हम , वो और बरसात

बुधवार, अगस्त 23, 2006


एक शाम मैं अपने रूम पर अकेला ही था। बादल घिरे हुये थे। मौसम ठंडा हो गया था। अंधेरा छा रहा था। देखते देखते ही बुंदाबांदी शुरू हो गयी। बालकनी पर खडा बारिश की भटककर आती हुये बुंदो का आनंद लेते हुये रीम झीम बारिश के निनाद का आनंद ले रहा था।

कुछ देर बाद ऐसे ही टीवी चालू किया हिमेश बाबू नाक दबा कर गा रहा था
“एक बार आजा आजा.. झलक दिखला जा……"
गुस्से मे आकर टी वी बंद कर दिया और आकाशवाणी की शरण ली…
विविध-भारती के क्या कहने….. सुभा मुदगल गा रही थी…..
“अब के सावन ऐसे बरसे……”
पूरा मुड़ हो गया बारिश मे भिगते हुये झुमने का… अपना तो ऐसा है कि मन हुआ नही कि शुरू भी जाते है …सामने के मकान वाले अंकल-आंटी मुझे घुर घुर कर देख रहे थे… क्या लड़का है.. अभी तक बचपना नही गया….बारिश मे भीग रहा है…

इतने मे एक मधुर आवाज़ आयी
“कोई घर पर है ?”
हमने रेडियो को घुरा… शुभा मुदगल की मस्ती भरी आवाज़ के बीच मे ये मधुर आवाज़ कंहा से आयी… हमने सोचा की अपने कान बज रहे होंगे….इतने मे दरवाज़े की घंटी के साथ आवाज़ भी आयी
“कोई घर पर है ?”
हमने दरवाजे पर जाकर देखा और देखते रह गये। अहाहा ! बारिश मे भीगा हुआ एक खूबसूरत शिल्प कंधे पर एक बैग लटकाये हुये खड़ा था।
“घर मे कोई है क्या ?” 
आवाज़ से हमारी समाधी भंग हुयी।

हमने कहा
“आईये आईये, आप भींग क्यो रही है ? अंदर आईये ?”
मोहतरमा के बैठने के लिये हमने कुर्सी सरकाई। पूछा
“आप काफी भींग गयी है, टावेल ला दूं“।
गर्दन मे हल्की सी जुंबीश हुयी और हमने आदेश का पालन किया। टावेल प्रदान किया। वह अपने केशराशी को सुखा रही थी और हम अपनी आंखों को ठंडक प्रदान कर रहे थे।

हम क्या कहे कुछ सुझ नही रहा था और उसकी बड-बड चालू थी
“आज अचानक बारिश के कारण मुसीबत हो गयी. वो तो गनीमत थी की आपका दरवाजा खुला था…..”
ऐसे मौसम मे हम उसे चाय के एक प्याले के लिये पूछ लेते तो क्या बात होती लेकिन हाय री किस्मत… रूम मे चाय की पत्ती हमेशा की तरह नदारद थी…शक्कर का डिब्बा हमने खोलकर नही देखा…।

उसे अपने बालो को सुखाते देखकर हमारी इच्छा हो रही थी कि ऐसी ही बारीश होती रहे और हम गाते रहें “इक लडकी भीगी भागी सी…..“। इतने मे बारीश तेज हो गयी, वो एकदम से घबरा गयी। उसके बालों से एक पाने की बूंद गालो पर बह कर मोती के समान लग रही थी।

मैं क्या करता हूं, कहां काम करता हूं यह सब पूछते हुये उसने अपना बैग खोलना शुरू किया। उसने बैग से चाकलेट और बिस्कुट निकाले और मेरे हाथ मे रखे। मुझे लगा कि इस कन्या को भूख लगी होगी, काश मेरे रूम पर गैस होती… कम से कम इसे एक आमलेट तो खीला देता…।

ये क्या इसका बैग तो भानुमति का पिटारा है.. साबुन निकाल रही है…. मेरे रूम पर स्नान भी करेगी क्या ?
ब्रश भी निकाल लिया.. अरे बिस्कुट , पाउडर, कंघी भी….. अरे ये तो सेल्स गर्ल है !

अब सुंदर कन्या कुछ बेचे और हम ना खरीदे ऐसे सन्यासी तो हम है नही। वो एक एक सामान निकाल रही थी, हम हां हां कहते हुये रखते जा रहे थे। अंत मे उसके पास उपलब्ध हर चिज का एक एक सामान हमने खरिद लिया। लग रहा था कि उसके पास और भी चिजें होती। वह जब एक एक सामान हमारे हाथों मे थमा रही थी, उसके स्पर्श से हमारा सारा शरीर रोमांच से कांप जा रहा था!

अरे ,ये क्या बारिश रूक गयी, उन्होने बिल नुमा बिजली हमारे सामने चमकायी। पूरे ५०० रूपये की ख़रीददारी हम कर चुके थे। हमने अपनी जेब टटोली, जेब मे कुल जमा ३०० रूपये ही निकले। पूरी इज्जत का भाजीपाला हो गया। लेकिन कन्या समझदार निकली, कहा
“कोई बात नही कल आकर बाकी पैसे ले जाउंगी…“।
हम भी खुश , चलो कल भी आयेगी।

बाहर हल्की बुंदा बांदी जारी थी। अबतक बारिश से घबरानेवाला भीगा हुआ शिल्प फिर से बारिश मे भीगने जा रहा था। काश मेरे पास छाता होता, कम से कम उसे बस स्टैंड तक छोड आता। एक छाते के निचे….”प्यार हुआ ईकरार हुआ ….”

आज फिर बारिश हो रही है, वही रूम है, वही बालकनी है और वही मैं हूं… मुझे फिर इंतजार है उसका… मुझे चिढ हो रही है बारिश से…

जिंदगी भर नही भुलेगी वो बरसात की रात।
एक अंजान हसीना से मुलाकात की रात।

ना जी ना मुझे उससे फिर से मिलना नही है, उससे उसके बकाया पैसे भी नही देने है….मुझे तो उससे अपने ३०० रूपये वापिस लेने है। चूना लगा गयी है। उसके हुआ साबुन से झाग नही आता है, बिस्कुट तो पडोस का टामी भी नही खाता, पाउडर लगाने पर लोग पुछते है, आज नहाकर नही आया क्या ? अब बाकी चीजों की क्या कहुं…..

जिंदगी भर नही भुलेगी वो बरसात की रात।
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13 टिप्पणीयां “हम , वो और बरसात” पर
आपकी किस्सागोई अच्छी लगी। आपके नक्षत्र बताते हैं कि आपको कन्याओं से बचकर रहना चाहिये।
ई-छाया द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

वाह जी वाह, आपकी तो बल्ले-बल्ले हो गई जी!! दिन दहाड़े, बढ़िया बरसात में आपका तो “काम” हो गया!!  
Amit द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

क्या बात है? आपके अँदा बदल गये। धाँसू लिखा है। अच्छी लगी यह आपबीती।
अतुल द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

बहुत बढ़ियां अंदाज है किस्सागोही का. मजा आ गया आप का बरसाती विवरण पढ़कर.
समीर लाल द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

ये लुटने का भी सुख सबको कहाँ मिलता है?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

एकाध ऐसे झटकों से घबडाना नहीं चाहिये । प्रयास जारी रखें । सफलता अवश्य मिलेगी ।
pratyaksha द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

अन्य सेल्स गर्ल को अब तक आपकी दरियादिली की खबर लग गई होगी,शीघ्र ही आप के दर पर कोई और आने वाली होगी। उसके लिए हमारी शुभकामनाएं।
ratna द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

वाह वाह क्या मज़ेदार किस्सा है। मज़ा आया पढ़ के। वैसे कौन सी कम्पनी थी जो घटिया साबुन से ले कर घटिया चॉकलेट तक सब बनाती है  …बता दीजिये तो बच के रहें।
Nidhi द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

मजेदार वाकया सुनाया आपने भी !
मनीष द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

कहानी पुरी फ़िल्मी है.
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

मजेदार किस्से का मजेदार विवरणॅहै.
rachana द्वारा दिनांक अगस्त 24th, 2006

***अब सुंदर कन्या कुछ बेचे और हम ना खरीदे ऐसे सन्यासी तो हम है नही।
मस्त लिखा है
अगली बार फिर से बारिश में भीगने का इरादा नही लगता, एक छोटी सी बात को क्या मजेदार शब्दों में पिरोया मजा आ गया।
यार एक बात बताओ, तुम्हारा प्रोवाइडर कौन है, १०० में से ९० बार आने पर पेज नॉट फाउंड का पेज नजर आता है।
Tarun द्वारा दिनांक अगस्त 25th, 2006

Ashish, hamesha ki tarah hansaya hai tumne…
मानोशी द्वारा दिनांक अगस्त 25th, 2006

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हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली

सोमवार, जुलाई 31, 2006


३१ जुलाई हिन्दी के उपन्यास सम्राट और कहानीकार प्रेमचंद का १२६ वां जन्मदिन है। उनके जन्मदिन पर मेरी हार्दिक श्रद्धांजलि।

दसवी मे पढा था कि उनका असली नाम नवाबराय था। उनकी पहली रचना सोजे-वतन थी जिसमें देशभक्ति पूर्ण कहानियां थीं। छपते ही इसे अंग्रेजों ने जब्त कर लिया। तत्पश्चात वे प्रेमचंद के नाम से लिखने लगे।

प्रेमचंद मेरे प्रिय लेखक रहे हैं, उनके लगब्भग सभी उपन्यास और ढेरो कहानिया पढी है।प्रेमचंद को पढना तो बचपन से ही शुरू हो गया था। कक्षा दूसरी मे बालभारती मे उनकी कहानी पढी थी ‘ईदगाह′, और ये सफर शुरू हुआ था। हामिद का चिमटा आज भी भूल नही पायां हूं।

गूल्ली-डंडा, बडे भाई साहब जैसी कहानियां तो ऐसी लगती है जैसे मेरे ही बचपन से ली गयी हैं। ‘ठाकुर का कुंवा’, पूस की रात , सुभागी, बडे घर की बेटी जैसी कहानियाँ अपने आस पास ही घटते देखी है।
पंच परमेश्वर का रूप मैने अपने गांव की चौपाल पर होने वाली पंचायत मे देखा है। वहीं मैकु जैसे शराबी भी देखे है जिनके बच्चे भुखे सोते रहे लेकिन शराब चाहिये ही। उनकी कहानी का हर पात्र मुझे अपने आस पास ही दिखायी दिया है।

जीवन का ऐसा कौनसा अंग है जो उन्होने नही छुआ। ‘समस्या’ के चपरासी गरीब का परिवर्तन हो, या कोरी अफवाह से एक ‘बैंक का दिवाला’ निकलना।

उनके द्वारा लिखे गये हास्य रस के तो क्या कहने “ पंडित मोटेराम शास्त्री का डायरी”, “शादी की वजह″,”कुछ दूख ना हो तो बकरी खरीद ला” पढीये और हंसते हंसते लोट पोट हो जायीये।

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4 टिप्पणीयां “हिन्दी कहानी एवं उपन्यास सम्राट प्रेमचन्द को जन्मदिन पर हार्दिक श्रद्धांजली” पर
प्रेमचंद जी को श्रद्धांजलि।
सोचता हूं १९३६ में ५६ वर्ष की अल्पायु में न गये होते और भारत की आजादी देखी होती उन्होने तो आजादी के बाद के भारत का वे कैसा वर्णन करते।
eshadow द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

ये बढ़िया किया कि आज के दिन मुंशी जी को याद कर लिया।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

गोदान पढी थी जब दसवीं में थे. कई कहानिया स्कूल में पठ्य पुस्तकों में पढी . बूढी काकी , पँच पर्मेश्वर ,हामिद आज भी बहुत करीब हैं
pratyaksha द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

प्रेमचंद्र के जन्म-दिन पर उनके बारे में लिखना उनके प्रति आदर है। साधुवाद। जब तक समाज में विसंगतियाँ रहेंगी तबतक प्रेमचंद्र समसामयिक रहेंगे। उनका यथार्थमय आदर्श हमेशा अधुनातन रहेगा।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक अगस्त 1st, 2006

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एक प्रेम (?) कथा

रविवार, जुलाई 30, 2006

निधीजी के चिठ्ठे पर एक मजनू के बारे मे पढा, मेरे आस पास तो मजनूओ की भरमार रही है। सोचा चलो एक के बाद एक मजनूओ के किस्से लिखना शुरू कर दे।

ये किस्सा है उन दिनो का जब मै नया नया दिल्ली पहुंचा था। हम लोग कुल आठ लोग एक ही फ्लैट मे काल्काजी मे रहते थे। सभी के सभी नागपूर और उसके आसपास के क्षेत्र से थे। कुछ नौकरी करते थे, कुछ सघर्ष कर रहे थे। फ्लैट का खर्च नौकरीशुदा लोगो की जिम्मेदारी थी। जो संघर्ष कर रहे थे, उनका एक काम था, दिन मे अपना बायोडाटा बांटना, साक्षात्कार देना और रात मे पढना। मौज मस्ती इन लोगो के लिये वर्जित थी।

