हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली

सोमवार, जुलाई 31, 2006


३१ जुलाई हिन्दी के उपन्यास सम्राट और कहानीकार प्रेमचंद का १२६ वां जन्मदिन है। उनके जन्मदिन पर मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

दसवी मे पढा था कि उनका असली नाम नवाबराय था। उनकी पहली रचना सोजे-वतन थी जिसमें देशभक्ति पूर्ण कहानियां थीं। छपते ही इसे अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। तत्पश्चात वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।

प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक रहे हैं, उनके लगब्भग सभी उपन्यास और ढेरो कहानिया पढी है।प्रेमचंद को पढना तो बचपन से ही शुरू हो गया था। कक्षा दूसरी मे बालभारती मे उनकी कहानी पढी थी ‘ईदगाह′, और ये सफर शुरू हुआ था। हामिद का चिमटा आज भी भूल नही पायां हूं।

गूल्ली-डंडा, बडे भाई साहब जैसी कहानियां तो ऐसी लगती है जैसे मेरे ही बचपन से ली गयी हैं। ‘ठाकुर का कुंवा’, पूस की रात , सुभागी, बडे घर की बेटी जैसी कहानियाँ अपने आस पास ही घटते देखी है।
पंच परमेश्वर का रूप मैने अपने गांव की चौपाल पर होने वाली पंचायत मे देखा है। वहीं मैकु जैसे शराबी भी देखे है जिनके बच्चे भुखे सोते रहे लेकिन शराब चाहिये ही। उनकी कहानी का हर पात्र मुझे अपने आस पास ही दिखायी दिया है।

जीवन का ऐसा कौनसा अंग है जो उन्होने नही छुआ। ‘समस्या’ के चपरासी गरीब का परिवर्तन हो, या कोरी अफवाह से एक ‘बैंक का दिवाला’ निकलना।

उनके द्वारा लिखे गये हास्य रस के तो क्या कहने “ पंडित मोटेराम शास्त्री का डायरी”, “शादी की वजह″,”कुछ दूख ना हो तो बकरी खरीद ला” पढीये और हंसते हंसते लोट पोट हो जायीये।

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4 टिप्पणीयां “हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली” पर
प्रेमचंद जी को श्रद्धांजलि।
सोचता हूं १९३६ में ५६ वर्ष की अल्पायु में न गये होते और भारत की आजादी देखी होती उन्होने तो आजादी के बाद के भारत का वे कैसा वर्णन करते।
eshadow द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

ये बढ़िया किया कि आज के दिन मुंशी जी को याद कर लिया।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

गोदान पढी थी जब दसवीं में थे. कई कहानिया स्कूल में पठ्य पुस्तकों में पढी . बूढी काकी , पँच पर्मेश्वर ,हामिद आज भी बहुत करीब हैं
pratyaksha द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

प्रेमचंद्र के जन्म-दिन पर उनके बारे में लिखना उनके प्रति आदर है। साधुवाद। जब तक समाज में विसंगतियाँ रहेंगी तबतक प्रेमचंद्र समसामयिक रहेंगे। उनका यथार्थमय आदर्श हमेशा अधुनातन रहेगा।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

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एक प्रेम (?) कथा

रविवार, जुलाई 30, 2006

निधीजी के चिठ्ठे पर एक मजनू के बारे मे पढा, मेरे आस पास तो मजनूओ की भरमार रही है। सोचा चलो एक के बाद एक मजनूओ के किस्से लिखना शुरू कर दे।

ये किस्सा है उन दिनो का जब मै नया नया दिल्ली पहुंचा था। हम लोग कुल आठ लोग एक ही फ्लैट मे काल्काजी मे रहते थे। सभी के सभी नागपूर और उसके आसपास के क्षेत्र से थे। कुछ नौकरी करते थे, कुछ सघर्ष कर रहे थे। फ्लैट का खर्च नौकरीशुदा लोगो की जिम्मेदारी थी। जो संघर्ष कर रहे थे, उनका एक काम था, दिन मे अपना बायोडाटा बांटना, साक्षात्कार देना और रात मे पढना। मौज मस्ती इन लोगो के लिये वर्जित थी।

राजेश, प्रवीण और कमलेश दोनो नौकरी कर रहे थे, मैने मुंबई की नौकरी छोडकर गुडगांव मे एक कपंनी मे काम शुरू किया था। हम चारो का सप्ताहांत मे मौज मस्ती का कार्यक्रम होता था। दिन भर आवारागर्दी और शाम को किसी अच्छी जगह खाना। मै शराब पीता नही लेकिन मेरे अधिकतर दोस्त अखंड बेवडे रहे है। दारू की पूरी बोतल अंदर कर जाते हैं और हिलते भी नही हैं। शाम को मेरा काम होता था, बैरो को समझा बुझा कर शांत करना। अब क्यों ? अरे दारू पीने के बाद कमलेश और राजेश दोनो मे दिल्ली की सल्तनत के शहनशाहो की आत्मा जो सवार हो जाती थी। उसके बाद टूटी बोतल , गिलास, प्लेटो की किमत के साथ खाने का बील का भुगतान करना। एक एक को लाते मारते हुये कार मे लादना, पुलीसवालो से बचते, हाथ पैर जोडते हुये अपने घर पहुंचना।

एक ऐसी ही शनीवार की शाम मेरी मुलाकात हुयी सुरेश से(नाम् बदला हुआ है)। ६ बोतल बियर पिने के बाद उन्होने कम से कम ‘२० रन’ बनाये थे,मतलब कि खाने की मेज से टायलेट उल्टी करने के लिये। पता चला कि वो भी भंडारा(नागपूर से १०० की मी दूर) से है। उसकी मम्मी दिल्ली मे एक अस्पताल मे काम करती है। वो कभी कभी दिल्ली आता है, महिने दो महिने रह्ता है और वापिस चला जाता है। रात मे सुरेश मे घर जाने की हिम्मत तो थी नही, वो भी हम लोगो के साथ रूक गया। मै सुबह अपनी दौड लगाने के बाद वापिस आया तो वह उठ चुका था। बाकि सभी तो घोडे बेचकर सो रहे थे।

