उत्तर विशेषज्ञ : मेरा मुफ्त सलाह केन्द्र

सोमवार, दिसंबर 26, 2005



आजकल मै थोडा परेशान हुं। ना ना अपनी परेशानीयो से नही, लोगो की परेशानीयो से। अब समझ मे नही आता ऐसा क्या है कि जो देखो अपना दुखडा लिये मेरे पास चला आता है। और दुखडे भी ऐसे कि जिसका मुझे कोई अनुभव ही नही है। कुल मिला कर मै दुखियारा मौसा((Agony aunt का पुरूष वाचक शब्द) बन गया हुं आजकल।

हम ठहरे जावा के मास्टर, जावा के हर मर्ज का ईलाज है हमारे पास, लेकिन आजतक किसी ने एक ठो सवाल नही पूछा। तकनीकी समस्या के लिये सबके पास गूगल जो है, लेकिन अपने हर दुखडे के लिये लोगो ने हमे गूगल बना दिया है…

हमारे मद्रासी साथी सुबु की सगाई हो गयी है। कुछ ही दिनो मे बर्बाद होने जा रहे है। काफी बडा मसला है। हम भी थोडे उत्साहित थे, चलो अपना पूराना यार शादी कर रहा है। लेकिन सुबु भाई हर दिन कोई ना कोई समस्या लेकर हाजीर। इस सप्ताहांत मे उससे मिलने कि योजना है कहां जाना चाहिये ? कल उसका जन्मदिन है क्या उपहार देना चाहिये ? लडकियों को क्या पसन्द होता है वगैरहा वगैरहा। अब इन्हे कोई बताये अगर हमे खुद यह सब मालूम होता तो हमारी खुद की शादी ना हो गयी होती ?

अब हमारे साथ हमारे रूम मे रहने वाले नन्दी महाराज को इश्क हो गया। सहायता सलाह के लिये पहुच गये हमारे पास। हमने अपनी तरफ से पूरी कोशीश की, हर तिकडम लगाई, ढेरो जुगत बतायी, नन्दी भाई ने पूरी कोशीश भी की लेकिन नतिजा सिफर रहा। अब तो नन्दी महाराज को समझ आ जाना चाहिये था कि हमारी सलाह से उसका भला होने की बजाये नुकसान हो गया। ना जी ना, मेरा कन्धा जो हाजीर था उनके आंसुओ से भीगने के लिये !

हमारे एक जिगरी दोस्त है राजेश। अंग्रेज हो गये है, मतलब यु के मे काम कर रहे है। हम उनके पूराने परामर्शदाता है। पहले प्यार से लेकर अब तक के दर्जनो प्यार मे हम उनकी नैया पार करा(डुबा) चुके है। उनकी नयी नयी समस्या ये है कि उनका भी शादी का मूड बन गया है। अब समस्या ये है कि उन्हे जो लडकी पसंद है वो पिताश्री और भ्राताश्री को पसन्द नही, लेकिन मम्मी और बहन को पसंद है। घर मे महाभारत छिड़ा हुवा है। पिताश्री और भ्राताश्री एक ओर कौरव पक्ष मे, मम्मी और बहन दुसरी ओर पाडंव पक्ष , बिच मे खडे है राजेश भाई अर्जुन बन कर। हमारे कलयुगी अर्जुन को हम श्रीकृष्ण नजर आते हैं !

एक और यार है संजय। उम्र हो चली है, ३० साल से उपर के है। उनसे बडे भाई भी अब तक सुखी है मतलब क्वारें है। इनकी समस्या ये है कि बडा भाई शादी करने तैयार नही है, पिताश्री का दबाव अब इन पर है कि जब बडा शादी नही कर रहा है तो छोटा ही कर ले। अब दुखडा सुनने के लिये, सलाह देने मै हुं ना । बडे भैया से बात की तो भैया हम पर गुर्राये
 ” ज्यादा अकल आ गयी है क्या ? तु खुद शादी क्यो नही कर रहा ?”
 संजय को समझाया कि भाई तु तो शादी कर ले। संजय भाई बडी दुख भरी आवाज मे बोले
“आशीष तु भी” !”
पूरे जुलियस सीजर के अंदाज मे “ब्रुटस यु टू"

मेरा दुसरा रूम पार्टनर अन्ना की समस्या और भी विकट है। भाई को नौकरी मिले जुम्मा जुम्मा २ साल हुये है, वेतन ठिकठाक है लेकिन इतना नही कि बीवी के साथ खुश रह सकें। लेकिन माता पिता हाथ धोकर पिछे पड़े है कि अन्ना शादी कर ले। यहां तक तो ठिक है, उन्होने लडकी भी पसन्द कर ली है। वैसे लडकी अपने हीरो(?) को भी पसन्द है। अब अन्ना अपना दुखडा रोने के लिये कहां जाये ?

सुबह शाम एक ही रट :
“दादा , मै क्या करू ?”
 “करना क्या है, मा बाप ने जब सोच लिया है तो शादी कर ले। जब की तब देखी जायेगी”
 “लेकिन दादा मेरे इतने से वेतन मे क्या होगा ? कैसे गुजारा चलेगा ?”
हम मन ही मन मे
” पूछ तो ऐसे रहा है कि मैने २-३ बीवीया कर रखी है।”
प्रत्यक्ष मे
“ भैया लडकी अच्छी होगी इतने वेतन मे संतोष कर लेगी, नही होगी तो तु लाख रूपया भी कमा तो भी संतोष नही होगा !” 
मै एक दार्शनिक सा चेहरा बना लेता हुं।

”दादा लेकिन उसके भी तो कुछ सपने होंगे, कुछ सोच रखा होगा। उसका क्या होगा ?”

मै अपना सीर पिट रहा हुं!
 “कोई बात नही यार शाम को बात करते है!”
शाम को फीर से
“दादा,अगर वो नौकरी करे तो कैसा रहेगा  ?”
मै मन मे
“अबे उसके सपने गये तेल लेने। ” 
प्रत्यक्ष मे
“बढिया आईडिया है, ये तुने पहले क्यों नही सोचा ?”
”लेकिन दादा कौनसी नौकरी अच्छी रहेगी ”
” देख वो संगणक विज्ञान मे एम एस सी है, अपनी कम्पनी मे कोशीश कर लेते है। यहां नही हुवा तो बी पी ओ मे तो आराम से हो जायेगा”
एक सुबह अन्ना:
“दादा , सब घपला हो गया , उसकी अंग्रेजी अच्छी नही है। उसकी नौकरी के वांदे हो जायेंगे”
” क्यों भाई ऐसा क्या हो गया ?”
“आज मैने उससे अंग्रेजी मे बात की, वो जवाब नही दे पा रही थी!”
“अबे अंग्रेज, वो थोडा घबराहट मे नही बोल पा रही होगी। कुछ लोग आत्माविश्वास की कमी से अंग्रेजी नही बोल पाते है”
“नही दादा मेरा मन अब घबरा रहा है”
” एक काम कर उसको याहू चैट पर बुला, और बात कर। वो यदि चैट पर यदि अंग्रेजी मे लिख कर बाते कर सकती है तो इसका मतलब होगा कि उसे अंग्रेजी आती है बोल नही पा रही है। और यदि ऐसा है तो धीरे धीरे ठिक हो जायेगा। और वह अंग्रेजी बोलने का कोर्स भी कर सकती है”
शाम को अन्ना :
“दादा, मैने मामला सेट कर दिया है। वो अगले हफ्ते से अंग्रेजी का कोर्स कर रही है”
आज सुबह अन्ना :
“दादा, शादी के बाद लिये क्या क्या खरीदना चाहिये। किस किस चिज की जरूरत होगी ?”
कोई बात नही यार शाम को आराम से बैठकर बात करते है ”
हम उपरवाले को याद कर रहे है
“हे भगवान यहां तो ठिक है, उपर ऐसे रूम पार्टनर मत देना। “
अब रात हो गयी है, कार्यालय मे कोई नही है लेकिन मै अभी भी कार्यालय मे बैठा हुं। मुझे रूम जाने से डर लग रहा है। रूम पर अन्ना बैठा है अपने सवालो को लेकर !



3 टिप्पणीयां “उत्तर विशेषज्ञ : मेरा मूफ्त सलाह केन्द्र” पर
बबुआ, तुम भी सलाहकार खोजो न कोई। अपना भी कुछ हिसाब बनाओ। कब तक दूसरों को डुबाते रहोगे?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक दिसम्बर 27th, 2005

Ashish tumko shadi karne ki koi jaroorat nahi hai, jaab doston ne hi saari samasyein gift main de di hain to phir tum shadi karke kaise apna swasthya bigadoge.
kali द्वारा दिनांक दिसम्बर 27th, 2005

भई, पढ़कर मज़ा आ गया। आप यह प्रविष्टि अपने सभी दोस्‍तों को पढ़वा दीजिए। इससे आपका और आपके दोस्‍तों का, सबका ही फ़ायदा होगा। आपका फ़ायदा यह होगा फिर कोई आपसे सलाह नहीं मांगेगा, क्‍योंकि सब जान जाएंगे कि आपने जिसे जो भी सलाह दी है उसका परिणाम उल्‍टा ही निकला है। ऐसी सलाह से वंचित रहना तो आपके दोस्‍तों के लिये भी लाभदायक साबित होगा।
Pratik Pandey द्वारा दिनांक दिसम्बर 28th, 2005

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आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे

गुरुवार, दिसंबर 22, 2005



किस्मत ऐसी पायी है कि मुझे अलग अलग जगह भिन्न भिन्न लोगो के साथ काम करने का सौभाग्य मिलता है। एक अलग ही आनन्द आता है । ऐसे भी मै सुचना तकनीक के क्षेत्र मे काम कर रहा हुं, यह एक ऐसा क्षेत्र है कि आप को भारत के हर कोने से आये हुये सहकर्मियो के साथ काम करने का मौका मिल जायेगा, चाहे आप जहां हो।


अब जब ऐसे वातावरण मे काम करते हों जहां अलग अलग संस्कृति और अलग अलग भाषा भाषी साथ हो तब कभी कभी कुछ मनोरंजक परिस्थितियां पैदा हो जाती है।


मै उस समय दिल्ली मे रहता था और गुडगांव मे काम करता था। कंपनी की बस से गुडगांव आना जाना होता था। हमारी बस का ड्राइवर काफी रंगीले मिजाज का हुवा करता था। बस चालू करने से पहले बस का थका हुवा डिब्बा( म्युझिक सिस्टम ) चालू करता था। आम बस ड्राइवरो के जैसे उसके गानो की पसन्द हुवा करती थी। उसका सबसे ज्यादा पसन्दीदा गाना था
चल चमेली बाग मे
मेरे साथीयो मे एक सुबु था, जो मद्रासी(तमील) था। हम लोग बस मे साथ ही बैठा करते थे। सुबु कभी शांत ना बैठने वालो मे से था। उसे हिन्दी नही आती थी, लेकिन दिल्ली मे हिन्दी के बिना जीना मुश्किल है। वह धीरे धीरे हिन्दी सीख रहा था। अब वो काम चलाउ हिन्दी बोल लेता था लेकिन हिन्दी गाने उसके समझ से बाहर थे। मै अक्सर उसे गानो का मतलब भावानुवाद कर बता देता था। लेकिन सुबु भाई अड गये उन्हे भावानुनाद नही हर शब्द का अनुवाद चाहिये जिससे वो अपने हिन्दी का शब्द्कोष बढा सके। वाजिब मांग थी, मै मना भी नही कर सकता था।
अब मेरी परेशानी सुनिये,एक दिन गाना बजा
उड जा काले कांवां तेरे मूविच खंडपावाले जा तु संदेशा मेरा मै सदके जांवा
और हमारा अनुवाद था
“O Black Crow You Fly, I Will Put Sugar In Your MouthTake My Message, I Will Be Gracefull”
सुबु उवाच
 “तुम हिन्दी लोगो का गाना कितना गन्दा, कोइ मतलब का नई। गाने मे कुच बी बोलता। कौवा मेसेज थोडे ले जाता, वो क्या बोलते पिण्जन वो मेसेज ले जाता। तुम लोग कौवा को शक्कर खिलाता, वो कित्ता गन्दा रहता, छे छे…।।”


अब मै सर पिट रहा हुं। बडी मुश्किल से उसे समझाया कि उत्तर भारत मे यदि कौवा मुंडेर पर बोले तो उसे किसी मेहमान के आने का सगुन माना जाता है। उसे मुडेंर और सगुन का भी मतलब समझाया। तब उसकी अकलदानी मे बात आयी।
अगले दिन गाना बजा
आंखो मे क्या जी, रूपहला बादलबादल मे क्या जी, किसी का आंचलआचंल मे क्या जी, अजब सी हलचल
मैने अनुवाद शुरू किया
“What’s in your eye, Silver Cloud”
सुबु उवाच 
“कितना अच्चा लाइन है जे”
“What’s In the Cloud, somebody’s आंचल″
“ये आंचल याने ?”
अब मेरा माथा ठनका,आसपास देखा। और सोचा कि गाने की अगली पंक्ति का यदि अनुवाद किया तो चारो ओर से चप्पले पडेंगी। मैने सुब्बु के हाथ जोडे और कहा 
“मेरे भाई ,रहम कर आगे मै अनुवाद नही कर सकता “
” गन्दा गाना क्या ?, ड्राईवर को समजता नइ क्या, इतना लडकी लोग बैठा फिर बी गन्दा गाना बजाता”
अगले दिन मै पिछे की सीट पर बैठा, सुबु की सीट से ३ कतार पिछे।
गाना बज रहा था


आ सजदा करूँ मै तेरे बातों मे,

 आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे"


अब सुबु बस मे मुझे ढुंढ रहा था, मै बचने की कोशीश कर रहा था। लेकिन उसने मुझे देख लिया। पास आकर शुरू हो गया।
“तुम लोग प्यार मे दुसरो पर थूकता क्या ?”
“अबे ये क्या बोल रहा है ?, पागल हो गया क्या ?”
“ये गाना सुन वो बोलता थूक मलूं मै तेरे हाथो मे “


मेरी समझ मे नही आया कि मै हंसू या रोउं ।
सुबु भाई “धूप” को “थूक” समझ रहे थे।



4 टिप्पणीयां “आ धूप मलूं मै तेरे हाथो मे” पर
बहुत दिलचस्प। फिल्मी गानों को लोग किस तरह उल्टा-पुल्टा सुनते हैं, इस के लिए अपने विनय भाई ने मनबोल नामक साइट बनाई है। धूप मलूँ को थूक मलूँ सुनने वाले और भी हैं।
Raman Kaul द्वारा दिनांक दिसम्बर 23rd, 2005


बहुत ही मजेदार लगा आपका ये संस्मरण।
सारिका सक्सेना द्वारा दिनांक दिसम्बर 23rd, 2005


अच्छा लगा ये सँस्मरण | याद आ गई अपने एक दोस्त की जिन्हे छोटे से शहर मे रहते हुए अँग्रेज़ी फ़िल्में देखनें का बहुत शौक था । जब कभी कोई फ़िल्म लगी बस पहुंच गये देखनें (समझ में आना ज़रूरी नहीं था) ।
एक बार ज़ल्दी में बस पोस्टर देख कर घुस लिये फ़िल्म Jane Anjane (जेन ऐन्जेन) देखनें के लिये । बड़ी निराशा हुई जब अन्दर जानें पर ‘जाने अन्जाने’ निकली ।
Anoop BHargava  द्वारा दिनांक दिसम्बर 24th, 2005


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अपने अपने आसमां भाग २ : एक असफल गाडफादर

गुरुवार, दिसंबर 15, 2005


ये कहानी शुरू होती है मेरे अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष से। अंतिम वर्ष और कालेज का प्रोजेक्ट दोनो का एक दूसरे से गहरा नाता है। मै ठहरा कंप्युटर विज्ञान का छात्र, मतलब प्रोजेक्ट याने एक साफ्टवेयर बनाओ। चार साल की मेहनत इसी प्रोजेक्ट पर निर्भर होती है क्योंकि २०% अंक प्रोजेक्ट पर दिये जाते है। प्रोजेक्ट के लिये महाविद्यालय की कंप्युटर प्रयोगशाला मे जो समय मिलता था, पर्याप्त नही होता था। मेरी कक्षा के अधिकांश छात्रो के पास खुद के कंप्यूटर थे या उन्होने किसी कंप्यूटर संस्थान मे प्रवेश लिया था। मै कंप्युटर खरीदना तो दूर किसी कंम्प्युटर संस्थान मे प्रवेश ले कर प्रोजेक्ट बनाने की हालत मे नही था। मेरे परिवार की आर्थिक स्थिती उस समय काफी डांवाडोल चल रही थी।

समस्या ! क्या किया जाये ? इसी उधेड्बुन मे मै एक कंप्यूटर संस्थान (एप्टेक) पहुंच गया, इरादा था कि तीन महिनो के लिये फीस की जानकारी ली जाये, उसके बाद मे कुछ तिकडम लगा कर फीस का जुगाड करें। लेकिन ऐसा कोई मौका नही आया। जब मै पहुंचा पता चला उन्हे C और C++ पढाने के लिये कुछ शिक्षक चाहिये ! मेरी बांछे खिल गयी, हम तो ठहरे डेनीश रीची के भक्त, मतलब C और C++ के मास्टर। उसी समय साक्षात्कार दिया और चुन भी लिये गये। मुझे अब शाम ६-८ बजे तक की दो कक्षाये लेनी थी और ८-९ कंप्युटर प्रयोगशाला मे छात्रो की प्रायोगिक कक्षा लेनी थी। और क्या चाहिये बदले मे मुझे २००० रू महिने के मिलने थे, साथ मे अपना काम करने के लिये पूरी की पूरी कंप्युटर प्रयोगशाला। सोचा क्या किस्मत है, छात्र बनने गये थे, मास्टर बन कर आ गये !