राजेश, प्रवीण और कमलेश दोनो नौकरी कर रहे थे, मैने मुंबई की नौकरी छोडकर गुडगांव मे एक कपंनी मे काम शुरू किया था। हम चारो का सप्ताहांत मे मौज मस्ती का कार्यक्रम होता था। दिन भर आवारागर्दी और शाम को किसी अच्छी जगह खाना। मै शराब पीता नही लेकिन मेरे अधिकतर दोस्त अखंड बेवडे रहे है। दारू की पूरी बोतल अंदर कर जाते हैं और हिलते भी नही हैं। शाम को मेरा काम होता था, बैरो को समझा बुझा कर शांत करना। अब क्यों ? अरे दारू पीने के बाद कमलेश और राजेश दोनो मे दिल्ली की सल्तनत के शहनशाहो की आत्मा जो सवार हो जाती थी। उसके बाद टूटी बोतल , गिलास, प्लेटो की किमत के साथ खाने का बील का भुगतान करना। एक एक को लाते मारते हुये कार मे लादना, पुलीसवालो से बचते, हाथ पैर जोडते हुये अपने घर पहुंचना।

एक ऐसी ही शनीवार की शाम मेरी मुलाकात हुयी सुरेश से(नाम् बदला हुआ है)। ६ बोतल बियर पिने के बाद उन्होने कम से कम ‘२० रन’ बनाये थे,मतलब कि खाने की मेज से टायलेट उल्टी करने के लिये। पता चला कि वो भी भंडारा(नागपूर से १०० की मी दूर) से है। उसकी मम्मी दिल्ली मे एक अस्पताल मे काम करती है। वो कभी कभी दिल्ली आता है, महिने दो महिने रह्ता है और वापिस चला जाता है। रात मे सुरेश मे घर जाने की हिम्मत तो थी नही, वो भी हम लोगो के साथ रूक गया। मै सुबह अपनी दौड लगाने के बाद वापिस आया तो वह उठ चुका था। बाकि सभी तो घोडे बेचकर सो रहे थे।

सुरेश ने मुझे कहा कि “ये सभी तो कम से कम दो तिन घंटे बाद सोकर उठेंगे , तु मेरे साथ घर चल। मम्मी से मिल लेना, साथ मे चाय नास्ता भी हो जायेगा“। घर के खाने के नाम पर तो मै काल्का जी से एक शादीशुदा दोस्त के घर रोहीणी तक लगभग ३० किमी दूर भी चला जाता था। मै चल दिया उसके साथ। उसके साथ उसके घर के पास पहुंचे, सामने की फ्लैट की बालकनी पर एक खूबसूरत कन्या खडी थी। मेरी नजरे उसकी तरफ गयीं कि उसने एक उड्ता हुआ चुंबन उछाल दिया। मै चकराया ये क्या ? क्या आज मै इतना जम रहा हूं ? सुरेश ने गलतफहमी जलदी दूर कर दी “उछल मत , वो तेरे लिये नही मेरे लिये था!”
खैर उसके घर गया , ‘काकू’(सुरेश की मम्मी) से मिला। नाश्ता ही नही, दोपहर का खाना भी खाकर वापिस आया। फ्लैट मे आने पर प्रवीण ने पूछा कि मै कहां गया था। मैने बताया कि सुरेश के साथ उसके घर गया था। तब प्रवीण ने मुझे सावधान किया कि उसके घर जाने मे कोई परेशानी की बात नही है, लेकिन उसके साथ घुमना फिरना नही। बात मे मुझे पता चला कि सुरेश का बस एक ही शौक था। लडकीयो को अपने जाल मे फांसना और अपना काम निकालना, मतलब कि अय्याशी करना। काम निकलने के बाद , वह नये शिकार की तलाश मे लग जाता था। अब तक पता नही कि कितनी लडकिया उसके जाल मे फंस चूकी थी, ये किसी को नही मालुम था। पता नही उसमे ऐसा क्या था, लडकिया खिंची चली आती थी।

हम लोग को उसका साथ पसंद नही था लेकिन काकू का स्वभाव काफी अच्छा था। सुरेश जब दिल्ली मे नही होता था तब काकू लिये हम लोग ही सब कुछ थे। बस सांप छछूंदर वाली हालत, ना उगलते बने ना निगलते। उपर से अपना नायक हर हफ्ते नयी लडकी और अय्याशी के किस्से लेकर आ जाता था। उसके किस्से सूनकर कोफ्त होती थी। प्रवीण तो उसे बूरी तरह झाड देता था लेकिन वो बाज नही आता था। उसमे अय्याशी की बूरी आदत होने के बावजूद वो हम लोगो की इज्जत करता था। अपने करीयर के हर निर्णय मे हमसे सलाह लेता था।

२००२ मध्य मे वह भडांरा अपने घर गया। कुछ महिनो बाद मै उससे नागपूर मे एक शादी मे मिला। उसने मुझे एक लडकी की तस्वीर दिखाई। मैने उसे चेतावनी दी “अबे अब तु शूरू हो गया, तो तेरा सर और मेरा जूता। तेरे अय्याशी के किस्सो मे मेरी कोई दिलचस्पी नही।” सुरेश ने कहा “नही यार , ये वैसी लडकी नही है। इस लडकी को मैने छुवा तक नही है।” मुझे विश्वास तो नही हुआ, वह जारी रहा “मै इससे शादी करने वाला हूं।

मैने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह इस लडकी के लिये यदि गंभीर है तो काकू को तैयार करना मेरी जिम्मेदारी होगी। वह खुश हो गया, उसने मुझसे कहा कि संभव हुआ तो वह मुझे उस लडकी से मिलायेगा। बाद मे मुझे ज्ञात हुआ कि दोनो के सामजिक स्तर मे काफी अंतर है। लडकी उंची जाति से है और सुरेश उससे नीची जाति से है। मैने उन लोगो के भविष्य मे आनेवाली समस्याओ का अनुमान लगा लिया था। मुझे मालूम था कि समाज अभी इतने खुले दिल का नही हुआ है।

बाद मे मैने इस विषय पर राजेश और प्रवीण से चर्चा की, किसी ने गंभीरता से नही लिया। सभी को यही लगा कि कुत्ते की दुम सीधी नही हो सकती।

इस बीच मै चेन्नई आ गया था, राजेश लंदन मे था, प्रवीण डलास पहुंच गया था। सभी के सभी अपनी अपनी राह चल दिये थे। संपर्क का माध्यम फोन और ईमेल थे। कुछ दिनो के बाद सुरेश ने राजेश से कुछ आर्थिक सहायता की मांग की। राजेश ने कारण पूछा, जवाब था “शादी करनी है“। हम लोगो (मै, राजेश और प्रवीण) की आपातकालीन चैट पर चर्चा हुयी और निर्णय हुआ कि सुरेश को आर्थिक सहायता नही दी जाये। कारण ये था कि उसका परिवार आर्थिक रूप से संपन्न था और उसके परिवार मे लडकी स्वीकार्य थी। कोई परेशानी थी तो लडकी के घर से। हमने उसे सलाह दी कि अपने घर वालो से बात करे, जरूरत पढने पर हम बात कर सकते है। उसे यह भी कहा गया कि शादी से पहले कम से कम वह कोई नौकरी या काम् करना शुरू करे।

इस घटना को कुछ महीने गुजर गये बात आयी गयी हो गयी। उसका हमसे संपर्क टूट गया। हम लोगो ने भी इसे गंभीरता से नही लिया।

अचानक एक दिन भंडारा से एक दोस्त का मेल आया कि सुरेश ने आत्महत्या कर ली है। हम लोग सन्न रह गये। एकबारगी विश्वास नही हुआ कि सुरेश ऐसा कर सकता है। खोजबीन से पता चला कि इस बार सुरेश को उस लडकी ने गच्चा दिया था। उसके परिवारवालो को सुरेश स्वीकार नही था। उस लडकी ने परिवारवालो के दबाव मे या किसी अन्य कारणवश शादी से इंकार कर दिया। ये झटका सुरेश सहन नही कर पाया और आतमघाति कदम उठा बैठा।

मुझे आज भी विश्वास नही होता कि सुरेश जिसके लिये लडकी की किमत एक खिलौने से ज्यादा नही होती थी, एक लडकी के धोखा देने पर आत्महत्या कर बैठा।

मुझे सुरेश के लिये कोई दुःख नही है, वो तो कायर निकला। दुख है ‘काकू’ के लिये। अब सुरेश तो नही है लेकिन हम लोगो मे से भी कोई  उनके आसपास नही है।

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चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये

रविवार, जुलाई 23, 2006


अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
घर से मस्जिद है बहुत दूर ,चलो यू टर्न ले
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
निदा फाजली की ये गजल मै कल फिर एक बार “वाह वाह″ मे सुनी। जब उन्होने ये शेर पाकिस्तान मे एक मुशायरे मे पढे थे,उसके बाद कुछ श्रोताओ ने उनसे पूछा कि
“मस्जिद किसी बच्चे से बडी कैसे हो सकती है।
उनका जवाब था
"मस्जिद तो इंसान के हाथ बनाते है, लेकिन बच्चो को तो खुदा के हाथ बनाते है !"
ये पंक्तिया फिर याद आ गयी जब गढ्ढे मे गिरे बच्चे प्रिंस को बचाने के लिये मंदिर, मस्जिद और गुरुद्बारे मे प्रार्थना की गयी और सेना ने उसे बचा भी लिया !
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5 टिप्पणीयां “चलो किसी बच्चे को हंसाया जाये” पर
मुंबई धमाकों की गूंज का जवाब देश के नागरिकों ने अपने जयघोष से आतंकियों और प्रतिक्रियावादी ताक़तों को दिया है. ये क़ौमी एकता का जयघोष है जो प्रिंस के पुनर्जीवन के साथ आपके और मेरे सामने मीडिया के ज़रिए सुनाई दिया.
निदा साहब ने उक्त दो लाइनों में सारा निचोड़ दे दिया.
नीरज दीवान द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

मेरे खयाल से शब्द कुछ ऐसे हैंः
घर से मसजिद है बड़ी दूर चलो यूँ कर लें
रोते हुए किसी बच्चे को हँसाया जाये
anunad द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

“यू टर्न ले!” पे हंसते हंसते हाल खराब.
आशीष तुम्हारे खोपडी भी बडी फ़र्टाईल है!
क्या इसे मन-बोल मे डाला जा सकता है?
eswami द्वारा दिनांक जुलाई 24th, 2006

आशीष जी और अनुनाद जी, सही शब्द यह हैं :
अपना ग़म ले के कहीं और न जाया जाये
घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये,
….
घर से मस्जिद है बहुत दूर, चलो यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये ।
Nidhi द्वारा दिनांक जुलाई 26th, 2006

आशीष जी…. ‘ यू टर्न लें ‘ वाक़ई आपकी रचनात्मकता की हद हो गई! फ़ाज़ली साहब को सजेस्ट किया किसी ने?
अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006

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बचपन की शरारतें भाग २

मंगलवार, जुलाई 18, 2006


मेरा गांव जहां मेरा सारा बचपन और किशोरावस्था बीता एक आम भारतीय गांव था। गांव के पश्चिम मे पाठशाला थी ,उसके बाद एक बड़ा सा मैदान। इस मैदान को ‘झंडा टेकरा’ कहा जाता था। पाठशाला के पीछे एक पहाड़ी, पहाड़ी और ‘झंडा टेकरा’ को विभाजित करती हुयी एक नहर। गांव के उत्तर मे था एक बडा बरगद का पेड़ और उसके पिछे एक बड़ा सा तालाब। बरगद के पेड़ और गांव को अलग करती एक पक्की सडक।
ये बरगद का पेड़ गांव का हृदय-स्थल था, ये बस स्थानक तो था ही साथ मे चौपाल का भी कार्य करता था। गांव के सारे के सारे ठलुये दिन भर और बाकी सभी शाम को यहीं पर पाये जाते थे।

सुबह जब चरवाहा सारे गांव से गायो को एकत्र कर चराने के लिये ले जाता था, तब उन्हे कुछ देर के लिये इसी बरगद के नीचे खडा करता था।बरसात मे जब खेतो के काम खत्म हो जाते थे ग्रामीण यहां आल्हा गाते थे। घनघोर बरसात मे आल्हा की वो तान
बढ़े लढैया गड मोहबे के जिनके बल को वार न पार
इस बरगद के पेड के नीचे कुछ चाय-पान और साइकिल मरम्मत की दुकानें भी थी। साइकिल की ये दुकानें साइकिल किराये से भी देती थीं। यहां पर हमे बच्चों के लिये छोटी साइकिलें किराये से मिल जाती थी। किराया होता था १० पैसे घन्टा !