सुरेश ने मुझे कहा कि “ये सभी तो कम से कम दो तिन घंटे बाद सोकर उठेंगे , तु मेरे साथ घर चल। मम्मी से मिल लेना, साथ मे चाय नास्ता भी हो जायेगा“। घर के खाने के नाम पर तो मै काल्का जी से एक शादीशुदा दोस्त के घर रोहीणी तक लगभग ३० किमी दूर भी चला जाता था। मै चल दिया उसके साथ। उसके साथ उसके घर के पास पहुंचे, सामने की फ्लैट की बालकनी पर एक खूबसूरत कन्या खडी थी। मेरी नजरे उसकी तरफ गयीं कि उसने एक उड्ता हुआ चुंबन उछाल दिया। मै चकराया ये क्या ? क्या आज मै इतना जम रहा हूं ? सुरेश ने गलतफहमी जलदी दूर कर दी “उछल मत , वो तेरे लिये नही मेरे लिये था!”
खैर उसके घर गया , ‘काकू’(सुरेश की मम्मी) से मिला। नाश्ता ही नही, दोपहर का खाना भी खाकर वापिस आया। फ्लैट मे आने पर प्रवीण ने पूछा कि मै कहां गया था। मैने बताया कि सुरेश के साथ उसके घर गया था। तब प्रवीण ने मुझे सावधान किया कि उसके घर जाने मे कोई परेशानी की बात नही है, लेकिन उसके साथ घुमना फिरना नही। बात मे मुझे पता चला कि सुरेश का बस एक ही शौक था। लडकीयो को अपने जाल मे फांसना और अपना काम निकालना, मतलब कि अय्याशी करना। काम निकलने के बाद , वह नये शिकार की तलाश मे लग जाता था। अब तक पता नही कि कितनी लडकिया उसके जाल मे फंस चूकी थी, ये किसी को नही मालुम था। पता नही उसमे ऐसा क्या था, लडकिया खिंची चली आती थी।

हम लोग को उसका साथ पसंद नही था लेकिन काकू का स्वभाव काफी अच्छा था। सुरेश जब दिल्ली मे नही होता था तब काकू लिये हम लोग ही सब कुछ थे। बस सांप छछूंदर वाली हालत, ना उगलते बने ना निगलते। उपर से अपना नायक हर हफ्ते नयी लडकी और अय्याशी के किस्से लेकर आ जाता था। उसके किस्से सूनकर कोफ्त होती थी। प्रवीण तो उसे बूरी तरह झाड देता था लेकिन वो बाज नही आता था। उसमे अय्याशी की बूरी आदत होने के बावजूद वो हम लोगो की इज्जत करता था। अपने करीयर के हर निर्णय मे हमसे सलाह लेता था।

२००२ मध्य मे वह भडांरा अपने घर गया। कुछ महिनो बाद मै उससे नागपूर मे एक शादी मे मिला। उसने मुझे एक लडकी की तस्वीर दिखाई। मैने उसे चेतावनी दी “अबे अब तु शूरू हो गया, तो तेरा सर और मेरा जूता। तेरे अय्याशी के किस्सो मे मेरी कोई दिलचस्पी नही।” सुरेश ने कहा “नही यार , ये वैसी लडकी नही है। इस लडकी को मैने छुवा तक नही है।” मुझे विश्वास तो नही हुआ, वह जारी रहा “मै इससे शादी करने वाला हूं।

मैने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह इस लडकी के लिये यदि गंभीर है तो काकू को तैयार करना मेरी जिम्मेदारी होगी। वह खुश हो गया, उसने मुझसे कहा कि संभव हुआ तो वह मुझे उस लडकी से मिलायेगा। बाद मे मुझे ज्ञात हुआ कि दोनो के सामजिक स्तर मे काफी अंतर है। लडकी उंची जाति से है और सुरेश उससे नीची जाति से है। मैने उन लोगो के भविष्य मे आनेवाली समस्याओ का अनुमान लगा लिया था। मुझे मालूम था कि समाज अभी इतने खुले दिल का नही हुआ है।

बाद मे मैने इस विषय पर राजेश और प्रवीण से चर्चा की, किसी ने गंभीरता से नही लिया। सभी को यही लगा कि कुत्ते की दुम सीधी नही हो सकती।

इस बीच मै चेन्नई आ गया था, राजेश लंदन मे था, प्रवीण डलास पहुंच गया था। सभी के सभी अपनी अपनी राह चल दिये थे। संपर्क का माध्यम फोन और ईमेल थे। कुछ दिनो के बाद सुरेश ने राजेश से कुछ आर्थिक सहायता की मांग की। राजेश ने कारण पूछा, जवाब था “शादी करनी है“। हम लोगो (मै, राजेश और प्रवीण) की आपातकालीन चैट पर चर्चा हुयी और निर्णय हुआ कि सुरेश को आर्थिक सहायता नही दी जाये। कारण ये था कि उसका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था और उसके परिवार मे लडकी स्वीकार्य थी। कोई परेशानी थी तो लडकी के घर से। हमने उसे सलाह दी कि अपने घर वालो से बात करे, जरूरत पढने पर हम बात कर सकते है। उसे यह भी कहा गया कि शादी से पहले कम से कम वह कोई नौकरी या काम् करना शुरू करे।

इस घटना को कुछ महीने गुजर गये बात आयी गयी हो गयी। उसका हमसे संपर्क टूट गया। हम लोगो ने भी इसे गंभीरता से नही लिया।

