आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान

मंगलवार, फ़रवरी 28, 2006


हाल ही मे मै स्टीफन हाकिंस की “ए ब्रीफ हिस्ट्री आफ टाइम” पढ रहा था। ये पुस्तक मै इसके पहले भी कई बार पढ चुका हूं, लेकिन कुछ दिनो बाद फिर से पढने की इच्छा हो जाती है। मुझे ऐसे भी भौतिकी बचपन से पसंद रहा है, जैसे जैसे आगे पढता गया , इस विषय मे रूची बढती गयी। लेकिन इस पर अढंगा तब लगा जब मैने संगणक विज्ञान लेकर अभियांत्रिकी मे प्रवेश लिया।

वैसे संगणक विज्ञान के पाठयक्रम मे भी भौतिकी के काफी सारे विषय थे, जैसे प्रकाश विज्ञान(ओप्टीकस),क्वांटम मेकेनिक्स, विद्युत और चुंबकिय क्षेत्र(इलेक्ट्रिक एण्ड मैगनेटीक फिल्ड) वगैरह। लेकिन अंतर यह था कि ये सभी विषय अनुप्रयोग(एप्लाईड) थे ना कि सैधांतिक (थ्योराटिकल)। और जो चिजे छुट गयी थी वे थी, कास्मोलाजी, खगोल विज्ञान (आस्ट्रोनामी), अणु-परमाणु सरंचना(पार्टीकल फिजीक्स), पदार्थ के गुण(प्रोपेर्टीस आफ मैटर)। ये सभी छुटे हुये विषय हमेशा चुनौती देते लगते रहे है। जब भी समय मिलता है मै इस पर सामग्री ढुंढ कर पढता रहता हूं। इस विषय पर विस्तार से फिर कभी।

इस पूस्तक मे भगवान(गाड/सुपर नैचुरल पावर) का जिक्र कई बार आया है। इस पुस्तक के मे जहां कुछ जगह भगवान के आस्तिव पर प्रश्नचिन्ह उठाये गये है, वही कुछ जगह अनसुलझे रहस्यो के लिये भगवान का सहारा भी लिया गया है।
हाकिंस कहते है
“बिना भगवान के सिद्धांत के ब्रम्हांड के आरंभ के बारे चर्चा करना मुश्किल है। मेरा ब्रम्हांड के आरंभ पर किया गया शोध कार्य विज्ञान और धर्म की सीमा पर है, लेकिन मै विज्ञान की तरफ रहने का प्रयास करता रहा हूं। यह संभव है कि भगवान के कार्यकलाप विज्ञान के नियमो मे बाण्धे नही जा सकते, लेकिन इस विषय मे हमे अपनी व्यक्तिगत विश्वास को मानना चाहिये।”
लेकिन यह कुछ ऐसा नही लगता कि जब मानव मस्तिष्क कीसी भी सिद्धांत या घटना के रहस्य को नही समझ पाता तब वह धर्म , चमत्कार और भगवान के नाम का सहारा लेता है।
कुछ् ऐसा ही हाकिसं इन पक्तियो मे कहने की कोशीश कर रहे है।
“यदि सिर्फ एक ही एकिकृत सिद्धांत(क्वांटम भौतीकी और गुरूत्वाकर्षन सिद्धांत का एकीकरण) है, पर वह एक नियमो और समीकरणो का समुच्च्य है। लेकिन वह क्या है जो समीकरणो को जिवन देता है और एक ब्रम्हांड को व्याख्या के प्रस्तुत करता है ? “
भगवान और भौतिकी के नियमो के रिश्तो से तो आइंस्टाइन भी नही बच पाये थे। जब उन्हे “थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी” हजम नही हो पायी थी तब उन्होने कहा था ” भगवान पांसे नही खेलता”(God doesn’t play dice)"। ये बात और है कि उन्हे नोबेल पुरस्कार भी इसी क्षेत्र( क्वांटम मेकेनिक्स का मूल थ्योरी आफ अनसर्टीनीटी है) मे किये गये कार्य के लिये मिला था।

हाकिंस के मन की एक दुविधा का वर्णन करती यह पंक्ति
“जब से ब्रम्हांड आ आरंभ हुआ है,हम उसके निर्माता की कल्पना कर सकते है। लेकिन यदि ब्रम्हांड स्वयंमनिर्मित हो, जिसकी कोइ सीमा नाहो, उसका आरंभ और अंत नही हो तब भगवान के लिये जगह कहां होगी ?”
यह पूस्तक खत्म होती है इस वाक्य से
“यदि हम एक पूर्ण सिद्धांत(ग्रैण्ड युनिफाइड थ्योरी) की खोज कर पाये तब हम भगवान के मन को समझ पायेंगे।”
ब्रम्हांड की रचना के लिये महाविस्फोट (बीग बैंग) का सिद्धांत सर्वमान्य है। इस के अनुसार ब्रम्हाण्ड की उतपत्ती एक बिन्दु के महाविस्फोट से हुयी। समय की शूरूवात भी इसी समय से हुयी थी। जब कहीं भी कुछ भी नही था तब समय कैसे हो सकता है ? जब कुछ नही था तब क्या था ? भगवान कहां थे ? ऐसा क्या था कि भगवान ने ब्रम्हाण्ड को बनाया ? या ऐसा क्या हुवा जिससे ब्रम्हांड बना ? और भगवान को किसने बनाया ?
मै आस्तिक हूं या नास्तिक नही जानता। लेकिन पूजा, अर्चना, आरती जैसी चिजो से दूर ही रहता हूं। मै खुद हो कर मन्दीर भी नही जाता, यदि जाता हूं तो पर्यटन के उद्देश्य से या किसी ने साथ चलने कह दिया तो उसके साथ हो लेता हूं।
शाम को जब मै अपना पर्स जब भगवान की मुर्ती के सामने फेंक देता हू, तब अन्ना हमेशा टोकता है
“दादा भगवान के सामने चमडे की चिज मत रखो”। 
मेरा जवाब होता है
“मत पी गालीब शराब मस्जीद मे बैठकर,
तो मुझे वह जगह बता दे जहां ख़ुदा ना हो।”
सूबह जब मै सो कर उठता हूं तब मै भजन नही सुनता जो भी गाने की सीडी सामने मिल जाये बजाता हू। अन्ना नहा धोकर जब आता है और भगवान की मूर्ति से सामने प्रार्थना करता है, सबसे पहले वो संगीत को धीमा करता है। तब मेरी प्रतिक्रिया होती है,
"तेरा भगवान बहरा हो गया है क्या ? तेरे भगवान के पास आज भी पुरानी टेक्नालाजी है जो वायरलेस के जमाने मे भी तुझे प्रार्थना करनी पड रही है।"
जब मन्दीर मे घडियाल बजते है यहां मस्जिद मे अजान होती है तब मेरी प्रतिक्रिया यही होती है
“भगवान तो मन्दिर के पहले घंटे की आवाज सुन कर ही भाग खडे होते है।”
क्या भगवान का आस्तिव है ? यदि है तो क्यो इतनी असमानता है ? भगवान ने तो समानतावादी होना चाहिये ना !


2 टिप्पणीयां “आस्तिकता / नास्तिकता बनाम विज्ञान” पर
भई, भगवान है कि नहीं, यह तो एक अंतहीन विवाद का मुद्दा है। मानने वाले मानते हैं, नहीं मानने वाले नहीं मानते(जैसे मैं नहीं मानता)। रही बात समानता की, तो अब यदि एक सच्चे भक्त की दृष्टि से देखा जाए तो वह यही कहेगा कि असमानता ईश्वर में नहीं वरन् मनुष्य में है। उसने तो मात्र मनुष्य को बनाया, धर्म इत्यादि मनुष्य ने बना डाले। अब अकबर को ही ले लो(हाँ भई, मुग़लेआज़म अकबर)। उसने अपना एक नया धर्म दीन-ऐ-ईलाही शुरू कर दिया था, पर वह उसके मरने के बाद ही समाप्त हो गया, भई हिन्दु धर्म और इस्लाम आदि जैसे बड़े धर्मों के साथ कैसे कम्पीट कर सकता था!!
तो मूल सत्य यही है, कि धर्म मनुष्य ने बनाए, अब यदि मनुष्य स्वयं समान नहीं है तो धर्म कैसे समान हो सकते हैं क्योंकि हर धर्म उसके बनाने वाले की विचारधारा आदि का प्रतिबिम्ब है।
Amit द्वारा दिनांक मार्च 1st, 2006

Kaafi achchha post hai. Visay ke upar ant-hin (endless) bahas ho sakti hai. Waise main na dharm na bhautiki kaa koi bade jaankaar hone ka daavaa nahin karunga. Lekin main aapko Swami Vivekanand ke Sanatan dharm (jo aaj hindu dharm se parichit hai) ke utpati par likhe koi bhi achche kitab ko padhne ka salah dunga. Jahan tak brahmand ke utpati kas sawaal hai, mujhe to Stephen Hawkins aur Vivekanand ke vicharaon main kayi saari samaanataayen nazar aati hain. Khas kar is baat ka ki shristi ka na koi aadi hai aur naa ant - bas shristi sankuchit (shrinking) and vistrit (expand or explode) hoti rahati hai. Aur ek baar dohra doon ki ye mere vichaar hai - meri samajh bilkul galat bhi ko sakati hai
Raag द्वारा दिनांक मार्च 2nd, 2006

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वेलेंटाईन डे और हम

मंगलवार, फ़रवरी 14, 2006


आज सुबह देर से उठा, ७:३० के करीब। अपने कमरे से बाहर आया, देखा हमेशा सुबह रोनी सूरत बनाये रखने वाला अन्ना गुनगुना रहा था और मेरा डिब्बा(CD Player) बज रहा था। मै चकराया ये क्या हो रहा है। सुबह सुबह गाने तो मै सूनता हुं, ये आज डिब्बा किसने शुरू कर दिया ?

