मैने पूछा
“कहो क्या बात है ?”
जवाब आया
“आपसे मुझे निजी बात करनी है”
मै मन मे
“कर लिया आ बैल मुझे मार वाली हालत, अब झेलो इन मोहतरमा को! “
मै प्रत्यक्ष मे
 ” हां कहो , क्या बात है ? हम आप की क्या मदद कर सकते है ?”
उसने एक लंबी कथा सूनायी जिसका सक्षेंप ये था कि वह एक महत्वाकांक्षी लडकी है। उसे अपनी जिंदगी मे कुछ बनना है। उसके घर मे उसके पिताजी उसे प्रोत्साहन देते है लेकिन उसका भाई हर चिज मे टांग अडाता है। उसकी मम्मी भी भाई का साथ देती है। उस लडकी का मेरे से ये अपेक्षा थी कि मै उसके लिये एक मार्गदर्शक, एक प्रोत्साहक की भूमिका निभाऊं।
अब मैने सोचा “अब बडी बडी बांते कर ली है, लम्बी लम्बी फेंक तो दी है, चलो प्रयास भी कर लेते है।”
मैने उसे कहा
“देखो, मै तुम्हे मार्गदर्शन तो दे सकता हुं, सलाह दे सकता हुं, लेकिन निर्णय तुम्हारा अपना होगा। रही बात तुम्हारे घर की और भाई की तुम्हे अपनी लडाई खुद लडनी होगी, मै तुम्हारे कैरीयर के लिये मै पूरी मदद करूंगा।”
उसने कहा, वह यह सब कर सकती है लेकिन उसे एक मानसीक रूप से संबल देने वाला चाहिये, जो उसकी नजरो मे मै था। मै मन मे
“लो कर लो बात ! खुद के कैरीयर का कोई ठौर ठिकाना नही , चले दुसरो का कैरीयर बनाने।”
धीरे धीरे नज़दीकियाँ बडी, उसके हर निर्णय मे मै सहभागी होने लगा था। बात यहां तक आ पहुंची थी कि वो अपने पिताजी की सलाह देने पर उसका जवाब होता था
“आपकी बात ठीक है लेकिन मै आशीष से पूछ्कर आपको बताती हुं।”

मैं खुद हैरान कोई भी व्यक्ती मुझ पर इतना निर्भर कैसे हो सकता है ? समय आगे बढ़ा, मै कालेज से निकला। मेरी घर के आर्थिक हालात बदतर हो गये थे, गुजारा सिर्फ ,मेरी ऎप्टेक की कमाई पर चल रहा था। मैने एक साहसिक निर्णय लिया और चल दिया दिल्ली । इरादा था कि 1-2 महिने नौकरी का प्रयास करो, मिल गयी तो ठीक वर्ना वापिस आ जाओ। जब घर के हालात ठीक हो जायें तब दुबारा प्रयास करेंगे। लेकिन मै किस्मत का धनी, दिल्ली मे मेरे कुछ मित्र थे मै उन्ही के साथ रहता था। अब रहने के लिये छत, खाना और पुस्तको की समस्या नही थी। मेरे एक मित्र प्रवीण पांडेय ने अपनी कंपनी मे मेरा परिचय दिया और मेरा साक्षात्कार का प्रबंध करा दिया। साक्षात्कार अच्छा रहा और मै चुन लिया गया। एक महिने पहले मै जहां 2000 रू महिना कमाता था, अब 15000 महिना कमा रहा था !

मेरे मित्रो ने मुझ पर जो अहसान किये थे, उसका बदला चुकाने का मेरे पास एक ही उपाय था। जैसा मेरे मित्रो ने मेरा करीयर बनाया वैसे तुम भी किसी और का कैरीयर बना दो, और मेरे पास उसका उम्मीदवार भी था।
मैने उसी दिशा मे कदम उठाये, सोचा कि इसे पहले आर्थिक रूप से स्वतंत्रता दिलायी जाये। उसका बी एस सी हो चुका था, एप्टेक का कोर्स भी खत्म हो गया था । मैने उसे उसी ऎप्टेक मे अपनी जगह नौकरी दिलवा दी। उसके बाद उसके आगे क्या करना चाहिये इसका पूरा रोडमैप बना दिया।