अचानक एक दिन भंडारा से एक दोस्त का मेल आया कि सुरेश ने आत्महत्या कर ली है। हम लोग सन्न रह गये। एकबारगी विश्वास नही हुआ कि सुरेश ऐसा कर सकता है। खोजबीन से पता चला कि इस बार सुरेश को उस लडकी ने गच्चा दिया था। उसके परिवारवालो को सुरेश स्वीकार नही था। उस लडकी ने परिवारवालो के दबाव मे या किसी अन्य कारणवश शादी से इंकार कर दिया। ये झटका सुरेश सहन नही कर पाया और आतमघाति कदम उठा बैठा।

मुझे आज भी विश्वास नही होता कि सुरेश जिसके लिये लडकी की किमत एक खिलौने से ज्यादा नही होती थी, एक लडकी के धोखा देने पर आत्महत्या कर बैठा।

मुझे सुरेश के लिये कोई दुःख नही है, वो तो कायर निकला। दुख है ‘काकू’ के लिये। अब सुरेश तो नही है लेकिन हम लोगो मे से भी कोई  उनके आसपास नही है।

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चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये

रविवार, जुलाई 23, 2006


अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
घर से मस्जिद है बहुत दूर ,चलो यू टर्न ले
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
निदा फाजली की ये गजल मै कल फिर एक बार “वाह वाह″ मे सुनी। जब उन्होने ये शेर पाकिस्तान मे एक मुशायरे मे पढे थे,उसके बाद कुछ श्रोताओ ने उनसे पूछा कि
“मस्जिद किसी बच्चे से बडी कैसे हो सकती है।
उनका जवाब था
"मस्जिद तो इंसान के हाथ बनाते है, लेकिन बच्चो को तो खुदा के हाथ बनाते है !"
ये पंक्तिया फिर याद आ गयी जब गढ्ढे मे गिरे बच्चे प्रिंस को बचाने के लिये मंदिर, मस्जिद और गुरुद्बारे मे प्रार्थना की गयी और सेना ने उसे बचा भी लिया !
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5 टिप्पणीयां “चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये” पर
मुंबई धमाकों की गूंज का जवाब देश के नागरिकों ने अपने जयघोष से आतंकियों और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को दिया है. ये क़ौमी एकता का जयघोष है जो प्रिंस के पुनर्जीवन के साथ आपके और मेरे सामने मीडिया के ज़रिए सुनाई दिया.
निदा साहब ने उक्त दो लाइनों में सारा निचोड़ दे दिया.
नीरज दीवान द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

मेरे खयाल से शब्द कुछ ऐसे हैंः
घर से मसजिद है बड़ी दूर चलो यूँ कर लें
रोते हुए किसी बच्चे को हँसाया जाये
anunad द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

“यू टर्न ले!” पे हंसते हंसते हाल खराब.
आशीष तुम्हारे खोपडी भी बडी फ़र्टाईल है!
क्या इसे मन-बोल मे डाला जा सकता है?
eswami द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

आशीष जी और अनुनाद जी, सही शब्द यह हैं :
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
….
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
Nidhi द्वारा दिनांक जुलाई 26th, 2006

आशीष जी…. ‘ यू टर्न लें ‘ वाक़ई आपकी रचनात्मकता की हद हो गई! फ़ाज़ली साहब को सजेस्ट किया किसी ने?
अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006

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बचपन की शरारतें भाग २

मंगलवार, जुलाई 18, 2006


मेरा गांव जहां मेरा सारा बचपन और किशोरावस्था बीता एक आम भारतीय गांव था। गांव के पश्चिम मे पाठशाला थी ,उसके बाद एक बड़ा सा मैदान। इस मैदान को ‘झंडा टेकरा’ कहा जाता था। पाठशाला के पीछे एक पहाड़ी, पहाड़ी और ‘झंडा टेकरा’ को विभाजित करती हुयी एक नहर। गांव के उत्तर मे था एक बडा बरगद का पेड़ और उसके पिछे एक बड़ा सा तालाब। बरगद के पेड़ और गांव को अलग करती एक पक्की सडक।
ये बरगद का पेड़ गांव का हृदय-स्थल था, ये बस स्थानक तो था ही साथ मे चौपाल का भी कार्य करता था। गांव के सारे के सारे ठलुये दिन भर और बाकी सभी शाम को यहीं पर पाये जाते थे।

सुबह जब चरवाहा सारे गांव से गायो को एकत्र कर चराने के लिये ले जाता था, तब उन्हे कुछ देर के लिये इसी बरगद के नीचे खडा करता था।बरसात मे जब खेतो के काम खत्म हो जाते थे ग्रामीण यहां आल्हा गाते थे। घनघोर बरसात मे आल्हा की वो तान
बढ़े लढैया गड मोहबे के जिनके बल को वार न पार
इस बरगद के पेड के नीचे कुछ चाय-पान और साइकिल मरम्मत की दुकानें भी थी। साइकिल की ये दुकानें साइकिल किराये से भी देती थीं। यहां पर हमे बच्चों के लिये छोटी साइकिलें किराये से मिल जाती थी। किराया होता था १० पैसे घन्टा !