अब हम बन गये मास्टर , पढाते तो थे, साथ मे पढते भी थे, अपना कालेज का प्रोजेक्ट भी बनाते थे। उम्र थी यही कोई २१ साल। भरी पूरी नौजवानी। एप्टेक मे मेरी कक्षा मे आधे से भी ज्यादा खूबसूरत कन्यांये थी, सोने पर सुहागा। हम भी पूरा मन लगा कर पढाते थे, कुछ इज्जत का सवाल होता था और कुछ रोब जमाना (स्टाईयल मारना) होता था। पढाने मे काफी आनंद आ रहा था और पैसा भी।

एक दिन बारिश हो रही थी, कक्षा मे सिर्फ ५-६ कन्याये आयी थी और बाकी सब गायब थे, किसी का पढने का मूड नही था। हम भी लग गये इधर उधर की बतियाने। ऐसे भी हमे बातों का बादशाह कहा जाता है। जब अच्छे श्रोता हो, वो भी कन्याये तो फिर क्या कहने। हांकना शुरू कर दी। अब बात चली करीयर से और दोस्ती-रिश्ते-जीन्दगी तक जा पहुंची। अब पता नही ऐसा क्या है “दोस्ती-रिश्ते-जीन्दगी” जैसी फिलासफाना बातो मे कन्याओ का मन अच्छे से लगता है, हम लपेटते रहे और वे सुनते रहे। अब बातों का बादशाह अपने पूरे सरूर मे था, झोंक झोंक मे कह गया


“पता नही मै तुम लोगो के साथ कब तक रहुंगा, लेकिन जिन्दगी मे तुम्हे कभी मेरी आवश्यकता मह्सुस हो , मुझसे संपर्क कर लेना मै मदद के लिये उपलब्ध रहुंगा।” 

पता नही ये शब्द दिल से निकले थे या नही, आज जब मै पिछे मुडकर देखता हुं तब यह सब कुछ बचकाना लगता है।

खैर मेरी बातों का एक कन्या का तत्काल ही कुछ ज्यादा ही असर हुआ। कन्या ज्यादा खूबसूरत वाली श्रेणी की थी। जब कक्षा खत्म हुयी, और मै अपने कंप्युटर पर अपना कार्य कर रहा था वह बाजु मे आ कर बैठ गयी। मुझे लगा कि उसे कोई तकनीकी शंका होगी। मैने पूछा
“कहो क्या बात है ?”
जवाब आया
“आपसे मुझे निजी बात करनी है”
मै मन मे
“कर लिया आ बैल मुझे मार वाली हालत, अब झेलो इन मोहतरमा को! “
मै प्रत्यक्ष मे
 ” हां कहो , क्या बात है ? हम आप की क्या मदद कर सकते है ?”
उसने एक लंबी कथा सूनायी जिसका सक्षेंप ये था कि वह एक महत्वाकांक्षी लडकी है। उसे अपनी जिंदगी मे कुछ बनना है। उसके घर मे उसके पिताजी उसे प्रोत्साहन देते है लेकिन उसका भाई हर चिज मे टांग अडाता है। उसकी मम्मी भी भाई का साथ देती है। उस लडकी का मेरे से ये अपेक्षा थी कि मै उसके लिये एक मार्गदर्शक, एक प्रोत्साहक की भूमिका निभाऊं।
अब मैने सोचा “अब बडी बडी बांते कर ली है, लम्बी लम्बी फेंक तो दी है, चलो प्रयास भी कर लेते है।”
मैने उसे कहा
“देखो, मै तुम्हे मार्गदर्शन तो दे सकता हुं, सलाह दे सकता हुं, लेकिन निर्णय तुम्हारा अपना होगा। रही बात तुम्हारे घर की और भाई की तुम्हे अपनी लडाई खुद लडनी होगी, मै तुम्हारे कैरीयर के लिये मै पूरी मदद करूंगा।”
उसने कहा, वह यह सब कर सकती है लेकिन उसे एक मानसीक रूप से संबल देने वाला चाहिये, जो उसकी नजरो मे मै था। मै मन मे
“लो कर लो बात ! खुद के कैरीयर का कोई ठौर ठिकाना नही , चले दुसरो का कैरीयर बनाने।”
धीरे धीरे नज़दीकियाँ बडी, उसके हर निर्णय मे मै सहभागी होने लगा था। बात यहां तक आ पहुंची थी कि वो अपने पिताजी की सलाह देने पर उसका जवाब होता था
“आपकी बात ठीक है लेकिन मै आशीष से पूछ्कर आपको बताती हुं।”

मैं खुद हैरान कोई भी व्यक्ती मुझ पर इतना निर्भर कैसे हो सकता है ? समय आगे बढ़ा, मै कालेज से निकला। मेरी घर के आर्थिक हालात बदतर हो गये थे, गुजारा सिर्फ ,मेरी ऎप्टेक की कमाई पर चल रहा था। मैने एक साहसिक निर्णय लिया और चल दिया दिल्ली । इरादा था कि 1-2 महिने नौकरी का प्रयास करो, मिल गयी तो ठीक वर्ना वापिस आ जाओ। जब घर के हालात ठीक हो जायें तब दुबारा प्रयास करेंगे। लेकिन मै किस्मत का धनी, दिल्ली मे मेरे कुछ मित्र थे मै उन्ही के साथ रहता था। अब रहने के लिये छत, खाना और पुस्तको की समस्या नही थी। मेरे एक मित्र प्रवीण पांडेय ने अपनी कंपनी मे मेरा परिचय दिया और मेरा साक्षात्कार का प्रबंध करा दिया। साक्षात्कार अच्छा रहा और मै चुन लिया गया। एक महिने पहले मै जहां 2000 रू महिना कमाता था, अब 15000 महिना कमा रहा था !

मेरे मित्रो ने मुझ पर जो अहसान किये थे, उसका बदला चुकाने का मेरे पास एक ही उपाय था। जैसा मेरे मित्रो ने मेरा करीयर बनाया वैसे तुम भी किसी और का कैरीयर बना दो, और मेरे पास उसका उम्मीदवार भी था।
मैने उसी दिशा मे कदम उठाये, सोचा कि इसे पहले आर्थिक रूप से स्वतंत्रता दिलायी जाये। उसका बी एस सी हो चुका था, एप्टेक का कोर्स भी खत्म हो गया था । मैने उसे उसी ऎप्टेक मे अपनी जगह नौकरी दिलवा दी। उसके बाद उसके आगे क्या करना चाहिये इसका पूरा रोडमैप बना दिया।

मै अब अपनी नयी जिन्दगी मे लग गया और उसे उसी तरह फोन और इमेल से सलाह देता रहा ! उसे जब भी जरूरत होती वो मुझे मेल कर देती थी।

लेकिन दोनो के आसंमा अलग अलग थे, दोनो की अपनी सोचो का एक अलग दायरा था। कुछ समय बाद मुझे लगा कि अब वह रोड्मैप से भटक रही है। मैने ये महसूस किया कि कोई उसकी जिंदगी मे काफ़ी करीब आ चुका है और उसकी मंजिल बदल चुकी है।
कुछ दिनो बाद जब मै उससे मिला तब उसने मुझसे बताया कि उसे अपने एक सहकर्मी  से प्रेम हो गया है।

मैने उससे कहा
“तो आगे क्या सोचा है?” 
जवाब था
“कुछ नही!”
मेरा जवाब था
“अपनी निजी लडाई तुम्हे खुद लडनी है, और जहां तक तुम्हारे कैरीयर का सवाल है मै सोचता हुं, मेरा रोल खत्म हो चुका है।”
और ये मेरी उससे आखीरी मुलाकात थी। उस लड़की ने अगले वर्ष उससे शादी कर ली, वह अपने परिवार मे व्यस्त है। अपने जीवन मे स्वतंत्र रहकर करियर बनाना अब उसकी प्राथमिकता मे नही था।

और मैने नये उम्मीदवार की तलाश शुरू कर दी, वो मुझे मिला भी। मेरा नया उम्मीदवार विप्रो मे काम कर रहा है। वह एक पिछड़े आदीवासी क्षेत्र से है, अपने पूरे खानदान मे पहला स्नातक।  लेकिन मेरे दोनो उम्मीदवार मे एक अंतर है, मेरा नया उम्मीदवार एक लडका है।

कभी कभी मै सोचता हुं, उस लडकी की जिन्दगी मे से मेरा अचानक बाहर आना उचित था या नही ? मैने उस लड़की से उसके सपनो को पूरा करने का जो वादा किया था, वो तो अधुरा ही रह गया ? ये मेरे मन की एक खीज भी हो सकती है क्योंकि मेरी मेहनत व्यर्थ गयी थी और मेरा अपना स्वार्थ भी तो था। मेरा अपना खुद का सपना किसी का गाडफादर बनने का जो टूट गया था !

कभी ये लगता है कि मेरा निर्णय उचित था क्योंकि मैने अपनी तरह से प्रयास पूरा किया था लेकिन उसका आसमां कुछ और था !

2 टिप्पणीयां 
1. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 16, 2005 at 1:34 am ·
बड़ा बढ़िया संस्मरण लिखा।

2. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 16, 2005 at 8:32 am ·
जैसे हर सफल पुरुष के पीछे एक अदद महिला का हाथ माना जाता है वैसे ही हर गाडफादर की सफलता में गाडमदर का भी योगदान होता होगा। उसकी खोज करो।

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अपने अपने आसमां - भाग १ : सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

सोमवार, दिसंबर 12, 2005


आज सुबह सुबह मेलबाक्स खोला, एक चिठ्ठी आयी थी।एक पूराने मित्र ने पत्र लिखा था। पढ्कर एक खुश नुमा अहसास हुआ, थोडा अचरज भी। इमेल और इस मित्र से ? जहां तक कम्प्युटर के ज्ञान का प्रश्न है , मेरी जानकारी मे उसे नही था। खैर मैने उसके मेल के उत्तर मे उसे फोन किया। पता चला कि उसने हाल ही मे एक संस्थान मे कंप्युटर सीखना शुरू किया था और उसे इमेल करना सिखाया गया था।

खुशी इस बात की ज्यादा थी कि उसने अपनी जिंदगी का पहला इमेल मुझे किया था और दुःख इस बात का कि मैं शायद अब उसे लगभग भुल चुका था। काफी बाते हुयी, कुछ शिकवे हुये, कुछ शिकायते हुयी। पूराने मुर्दे उखाडे गये। बातो बातो मे मुझे कहीं लगा कि मेरा यह मित्र कही मेरे भाग्य से कहीं इर्ष्या का भाव रखता है। इर्ष्या मेरे भाग्य से , ना कि मेरे से। मै तो ऐसे भाग्य को नही मानता।खैर इस बात पर चर्चा फिर कभी।

पुरानी यादो मे खोना मेरी पूरानी आदत है, मै अपने बचपन मे खो गया। मुझे याद आने लगे अपनी प्राथमिक पाठशाला (कक्षा १ से कक्षा ७) तक के सहपाठी और साथ मे बिताया खट्टा मिठा बचपन। हम कुल जमा ४५-५० सहपाठी साथ पढते थे, जिसमे से शायद २० के आसपास लडकीयां थी, बाकी सारे लफंगे(हमारे मास्टरजी यही कहते थे)। एक ही आसमां के निचे हम साथ साथ खेले कुदे और एक ही छत के नीचे हम पढे। साथ साथ शरारते की, साथ साथ मास्टरजी से मार खायी। दोपहर का भोजन मिल बांट कर खाया, स्कूल के पीछे वाले अमरूदो के बाग से अमरूद तोडे और माली के आने पर उसे उल्लु बनाकर भाग खडे हुये। एक सा बचपन एक सी हरकते, सब कुछ साझा !

इतना सब कुछ सा होने के बाद भी आज हम लोग कितने जुदा है, कितने अलग है। मै यहा एक बहुराष्ट्रिय कम्पनी मे कंप्युटर का कुंजी पटल तोडकर ऐश कर रहा हुं और मेरे सहपाठी आज भी उसी ग्रामीण भारत मे रह रहे है, अधिकतर किसी तरह जीवन चला रहे है। खैर इतना तो संतोष है कि कोई बेरोजगार नही है। मेरा यह सहपाठी जिसका इमेल मुझे मिला था, वह एक औषधालय का मालिक है। वह एक अच्छे संपन्न परिवार से है, अध्ययन मे वह कक्षा मे दुसरे क्रमांक पर रहता था। (पहले क्रमांक पर मेरी बादशाहत थी)।

आगे बढने से पहले मै यह स्पष्ट कर दुं कि मेरा मेरे मित्र के पेशे से कोई दुर्भावना नही है, और ना ही मेरी उस मित्र को नीचा दिखाने की कोई इच्छा है।

आज मेरा वह दोस्त वह एक छोटे से औषधालय का मालिक है और मै एक कम्प्युटर अभियंता ! उसकी दुनिया घर से औषधालय और औषधालय से घर तक और मै सारे विश्व की सैर के साथ अपना काम करने वाला। मै अपने पेशे और भटकती जिन्दगी से पुर्णतया संतुष्ट और उसके मन मे इर्ष्या और अपुर्णता का भाव।
क्या अंतर था हम दोनो मे ? अवसर का अभाव ? नही। उच्च शिक्षा के लिये धन का अभाव ? नही, इस मामले मे तो वह मुझसे ज्यादा भाग्यशाली था। गावों मे औषधालय खोल कर सेवा की भावना ? नही,कदापि नही। मेरा यह मित्र इस पेशे मे पूरी तरह व्यवसायिक दृष्टीकोण रखता है।

हम दोनो मे एक ही अंतर था, दोनो के अपने अपने आसमाँ थे। दोनो की सोचो के अपने अपने क्षितीज थे। दोनो मे मन की उडान को अपना अपना दायरा था। बस यही एक अंतर ने आज हम दोनो को इतना अलग कर रखा है।

हम दोनो का बचपन एक साथ एक जैसे वातावरण मे बिताने के बाद भी दोनो की सोचो एक बुनियादी अंतर था, मै उंचे उंचे सपने देखता था और वह सोचता था कि किसी तरह एक ढंग का काम मिल जाये चाहे सरकारी नौकरी हो या कोई व्यवसाय। बचपन मे मैने तो कम्प्युटर अभियंता बनने की तो नही सोची थी लेकिन विमानचालक बनने की अवश्य सपने देखे थे और वह मेरे इन सपनो का मजाक उडाया करता था। वह कहता था
“ज्यादा उंचा मत उड , गिरेगा तो हड्डीया भी नही बचेंगी!”
लेकिन मै किसी और मिट्टी का बना हुआ था, बचपन मे कही पढा था

“नेपोलियन सिकंदर से स्पर्धा करता था, सिकंदर जुलीयस सीझर से, जुलियस सीझर हरक्युलिस से। और ये हरक्युलिस सिर्फ कहानियो मे ही हो सकता है”

मै सोचता था कि यदि आगे बढना है तो अपने से उंचे स्थान पर स्थित व्यक्ति को देखो, अपनी बराबरी से स्पर्धा से क्या मतलब। और वह कहता था कि
 “इंसान ने अपनी कद के अनुरूप उंचाई देखनी चाहिये।”

यह तो सिर्फ एक उदाहरण है अपने अपने आसमां का। इस पर लिखने के लिये मेरे पास एक और बेहतरीन उदाहरण है वह अगले चिठ्ठे मे !