मै अब अपनी नयी जिन्दगी मे लग गया और उसे उसी तरह फोन और इमेल से सलाह देता रहा ! उसे जब भी जरूरत होती वो मुझे मेल कर देती थी।

लेकिन दोनो के आसंमा अलग अलग थे, दोनो की अपनी सोचो का एक अलग दायरा था। कुछ समय बाद मुझे लगा कि अब वह रोड्मैप से भटक रही है। मैने ये महसूस किया कि कोई उसकी जिंदगी मे काफ़ी करीब आ चुका है और उसकी मंजिल बदल चुकी है।
कुछ दिनो बाद जब मै उससे मिला तब उसने मुझसे बताया कि उसे अपने एक सहकर्मी  से प्रेम हो गया है।

मैने उससे कहा
“तो आगे क्या सोचा है?” 
जवाब था
“कुछ नही!”
मेरा जवाब था
“अपनी निजी लडाई तुम्हे खुद लडनी है, और जहां तक तुम्हारे कैरीयर का सवाल है मै सोचता हुं, मेरा रोल खत्म हो चुका है।”
और ये मेरी उससे आखीरी मुलाकात थी। उस लड़की ने अगले वर्ष उससे शादी कर ली, वह अपने परिवार मे व्यस्त है। अपने जीवन मे स्वतंत्र रहकर करियर बनाना अब उसकी प्राथमिकता मे नही था।

और मैने नये उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी, वो मुझे मिला भी। मेरा नया उम्मीदवार विप्रो मे काम कर रहा है। वह एक पिछड़े आदीवासी क्षेत्र से है, अपने पूरे खानदान मे पहला स्नातक।  लेकिन मेरे दोनो उम्मीदवार मे एक अंतर है, मेरा नया उम्मीदवार एक लडका है।

कभी कभी मै सोचता हुं, उस लडकी की जिन्दगी मे से मेरा अचानक बाहर आना उचित था या नही ? मैने उस लड़की से उसके सपनो को पूरा करने का जो वादा किया था, वो तो अधुरा ही रह गया ? ये मेरे मन की एक खीज भी हो सकती है क्योंकि मेरी मेहनत व्यर्थ गयी थी और मेरा अपना स्वार्थ भी तो था। मेरा अपना खुद का सपना किसी का गाडफादर बनने का जो टूट गया था !

कभी ये लगता है कि मेरा निर्णय उचित था क्योंकि मैने अपनी तरह से प्रयास पूरा किया था लेकिन उसका आसमां कुछ और था !

2 टिप्पणीयां 
1. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 16, 2005 at 1:34 am ·
बड़ा बढ़िया संस्मरण लिखा।

2. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 16, 2005 at 8:32 am ·
जैसे हर सफल पुरुष के पीछे एक अदद महिला का हाथ माना जाता है वैसे ही हर गाडफादर की सफलता में गाडमदर का भी योगदान होता होगा। उसकी खोज करो।

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अपने अपने आसमां - भाग १ : सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सोमवार, दिसंबर 12, 2005


आज सुबह सुबह मेलबाक्स खोला, एक चिठ्ठी आयी थी।एक पूराने मित्र ने पत्र लिखा था। पढ्कर एक खुश नुमा अहसास हुआ, थोडा अचरज भी। इमेल और इस मित्र से ? जहां तक कम्प्युटर के ज्ञान का प्रश्न है , मेरी जानकारी मे उसे नही था। खैर मैने उसके मेल के उत्तर मे उसे फोन किया। पता चला कि उसने हाल ही मे एक संस्थान मे कंप्युटर सीखना शुरू किया था और उसे इमेल करना सिखाया गया था।

खुशी इस बात की ज्यादा थी कि उसने अपनी जिंदगी का पहला इमेल मुझे किया था और दुःख इस बात का कि मैं शायद अब उसे लगभग भुल चुका था। काफी बाते हुयी, कुछ शिकवे हुये, कुछ शिकायते हुयी। पूराने मुर्दे उखाडे गये। बातो बातो मे मुझे कहीं लगा कि मेरा यह मित्र कही मेरे भाग्य से कहीं इर्ष्या का भाव रखता है। इर्ष्या मेरे भाग्य से , ना कि मेरे से। मै तो ऐसे भाग्य को नही मानता।खैर इस बात पर चर्चा फिर कभी।