छूट्टीयो मे हम सुबह सुबह साइकिल दुकान पहुंच जाते और साइकिले ले कर चल देते ‘झंडा टेकरा’ । साइकिलों की दौड़ होती थी और ढेर सारे करतब किये जाते थे। इन करतबो मे शामिल थे एक साइकिल पर ज्यादा से ज्यादा सवारी ले जाना। क्या आप विश्वास करेंगे कि हम लोगो का रिकार्ड है, एक साइकिल पर ७ लोगो को सवार कर सारे गांव का चक्कर( लगभग २ किमी) लगाने का ! साइकिल चला रहा था हमारा गामा पहलवान ‘अमरचन्द’ ! २ पीछे कैरियर पर थे, २ सीट पर, २ डंडे पर और १ हैंडल पर सामने देखते हुये ! सारे गांव मे बच्चे ताली बजा रहे थे और बुजुर्ग डांट रहे थे। अमरचन्द अच्छे खासे डील डौल वाला था, अपनी उम्र से ५ साल बड़ा लगता था। कबड्डी मे वह पूरी की पूरी विपक्षी टीम को अकेले खिंच लाता था।

साइकिलों के करतबो मे हैण्डल छोड़कर चलाना, उल्टे बैठकर साइकिल चलाना, कैरियर पर बैठकर चलाना, अगला चक्का हवा मे रखकर पिछले पहिए पर साइकिल चलाना और ना जाने क्या क्या करतब किये जाते थे। अब ऐसे करतब दिखांये, और गिरे पड़े ना ! ऐसा तो हो नही सकता था। घुटना और कुहनी छिलना तो रोज की बात थी। मुसीबत ये थी कि घर मे बता नही सकते थे कि आज साईकिल से गिर पड़े ! सबसे पहले पूछा जाता कि कि आज कौनसा करतब हो रहा था ? डांट तो पढती ही थी, पापा कभी कभी रात का खाना बंद करा देते थे। रात का इसलिये कि दिन मे तो हम घर के खाने कि चिंता करते ही नही थे। कहीं भी किसी के भी घर खा लिया। आम, अमरूद, इमली,हरे चने, मटर जैसे मौसमी चीजे अलग। हम कितना भी छुपांये लेकिन छोटे भाई , बहन मे से कोई ना कोई गद्दारी कर ही जाता था। उन्होने गद्दारी नही कि तो जख्मो का दर्द गद्दारी कर जाता था। दर्द से जितनी तकलीफ़ नही होती थी, तकलीफ़ होती थी जब पापा डांट के साथ ‘टिंचर आयोडीन’ लगाते थे ! दर्द से यदि कराह निकली कि गाल पर भी दर्द सहना पढ़ता था ।

हम लोगो का दूसरा खेल होता था तालाब मे तैरना! दोपहर मे जब तालाब मे कोई नही होता था, तब हम पहुंच जाते थे तालाब। घंटो तैरते रहते थे। तालाब के एक किनारे एक आम का पेड़ था जो तालाब पर झुका हुआ था। हम पेड़ पर चढ़कर तालाब मे कुदा करते थे। हम लोगो को भैंस की पुंछ पकड़ कर तालाब को पार करना सबसे मजेदार खेल लगता था। यह सब हम गांव वालो और घरवालों की नजर बचा कर किया करते थे। ये सावधानी बरती जाती कि किसी को पता ना चले कि हम तालाब मे मस्ती करते है। जरूरी ये होता था कि तालाब से बाहर निकलने के बाद कपडे और सर के बाल सूखे हो। बस हम तालाब मे नंगधडंग कूद जाते थे। कोई तालाब के आस पास फटका कि बाहर निकलो, कपड़े उठाओ और भाग लो।

एक बार हम लोग तालाब मे मस्ती कर रहे थे किसी ने मेरे घर मे खबर कर दी। जब पापा तालाब पहुंचे, हम लोग भैंस की पुंछ पकड़े हुये दूसरे किनारे जा रहे थे। तालाब से निकल कर भागना संभव नही था। कपडे भी उस किनारे पडे थे, जंहा पापा खडे थे। सबकी सिट्टी-पिट्टी गुम। लेकिन पापा ने हम लोगो से कुछ नही कहा, बस किनारे रखे सारे के सारे कपड़े उठाये और चल दिये।

अब क्या करें ? सारे के सारे नंगधंडंग पानी मे !

सब एक दूसरी की तरफ देख रहे थे। ऐसे ही पानी मे खड़े खड़े एक घन्टा गुज़र गया, तब गामा पहलवान ‘अमरचंद’ आता नजर आया। जब उसे सारी बात पता चली तो वह आधा घण्टे तो हंसते हंसते लोट पोट होता रहा। उसके बाद उसे अगले हफ्ते साइकिल के किराये के पैसे देने के वादे की रिश्वत दी गयी, साथ मे ये भी वादा किया गया कि अगली अमरूदो की चोरी मे से उसके हिस्से के अलावा एक हिस्सा और दिया जायेगा। वो मेरे अलावा सबके घर जाकर सबकी मम्मीयों से उल्टे सीधे बहाने बनाकर कपड़े ले आया। मेरे घर मे पापा ने उसे दरवाज़े से ही भगा दिया। लेकिन गामा पहलवान कम नही था, वह मेरे लिये अपने कपड़े ले आया था। सबने कपडे पहने। मैने अमरचन्द के कपडे पहने। उसके कपडे मुझ पर ऐसे लग रहे थे जैसे कि हैंगर पर कपडे सुखते है !

शाम को मेरी मिंत्र मंडली जब कपडे लेने मेरे घर पहुंचे, उन्हे पापा ने कपडो साथ ‘प्रसाद’ दिया और लम्बा चौडा भाषण पिलाया। मेरे साथ क्या हुआ ये अब मै ही बताउंगा क्या ?


5 टिप्पणीयां “बचपन की शरारतें भाग २” पर
मतलब चीरहरण सिर्फ गोपियों का ही नहीं हुआ था। पिता भी कृष्ण की भूमिका कर सकते हैं जिनके लिये बच्चे गोपियां होते हैं।अच्छा लगा विवरण। आगे बताओ क्या हुआ तुम्हारे साथ?
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006

वाह वाह, मजा आ गया और हँसी भी आई।
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006

बढिया लगा .बहुत अच्छा लिखा . पूरा दृश्य आँखों के सामने आ गया
pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 19th, 2006

बहुत बढ़िया किस्से हैं आशीष । लगता है बचपन में आप बहुत पिटे हैं । लड़के खैर शायद सभी पिटते हैं । आपकी ख़ुराफ़ातें पढ़ के लगा कि बचपन का भरपूर आनंद उठाया है आपने ।
निधि द्वारा दिनांक जुलाई 22nd, 2006

मस्त लिखा है…आगे भी लिखें इसी सीरीज़ में!
अन्तर्मन द्वारा दिनांक जुलाई 27th, 2006

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अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले

सोमवार, जुलाई 17, 2006


लालु और सूअर का बच्चा
लालुजी अपने ड्रायवर के साथ एक बार कार से जा रहे थे। एक गांव से पहले उनकी कार के निचे एक सूअर का बच्चा कुचल कर मर गया। लालुजी दुखी हुये। ड्रायवर को कुछ पैसे दिये और कहा कि “गांव मे जाओ और सूअर के मालिक को मुआवजा दे आओ”
ड्रायवर पैसे लेकर गांव चला गया। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गये ड्रायवर वापिस नही आया। लालुजी बैचेनी से टहलते रहे। तिसरे घंटे के आखिर मे ड्रायवर एक बोरा सिर पर लादे आते दिखा। पास आने पर लालुजी ने पूछा “का रे ड्रायबर , अतना देर काहे लगा दिये ? अउर इस बोरा मे का लाये हो”
ड्राववर “इस बोरा मै पैसा है मालिक”
लालु ” क्यो गांव मे का हुवा, तुम्हे अतना पईसा किसने और काहे दे दिया ?”
ड्रायवर “हमको कुछ नाही पता, हम तो गांव मे जाके इतना ही बोला कि हम लालु का ड्रायवर हूं और हमने उ सूअर का बच्चा मार दिया हूं”
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दवा
कुत्ता और पत्नी दोनों के बीमार होने पर एक व्यक्ति दवा खरीदने गया। व्यक्ति ने दुकानदार से कहा, ‘दवाइयों को अलग-अलग लिफाफे में रखकर उस पर लिख दें कि कौन-सी मेरी बीवी के हैं और कौन-सी मेरे कुत्ते की। मैं नहीं चाहता कि दवा बदल जाए और मेरे कुत्ते को कुछ हो जाए।’
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मित्र
रेखा ने अपने पति रोहित से कहा, ‘हमारी शादी में तो आपके बहुत से मित्र आए थे, अब उनमें से कोई नहीं आता।’ रोहित ने कहा, ‘सुख के सब साथी, दुख में न कोय…।’
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पदयात्रा
मत्री जी की पदयात्रा सुबह सुबह एक गांव से गुजरने वाली थी। दोपहर को निरज दिवान जी उस गांव मे भागते हुये पहुंचे और एक व्यक्ति से पोछा ” क्या नेताजी गुजर गये ?” उसने जवाब दिया “काश नेताजी गुजर जाते ?”
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धुलाई
रमेश धोबी को डांटते हुए, ‘एक तो तुमने मेरी पेन्ट गुम कर दी, ऊपर से धुलाई के पैसे मांग रहे हो?’ धोबी ने कहा, ‘साहब, पेन्ट धुलने के बाद गुम हुई थी।’
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स्कूल
कसाई बकरे को लेकर काटने जा रहा था। बकरा चिल्ला रहा था। इसे देख सोहन अपने पिता से बोला, ‘पिता जी, यह बकरा क्यों चिल्ला रहा है?’ पिता ने कहा, ‘बेटा, कसाई इसे काटने जा रहा है।’ सोहन ने कहा, ‘मैंने सोचा यह स्कूल जा रहा है।’
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किराये का मकान
किरायेदार ने मकान मालिक से कहा, ‘भाई साहब, आपने कैसा मकान मुझे किराये पर दिया है, वहां चूहे ही दौड़ते रहते हैं।’ मकान मालिक ने कहा, ‘तो क्या इतने कम किराये में आप घोड़ों की रेस देखना चाहते हैं।’
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प्रेम
कमला ने हरीश से कहा, ‘मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती रमेश।’ हरीश ने कहा, ‘लेकिन मैं रमेश नहीं हरीश हूं।’ कमला ने कहा, ‘सॉरी डार्लिग, मैं भूल गई थी कि आज रविवार नहीं सोमवार है।’ हरीश ने कहा, ‘क्या कहा, सोमवार है? अब मैं चलता हूं, पता नहीं सीमा कब से मेरा इंतजार कर रही होगी।’
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नाम
एक ड्राइवर को तेज मोटर चलाने पर सिपाही ने रोका और डायरी निकालकर पूछा, ‘आपका नाम?’ ड्राइवर ने कहा, ‘मेरा नाम है कपालामत चंद्रा तसकल काततीमयु नाकु दा…।’ सिपाही ने कहा, ‘बस, बस। जाओ, आगे से इतनी तेज गाड़ी मत चलाना।’
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गुस्सा
सोहन ने राहुल से पूछा, ‘यार, तुम्हारी बीवी को जब गुस्सा आता था तो वह काटना शुरू कर देती थी। अब काटती है या नहीं?’ राहुल ने कहा, ‘नहीं।’ सोहन ने पूछा, ‘क्यों, क्या उसे अब गुस्सा नहीं आता?’ राहुल ने कहा, ‘ऐसी बात नहीं है। गुस्सा तो आता है, पर अब दांत नहीं रहे।’
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प्रश्नपत्र
अध्यापक ने परीक्षा से पहले विद्याथियों से कहा, ‘बच्चों, परीक्षा नजदीक है, प्रश्न पत्र छपने के लिए जा चुके हैं। फिर भी अगर किसी को कुछ पूछना हो तो, वह पूछ सकता है।’ सौरभ ने कहा, ‘सर, एक प्रश्न है।’ अध्यापक ने कहा, ‘पूछो?’ सौरभ ने कहा, ‘सर, ये प्रश्नप्रत्र कहां छप रहे हैं।’
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मंहगाई
पिंकी की मां ने डाक्टर से कहा, ‘डाक्टर साहब, पिंकी बढ़ नहीं रही है, इसके लिए कोई दवा बताएं।’ डाक्टर ने दवा के बदले उपाय बताते हुए कहा, ‘इसका नाम बदल कर महंगाई रख लो, फिर इसे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।’
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मौके की तलाश
एक व्यक्ति बहुत देर से एक दुकान का चक्कर लगा रहा था। दुकानदान ने कहा, ‘भाई साहब, आखिर आपको चाहिए क्या?’ व्यक्ति ने कहा, ‘कुछ सामान ले जाने का मौका।’
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दांत में दर्द
सिनेमा हॉल का गेट कीपर दांत के डाक्टर के पास गया। डाक्टर ने पूछा, ‘तुम्हारे कौन से दांत में दर्द हो रहा है?’ गेट कीपर ने कहा, ‘ऊपर की बॉलकानी में दूसरे नंबर के दांत में।’
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फिजूलखर्च
कंजूस पति ने अपनी पत्नी से कहा, ‘तुम फिजूलखर्ची बहुत करती हो। भगवान न करे, यदि मुझे कुछ हो गया तो तुम्हें भीख मांग कर गुजारा करना होगा।’ पत्नी ने कहा, ‘तुम इसकी चिंता मत करो। तुम से मांगते-मांगते मुझे अब भीख मांगने की आदत पड़ गई है।’
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नजर
एक मरीज की आंखे कुछ ज्यादा ही कमजोर थीं। एक भी अक्षर पढ़वा पाने में नाकाम डाक्टर ने हारकर मरीज से आंखों के ठीक सामने थाली अड़ाकर पूछा, ‘क्या यह चीज तुम्हें दिखती है?’ मरीज ने कहा, ‘जी, दिखती है।’ डाक्टर ने पूछा, ‘क्या है?’ मरीज ने कहा, ‘ठीक-ठीक नहीं बता सकता, चवन्नी है कि अठन्नी है।’
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शर्म
मिस्टर वर्मा ने भिखारी से कहा, ‘भीख मांगते हुए तुम्हें शर्म आनी चाहिए। मेरे साथ चलो, मेरे घर काम करना। मैं तुम्हें दस रुपये दूंगा।’ भिखारी ने कहा, ‘अच्छा ठीक है, तुम मेरे साथ बैठ जाओ। मैं तुम्हें बीस रुपए दूंगा।’
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दिल
एक व्यक्ति पायलट के लिए इंटरव्यू देने पहुंचा। इंटरव्यू में उससे पूछा गया, ‘आपका दिल कहीं कमजोर तो नहीं?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी नहीं साहब, मेरा दिल तो इतना मजबूत है कि पिछले तीन सालों ने मुझे तीन-तीन दिल के दौरे पड़े फिर भी मैं जिंदा हूं।’ उस व्यक्ति से फिर पूछा गया, ‘दौरे तुम्हें कब-कब पड़े?’ व्यक्ति ने कहा, ‘जी जब श्रीदेवी, माधुरी और काजोल की शादी हुई थी तब।’
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कैदी
जेलर ने कैदी से पूछा, ‘जेल से छूटने के बाद क्या करोगे?’ कैदी ने उत्तर दिया, ‘जी, जौहरी की दुकान खोलूंगा।’ जेलर ने पूछा, ‘लेकिन जौहरी की दुकान खोलने के लिए इतना रुपया कहां से लाओगे?’ इस पर कैदी ने कहा, ‘जेलर साहब आप भी कमाल करते हैं, किसी जौहरी की दुकान खोलने के लिए तो मुझे सिर्फ एक हथोड़े की जरूरत होगी।’
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रिकार्ड
हरीश ने अपने मित्र से कहा, ‘यार, यह आदमी अपने-आप को जूते क्यों मार रहा है?’ मित्र ने कहा, ‘यह गिनीज बुक में जूते खाने का रिकार्ड अपने नाम करवाना चाहता है।’
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लाल-पीला
बबलू ने राम से कहा, ‘यार, तुम छोटी-छोटी बातों पर लाल-पीले हो जाते हो।’ राम ने कहा, ‘क्या कंरू, मेरा जन्म ही होली के दिन हुआ था।’