5 टिप्पणीयां » 
1. अनूप शुक्ला उवाच :
दिसम्बर 13, 2005 at 11:05 pm ·
ईष्या का कारण हमारे समझने के लिये छोड़ दिया?
2. Anoop BHargava उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 12:07 am ·
लेख अच्छा है लेकिन अंत में सफ़लता या असफ़लता का मापदंड तो यही होगा ना कि :
जब आप अकेले हों और अपनें आप से पूछें कि “मैं वास्तव में कितना खुश हूँ” ?
अगर आप दोनों के हालातों में अन्तर की बात कर रहे हैं , तब तक तो ठीक है लेकिन जहाँ तक ‘बेहतर’ या ‘अधिक खुश’ होनें की बात है , आप को अपनें ‘मित्र’ से पूछना चाहिये ।
महत्वकाँक्षा का न होना कोई गलत बात नहीं है जब तक आप सन्तुष्ट है और शिकायत न
करें ।
बस यूँ ही बैठे बैठे लिख दिया …।
3. kali उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 10:51 am ·
aur mujhse jo irshyabhav rakhte hain woh H1B per kaam karne wale computer wale jinko idhar udhar ghoomna padta hai, jabki main aaram se sabarbia main baith kar manager banta hun aise contractors per। Irshya mujhe hai mere mitron se jo apne ghar per, apne desh main santosh aur sampannata ka jivan bita rahe hain apne vyavsaya ya sarkari naukri main
4. pratyaksha उवाच :
दिसम्बर 14, 2005 at 4:52 pm ·
खुशी एक मनस्थिति है। जरूरी नहीं कि सुख सुविधाओं से घिरे रहने में ही सुख मिल जाये।
शायद शुरुआत में ऐसा लगे लेकिन बाद में हम उन सुविधाओं के आदि हो जाते हैं और इस स्थिति पर पहुंचते ही उनका महत्त्व खत्म हो जाता है।और फिर उनसे मिलने वाला सुख भी।
वैसे भी सुख की परिभाषा अलग अलग लोगों में भिन्न हो सकती है।
प्रत्यक्षा

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अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?

शुक्रवार, दिसंबर 09, 2005


आदर्शवादी संस्कार सही या गलत इस पर विचार करने से पहले यह निश्चीत कर लिया जाये की, आदर्श की परिभाषा क्या हो ?

आदर्श परिवर्तनशील है। आदर्श भी सामाजिक मान्यताओ परंपराओ की तरह काल, व्यक्ति , परिस्थीती और समाज के अनुरूप बदलता रहता है। जो कल आदर्श था, आवश्यक नही कि वह आज आदर्श हो। आवश्यक नही कि जो किसी एक व्यक्ति के लिये आदर्श हो, दुसरे के लिये आदर्श हो।

पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्म्द गौरी को २१ बार क्षमा किया था, यह व्यव्हार पृथ्वीराज चौहान के लिये उस समय की मान्यताओ के लिये आदर्श हो सकता है। लेकिन क्या आज यह आदर्श हम पाकिस्तान के लिये रख सकते है ? हमने पृथ्वीराज चौहान का हश्र देखा है, क्या आदर्श इतिहास से सीख लेकर परिवर्तित नही होगा ? यह परिवर्तन नही है, यह आदर्श का विकास है।

महाभारत और रामायण भारतीय जिवन और समाज के लिये एक आदर्श माने जाते हैं। शुर्पनखा ने लक्षमण से प्रणय निवेदन किया था, जिसका प्रत्युत्तर लक्ष्मण ने उसके नाक कान काट कर दिया था। जबकी उस समाज का आदर्श यह था कि कामातुर स्त्री की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिये। अब इस घटना से क्या साबित होता है ? प्रणय निवेदन के प्रत्युत्तर मे नाक कान काट्ना ,यह ना तो उस समय आदर्श हो सकता है था ना आज हो सकता है।

जुआ खेलना यह एक सामाजिक बुराई है ! पर एक क्षत्रिय जुवे का निमंत्रण अस्वीकार नही कर सकता (महाभारत मे युद्धीष्ठीर द्वारा निमंत्रण स्वीकार करना)। अब इन दोनो मे आदर्श किसे माना जाये ?
महाभारत को धर्मयुद्ध कहा जाता है। अब धर्मयुद्ध मे तो आदर्शो का पालन होना चाहिये। लेकिन कौरव पक्ष के किसी भी महारथी का वध जिस तरीके से किया गया , क्या वह आदर्श हो सकता है ? चाहे भिष्म हो जिनके लिये शिखंडी को सामने रख दिया गया, यहां तो भिष्म पितामह अपने आदर्श का शिकार हो गये। द्रोणाचार्य के लिये धर्मराज ने असत्य(कथीत अर्धसत्य) कहा, धर्मराज अपने आदर्श से डिग गये। कर्ण को निशस्त्र मारा गया जबकि क्षत्रिय निहत्थे पर शस्त्र नही उठाता, दुर्योधन को युध्द नियमो के विरूद्ध जांघ पर वार किया गया ! कहां गये पांडवो के आदर्श जो भगवान श्रीकृष्ण के मार्गदर्शन मे लढ रहे थे? यहां पर परिस्थितियों के अनुकुल आदर्शो को ढाल दिया गया। कहने का तात्पर्य यही है कि जो जीवन मूल्य काल और परिस्थीतीयो के अनुसार ढल सके वही आदर्श है।

मर्यादा पुरूषोत्तम राम मर्यादा पुरूषोत्तम द्वारा एक धोबी द्वारा लाछंन लगाने पर पत्नी को वनवास देना आदर्श है ? क्या सीता की अग्नी परिक्षा एक आदर्श है ? शुद्र द्वारा तपस्या पर उसका वध एक आदर्श है ? ये सब तो मर्यादा पुरूषोत्तम राम का व्यवहार है !

बहुत हो गयी पौराणीक बाते, कुछ आज की बात कर ली जाये। आदर्श वादी संस्कार और जीवन मुल्यो को आज के परिपेक्ष मे देखें। आप कोई भी कार्य कर रहे हो और बाद मे आपको ग्लानी हो उस कार्य पर ! यह आप के मन पर आपके आदर्शो का संस्कार है, आपका आदर्श है। आपके लिये आदर्श वह है जिसको ना मानने पर जिस पर आपकी अंतरात्मा आपको धिक्कारे और आपको ग्लानी हो। लेकिन कोई जरूरी नही वह किसी और के लिये या किसी और परिस्थिति मे लागु हो।।

आदर्श किसी भी व्यक्ती के लिये एक जीवन मुल्य होता है और वह उन जीवन मुल्यो के लिये जीता है। किसी भी संस्कृति में अनेक आदर्श रहते हैं, लेकिन यदि कोई व्यक्ति किसी आदर्श को अपना लक्ष्य बनाता है तो उसे अन्य आदर्शों का परित्याग करना पड़ सकता है। आदर्श मूल्य है, और मूल्यों का मुख्य संवाहक संस्कृति होती है । किसी संस्कृति में परस्पर व्याघाती मूल्यों की उपस्थिति उसकी जीवन्तता का प्रतीक है ।

1 टिप्पणी » 
1। इस्वामी उवाच :
दिसम्बर 9, 2005 at 10:45 pm ·
आशीष,
मैने तो आपके पहले लेख से ले कर आपका चिट्ठा पढा है। आपके लेखन की धार हर लेख के साथ तेज हो रही है - बहुत सुँदर लिखा है। बधाई!

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बदलते रिश्ते

मंगलवार, दिसंबर 06, 2005


हाल ही मे मै इंद्रजाल पर लोकमत(विदर्भ का लोकप्रिय मराठी दैनिक) पढ रहा था। एक समाचार पर अनायास नजर गयी। समाचार यो तो आपराधिक था जो मै सामान्यातः नही पढता लेकिन मेरे गांव के पडोस से संबधीत था। सोचा पढ लिया जाये। समाचार था “एक भाई के परिवार द्वारा दुसरे भाई के परिवार पर कातिलाना हमला!
जब मैने समाचार पढा , मै हैरान रह गया। मै इस परिवार को अच्छी तरह से जानता हुं। मैने सपने मे भी नही सोचा था कि इस परिवार मे ऐसा हो सकता है। लेकिन सत्य मेरे सामने था।

मै यादो मे खो गया। यह परिवार था मेरे हाई स्कुल के हिन्दी शिक्षक का। वे मेरे पापा के ही स्कुल मे कार्यरत थे। वह स्कुल एक गांव मे ही स्थित था, गांव की परंपरा कहें या भारतीय परंपरा पूरा स्कुल भी एक परिवार था, जिससे हम लोगो के भी उनसे पारिवारिक रिश्ते बन गये थे। दोनो परिवारो के बीच आना जाना लगा रहता था।
ऐसे तो वे जमींदार घराने से थे, जमींदारी चली गयी थी लेकिन जंमीदारी ठाट कायम थे। उनका घर एक पूरानी हवेली था, जो जिर्ण शीर्ण हालत मे थी। उसकी दिवारो पर जगह जगह शिकार किये पशुऒ के सर और खाल लटकती रहती थी। उसके साथ ही दिवारो पर तलवारे, भाले और बंदुके भी शान से सजायी हुयी थी। रस्सी जल गयी थी लेकिन ऐंठ नही गयी थी।

मेरे हिन्दी शिक्षक और उनसे छोटे भाई दोनो शिक्षक थे। अच्छा खासा बडा परिवार था। बडे भाई के ७ लड़कियाँ और दो लडके तथा छोटे भाई के ५ लडके थे। पूराने जमींदार थे, परिवार नियोजन के विरोधी !
दोनो भाईयो के बीच मे जो समझ और भाईचारा थी ,वह एक मिसाल था। दोनो हर काम एक दुसरे से पूछ कर ही करते थे। सुबह साथ मे स्कुल आते और साथ मे जाते थे। रविवार को भी यदि कहीं जाना हो तो भी ज्यादातर साथ मे जाते थे। यदि एक भाई कहीं दिख गया तो दुसरे को पूछने की जरूरत नही वो कही आसपास ही होगा।

जब उन मेसे एक भी मेरे घर आता तब भी पापा दोनो के लिये नाश्ता चाय बनवाते थे क्योंकि कुछ ही देर मे दूसरा पहुंच जाता था। दोनो भाई एक सामान्य हिन्दी शिक्षक की तरह काफी बातुनी थे। जब भी वह किसी भी विषय पर बोलना शुरू करेंगे, पूरे अंलकार, मुहावरे, दोहे का उद्धरण देते हुये कहेंगे। किसी के पास कितना भी जरूरी काम हो, वह सब कुछ भुल कर उन की बाते सुनता था। मेरे पापा एक अपवाद थे, उनके पास बचने का एक तरीका था, वे मम्मी को उनसे बात करने लगा कर खुद खिसक लेते थे। एसे भी एक गणित शिक्षक और हिन्दी शिक्षक मे बाते करने के लिये विषय कम होते है !

यो तो दोनो भाईयो का परिवार साथ मे एक छत के निचे रहता था, लेकिन खाना अलग अलग पकता था। देवरानी और जेठानी के मनमुटाव के कारण। लेकिन दोनो भाई जब खाना खायेंगे साथ मे ही। जहां खाना पहले पक गया वहां पर। ऐसा दोनो परिवारो के बच्चो मे भी था। चुल्हे भले ही दो थे,लेकिन दिल एक ही था। किसी भी भाई ने कभी कोई भी चिज खरीदी तो कभी एक परिवार के लिये नही खरीदी, हमेशा दोनो परिवार के लिये खरीदी। बच्चो की पढायी लिखाई के लिये भी वही पैमाना, कोई भेदभाव नही, जिसके पास पैसा हो वो दे देगा, कोई हिसाब किताब नही। कुल मिलाकर एक आदर्श परिवार था।

जब मै आखरी बार उनसे मिला तब दोनो भाई सेवानिवृत हो चुके थे। मैने उनसे काफी देर तक बाते की। दोनो मे वही पूरानी जिन्दादिली थी, वही अलंकारीत भाषा। लेकिन मैने उन भाईयो मे थोडी तल्खी भी पायी लेकिन एक दुसरे से नही शासन व्यवस्था से और समाज से। उनका कहना था, सारी जिन्दगी अध्यापन करने के बाद अचानक कोई व्यक्ति एक ही दिन मे कार्य से मुक्त हो कर आधे वेतन मे कैसे गुजारा कर सकता है। मै उन की स्थिती जानता था, परिवार अब काफी बडा हो गया था। आधी जमींदारी शान लडकियो की शादी मे जा चुकी थी , लेकिन कुछ लडकियां अभी भी बिनब्याही बची थी। कुछ बेटो की शादी हो चुकी थी और बच्चो वाले थे। लेकिन आय उस अनुपात मे नही बढी थी। नयी पिढी मे २-३ बेटो नौकरी कर रहे थे, लेकिन अपनी जिन्दगी मे मस्त। घर का जिम्मा दोनो बुढो पर था।

जब मैने इस परिवार मे “एक भाई के परिवार द्वारा दुसरे भाई के परिवार पर कातिलाना हमला! “ की खबर पढी तो सन्न रह गया। मेरी समझ मे नही आया ये क्या हो गया। खैर मैने मामले की तहकिकात करने की सोची।

भाई को फोन किया और जब उसे सब कुछ बताया तो वो भी चकित ! मम्मी ने मानने से ईंकार कर दिया। भाई ने कहा मै उनके घर जाकर देखता हुं क्या मामला है ?

दूसरे दिन भाई ने फोन पर बताया कि ये दोनो भाईयो के बिच का संघर्ष नही है, पीढ़ियों का संघर्ष है। जब दोनो भाई सेवानिवृत्त हो गये और घर का खर्च चलाना मुश्किल हो गया था, तब दोनो भाईयो ने साथ बैठकर अगली पीढ़ी पर जिम्मेदारी सौपने का निर्णय लिया था। लेकिन अगली पीढ़ी ने मानने से मना कर दिया। चचेरे भाइयों मे मनमुटाव हुआ और संघर्ष हुआ था। दोनो भाई असहाय से देखते रहे थे। और उस गैर जिम्मेदार पत्रकार ने खबर मे सनसनी डालने के चक्कर मे निरपराध और असहाय बुढे शिक्षको को भी लपेट दिया था!

लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है । जब दो भाई पूरी जिन्दगी बिना किसी परेशानी के साथ रह सकते है, दो अच्छे खासे बडे परिवारो का भरन पोषण कर सकते है, अच्छी शिक्षा दे सकते है, नयी उच्च शिक्षीत पीढ़ी क्यो नही कर सकती ?

क्या अब खून के रिश्तों का मुल्य नही रहा ?
क्या आम जीवन से भारतिय जिवन मुल्यो का ह्रास हो चुका है ?

1 टिप्पणी » 
1. इस्वामी उवाच :
दिसम्बर 8, 2005 at 5:28 am ·
मुझे लगता है की रिश्ते निभते हैं रिश्तों के सम्मान का भाव या उन को लेकर किसी भावनात्मक जुडाव के होने पर। अगर भाई या चचेरे भाई उस सम्मान के भाव को खो चुके हैं या भावनाएँ नही रहीं तो क्या सत्तु-सप्रेटा और क्या अंबानी-बिरला-टाटा कोई भी नही निभाता यार और निभाने वाले मूह बोले रिश्ते निभा रहे हैं। फिर ये आज की बात नही है इस मेलोड्रामे पर तो रामायण और महाभारत टिकी है - आज भी घर घर खेली जा रही है!

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ये क्या हो रहा है ?