पुरानी यादो मे खोना मेरी पूरानी आदत है, मै अपने बचपन मे खो गया। मुझे याद आने लगे अपनी प्राथमिक पाठशाला (कक्षा १ से कक्षा ७) तक के सहपाठी और साथ मे बिताया खट्टा मिठा बचपन। हम कुल जमा ४५-५० सहपाठी साथ पढते थे, जिसमे से शायद २० के आसपास लडकीयां थी, बाकी सारे लफंगे(हमारे मास्टरजी यही कहते थे)। एक ही आसमां के निचे हम साथ साथ खेले कुदे और एक ही छत के नीचे हम पढे। साथ साथ शरारते की, साथ साथ मास्टरजी से मार खायी। दोपहर का भोजन मिल बांट कर खाया, स्कूल के पीछे वाले अमरूदो के बाग से अमरूद तोडे और माली के आने पर उसे उल्लु बनाकर भाग खडे हुये। एक सा बचपन एक सी हरकते, सब कुछ साझा !

इतना सब कुछ सा होने के बाद भी आज हम लोग कितने जुदा है, कितने अलग है। मै यहा एक बहुराष्ट्रिय कम्पनी मे कंप्युटर का कुंजी पटल तोडकर ऐश कर रहा हुं और मेरे सहपाठी आज भी उसी ग्रामीण भारत मे रह रहे है, अधिकतर किसी तरह जीवन चला रहे है। खैर इतना तो संतोष है कि कोई बेरोजगार नही है। मेरा यह सहपाठी जिसका इमेल मुझे मिला था, वह एक औषधालय का मालिक है। वह एक अच्छे संपन्न परिवार से है, अध्ययन मे वह कक्षा मे दुसरे क्रमांक पर रहता था। (पहले क्रमांक पर मेरी बादशाहत थी)।

आगे बढने से पहले मै यह स्पष्ट कर दुं कि मेरा मेरे मित्र के पेशे से कोई दुर्भावना नही है, और ना ही मेरी उस मित्र को नीचा दिखाने की कोई इच्छा है।

आज मेरा वह दोस्त वह एक छोटे से औषधालय का मालिक है और मै एक कम्प्युटर अभियंता ! उसकी दुनिया घर से औषधालय और औषधालय से घर तक और मै सारे विश्व की सैर के साथ अपना काम करने वाला। मै अपने पेशे और भटकती जिन्दगी से पुर्णतया संतुष्ट और उसके मन मे इर्ष्या और अपुर्णता का भाव।
क्या अंतर था हम दोनो मे ? अवसर का अभाव ? नही। उच्च शिक्षा के लिये धन का अभाव ? नही, इस मामले मे तो वह मुझसे ज्यादा भाग्यशाली था। गावों मे औषधालय खोल कर सेवा की भावना ? नही,कदापि नही। मेरा यह मित्र इस पेशे मे पूरी तरह व्यवसायिक दृष्टीकोण रखता है।

हम दोनो मे एक ही अंतर था, दोनो के अपने अपने आसमाँ थे। दोनो की सोचो के अपने अपने क्षितीज थे। दोनो मे मन की उडान को अपना अपना दायरा था। बस यही एक अंतर ने आज हम दोनो को इतना अलग कर रखा है।

हम दोनो का बचपन एक साथ एक जैसे वातावरण मे बिताने के बाद भी दोनो की सोचो एक बुनियादी अंतर था, मै उंचे उंचे सपने देखता था और वह सोचता था कि किसी तरह एक ढंग का काम मिल जाये चाहे सरकारी नौकरी हो या कोई व्यवसाय। बचपन मे मैने तो कम्प्युटर अभियंता बनने की तो नही सोची थी लेकिन विमानचालक बनने की अवश्य सपने देखे थे और वह मेरे इन सपनो का मजाक उडाया करता था। वह कहता था
“ज्यादा उंचा मत उड , गिरेगा तो हड्डीया भी नही बचेंगी!”
लेकिन मै किसी और मिट्टी का बना हुआ था, बचपन मे कही पढा था