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4 टिप्पणीयां “अनुगुंज २१ : कुछ चुटकुले” पर
वाह ! वाह!!
ठहाके दार डरे आप तो.
रवि द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

:-D
संजय बेंगाणी द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

Thanx for Hansana  
SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

[…] चुटकुलों के कुछ मंतव्य ने भी बहुत आनंद प्रदान किया, और हो� ों पर हँसी वापस आई. मिर्ची से� यानी की पंकज भाई . […]
अवलोकन - चुटकुलों की 21 वीं अनुगूंज at अक्षरग्राम द्वारा दिनांक जुलाई 20th, 2006

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मेरे बचपन की कुछ शरारतें

रविवार, जुलाई 16, 2006


ये किस्से उस समय के है जब मै प्राथमिक पाठ्शाला मे था। हम महाराष्ट्र के गोंदिया जिले मे एक गांव झालिया मे रहते थे, गांव के बाहर थी हमारी पाठशाला। पाठशाला के ठीक सामने एक बडा सा मैदान और एक कुंआ। एक तरफ ध्वजस्तंभ,जिसका प्रयोग साल मे दो बार १५ अगस्त और २६ जनवरी को होता था। पाठशाला के एक तरफ थी,पानी की नहर, पीछे एक छोटी सी पहाड़ी।

पाठशाला की इमारत का निर्माण इस तरह से किया गया था कि किसी भी कक्षा मे प्रवेश करने के लिये तीन सीढीया चढनी होती थी। पाठशाला का समय होता था ११ बजे सुबह से ५ बजे शाम तक का । पहले २ शिक्षण अंतराल के बाद १५ मिनिट की छूट्टी, उसके बाद २ शिक्षण अंतराल होते थे। तपश्चात होता था भोजनावकाश। उसके बाद २ और शिक्षण अंतराल। अंत मे बारी आती थी खेल कूद की। ये था हमारी पाठशाला की दिनचर्या।

अब सवाल ये है कि पाठशाला के नक्शे और हमारी शरारतो का क्या संबध ? जी हां बिलकुल संबध है बस आप पढते जायीये ! रूकिये हम अपने शिक्षको से भी परिचय करवा दे। हमारे मुख्याध्यापक थे लिल्हारे गुरूजी और कक्षाध्यापक तो हर साल बदलते रहे, लेकिन कक्षा १ से ३ तक जांभुळ्कर गुरूजी, कक्षा ४ मे तिवारी गुरूजी, कक्षा ५ मे बडी शेख बहनजी, कक्षा ६ मे टाटी गुरूदेव और कक्षा ७ मे कुराहे गुरूजी।

लिल्हारे गुरूजी से सभी थरथर कांपते थे, गणित के अच्छे अध्यापक थे। लेकिन उनके थप्पड से गाल पर पंजाब का नक्शा बनना तय होता था। जांभुळ्कर गुरूजी सभी छात्रो को गांधीजी बनने की शिक्षा देते थे। उनका कहना रहता था कि एक गाल पर थप्पड पढने पर दूसरा गाल सामने करना चाहिये!

ऐसी ही थी मेरी कक्षायें भी
तिवारी गुरूजी सबसे अलग थे। वे एक अच्छे नाट्य/नृत्य निर्देशक थे। उनके पास आईडियो और कहानीयों का खजाना होता था, उनके निर्देशन मे हमने शिवाजी द्वारा अफजल खान का वध का नाटक, आदिवासी नृत्य जैसे कार्यक्रमो मे भाग लिया था। बडी शेख बहनजी संगीत मे अच्छा ज्ञान रखती थी,कुराहे गुरुजी अंग्रेजी मे। मेरे प्रिय शिक्षक थे टाटी गुरुदेव, उन पर तो एक पूरा चिठठा लिखना है। हम लोगो ने शतरंज उन्ही से सीखा और अष्टांग योग भी।

शाम को ६ वे शिक्षण अंतराल के बाद होते थे खेलकूद के २ अंतराल। हम सभी के सभी खेलमैदान पर होते थे। कबड्डी, खो खो और दौड भाग के खेल चलते रहते थे। कभी कभी पीटी और योग सीखाया जाता था लेकिन अधिकतर समय कबड्डी और खो खो। अपने सहपाठीयो के कद काठी की तुलना मे,मै उस समय काफी छोटा था। गाँव का स्कूल था , अधिकतर बच्चे सात/आठ की उम्र से स्कूल आते थे, जबकि मै साढे चार साल की उम्र मे स्कूल पहुंच गया था। मै खेलो मे सिर्फ खोखो खेल पाता था, कबड्डी मे छोटे कदकाठी से मेरा तो कचूमर निकल जाता था। दौड़ भाग वाले खेल मे भी हमारे बुरे हाल थे। जबकि खोखो मे तो हम अपनी चपलता और छोटे कद के कारण ही चल जाते थे।

खेलकूद के अंतराल के बाद छुट्टी की घंटी जब बजती थी, तब हाल देखने लायक होता था। सारे के सारे छात्र अपना बस्ता लेने दौड पढते थे अपनी अपनी कक्षा की ओर। तीन सीढी चढने के बाद दरवाजे से जो अंदर चला गया वो बस्ता लेकर बाहर आने की कोशीश करता, जो बाहर रह गये वो अंदर जाने की कोशीस करते थे। बस ना अंदर वाले बाहर आ पाते थे ना बाहर वाले अंदर जा पाते। इस धक्कामुक्की मे रोज कोई ना कोई सीढीयों से नीचे गिरता था। जैसे ही उसका रोना शूरू होता, लिल्हारे गुरुजी पहुंच जाते अपनी छडी लेकर। उन्हे देखते साथ कतार बन जाती , फिर भी दो तीन छात्र पिट जाते थे। वे बडबडाते चले जाते, इन्हे रोज कतार लगाना सिखाओ ,दूसरे दिन वही हाल हो जाता है। इस सारे हंगामे मे मेरे बुरे हाल हो जाते थे,मै तो सीढ़ियों से रोज गिरने वालो मे से एक था। मेरा एक ऐसा ही साथी था नरेंद्र।

हमने इसका एक जुगाड निकाला। कक्षा की पिछली खिडकीयो से एक सलाख को थोडा मोड दिया। कैसे ? गुरूदेव की कुर्सी का सदूपयोग करके। अब खिड़की मे इतनी जगह हो गयी थी कि हम आराम से अंदर आ सकते थे और बाहर जा सकते थे। बस फिर क्या था। हमारा रोज का धक्कामुक्की मे सीढ़ियों से नीचे गीरना बंद हो गया था।

कुछ दिनो के बाद लिल्हारे गुरूजी की नजर मे आगया कि हम लोग दरवाजे से अंदर नही जा रहे है ना बाहर आ रहे हैं। हमारा सीढीयों से गिरकर रोना जो बंद हो गया था। बस एक दिन हम अपनी मस्ती मे बस्ता लिये खिड़की से बाहर कुदने ही वाले थे कि नीचे से आवाज आयी
“आओ बेटा इधर आओ”
नीचे देखा लिल्हारे गुरूजी अपनी छ्डी के साथ खडे है, बाजू मे नरेंद्र सहमा हुआ खडा है। हमारी समझ मे आ गया कि नरेंद्र ने विभीषण , जयचण्द और मीरजाफर की परंपरा को आगे बढाया है।

अब आगे क्या लिखूं आप समझ जाईये…..

मेरा घर पाठ्शाला से ५०० मीटर की दूरी पर था। मै पाठ्शाला के पीछे से पहाडी के सामने होते हुये भोजनावकाश मे घर जाता था और भोजन के बाद वापिस आता था। जब मै भोजनावकाश के बाद वापिस आता था उसी समय एक रेल गुजरती थी। रेल की सिर्फ आवाज आती थी दिखायी नही देती थी। एक दिन पहाड़ी पर चढ गये, सबसे उपरवाले पत्थर पर पर चढकर देखा, दूर रेल जाते हुये माचिस के डिब्बो के आकार मे दिखायी दे रही है। बस क्या था? रोज का काम हो गया। पहले मै अकेला जाता था, लोग साथ आते गये और कांरवां बनता गया।

अब पता नही कैसे लिल्हारे गुरूजी को पता चल गया कि भोजनावकाश के बाद बच्चे पहाड़ी के आसपास से आते है। एक दिन ऐसे ही रेल देखने के बाद हम पहाड़ी से नीचे उतर रहे थे वही आवाज आयी
“आओ बेटा, इधर आओ………………”
जारी अगले अंको मे…………………

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6 टिप्पणीयां “मेरे बचपन की कुछ शरारते.” पर
आशीष जी,
बढ़िया संस्मरण हैं। अगली किश्त का इन्तज़ार है
Laxmi N. Gupta द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

खूब लिखा है। आगे टाटी गुरू के बारे में लिखा जाये जल्दी।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

बहुत रोचक लिखा है आशीष भाई. आपकी कक्षा ७ तक की शिक्षा मराठी माध्यम में हुई थी क्या?
अमित द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

नही अमित, मराठी मेरी तृतिय भाषा थी। मेरी शिक्षा १० तक हिन्दी माध्यम से और उसके बाद अंग्रेजी माध्यम से हुयी है।
वैसे मै मराठी पढ लिख और बोल लेता हूं !
आशीष श्रीवास्तव द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

बहुत खूब, रोचक लेख है
SHUAIB द्वारा दिनांक जुलाई 17th, 2006

अच्छा लगा।
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 18th, 2006

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गुरु पूर्णिमा

मंगलवार, जुलाई 11, 2006


आज गुरु पूर्णिमा है, वेद व्यास का जन्मदिन ! गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें हम अपने गुरुजनों, श्रेष्ठजनों व माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा उनका आदर करते है।

इस दिन के साथ बचपन की काफी सारी खट्टी मीठी यादे जुड़ीं हुयी हैं। मुझे याद है कि मेरा स्कूल मे प्रवेश इसी दिन कराया गया था। सुबह कलम -पाटी पूजा हुयी थी, तिलक लगाया गया था। पाटी पर एक बड़ा सा ॐ बनाया गया था। एक मंत्र भी पढ़ा गया था
ॐ नमः सिद्धम ।
ॐ नमः सिद्धम । इस मंत्र से याद आया कि हमारे गांव मे एक बुजुर्ग हुआ करते थे, वे इस मंत्र को बिगाड़ कर कहते थे
आनामाशी धम, ना बाप पढ़े ना हम ।
पापा ने उसके बाद मुझे स्कूल लेकर गये थे। हंसते हंसते पापा की साईकिल पर बैठकर स्कूल गये थे और रोते रोते वापिस आये थे। अब रोते हुये इसलिये आये थे कि पापा तो नाम लिखा कर हमे झांसा देकर खिसक लिये थे। कुछ देर बाद पापा दिखायी नही दिये तब रोना शुरू! वो तो गनीमत थी (शिक्षिका बहनजी के लिये) कि मेरे पड़ोस की प्रभा दीदी भी उसी स्कूल मे पढ़ती थी। उन्होने हमे सम्हाला और शाम को घर वापिस लेकर आयी थी।

स्कूल मे हर साल यह दिन धूमधाम से मनाया जाता था। हम पाटी पर , बाद मे पूस्तिका पर ॐ बनाकर स्कूल जाते थे। स्कूल मे वेदव्यासजी और ॐ की पूजा होती थी। शिक्षकों के भाषण होते थे और छुट्टी। मेरी शिक्षिकाओ मे से दो मुस्लिम थी (छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी)। स्कूल मे हर शुक्रवार सरस्वती पूजा भी होती थी, लेकिन उन्होने हमेशा हर पूजा मे सक्रिय रूप से भाग लिया था। उस समय मुझे सब कुछ सामान्य लगता था। आज जब मै स्कूलों मे पूजा पाठ, प्रार्थना और तो और राष्ट्रगान(वंदे मातरम) पर विवाद के बारे मे पढ़ता हूं तो आश्चर्य होता है कि मेरे बचपन मे सरस्वती और वेद व्यास की पूजा छोटी शेख बहनजी और बडी शेख बहनजी ने करवाई है।

समझ मे नही आता कि ऐसा धार्मिक सौहार्द पता नही क्यो राजनिति की बली चढ जाता है !