छूट्टीयो मे हम सुबह सुबह साइकिल दुकान पहुंच जाते और साइकिले ले कर चल देते ‘झंडा टेकरा’ । साइकिलों की दौड़ होती थी और ढेर सारे करतब किये जाते थे। इन करतबो मे शामिल थे एक साइकिल पर ज्यादा से ज्यादा सवारी ले जाना। क्या आप विश्वास करेंगे कि हम लोगो का रिकार्ड है, एक साइकिल पर ७ लोगो को सवार कर सारे गांव का चक्कर( लगभग २ किमी) लगाने का ! साइकिल चला रहा था हमारा गामा पहलवान ‘अमरचन्द’ ! २ पीछे कैरियर पर थे, २ सीट पर, २ डंडे पर और १ हैंडल पर सामने देखते हुये ! सारे गांव मे बच्चे ताली बजा रहे थे और बुजुर्ग डांट रहे थे। अमरचन्द अच्छे खासे डील डौल वाला था, अपनी उम्र से ५ साल बड़ा लगता था। कबड्डी मे वह पूरी की पूरी विपक्षी टीम को अकेले खिंच लाता था।

साइकिलों के करतबो मे हैण्डल छोड़कर चलाना, उल्टे बैठकर साइकिल चलाना, कैरियर पर बैठकर चलाना, अगला चक्का हवा मे रखकर पिछले पहिए पर साइकिल चलाना और ना जाने क्या क्या करतब किये जाते थे। अब ऐसे करतब दिखांये, और गिरे पड़े ना ! ऐसा तो हो नही सकता था। घुटना और कुहनी छिलना तो रोज की बात थी। मुसीबत ये थी कि घर मे बता नही सकते थे कि आज साईकिल से गिर पड़े ! सबसे पहले पूछा जाता कि कि आज कौनसा करतब हो रहा था ? डांट तो पढती ही थी, पापा कभी कभी रात का खाना बंद करा देते थे। रात का इसलिये कि दिन मे तो हम घर के खाने कि चिंता करते ही नही थे। कहीं भी किसी के भी घर खा लिया। आम, अमरूद, इमली,हरे चने, मटर जैसे मौसमी चीजे अलग। हम कितना भी छुपांये लेकिन छोटे भाई , बहन मे से कोई ना कोई गद्दारी कर ही जाता था। उन्होने गद्दारी नही कि तो जख्मो का दर्द गद्दारी कर जाता था। दर्द से जितनी तकलीफ़ नही होती थी, तकलीफ़ होती थी जब पापा डांट के साथ ‘टिंचर आयोडीन’ लगाते थे ! दर्द से यदि कराह निकली कि गाल पर भी दर्द सहना पढ़ता था ।

हम लोगो का दूसरा खेल होता था तालाब मे तैरना! दोपहर मे जब तालाब मे कोई नही होता था, तब हम पहुंच जाते थे तालाब। घंटो तैरते रहते थे। तालाब के एक किनारे एक आम का पेड़ था जो तालाब पर झुका हुआ था। हम पेड़ पर चढ़कर तालाब मे कुदा करते थे। हम लोगो को भैंस की पुंछ पकड़ कर तालाब को पार करना सबसे मजेदार खेल लगता था। यह सब हम गांव वालो और घरवालों की नजर बचा कर किया करते थे। ये सावधानी बरती जाती कि किसी को पता ना चले कि हम तालाब मे मस्ती करते है। जरूरी ये होता था कि तालाब से बाहर निकलने के बाद कपडे और सर के बाल सूखे हो। बस हम तालाब मे नंगधडंग कूद जाते थे। कोई तालाब के आस पास फटका कि बाहर निकलो, कपड़े उठाओ और भाग लो।

एक बार हम लोग तालाब मे मस्ती कर रहे थे किसी ने मेरे घर मे खबर कर दी। जब पापा तालाब पहुंचे, हम लोग भैंस की पुंछ पकड़े हुये दूसरे किनारे जा रहे थे। तालाब से निकल कर भागना संभव नही था। कपडे भी उस किनारे पडे थे, जंहा पापा खडे थे। सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम। लेकिन पापा ने हम लोगो से कुछ नही कहा, बस किनारे रखे सारे के सारे कपड़े उठाये और चल दिये।

अब क्या करें ? सारे के सारे नंगधंडंग पानी मे !

सब एक दूसरी की तरफ देख रहे थे। ऐसे ही पानी मे खड़े खड़े एक घन्टा गुज़र गया, तब गामा पहलवान ‘अमरचंद’ आता नजर आया। जब उसे सारी बात पता चली तो वह आधा घण्टे तो हंसते हंसते लोट पोट होता रहा। उसके बाद उसे अगले हफ्ते साइकिल के किराये के पैसे देने के वादे की रिश्वत दी गयी, साथ मे ये भी वादा किया गया कि अगली अमरूदो की चोरी मे से उसके हिस्से के अलावा एक हिस्सा और दिया जायेगा। वो मेरे अलावा सबके घर जाकर सबकी मम्मीयों से उल्टे सीधे बहाने बनाकर कपड़े ले आया। मेरे घर मे पापा ने उसे दरवाज़े से ही भगा दिया। लेकिन गामा पहलवान कम नही था, वह मेरे लिये अपने कपड़े ले आया था। सबने कपडे पहने। मैने अमरचन्द के कपडे पहने। उसके कपडे मुझ पर ऐसे लग रहे थे जैसे कि हैंगर पर कपडे सुखते है !

शाम को मेरी मिंत्र मंडली जब कपडे लेने मेरे घर पहुंचे, उन्हे पापा ने कपडो साथ ‘प्रसाद’ दिया और लम्बा चौडा भाषण पिलाया। मेरे साथ क्या हुआ ये अब मै ही बताउंगा क्या ?


5 टिप्पणीयां “बचपन की शरारतें भाग २” पर
मतलब चीरहरण सिर्फ गोपियों का ही नहीं हुआ था। पिता भी कृष्ण की भूमिका कर सकते हैं जिनके लिये बच्चे गोपियां होते हैं।अच्छा लगा विवरण। आगे बताओ क्या हुआ तुम्हारे साथ?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006

वाह वाह, मजा आ गया और हँसी भी आई।
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006

बढिया लगा .बहुत अच्छा लिखा . पूरा दृश्य आँखों के सामने आ गया
pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006

बहुत बढ़िया किस्से हैं आशीष । लगता है बचपन में आप बहुत पिटे हैं । लड़के खैर शायद सभी पिटते हैं । आपकी ख़ुराफ़ातें पढ़ के लगा कि बचपन का भरपूर आनंद उठाया है आपने ।
निधि द्वारा दिनांक जुलाई 22nd, 2006