“नेपोलियन सिकंदर से स्पर्धा करता था, सिकंदर जुलीयस सीझर से, जुलियस सीझर हरक्युलिस से। और ये हरक्युलिस सिर्फ कहानियो मे ही हो सकता है”

मै सोचता था कि यदि आगे बढना है तो अपने से उंचे स्थान पर स्थित व्यक्ति को देखो, अपनी बराबरी से स्पर्धा से क्या मतलब। और वह कहता था कि
 “इंसान ने अपनी कद के अनुरूप उंचाई देखनी चाहिये।”

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है अपने अपने आसमां का। इस पर लिखने के लिये मेरे पास एक और बेहतरीन उदाहरण है वह अगले चिठ्ठे मे !

5 टिप्पणीयां » 
1. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 13, 2005 at 11:05 pm ·
ईष्या का कारण हमारे समझने के लिये छोड़ दिया?
2. Anoop BHargava उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 12:07 am ·
लेख अच्छा है लेकिन अंत में सफ़लता या असफ़लता का मापदंड तो यही होगा ना कि :
जब आप अकेले हों और अपनें आप से पूछें कि “मैं वास्तव में कितना खुश हूँ” ?
अगर आप दोनों के हालातों में अन्तर की बात कर रहे हैं , तब तक तो ठीक है लेकिन जहाँ तक ‘बेहतर’ या ‘अधिक खुश’ होनें की बात है , आप को अपनें ‘मित्र’ से पूछना चाहिये ।
महत्वकाँक्षा का न होना कोई गलत बात नहीं है जब तक आप सन्तुष्ट है और शिकायत न
करें ।
बस यूँ ही बैठे बैठे लिख दिया …।
3. kali उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 10:51 am ·
aur mujhse jo irshyabhav rakhte hain woh H1B per kaam karne wale computer wale jinko idhar udhar ghoomna padta hai, jabki main aaram se sabarbia main baith kar manager banta hun aise contractors per। Irshya mujhe hai mere mitron se jo apne ghar per, apne desh main santosh aur sampannata ka jivan bita rahe hain apne vyavsaya ya sarkari naukri main
4. pratyaksha उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 4:52 pm ·
खुशी एक मनस्थिति है। जरूरी नहीं कि सुख सुविधाओं से घिरे रहने में ही सुख मिल जाये।
शायद शुरुआत में ऐसा लगे लेकिन बाद में हम उन सुविधाओं के आदि हो जाते हैं और इस स्थिति पर पहुंचते ही उनका महत्त्व खत्म हो जाता है।और फिर उनसे मिलने वाला सुख भी।
वैसे भी सुख की परिभाषा अलग अलग लोगों में भिन्न हो सकती है।
प्रत्यक्षा

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अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?

शुक्रवार, दिसंबर 09, 2005


आदर्शवादी संस्कार सही या गलत इस पर विचार करने से पहले यह निश्चीत कर लिया जाये की, आदर्श की परिभाषा क्या हो ?

आदर्श परिवर्तनशील है। आदर्श भी सामाजिक मान्यताओ परंपराओ की तरह काल, व्यक्ति , परिस्थीती और समाज के अनुरूप बदलता रहता है। जो कल आदर्श था, आवश्यक नही कि वह आज आदर्श हो। आवश्यक नही कि जो किसी एक व्यक्ति के लिये आदर्श हो, दुसरे के लिये आदर्श हो।

पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्म्द गौरी को २१ बार क्षमा किया था, यह व्यव्हार पृथ्वीराज चौहान के लिये उस समय की मान्यताओ के लिये आदर्श हो सकता है। लेकिन क्या आज यह आदर्श हम पाकिस्तान के लिये रख सकते है ? हमने पृथ्वीराज चौहान का हश्र देखा है, क्या आदर्श इतिहास से सीख लेकर परिवर्तित नही होगा ? यह परिवर्तन नही है, यह आदर्श का विकास है।