मेरे कमरे की दिनचर्या कुछ ऐसी है, सबसे पहले मै उठ जाता हुं, नहा धो कर तैयार होने के बाद डिब्बा चालु करता हुं। आवाज इतनी तेज होती है कि नन्दी और अन्ना दोनो भुनभुनाते हुये उठ जाते हैं। किसी दिन मै देर से जागा तो बाकि दोनो भी देर से ही जागते है। लेकिन आज ये क्या …।

मैने अन्ना को आवाज लगायी
” क्या हुवा बे, इतनी जल्दी कैसे उठ गया, और डिब्बा भी चालू कर दिया ?”
” दादा आज १४ फरवरी है ना !?”
” तो इसमे क्या है कल १३ फरवरी थी कल १५ फरवरी होगी।”
” दादा, इसलिये आपको पिछले २९ साल मे कोई नही मिली।”
” क्यो सुबह सुबह पिटने के काम कर रहा है, सीधे सीधे बोल चक्कर क्या है ?”
” दादा सुबह सुबह सूमन का फोन आया था।” 
सूमन अन्ना की मंगेतर है।
” तो इसमे नया क्या है ?”
” दादा आज वेलेन्टाइन डे है ना!”
हमारा ट्युबलाईट जला। इतने मे नन्दी अपनी आंखे मलता हुआ आया। मुझे रात के कपडो मे देखा और अन्ना को तैयार देखा। उसको दिल का दौरा पडते पडते बचा।
नन्दी महाराज बोले
“आज सूरज पश्चिम से उगा क्या ?”
” अरे नही यार,आज सूमन ने इसे सूबह फोन कर वेलेण्टाईन डे की बधाई दे दी इसलिये ये नमूना इतना उछल रहा है।”
नन्दी महाराज के जख्म हरे हो गये। उनका एकतरफा प्रेम कुछ दिनो पहले चकनाचूर हो गया था।
नन्दी महाराज दहाडे
” अन्ना, साले अंगरेज, तूझे शरम नही आ रही है”
मै और अन्ना दोनो चकराये इसे अचानक क्या हो गया।
अन्ना बोला
 “अबे क्या हो गया तुझे सूबह सूबह ?”
नन्दी :
“तु साले पश्चिमी संस्कृति का पालन कर रहा है, वेलेंटाइन डे मना रहा है, तुझे शर्म आना चाहिये। तेरे जैसे लोगो के कारण हमारी संस्कृति पतन के रास्ते जा रही है।जब तक तेरे जैसे पश्चिमी गुलाम रहेंगे देश का भला नही हो सकता।”

मुझे याद था कि ये नन्दी खुद कुछ दिनो पहले तक वेलेन्टाईन डे के दिन एक कन्या को प्रेम प्रस्ताव देने की योजना बना रहा था। लेकिन जब वो कन्या उनके हाथ से निकल गयी नन्दी महाशय आडवाणी की तरह बदल गये थे। अपने बयानो से ठीक वैसे पल्टी मारी थी जैसे आडवाणी ने जिन्ना को धर्मनिरपेक्ष करार दिया था।

नन्दी महाराज मेरी तरफ मुडकर बोले
“आप बोलो मै गलत कह रहा हूं तो ?”

मैने बर्र के छत्ते को छेडना उचित नही समझा। वैसे भी अन्ना का समर्थन करने का कोई मतलब था नही। ऐसे भी चेन्नई मे हमारी कोई ऐसी कन्या थी नही कि हम वेलेण्टाईन डे मनाते। हम भी बजरंगदल मे शामिल हो गये। मेरा अनुभव रहा है कि बजरंग दल और शिवसेना के नाम इस दिन हुडदंग मचाने वाले वो कालेजवीर होते है जिन्हे कोई कन्या भाव नही देती।
संत श्री १००८ श्री आशीष कुमार जी महाराज उवाच ;
“वेलेण्टाईन डे हमारी संस्कृती नही है। ये भारतीय संस्कृति पर पाश्चात्य प्रभाव है। प्रेम की अभिव्यक्ति के लिये हमारा अपना वसंत उत्सव है, मदनोत्सव है। हमे अपने त्योहार मनाना चाहिये ना कि पश्चिमी।”
” आप तो तोगडिया की भाषा बोल रहे हो, आपका बस चले तो आप महिलाओ को परदे के पिछे बंद कर दे!”
” जी नही हम तोगडिया की भाषा नही कह रहे हैं। भारतिय संस्कृती ने प्रेम का विरोध कभी नही कीया। श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम तो विवाह बाह्य प्रेम था, लेकिन समाज उसे सम्मान से देखता है। भारतीय संस्कृती मे तो गंधर्व विवाह एक मान्यता प्राप्त विवाह पध्दति है। मदनोत्सव कुछ और नही वेलेंटाईन डे है। मदनोत्सव का प्रारम्भ पौराणिक काल में हुआ था । उसे कामसूत्र में ‘सुवसंतक’ कहा गया है । मूल रुप में यह ॠतु का उत्सव ‘ॠतूत्सव’ था, जो वसन्त ॠतु के आगमन पर होता था । ॠतु की अगवानी में पुरुष और स्त्रियाँ गीत-नृत्य करते थे । पुराणों ने ‘काम’ की पूजा को महत्त्व दिया, अतएव यह ‘मदनोत्सव’ हो गया । घर में ‘काम’ की पूजा आम के और टेसू के फूल से की जाती थी और बाहर आयु, रंग एवलं जाति के भेद-भाव को भुलाकर एक-दूसरे से प्रेम दर्शाते और मिलते-जुलते थे ।”
नन्दी महाराज उवाच
” इ़सका मतलब तो ये हुवा कि वेलेण्टाइन डे को प्रेम प्रस्ताव ना दे कर मदनोत्सव को देना चाहिये। लेकिन ये तो गलत है, अश्लिलता का प्रदर्शन है।”
“प्रेम की स्वस्थ अभिव्यक्ति गलत नही हो सकती। समाज मे हम जितनी वर्जनाये रखेंगे, उल्लघंन उतना ज्यादा होगा। भारतिय संस्कृती मे धर्म और काम को समान माना गया है। खजुराहो और कोणार्क इसका उदाहरण है। हमारे यहां तो गणिका को भी समाज मे सम्मान्जनक स्थान दिया गया है, आम्रपाली इसका उदाहरण है”
” आप वेलेंटाईन डे का विरोध करते है या समर्थन ?”
“मै वेलेन्टाईन डे का विरोध नही करता हूं, लेकिन मै वेलेन्टाईन डे मदनोत्सव के मुल्य पर नही चाहता। मै तो १ जनवरी को नया साल भी नही मनाना चाहता, मेरा नया साल तो १ चैत्र से शूरू होता है। मै किसी पाश्चात्य परंपरा और त्योहार का विरोध नही करता बशर्ते वह भारतिय परंपरा और संस्कृती की किमत पर न हो”

2 टिप्पणीयां “वेलेंटाईन डे और हम” पर
ड्यूड,
यह सब कमाने-खाने का धंधा है और कुछ नहीं। हम में से कितने लोग यह जानते हैं कि सन्त वैलेंटाइन कौन थे और यह दिन क्यों मनाया जाता है? पर अधिकतर यही जानते हैं कि आज के दिन उपहार, फूल इत्यादि दिये जाते हैं। तो अन्त में यह डे किसका हुआ - हॉलमार्क या आर्चीज़ गैलरीज़ का  
और आशीष भाई, कार्यालय दूर हुआ तो क्या हुआ, बाइक के और भी कई उपयोग हैं - वैलेंटाइन डे पर मोटरबाइक पर तो पीछे बिठा कर सब घुमाते हैं, आप आगे बिठा के घुमा सकते हो…
निशांत
निशांत द्वारा दिनांक फरवरी 14th, 2006

अपने प्रेम को एक दिन के लिये मत रख बालक।साल भर प्रेमगीत गा।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक फरवरी 16th, 2006