मस्त लिखा है…आगे भी लिखें इसी सीरीज़ में!
अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006

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अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले

सोमवार, जुलाई 17, 2006


लालु और सूअर का बच्चा
लालुजी अपने ड्रायवर के साथ एक बार कार से जा रहे थे। एक गांव से पहले उनकी कार के निचे एक सूअर का बच्चा कुचल कर मर गया। लालुजी दुखी हुये। ड्रायवर को कुछ पैसे दिये और कहा कि “गांव मे जाओ और सूअर के मालिक को मुआवजा दे आओ”
ड्रायवर पैसे लेकर गांव चला गया। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गये ड्रायवर वापिस नही आया। लालुजी बैचेनी से टहलते रहे। तिसरे घंटे के आखिर मे ड्रायवर एक बोरा सिर पर लादे आते दिखा। पास आने पर लालुजी ने पूछा “का रे ड्रायबर , अतना देर काहे लगा दिये ? अउर इस बोरा मे का लाये हो”
ड्राववर “इस बोरा मै पैसा है मालिक”
लालु ” क्यो गांव मे का हुवा, तुम्हे अतना पईसा किसने और काहे दे दिया ?”
ड्रायवर “हमको कुछ नाही पता, हम तो गांव मे जाके इतना ही बोला कि हम लालु का ड्रायवर हूं और हमने उ सूअर का बच्चा मार दिया हूं”
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दवा
कुत्ता और पत्नी दोनों के बीमार होने पर एक व्यक्ति दवा खरीदने गया। व्यक्ति ने दुकानदार से कहा, ‘दवाइयों को अलग-अलग लिफाफे में रखकर उस पर लिख दें कि कौन-सी मेरी बीवी के हैं और कौन-सी मेरे कुत्ते की। मैं नहीं चाहता कि दवा बदल जाए और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाए।’
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मित्र
रेखा ने अपने पति रोहित से कहा, ‘हमारी शादी में तो आपके बहुत से मित्र आए थे, अब उनमें से कोई नहीं आता।’ रोहित ने कहा, ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोय…।’
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पदयात्रा
मत्री जी की पदयात्रा सुबह सुबह एक गांव से गुजरने वाली थी। दोपहर को निरज दिवान जी उस गांव मे भागते हुये पहुंचे और एक व्यक्ति से पोछा ” क्या नेताजी गुजर गये ?” उसने जवाब दिया “काश नेताजी गुजर जाते ?”
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धुलाई
रमेश धोबी को डांटते हुए, ‘एक तो तुमने मेरी पेन्ट गुम कर दी, ऊपर से धुलाई के पैसे मांग रहे हो?’ धोबी ने कहा, ‘साहब, पेन्ट धुलने के बाद गुम हुई थी।’
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स्कूल
कसाई बकरे को लेकर काटने जा रहा था। बकरा चिल्ला रहा था। इसे देख सोहन अपने पिता से बोला, ‘पिता जी, यह बकरा क्यों चिल्ला रहा है?’ पिता ने कहा, ‘बेटा, कसाई इसे काटने जा रहा है।’ सोहन ने कहा, ‘मैंने सोचा यह स्कूल जा रहा है।’
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किराये का मकान
किरायेदार ने मकान मालिक से कहा, ‘भाई साहब, आपने कैसा मकान मुझे किराये पर दिया है, वहां चूहे ही दौड़ते रहते हैं।’ मकान मालिक ने कहा, ‘तो क्या इतने कम किराये में आप घोड़ों की रेस देखना चाहते हैं।’
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प्रेम
कमला ने हरीश से कहा, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती रमेश।’ हरीश ने कहा, ‘लेकिन मैं रमेश नहीं हरीश हूं।’ कमला ने कहा, ‘सॉरी डार्लिग, मैं भूल गई थी कि आज रविवार नहीं सोमवार है।’ हरीश ने कहा, ‘क्या कहा, सोमवार है? अब मैं चलता हूं, पता नहीं सीमा कब से मेरा इंतजार कर रही होगी।’
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नाम
एक ड्राइवर को तेज मोटर चलाने पर सिपाही ने रोका और डायरी निकालकर पूछा, ‘आपका नाम?’ ड्राइवर ने कहा, ‘मेरा नाम है कपालामत चंद्रा तसकल काततीमयु नाकु दा…।’ सिपाही ने कहा, ‘बस, बस। जाओ, आगे से इतनी तेज गाड़ी मत चलाना।’
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गुस्सा
सोहन ने राहुल से पूछा, ‘यार, तुम्हारी बीवी को जब गुस्सा आता था तो वह काटना शुरू कर देती थी। अब काटती है या नहीं?’ राहुल ने कहा, ‘नहीं।’ सोहन ने पूछा, ‘क्यों, क्या उसे अब गुस्सा नहीं आता?’ राहुल ने कहा, ‘ऐसी बात नहीं है। गुस्सा तो आता है, पर अब दांत नहीं रहे।’
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प्रश्नपत्र
अध्यापक ने परीक्षा से पहले विद्याथियों से कहा, ‘बच्चों, परीक्षा नजदीक है, प्रश्न पत्र छपने के लिए जा चुके हैं। फिर भी अगर किसी को कुछ पूछना हो तो, वह पूछ सकता है।’ सौरभ ने कहा, ‘सर, एक प्रश्न है।’ अध्यापक ने कहा, ‘पूछो?’ सौरभ ने कहा, ‘सर, ये प्रश्नप्रत्र कहां छप रहे हैं।’
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मंहगाई
पिंकी की मां ने डाक्टर से कहा, ‘डाक्टर साहब, पिंकी बढ़ नहीं रही है, इसके लिए कोई दवा बताएं।’ डाक्टर ने दवा के बदले उपाय बताते हुए कहा, ‘इसका नाम बदल कर महंगाई रख लो, फिर इसे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।’
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मौके की तलाश
एक व्यक्ति बहुत देर से एक दुकान का चक्कर लगा रहा था। दुकानदान ने कहा, ‘भाई साहब, आखिर आपको चाहिए क्या?’ व्यक्ति ने कहा, ‘कुछ सामान ले जाने का मौका।’
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दांत में दर्द
सिनेमा हॉल का गेट कीपर दांत के डाक्टर के पास गया। डाक्टर ने पूछा, ‘तुम्हारे कौन से दांत में दर्द हो रहा है?’ गेट कीपर ने कहा, ‘ऊपर की बॉलकानी में दूसरे नंबर के दांत में।’
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फिजूलखर्च
कंजूस पति ने अपनी पत्नी से कहा, ‘तुम फिजूलखर्ची बहुत करती हो। भगवान न करे, यदि मुझे कुछ हो गया तो तुम्हें भीख मांग कर गुजारा करना होगा।’ पत्नी ने कहा, ‘तुम इसकी चिंता मत करो। तुम से मांगते-मांगते मुझे अब भीख मांगने की आदत पड़ गई है।’
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नजर
एक मरीज की आंखे कुछ ज्यादा ही कमजोर थीं। एक भी अक्षर पढ़वा पाने में नाकाम डाक्टर ने हारकर मरीज से आंखों के ठीक सामने थाली अड़ाकर पूछा, ‘क्या यह चीज तुम्हें दिखती है?’ मरीज ने कहा, ‘जी, दिखती है।’ डाक्टर ने पूछा, ‘क्या है?’ मरीज ने कहा, ‘ठीक-ठीक नहीं बता सकता, चवन्नी है कि अठन्नी है।’
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शर्म
मिस्टर वर्मा ने भिखारी से कहा, ‘भीख मांगते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए। मेरे साथ चलो, मेरे घर काम करना। मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा।’ भिखारी ने कहा, ‘अच्छा ठीक है, तुम मेरे साथ बैठ जाओ। मैं तुम्हें बीस रुपए दूंगा।’
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दिल
एक व्यक्ति पायलट के लिए इंटरव्यू देने पहुंचा। इंटरव्यू में उससे पूछा गया, ‘आपका दिल कहीं कमजोर तो नहीं?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी नहीं साहब, मेरा दिल तो इतना मजबूत है कि पिछले तीन सालों ने मुझे तीन-तीन दिल के दौरे पड़े फिर भी मैं जिंदा हूं।’ उस व्यक्ति से फिर पूछा गया, ‘दौरे तुम्हें कब-कब पड़े?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी जब श्रीदेवी, माधुरी और काजोल की शादी हुई थी तब।’
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कैदी
जेलर ने कैदी से पूछा, ‘जेल से छूटने के बाद क्या करोगे?’ कैदी ने उत्तर दिया, ‘जी, जौहरी की दुकान खोलूंगा।’ जेलर ने पूछा, ‘लेकिन जौहरी की दुकान खोलने के लिए इतना रुपया कहां से लाओगे?’ इस पर कैदी ने कहा, ‘जेलर साहब आप भी कमाल करते हैं, किसी जौहरी की दुकान खोलने के लिए तो मुझे सिर्फ एक हथोड़े की जरूरत होगी।’
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रिकार्ड
हरीश ने अपने मित्र से कहा, ‘यार, यह आदमी अपने-आप को जूते क्यों मार रहा है?’ मित्र ने कहा, ‘यह गिनीज बुक में जूते खाने का रिकार्ड अपने नाम करवाना चाहता है।’
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लाल-पीला
बबलू ने राम से कहा, ‘यार, तुम छोटी-छोटी बातों पर लाल-पीले हो जाते हो।’ राम ने कहा, ‘क्या कंरू, मेरा जन्म ही होली के दिन हुआ था।’