महाभारत और रामायण भारतीय जिवन और समाज के लिये एक आदर्श माने जाते हैं। शुर्पनखा ने लक्षमण से प्रणय निवेदन किया था, जिसका प्रत्युत्तर लक्ष्मण ने उसके नाक कान काट कर दिया था। जबकी उस समाज का आदर्श यह था कि कामातुर स्त्री की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिये। अब इस घटना से क्या साबित होता है ? प्रणय निवेदन के प्रत्युत्तर मे नाक कान काट्ना ,यह ना तो उस समय आदर्श हो सकता है था ना आज हो सकता है।

जुआ खेलना यह एक सामाजिक बुराई है ! पर एक क्षत्रिय जुवे का निमंत्रण अस्वीकार नही कर सकता (महाभारत मे युद्धीष्ठीर द्वारा निमंत्रण स्वीकार करना)। अब इन दोनो मे आदर्श किसे माना जाये ?
महाभारत को धर्मयुद्ध कहा जाता है। अब धर्मयुद्ध मे तो आदर्शो का पालन होना चाहिये। लेकिन कौरव पक्ष के किसी भी महारथी का वध जिस तरीके से किया गया , क्या वह आदर्श हो सकता है ? चाहे भिष्म हो जिनके लिये शिखंडी को सामने रख दिया गया, यहां तो भिष्म पितामह अपने आदर्श का शिकार हो गये। द्रोणाचार्य के लिये धर्मराज ने असत्य(कथीत अर्धसत्य) कहा, धर्मराज अपने आदर्श से डिग गये। कर्ण को निशस्त्र मारा गया जबकि क्षत्रिय निहत्थे पर शस्त्र नही उठाता, दुर्योधन को युध्द नियमो के विरूद्ध जांघ पर वार किया गया ! कहां गये पांडवो के आदर्श जो भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन मे लढ रहे थे? यहां पर परिस्थितियों के अनुकुल आदर्शो को ढाल दिया गया। कहने का तात्पर्य यही है कि जो जीवन मूल्य काल और परिस्थीतीयो के अनुसार ढल सके वही आदर्श है।

मर्यादा पुरूषोत्तम राम मर्यादा पुरूषोत्तम द्वारा एक धोबी द्वारा लाछंन लगाने पर पत्नी को वनवास देना आदर्श है ? क्या सीता की अग्नी परिक्षा एक आदर्श है ? शुद्र द्वारा तपस्या पर उसका वध एक आदर्श है ? ये सब तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम का व्यवहार है !

बहुत हो गयी पौराणीक बाते, कुछ आज की बात कर ली जाये। आदर्श वादी संस्कार और जीवन मुल्यो को आज के परिपेक्ष मे देखें। आप कोई भी कार्य कर रहे हो और बाद मे आपको ग्लानी हो उस कार्य पर ! यह आप के मन पर आपके आदर्शो का संस्कार है, आपका आदर्श है। आपके लिये आदर्श वह है जिसको ना मानने पर जिस पर आपकी अंतरात्मा आपको धिक्कारे और आपको ग्लानी हो। लेकिन कोई जरूरी नही वह किसी और के लिये या किसी और परिस्थिति मे लागु हो।।

आदर्श किसी भी व्यक्ती के लिये एक जीवन मुल्य होता है और वह उन जीवन मुल्यो के लिये जीता है। किसी भी संस्कृति में अनेक आदर्श रहते हैं, लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी आदर्श को अपना लक्ष्य बनाता है तो उसे अन्य आदर्शों का परित्याग करना पड़ सकता है। आदर्श मूल्य है, और मूल्यों का मुख्य संवाहक संस्कृति होती है । किसी संस्कृति में परस्पर व्याघाती मूल्यों की उपस्थिति उसकी जीवन्तता का प्रतीक है ।

1 टिप्पणी » 
1। इस्वामी उवाच :
दिसम्बर 9, 2005 at 10:45 pm ·
आशीष,
मैने तो आपके पहले लेख से ले कर आपका चिट्ठा पढा है। आपके लेखन की धार हर लेख के साथ तेज हो रही है - बहुत सुँदर लिखा है। बधाई!