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एक अधूरी प्रेमगाथा

शुक्रवार, फ़रवरी 10, 2006

वह अपने अपार्टमेंट की बालकनी मे अकेले खडा़ तारों को घूर रहा था। संजय पीछे कब आया उसे पता ही नही चला।
संजय : "यहाँ अकेले क्या कर रहा है, तु ठीक तो है ना ?"
वह : "सितारों मे अपनी महबूबा ढूंढ रहा हूं! कोई पसंद ही नही आ रही!"
 "बातें मत बना, दो दिन से तु उखड़ा-उखड़ा है, सब दिखता है , तु कितने भी ठहाके लगा ले, तेरी आंखे चुगली कर देती है कि तु परेशान है। क्या हुआ बे?"
"अबे रूम मे इतने सारे दुःखी आत्मा पहले से है, देवदास, पंडित और कमलेश पहले से इश्क के मारे है, मुझे उन लोगो मे क्यो शामिल कर रहा है?"
 "ठीक है मत बता! आज रविवार है, घर फोन किया होगा ही, और बता तेरी ’वो’ कैसी है?"
वह मुस्कराते हुये: "आज उसकी शादी है!"
संजय झल्लाया "हर बात मे मजाक मत किया कर, बता कब उससे शादी की बात कर रहा है!"
"तुझे नही मानना है, मत मान लेकिन सच यही है कि आज उसकी शादी है।"
संजय : "क्या ? अबे कमीने, तुने कुछ बताया नही! कब हुआ ये सब ?"
वह : "मै क्या बताता? उसके माता पिता ने शादी तय कर दी और आज उसकी शादी है! बस! इसमे नया क्या है? हर लड़की की शादी होती है, उसकी भी हो गयी!"
"तुझे बुरा नही लग रहा है?"
"किस बात का बुरा ? यार जब उसे पाने का प्रयास ही नही किया तो बुरा किस बात का! बूरा तो तब लगता ना जब प्रयास करते और असफलता हाथ लगती!"
संजय : "तु नही सुधरेगा! ज्ञान बांटना शुरू! अबे मै देवदास, पंडित या कमलेश नही हूं! खैर तुझे कब पता चला कि उसकी शादी तय हो गयी है।"
वह : "सुनेगा तो बताता हूं! लेकिन किसी के सामने उगला तो तेरा सर और मेरा 9 नंबर का जूता!"
===1====
वह जा रहा था उससे मिलने । तीन साल, हां पूरे तीन साल बाद । एक उमंग थी, एक उत्सुकता थी । सोच रहा था "कैसी होगी वो ?” वही दुबली-पतली होगी या मोटी हो गयी होगी ?" खिड़की से बाहर पेड़ , बिजली, फोन के खम्भे पीछे भागे जा रहे थे। उसका मन भी पीछे भागा जा रहा था- अपने बचपन मे।
उसका बचपन बीता था,एक छोटे से गांव मे। शहरी चकाचौंध और आधुकनिकता से कोसो दूर। यही कोई 30-40 परिवार। कुल मिला कर 300-400 लोगो की जनसंख्या। शिक्षा की रोशनी तो पहुंच गयी थी, लेकिन अंधविश्वास और सामाजिक कुरीतियां कायम थी। कोई बीमार हो जाये तो उपचार के लिये पहले झाड्फूंक होती थी, फिर झोलाछाप, नीम हकीम डाक्टर का इलाज। इन दोनों के बावजूद भी यदि कोई बच जाये तो शहर के अस्पताल पहुंचा देते थे। 
गांव में एक स्कूल ही था जो सातवीं तक था। आगे दसवीं तक पढने के लिये बाज़ू के  गांव मे हाईस्कूल में जाना होता था।गांव को शहर से जोड़ने के लिये पक्की सडक ज़रूर बन गयी थी, लेकिन बिजली पानी की समस्या अपनी जगह थी।
 ऐसे गांव मे रहने आया था उसका परिवार, अपनी जडो और वातावरण से कोसों दूर। पिताजी शिक्षक थे, जो नौकरी के साथ भटकते हुये सूदूर बुंदेलखंड से यहां विदर्भ (महाराष्ट्र) के इस पिछडे हुये क्षेत्र मे आ पहुंचे थे।
 गांव ने पूरा स्वागत किया था इस परिवार का। सम्मान और श्रद्धा जो भारतीय समाज  एक शिक्षक को  देता है, वह भरपूर मिला। गांव की पंचायत हो , हनुमान मंदिर मे होने वाला उत्सव  या चौपाल मे होनेवाली नौटंकी, हर चीज मे भाग लेने के लिये गांव वाले न केवल न्योता देते, बल्कि खुद लिवा ले जाते। कोई सलाह लेनी हो, कोई बीमार हो या शिक्षा हो, हर बात मे उसके पिता की सलाह ली जाती थी। उसके पिताजी अब मास्टर साहब थे और मम्मी मास्टरनी जी। फिर भी   एक अकेलापन, एक सूनापन कचोटता था। सूनापन दूर होने का अपनी जडो से, अपने लोगो से और अपने नाते रिस्तेदारो से, जिनसे भाषा, त्योहारों और रीति- रिवाजों  का साझा था। नाते रिश्तेदार दूर हो गये थे। रिश्तेदारो का आना जाना भी काफी कम हो गया था। बच्चे मामा,चाचा ताऊ और बुवा जैसे रिश्तों को भूल रहे थे ।
 ब्रेको की चरमराहट से वह वापस वर्तमान मे आया। बस रूक गयी थी और यात्री नीचे उतर रहे थे। वह सोच मे पड गया "ये कहां रूक गयी बस ? अभी तो आमगांव भी नही आया।". वह भी भुनभुनाता हुआ नीचे उतरा। पता चला बस का पहिया पंक्चर हो गया था। अभी भी आमगांव आधे घण्टे का रास्ता था। उसे तो आमगांव से आगे और २० की.मी. जाना था...।
वह सडक के किनारे एक पत्थर पर बैठ गया। दिन के बारह बज रहे थे, सूरज सर पर सवार था। सडक के दोनो किनारे खेत थे। यही फरवरी का महिना था -वसंत का। पलाश के फूल तो नही आये थे लेकिन कलियां ज़रूर आ गयी थी। कहीं-कहीं इक्का-दुक्का फूल भी दिखायी पड जाते थे। खेतो मे गेहूं की और कहीं -कहीं चने की फसल दिखायी दे रही थी। कुछ भी तो नही बदला था ।सब कुछ तो वही था। वही खेत वही वसंत और वही चने -गेहूं की फसल। वही पक्षी उड़ाते किसान।  वही मस्ती मे गाते हुये चरवाहे। क्या वह भी वैसी ही होगी , जैसे तीन साल पहले थी ? क्या वह भी उसे याद करती होगी ? उसे कैसा लगेगा जब वह अचानक उसके सामने खड़ा हो जायेगा ? वह तो शायद खुशी से पागल हो जायेगी! पूरे घर को सर पर उठा लेगी।

कंडक्टर ने सीटी बजायी। बस का पहिया ठीक हो गया था। यात्री अपनी-अपनी सीट पर जा रहे थे। वह भी वापस अपनी सीट पर जा बैठा। बस धीरे-धीरे धूल उडाते हुये आगे बढने लगी थी।लेकिन वह अपनी सुनहरी यादों पर  से वक्त की धूल को हटा रहा था।
===2====
एक दिन उसके पिताजी शाम को घर एक व्यक्ति के साथ आये। मम्मी से परिचय करवाया- "ये..... है, बाजू के गांव में शिक्षक हैं।" उनका उपनाम सुनकर मम्मी को काफी खुशी हुयी थी, एक और परिवार  से परिचय होने जा रहा था जिसका भाषा, त्योहारों और रीति- रिवाज़ों  का साझा था। उसके पिताजी ने आगे कहा था "रविवार को ये सपरिवार खाने पर आ रहे है।"
वह उस रविवार को कभी नही भूल सकता। उस दिन वह पहली बार उस से मिला था। अपनी बडी बहनों के पीछे,सिमटी, सकुचाई,शरमायी,छुईमुई सी। वो उसकी हम उम्र थी। बाकी सभी या तो उससे बडे थे या छोटे। उनका परिवार अच्छा खासा बडा था चार लडकियां और दो लडके। वह अपने परिवार मे पांचवे नम्बर पर थी । तीन बडी बहनें ,एक बडा भाई और एक छोटा भाई। वैसे उसका खुद का परिवार भी बडा था। उससे छोटी दो बहने और एक सबसे छोटा भाई था।