बुधवार, नवंबर 30, 2005


खबर है अमिताभ बच्चन बिमार हो गये । माना अमिताभ जी एक उतकृष्ट अभिनेता है, उन्होने हिन्दी फिल्म उद्योग को काफी कुछ दिया है। मै उनके स्वस्थ होने और लम्बी उमर की कामना करता हुं।

लेकिन हमारे मिडीया को क्या हो गया है ? हाथ धो कर पिछे पड गया। सीधा प्रसारण शुरू कर दिया, हर मिनिट की जानकारी देना शुरू कर दी। एक बीमार इंसान को यदि घेर लिया जाये तो वह स्वस्थ होने की बजाय और घबरा जायेगा। मरीज तो परेशान ही, मरीज के घरवाले भी परेशान, बाकी मरीज और उनके घरवाले भी परेशान।

समाचार पत्र, टी वी, इंद्रजाल जहा देखो वहा एक ही खबर।

उपर से तुर्रा ये कि अमितजी की बिमारी “आंतो मे सुजन” है, जो एक सामान्य बिमारी है। एक डाक्टर के अनुसार उसके पास आने वाले २०% मरीज इसी बिमारी के होते है। “मीड डे” वाले तो और भी आगे पहुंच गये, अमिताभ जी ने क्या खाया था ये भी पता कर लिया।

कोफ्त तो उस समय होती है जब मिडिया के सामने अभीषेक बच्चन हाथ जोडकर जाने कह रहे है “हट जाओ यहां से” और मिडीया वह फोटो छाप दे रहा है !
बाकी मरीजो के रिश्तेदारो को मजबूरन कहना पड रहा है “इन लोगो के लिये अलग अस्पताल होना चाहिये।

क्या भारतीय मिडीया के पास और कोई खबर नही है या मानसीक रूप से दिवालिया हो गया है ?

वैसे ये हफ्ता मिडिया के लिये काफी अच्छा रहा , काफ़ी मसाला मिल गया। उमा भारती और राज ठाकरे ने कोई कसर नही छोडी।

वैसे इन दोनो खबरो से कोई आश्चर्य तो नही हुवा। अपेक्षीत ही था। उमा भारती का दिमाग सांतवे आसमान पर पहुंच गया था, अब जमीन पर आ गया होगा। परिवारवाद को पानी पी पी कर कोसने वाल बाल ठाकरे ने परिवार को बढाया तो पहले राणे और बाद मे भतिजा ही विरोध मे आ गया।

देखते है आगे क्या होता है।

1 टिप्पणी 
1. eswami उवाच :
दिसम्बर 1, 2005 at 12:17 am ·
बिल्कुल यही विचार मुझे भी आए थे - क्या भारत क्या अमरीका और क्या यूके सब जगह न्यूज़ अब इन्फोटेनमेंट हो गई है। और चाहे जो परोस रहे है मीडिया वाले।

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“दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……..” कहानी पूरी फिल्मी है भाग २

बुधवार, नवंबर 23, 2005


एक सीधी सादी सी लडकी, पढी लीखी लेकिन मध्यम वर्ग से। जिन्दगी बस घर से कार्यालय और कार्यालय से घर। किसी से ज्यादा घुलना मिलना नही, बस काम से मतलब रखना। ज्यादा उंचे ख्वाब नही, जो घर वाले कहे वह पत्थर की लकीर। कोई डांट दे, या किसी की कोई बात बुरी लगे तो रो देना। एक आम भारतीय लडकी।

एक लडका, वही मध्यम वर्गिय। घर से पहली बार निकला, दुनियादारी क्या होती है नही मालुम। बचपन से लेकर जवानी तक घरवालो की छत्रछाया मे रहा, जिससे थोडा लापरवाह। घर मे लडको के स्कुल,महाविद्यालय मे पढा और बढा। कभी लडकीयो से बात नही की और करना आता भी नही। वैसे तो बाते बनाने मे कोई जवाब नही लेकिन कन्या राशी के सामने बोलती बन्द।

जब ये दोनो मिले तो हिन्दी फिल्मो की तरह कुछ तो होना ही था। लडके को लडकी भा गयी। लेकिन लडकी अपनी दुनिया मे गुम जिसे अपने काम और घरवालो के अलावा किसी से मतलब ही नही। सहकर्मी से सिर्फ हाय-हेलो का रिश्ता।

कहते हैं कि इंसान प्यार मे अन्धा हो जाता है, अब तो यह मै भी मानता हुं। हमार इस कहानी के नायक भी इसी सुरदास की श्रेणी मे आ गये। अकल से काम लेना बन्द कर दिया। जहां लडकी वहा पर हिरो। चाहे वो दोपहर का भोजन हो या शाम की चाय जहां लडकी जाये वहा अपने भाई साहब कीसी ना कीसी बहाने पहुंच जायेंगे। ये बात और है कि भाई ने कोई बेहुदा हरकत तो दूर उस लडकी से कोइ बात तक ही नही की !

शाम को कमरे पर मेरा और मेरे एक और दोस्त (अन्ना) का दिमाग चाटना शुरू। अब क्या करना चाहिये, अब क्या करूं वगैरह वगैरह…।। हम लोग उसे प्यार से सब कुछ समझाते, भईया कम से कम उस लडकी से बात तो करो … भाई साहब बाकायदा शान से छाती फुलाकर कहेंगे, कल बात करता हुं…। और ये कल आज मे कभी तबदील नही हो पाया।

अब दोनो साथ मे काम करते थे तो लडकी धीरे धीरे सहज हो गयी, कभी कभार हाय हेलो कर देती, कभी चाय पीने जाते औपचारीकतावश वक्त पूछ लेती थी। भाई को लगा कि बात आगे बड रही है, और ख्याली पुलाव पकाने लगे थे… अब हम ठहरे थोडे पूराने खिलाडी, सब समझ रहे थे, कि लडकी सिर्फ एक सहकर्मी( दोस्त भी नही) की तरह बर्ताव कर रही है।

धीरे धीरे हमने सोचा कि चलो अब मुझे एक उत्प्रेरक की भुमीका मे आना होगा। पहले सोचा चलो कि दोनो मे बात कराते है, साथ मे घुमने फिरने का मौका देते है और देखते है कि बात कहां तक बढती है। बाद मे सोचते हैं कि अगला कदम क्या होगा। जबवह लडकी अपने एक सहकर्मी सहेली की शादी मे जा रही थी, तो मौका देखकर हम ने लडके को साथ मे चिपका दिया और प्रतियोगीता की जो भी सम्भावना थी उसको खत्म कर दिया। सोचा था दोनो शादी के बहाने पूरे २ दिन साथ मे रहेंगे प्यार तो नही , कम से कम दोस्ती तो जरूर हो जायेगी।

हम चल दिये २ सप्ताह की छुट्टी पर घर, वापिस आने पर हमने लडके को निराशावस्था मे पाया। हमारा माथा ठनका, ये क्या हुवा ! पूछा तो पता चला कि लडकी अब उससे कटने लगी है, चाय पर जाते समय उससे बात भी नही करती(साथ मे बुलाना बन्द) है। हमने थोडी जासुसी की तो पता चला, अपने भाई जब शादी मे गये थे, तब २ दिनो तक दोनो साथ मे अच्छे दोस्तो की तरह रहे थे और अच्छा समय काटा था। लेकिन विघ्नसतोंषी सहकर्मियो ने बात का बतंगड बना दिया है और कानाफुसी चालु कर दी है। और ये सब उस लडकी को पता चल गया है।

ऐसे तो ये सभी लोग मेरे से २ पद स्तर निचे है(कार्यालय के) लेकिन मेरी छवि काफी अच्छी है, और मुझे काफी सम्मान मिलता है। किसी को को व्यक्तिगत परेशानी होने पर भी वह मुझसे विचार विमर्श कर लेता है। कुल मिलाकर इन लोगो के लिये मै “बास कम एक मार्गदर्शक ज्यादा हुं”। मैने सोचा चलो लडकी के मन की बात पता की जाये। ऐसे ही उससे मैने बात करने लगा। उसने मुझसे पूछा
और आप शादी कब कर रहे हो ?” 

ये मेरे लिये कभी अनेपेक्षीत प्रश्न नही रहा है, हर कोई पूछता है। और हमने यही सवाल मानोशीजी से भी पूछा था कि हमारी शादी की कितने प्रतीशत संभावना है लेकिन कोई जवाब नही आया !

“मुझे छोडो मुझसे शादी करने कोई तैयार नही है, मेरी जन्मकुडली मे सन्यास योग है तो हर कोई मुझे अस्वीकार कर देता है।” 
मैने उससे पलट के पूछा
“तुम बोलो तुम्हारा अपना शादी क्या इरादा है ?”
लडकी ने थोडा शर्माते सकुचाते जवाब दिया
“अगले हफ्ते उसके घर लडके वाले देखने आ रहे है”।
मै मन ही मन मे
” गयी भैंस पानी मे, अब अपना हीरो अताउल्लाह खान के गाने गायेगा।”
मै प्रकट मे
 “कौन है वो बदनशीब?” ये मेरा अपना तरीका है सभी जानते है।
लडकी (पूरी बीर बहुटी हो कर )
“मेरे पापा के एक बचपन के दोस्त का लडका, बंग्लोर मे काम कर रहा ह॥”
मै मन मे ही
“आज वापिस जाते समय किशोर के दर्द भरे नग्मो की कैसेट ले लेता हु , अपने हिरो को भेंट दे दुंगा।”

मैने पूछा
” तुम्हे पसन्द है?”
“मेरी पसन्द या नापसन्द का सवाल ही नही है, जो पापा कहेंगे वो मै करूंगी।”
मैने सोचा चलो थोडी उम्मीद है, अगला सवाल दागा
” मानलो यहां कोई दिवानगी की हद तक तुम्हे चाहता हो और तुम से शादी करने को तैयार हो तो तुम क्या करोगी ?”

“इसका कोई चांस ही नही है। मेरी मम्मी की मौत मेरे बचपन मे हो गयी थी। पापा ने मुझे और छोटे बहन और भाई को बडा किया है। मै ऐसा कोई कदम नही उठा सकती जिससे मेरे पापा के दिल को ठेस पहुंचे और मै तो अपने छोटे भाई बहनो के लिये एक आदर्श भी रखना है”

मै कितना भी आधुनिकतावादी बनने की कोशीश कंरू, लेकिन मै भी एक मध्यमवर्ग से ताल्लुक रखता हुं और मेरे पास लडकी की इस बात का कोई जवाब नही था। और मैने कई बार महसुस भी किया था कि वह अपने पापा को कितना चाहती है। वह दिन मे कमसे कम ५-६ बार अपने पापा को फोन कर भोजन, चाय और दवाईयो के बारे मे निर्देश देते रह्ती थी।

”वैसे मै जानती हु कि आप किसकी बात कर रहे हैं, मैने कभी भी किसी भी लडके को कभी उस नजरो से नही देखा है ना देख पाउंगी, मै अपने पापा को कभी निचा नही दिखा सकती।”
“तुम काफी सुलझे विचारो वाली लडकी हो, वही करो जो तुम्हारे दिल को अच्छा लगे। एक बात ध्यान मे रखना कि ऐसा कोई कदम मत उठाना कि तुम्हे भविष्य मे पछताना या पिछे मुडकर देखना पढे।”
अगले हफ्ते लडकी कार्यालय मे सगाई की मिठाई लेकर आ गयी। एक दिल और टुटा !

मै परेशान ,कि मेरे दोस्तो मे दिल टुटने का रिवाज अभी तक कायम है। मेरे साथ अब तक ऐसा हुवा है कि किसी का कोई प्रेम प्रसंग हो चाहे एक तरफा या दो तरफा, यदि गलती से भी मुझे पता चल गया तो वह एक या दो महीनो से ज्यादा नही टिका है। इसमे से एक मामला तो आत्महत्या का भी है।

अपना हीरो आजकल किशोर के दर्द भरे नग्मे सुन रहा है “दिल ऐसा किसी ने मेरा तोडा……।।”

6 टिप्पणीयां » 
1 kali उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 8:16 pm ·
Isi per yeh joke yaad aa gaya:
Pagal khane main
patient # 1 : “Rupa”, “Rupa”।
New Doctor: Sir isse kya hua?
Old Doctor: Poor Chap, Rupa ke pyaar main pagal ho gaya, Rupa ki kahin aur shadi ho gayi thi।
Patient #2: “Rupa”, “Rupa”
New Doctor: Sir yeh bhi usi Rupa ke pyaar main nirash premi hai kya।
Old Doctor: Oh no, young man, yeh jyaada pagal hai, Rupa ki isse hi shadi hui thi।
2 Nitin Bagla उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 10:25 pm ·
बहुत खतरनाक इंसान हैं मतलब आप…।।:)
3 मानोशी उवाच :
नवम्बर 23, 2005 at 11:14 pm ·
अब लगता है तुम्हरी पत्रिका देखनी ही पडेगी| तुम्हारी शादी हो जाये तो शायद लोगों के भी घर बसने लगें|
4 अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 24, 2005 at 5:22 pm ·
अब कहां बच के जाओगे? मानसी तुम्हारी शादी करा के ही मानेंगी।
5 आलोक कुमार उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 11:54 am ·
अधिकतर प्रेम कहानियाँ इसीलिए नहीं आगे बढ़ती हैं क्योंकि लोग मौजूदा हालत को बदलने की हिम्मत नहीं कर पाते - यानी कि अभी बोलचाल है, सलाम नमस्ते है, बाद में शायद ये भी न बचे? पर हाथ मलने से अच्छा है ओखल सर में डाल दो। मान लो कि जनाब की मोतरमा से शादी हो जाती तो भी क्या ज़िन्दगी भर सुखी रहते? या दुखी रहते? पता नहीं। उनका जीवन भी बाकियों जैसा होता। पर अब एक सान्त्वना है कि एक सच्चा प्यार था। सपना हकीकत नहीं बना, इसलिए मधुर रहा। वास्तविकता की कर्कशता इसमें नहीं आई।
6 pratyaksha उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 5:32 pm ·
मानसी और अनूप की टिप्पणी के संदर्भ में…
“अब कहां बच के जाओगे”
आशीष बचना चाहते हैं क्या ?
प्रत्यक्षा

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अनुगूँज (15) : हम फिल्मे क्यों देखते है !

बुधवार, नवंबर 16, 2005



हम फिल्मे क्यों देखते है ? अरे भाई मै तो सिर्फ अपने बारे मे बता सकता हुं कि मै फिल्मे क्यों देखता हुं। भगवान की दया से अब तक क्वांरा हु और कोई महिला मित्र है नही, इसलिये अकेले ही देखता हुं। एक जमाना था जब हम यारो के साथ फिल्मे देखा करते थेहै। वैसे यारो के साथ फिल्मे कहां देखते थे, हंगामा करते थे, नैन सुख लेते थे, पॊप कार्न खाते थे और ठंडा पीते थे। मतलब कुल जमा चित्रपट गृह मे फ़िल्म देखने के अलावा हर वो हरकत करते थे जो नयी नयी जवानी मे की जाती है।

फिल्मे अब भी देखते है लेकिन अकेले देखते हैं। अब क्यो देखते है ? यह तो निश्चित ही शोध का विषय है, फुर्सत मिले तो पी एच डी कर सकते हैं। लेकिन कम्बख्त हर सप्ताह कम से कम २-४ फिल्मे आ जाती है, फुरसत मिले तो कहां से। वैसे भी फुरसत पर तो अब फुरसतियाजी का एकाधीकार हो गया है।

अब सवाल उठ ही गया है तो सोचते है कि हम(मै) फिल्मे क्यों देखते हैं।

जब हम कालेज मे थे और मार्च अप्रैल का विकट काल चल रहा होता था, मतलब की परिक्षायें चल रहे होती थी। तब यदि किसी विषय का प्रश्नपत्र अच्छे से हल कर आ गये तो हम खुश हो कर फिल्म देखने जाते थे।भाई इतना इस प्रश्नपत्र मे सफल होने के लिये फलां दादा को पूरे ५ प्रयास करने पडे थे, अब हम तो पहली बार मे निकाल रहे है, थोडा उत्सव तो होना चाहिये। अब यदि प्रश्नपत्र अंग्रेजी मे आ गया है(मतलब कि सारे के सारे प्रश्न समझ से बाहर हो) और असफल होने के पूरे आसार हो, तब मुड ठिक करने फिल्म देखते थे। आखिर अगले प्रश्नपत्र की भी तो तैयारी करनी है, अब मुड खराब हो तो अगला प्रश्नपत्र भी तो ठुक जायेगा ना।
जब यह विकट काल बीत जाता था, तब कुछ करने तो होता नही था अब क्या करे फिल्मे देखों।
कालेज जमाने मे हमारे फिल्म देखने के कुछ कारण :


  • वो अपनी सहेलियों के साथ फिल्म देखने जा रही है।
  • राजेश अपनी महिला मित्र के साथ फिल्म देखने जा रहा है।(हम थोडे विघ्न संतोषी जीव ! जब राजेश ने हमारे साथ फिल्म देखने से मना कर दिया तो उसके साथ कैसे देख सकता है ?)
  • आज पहली तारीख है, घर से धनादेश आया है।
  • रविद्रकांत आज घर से वापिस आया है। (अब खाली हाथ थोडे ही आया होगा)
  • आज सुमित का जन्मदिन है, सभी को फिल्म दिखायेगा।
  • नन्दी जिस पर मरता है उसका जन्मदिन है। (अब वो लड्की नन्दी महाराज को घास नही डालती तो इसमे हमारी क्या गलती ?)
  • उसने साथ मे फिल्म देखने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। सारा मुड खराब हो गया।
  • उसने साथ मे फ़िल्म देखने के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। (ये बात और है कि अपने साथ अपनी दोनो छोटी बहनो को भी ले आयी।)

वगैरह वगैरह…।।
अब कालेज के दिन गये, उज्जड जवानी गयी ! ना भईया हम अभी बुढे नही हुये है, मै तो अभी भी जवान हुं। अब हमारी जवानी मे परिपक्वता आ गयी है, अब हम विघ्न सतोषी नही है। किसी दोस्त को अपनी महिला मित्र (पत्नी) के साथ फिल्मे देखते हुये हम गाते है

लाखों तारे आसमा मे एक मगर ढुढें से ना मिला
देख के दुनिया की दिवाली दिल मेरा चुपचाप जला !