मेरे एक शिक्षक थे टाटी गुरू(जी), मै उनके प्रिय छात्रो मे से एक था। उन्हे मुझसे काफी आशायें थी। वे मुझसे पूछा करते थे कि “मै तेरा क्या हूं,गुरू या गुरुजी”। उस समय मेरी समझ मे नही आता था कि उनका इस अजीब से प्रश्न का मतलब क्या है ? मै जवाब देता था “गुरु जी”। हमारी आदत थी कि सम्मान देने के लिये हर वाक्य के बाद ‘जी’ लगा दो और हम ‘गुरु’ के बाद ‘जी’ लगा देते थे। वे थोडे निराश हो जाते थे। बाद मे जब बडे हुये और इस प्रश्न का मतलब समझ मे आया तबसे हम उन्हे टाटी गुरुदेव ही कहते हैं। उन्होने हमे गुरू का अर्थ बताया था जो आज भी याद है
जीवन में अज्ञान के अंधकार को दूर कर सके वही गुरु है।
उनका एक और कथन मुझे याद आ रहा है
“गुरु मे वह शक्ति होती है जो एक चरवाहे को मगध सम्राट बना सकती है।“
समस्त गुरुजनो को सादर नमन !
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5 टिप्पणीयां “गुरु पूर्णिमा” पर

हमारा भी नमन शामिल है गुरुजन के लिये!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

संसार के समस्त गुरुओं को मेरा नमन्
गुरु गोविंद दोऊ खडे, काके लागूं पांय
बलिहारी गुरु आपकी, गोविंद दियो बताय
eshadow द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

बहुत बढिया लिखा. गुरु पूर्णिमा पर इससे बेहतर लेख नहीं हो सकता था
pratyaksha द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

ज्ञान की जगह शायद अज्ञान हो।(भूले से लिखा गया) ज्ञान का प्रकाश होता है। लेख बहुत ही अच्छा है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 12th, 2006

अब ठीक है।
प्रेमलता पांडे द्वारा दिनांक जुलाई 13th, 2006

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प्रगति का मार्ग

शुक्रवार, जून 09, 2006


हमारा देश हमेशा प्रगति के मार्ग पर रहता है, इसका मूल कारण यह है कि मार्ग पर हमेशा कार्य चलते रहता है। मार्ग पर कार्य रूकने का मतलब होता है प्रगति का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। हर तरफ पहले गहरे गड्डे खोदना, उसमे से अलग अलग तरह के पाईप निकाल कर रख देना। कितने ही तरह की पाईप-लाईन होती है पीने के पानी की, गटर लाईन(ये दोनो पास पास ही होती है, आवश्यकता होने पर एक दूसरे की मदद करती है),टेलीफ़ोन की, बिजली की, गैस की,टाटा की, रिलायंस की… वगैरह वगैरह। इन सभी पाईपलाईने किसी हसीना की चोटी के बालो की तरह एक दूसरे से गुंथी हुयी रहती है। ये गुंथन वे कैसे सुलझाते है, यह प्रश्न मुझसे सुलझाते नही बनेगा। हां तो मै कह रहा था कि रास्ते खोदकर, बाजु मे मिट्टी के पहाड खड़े कर दिये जाते है। अभी स्कूलों मे छुट्टियाँ है। बच्चों के लिये हर जगह शिविर लगे हुये है। रास्ते के किनारे ये मिट्टी के पहाडो का उपयोग पर्वतारोहण के शिवीर के लिये किया जा सकता है। समय भी बचेगा और पैसा भी।

पहले रास्तो के किनारे गढ्ढे खोद कर दुर्घटना से बचने बांस से एक कठघरा बना दिया जाता था। लेकिन इस कठघरों से टकरा कर दुर्घटना ज्यादा होती थी। अब कठघरा ना होने के बावजूद दुर्घटना कम हो गयी है। इसका कारण यह है कि कठघरा ना होने से लोग पूरी सावधानी से चलते है ! रास्ते पर एक समय मे अनेक तरह के कार्य चलते रहते है, साथ मे यातायात भी चलते रहता है। इस कारण अनेक बाधाओं का निर्माण होता है। इन बाधाओ(गढ्ढो और मिट्टी के ढेरो) के बीच से चलना एक चमत्कार है। यदि इस जगह बाधा दौड की तैयारी करवायी जाये तो २००८ मे बीजिंग ओलंपिक का स्वर्ण पदक हमारी झोली मे ही आयेगा। स्वर्ण इतिहास लिखने की यह एक स्वर्ण संधि है यह !

पहले छोटे मोटे कारणो से “रास्ता रोको” आयोजित होता था,पानी के जैसे क्षुद्र कारणो पर भी ! उससे पहले पानी के मुद्दे पर नलो पर सिर्फ झगडे हुआ करते थे। इस ‘रास्ता रोको’ आंदोलनो से आंदोलनकारीयो को छोड़कर सभी को परेशानी हुआ करती थी। अब ये आंदोलन अपने आप बंद हो गये है। कारण यह है कि रास्तो पर चल रहे कार्य के से हर तरफ ट्रैफिक जाम है। सभी वाहन पहले से ही रुके हुये है,अब रास्ता रोक कर क्या करे ?

कोई कहेगा कि ऐसे ट्रैफिक जाम से देश का कीमती समय, शक्ति और पैसा व्यर्थ जाता है। लेकिन इन लोगो यह समझ मे नही आता कि सारी तरफ यातायात रूक जाने से पेटोल की कितनी बचत होती है। कितनी विदेशी मुद्रा बचतीं है। “पेट्रोल की बचत यानी पेट्रोल का निर्माण” ! इस तरह से हम पेट्रोल का निर्माण करते रहे तो एक दिन ऐसा आयेगा की हम अरब राष्ट्रों को पेट्रोल बेचेंगे! वैसे भी हमारी शक्ति व्यर्थ नही जाती है। ट्रैफिक मे फंसकर एक जगह बैठे होने से शक्ति कैसे बर्बाद होगी ? उल्टे लोग सुबह सुबह जागींग कर अपनी शक्ति(कैलरी) बर्बाद करते है !

लोगबाग आजकल काफी सोना(स्वर्ण) ख़रीद रहे हैं ,सोने की किमंते आसमान छूने के बाद भी। इसका असली कारण ट्रैफिक जाम मे छुपा है। इस ट्रैफिक के कारण चोरो की संख्या मे कमी आयी है, खास कर सोने की चेन या मंगलसुत्र खींच के भाग जानेवालों की। बेचारा चोर घट्ना स्थल पर ही माल के साथ बरामद हो जाता है। जिस ट्रैफिक मे हम ढंग से चल नही सकते,चोर भागेगा कैसे ? चोरो और चोरी मे कमी का श्रेय पुलिस का नही ट्रैफीक जाम का है।

पकडे गये चोरो का या अपराधियों का मुंह खुलवाने पुलिस ‘थर्ड डिग्री’ का प्रयोग करती है।(शिक्षण मे ही नही, नौकरी मे, कहीं भी थर्ड डिग्री का ही बोलबाला है !) पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।

कभी कभी ऐसे ट्रैफिक जाम मे रूग्णवाहीनी फंस जाती है, जाने के लिये जगह नही होती। मरीज उपर जाने के मार्ग पर होता हओ। इस परिस्थिती मे रूग्णवाहिनी शववाहिनी मे रूपांतरीत ना हो ऐसी मनोभावना होती है। लेकिन नियति के आगे किसकी चलती है !

कुछ जगह पर रास्ता चौडे करने के लिये जगह ही नही बची है,उड्डान पूल बनाना मजबूरी है। लताजी कहती हैं कि इससे उन्हे परेशानी होगी। अब इसमे गलत क्या है ? लोगो ने खिडकी के किनारे गाडी खडी कर आटोग्राफ मांगना शूरू कर दिया तो ? उड्डान पूल पर ही ट्रफिक जाम हो जायेगा ! क्या मतलब रहा पैसे बरबाद कर पूल बनाने का ?

देखा गया है कि शापिंग माल के आसपास ट्रैफिक जाम ज्यादा होता है। वैसे ये नजारा फुटपाथ की दूकानो के बाहर ‘माल′ के कारण भी पैदा होता है। लेकिम ट्रैफिक जाम और शापिंग मे एक अटूट रिश्ता है।आप अपनी सीट पर डमी बिठाकर शान से शापिंग कर के वापिस आ सकते है।

आस्तिको की मदत के लिये लोगो ने फुटफाथ पर छोटे छोटे मंदिर बना दिये है। लोग रास्ते मे चप्पलो जूते सहित खडे खडे पूरे मन से भगवान के दर्शन कर सकते है। पैरो मे चप्पल/जूते होने से मन भगवान प्रतिमा की तरफ ही होता है,चप्पल/जूते चोरी होने का डर जो नही होता है।

सुना है कि रास्ते चौडे हो रहे है। इसके लिये सडक किनारे के पेड काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे होंगे, नये वाहनो के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। ये मालूम होने पर कार कंपनीयां अपना उत्पादन बढा रही हैं। बाजार मे कारो के नये नये माडेल आये हैं। अनेक बैंक लोगो के पीछे हाथ धोकर पिछे लगे है। आप कार लिजिये, हम कर्ज देते है !

कल मुझे एक बैंक से फोन आया। एक कर्णप्रिय मधूर आवाज “मै लेनादेना बैंक से बोल रही हूं”
हम : “हां जी कहिये !”
उसने प्रश्न पूछा “आपके पास गाडी है ?”
हम : ” हांजी है”
वह : “कौनसी गाडी है ?”(जैसे कह रही हो तुम्हारे पास मारूती या होंडा हो तो उसे बेच डालिये और रोल्स रायस , बेण्टले, बी एम डब्ल्यु या मर्सडीज खरीदीये। हम कर्ज देते है।)
हमने उत्तर दिया “बैलगाडी, अभी तो मैने उसे अपने गांव मे ही रखी है।”
उत्तर मे आवाज आयी “भडाक” !

हमारी समझ मे आज तक ये नही आया कि कन्याये फोन को इतनी बेदर्दी से क्यों पटकती है !
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5 टिप्पणीयां “प्रगति का मार्ग” पर

अरे यार क्या लिखते हो माउसतोड़ के! खासकर ये पढ़कर-
पुलिस अब थर्ड डिग्री की बजाये अपराधी को ट्रैफिक जाम मे फंसा देते है, बेचारा परेशान हो कर अपराध कबूल कर लेता है।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006

…पिछले कमेंट के आगे
बहुत मजा आया।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 9th, 2006

हकीकत बयान की है आपने।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 10th, 2006

ही ही ही, सही लिखे हो आशीष भाई!!
Amit द्वारा दिनांक जून 10th, 2006

[…] क्या आशीष खाली-पीली चिंता कर रहे हैं? सुना है कि रास्ते चौडे[यथा] हो रहे है[यथा]। इसके लिये सडक[यथा] किनारे के पेड[यथा] काटे जायेंगे। भविष्य मे स्वच्छ हवा की जरूरत महसूस होने पर एक और पाईप लाईन डाल दी जायेगी। रास्ते चौडे[यथा] होंगे, नये वाहनो[यथा] के लिये भरपूर जगह उपलब्ध होगी। […]
DesiPundit » Archives » प्रगति पर उतारू भारत द्वारा दिनांक जून 11th, 2006

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सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’

बुधवार, जून 07, 2006


चेन्नई मे कार्य करते हुये एक वर्ष बीत चुका था । एक ही कार्य की नीरसता से मन उब गया था । किसी परिवर्तन की आवश्यकता महसुस हो रही थी । ऐसे मे प्रदीप ने एक शाम खाने के समय कहा चलो कन्याकुमारी चलते हैं । अंधा क्या चाहे , दो आँखें । बिना सोचे विचारे कह दिया, चलो चलते है । अगले दिन आँफिस आ कर सहकर्मीयों से बात की। तब एक और महाशय श्रीनिवास भी तैयार हो गये । आनन फानन कार्यक्रम बना । चल दिये हम तीनों सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’ ।

हमारा ‘’चेन्नई कन्याकुमारी'’ एक्सप्रेस से आरक्षण था । जो चेन्नई से शाम 5:15 बजे चल कर दूसरे दिन सुबह 8:00 बजे कन्याकुमारी पहुंचती है । रेल नीयत समय पर चेन्नई से रवाना हुई । हमारे डिब्बे मे अधिकतर लोग दक्षिण भारतीय थे , जो अपने अपने कार्यो से मदुरै या किसी और जगह जा रहे थे । पर्यटन की दृष्टि से यात्रा करने वाले सिर्फ हम तीनों थे । चेन्नई से बाहर निकलते ही मन काफी हल्का हो गया । दैनिक जीवन का सारा मानसिक बोझ शहर मे ही छूट गया ऐसा महसूस हो रहा था । हम तीनों काफी देर तक बच्चो की तरह खिड़की के बाहर देखते रहे , और बाते करते रहे । रात्री के 10:00 बजे के आसपास हम लोगो ने भोजन किया और सो गये ।