वो पूरा दिन उसे घूरता रहा था, जबकि वह उससे नजरें मिलते ही  झुका लेती थी। घर के सभी बडे लोग खाने के बाद बातों मे मशगूल हो गये थे और बच्चे खेल में।धीरे धीरे दोनों परिवारों मे नजदीकियां बढी और दोनों परिवार एक दूसरे के काफी करीब आ गये। हर त्योहार, पारिवारिक समारोहों में दोनों परिवारों की उपस्थिति अनिवार्य सी हो गयी थी।
===3===
"आमगांव वाले उतरो" कंडक्टर  चिल्लाया। उसकी तन्द्रा भंग हुयी। वह वर्तमान मे आ गया। बस से नीचे उतरा।दोपहर का एक बज रहा था, भूख लग आयी थी। लेकिन उसे कुछ खाने की इच्छा नही हो रही थी। पूछताछ काउन्टर पर जाकर उसने पूछा "भैया, ........ के लिये बस कब जायेगी ?"  जवाब आया "2 बजे...।"

एक घंटा और ! इन्तजार की घडियां लम्बी होते जा रही थी। उससे अब इन्तजार  सहन नही हो रहा था। लेकिन कोई और चारा भी नही था। उसने सोचा चलो चाय पी लेते है। आमगांव उसका अपना कस्बा रहा है । यहां की हर गली, हर चौक की तमाम यादें मन में समायी हुयी है । पूरी किशोरावस्था यहीं गुजारी थी। यहीं के सिनेमाघर मे फिल्मे देखी है। एक जमाना था, जब आमगांव से अपने गांव जाने की इच्छा नही होती थी और आज एक घन्टा जान पर आ रहा था।

चाय की दूकान पर जाकर चाय के लिये कहा, चायवाला उसे पहचान गया था ।लेकिन वह जानबूझकर अनदेखा कर गया। वह किसी से बात करने के मूड मे नही था। चाय पीकर वह अपनी बस के इन्तजार मे खडा हो गया।

धीरे -धीरे उन दोनों में अच्छी खासी दोस्ती हो गयी थी। दोनो एक ही स्कूल मे पढते थे, वह एक कक्षा आगे था। दोनो पढने लिखने  के साथ अन्य गतिविधियो मे भी बढ़ चढ़कर भाग लेते थे। विद्यालयी या अन्तर-विद्यालयी स्पर्धाओ मे दोनों ही पुरस्कारों की झडी लगा देते थे। वह एक कक्षा आगे था, तो वह उसे पढ़ा भी दिया करता था। जहां दोनो एक दूसरे के साथ रहना पसंद करते थे, लड़ाई भी उतनी ही हुआ करती थी। नोकं झोंक, एक दूसरे को तंग करना , खिंचाई करना चलता रहता था। वह उसकी चोटी खींचता रहता था और वह उसे चिकोटी काटते रहती। उन दोनों का एक दूसरे के लिये लगाव किसी से छुपा भी नही था, दोस्तों और दोनो के घरवालों से भी। जब उसके घर जाता उसकी बहने कहती "तू हमसे मिलने तो आया नही होगा। जा वो वहां पर है।" यही किस्सा दोहराया जाता जब वह उसके घर आती।

जब दोनो गप्पे मारना शूरू करते समय कैसे जाता पता ही नही चलता था। दोनो एक दूसरे के पूरक भी थे। उसे गाना सुनना अच्छा लगता था, जबकी वह अच्छा गाती थी। वह खाने का शौकीन था, वह खाना अच्छा बनाती थी। उसे को घर सजाने का शौक था, तो वह पेंटिग कर लेता था।

"पीं पीं..." बस की आवाज सुनायी दी। उसकी बस आ चुकी थी। टिकट खरीदी और बस मे जा बैठा। बस ने अपनी आगे की यात्रा जारी की और उसने अपनी पीछे की।
===4====
दिन ऐसे ही गुजरते रहे । धीरे-धीरे जहां वह अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष मे आ गया था, वह अपना स्नातकोत्तर कर चुकी थी। उसकी तीनों बडी बहनों की शादी हो गयी थी और वह अकेली बची थी। दोनो एक दूसरे की भावनाओ को समझते थे लेकिन किसी ने प्यार का इजहार नही किया था, न जरूरत समझी थी। वैसे भी दोनो को मालूम था कि दोनो के परिवार वाले सब कुछ जानते है. बस सही समय ही की देर है...।

समय ! समय बडा बलवान होता है. अच्छे -अच्छे साम्राज्यों को हिला देता है समय। और इसी समय ने साथ नही दिया था उसका।हिला के रख दिया उसे भी...।

उसकी  अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष की परीक्षायें चल रही थीं और उसके पिता का देहांत हो गया था। सारे परिवार की जिम्मेदारी अचानक उसके कंधो पर आ गयी थी। तब उसके पिताजी ने सम्हाला था उसे। सारे रीति-रिवाज कर्मकाण्ड पूरे करवाये थे। तेरहवी तक साथ रहे थे। तेरहवी के बाद प्यार से बिठा कर समझाया था "बेटा, जो होना था वो हो गया। होनी को कोई नही टाल सकता। अब तुम घर के सबसे बडे हो। तुम्हें ही सब कुछ सम्हालना है। तुमसे छोटी बहनों की शादी करनी है, भाई का कैरियर बनाना है।"

"बेटा, याद रखो तुम्हारे रिश्तेदार आयेंगे, सभी सहानुभूति दिखायेंगे लेकिन जहां मदद की जरूरत होगी, सभी भाग जायेंगे। ये दुनिया की रीत है। तुम पहले सारी चिन्ता छोडकर अपनी पढाई पर ध्यान दो। फ़िर  नौकरी ढूढो ।ये ज्यादा जरूरी है।"

वह सोच रहा था कितना सच कहा था उन्होने ! उसे सारी लड़ाई अकेले लडनी पडी थी। कोई हाथ मदद् के लिये सामने नहीं आया था सिवा उसके पिता के। किसी रिश्तेदार ने मदद तो दूर हाल तक नही पूछा था। मामा,मौसी, ताऊ सब तेरहवीं के बाद चले गये थे। उसके पिताजी रिटायर हो गये थे। उसके हर काम के लिये उसका मार्गदर्शन करते रहते थे मम्मी को मिलने वाली पिताजी की पेशनं के, ग्रेच्युटी और बाकी सारे कामों के लिये। उसने सरकारी कार्यालयो के धक्के खाना, अपनी पढाई और मम्मी के आंखों का आपरेशन , सभी अकेले सम्हाला था। उसके पिताजी ने उसे सम्बल दिया था वह उनका अहसानमंद हो गया था लेकिन उसका उसके घर जाना बन्द हो गया था।

इन सब में डेढ साल गुजर गया, और उस पर इधर -उधर का अच्छा खासा कर्ज हो गया था। पिताजी की पेंशन और ग्रेच्युटी का पैसा जरूर मिला था लेकिन उसे उसने हाथ नही लगाया था। वह बहनों की शादी और भाई के भविष्य के लिये सुरक्षा राशि की तरह बचा रखा था।

उसने अभियांत्रिकी की पढाई पूरी की और जा पहुंचा मुंबई- नौकरी की तलाश में। किस्मत ने साथ दिया, बिना धक्के खाये नौकरी मिल गयी। छ्ह महीनों बाद वह जा पहुंचा अमरीका जहां से वह पूरे एक साल बाद वापस आ रहा था। अब जा रहा था उससे मिलने तीन साल बाद।
===5===
बस अचानक रूकी, कंडक्टर आकर बोला "साहब आपका स्टाप आ गया"।

वह बस से नीचे उतरा। दोपहर के ढाई बज रहे थे। उसके दिल की धडकन तेज हो गयी थी। वह धीरे-धीरे उसके घर की ओर जा रहा था। घर के सामने पहुंचा। देखा कि वह बरामदे मे बैठे-बैठे सो गयी थी। सोते हुये वह काफी खूबसूरत लग रही थी। उसके मन मे छुपा बचपन जाग उठा। दबे पांव उसके करीब पहुंचा और जोर से उसकी चोटी खींच दी। वह जाग गई और चीखी '...... के बच्चे , अब तो सुधर जाओ"। वह हतप्रभ खडा रह गया। इसे मालूम भी नही था कि वह आज आनेवाला है, लेकिन वह जान गयी थी कि चोटी उसी ने खिंची है।

वह उठकर बैठी। पूछा- "कब आये"?