जब ऐसा मुड हो तब हम बेखटके ‘देवदास’ देख आते है।

जब हम अपने रहने के लिये आशियाना ढुण्ढ रहे होते है और मकान मालिक हमारे क्वारेपन के कारण इकार कर देता है, तब हमे “घरौंदा” जैसी फिल्मे देख लेते है। अब नौकरी अच्छी है, अच्छा खासा कमा लेते है,लेकिन ‘दिल है कि मानता ही नही’ और पैसा चाहिये ! मन बहलाने के लिये “कांटे”, “आंखे” जैसी फिल्म देख आते है।
अभी जहा हम काम कर रहे है, वहा पर नये रंगरूटो के आने का समय है। हर सोमवार को नये नये खूबसूरत चेहरे दिखाई दे जाते है, कार्यालय की खूबसूरती मे हर हफ्ते इजाफा होते जाता है। हमारे मुरझाई उमगों की जडो मे पानी पड जाता है, दिल मे नयी लहरे उठना शुरू होती है। और हमारा रोमांटिक फिल्मे देखने का मौसम आ जाता है।

अब जब हम भारत मे रह रहे है, देर सबेर कभी ना कभी सरकारी दफ्तरो से तो पाला पड्ता ही है। अव्यवस्था, रिश्वतखोरी से चिढ होती है, तब हमे नाना पाटेकर की फिल्मो(प्रहार जैसी) का भुत चढता है। भारत पाकिस्तान क्रिकेट मैच मे भारत के हारने पर जब पडोस के मुहल्ले मे पटाखे छुटते है तब हम सन्नी दयोल की “गदर” या “मिशन कश्मीर ” नुमा फिल्मे देखते है।

कभी कभी घर मे बिजली गुम हो जाती है, और गर्मी के मारे बूरा हाल हो जाता है तब हम मिथुन दा की फिल्म देख आते है। क्या मीठी निंद आती है , मिथुन दा की फिल्मो मे। मेरे ख्याल से मिथुन दा को तो अनिद्रा के रोगीयो के लिये एक चिकित्सालय खोल ही लेना चाहिये।

कुल मिला के हाल यह है कि मुड कोई भी हो, हमारे मुड के अनुसार फिल्मे मिल ही जाती है।

वैसे हमे समानांतर सिनेमा से कोई दुश्मनी नही है, लेकिन हमारा मानना है कि फिल्मे हल्के फुल्के मनोरंजन का साधन है। जिंदगी मे ऐसे भी परेशानीयो की, दुखो की कमी तो नही है जो सिनेमागृह मे भी जाकर वही सब कुछ देखे। मै ज्यादातर ऐसी फिल्मे देखता हुं जिसमे सोचने की जरूरत ना हो, दिमाग घर पर रख कर आओ। सारी दुनिया जहान को भुल्कर २-३ घन्टे फिल्म का आनंद लो, खुल कर हंसो। अब आप ही बताये “जाने भी दो यारो” से बढ्कर कोई यथार्थ वादी फिल्म हो सकती है, हास्य और यथार्थ का कितना सुंदर संगम है !

हां जब मुझे अपने आप को जब बुद्धीजिवी(इंट्लैक्चुवल) साबीत करना होता है या दिमाग पर जोर देना होता है तब मै घर पर ही(सिनेमाघर मे नही) समानांतर सिनेमा देख लेता हुं।

बस हम ऐसे ही फिल्म देख लेते है !


4 टिप्पणीयां 
1. Atul उवाच :
नवम्बर 16, 2005 at 7:24 pm ·
फिल्मे देखने के कारण तो सुँदर है पर मिथुन दा की फिल्मे इतनी बुरी तो नही होती थी बँधु, याद करो मृगया, डिस्को डाँसर और एक फिल्म का नाम भूल रहा हूँ जिसमें वह हिरोईन के हाथ कटे भाई बनकर विनोद मेहरा से पँगा लेते थे, वगैरह। किसी जमाने में मिथुन दा गरीब निर्देशकों के अमिताभ कहलाते थे।


2. अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 17, 2005 at 6:50 am ·
बढ़िया पिक्चर है। हमें तुम्हारी बनाई पिक्चर का इंतजार रहता है।जहां तक बात रही फ़ुरसत की तो भइये हम सारी की सारी भेज देते हैं। जी भर मौज करो।
3. अक्षरग्राम » Blog Archive » अवलोकन अनुगूँज १५ - हम फिल्में क्यूँ देखते हैं उवाच :
दिसम्बर 2, 2005 at 1:35 pm ·

[…] विषय तो सभी को प्रिय होगा इतना पता था पर अपने आशीष जी खालीपीली के उत्साह की दाद देनी पड़ेगी पहली प्रविष्टि भेजने के लिए बधाई। लिखी भी एकदम फक्कड़ स्टाइल से है और “छड़यां दी जून बुरी” के बारे में बताना नहीं भूले। जिंदगी के हर मूड के लिए उनके पास फिल्में हैं - […]


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वो ४८ घन्टे

रविवार, नवंबर 06, 2005

अमरीका से वापिस आये हुये २ सप्ताह हो चुके थे, दिपावली पर घर जाने की पूरी तैयारी थी।  भला हो भारतीय रेलवे का जो उन्होने इन्द्रजाल के द्वारा यात्रा टिकट उपलब्ध करवा दिये है| अमरीका से निकलने से पहले ही मै अपने टिकट खरीद चुका था। वापिस चेन्नई आने पर टिकट मेरा ईंतजार कर रहे थे। सोचा था कि अब घर जाकर कुछ आराम किया जाये। मेरे साथ मुसीबत यह है कि यदि मै रेल से घर जाउं तो 18 घन्टे लगते है और वायुयान से 14 घन्टे ! चेन्नई से नागपूर सीधी उड़ान नही है, जिससे मुझे मुम्बई होते हुये जाना होता है। नागपूर से मुझे मार्ग बदल कर मुम्बई हावडा मार्ग पर गोंदिया जाना होता है जो मेरा गृह नगर है। इसीलिये मै रेलमार्ग ही पसन्द करता हुं। कम पैसो मे ज्यादा सफर।

लेकिन मुसीबत मेरा पिछा कर रही थी, मुझे क्या मालुम था कि अमरीका के हरीकेन(कैटरीना/रीटा/विल्मा) अब नाम बदल कर मेरे साथ चेन्नई चक्रवात के रूप मे पहुंच गये है। मुझे 28 अक्तूबर शुक्रवार को तमिलनाडु एक्सप्रेस से निकलना था, लेकिन बारीश बुधवार से ही शुरू हो गयी। चेन्नई मे बारीश एक आश्चर्य होता है। लेकिन इस बार बारीश मुसलाधार हो रही थी, बिना रूके लगातार। मैने चेन्नई मे इतनी बारीश कभी देखी और सुनी नही थी जो अब देख ली। मै अड्यार मे रहता हुं, जो उंचाई पर स्थित है, बारीश का पानी जमा नही होता। इस बार मेरे कमरे(घर नही) के सामने 4 फुट पानी था।

गुरूवार सुबह दोस्तो ने फोन कर बता दिया कि आज कार्यालय बन्द है, सडको पर पानी जमा हो गया था। कार्यालय जाने के लिये नाव के अलावा और कोई साधन नही था। मै और मेरे साथी परेशान क्या करें ! कमरे मे खाने और पीने के लिये कुछ नही। इससे ज्यादा परेशान इसलिये कि सभी का घर जाने का कार्यक्रम पर पानी फिर रहा था। मै सबसे ज्यादा परेशान,मुझे हर हालत मे घर जाना था। मै पहली बार घर से पूरे ८ महिने के लिये दूर था।

शाम तक बारीश नही रूकी ,पता चला चेन्नई आनेवाली और जानेवाली सारी की सारी रेले रद्द कर दी गयी है। मै और परेशान। हवाईअड्डे पहुंचा, उडान पट्टी पर पानी, उडाने रद्द। फिर भी मैने सोचा शुक्रवार ना सही, शनीवार, रविवार या सोमवार का टिकट मिल जाये ताकि मै मंगलवार दिपावली से पहले घर पहुंच जाउंगा। लेकिन जेट/सहारा तो दूर ढक्कन वाले(एअर डेक्कन) भी भाव खा रहे थे। फरमाया कि 5 नवंबर तक किसी भी विमान सेवा मे कीसी भी श्रेणी मे स्थान उपलब्ध नही है !

शुक्रवार सुबह, बारीश रूक गयी और धुप निकल आयी। थोडी आशा जगी। सडको पर से पानी छंट गया था। मै अपना सामान बांध चुका था। रेलवे पूछ्ताछ फोन किया पता चला कि दोपहर तक की सारी रेले रद्द है और बाकी रेलो के बारे मे शाम को विचार किया जायेगा। विमान सेवा के बारे मे पता किया, हालात वही थे, कोई जगह खाली नही थी। मेरा एक रूममेट शाम 4:30 की जीटी से जा रहा था उसने पता किया की जीटी और तमिलनाडु दोनो जा रही है लेकिन मार्ग बदल दिया गया है। मैने सोचा ठीक है,कैसे भी पहुंचाओ लेकिन पहुंचाओ तो !

मेरा एक और सहयोगी जो मेरे साथ मेरी ही रेल से जा रहा था, उसने फोन किया कि तमिलनाडु एक्सप्रेस रद्द कर दी गयी है और वो अपने टिकट रद्द करवा चुका है। मेरा दिमाग चकराया। मैने फिर से रेलवे मे पूछताछ की , जवाब आया की स्थिति पूर्ववत है, याने बदले हुये मार्ग से तमिलनाडु एक्सप्रेस जा रही है। बस समझ मे आ गया कि हमेशा की तरह अफवाहो का बाजार गर्म है। समझ मे नही आता, कि हम लोग अफवाहे फैलाने मे सबसे आगे कैसे रहते है ! अब तो विश्वव्यापी अफवाह भी(गणेश जी का दुध पीना) फैलाते है !

सोचा रेल के समय पर स्टेशन पहुंच जाओ, जो होगा देखा जायेगा। कमरे से निकल कर वापिस नही आऊंगा। रेल रद्द तो बस से हैद्राबाद और वहा से घर जाउंगा। वो नही हुवा तो कार किराये से लेकर जाउंगा, बस घर जाना है। कैसे भी।
4:30 शाम, मेरा रूममेट रेल्वे स्टेशन पहुंचा, पता चला उसकी रेल जी टी रद्द कर दी गयी है ,लेकिन मेरी तमिलनाडु एक्सप्रेस जा रही है। मन थोडा घबराया, लेकिन आशा अभी जवान थी। राम राम करते 9 बजे रेलवे स्टेशन पहुंचा। 9:30को को रेल प्लेटफार्म पर आ गयी। थोडी आशंका अभी भी थी। लेकिन ठिक 10 बजे रेल चल दी। अब मन शांत हुवा, चलो चल तो दिये , देर से सही पहुंच तो जायेंगे।

हर डिब्बा खचाखच भरा हुवा था, एक एक शायिका पर 5-5 लोग यात्रा कर रहे थे। 2 दिनो का कम से कम 5 रेलो के यात्री एक रेल से जा रहे थे। लेकिन सभी खुश थे, कोई किसी से शिकायत नही कर रहा था। जिसे जहां जगह मिल गयी वहां जम गया था। मेरी कुपे मे 7-8 आइ आइ टी के छात्र जा रहे थे, एक के पास वैध टिकट था, बाकि उस के भरोसे जा रहे थे। ऐसा हर जगह था। मेरी साथ कोई नही था, लेकिन वो लोग हो लिये।

रेल चल तो दी, रेल की पैन्ट्री का दो दिन का खाना एक दिन मे साफ हो गया! दुसरे दिन 2 बजे दोपहर मे नागपूर पहुंचने वाली रेल शाम के 8 बजे सिकंदराबाद पहुंची थी। मै भूख से परेशान था। मै सामन्यतः रेल यात्रा मे कुछ नही खाता। सिकंदराबाद मे कुछ केले खाये। आइ आइ टी के छात्र साथ मे थे जिससे लम्बी और उबाउ यात्रा मनोरंजक हो गयी थी। वो लोग मस्ती कर रहे थे, हर किसी को छेड रहे थे। जिसका सभी आनंद उठा रहे थे। और मुझे अपना कालेज जमाना याद आ रहा था। 16 घन्टो का सफर 32 घन्टो मे तय कर मै नागपूर पहुंचा। थका था लेकिन खुश था कि घर पहुंच गया।
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1 टिप्पणी »
1.अनूप शुक्ला उवाच :
नवम्बर 6, 2005 at 11:41 pm • संपादन करें
बधाई, लौट के घर आये।

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कहानी तो पूरी फिल्मी है !

सोमवार, अक्तूबर 24, 2005

अब मेरी तो समझ मे नही आ रहा है कहां से शुरू करें ! कहानी पूरी फिल्मी है, फ्लैश बैक मे ले जाउं या सीधे शुरूवात से ले जाउं। ऐसे भी इस मामले मे हम थोडे अनाडी है। वैसे ठीक ही है वर्ना अब तक बर्बाद(शादी) हो गये होते !