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4 टिप्पणीयां “अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले” पर
वाह ! वाह!!
ठहाके दार डरे आप तो.
रवि द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

:-D
संजय बेंगाणी द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

Thanx for Hansana  
SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

[…] चुटकुलों के कुछ मंतव्य ने भी बहुत आनंद प्रदान किया, और हो� ों पर हँसी वापस आई. मिर्ची से� यानी की पंकज भाई . […]
अवलोकन - चुटकुलों की 21 वीं अनुगूंज at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक जुलाई 20th, 2006

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मेरे बचपन की कुछ शरारतें

रविवार, जुलाई 16, 2006


ये किस्से उस समय के है जब मै प्राथमिक पाठ्शाला मे था। हम महाराष्ट्र के गोंदिया जिले मे एक गांव झालिया मे रहते थे, गांव के बाहर थी हमारी पाठशाला। पाठशाला के ठीक सामने एक बडा सा मैदान और एक कुंआ। एक तरफ ध्वजस्तंभ,जिसका प्रयोग साल मे दो बार १५ अगस्त और २६ जनवरी को होता था। पाठशाला के एक तरफ थी,पानी की नहर, पीछे एक छोटी सी पहाड़ी।

पाठशाला की इमारत का निर्माण इस तरह से किया गया था कि किसी भी कक्षा मे प्रवेश करने के लिये तीन सीढीया चढनी होती थी। पाठशाला का समय होता था ११ बजे सुबह से ५ बजे शाम तक का । पहले २ शिक्षण अंतराल के बाद १५ मिनिट की छूट्टी, उसके बाद २ शिक्षण अंतराल होते थे। तपश्चात होता था भोजनावकाश। उसके बाद २ और शिक्षण अंतराल। अंत मे बारी आती थी खेल कूद की। ये था हमारी पाठशाला की दिनचर्या।

अब सवाल ये है कि पाठशाला के नक्शे और हमारी शरारतो का क्या संबध ? जी हां बिलकुल संबध है बस आप पढते जायीये ! रूकिये हम अपने शिक्षको से भी परिचय करवा दे। हमारे मुख्याध्यापक थे लिल्हारे गुरूजी और कक्षाध्यापक तो हर साल बदलते रहे, लेकिन कक्षा १ से ३ तक जांभुळ्कर गुरूजी, कक्षा ४ मे तिवारी गुरूजी, कक्षा ५ मे बडी शेख बहनजी, कक्षा ६ मे टाटी गुरूदेव और कक्षा ७ मे कुराहे गुरूजी।

लिल्हारे गुरूजी से सभी थरथर कांपते थे, गणित के अच्छे अध्यापक थे। लेकिन उनके थप्पड से गाल पर पंजाब का नक्शा बनना तय होता था। जांभुळ्कर गुरूजी सभी छात्रो को गांधीजी बनने की शिक्षा देते थे। उनका कहना रहता था कि एक गाल पर थप्पड पढने पर दूसरा गाल सामने करना चाहिये!