 उसने अपनी सारी कहानी सुनायी। गिले-शिकवे हुये। वह आज घर मे अकेली थी। आज पता नही उसे क्या हुआ था, आमतौर पर शांत रहने वाली लडकी तीन साल की भडास निकाल रही थी। वह बोल रही थी और ये सुन रहा था।वह बचपन से लेकर अब तक की सारी कहानी दोहरा रही थी, और वह तीन वर्षों की आंखो की प्यास बुझा रहा था। अचानक उसने पूछा "क्या देख रहे हो"! वो झेंप गया। दोनो एक दूसरे के मन की बात समझ रहे थे, लेकिन आज भी किसी के ओठों पर बात नही आ रही थी।

उसने कहा "तुम्हे मालूम है, पापा मेरे लिये लडका देख रहे है ?" उसके चेहरे पर एक उदासी आ गयी थी।

वह सोच मे पड गया।वह किस मुंह से उसके पिता से कहे कि क्या वह उसका इंतजार कर सकते है। उसके पिता क्या इसे मानेंगे! क्या वह ये नही सोचेंगे कि ये लडका अपनी जिम्मेदारियों से मुख मोडकर, स्वार्थी हो गया है।वे उस पर कैसे विश्वास करें? वह अपनी मजबूरी जानता था। उसकी दो बहनें बिन ब्याही बैठी थीं, भाई पढ रहा था।  एक जवान लडकी का घर पर बिन ब्याहे बैठे रहना सेवानिवृत पिता के लिये कितना बडा बोझ होता है, इसका अहसास उसे भी तो था। अगर वह आज शादी भी कर ले, तो उसकी बहनें, भाई और मां क्या सोचेंगे उसके बारे मे। यही कि इसे अपनी बहने और भाई के भविष्य की चिन्ता नही है, बस अपनी फिक्र है। उसका खुद का तो ठीक है, लेकिन क्या वे लोग इस परिस्थिति मे उसेको स्वीकार कर पायेंगे?

"किस सोच मे पड गये ?" उसने टहोका " लो चाय पियो"।

"कुछ नही, बस ऐसे ही सोच रहा था, कितना बदनसीब होगा वह?"
"कौन" उसने पूछा।

"जिससे तुम्हारी शादी होगी" उसने छेडा "तुम्हे चाय बनाना भी तो नही आता !"

उसे उसकी बनायी चाय अच्छी लगती थी, वह तो बस अपने मजबूरी को छिपा कर हंसने की कोशिश कर रहा था। ऐसा नही की वो इससे अनजान थी, उसे सब समझ मे आ रहा था।

"किचन मे चलो, तुम्हारे लिये खाना बनाया जाये"
रसोई मे पहुंचने पर उसने पूछा "और तुम्हे कोई लडकी पसंद आयी"?
उसने  जवाब दिया “मुझे तो बहुत सारी पसंद आईं, लेकिन मुझे भी तो कोई को पसंद करे !”
वह बोली “ऐसा क्यों, तुम्हे पसंद करने वाली लडकियों की तो कमी नहीं होगी ?”
उसने जवाब दिया  “ अरे मेरे जैसे मस्तमौला, बेफिकरे को कौन पसन्द करेगा? और तुम तो जानती हो मेरा गुस्सा !”
वह ” तुम अपने बारे मे खुद नही जानते हो, तुम्हारे साथ कोई भी उदास नही रह सकता। तुम हमेशा हंसते रहते हो और हंसाते रहते हो। तुम हर चीज पर हंसना जानते हो, खुद पर भी। उसके साथ तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों का अहसास भी रहता है। कौन ऐसी बेवकूफ लडकी होगी जो तुम्हे पसंद नही करेगी?"
इतने मे उसके पिता आ गये।
"और बेटा अमरीका से कब आये ?"
"जी, दो दिन पहले ही आया, यहां पर थोडी देर पहले ही आया।"
"और बहनों की शादी का देखना शुरू कर दो, दो बहनों के लिये कम से कम २-३ साल तो लग ही जायेंगे। कुछ लड़को के पते मुझसे ले जाना। "
"जी"
"तुम पर जिम्मेदारी काफी बडी है, जिम्मेदारी से पहले मुक्त हो जाओ।" उसके पिता ने उसे कुछ कहने से पहले ही उसकी जिम्मेदारियां फ़िर से याद दिला दीं।
"जी"
"मै भी इसकी शादी इस साल निपटा कर मुक्त हो जाना चाहता हूं। दो तीन अच्छे रिश्ते है..।"
उसने आखों के कोने से देखा वह रसोई के दरवाजे के पीछे खडी थी। उसकी आंखे भीगी हुयी थी और चेहरे पर उदासी थी।
===6===
संजय: "तो तु अब क्या करेगा?"
वह : "परसो चेन्नई जा रहा हूं, नयी नौकरी, नयी जगह!"
"अबे तुने ये भी नही बताया, बहुत बड़ा कमीना है बे तु!"
वह मुस्कराया : "दो सप्ताह पहले ही यहाँ त्यागपत्र दे दिया था। बस कल यहाँ आफीस मे आखिरी दिन है।"
"अबे लेकिन हम लोगो को तो बताया होता ?"
"किसे ? तुझे? तु अपनी नौकरी की तलाश मे व्यस्त है! देवदास को जब भी अपनी पारो की याद आती है उसे रोने के लिये मेरा कंधा चाहिये, , पंडित को अपनी महबूबा याद आती है तो दारू मे डूब जाता है, उसे बार से घर लाने काम भी मेरे जिम्मे! कमलेश की तो बात ही मत कर। सब दिलजले है यहाँ। और ऐसे भी सब मजनूओं की टांग खिंचने का काम मेरा है! मेरी टांग खिंचाई शुरु हो जाती तब!"
"लेकिन .... "
"लेकिन क्या ? अरे यार सबको उपदेश मै ही देता हूं कि वक्त सबसे बड़ा मरहम होता है! बस वही मरहम खुद पर लगा रहा हूं! चेन्नई, नयी जगह है, नयी कंपनी है, नये लोग होंगे, समय कैसे बितेगा पता ही नही चलेगा। आज तुने पकड़ लिया, कल देवदास पकड़ लेगा। जिस चीज से मै आजतक बचता रहा हूं, वह हर किसी के सामने दोहराना तो नही चाहता ना!"
"लेकिन इतने कम समय मे तु सब कुछ छोड़ छाड़ के जा रहा है...."
"यार , समय ही तो नही चाहिये मुझे.... जग्गू दा की गजल याद है ?
कोई दोस्त है ना रक़ीब है तेरा शहर कितना अजीब है,

मै किसे कहूँ मेरे साथ चल, यहाँ सब के सर पे सलीब है"

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कल शाम कुछ फोन आये।

बुधवार, फ़रवरी 08, 2006


फोन न १
“एक समस्या है यार”
“पता चल गयी !”
“कैसे”
“तेरे फोन से ही।”
“सुन”
“सुना”
“तेरे आसपास कोइ है तो नही ?”
“तुझे कोइ आसपास चाहिये क्या ?”
“नही”
‘’तब नही है, बोल″
“यार पर्सनल समस्या है, किसी को बताना मत”
“नही बताता यार,सभी को यही समस्या है। काम की बात कर”
“मै टूर से आया हूं और भूखा हूं।”
“तो किसी होटल फोन करना ! ”
“नही यार, ये बोल रही है ।।”
“ये यानी कौन।”
“बीबी, और कौन”
“किसकी ?”
“मेरी और किसकी बीबी मेरे से बात करेगी।”
“ठीक है , काम की बात बोल″
“ये लो, विषय मै बदल रहा हू कि तू !”
“ठीक है ठीक है आगे बढ”
“वो मायके जाने की बात कर रही है”
“अरे बधाई हो, साले तू इसे समस्या बोल रहा है ?”
“अरे मै अकेला अनाथ हो जाउंगा ना !”
“कितने दिनो के लिये जा रही है ?”
“१५ दिनो के लिये”
“तो भाई मै क्या कर सकता हूं”
“वो रात मे नही रहेगी ! क्या करू ?”
“अबे क्या मतलब है तेरा मै ऐसे वैसे कोई काम नही करता!”
“तू मेरी सुनेगा क्या कि अपनी हांके जायेगा ?”
“झगडा किस बात पर हुआ ?”
“झगडा किस बात का, मै तो अभी टूर से वापिस आया !”
“तो वो जा क्यों रही है ?”
“मै जब टूर पर गया था तब उसकी मां यहा साथ मे थी। अब उसकी मां उसे लेकर जा रही है”
“अब तेरी बीवी के पिताजी भी टूर पर गये है क्या ?”
“वो कभी वापिस नही आनेवाले टूर पर गये है !”
“ओह″
“मेरी बीवी को रोकना है”
“सास को चार दिन बाद जाने के लिये बोलना , उसमे क्या है”
“नही, मेरी सास को जाना चाहिये”
“नही रे बाप मै ऐसा कोई काम नही करता। तू किसी भाई को पकड”
“अबे हमेशा हमेशा के लिये नही।। अब तूझे कैसे बतांउ, तेरी शादी नही हुयी, तू कैसे समझेगा।”
“जाने दे यार तू बोल।, मुद्दा ये है कि तेरी बीवी ने घर पर रहना चाहिये और सास ने वापिस जाना चाहिये। ठीक ?”
“ठीक। बोल क्या कर सकते है।”
“अच्छा कब निकलने वाले है ?”
“दोपहर मे खाने के बाद”
“यानी की चार घन्टे है।”
“लेकिन सास घर पर है”
“अबे मै प्लान के लिये बोल रहा हूं”
“प्लान क्या है ?”
“तेरे घर मे काम वाली बाई है क्या ?”
“वो छूट्टी पर है इसलिये तो बीवी मायके जा रही है”
“ठीक है, मै सब ठीक करता हू। सास जायेगी लेकिन तेरी बीवी तेरे बोलने पर भी नही जायेगी।”
“थैंक्यु वेरी मच”
“सूखा सूखा नही चलेगा !”
“ठीक है यार”
“तूने बीवी को नही जाने के लिये मनाया या नही”
“वो असफल होने के बाद ही तो मैने तूझे फोन किया”
“तू अपनी बीवी को बोल कि ठीक है जाओ मै सम्हाल लेता हूं। १५-२० दिन रह कर आना”
“ओके लेकिन तू क्या करने वाला है ?”
“तू आम खा पेड मत गीन”
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फोन न. २
“शांताबाई”
“नमस्कार साहब, आ जाउ क्या ?”
“नही, एक पता देता हू वहां जा”
“साहब, ठीक है पता दे दो”
“पता बाद मे पहले क्या बोलना है वो सून”
“बोलो साहब”
“वहां जाकर बोलना कि आपकी पूरानीवाली काम वाली ने भेजा है, और कहा है कि अगले १५ दिन काम करने को बोला है।”
“साहब मै ऐसे लोअर डाउन काम नही करती”
“काम नही करना है, सिर्फ ये वाक्य बोलना है”
“ठीक है”
“एक बात और ये बात साहब से मत करना, मालकिन से करना। साहब थोडा सर्किट है”
“ठीक है साहब”
“और हा साहब थोडा मार्डन है, कपडे वपडे अच्छे पहन कर जाना।”
“साहब उसने किचन दिखा दिया तो ?”
“अरे नही, तू मेमसाहब को नही जानती।”
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फोन न. ३
“मर गया यार !”
“क्या हुआ ? बीवी मायके जा रही है क्या ?”
“नही जा रही लेकिन तूने किया क्या?”
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कल रात सब्जी जल गयी