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बदलते रिश्ते

मंगलवार, दिसंबर 06, 2005


हाल ही मे मै इंद्रजाल पर लोकमत(विदर्भ का लोकप्रिय मराठी दैनिक) पढ रहा था। एक समाचार पर अनायास नजर गयी। समाचार यो तो आपराधिक था जो मै सामान्यातः नही पढता लेकिन मेरे गांव के पडोस से संबधीत था। सोचा पढ लिया जाये। समाचार था “एक भाई के परिवार द्वारा दुसरे भाई के परिवार पर कातिलाना हमला!
जब मैने समाचार पढा , मै हैरान रह गया। मै इस परिवार को अच्छी तरह से जानता हुं। मैने सपने मे भी नही सोचा था कि इस परिवार मे ऐसा हो सकता है। लेकिन सत्य मेरे सामने था।

मै यादो मे खो गया। यह परिवार था मेरे हाई स्कुल के हिन्दी शिक्षक का। वे मेरे पापा के ही स्कुल मे कार्यरत थे। वह स्कुल एक गांव मे ही स्थित था, गांव की परंपरा कहें या भारतीय परंपरा पूरा स्कुल भी एक परिवार था, जिससे हम लोगो के भी उनसे पारिवारिक रिश्ते बन गये थे। दोनो परिवारो के बीच आना जाना लगा रहता था।
ऐसे तो वे जमींदार घराने से थे, जमींदारी चली गयी थी लेकिन जंमीदारी ठाट कायम थे। उनका घर एक पूरानी हवेली था, जो जिर्ण शीर्ण हालत मे थी। उसकी दिवारो पर जगह जगह शिकार किये पशुऒ के सर और खाल लटकती रहती थी। उसके साथ ही दिवारो पर तलवारे, भाले और बंदुके भी शान से सजायी हुयी थी। रस्सी जल गयी थी लेकिन ऐंठ नही गयी थी।

मेरे हिन्दी शिक्षक और उनसे छोटे भाई दोनो शिक्षक थे। अच्छा खासा बडा परिवार था। बडे भाई के ७ लड़कियाँ और दो लडके तथा छोटे भाई के ५ लडके थे। पूराने जमींदार थे, परिवार नियोजन के विरोधी !
दोनो भाईयो के बीच मे जो समझ और भाईचारा थी ,वह एक मिसाल था। दोनो हर काम एक दुसरे से पूछ कर ही करते थे। सुबह साथ मे स्कुल आते और साथ मे जाते थे। रविवार को भी यदि कहीं जाना हो तो भी ज्यादातर साथ मे जाते थे। यदि एक भाई कहीं दिख गया तो दुसरे को पूछने की जरूरत नही वो कही आसपास ही होगा।

जब उन मेसे एक भी मेरे घर आता तब भी पापा दोनो के लिये नाश्ता चाय बनवाते थे क्योंकि कुछ ही देर मे दूसरा पहुंच जाता था। दोनो भाई एक सामान्य हिन्दी शिक्षक की तरह काफी बातुनी थे। जब भी वह किसी भी विषय पर बोलना शुरू करेंगे, पूरे अंलकार, मुहावरे, दोहे का उद्धरण देते हुये कहेंगे। किसी के पास कितना भी जरूरी काम हो, वह सब कुछ भुल कर उन की बाते सुनता था। मेरे पापा एक अपवाद थे, उनके पास बचने का एक तरीका था, वे मम्मी को उनसे बात करने लगा कर खुद खिसक लेते थे। एसे भी एक गणित शिक्षक और हिन्दी शिक्षक मे बाते करने के लिये विषय कम होते है !