अब किस्सा कुछ ऐसा है कि चेन्नै मे मै दो और छडो(सुखी/क्वांरो) के साथ रहता हुं। जब इन दोनो महाशयो को मेरी कम्पनी (विप्रो) मे नौकरी मिली थी, तब मै इन दोनो का बास था। तब मै अकेला रह रहा था। इन लोगो की खुशकिस्मती या बदकिस्मती समझे, मैने इन लोगो से पूछा कि क्या वे मेरे साथ रहना पसन्द करेंगे। अब वे तो बास को ना करने से रहे। दोनो मान गये। अब मै बास था तो थोडा नाजायज फयदा तो उठा लेता था जैसे खाना मै बनाउंगा, वे तैयारी करेंगे(सब्जी काटना/बर्तन साफ करना वगैरहा वगैरहा..)। वे बेचारे मेरा बनाया खाना झेल कर भी तारीफ करते थे।

बाद मे पता चला उनमे से एक अन्ना मेरे ही कालेज से है, दुसरा नन्दी है। दोनो बन्दे अपने आप मे मस्त है, थोडे लापरवाह, हर आती जाती कन्या को घुरना उनका जन्मसिद्ध अधिकार। कभी कभी किसी कन्या के कारण अपने बस स्थानक के आगे 4-5 बस स्थानक आगे तक जाकर वापस पैदल आयेंगे। वैसे बन्दे शरीफ है, लेकिन अन्ना का सबसे बडा सपना है कि जिन्दगी मे कम से कम उसकी एक “महिला मित्र” हो जिसके साथ वो कम से कम एक फिल्म देख सके। उससे शादी तक का उसका कोई इरादा नही है क्योकि उसे मालुम है कि अगर उसने प्रेम विवाह की बात भी की तो उसके मां बाप घर से निकाल देंगे।

नन्दी का फंडा थोडा अलग है, शर्मीला है, बिल्कुल “छोटी सी बात” के अमोल पालेकर के जैसे। वैसे तो बातो का शहंशाह है लेकिन किसी लड़की से बात नही कर सकता।

अन्ना जो मेरा कालेज का कनिष्ठ था, मुझसे कुछ ज्यादा खुल गया था। उसकी नजरो मे मै हर चिज (तकनिकी हो या खेल-कुद या चीडीमारी या कुछ भी) मे उसका “बाप” लगता था। और तो और उसने मुझे “पापा” कहना शुरू कर दिया था।

हिन्दी फिल्मो की तरह कहानी मे मोड आया, एक कन्या के प्रवेश से। अब कम्पनी की मेरी टीम मे एक ख़ूबसूरत सी कन्या आयी। कन्या सीधी-सादी घरेलु सी थी, मृदुभाषीणी थी। कन्या इन दोनो को भा गयी। एक प्रेम त्रिकोण बन गया जिसमे तीसरा कोण(कन्या) शांत था, मतलब कि उसे कुछ मालुम ही नही था। कभी कन्या ने एक से “हाय” कर दी, उसका सारा दिन अच्छे से गुजरेगा। दुसरा सारा दिन झल्लाता रहेगा। एक बन्दे की मुस्कराहट दुसरे के जख्मो पर नमक का काम करती थी उसपर जिसे “हाय” मीली थी वह शाम को पार्टी दे देगा, जो तेज मिर्च काम करती थी।

मै इन सब चिजो से अंजान था, लेकिन मुझे कुछ शक हो रहा था। एक दिन ऐसे ही जब रूम पर हम लोग बाते कर रहे थे, उस कन्या का जिक्र निकल आया। मैने ऐसे ही कह दिया “अच्छी लडकी है”। मेरा मतलब था, लडकी काम मे अच्छी है। लेकिन अन्ना को लगा कि मै अपना नंबर लगा रहा हुं और मैने अपना नंबर लगाया तो उन दोनो को पत्ता साफ ! वो छुटते ही बोला:

“पापा! आप ये क्या बोल रहे हो, आप अपनी उमर देखो और उसकी उमर देखो। वो आपके बेटी जैसी है।”

और अन्ना ने अपनी जिन्दगी की सबसे भयानक भुल कर दी। मैने कहा

“अबे मै उसको लाईन नही मार रहा, तु बोल रहा है तो ठीक है वो मेरी बेटी है।” 

नन्दी को मौका मिल गया। ऐसे भी बाल की खाल निकालने मे उस्ताद। बोला

“तब तो वह लडकी अन्ना की बहन हो गयी क्योकि बास(मै) तो अन्ना और कन्या दोनो के बाप है”। 

नन्दी उछलने लगा,और रूम मे नाचना शुरू कर दिया। बेचारा अन्ना सर पीट रहा था, कहां मुझे फंसाने चला था खुद ही अपने जाल मे फंस गया।

कुछ ही दिनो बाद मै चल दिया, एक दुसरे प्रोजेक्ट मे मिनियापोलिस, उसके बाद क्लीवलैण्ड पूरे ८ महीने बाहर रहा। जब भारत वापिस आया तो नया नजारा देखने मिला। अन्ना की उस दिन की गलती उसके लिये गले का फांस बन चुकी थी। नन्दी उसे ब्लैकमेल कर रहा था और कहते रहता था,

“अबे अन्ना अपनी बहन को बूरी नजर से मत देख”।

मैने पाया कि नन्दी कुछ ज्यादा ही गम्भीर है, उसने अपनी मां को उस लडकी के बारे मे बता रखा है। लेकिन बन्दा पूरा “छोटी सी बात” वाला अमोल पालेकर है, अपनी मां से बात कर ली, लेकिन उस लडकी से नही। प्रेम प्रस्ताव तो दूर की बात साधारण रोजाना के काम वाली प्रोग्रामिंग की तकनीकी बाते भी नही की है ! लेकिन महाशय ने उस लडकी के बारे मे हर चिज पता कर रखी है, उसके खाने के समय पर खाना खाने जायेगा, उसके पिछे वाली सीट पर बैठेगा।ऒफीस मे सबसे पहले पहुंचेगा ताकि वह जब आये तो हाय बोल सके। अन्ना उससे यदि बात करने की कोशीश भी करे तो शाम को उसे धमकायेगा। बोलेगा
“अबे , साले बहन पर लाईन मारता है”। 

अन्ना को तो साला बना लिया है लेकिन वाह रे नन्दी महाराज , लड़की सामने आयी  कि बोलती बन्द !

उसका जन्मदिन आया नन्दी सुबह छः बजे आफीस मे , अन्ना को बाथरूम मे बंद करने के बाद ! सुबह सबसे पहले उसको जन्मदिन की बधाई दी, हाथ मिलाया। उसके बाद सारे दिन उसने वो हाथ किसी से नही मिलाया और शाम को अन्ना को एक रेस्तरां मे डीनर पार्टी दे डाली। अन्ना शायद पिछले जन्म मे कालाहांडी मे पैदा हुवा था, खाने के नाम से सब भुल जाता है ! जन्मदिन किसी और का, पार्टी  दे रहा है नंदी और वह भी किसी और को!

मैने नोट किया कि वो लडकी दोनो को पसंद है लेकिन अन्ना अपने सपने तक के लिये ही गम्भीर है। जबकि नन्दी ने अपने घर मे भी बात कर रखी थी, मेरा झुकाव नन्दी के लिये हो गया था। अब उनकी टीम(मेरी भुतपूर्व टीम) से एक कन्या की शादी तय हुयी। उस लडकी ने भी अपनी सहेली की शादी मे जाने का तय किया। शादी चेन्नई से ५ घंटे की दूरी पर कुंभकोणम मे थी। शादी रविवार की थी, लेकिन वह कन्या शुक्रवार को जा रही थी ताकि वह वहां पर शनिवार को आसपास घुम-फीर सके। अपने दोनो हीरो ने शनिवार को जाने कि योजना बनाई।

अब गुरूवार की रात को हम लोग ऐसे ही बाते कर रहे थे, उन लोगो ने मेरे से पूछा आप इस स्थिति मे क्या करते, मैने कहा

”करना क्या है? जब वह शुक्रवार को जा रही है, तब मै भी उसी दिन जाता । उसके साथ मे पूरे दिन घुमने फिरने का पूरा जुगाड तो कर ही लेता। आखिर पहले बातें होगी साथ मे घुमेंगे, तब ही तो मामला आगे बढेगा”

अन्ना थोडा निश्चिंत था, उसे अपने पर तो नही लेकिन नन्दी पर पूरा भरोसा था, कि ये कुछ नही कर सकता। अब नन्दी ने पूरी योजना बदल दी और अन्ना को हवा नही लगने दी। शुक्रवार शाम को 9 बजे बस के समय 15 मिनिट पहले उसने अन्ना को जोर का झटका धीरे से दिया। कहा

”मै आज ही उसी बस से, उसके साथ ही जा रहा हूं।”

और हिरो ने अपना बैग उठाया और चल दिया। बेचारा अन्ना ऐन वक्त पर कुछ नही कर पाया। पूरी रात भुनभुनाता रहा और नन्दी को गालियां देता रहा। और मै अपने लैपटोप पर “हम -तुम” देखता रहा और अन्ना के मजे लेते रहा अभी तक तो नन्दी है अभीषेक बच्चन और अन्ना सैफ अली खान। यहां तो अभीषेक बच्चन मेहमान भूमिका मे नही, नायक की भूमिका मे नजर आ रहा है।

और हां इस “अमोल पालेकर” को “अशोक कुमार” तो नही लेकिन ‘आशीष कुमार” जरूर मिल गया है। आगे देखते है क्या होता है।
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3 टिप्पणीयां »
1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 24, 2005 at 11:56 pm
कहानी तो बढ़िया है लेकिन भइये ये मन शक के घेरे में आ रहा हैकि
कहीं नंदी के बहाने अपनी कहानी तो नहीं कह रहे हो।

2.आशीष श्रीवास्तव उवाच :
अक्तुबर 25, 2005 at 7:11 pm
अनुप भईया,
इस कथा मे जितनी भी घटनायें घटी है, उसमे से अधीकांश घटनाओ के समय हम भारत भुमी पर थे ही नही !
आशीष

3.सारिका सक्सेना उवाच :
अक्तुबर 26, 2005 at 6:55 pm
कहानी के साथ-साथ कहने का अंदाज़ भी अच्छा है। आगे की कहानी का इंतज़ार रहेगा।



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ऐसे बीता मेरा जन्मदिन

बुधवार, अक्तूबर 19, 2005

आज मैने अपनी जिन्दगी के उन्तीस साल पूरे कर लिये। बचपन मे मेरा जन्मदिन काफी धुमधाम से बनता था। घर मे सबसे बड़ा था उपर से पूरे मुहल्ले मे अकेला लड़का। काफी आनन्द आता था। हमेशा इंतजार रहता था, हम एक दिन के शंहशाह होते। हर फरमाईस पूरी की जाती। घर मे उपहारो का ढेर लग जाता था। पापा मम्मी और बहने तो रह्ते ही थे, साथ पापा के स्कुल से सभी शिक्षक सहकर्मी भी आते थे।

ये सिलसीला खत्म हुवा मेरे कालेज मे पहुंचने के बाद। उसके बाद तो कुछ ऐसा हुवा कि जन्मदिन पर घर पहुंचना मुश्किल जाता था। लेकिन मै कैसे भी , हर हालत मे शाम तक घर पहुंच जाता था। पांरपरिक तरिके से टिका किया जाता था,। कुल मिला कर परिवार मे मेरा जन्मदिन एक तरह से त्योहार ही था।

कालेज के बाद जब नौकरी की जद्दोजहद मे ऐसा हुवा कि जन्मदिन मनाना  लगभग बंद हो गया। ऐसे भी जब से पापा नही रहे थे तो कोई उत्साह नही रहता था। बस यदि दोस्तो को याद रहा तो शाम को पार्टी हो जाती थी, किसी होटल/रेस्टारेंट मे जाकर शाम का खाना खा लिया बस।

वैसे भी मै पिछले 7-8 सालो से अकेला रह रहा हुं, एक जगह पर टिक कर कभी नही रहा तो मम्मी को साथ मे रखने की सोच नही पाया छोटा भाई सरकारी नौकरी मे जमा हुवा है तो मम्मी और छोटी बहन उसी के साथ रहते है। बस तब से तो जन्मदिन पर उन लोगो से बात कर लो बस दिल खुश हो जाता है।

जब मैने चेन्नई मे विप्रो मे काम करना शुरू किया था, यहां भी कुल मिला कर हाल वही था, वही भटकती जिन्दगी, कभी भी 3-4 महीनो से ज्यादा एक जगह ना रह पाना। साल मे 6 महिने से ज्यादा बाहर। जन्मदिन तो दूर किसी भी त्योहार मनाने के लिये तरस जाता था। नये दोस्त बन नही पाये, एक जगह टिक कर रहो तभी तो दोस्त बनेंगें!

लेकिन इस साल बात कुछ और थी। पिछले प्रोजेक्ट के लिये मुझे दिसंबर 2004 मे कुछ रूकी(नये कालेज स्नातक प्रोग्रामर) दिये गये थे। उन लोगो ने अपना कैरीयर की शुरूवात मेरे मार्गदर्शन मे की थी, और मैने उन लोगो को एक अच्छी शुरूवात देने की कोशीश की थी। इन लोगो को मै मस्ती मे मेरे बच्चे ही कहता था। और वे मुझे बास इन बच्चो का मुझे बास कहना, अपने मार्गदर्शक/गाईड/मेंटर को सम्मान देने के जैसा ही था।

इस टीम के साथ मैने 3-4 महीने कार्य किया। बच्चो का कार्य अच्छा रहा था, मेरा यह प्रोजेक्ट अब कंपनी के लिए एक उत्पाद बन चुका था। मेरा कार्य समाप्त था, मेरे बच्चे अब इसे आगे बढ़ाने मे सक्षम थे। प्रोजेक्ट का ठोस आधार खडा कर मै चल दिया फिर से अमरीका, अगले प्रोजेक्ट के लिये।

और मैं वापिस पहुचां अपने जन्मदिन(19 अक्टूबर) से 2 दिन पहले। 19 अक्टूबर आया। सुबह मंदिर जाकर भगवान जी को पिछले साल के लिये धन्यवाद बोला और अगले साल के आने के लिये समय ले लिया। घर फोन कर मम्मी , छोटी बहन और भाई से बाते की और सोचा हो गया अपना जन्मदिन !

शाम तक काम मे लगा रहा। ऐसे भी काफी काम पडा था… भारत वापिस आने के बाद नये वातावरण मे, फिर से सब कुछ व्यवस्थित करना मुश्किल हो जाता है। हर बार जब भी वापस आता हुं सब कुछ बदल चुका होता है। नये लोग, नया वातावरण, नये सहकर्मी…। पूरा दिन कैसे गया पता नही चला…।

शाम को जब घर(मेरा कमरा, घर तो वो होता है जिसमे घरवाले हों) जाने की तैयार था, एक मिटिंग के लिये बुलाया गया। अंदर पहुंचा तो पता चला कि मेरे जन्मदिन मनाने की पूरी तैयारी है। केक, बधाई पत्र लेकर पूरी जनता तैयार थी। दिल खुश हो गया। बचपन के सारे जन्मदिन याद आ गये।

मैने तो सपने मे भी नही सोचा था कि भारत आने के बाद कार्यालय मे मेरा जन्मदिन इतने अच्छे से मनाया जायेगा। और मेरे साथ काम करने वाले मेरे ये बच्चे, मेरे लिये ये सब ताम झाम करेंगे।

कुल मिला कर याद रहेगा ये जन्मदिन!


5 टिप्पणीयां »

1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 21, 2005 at 6:43 am
जन्मदिन मुबारक हो मेरे बच्चे। दुआयें कि भगवान तुझे टिकाकर रहने वाली साथी टिकायें।

2.eswami उवाच :
अक्तुबर 21, 2005 at 6:55 am
जन्मदिन की बहुत-बहुत मुबारकबाद आशीष!

3.जीतू उवाच :
अक्तुबर 22, 2005 at 6:23 pm
भई आपको जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई। देर से ही सही, लेकिन हम आ ही गये।
अक्सर होता ये था, कि जो परमालिंक आपका बनता था, वो काम नही करता था, पता नही क्यों। लेकिन आज कर गया, इसलिय सारी पिछली पोस्ट एक साथ पढ रहा हूँ।

4.पंकज नरुला उवाच :
नवम्बर 25, 2005 at 3:36 am
आशीष भाई,
थोड़ा लेट कह रहा हूँ पर बधाईयाँ तो समय की मोहताज नहीं होती। जिंदगी के नए साल की बहुत बहुत बधाईयाँ। आशा करते हैं कि आपका नया प्रोजेक्ट इधर सैन होज़े साइड लगे व आप कम से कम चार अटैची लेकर यहाँ पधारे।
पंकज




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चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना

मंगलवार, अक्तूबर 11, 2005

चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना
खतम हुवे उस डाली के जिस पर तेरा बसेरा था
आज यहां और कल हो वहां ये जोगी वाला फेरा था
सदा रहा है इस दुनिया मे किसका आबो दाना
चल उड जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना

भारत वालो मै आ रहा हुँ, अमरीका वालो मै जा रहा हूँ। यहाँ क्लीवलैंड मे मेरा काम खत्म हो गया है, और हमने अपना बोरीया बिस्तर बांध लिया है। बस कुछ दिनो का और इंतजार 15 अक्तुबर को हम चल दिये वापिस।

वैसे मै अमरीका अक्सर आते जाते रहता हुं लेकिन ज्यादा समय के लिये नही, 6 सप्ताह से लेकर 8 सप्ताह तक। इस बार कुछ ज्यादा ही खिंच गया पूरे 8 महीने हो गये। जैसे ही हाथ का काम निपटाता , दुसरा काम हाजिर हो जाता। लग जाओ फिर से। इस बार भी फिर से नया काम आ गया था, लेकिन मै अड़ गया, बहुत हो गया अब हर हाल मे वापिस जाना है। रही काम की बात भारत जा कर अपनी जगह किसी को भेज दुंगा। वैसे भी मेरा विसा नवम्बर मे खत्म हो रहा था।

वैसे भी मालुम है कि कम्पनी भारत पहुचने के बाद चैन से नही रहने देगी, कहीं ना कहीं भेज देगी। वो तो भला हो अमरीकी दुतावास का अगले 3 महीनो तक विसा साक्षात्कार के लिये समय उपलब्द्ध नही है, अमरीका वापिस आने का कम से कम मार्च तक कोई मौका ही नही है। ऐसे भी सर्दियो मे कौन आना चाह्ता है यहां ? और यदि युरोप जाने का अवसर आया तो क्या कहने ! काफी कुछ है घुमने के लिये, वेनिस, रोम ,प्राग , पेरीस…

इस बार भारत मे ज्यादा टिक गया तो इतना निश्चित है कि भविष्य मे इतनी स्वतत्रंता से आवारागर्दी नही कर पाउंगा ! इस बार घरवाले छोडेगे नही। मेरा सुख चैन छीन जायेगा।

कैसी दुविधा है? एक तो घर जाने की जल्दी है और घर से भागने की योजना भी तैयार ।

चलो कोई बात नही पहले भारत तो पहूचों !
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टिप्पणीयाँ

1.अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 11, 2005 at 12:52 pm
आओ स्वागत है तुम्हारा.लगन-साइत बडी जोरदार चल रही है.