शुक्रवार, फ़रवरी 03, 2006

 प्रत्याक्षाजी ने हमारे पुराने जख्म हरे कर दिये। हमने अपनी आधी अधूरी ही सही; दास्तान ए इश्क सुना दी।

बहरहाल हमारी इस कहानी पर काफी सारी टिप्पणियां मिली। आगे लिखने का अनुरोध किया गया।
कल का सारा दिन पूरानी हसीन यादो मे डूबा रहा। कहते है जब हमे हिचकी आती है तो उसका मतलब होता है कि कोई आपको याद कर रहा है। तब तो शायद उसे सारा दिन बिना रूके हिचकी आती रही होगी।
शाम को घर गये। खाना बनाना शुरू किया। रोटियाँ सेकीं। और सब्जी बनाने की तैयारीया शुरू की।
जब मै किसी की याद मे खाना बनाता हुं, तब खाना काफी अच्छा बनता है, लोग उंगलिया चाटते हुये खाते है। ऐसा मेरा नही अन्ना का मानना है।
अब सब्जी बनाना शूरू किया, इतने मे अन्ना आ गया। अब उससे बाते चलती रही और खाना बनता रहा। वो भी मेरा चिठ्ठा कभी कभार पढ लेता है। और आज उसने पढा था।
अन्ना उवाच :
“दादा आपने ये कहानी तो कभी बतायी नही !”
 ” इसमे कुछ बताने लायक हो तो बताउ ना”
 “नही दादा, आपकी वो कहानियां जिसमे आप कहते थे कि यदि आपको किसी की प्रेमकथा पता चल जाये वो कुछ ही दिन मे टूट जाता है. इसकी शुरूआत तो आपने ही कर दी थी”
“ऐसा ही कुछ है…”
” ये आपने पहले क्यों नही बताया ?”
हम शुरू हो गये… खो गये पूरानी यादो मे…….हम कहते रहे … अन्ना सुनता रहा………
अचानक कुछ जलने की बू आयी, पता चला सब्जी जल गयी थी  . काफी रात हो चुकी थी. तय हुआ की अब इसी से काम चलाया जाये.
खाने बैठे , सब्जी जलने के बाद भी स्वादिष्ट थी. आखीर कैसे नही होती…….
सब्जी नही हमारा दिल जो जला था।


3 टिप्पणीयां “कल रात सब्जी जल गयी” पर


शादी कर लो . फिर जली हुई सब्ज़ियाँ नहीं खानी पडेगी.
मतलब अकेले ! फिर दुकेले खानी पडेंगी. क्या पता बाद में भी जली हुई स्वादिष्ट सब्ज़ी बनाने का सौभाग्य तुम्हें ही मिलता रहे  )
प्रत्यक्षा
pratyaksha द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006

हा हा हा, वाह, पुरानी यादें ताज़ा करने बैठे और सब्ज़ी जला बैठे, यार एक लड़के से ऐसी आशा नहीं थी मुझे, अमूमन यह काम लड़कियाँ ही करती हैं!!  वैसे यह बात सही है, कभी कभी थोड़ी जली सब्ज़ी या दाल अधिक स्वादिष्ट लगती है!! और प्रत्यक्षा जी का कहना भी ठीक है, ब्याह कर लो, फ़िर अकेले जली सब्ज़ी नहीं खानी पड़ेगी!!
Amit द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006

पढ के तो यही लगता है कि आज भी दुकेले ही खा रहे थै. आपका शिकार हलाल हो चुका है.
Tarun द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006

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आदर्श प्रेमिका के गुण ?

बुधवार, फ़रवरी 01, 2006


प्रस्तावना
प्रत्यक्षा जी ने हमे प्रेम विषय का पंडित समझ लपेट दिया और इस पर कह दिया कि “आदर्श प्रेमिका के गुण” बतायें। शायद उन्होने कबीर की तरह सोचा होगा “ढाई आखर प्रेम का पढे सो पंडित होय”।

हम तो इस प्रेम की जालिम , बेरहम दुनिया मे इतनी ठोकर खा चुके है कि हमारे दिल नुमा प्रेम ग्रंथ के हर पन्ने से सिर्फ आह ही आती है। दिल के इतने टुकड़े हो चुके है जितने जनता दल के भी नही हुये होंगे। फिर भी हमने हिम्मत नही हारी है और लगे हुये हैं।

हसीं हजारो भी हो खडे, मगर उसी पर नजर पढे
हो जुल्फ़ गालो से खेलती, के जैसे दिन रात से लढे
अदाओ मे बहार हो। निगाहो पर खुमार हो
कबूल मेरा प्यार हो तो क्या बात है
जरूरत है जरूरत है जरूरत है
झटक के गेसूं जहां चलेतो साथ मे आसमा चले
लिपट के कितने भी पांव से ये पूछते कहां चले
प्यार से जो काम ले, हंस के सलाम ले
वो हाथ मेरा थाम ले तो क्या बात है
अब आदर्श प्रेमिका के गुण पर लिखना है तो क्यो ना अपने पहले प्यार पर फिर से एक नजर डाली जाये। अब आप ही देखें की हमारी प्रेमिका मे क्या क्या गुण है(थे)!

प्रस्तुत है हमारा शोध प्रबंध “आदर्श प्रेमिका के गुण”।

वो पहला प्यार

याद है जय साबून का विज्ञापन
पहला प्यार
लाये जीवन मे बहार
पहला प्यार
शायद कुछ ऐसा ही था हमारा पहला प्यार। प्यार ! पता नही वह प्यार था या कुछ और ! कब हुआ, कैसे हुआ, कब परवान चढ़ा… पता ही नही चला।

जब दोस्त छेड़ते तो हंस के कहते

“तुम भी यार बात का बंतगड बना देते हो वो मेरी एक अच्छी दोस्त है बस और कुछ नही।”
वो मेरी हमउम्र थी, शायद १-२ साल छोटी। दुबली पतली सी , सीधी सादी सी। । मेरे परिवार का उन लोगो के घर आना जाना था, वो लोग भी गाहे बगाहे मेरे घर आते जाते थे। वह चार बहनो और दो भाईयो मे से पांचवे क्रमांक पर थी, उससे बडी तीन बहने ,एक बडा भाई और एक छोटा भाई।

कद उसका नाटा था, मेरे बगल मे खड़ी हो तो कन्धे से नीचे ही ! इसका मुझे एक फायदा था। मै उसके कान खींच सकता था, वो नही।

शायद मै उससे पहली बार कक्षा ५ वी या ६ वी मे मिला। वैसे तो बचपन मे मै थोडा शर्मीला (विशेषतया लडकियो से) था लेकिन उससे बातें करने मे कभी कोई झिझक नही थी, ना उसे मुझसे बातें करने मे कोई झिझक होती थी। हम दोनो दिल खोल के बतीयाते थे। वैसे वह कम बोलती थी, बोलते मै रहता था और वो सुनते रहती थी। मेरी हर बेसीर पैर की कहानियो, गप्पो के लिये मुझे उससे बढ़िया श्रोता आज तक नही मिला। कभी कभार ईद के चांद की तरह वो भी शुरू हो जाती, तब मै भी सुन लेता था।