सुबह 6:00 बजे प्रदीप ने मुझे यह कहते हुये जगाया ‘’भाई साहब , सपने देखना बंद करो और बाहर के नज़ारे देखो'’ । मैने भुनभुनाते हुये आँखें खोलकर बाहर देखा और देखता ही रह गया । रेल उस वक्त पहाड़ों के किनारे किनारे धान के खेतो के बीच से ग़ुज़र रही थी । जिधर नजर उठावो उधर धान के खेत और नारियल के उंचे उंचे पेड नजर आ रहे थे । पृष्ठ-भाग मे पहाड़ों की चोटियों पर अठखेलियां करते बादल हिमाचल प्रदेश के पहाड़ों सा नज़ारा पेश कर रहे थे । कुदरत ने अपनी खूबसूरती यहां दिल खोल के बाटीं है । थोडा आगे चलने पर रेल मार्ग के दोनो ओर पवन चक्कीयों की कतारे दिखाई देने लगी । पहाड की तलहटी मे धान के खेत और, दोनो ओर से पवन चक्कीयों की कतारो के बीच से होते हुये हमारी रेल गुजर रही थी । कन्याकुमारी के पहले एक स्टेशन है ‘’नागर कोइल′’,इस स्टेशन पर हमारी रेल पुरी खाली हो चुकी थी । हमारे डिब्बे मे हम तीनों ही बचे थे ।

जब हम कन्याकुमारी पहुचें तब हम लोग आश्चर्य मे पड गये । हमे लगा था कि स्टेशन पर उतरते ही हमे कुली , टैक्सी वाले घेर लेगें ज़ैसा कि अन्य पर्यटन स्थलों पर होता आया है। स्टेशन पर चाय , काफी और नाश्ते की आवाज लगाते दुकानदार होंगे । आशा के विपरीत कन्याकुमारी का रेलवे स्टेशन उजाड और वीरान सा था । स्टेशन पर सिर्फ दो प्लेटफॉर्म और एक चाय पान की दुकान थी । हमे सबसे पहले ठहरने के लिये एक होटल या धर्मशाला की तलाश थी । रेलवे स्टेशन पर ही विवेकानंद स्मारक का कार्यालय बना हुवा है जहां से विवेकानंद स्मारक आश्रम मे कमरे किराये से लिये जा सकते है । उस वक्त वो भी बंद पडा हुवा था पुछने पर पता चला कि आज कल वो बंद ही रहता है ।

रेलवे स्टेशन से बाहर आकर हमने विवेकानंद स्मारक आश्रम के लिये आटो किया । ये आटोवाले कन्याकुमारी मे कही भी 20 रू मे पहुंचा देते है । रास्ते मे आटोवाले ने हमसे पूछा कि हम विवेकानंद स्मारक आश्रम ठहरने जा रहे है या देखने । जब हमने उसे कहा कि हम वहां ठहरने जा रहे है तब उसने हमे सलाह दी कि विवेकानंद स्मारक आश्रम मे ठहरने की बजाय हम त्रिवेणी संगम के पास किसी होटल मे ठहरे जिससे सूर्योदय और सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य देखने मे आसानी होगी । हमने उसकी बात मानते हुवे त्रिवेणी संगम के पास ठहरने का निश्चय किया । आटोवाला हमे एक सस्ते और अच्छे होटल मे छोड़ गया। होटल मे नहा धोकर तैयार होने के बाद हम कन्याकुमारी घूमने निकले ।

कन्याकुमारी एक काफी छोटा सा कस्बा है । कन्याकुमारी मे सारे दर्शनीय स्थल 500 वर्ग मी मे ही है। देवी कुमारी का मंदिर ग़ांधी स्मारक विवेकान्द शिला और ॠषी थिरूवल्लुवर प्रतिमा एक दुसरे से सटे हुवे है ।सिर्फ विवेकानंद स्मारक आश्रम ही थोड़ी दूरी 1 की मी पर स्थित है। हमने देवी कुमारी के मंदिर से शुरूवात की। दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह यहां दर्शन के लिये बदन पर आप अगंवस्त्र या अंगोछा पहन कर ही जा सकते है । मंदिर के पुजारी ने बताया कि कुछ वर्षो पहले तक पुरूषो के लिये धोती या लुंगी तथा अगंवस्त्र और महिलाओ को साड़ी ही पहन कर दर्शन की ही अनुमती थी । अब पुरूषो को पतलुन की छुट मिल गयी है लेकीन बदन उघाडा या अगंवस्त्र से ढंका चाहिये । महिलाओ को साडी या सलवार की अनुमति है। जब हम मदिंर के अंदर पहुचे देवी का स्नान चल रहा था । देवी स्नान के लिये चंदन चुरा, जल और भी काफी सारी चीजों का उपयोग किया जाता है । गर्भगृह मे शहनाई तथा पखावज का वादन हो रहा था । मै खुद को 12 वी सदी मे महसुस कर रहा था । यह मंदिर ज्यादातर दक्षिण भारतीय मंदिरो की तरह चार प्रवेशद्वारों से सुसज्जीत है । पुजारी ने बताया की पूर्व का दवार अब बंद ही रहता है क्योकि समुद्र के नाविक देवी के नाक की हीरे की नथ की चमक से दिशा भ्रमीत हो जाते थे । यह मंदिर काफी पुराना और खूबसूरत है । मंदिर दर्शन के लिये सबसे उपयुक्त समय 11:00 सुबह का है इस समय देवी की आरती होती है । आरती मे दक्षिण भारतीय वादय यन्त्रो का उपयोग होता है। मन तथा वातावरण भक्ती के रस से सराबोर हो जाता है। मेरे जैसा नास्तिक इस गीत ,संगीत, आरती के आल्हादक वातावरण से प्रभावित हुये बिना नही रह सका ।

देवी दर्शन के बाद हमने शुछिन्द्र मंदिर जाने का विचार किया। यह मंदिर करीब 1300 साल पुराना है । इसे चोल राजाओ ने बनवाया था। मंदिर कन्याकुमारी से 18 कि मी की दुरी पर है। यहां आप बस या टैक्सी से जा सकते है । हम लोगो ने एक टैक्सी तय कर ली । मदिर का मार्ग हरियाली से भरपुर और रमणीक है । हमारा टैक्सी चालक काफी बातुनी था । वो रास्ते मे पडनेवाली हर चीज के बारे मे बताते जा रहा था । हम लोग 20 मी मे मंदिर पहुच गये। टैक्सी चालक ने हमे चप्पलें और कमीज टैक्सी मे ही छोड देने कहा । जैसे ही हम मंदिर परिसर के अंदर पहुचे एक गाइड हमारे साथ लग गया । वो हमे मार्ग दिखाते हुवे हर मूर्ति के बारे मे बताने लगा । मंदिर परिसर काफी विशाल है । सबसे पहले हम हनुमान जी की 80 फीट उचीं एक ही पत्त्थर मे तराशी मुर्ती के पास पहुचे । इस मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया जाता है । कहा जाता है हनुमान जी ने लकां दहन के बाद यहीं पर अपनी पुंछ की आग बुझायी थी । हम लोगो ने भी मुर्ती पर पान की माला और मख्खन चढाया । पश्चात हम लोग अंदर पहुचे । गाइड हमे मदिर के अंदर घुमाता हुवा हर मूर्ति के बारे मे बताता जा रहा था । यहा एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ नदीं, ग़णेश, क़ार्तीकेय की विशालकाय मूर्तिया है । इन मूर्तियों को देख कर आश्चर्य होता है कि उस काल मे जब तकनीक इतनी विकसित नही थी यह निर्माण किस तरह से कीया गया होगा । हम लो चोल राज की एक मूर्ति के पास पहुंचे देख कर विश्मय मे पड गये ।यह मूर्ति भी एक ही पत्त्थर मे तराशी हुइ है क़ितुं इसमे चोल राजा, रानी, दो दरबान तथा पूरा मडंप संम्मीलीत है । हम शिव मंदिर पहुचे । शिव लिंग के दर्शन किये । यह मदिर सुबह 6:00 से 11:00 तक तथा शाम 4:00 से 6:00 बजे तक ही खुला रहता है । इस मन्दिर परिसर के खम्बो को बजाने पर संगीतमय ध्वनीयां निकलती है । गाइड ने हमे इन खम्बो पर जलतरंग तथा सरगम बजा कर आर्श्चयचकीत कर दिया । गाइड हमे मंदिर परीसर से बाहर ले आया। हमने गाइड को उसका पारिश्रमीक दिया और चल दिये अपने अगले पड़ाव की ओर ।

टैक्सी चालक हमे वापस कन्याकुमारी की ओर ले चला । मार्ग मे उसने एक पहाडी के निचे टैक्सी खडी कर हमे बताया कि यह संजीवनी पर्वत है, उपर एक शिव मंदिर है । यहां पर बाहर यहां काफी कम लोग आते है। हम लोग चल दिये शिव मदिर की ओर । लगभग 500 सीढीया चढने के बाद हम मंदिर तक पहुच गये । यह मंदिर एक प्राकृतिक गुफा मंदिर है । गुफा के अंदर एक शिव लींग है । शिव लींग के दर्शन कर बाहर निकलने पर सामने उचांई से कन्याकुमारी का मनमोहक नजारा दिखाई दिया ।

इसके बाद हमारा अगला पडाव था विवेकानंद आश्रम।यह आश्रम अब उजाड सा है। आश्रम मे एक विश्रामगृह और प्रदर्शनालय है। प्रदर्शनी मे स्वामी विवेकानंद की कुछ वस्तुये रखी हुयी है। यहां पर विवेकानंद साहित्य भी बिक्री के लिये उपलब्ध है। मन आश्रम की हालत को देख कर निराश हो गया था।

वापिस कन्याकुमारी पहुंचने पर हमारे पास देवी कुमारी मंदिर के आसपास के दो तीन स्थल बचे हुये थे। सबसे पहले गांधी स्मारक पहुंचे। महात्मा गांधी की अस्थियां सागर मे विसर्जन से पहले यहां रखी गयी थी। उस जगह एक चबुतरा बना हुआ है। यह मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह से किया गया है कि यह मण्दिर मस्जिद और चर्च सभी का आभास देता है। दो अक्तुबर को दोपहर मे ठीक बारह बजे मंदिर के छत पर बनाये गये एक सूराख से चबुतरे पर सूर्य किरणे पडती है।

अब बारी थी विवेकानंद शीला और थिरूवल्लुवर प्रतिमा की। यहां जाने के लिये आपको नाव से जाना होता है। ये नाव आपको हर २० मिनट मे मिल जायेगी। नाव पहले विवेकानंद स्मारक और उसके बाद थिरूवल्लुवर प्रतिमा जाती है।

विवेकानंद शीला एक काफी बडी सी चट्टान है। इस पर एक देवी कुमारी का मण्दिर और विवेकानंद स्मारक है। इस जगह पहुंचने के बाद सबसे पहले हमने एक कक्षा मे शामिल हुये,। यहां इस स्मारक के बारे मे जानकारी दी जाती है। कक्षा के बाद देवी कुमारी पहुंचे। मण्दिर मे देवी कुमारी के एक पांव का निशान है। कहा जाता है कि देवी कुमारी ने शिव की पति के रूप मे प्राप्ति के लिये यंहा एक पांव पर तपस्या की थी। स्वामी विवेकांनन्द ने जहां पर तीन दिनो के लिये समाधी ली थी, वहां पर एक बड़ा सा कमरा है, लोग वहां पर जाकर कुछ देर तक मौन धारण कर साधना या प्रार्थना करते है। यहां पर से भी आप विवेकानन्द साहित्य खरीद सकते है।

अगला पडाव थिरूवल्लुवर प्रतिमा थी, यह प्रसीद्ध तमिळ कवी की प्रतिमा है । तमिळ्नाडु मे उन्हे वाल्मिकी के बराबर दर्जा दिया जाता है। यह प्रतिमा विशालकाय है। प्रतिमा के अंदर कुछ उंचाई तक चढकर जाया जा सकता है। यंहा हवा इतनी तेज चलती है कि खुद को सम्हालना मुश्किल हो जाता है।

हमारा कन्याकुमारी भ्रमण पूरा हो चुका था, अब इंतजार था शाम का, जब अरब सागर मे डूबते सुरज का मनोहारी दृश्य देखना था। हमारी किस्मत खराब थी। बाद्ल नही छाये थे, सुरज उत्तरायण मे था। सुरज सागर मे डुबते दिखायी देने की बजाये पहाड़ियों के पीछे छुप रहा था ।

कन्याकुमारी की यात्रा पूरी करने के बाद हम चल दिये त्रिवेन्द्रम। यह अगले यात्रा वृतांत मे।


4 टिप्पणीयां “सुदूर भारत के दक्षिण मे ‘’कन्याकुमारी'’” पर
वाह! आशीष,
बहुत खुब वर्णन किया है, और फ़िर छायाचित्रों के साथ तो यह प्रविष्टी परिपूर्ण ही हो गई है.
वाकई, बहुत अच्छा लिखे हो, बस, मात्राओं की तरफ़ थोड़ा और ध्यान दे देने की आवश्यकता लग रही है.
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

बहुत खूब । बढ़िया लिखा।हमारे पास तो कन्याकुमारी तथा त्रिवेन्द्रम की काली-सफेद फोटो हैं। तुम्हारे फोटो से काम चलाते हुये अपना यात्रा विवरण लिखा जायेगा।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