ऐसी ही थी मेरी कक्षायें भी
तिवारी गुरूजी सबसे अलग थे। वे एक अच्छे नाट्य/नृत्य निर्देशक थे। उनके पास आईडियो और कहानीयों का खजाना होता था, उनके निर्देशन मे हमने शिवाजी द्वारा अफजल खान का वध का नाटक, आदिवासी नृत्य जैसे कार्यक्रमो मे भाग लिया था। बडी शेख बहनजी संगीत मे अच्छा ज्ञान रखती थी,कुराहे गुरुजी अंग्रेजी मे। मेरे प्रिय शिक्षक थे टाटी गुरुदेव, उन पर तो एक पूरा चिठठा लिखना है। हम लोगो ने शतरंज उन्ही से सीखा और अष्टांग योग भी।

शाम को ६ वे शिक्षण अंतराल के बाद होते थे खेलकूद के २ अंतराल। हम सभी के सभी खेलमैदान पर होते थे। कबड्डी, खो खो और दौड भाग के खेल चलते रहते थे। कभी कभी पीटी और योग सीखाया जाता था लेकिन अधिकतर समय कबड्डी और खो खो। अपने सहपाठीयो के कद काठी की तुलना मे,मै उस समय काफी छोटा था। गाँव का स्कूल था , अधिकतर बच्चे सात/आठ की उम्र से स्कूल आते थे, जबकि मै साढे चार साल की उम्र मे स्कूल पहुंच गया था। मै खेलो मे सिर्फ खोखो खेल पाता था, कबड्डी मे छोटे कदकाठी से मेरा तो कचूमर निकल जाता था। दौड़ भाग वाले खेल मे भी हमारे बुरे हाल थे। जबकि खोखो मे तो हम अपनी चपलता और छोटे कद के कारण ही चल जाते थे।

खेलकूद के अंतराल के बाद छुट्टी की घंटी जब बजती थी, तब हाल देखने लायक होता था। सारे के सारे छात्र अपना बस्ता लेने दौड पढते थे अपनी अपनी कक्षा की ओर। तीन सीढी चढने के बाद दरवाजे से जो अंदर चला गया वो बस्ता लेकर बाहर आने की कोशीश करता, जो बाहर रह गये वो अंदर जाने की कोशीस करते थे। बस ना अंदर वाले बाहर आ पाते थे ना बाहर वाले अंदर जा पाते। इस धक्कामुक्की मे रोज कोई ना कोई सीढीयों से नीचे गिरता था। जैसे ही उसका रोना शूरू होता, लिल्हारे गुरुजी पहुंच जाते अपनी छडी लेकर। उन्हे देखते साथ कतार बन जाती , फिर भी दो तीन छात्र पिट जाते थे। वे बडबडाते चले जाते, इन्हे रोज कतार लगाना सिखाओ ,दूसरे दिन वही हाल हो जाता है। इस सारे हंगामे मे मेरे बुरे हाल हो जाते थे,मै तो सीढ़ियों से रोज गिरने वालो मे से एक था। मेरा एक ऐसा ही साथी था नरेंद्र।

हमने इसका एक जुगाड निकाला। कक्षा की पिछली खिडकीयो से एक सलाख को थोडा मोड दिया। कैसे ? गुरूदेव की कुर्सी का सदूपयोग करके। अब खिड़की मे इतनी जगह हो गयी थी कि हम आराम से अंदर आ सकते थे और बाहर जा सकते थे। बस फिर क्या था। हमारा रोज का धक्कामुक्की मे सीढ़ियों से नीचे गीरना बंद हो गया था।

कुछ दिनो के बाद लिल्हारे गुरूजी की नजर मे आगया कि हम लोग दरवाजे से अंदर नही जा रहे है ना बाहर आ रहे हैं। हमारा सीढीयों से गिरकर रोना जो बंद हो गया था। बस एक दिन हम अपनी मस्ती मे बस्ता लिये खिड़की से बाहर कुदने ही वाले थे कि नीचे से आवाज आयी
“आओ बेटा इधर आओ”
नीचे देखा लिल्हारे गुरूजी अपनी छ्डी के साथ खडे है, बाजू मे नरेंद्र सहमा हुआ खडा है। हमारी समझ मे आ गया कि नरेंद्र ने विभीषण , जयचण्द और मीरजाफर की परंपरा को आगे बढाया है।

अब आगे क्या लिखूं आप समझ जाईये…..