उसके लंबे काले कमर तक के बाल मुझे अच्छे लगते थे। वह सिर्फ एक चोटी करती थी जो उसकी पीठ पर लहराते रहती थी। मुझे उसकी चोटी खींचने मे मजा आता था, यहां तक की कोई उसकी चोटी खींचे वो बीना मुड़ कर बोल पढ़ती थी 
“आशीष के बच्चे ! तुमसे कितनी बार कहा है मेरी चोटी मत खींचा करो।

ऐसे तो मुझे उसे तंग करने मे , उसके साथ रहने मे मजा आता था, उसे भी मेरे साथ रहने मे, मुझे तंग करने मे मजा आता था। नोंक झोंक चलते रहती थी। एक बार हम लोग (मै, मेरी बहने वह और उसकी बहने) कहीं जा रहे थे। वाहन के नाम पर हम लोगो के पास ४ साइकिले थी और हम लोग कुल ६। मेरी दोनो बहने एक साइकिल पर, उसकी दोनो बहने एक एक साइकिल पर थे। मेरे पास मेरी “साबू” साइकिल थी। अब वो किस की साइकिल पर बैठे ? मैने अपनी साइकिल पर बिठाने के लिये मना कर दिया। मेरे मना करने की देर थी, कि वो अड गयी, अब तो मै इसी की साइकिल मे बैठुंगी। अब दोनो अपनी अपनी ज़िद पर अड गये। सब परेशान, ना मै पीछे हट्ने तैयार ना वो। अंत मे मै झुका और कहा
“ठीक है बैठ मेरी साइकिल पर, रास्ते मे साइकिल से नही गिराया तो कहना।”
“ठीक है,ठीक है”
मै थोडे गुस्से मे साइकिल तेज चला रहा था और वो पीछे कैरीयर पर बैठे हुये गा रही थी। कुल मिला कर जले पर नमक छिड़क रही थी। अब उसके गाने का असर था या मेरे तेज चलाने का रास्ते मे एक मोड पर साइकिल फिसल गयी और हम दोनो धूल फांक रहे थे। मेरी हंसी छूट गयी, बस मैडम ने आव देखा ना ताव दोनो मुठ्ठी बांध कर मेरी पिटायी शुरू कर दी। मेरी हंसी नही रूक रही थी, उसकी पिटाई से मुझे मार तो दूर गुदगुदी ज्यादा लग रही थी। अब दृश्य कुछ ऐसा था, सडक के बीचोंबीच मै बैठा हुआ हंस रहा था, साइकिल बाजू मे गिरी पडी थी और वो मुझे पीट रही थी। रास्ता चलते लोग हमलोगो रूक कर देखते, थोडा घूरते और आगे बढ लेते। ये दृश्य खत्म हुआ जब उसकी बहने आ गयी और मुझे बचाया। हम आगे बढे लेकिन वो फिर से मेरी साइकिल पर !

दोनो को एक से गाने सुनने का शौक। मेरे घर से मेरी कोई कैसेट ग़ायब हो तो पहला सवाल होता था,”……। आयी थी क्या ?”

वैसे वो गाती अच्छा थी, मुझे उसका गाना भी अच्छा लगता था। लेकिन मैने उसके गाने की तारीफ कभी नही की, हमेशा खिंचायी ही की। लेकिन उसने मेरी खिंचायी की कभी कोइ परवाह नही की उलटे यदि मै आसपास रहा तब उसका “वाल्युम” तेज हो जाता था। वह ना केवल गाने मे , नृत्य कला मे भी उस्ताद थी। स्कुल की सांस्कृतिक टीम के हम दोनो स्तंभ थे। मै बौद्धिक प्रतियोगिता (वादविवाद, स्वयंस्फूर्त भाषण, नाटक इत्यादि) सम्हालता और वह नृत्य और गायन विभाग। जब मै १० वी मे था और वह ९ वी मे उस वर्ष की आंतरशालेय मे प्रतियोगिताओ मे मैने और उसने ४-४ प्रथम इनाम जीते थे। उसका समूह नृत्य “कोळी नृत्य(कोकण के मछुआरों का नृत्य) काफी सराहा गया था। जब पुरस्कार वितरण हुया तब नज़ारा यह था

उदघोषक : (...हमारा नाम...) प्रथम पूरस्कार ….. के लिये……..
उदघोषक : (…उसका नाम …) प्रथम पूरस्कार ….. के लिये……..

उदघोषक ने उपर वाली लाइने ३ बार और दोहरायी। अब ऐसा था कि हम स्टेज पर एक ओर से चढते थे और दूसरी ओर से उतरते थे। मेरे और उसके एक के पिछे एक ऐसे ४ चक्कर लग गये थे। उधर कोने मे जहां मेरे कमीने दोस्तो का समूह बैठा था, हंगामा मचा रहा था…..
“ तीन चक्कर और लगा लो”

वह खाना बनाने मे भी उस्ताद थी। मेरी मम्मी उसके बनाये खाने की एक बडी प्रशंसक थी। उसे अच्छी तरह से मालूम रहता था कि मुझे क्या पसन्द है , क्या नही। उसे मालूम रहता था कि मै किस समय क्या खाना या पीना पसन्द करता हुं, मुझे कैसी चाय पसन्द है, यहा तक कि मेरे खाने मे नमक/मिर्च/मसाले/तेल कितना होना चाहिये। उसने मुझे कभी भी शिकायत का मौका नही दिया। लेकिन हमने कभी उसके खाने की प्रशंसा भी नही की उल्टे कहते

“खाना बनाना सीख ले नही तो ससुराल मे सास की मार खायेगी।”

एक दिन उसकी बडी बहन ने मेरे इस डायलाग पर टिप्पणी की

“उसे जो लडका पसंद है, उसकी मम्मी को इसका बनाया खाना अच्छा लगता है।”

हम ठहरे भोले भंडारी, इसका मतलब हमे काफी देर से समझ मे आया।

उसके बोलने का अंदाज कुछ ऐसा था कि उससे बाते करने के बाद हर कोइ उसका मुरीद हो जाता था। किसी भी वातावरण मे, हर किस्म के लोगो मे, वह हर जगह घुल मिल जाती थी। कुछ देर मे ही वह किसी को महसूस नही होने देती थी कि उससे परिचय हुये कुछ ही मिनट हुये हैं।

मेरे घरवाले और उसके घरवालो मे हमारी दोस्ती को लेकर कोइ एतराज कभी नही था। मेरी बहने और उसकी बहने तो बाकायदा हम दोनो की खिंचायी करती ही थी। मेरे मातापिता और उसके मातापिता ने कभी कहा कुछ नही, एक तरह से मौन स्वीकृति थी।

मेरे दोस्त हमेशा मेरी खिंचायी करते रहे थे और मै हमेशा इंकार। ये बात और है कि मैने उसे लेकर सपने कभी नही देखे। उसने सपने देखे या नही , मैने कभी नही पूछा ना जानने की कोशिश की। जब मैं उसके करीब था, तब कभी जानने की जरूरत नही समझी, और जब जानने की जरूरत थी तब इन बातो मेरे पास समय नही था।

कालेज के बाद एक काफी लम्बे अंतराल के उपरांत मै उससे मिला था। उसके घर पर कोई नही था। वह सामने बरामदे मे सो रही थी। शायद गर्मी और उमस से उसे निंद आ गयी थी। मैने बिना आवाज दरवाजा खोला और उसकी चोटी जोर से खिंची। वो चिखी
 “आशीष के बच्चे, अब तो सुधर जाओ”। 
मै हैरान हो गया, तीन साल बाद मै इसके सामने खड़ा हुं और ये नींद मे है फिर भी इसे मालुम है कि इसकी चोटी खिंचने वाला सिर्फ मै हो सकता हुं। काफी देर तक हम बाते करते रहे। पता नही उसे उस दिन क्या हो गया था वो बोल रही थी और मै सुन रहा था। वो बचपन से अब तक की हर घटना को दोहरा रही थी। साइकिल से गिराने की घट्ना को लेकर हम काफी देर तक हंसते रहे। उसने मेरे लिये चाय बनायी, खाना बनाया। खाने मे हर चीज मेरी पसंद की थी। वो मेरे से मेरी नौकरी के बारे मे, मेरे रहने खाने के बारे मे हर चीज खोद खोद कर पूछते रही। (मै गुडगांव मे नौकरी कर रहा था।) ऐसे ही उसने मेरे से पूछा
“कोई लड़की पसंद आयी क्या दिल्ली मे ?”
 “पसंद तो बहूत सारी आयी, लेकिन मुझे भी तो कोई पसंद करना चाहिये !”
“ऐसा क्यो, तुम्हे पसंद करने वाली लडकीयो की तो कमी नही होगी ?”
मै अपनी धुन मे
“ अरे मेरे जैसे मस्तमौला, बेफिकरे को कौन पसन्द करेगा। और तुम तो जानती हो मेरा गुस्सा !”
” तुम अपने बारे मे खुद नही जानते हो, तुम्हारे साथ कोई भी उदास नही रह सकता। तुम हमेशा हंसते रहते हो और हंसाते रहते हो। तुम हर चीज पर हंसना जानते हो, खुद पर भी। उसके साथ तुम्हें अपनी ज़िम्मेदारियों का अहसास भी रहता है। कौन ऐसी बेवकूफ़ लड़की होगी जो तुम्हें पसंद नही करेगी। “
और ये हमारी आखरी मुलाकात थी।
आखरी क्यों? फिर कभी !