यो तो दोनो भाईयो का परिवार साथ मे एक छत के निचे रहता था, लेकिन खाना अलग अलग पकता था। देवरानी और जेठानी के मनमुटाव के कारण। लेकिन दोनो भाई जब खाना खायेंगे साथ मे ही। जहां खाना पहले पक गया वहां पर। ऐसा दोनो परिवारो के बच्चो मे भी था। चुल्हे भले ही दो थे,लेकिन दिल एक ही था। किसी भी भाई ने कभी कोई भी चिज खरीदी तो कभी एक परिवार के लिये नही खरीदी, हमेशा दोनो परिवार के लिये खरीदी। बच्चो की पढायी लिखाई के लिये भी वही पैमाना, कोई भेदभाव नही, जिसके पास पैसा हो वो दे देगा, कोई हिसाब किताब नही। कुल मिलाकर एक आदर्श परिवार था।

जब मै आखरी बार उनसे मिला तब दोनो भाई सेवानिवृत हो चुके थे। मैने उनसे काफी देर तक बाते की। दोनो मे वही पूरानी जिन्दादिली थी, वही अलंकारीत भाषा। लेकिन मैने उन भाईयो मे थोडी तल्खी भी पायी लेकिन एक दुसरे से नही शासन व्यवस्था से और समाज से। उनका कहना था, सारी जिन्दगी अध्यापन करने के बाद अचानक कोई व्यक्ति एक ही दिन मे कार्य से मुक्त हो कर आधे वेतन मे कैसे गुजारा कर सकता है। मै उन की स्थिती जानता था, परिवार अब काफी बडा हो गया था। आधी जमींदारी शान लडकियो की शादी मे जा चुकी थी , लेकिन कुछ लडकियां अभी भी बिनब्याही बची थी। कुछ बेटो की शादी हो चुकी थी और बच्चो वाले थे। लेकिन आय उस अनुपात मे नही बढी थी। नयी पिढी मे २-३ बेटो नौकरी कर रहे थे, लेकिन अपनी जिन्दगी मे मस्त। घर का जिम्मा दोनो बुढो पर था।

जब मैने इस परिवार मे “एक भाई के परिवार द्वारा दुसरे भाई के परिवार पर कातिलाना हमला! “ की खबर पढी तो सन्न रह गया। मेरी समझ मे नही आया ये क्या हो गया। खैर मैने मामले की तहकिकात करने की सोची।

भाई को फोन किया और जब उसे सब कुछ बताया तो वो भी चकित ! मम्मी ने मानने से ईंकार कर दिया। भाई ने कहा मै उनके घर जाकर देखता हुं क्या मामला है ?

दूसरे दिन भाई ने फोन पर बताया कि ये दोनो भाईयो के बिच का संघर्ष नही है, पीढ़ियों का संघर्ष है। जब दोनो भाई सेवानिवृत्त हो गये और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था, तब दोनो भाईयो ने साथ बैठकर अगली पीढ़ी पर जिम्मेदारी सौपने का निर्णय लिया था। लेकिन अगली पीढ़ी ने मानने से मना कर दिया। चचेरे भाइयों मे मनमुटाव हुआ और संघर्ष हुआ था। दोनो भाई असहाय से देखते रहे थे। और उस गैर जिम्मेदार पत्रकार ने खबर मे सनसनी डालने के चक्कर मे निरपराध और असहाय बुढे शिक्षको को भी लपेट दिया था!

लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है । जब दो भाई पूरी जिन्दगी बिना किसी परेशानी के साथ रह सकते है, दो अच्छे खासे बडे परिवारो का भरन पोषण कर सकते है, अच्छी शिक्षा दे सकते है, नयी उच्च शिक्षीत पीढ़ी क्यो नही कर सकती ?

क्या अब खून के रिश्तों का मुल्य नही रहा ?
क्या आम जीवन से भारतिय जिवन मुल्यो का ह्रास हो चुका है ?

1 टिप्पणी » 
1. इस्वामी उवाच :
दिसम्बर 8, 2005 at 5:28 am ·
मुझे लगता है की रिश्ते निभते हैं रिश्तों के सम्मान का भाव या उन को लेकर किसी भावनात्मक जुडाव के होने पर। अगर भाई या चचेरे भाई उस सम्मान के भाव को खो चुके हैं या भावनाएँ नही रहीं तो क्या सत्तु-सप्रेटा और क्या अंबानी-बिरला-टाटा कोई भी नही निभाता यार और निभाने वाले मूह बोले रिश्ते निभा रहे हैं। फिर ये आज की बात नही है इस मेलोड्रामे पर तो रामायण और महाभारत टिकी है - आज भी घर घर खेली जा रही है!

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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