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मैं हिन्दी मे क्यों लिखता हुं ?

शुक्रवार, अक्तूबर 07, 2005

जब बात छेड( सुनील जी, इस्वामी जी, जितु जी, अतुल जी……)दी गयी है तो हम भी आ जाते है मैदान मे।

मै हिन्दी क्यों लिखता हुं ?

ये प्रश्न ही गलत है ! जबकि होना ये चाहिये मैं हिन्दी क्यों ना लिखुं ?



मेरा दिमाग ही हिन्दी मे चलता है। अंग्रेजी तो उसी वक्त याद आती है, जब सुनने वाले को हिन्दी ना आती हो। मेरे रगो मे हिन्दी रची बसी है। हिन्दी माध्यम से पढा हुं। बचपन से लेकर अब तक हिन्दी सुनी है, देखी है।

मैं हिन्दी मे लिखता हुं, पढ़ता हुं, बात करता हुं क्योंकि मुझे अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि मै अपनी जडो से जुडा हुवा हुं ! मै अपनी मिट्टी के पास हुं।

भाषा किस लिये होती है ? लोगो से संपर्क के लिये, विचारों के आदान प्रदान के लिये ? जब वो मैं हिन्दी मे कर सकता हुं, तब मैं किसी और भाषा का प्रयोग क्यो करूँ ? किसी और भाषा का प्रयोग करना आपकी व्यावसायिक मजबूरी हो तो समझ मे आता है लेकिन बाकी निजी कार्यो मे ?

दक्षिण भारत विशेषतया तमिलनाडु हिन्दी विरोध के लिये जाना जाता है। मैं चेन्नई मे २ साल रहा, लेकिन मुझे हिन्दी को लेकर कभी कोई परेशानी नही गयी ! होटल, आटो, रिक्शा यहां तक कि सब्जी वाला, दुधवाला, किराणावाला सभी से मैं हिन्दी मे बात कर लेता था। हां उन्हे हिन्दी मे बात करते परेशानी जरूर होती थी लेकिन इतनी भी नही कि मैं उनसे बात ना कर सकुं। और हां आप इन लोगो से अंग्रेजी मे बात करने की उम्मीद नही रख सकते।

भारत मे या भारत के बाहर मैं जहां भी गया, जहां भी भारतीय मिले चाहे दक्षिण भारतीय हो, गुजरती, बंगाली हो हिन्दी ही संपर्क का माध्यम रही। मैने हिन्दी मे शुरूवात की और मुझे जवाब हिन्दी मे ही मिला। जब मै हिन्दी मे अपने लोगो से संपर्क कर सकता हुं अपनी बात समझा सकता हुं तो मै हिन्दी क्यो ना लिखुं ?

जिसे हिन्दी आते हुये भी हिन्दी नही पढना हो या हिन्दी पढना लिखना पिछडापन लगता हो, नही चाहिये ऐसे लोग मुझे ! मै नही चाहता कि ऐसे लोग मेरा चिठ्ठा देखें भी। मै चाहता हुं कि मेरे चिठ्ठे को पढने वाले वही लोग को हो जो अपनी मातृभाषा से प्यार हो, सम्मान हो चाहे वे मुठ्ठीभर ही क्यों ना हो। और है मेरे पास ऐसे लोग !

ईस्वामी जी ने सही कहा था कि
““ऐसा ही हूं मैं - कर लो जो करते बने”, “हम नहीं सुधरेंगे” वाला ये भाव मुझे कहीं ना कहीं हर हिंदी के ब्लागर मे दीखता है”।

हां मैं भी अडियल हुं, मुझे हिन्दी मे ही लिखना अच्छा लगता है, एक सुकून मिलता है। नही लिखना मुझे किसी
और भाषा मे।

याद आती है कुछ साल पहले घटीत एक छोटी सी घटना ! कुछ साल पहले मै और मेरे कुछ सहकर्मी ओसाका, जापान गये थे। जब हम पहले दिन कार्यालय गये तब हमारे स्वागत के लिये संबधीत विभाग का व्यवस्थापक स्वागत कक्ष मे मौजूद था। उसने हम लोगो से हाथ ना मिलाते हुवे पूरे भारतीय अंदाज़ मे हाथ जोड़कर नमस्ते कहा। बाद मे पता चला कि जब उन लोगो को पता चला कि भारत से कुछ लोग उनके साथ काम करने आ रहे है तब पूरे विभाग ने एक हिन्दी शिक्षक से भारतीय अभिवादन और शिष्टाचार सीखा था।

मैं जापान मे कुछ ही सप्ताह रहा और देखा कि जापानी अपनी भाषा, अपनी संस्कृति से कितना प्यार करते हैं। विडंबना है मैने अपनी भाषा के लिये सम्मान विदेश जा कर सिखा। तब मैने सोच लिया था कि जहां भी मै जाउँगा अभिवादन के लिये “नमस्ते” और आभार के लिये “धन्यवाद” का प्रयोग करूंगा।

मैं क्लीवलैंड मे जिस कपनीं के लिये काम कर रहा हुं आज उस कंपनी के लगभग हर व्यक्ति को ‘नमस्ते’ तथा ‘धन्यवाद’ का अर्थ मालूम है। और जब मैं उनके पास से गुजरता हुं वो मुझे “हाय” या “हैलो” की बजाय “नमस्ते” कहते हैं।

इन दो घटनाओं से मैने देखा है कि यदि आप अपनी भाषा को सम्मान देते है तो आप के आस पास के लोग आपकी भाषा को सम्मान देना शुरू कर देंगें। आखिर सारी दुनिया जापान मे काम करने के लिये या जापान के साथ व्यवसाय करने के लिये जापानी क्यों सिखती है ? ये जर्मनो से साथ भी देखा गया है। जापानीयो को तो अंग्रेजी अच्छे से नही आती, लेकिन जर्मन तो अंग्रेजी जानते हुये भी अंग्रेजी बोलना पसंद नही करते !

सबसे पहले जब मैने “अभिव्यक्ति” देखी थी, काफी खुशी हुयी थी कि हिन्दी मे एक अच्छी पत्रिका इन्द्रजाल पर उपलब्ध है। बाद मे “वेब दुनिया” देखा, उसके बाद तो एक श्रंखला ही शुरू हो गयी। मै आभारी हुं हिन्दी चिठ्ठाकार समुह का जिन्होने हिन्दी को इन्द्रजाल मे लाने के लिये इतनी मेहनत की है। मैने तो चिठ्ठा “ब्लाग” शब्द ही रवी रतलामी जी के अभिव्यक्ति मे एक लेख मे पढा था। उसके बाद सभी को पढना शुरू किया। इसके पहले तो मुझे मालूम था सिर्फ उन्ही लोगो के बारे मे जो अभिव्यक्ति और अनुभूति मे लिखते थे। मुझे पता चला कि और भी धुरंधर बैठे है। बस क्या था चलो , हम भी लिखेंगे और शुरू हो गये।

पढने का शौक है, अब तो हिन्दी मे काफी कुछ पढने के लिये इन्द्रजाल मे उपलब्ध है, और इस तरह उत्साह बना रहा तो जल्द ही और भी काफी कुछ होगा। बस कोई कारण ही नही है हिन्दी मे ना लिखने के लिये !

ईकबाल ने कहा था

हिन्दी है हम , हिन्दी है हम, हिन्दी है हम
वतन है हिन्दोस्तां हमारा !

7 टिप्पणीयां »
1. eswami उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 4:50 am • संपादन करें
मित्र तुम तो बहुत काम का आईडिया लाए! ये नमस्ते और धन्यवाद वाला विचार मेरे दिमाग में क्यों नही आया! लेख पढ कर मजा आ गया!

2. अनूप शुक्ला उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 5:58 pm • संपादन करें
लेख हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है। बधाई।

3. सुनील उवाच :
अक्तुबर 7, 2005 at 9:11 pm • संपादन करें
आशीष जी लेख बहुत अच्छा लगा क्योंकि सीधे दिल से लिखा लगता है. सुनील

4. जीतू उवाच :
अक्तुबर 8, 2005 at 11:25 am • संपादन करें
अच्छा लिखे हो बन्धु, लगता है दिल की आवाज या कहो गुबार है।
सच ही है, जब हम सोचते हिन्दी मे है, तो लिखे दूसरी भाषा मे क्यो, ये तो विचारो का अनुवादीकरण हुआ, यानि डुप्लीकेशन। ओरीजनल हमेशा डुप्लीकेट से बेहतर होता है।

5. रजनीश मंगला उवाच :
अक्तुबर 10, 2005 at 12:49 am • संपादन करें
मैंने जीतू जी के ब्लाग पर भी अपना विचार छोड़ा है। जर्मनों के बारे में बहुत लोगों के मन में गलत धारनाएं हैं। लगभग सब व्यवसायिक जर्मन अंग्रेज़ी के महत्व को समझते हैं और अंग्रेज़ी सीखने बोलने का प्रयत्न करते हैं। शुरू शुरू में मुझे हर जर्मन कहता था कि चलो मैं तुम्हारे साथ थोड़ा अंग्रेज़ी बोलने का अभ्यास कर सकता हूं। पहले एक दो साल मैंने उनके साथ अंग्रेज़ी बोली क्योंकि मुझे भी इतनी अंग्रेज़ी बोलने का अवसर भारत में नहीं मिला था। लेकिन इस चक्कर में मैं जर्मन नहीं सीख पाया। अब यहां दफ़्तरी भाषा जर्मन है तो कभी न कभी तो जर्मन अच्छी तरह सीखनी ही पड़ेगी। अब मैं किसी जर्मन के साथ अंग्रेज़ी नहीं बोलता।
लेकिन यहां अंग्रेज़ी का बोलबाला है। अंतरराष्ट्रिय व्यापार के चलते अंग्रेज़ी सीखना अनिवार्य हो गया है। अंग्रेज़ी सीखे बिना ये लोग अमेरिका जाकर काम नहीं कर सकते। FM radio पर, Disco में लगातार अंग्रेज़ी गाने चलते हैं। ये अंग्रेज़ी फिल्में dub कर सकते हैं लेकिन संगीत नहीं।
भईया ये politics और business है ना कि देशप्रेम, भाषाप्रेम या सांस्क्रिति प्रेम।

6. आशीष श्रीवास्तव उवाच :
अक्तुबर 11, 2005 at 2:22 am • संपादन करें
रजनीश जी,
मैने जो लिखा था वह अपने अनुभव से लिखा था. मैने कुछ समय Deutsche Post के लिये काम किया था (भारत तथा फ्रेंकफर्ट दोनो जगह) तब मैने महसुस किया था कि जर्मन अग्रेंजी जानते हुये भी बोलना नही चाहते.
हो सकता है आपका अनुभव अलग रहा हो.
आशीष

7. Sachin Shinde उवाच :
अक्तुबर 28, 2005 at 7:35 pm • संपादन करें
आशीष श्रीवास्तव जि,
आप के चिथे को देख कर बोहोत खुशि हुई| आप ये उपक्रम ऐसे हि चालु रखे येहि आप से विनति है धन्यवाद|


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मैने एक सपना देखा !

बुधवार, सितंबर 28, 2005


कल रात मैने एक सपना देखा। वैसे कुछ नया नही था, हमेशा की तरह हम एक कन्या से बतिया रहे थे। वैसे हमारे अनुसार कन्यायें दो प्रकार की होती है, कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं। सपने मे देखी कन्या दुसरी श्रेणी(ज्यादा खूबसूरत) की थी।

वैसे हमे आज तक अपने सपनों का मतलब समझ मे नही आया, हमेशा अजीबो-गरीब, उल जलूल किस्म के सपने आते हैं, जिसका ना तो सर होता है ना पैर। सायमंड फ्रायड को भी पढ़कर देख लिया, सपनो का मतलब समझना तो दूर रहा, पूरा का पूरा कन्फुजिया गया। तीसरी कसम के राज कपूर की तरह कसम खा ली, दोबारा सायमंड फ्रायड को हाथ नही लगाएंगे, पुस्तकालय के जिस हिस्से मे उनकी पुस्तक रखी हो, उस हिस्से मे कदम ही नही रखेंगे।


तो हम सपने मे एक खुबसुरत कन्या से बतिया रहे थे। हम रहते ज़रूर अमरीका मे है लेकिन सपनो मे सिर्फ देशी कन्यायें आती है, आखिर फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी। या कुछ इस तरह कह सकते है कि विदेशी कन्यायें हमे सपने मे भी घास नही डालती। तो ये कन्या भी विशुद्ध देशी थी। हम सुबह उठने पर हैरान परेशान ! पूरे सात साल बाद उस कन्या ने हमे दर्शन कैसे दिये ?

हम पुरानी यादों मे खो गये, इस कन्या से हम मिले थे, अपनी पहली नौकरी मे। वह मानव संसाधन/प्रबंधन/स्वागत विभाग मे का एकमात्र स्तम्भ(इकलौती सदस्या) थी और हम कम्पनी के सबसे नये रंगरूट प्रोग्रामर। वह मेरी काफी अच्छे दोस्तों(?) मे से एक थी। पता नही वो मेरी दोस्त थी या दुश्मन? हम लोग कभी भी किसी मुद्दे पर एक मत नही हुये थे। जब भी मिलते थे ,हमेशा लड़ते रहते थे। यह शुरू होता था सुबह कार्यालय मे आने से और जारी रहता था शाम को घर जाते तक।

सुबह वह मेरे से पहले कार्यालय पहुंच जाती थी, जब मैं कार्यालय पहुचंता एक अच्छी मुस्की के साथ गुड मॊर्नींग मिलती थी। अब हम ठहरे थोडे तेड़े जीव, सीधी तरह जवाब देना कभी सिखा नही। कभी अपने पिछे की तरफ देखना शुरू कर देंगे, ये जताने के लिये की वो गुड मॊर्नींग हमे ना बोल कर पिछे वाले को बोल रही है। कभी पूरी अकड़ से जवाब देंगे ठीक है ठीक है, जैसे हम कम्पनी के मालिक है। फिर क्या है, जवाब मिलेगा आज से आपसे कभी बात नही करूंगी। अब हमे शांत रहना तो आता ही नही है, पलट के जवाब देंगे अरे जाओ ना! , तुमसे बात करना ही किसे है ?। वह नाक मुंह बिचका कर चेहरा घूमा लेती थी, और हम चल देते थे, अपनी सीट पर।

लेकिन ठीक 12:00 बजे, फोन बजेगा।

खाने के लिये आ जाओ।
आज मेरा उपवास है !
तुम उपवास रहते हो? किसके लिये ?
ऐश्वर्या राय नामक देवी के लिये!
भडाक(फोन पटकने की आवाज)

2 मिनट बाद दोनो कैंटीन मे। वो घर से खाना लाती थी, और हम कैटीन से खाना लेते थे। लेकिन मै उसका तीन चौथाई खाना मै खा जाता था। वैसे भी वो पूरा एक परांठा सिर्फ 30 मिनीट मे खाती थी। खाते खाते हर दिन किसी ना किसी बात पर लढाई शुरू हो जाती थी। मुझे या उसे(पता नही किसे) लड़ने का एक बहाना चाहिये होता था, , जो की मिलना मुश्किल नही होता था। वैसे भी मेरे जो सुवचन होते थे वह कन्या जाति के खिलाफ ही होते थे। मेरे सोचने का ढंग ऐसा नही होता था(ना है), सिर्फ उसे चिढाने के लिये पता नही कहां कहां से ऐसे सुवचन ढूंढ लाता था।

मेरे कुछ सुवचनो मे से जो उसे अंगारा बना देते थे:
  • नारी मस्तिष्क की बलीहारी, तन हरे मन हरे , मरे नर्क ले जाये।
  • भारतीय इतिहास मे जितने युद्ध हुये है, नारी के कारण हुये है। रामायण शुर्पनखा के कारण, महाभारत द्रौपदी के कारण। और तो और संयोगिता ना होती तो मुगल भी भारत नही आते।
  • हव्वा आदम को सेब खाने नही उकसाती तो, आज सभी लोग स्वर्ग मे होते।
बस हमारा युद्ध शुरू। धीरे धीरे पूरी की पूरी कंपनी(कुल जमा मालिक समेत २० लोगो की ) लडाई का मजा लेती थी। कंपनी की बाकि जनता भी आग लगा कर मजे लेती थी। कभी कोई उसके बारे मे मेरे सुविचार उस तक पहुँचा देता, और वो लड़ने मेरी सीट पर ! या कोई उसके सुविचार मुझे कह देता और मै उसकी सीट पर। या यूं कहे पूरी कम्पनी उत्प्रेरक का काम करती थी। उत्प्रेरकवह तत्व होता है, जो रासायनिक क्रिया मे भाग नही लेता लेकिन प्रतिक्रिया की गति को बढा देता है।

एक दिन लड़ाई मे हमने एक खतरनाक सुविचार व्यक्त कर दिया:
लड़कियों का काम सिर्फ बच्चे और चुल्हा सम्हालना है।

अब हमारी पिटायी के पूरे आसार नजर आ रहे थे, तूफान आ चुका था, बिजली कडकने लगी थी। वो तो भला हो “राजू साहब” का जो एन वक्त पर, ज्वालामुखी का साथ देने पहुंच गये। राजू साहब कंपनी के परीचर(Office Asistant) थे और उनका काम हर जगह टांग अडाना था।

राजू उवाच:
सर आप ये क्या बोल रहे हो, आप देखो कुछ दिनो मे सारे मरद घर मे बच्चा सम्हालेंगे और बाई(महिलाये) लोग ऒफीस मे काम करेंगी!