यह पहली बार है जब मै स्वीकार कर रहा हुं कि शायद वो मेरा पहला प्यार थी। आज से पहले ये बात कभी स्वीकार नही की। तब भी नही जब संजय ने मुझसे पूछा था कि
”अबे उसे खोने का तुझे कोई दुःख नही है क्या ? कैसा आदमी है तु ?” 
उसे मै कैसे बताऊं कि उसने कहा था
“तुम हर चीज पर हंसना जानते हो, खुद पर भी।”
--- 
ना जाने क्यों होता है ये जिन्दगी के साथ
अचानक ये मन, किसी के जाने के बाद
करे फिर उसकी याद, छोटी छोटी सी बात
उपसहांर
ऐसे तो हमारी ज़िदगी मे कई सारे प्रेम आये अर्थात कई सारी प्रेमिकाये आयी। यंहा हमने उनमे से चुनी हुयी पहली प्रेमकथा का उल्लेख किया है।

इस शोधप्रबण्ध मे हमने प्रेमिका के आदर्श गुणो का बखान प्रत्यक्ष रूप से ना करते हुये अप्रत्यक्ष रूप से प्रेमिका का बखान करते हुये किया है।यह पाठको पर निर्भर करता है कि वह उनमे से आदर्श प्रेमिका के गुण कैसे निकाल सकते है।


परिशिष्ट क

संत श्री १००८ श्री आशीष कुमार महाराज उवाच
प्रेम, प्रेमी और प्रेमीका,यह त्रिभूज बरमूडा त्रिभूज की तरह रहस्यमय है। इस के अंदर जो फंस गया उसके साथ क्या होता है वह दुर्घट्ना तक (शादी तक) एक अनसूलझा रहस्य रहता है। और दुर्घट्ना के बाद कोइ भी इस रहस्य को जानने मे इच्छूक नही रहता। यह एक ऐसा कटू सत्य है, जिसे कोई भी प्रेमी/प्रेमिका सूनना भी पसंद नही करता।


परिशिष्ट ख


अहम ब्रह्मचारी, जिधर देखी नारी,
पलट के आंख मारी,
पटी तो पटी,
नही तो अहम ब्रह्मचारी।

श्रीमान आशीष श्रीवास्तव , अध्यक्ष विश्व क्वांरा मंच

पारिभाषिक शब्दावली


ये जरूरी है कि हम दास्तान ए आदर्श प्रेमीका मे प्रयुक्त शब्दो को पारिभाषित कर दिया जाये। ये इसलिये भी जरूरी है कि बाद मे हमे ये ना कहना पढे कि “मेरा ये मतलब नही थी, हमारे बयान को मिडिया ने तोडमरोड कर पेश किया है”।

आदर्श -: हमने इस पर तो पूरा का पूरा चिठठा लिखा है!
कन्या : हर वो महिला जिस के माथे पर पर लाल बत्ती ना जल रही हो, मतलब की मांग मे सिंदूर ना हो।
कन्या श्रेणीयां :कन्यायें दो श्रेणी मे विभाजित की जा सकती है पहली श्रेणी की कन्यायें खूबसूरत होती हैं और दूसरी श्रेणी की कन्याये ज्यादा खूबसूरत होती हैं।
गुण : जो मुझे अच्छा लगे। अब कोई इस परिभाषा की आलोचना करे तो यह उस व्यक्ति का अवगुण है।
प्रेमिका :हंम्म, ये तो आज तक कोई समझ नही पाया, और जो समझा वो या तो कवी(तुलसीदास, कालीदास वगैरह वगैरह…) हो गया या स्वर्गवासी (मजनू, फरहाद, रांझा वगैरह वगैरह…) हो गया। हम इन दोनो श्रेणी मे नही आते हैं। हमारे लिये इस शब्द की परिभाषा समय, काल और परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तनशील है।


13 टिप्पणीयां “आदर्श प्रेमीका के गुण ?” पर
“तीन चक्कर और लगा लो!” कमाल का था.
बहुत अच्छे.
eswami द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

पहले देवदास देखी थी आज देवदास की कहानी पढ भी ली. उस वक्त तीन चक्कर लगा लिये होते तो आज तक यू ना भटक रहे होते.
अब लगता है लिखना ही पडेगा क रानी कैसी हो के बारे मे.
Tarun द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

बहुत ही रोचक लगी आपकी कहानी, लगा कोई प्रेम कहानी पढ रहे हैं, अब इस कहानी का अगला हिस्सा भी पढवा ही दीजिये, इंतज़ार रहेगा।
सारिका सक्सेना द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

वाह, पढ़कर मज़ा आ गया, खासतौर पर उस साईकिल से गिरने वाली बात से। काश मैं उस समय वहाँ होता तो उस दृश्य को कैमरे में हमेशा के लिए बंद कर लेता, ऐसे बहुत कम वाक्ये होते हैं जिनको कभी भी याद कर हंसी छूट जाती है!!
और आशीष भाई, जब इतनी रचनात्मकता दिखाई है तो थोड़ी और दिखा लेते, ये आखिरी पैराग्राफ़(नियमों के अलावा) मेरे यहाँ से टीपने के बजाए अपनी शैली में लिख लेते और शीर्षक स्वामी जी के जैसा न रख कुछ और रख लेते!!  वैसे मुझे कोई आपत्ति नहीं है!!
Amit द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

पूरी कहानी के हर वाक्य को पिक्च्राइज़ किया पढते पढते| बहुत अच्छा लिखा है आशीष |
मानोशी द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

भई मज़ा आ गया. अब कहो, पंडित तुम्हें ठीक चुना की नहीं .
कहानी आगे बढाई जाये…पाठक गण उत्सुक हैं.
प्रत्यक्षा
pratyaksha द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

यह कहानी बताती है कि दुनिया में क्या-क्या नमूने हैं। कन्या की चोटी न हो गयी जहांगीर के न्याय का घंटा हो गयी खींचे पड़े हो। लेख बढ़िया है लेकिन हरकतें निहायत बेवकूफी भरी कर चुके हो। आगे बताओ अच्छा सुना जाये।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

अनूप जी,
बाकी सब तक तो ठीक है लेकिन “हरकतें निहायत बेवकूफी भरी कर चुके हो।’ कुछ समझ मे नही आया, थोडा प्रकाश डाले !
आशीष
आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

अब भइया कितना प्रकाश डालें।इतने किस्से बता चुके हो अपने जिसमें हाथ आये अवसर छोड़ दिये।अब यह समझदारी लगती हो तो बेवकूफी की जगह समझदारी कर दो हमारे कमेंट में। शेष यथावत!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक फरवरी 2nd, 2006

भाई, बेचारी का कुछ तो दिल रख लेते। लेकिन हमें किस खेल में फ़ंसा लिए हो। हमसे तो लड़की बात भी करले तो हम दिल दे बैठते हैं (अभी भी)। महावीर जी की तरह हम तो सिर्फ़ त्रास्दियां गिना सकते हैं। लेकिन कोशिश करेंगे। आपकी आपबीती बहुत पसंद आई।
bloglines ने कोई नया लोचा डाल दिया है। कहते हैं RSS Feed के लिए ब्लौग का पता भर देदें तो फ़ीड अपने आप ढ़ूंढ़ लेंगे। आपके ब्लौग का पता डाला तो उन्हें फ़ीड नहीं मिल रही।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006

[…] अब ये लो नया लफड़ा। प्रेम के बारे में लिखो। हमारे पास जितना प्रेम का स्टाक था वह हम पहले ही अपने लेख प्रेम गली अति सांकरी तथा ये पीला वासंतिया चांद में उड़ेल चुके हैं। अब प्रत्यक्षाजी तथा आशीष कहते हैं थोड़ा और बयान किया जाय।में अपनी कल्पना के घोड़ों को दौडा़ने के लिये पुचकारता हूं लेकिन वे अड़े खड़े हैं जहां के तहां-� ेलुहा,देबाशीष,अतुल के ब्लाग की तरह। बहरहाल देखा जाये हमारे पहले के शूरमाओं ने क्या किया। […]
फ़ुरसतिया » अति सूधो सनेह को मारग है द्वारा दिनांक फरवरी 3rd, 2006

बहुत अच्छा लिखा है बन्धु…..! मज़ा आ गया…।
अनाम द्वारा दिनांक फरवरी 5th, 2006

बुरा फँसाया आपने। यह रही विशलिस्ट की व्यथाकथा।
अतुल द्वारा दिनांक फरवरी 7th, 2006

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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