आशीष भाई, बहुत सुंदर लिखा है आपने। ऐसा लगा कि मै पिछले बीस मिनट तक कन्याकुमारी में विचरता रहा। धन्यवाद।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 8th, 2006

सुन्दर
उन्मुक्त द्वारा दिनांक जून 8th, 2006

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रांग नंबर

सोमवार, जून 05, 2006


रांग नंबर” यह फोन पर वार्ता का सबसे मह्त्वपूर्ण शब्द है। ऐसे तो हमारे फोन इतिहास मे ना जाने कितने रांग नंबर आते है ,लेकिन कुछ रांग नम्बर हमेशा याद रह जाते है…
ऐसा ही एक रांग नम्बर मुझे आया था।

एक घनघोर अंधेरी रात, बारिश हो रही थी और बिजली जा चुकी थी। बिजली जाने पर हमेशा की तरह मै मोमबत्ती ढूंढ रहा था।वैसे भी मुझे मोमबत्ती हमेशा बिजली आ जाने के बाद ही मिलती है। मै मोमबत्ती शोध मुहिम मे व्यस्त था कि मेरा फोन बजा। फोन उठाने पर एक कर्णप्रिय मधुर आवाज आयी

“हैलो, बिजली आफिस ”
 “नही, रांग नंबर”

हमने जवाब दिया और अपनी मुहीम जारी रखी। (कर्णप्रिय, मधूर आवाज ! समझ गये ना ? )
एक बार फिर से घंटी बजी, वही प्रश्न और वही उत्तर। मैने फोन रखा और मुझे मोमबत्ती मिल गयी। लेकिन अब नयी शोध मुहीम; माचिस ढूढनी थी।

फिर एक बार फोन बजा , फिर वही मधुर आवाज ।मैने संयम ना छोडते हुये, उसे उत्तर देने का निश्चय किया।

मै : “हां जी कहिये ?”
वह: “क्या कहिये.. हमारी बिजली चली गयी है?”
मै : “बिजली गयी तो क्या ?”
वह: “तो क्या का क्या मतलब ? आप कर क्या रहे है ?” (तब तक मुझे माचिस मिल गयी)
वह: “अरे सो गये क्या ? हम लोगो को अंधेरे मे रखकर सोने के अलावा आप लोगो के पास कोई और काम नही है क्या ?”
मै : “अभी तो मै माचिस जला रहा हूं”
वह : “क्या ? देखिये। ये आपका रोज का नाटक हो गया है। दिन मे लोड शेडीग और अब रात मे भी !”
मै : “देखिये बहन जी….”
वह : “बहन जी, क्या बात करते है आप ?”
मै : “देखिये आप जो भी कोई है, जो नंबर आपने डायल किया है…”
वह : “वह मुझे कुछ नही मालूम , पहले ये बताईये बिजली कब आयेगी”

वह कुछ सुनने के लिये तैयार नही थी। अब मेरा शैतानी दिमाग जाग गया और मैने भी मौज लेना शुरू किया।

मै : “अच्छा, ये बताईये कब गयी ?”
वह : “सात से आठ के बिच”
मै: “साथ मे कोई था?”
वह : “मतलब ?”
मै: “जब गयी तो कौनसे कपडे पहने हुये थी ?”
वह : “क्या बात कर रहे है आप?”
मै : “क्या उमर होगी उसकी ?”
वह : “दिमाग घूम गया है क्या आपका ?”
मै : “वह तो एक्दम ठीक है, मुझे लगा कि आपके घर का कोई सद्स्य कहीं चला गया है ?”
वह : “बिजली गयी है बिजली”(एक चिढी़ हुयी आवाज, सारी मधुरता गायब)
मै: “ऐसा क्या, आपके बोलने से तो ऐसा लगा कि आपकी सास कहीं चली गयी है।”
वह :“मेरी अभी तक शादी नही हुयी है।”

हूर्रे….बल्ले …. बल्ले…….

मै : “ऐसा क्या, तब तो ये रांग नंबर लग रहा है.. मै तो गुमशूदा विभाग से बोल रहा हूं!”
वह : “रांग नंबर… तो आपने पहले क्यो नही बताया?”

येल्लो और कर लो बात…

वह : “सारी…”
मै : “कोई बात नही, ऐसे ही रांग नंबर लगा दिया किजिये।”
भडाक(फोन पटकने की आवाज आयी)। बिजली भी आ गयी थी !
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एक और किस्सा। पता नही क्यो, मुझे आने वाले अधिकतर रांग नंबर कन्याओं के क्यो होते है?
घंटी बजी, मैने फोन उठाया। आवाज आयी “हैलो सुरेश !” मैने फोन नही रखा, मालूम था कि अधिकतर रांग नंबर दोबारा कम से कम एक बार और आते है।

वह : “हैलो सुरेश !”
मै : “आधा चाहिये या पूरा ?”
वह : “आप कहां से बोल रहे है ?”
मै : “पृथ्वी नामक ग्रह से ”
वह : “हां हां वह ठीक है, लेकिन आप बोल कहां से रहे है?”
मै : “क्या मैडम, आप भी। सभी तो मुंह से ही बोलते है ना !”
वह : “ज्यादा होशियारी मत दिखाओ, आप है कौन ?”
मै : “एक भारतिय प्राणी”
वह : “लेकिन इस प्राणी का कोई नाम तो होगा”
मै : “नाम मे क्या रखा है , शेक्सपीयर ने कहा था”
वह : “तुम सीधे सीधे बताते हो या फोन रखूं”
मै : “ये हुयी ना अकलमंदी की बात,’रांग नंबर’ पर इतनी देर तक बात कर रही थी आप”
वह : “ओह नो,रांग नंबर क्या ?”

अब ऐसे होते है रांग नंबर….
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9 टिप्पणीयां “रांग नंबर” पर
रांग नंबर का चस्का लग गया है तुम्हें। अब कभी सही नंबर लग गया तो बात करने में तकलीफ होगी।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

लगता है कि बहुत प्रार्थना करते होगे कि कोई रोंग नम्बर लगे और कोई मधुर आवाज़ में कुछ पूछे. होशियार रहना, कभी कभी पत्नी या प्रेमिका भी रंगीनदिल आदमी की जाँच करने के लिए सहेलियों से फ़ोन करवा देतीं हैं, इसलिए तमीज़ से बात करने में ही भला है!
सुनील द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

हा हा मजेदार वाकये थे !
Manish द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

मुँह से बोलते हैं क्या ः)) अच्छा लगा
e-shadow द्वारा दिनांक जून 6th, 2006

या ईलाहि, हम ना हुये!!!
विजय वडनेरे द्वारा दिनांक जून 6th, 2006

हा हा हा मज़ेदार लेख है
अब चुटकुला सुनें
पत्नी आधे घंटे तक फोन से लगी रही। पती ने पूछा किसका फोन है? पत्नी ने कहाः रांग नंबर था।
SHUAIB द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

दिल्लचस्प वाकिये हैं|
हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|
rhythums द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

दिल्लचस्प वाकिये हैं|
हमारे साथ भी अक्सर ऐसा होता है लेकिन इतनी देर रांग नम्बर को झेलना हमारे बस कि बात नहीं|
संगीता मनराल द्वारा दिनांक जून 7th, 2006

Very interesting Story,
did electrick Lady called has came after that,
Ab kabhi bhi esa phone aye tu kahena telephone exchange se bool laha ho, apna no bataye
Rohit द्वारा दिनांक जून 15th, 2006

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अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता

गुरुवार, जून 01, 2006


बहुत पुरानी बात है, जब हम प्राथमिक स्कूल के छात्र थे। हमारा एक सहपाठी था मुन्नाभाई!

मुन्नाभाई हमारी कक्षा का नेता था, मतलब कि कक्षा कप्तान था। स्कूल के उसके दैनिक कार्यो मे होता था, सुबह सबसे पहले पहुंच कर दरीयों पर कब्जा करना। जी हां आपने सही पढा दरीयों पर कब्जा करना। हमारे स्कूल मे डेस्क बेंच नाम की वस्तुएँ नही हुआ करती थी। १०-१२ फुट लंबी और एक फुट चौडी दरीयां, दरीयां छात्रों की संख्या के हिसाब से उसी तरह कम हुआ करती थी, जिस तरह आई आई टी और आई आई एम की सीटें कम होती है। मुन्नाभाई एक साधारण परिवार से ही था, लेकिन उसके पिताजी सरकारी सेवा मे थे। उसके पास कोई और काम नही होता था,सो स्कूल सबसे पहले पहुँचता था। बाकी जनता का तो ऐसा था पालतू जानवरो को नहला धुला कर, चारा देकर, खेती के मौसम मे खेतो मे कुछ देर काम करने के बाद स्कूल आने का मौका मिल पाता था। जब तक वे पहुंचते ,स्कूल मे दरीयो पर मुन्नाभाई और मित्र मंडली का कब्जा होता था।

नेतागिरी


इसके पश्चात शुरू होती थी उसकी नेतागिरी। हर किसी से कुछ ना कुछ लेने के बाद वह दरीयो मे कुछ हिस्सा आंवटीत कर देता था।अब इस कुछ ना कुछ मे किसी से अमरूद लाने का वादा, किसी से आम का, किसी से मोरपंख लेना, किसी से गृहकार्य करवाना वगैरह वगैरह.. । कुल मिला कर ऐश होती मुन्नाभाई की इस नेतागिरी की वजह से। भारत सरकार की तरह उसने भी दरियो के आंवटन मे एक कोटा निर्धारित किया हुआ था, एक दरी पर वह और उसकी मित्रमडलीं बैठती थी। यह मुन्नाभाई का ऐस वोट बैंक था जो कभी उससे विमुख नही हो सकता था। जिस तरह बिहार और उत्तरप्रदेश मे आपको सत्ता मे रहने के लिये डी पी यादव, मुख्तार अंसारी, शहाबुद्दीन जैसे लोग चाहिये होते है वैसे ही उसने एक दरी दादा किस्म के लडको के लिये आरक्षित रखी थी। लेकिन वह भारत सरकार से एक मामले मे बेहतर था, उसने कुल लडकियो मे से ३३% को आरक्षण दे रखा था, एक दरी लडकियो के उस समुह के लिये आरक्षित होती थी, जिसमे उसकी वो होती थी। बाकी बचती थी एक दरी और बाकी दरीयो पर बची रिक्त जगह जिसके लिये उसी तरह मारामारी होती थी , जिस तरह से अनारक्षित सीटो लिये होती है। मुन्नाभाई का कोई विरोध इसलिये नही करता था क्योंकि वह कक्षा का कप्तान भी हुआ करता था। अपने वोट बैंक (लडकीया और दादाओ) के बदौलत वह हर साल कप्तान चुना जाता था। कुल मिलाकर इस तरह से कोटा और दादागिरी के भरोसे मुन्नाभाई की नेतागिरी चल रही थी।
मुन्नाभाई की तरह से हम स्कूल पहुंचने वालो मे सबसे पहले हुआ करते थे, लेकिन हमे बैठने के लिये मुन्नाभाई जी की मेहरबानीयो पर रहना होता था। वह मुझे ईमानदारी से जगह दे देता था क्योंकि मै उसे परीक्षा मे नकल जो करवाता था। अब हम सौरभ गांगूली तो थे नही कि ग्रेग चैपल से पंगा लेकर टीम से लतिया दिये जाये। अब ऐसा था कि जमिन पर बैठने की बजाये उसकी दादागिरी सहन करो और टीम मे बने रहो, मेरा मतलब है कि दरी पर बैठो।

राजनीति

अब हम कक्षा १ से १० तक साथ मे पढे। कक्षा ११ से हम दोनो ने अलग अलग स्कूल मे जाना शुरू किया। पढाई लिखायी तो वो ऐसे भी नही करते थे। उसके पिताजी भी उम्मीद छोड चुके थे। लेकिन मैने नही छोडी थी,मुझे मालूम था कि ये बहुत आगे जायेगा। ये कलयुग है, कलयुग मे आगे बढने के लिये जिन गुणो की जरूरत होती है,वह सभी गुण मुन्नाभाई मे हैं। हर किसी से अपने मतलब का काम निकालना उसे अच्छे से आता था। जिस तरीके से अमरीका ने दूसरे के पैसो पर अपनी अर्थव्यवस्था मजबूत कर रखी है उसी तरह मुन्नाभाई भी इसकी टोपी उसके सर कर ऐश कर रहा था।

इन्ही दिनो ग्रामपंचायत के चुनाव हुये। जिस तरह कांशीराम ने मायावती को राजनिती मे ले आये थे, उसी तरह तत्कालीन सरपंच ने मुन्नाभाई को भी राजनिती मे खिंच लिया। लेकिन मुन्नाभाई की उम्र चुनाव लढने की नही हुयी थी, उन्होने अपनी माताश्री को चुनाव मे खडा कर दिया। अब भारत मे कोई भी काम हो चाहे चुनाव हो या आई आई एम मे प्रवेश, जाति बताये बिना कार्य थोडे ही होता है ? आपकी योग्यता गयी तेल लेने, सबसे महत्वपूर्ण है आपकी जाति। मुन्नाभाई दलित तो नही लेकिन ओ बी सी जरूर था। विरोधी उम्मीदवार एक सेवानिवृत्त शिक्षक थे, जिसने अपनी सारी जिन्दगी गांव से बुराईयों को दूर करने मे लगायी(बरबाद की) थी। कोई बीमार हो,किसी का स्कूल /कालेज मे प्रवेश हो, कोर्ट कचहरी का काम हो, कोई नयी शासकीय योजना हो, सभी दौडे जाते उनके पास। वे भी बिना किसी स्वार्थ के लोगो का काम करते थे। गांव की शराब की दूकान उन्होने बंद करवाना, झाडफुंक वाले ओझा को गांव से भगाने जैसे समाजिक काम उन्होने किये थे। परंतु उनने ब्राम्हण जाति मे पैदा होने का जुर्म भी किया था। उन्हे विश्वास था कि सारी जिन्दगी के सद्कर्मो का फल उन्हे मिलेगा। वे भी निश्चिंत थे और हम भी। लेकिन चुनाव के एक दिन पहले, मुन्नाभाईजी को अपनी जाति याद आ गयी। रात मे शराब की पेटी भी आ गयी। मास्टर जी हार गये। और मुन्नाभाई ने राजनिती का पहला पाठ पढ लिया ।