मादाम अपनी झोंक मे कह गयी
तुम देखते जाओ, मैं ऐसा २ साल मे कर दिखाती हुं !

मेरा बल्ब जला
क्या ?
मुझे जोरो से हंसी आ गयी। अब मादाम की ट्युब लाईट जली और समझ मे आया कि वो क्या कह गयी है। वो शर्म से एकदम लाल हो गयी और मैं हंसते हंसते लोटपोट। राजू साहब की समझ मे आज तक नही आया कि क्या हुवा।

दूसरे दिन 9:00 बजे मैं रिसेप्शन पर:

आपके 2 साल मे एक दिन कम हो गया है, आपका प्लान कहाँ तक पहुंचा ?

उसने मेज पर से एक पेपर वेट उठाया और दे मारा, मै इस हमले के लिये पहले से तैयार था। पीछे दरवाज़े का शीशा शहीद हो गया।

समय का पहीया घूमा, घाट घाट का पानी पीते हम अमरीका आ पहुचे। उससे आखिर बार मिले(लड़े) पूरे ७ साल हो गये। आज वो नजर आयी सपने मे। पता नही कैसे ?

मै हैरान इसलिये हुं, क्योंकि सपने तो उन्ही चीज़ो के आते है जिनके बारे मे हम सोचते है। ये कन्या मेरी सुनहरी यादों कि एक प्रमुख पात्र ज़रूर है, लेकिन मेरे यादों पर तो समय की सुनहरी धूल की एक मोटी परत जम चुकी थी? क्या ये निकट भविष्य मे उससे मिलने(लडने) का संकेत है ?
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4 टिप्पणीयां

1.अनूप शुक्ला उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:01 am

बालक हम खुश हुये तुम्हारा सपना देख के। जब हम पढ़ रहे थे तो सारा समय हमारी नजरों के सामने से गुजर रहा था। सपना में कन्या आई है तो कुछ प्लान भी लायेगी । तब तक बाकी कन्याओं से के भी सपने देख लो। ज्याद कन्याओं की संगति पाने के लिये उचित होगा कि आगे से कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें खुबसुरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों की असहमति तथा आपसे बात नहीं करूंगी ये दो पतली गलियां हैं जो बातें करते कब समय गुजर गया कि पता ही नहीं चला के राजमार्ग से जुड़ता है।इन गलियों से लगातार जुड़े रहो बालक । खुशनुमा समय तुम्हें देख के मुस्कराये जा रहा है।

2.अनूप शुक्ला: उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 8:04 am
भूल सुधार:
कुछ कन्यायें काफी खुबसुरत होती है, और बाकी कन्यायें बदसूरत होती हैं.की जगह कुछ कन्यायें खूबसूरत होती हैं कुछ ज्यादा खूबसूरत होती हैं लिखा जाये।विचारों

3. Atul उवाच :
सितम्बर 28, 2005 at 11:12 pm

आशा है आपको आपकी स्वप्नसुँदरी जब भी मिले विभा की तरह न मिले जिसने रवि के सपने के गुब्बारे में सुई भोंक दी थी।

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जब मेरे घर पुलिस पहुंची!

शुक्रवार, सितंबर 23, 2005


यह किस्सा उस समय का है जब मैं अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष(1998) मे था। उन दिनो हम एक छोटे से गांव झालीया मे रहते थे। दिखावे की दुनिया से कोसों दूर विदर्भ (महाराष्ट्र), छत्तीसगड़ और मध्यप्रदेश की सीमा पर बसा एक आम भारतीय गांव "झालीया"। सीधे सादे किसानों का गांव, जिनमे से कुछ ही लोग शहरी सभ्यता और रीती-रिवाज़ों से परिचित थे। और जो लोग कुछ पढ लिख गये थे, वो गांव से पलायन कर शहरों मे बस गये थे।

गांव का जीवन आम बुराइयो से दूर था, कभी लड़ाई झगड़ा, दंगा फसाद, चोरी-चकारी जैसे मामले मैने नही सुने। कभी कोई कहा-सुनी या विवाद हो भी जाता तो लोग आपस मे बैठ कर मामला सुलझा लेते थे। पुलिस का आम जीवन मे कोई हस्तक्षेप नही था। पुलिस का दर्शन गांव मे सिर्फ चुनावों के समय ही होता था, वह भी शासकीय नियमो से बंधे होने के कारण। अन्यथा उसकी भी जरूरत नही थी।

मैं अपने गांव से यही कोई २४ किमी दूर गोंदिया(जिला मुख्यालय) मे इंजीनियरींग कर रहा था। हर सप्ताह शनिवार को घर आता था और सोमवार सुबह वापिस चला जाता था। मैं गांव वालो के लिये “आशीष” से “आशीष भैया” मे तब्दील होते जा रहा था। कभी कभार गांव वाले पूछ लिया करते थे कि अपने कॉलेज मे मैं क्या पढ़ता हुं, जिसका जवाब देना मेरे लिये काफी मुश्किल हो जाता था। अब सीधे साधे गांव वालो को कैसे बताये कि हम कम्प्युटर प्रोग्रामिंग सीख रहे है! उन्हे तो टीवी और कम्प्युटर सब एक ही लगता है।

गांव मे जब मन्दिर की पक्की इमारत बनी, तब कुछ लोगो ने मुझसे सलाह लेनी चाही थी कि मंदिर का नक्शा, संरचना कैसी हो। मैं परेशान कि इन्हे कैसे समझाउं कि मैं नागरी(civil) अभियन्ता नही, संगणक अभियन्ता (Computer Engineer) बनने जा रहा हूं ! उनके लिये तो “इन्जीनर साब” याने पुल और इमारत बनाने वाला! उन लोगो को शायद शक हो रहा था कि मैं कॉलेज मे पढ़ाई लिखाई नही करता, नही तो इन्जीनीर कालेज मे पढ़ने वाले को एक मंदिर के नक्शे बनाने मे क्या परेशानी?

कुछ पिठ पिछे कहते

"अरे जब चौथी पास कल्लु मिस्त्री नक्शा बना सकता है, तो ‘इन्जीनीर कॉलेज’ मे पढने वाला कैसे नही बना सकता ?"

मेरे कॉलेज मे मेरे सहपाठी काफी दूर दूर से थे, मेरी कक्षा एक तरह से छोटा भारत ही थी। मेरे कुछ सहपाठी(विशेषतया कन्याओं) की ग्रामीण जीवन मे काफी दिलचस्पी होती थी। कभी कभी वे मेरे साथ मेरे गांव आ जाते थे। जब कन्यायें गांव आती थी, तब पूरे गांव के लिये एक चटपटी खबर बन जाती थी। गांव वालो को कन्याऒ का पहनावा (जिंस-टी शर्ट) अजीब लगता था, ये सब उन्होने सिर्फ फिल्मों मे ही देखा होता था। हद तो उस समय हो जाती थी, जब वे उन कन्याऒं को मेरे कंधे पर हाथ रखे देख लेते थे। फुसफुहाटो का एक दौर शुरू हो जाता था। बाद मे वे मेरे से पूछते थे कि


“तुम्हारे साथ आने वाली ये लड़कियाँ इतनी बेशरम क्यों है ?”
"तुम उन लोगो को ढंग के कपड़े पहनने क्यों नही कहते ?"

मैं मुस्कराकर रह जाता था। ऐसा था मेरा गांव।

एक दिन गांव मे “महाराष्ट्र राज्य परिवहन” की बस रुकी। बस से एक हवलदार उतरा। सारा गांव सन्न, ये क्या ? गांव मे पुलिस !

बस स्थानक के पास चाय दुकान वाले धनलालजी दौड़ते दौड़ते हवलदार के पास पहुचे, बैठने कुर्सी दी। पानी पेश किया और “दारोगा साहब” के लिये चाय बनाना शुरू किया। हवलदार ने चाय-पानी पिया, गाल मे बढ़िया पान दबाया, तब तक पूरे गांव मे खबर हो चुकी थी कि गांव मे पुलिस आयी है। सारा का सारा गांव चौक पर इक्कठा हो गया था। हवलदार शायद इन सब बातों का आदि था, उस पर भीड़ देखकर कोई फर्क नही पडा था, शान से पान चबा रहे थे।

पान खा कर पीक थुकने के बाद मे उन्होने प्रश्न दागा,
“इस गांव मे कोई ‘आशीष श्रीवास्तव’ रहता है क्या ?”
बस सारा गांव सन्न! ये क्या हो गया ?

धनलाल जी जोकि मैट्रिक पास है, उन्होने गांव वालो का नेतृत्व सम्हाला:
“जी दारोगा जी ! रहता है जी ! वो श्रीवास्तव गुरूजी का लड़का है जी”

गांव वालो मे कानाफुसी शुरू हो गयी। एक ने कहा

आशीष भैया तो शरीफ लगते है, कभी कोई उल्टी सीधी हरकत नही की, अचानक पुलिस उनको ढुंढते कैसे पहुंच गयी?”
दूसरे का शक अब यकीन मे बदल रहा था:
“आशीष भैया शहर मे जाकर बिगड़ गये है ! पढाई लिखाई नही करते हैं !”
लेकिन किसी की हिम्मत नही हुई कि हवलदार से पूछ ले कि वो मेरे बारे मे क्यों पूछ रहे हैं। हवलदार साहब ने ड्न्डा फटकारते हुये आदेश दिया
“मुझे उसके घर का रास्ता दिखाओ।”
धनलाल जी बोले
“जी साहब जी, मेरे साथ चलो जी !”
बस क्या था, धनलाल जी आगे आगे, हवलदार पिछे पिछे , और उनके पिछे सारा गांव ! एक जुलुस की शक्ल मे हवलदार मेरे घर पहुंचा। अब मेरे घर के सामने पूरा गांव जमा था। जितने मुंह थे उतनी बातें। सब अपनी अपनी अटकलें लगा रहे थे।

अब घर मे मम्मी थी, पापा उस समय स्कूल गये थे।(मेरे पापा एक अध्यापक थे)। मेरी मम्मी भी परेशान कि पुलिस घर क्यों आयी है। हवलदार ने मम्मी से मेरे बारे मे पूछा। मम्मी ने कहा कि मैं गोंदिया मे हुं और शनिवार को वापिस आउंगा। हवलदार ने पापा के बारे मे पूछा। मम्मी ने कहा:

“गुरूजी तो स्कुल गये हैं। आप थोड़ी देर बैठ जाईये, मैं किसी को भेज कर गुरूजी को स्कूल से बुला लेती हुं।” 
(पापा को गांव मे गुरूजी के नाम से ही जानते है)

अब पुलिस वाले इतनी आसानी से मान जाये तो पुलिस वाले कैसे ! आदेश फरमाया

“जब आशीष घर आयेगा उसको पुलिस ‘ठेसन’ भेज देना।”

हवलदार साहब चल दिये,सब को परेशान छोड कर। शाम को पापा घर आये, मम्मी ने सारा किस्सा सुनाया। पापा ने शांति से किस्सा सुना, उन्हे सारा किस्सा घर आते समय ही पता चल चुका था। पापा ने कहा

“चिंता मत करो, कल आशीष आयेगा सब पता चल जायेगा।”

दूसरे दिन गांव पहुँचा। जैसे ही मैं बस से उतरा एक कोलाहल मच गया।
 “आशीष आ गया।”

मै चकराया ये क्या है, मै तो हर सप्ताह आता हुं, लेकिन इस सप्ताह ऐसा क्या खास है।

धनलाल जी ने एक कोने मे ले जाकर कहा :
“कल तुम्हे ढुढंते हुये पुलिस आयी थी, क्या घपला किया है? किसी लड़की का चक्कर है क्या ?”

मैने सोचा कोई “घपला” किया होता तो किसी लड़की का बाप घर आता, शायद मुझे अस्पताल जाना होता। लेकिन पुलिस ?

खैर लोगो से बचते हुये घर पहुँचा। सारा का सारा गांव घूर कर देख रहा था, कानाफुसी हो रही थी। और मै भी परेशान ये क्या चक्कर है।

घर पहुँचते ही मम्मी ने सवाल दागना शुरू कर दिये। पापा शांत थे। पापा ने कहा

” नहा धो लो, कुछ खा लो, उसके बाद पुलिस स्टेशन चलते है”।

मेरे पापा का मुझ पर भरोसा था, लेकिन मामला उनकी भी समझ से बाहर था। हम दोनो १० कि मी दूर पुलिस स्टेशन पहुँ। पुलिस स्टेशन मे वो हवलदार नही था, लेकिन दारोगा था। दारोगा पापा को जानता था। उसने पापा से पूछा

“गुरूजी आप यहां कैसे ? सब कुछ खैरियत से तो है?”
पापा ने कहा
“ये तो आपको बताना चाहिये कि सब कुछ खैरियत से है या नही। कल आपका एक हवलदार आशीष को पूछते हुये मेरे घर पहुँचा था”
दारोगा :
“अच्छा अच्छा, वो आशीष ये है !”

मैं और परेशान ! दारोगा अब मेरे से मुखातिब हुये
” तुमने पासपोर्ट के लिये अर्जी दी है ?”
मेरी जान मे जान आयी
” हां जी दी है।”
दारोगा :
“कोई खास बात नही है, नये पासपोर्ट के लिये जो पुलिस जाँच होती है, बस उसी के लिये कल हवलदार को भेजा था।”

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टिप्पणीयाँ
1. Atul उवाच :
सितम्बर 23, 2005 at 6:25 pm ·
सही है। पते की सत्यता जाँचने के लिए हवलदार आया होगा। पूरे गाँव को देख कर शकोशुबह की कोई गुँजाइश न बची होगी कि आप गांव में ही रहते हैं। अब आपके गांव पहुँचने पर क्या नजारा होता है?
2. सुनील उवाच :
सितम्बर 24, 2005 at 9:48 am ·
उस हवालदार को मालूम था कि लोग तो कुछ और ही सोचेंगे, तरह तरह की बातें बनायेंगे. यह भी मालूम होगा कि घर वाले परेशान होंगें. जब आ कर घर देख लिया तो उसने बताया क्यों नहीं कि पासपोर्ट की चेकिंग के लिए आया था ? यह सच है कि बाद में जरुर ऐसी बात सुनाने वाला किस्सा हो जाती है, पर उतना ही सच है कि इन पुलीस वालों को सताना अच्छा लगा है.
सुनील
3. anunad उवाच :
सितम्बर 24, 2005 at 12:14 pm
आनन्द आ गया , पढकर ।
सचमुच , सत्य को कह देना ही मजाक का सबसे अच्छा तरीका है ।

आगे पढे़....

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आशीष श्रीवास्तव
सूचना प्रौद्योगिकी मे 14 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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