मेरा घर पाठ्शाला से ५०० मीटर की दूरी पर था। मै पाठ्शाला के पीछे से पहाडी के सामने होते हुये भोजनावकाश मे घर जाता था और भोजन के बाद वापिस आता था। जब मै भोजनावकाश के बाद वापिस आता था उसी समय एक रेल गुजरती थी। रेल की सिर्फ आवाज आती थी दिखायी नही देती थी। एक दिन पहाड़ी पर चढ गये, सबसे उपरवाले पत्थर पर पर चढकर देखा, दूर रेल जाते हुये माचिस के डिब्बो के आकार मे दिखायी दे रही है। बस क्या था? रोज का काम हो गया। पहले मै अकेला जाता था, लोग साथ आते गये और कांरवां बनता गया।

अब पता नही कैसे लिल्हारे गुरूजी को पता चल गया कि भोजनावकाश के बाद बच्चे पहाड़ी के आसपास से आते है। एक दिन ऐसे ही रेल देखने के बाद हम पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे वही आवाज आयी
“आओ बेटा, इधर आओ………………”
जारी अगले अंको मे…………………

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6 टिप्पणीयां “मेरे बचपन की कुछ शरारते.” पर
आशीष जी,
बढ़िया संस्मरण हैं। अगली किश्त का इन्तज़ार है
Laxmi N. Gupta द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

खूब लिखा है। आगे टाटी गुरू के बारे में लिखा जाये जल्दी।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

बहुत रोचक लिखा है आशीष भाई. आपकी कक्षा ७ तक की शिक्षा मराठी माध्यम में हुई थी क्या?
अमित द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

नही अमित, मराठी मेरी तृतिय भाषा थी। मेरी शिक्षा १० तक हिन्दी माध्यम से और उसके बाद अंग्रेजी माध्यम से हुयी है।
वैसे मै मराठी पढ लिख और बोल लेता हूं !
आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

बहुत खूब, रोचक लेख है
SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

अच्छा लगा।
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006

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गुरु पूर्णिमा

मंगलवार, जुलाई 11, 2006


आज गुरु पूर्णिमा है, वेद व्यास का जन्मदिन ! गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें हम अपने गुरुजनों, श्रेष्ठजनों व माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा उनका आदर करते है।

इस दिन के साथ बचपन की काफी सारी खट्टी मीठी यादे जुड़ीं हुयी हैं। मुझे याद है कि मेरा स्कूल मे प्रवेश इसी दिन कराया गया था। सुबह कलम -पाटी पूजा हुयी थी, तिलक लगाया गया था। पाटी पर एक बड़ा सा ॐ बनाया गया था। एक मंत्र भी पढ़ा गया था
ॐ नमः सिद्धम ।
ॐ नमः सिद्धम । इस मंत्र से याद आया कि हमारे गांव मे एक बुजुर्ग हुआ करते थे, वे इस मंत्र को बिगाड़ कर कहते थे
आनामाशी धम, ना बाप पढ़े ना हम ।
पापा ने उसके बाद मुझे स्कूल लेकर गये थे। हंसते हंसते पापा की साईकिल पर बैठकर स्कूल गये थे और रोते रोते वापिस आये थे। अब रोते हुये इसलिये आये थे कि पापा तो नाम लिखा कर हमे झांसा देकर खिसक लिये थे। कुछ देर बाद पापा दिखायी नही दिये तब रोना शुरू! वो तो गनीमत थी (शिक्षिका बहनजी के लिये) कि मेरे पड़ोस की प्रभा दीदी भी उसी स्कूल मे पढ़ती थी। उन्होने हमे सम्हाला और शाम को घर वापिस लेकर आयी थी।

स्कूल मे हर साल यह दिन धूमधाम से मनाया जाता था। हम पाटी पर , बाद मे पूस्तिका पर ॐ बनाकर स्कूल जाते थे। स्कूल मे वेदव्यासजी और ॐ की पूजा होती थी। शिक्षकों के भाषण होते थे और छुट्टी। मेरी शिक्षिकाओ मे से दो मुस्लिम थी (छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी)। स्कूल मे हर शुक्रवार सरस्वती पूजा भी होती थी, लेकिन उन्होने हमेशा हर पूजा मे सक्रिय रूप से भाग लिया था। उस समय मुझे सब कुछ सामान्य लगता था। आज जब मै स्कूलों मे पूजा पाठ, प्रार्थना और तो और राष्ट्रगान(वंदे मातरम) पर विवाद के बारे मे पढ़ता हूं तो आश्चर्य होता है कि मेरे बचपन मे सरस्वती और वेद व्यास की पूजा छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी ने करवाई है।

समझ मे नही आता कि ऐसा धार्मिक सौहार्द पता नही क्यो राजनिति की बली चढ जाता है !

मेरे एक शिक्षक थे टाटी गुरू(जी), मै उनके प्रिय छात्रो मे से एक था। उन्हे मुझसे काफी आशायें थी। वे मुझसे पूछा करते थे कि “मै तेरा क्या हूं,गुरू या गुरुजी”। उस समय मेरी समझ मे नही आता था कि उनका इस अजीब से प्रश्न का मतलब क्या है ? मै जवाब देता था “गुरु जी”। हमारी आदत थी कि सम्मान देने के लिये हर वाक्य के बाद ‘जी’ लगा दो और हम ‘गुरु’ के बाद ‘जी’ लगा देते थे। वे थोडे निराश हो जाते थे। बाद मे जब बडे हुये और इस प्रश्न का मतलब समझ मे आया तबसे हम उन्हे टाटी गुरुदेव ही कहते हैं। उन्होने हमे गुरू का अर्थ बताया था जो आज भी याद है
जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर सके वही गुरु है।
उनका एक और कथन मुझे याद आ रहा है
“गुरु मे वह शक्ति होती है जो एक चरवाहे को मगध सम्राट बना सकती है।“
समस्त गुरुजनो को सादर नमन !
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5 टिप्पणीयां “गुरु पूर्णिमा” पर

हमारा भी नमन शामिल है गुरुजन के लिये!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

संसार के समस्त गुरुओं को मेरा नमन्
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

बहुत बढिया लिखा. गुरु पूर्णिमा पर इससे बेहतर लेख नहीं हो सकता था
pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

ज्ञान की जगह शायद अज्ञान हो।(भूले से लिखा गया) ज्ञान का प्रकाश होता है। लेख बहुत ही अच्छा है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

अब ठीक है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 13th, 2006

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मेरे बारे मे

आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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