नेता

अब मुन्नाभाई अपने विकास मार्ग पर अग्रसर था। गांव मे होने वाले हर विकास कार्य मे वह सहकारी होने लगा था। गांव के विकास कम उसका विकास ज्यादा हो रहा था।

मुन्नाभाईजी बारहवीं मे नकल करते हुये पकड़े गये। अब हुआ ऐसा कि दसवी मे तो मेज़ पर चाकु गडा हुआ था, तो किसी की हिम्मत नही हुयी थी , उसे नकल से रोकने की। एक शिक्षक ने हिम्मत कर कहा भी
 “भाई सबके सामने नकल तो मत करो ?” 
मुन्नाभाई गुर्राये
“ए मास्टर, गांव मे रहना है कि नही ?” 
लेकिन इस बार परीक्षा बोर्ड का उडन दस्ता आया था, पुलिस बंदोबस्त के साथ। मुन्नाभाई जी २ साल परीक्षा देने से वंचित कर दिये गये। इसके साथ मुन्नाभाई नेता बन गये।

मैने गांव छोड़ दिया था, अपनी अभियांत्रीकी के लिये, मुन्नाभाई से कभी कभार मिलना होता रहता था। वह कभी कभार कहता भी था,
“रास्ते पर एक पत्थर भी फेंको तो किसी कुत्ते की जगह इंजीनियर को लगेगा”।
हम मुस्करा देते थे। वो अपनी राजनीति और पहुंच की बाते करते थे। कोई भी मोर्चा हो या आंदोलन अपने चमचो को लेकर बिना टिकट यात्रा करते, वो भी आरक्षित डिब्बे मे। भाई नेता जो ठहरे, उनका तो आरक्षण जन्मसिद्ध अधिकार है, हर जगह। कभी हम कहते भी

“भाई, गांव के विकास के लिये भी कुछ कर ले यार, कितनी समस्या है गांव मे”
वह कहता
“अबे गांव के लोग विकास कर लेंगे तो मुझे वोट कौन देगा ? मुझे पहले अपना विकास करना है, विधायक बनना है, बाद मे सांसद बनना है……”
“यार ऐसे मे तुझे अगली बार वोट कौन देगा ?”
“वही जिसने पिछली बार दिया था, देख गांव मे मेरी जाति के लोग ज्यादा है। ऐसे भी मतदान के एक दिन पहले दारू की पेटी खोल दो। दो घुंट लगाने के बाद सब लाइन पर आ जाते है।”

वही हुआ अगले चुनाव मे मुन्नाभाई गांव का सरपंच बन गया। एक और खबर मिली की उसने बी एस सी और बी एड(शिक्षा स्नातक) भी कर ली है। कैसे नही मालूम। किसी ने उसे किसी भी कॉलेज जाते नही देखा। एक स्कूल खोल दिया है,जिसके संचालक वही हैं।.

कैसा रहा सफर ? नेतागिरी,राजनीति से नेता तक का ? टिप्पणी देना ना भुलें !

ताज़ा खबर यह है कि अपने मुन्नाभाई इस बार ग्रामपंचायत चुनाव हार गये हैं! लेकिन हमे इसका कोई फायदा नजर नही आरहा है। अर्जुन सिंह भी तो पिछले दो चुनाव हार चुके है , लेकिन केंद्र सरकार मे मानव संसाधन मंत्री है।

इस हार के बावजूद हमारा पूरा विश्वास है कि एक ना एक दिन नेता मुन्नाभाई अपनी नेतागिरी और राजनीति की बदौलत काफी उपर जायेगा। सुनील पाल उवाच
“इस देश का हाल ऐसा है कि जो चुनाव जितता है वो एम पी बनता है और जो हारता है वो देश का पी एम बन जाता है”
………………………………………………………………………………………
नोट :इस लेख के सभी पात्र वास्तविक है, सिर्फ नाम बदल दिये गये है।


4 टिप्पणीयां “अनुगूँज 20: नेतागिरी, राजनीति और नेता” पर


आशीष भाई आपने जो लिखा है, शब्दशः सच है। देश को ऐसे हजारों मुन्नाभाई खा रहे हैं। हर गॉव, हर नेता की लगभग यही कहानी है। जो सब जगह से लतियाये गये वो आज नेता हैं और देश का भाग्यनिर्धारण कर रहे हैं।
e-shadow द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

आशीष बहुत सही वास्‍तविक बातें लिखी हैं हों भी क्‍यों नही आखिर वास्‍तविक पात्रों के जो बारे में है। और सही मायने में विषय के छुपे अर्थ को बहुत अच्‍छे ढंग से व्‍यक्‍त किया है। तीनों बातें एक ही वक्‍त में आपस में अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़ी हैं। सबसे पहले लिखने की बधाई भी स्‍वीकार करें।
Tarun द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

पुरातन काल में जब वाल्मिकिजी ने मरा मरा का जाप किया तो रामजी सचमुच सहाय हो गये..
आज कल के सद्पुरूष ताने खा खा कर नेता बन जाते है
nitin द्वारा दिनांक जून 2nd, 2006

मेरे भी हाल ही में एक ऐसे ही महानिभाव से परिचय हुआ था। दरअसल राजनीति, और ऐसी कितनी ही बातें हमें पढ़ाई नहीं जातीं। अगर पढ़ाई जाएं, तो फिर कुछ हो सकता है।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

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मेरी कल्लो बेगम

शुक्रवार, मई 26, 2006


१९९७-१९९८, संगणक अभियांत्रीकी का अंतिम वर्ष। इस समय तक हम डेनिस रिची के परम भक्त बन चुके थे, यशवंत कान्हेटकर हमारे दूसरे देवता थे । ‘सी’ कंप्यूटर प्रोग्रामिंग भाषा पर मेरा अच्छा खासा अधिकार हो गया था। मै इस भाषा का उपयोग सामान्य प्रोग्रामिंग के अतिरिक्त ,वायरस बनाने, टी एस आर(टर्मिनेट एंड स्टे रेसीडेन्ट प्रोग्राम), सिस्टम प्रोग्रामिंग के लिये भी करता था। यह वह दौर था जब कंप्यूटर प्रोग्रामिंग मेरे लिये एक दीवानगी बन चुकी थी, मैं गर्व से कहता था ‘कंप्यूटर’ मेरा पहला प्यार है।

इन्ही दिनो मैं एप्टेक मे पार्ट टाईम नौकरी भी कर रहा था। मुझे शाम की दो बैचो को ‘सी’ पढानी होती थी। अब किस्मत कुछ ऐसी थी कि यहां भी दोनो बैचो मे कन्याओ का प्रतिशत ज्यादा था। दोनो बैच की अधिकांश कन्याये बी एस सी संगणक विज्ञान की छात्राये थी। सामान्यत: प्रोग्रामिंग पढाना एक कठिन कार्य होता है, यह एक ऐसी विधा है, जो पढायी नही जा सकती। ये खुद सीखनी होती है। हमारे पढ़ाने का अंदाज कुछ ऐसा था कि हम यहां भी लोकप्रिय हो गये थे। लोकप्रिय होने का एक कारण ये भी था कि मैं प्रोग्रामिंग के हर पहलू को माईक्रोप्रोसेसर के स्तर तक ले जाकर समझा देता था।

एप्टेक की प्रयोगशाला मे एक ही काला सफेद मानीटर वाला कंप्यूटर था जिस पर सामान्यतः कोई नही बैठता था। मै उसी पर काम करता था। मेरे उल्टे सीधे प्रोग्राम वही पर चलते थे। मैने इस कंप्यूटर का नाम ‘कल्लो बेग़म’ दिया हुआ था। सभी को मेरे पहले प्यार और ‘कल्लो बेग़म’ के बारे मे मालूम था।

मेर छात्रो मे एक कन्या काफी तेज़ थी, उसे भी 'सी' मे सिस्टम प्रोग्रामिंग अच्छी लगती थी। वह हमेशा मेरे प्रोग्रामों के साथ छेड़छाड़ करती रहती थी। मैं उसे मना नही करता था, क्योंकि मैने भी इसी तरह से सीखा था। उसने इस तरह से ‘सी’ पर अच्छा खासा अधिकार कर लिया था। जब मैं प्रोग्रामिंग करता रहता था, तो वह भी साथ मे बैठकर देखते रहती थी कि मैं क्या कर रहा हूं। उसे जब भी समय मिलता था, आ जाती थी और खोद खोद कर पूछते रहती थी। मुझे उसके सवालों का जवाब देना अच्छा लगता था क्योंकि कभी कभी उसके जवाबों के लिए मुझे कॉलेज के ग्रंथालय मे घंटो बैठना होता था।

एक दिन उसने मुझसे कहा
"आप झूठ बोलते हो, आपको ‘कल्लो बेग़म’ से प्यार नही है !”
मैं चकराया
“किसने कहा ? कल्लो बेग़म के बिना मेरी ज़िदग़ी अधूरी है!”
“तो आपका पासवर्ड “Ihatekallo” क्यों है ?”
उस कन्या ने मेरे एक टी एस आर (जो कीबोर्ड की हर कुंजी को एक फाइल मे रीकार्ड करता था), का दुरुपयोग कर मेरा ही पासवर्ड हैक कर लिया था !

मैं उससे काफी प्रभावित हुआ था। लेकिन मेरी उस कन्या से नज़दीकी का कुछ लोगो ने(मेरे एपटेक के सहयोगियों) ने कुछ और मतलब निकाल लिया था।

इस दौरान मेरा जुलाई आ गया था, मेरी बी. ई. पूरी हो गयी थी। मेरे पास एक नौकरी का प्रस्ताव था और मुझे १ अगस्त को अपनी नौकरी के लिये मुंबई जाना था। ये सभी को मालुम हो गया था। जुलाई के पहले सप्ताह मे ‘गुरू पुर्णीमा’ थी। उस कन्या ने मुझे गुरू दक्षिणा मे एक पूस्तक दी थी जिसमे स्वामी विवेकानंद के भाषणो का संग्रह था।

एक दिन मैं उन लोगो को पढाकर कर बाहर आया तब शुभांगी(मेरी सहयोगी) ने मुझे एक बधाई पत्र ला कर दिया और कहा कि ये स्वागत कक्ष मे रखा था।

मैने बधाई पत्र खोला । लिखा था
I love you !
Miss. You Know very Well

मैं चकराया।
“ये कौन है?” 
शुभांगी ने कहा
 ” इतने भोले मत बनो, आपको सब मालूम है !”
“अरे नही यार मै ऐसे भी एप्टेक मे दिन मे सिर्फ २ घंटे रहता हूं, वह भी पढ़ाते रहता हूं !”
” लेकिन कुछ ऐसे भी लोग है जो उन दो घंटो मे आपके आसपास ही रहते है|”
बाकी जनता भी उसकी हां मे हां मिलाने लगी। मै उन लोगो का इशारा समझ रहा था। मै उस कन्या को जानता था, वो ‘बोल्ड’ लड़की थी। उसे कुछ कहना होता तो शर्तिया वह सीधे कहती। वह कम से कम “Miss You Know very Well” का उपयोग तो नही करती। उसके पास एक तरिका और भी था, मेरे प्रोग्राम ! वह उनमें छेड़छाड़ तो करती ही थी , वह उसमे अपना संदेश छोड़ सकती थी।

मैने सोचा “छोडो यार, जो होगा सामने आयेगा!”

दूसरे दिन शाम को वो लड़की आयी। वो सामान्य थी। हमेशा की तरह वो शुरू हो गयी अपने प्रश्नों की बौछार लिये। मेरा जो बचा खुचा शक था , वो भी चला गया। मैं थोड़ा असामान्य था जो उसने भांप लिया ।
उसने पूछा
“क्या हुआ सर, कल्लो बेगम नाराज़ है क्या ?”
मैने कहा
 “हां, सोच रहा हूं ,मेरे जाने के बाद उसका क्या होगा ?”
” सर उसकी चिंता छोडो, भौजाई और बच्चों (मेरे प्रोग्रामों)की देखभाल मैं करते रहूँगी”
मैने चैन की सांस ली, ये कारनामा(बधाई पत्र) किसी और का है ! इस का तो नही वर्ना वह “भौजाई” तो नही कहती। बाद मे लोगो ने मुझे उकसाने की कोशिश भी की जिसपर मैने ध्यान नही दिया !

३० जुलाई मेरा एप्टेक मे आखिरी दिन, शाम को मैने एप्टेक के सहयोगियों को पार्टी दी । बातों ही बातों मे मैने किसी बात पर कहा
“अभी तक ऐसी कोई कन्या मेरे आसपास नही फटकी है,जो मुझे उल्लु बना सके!”
सोहेल काजी उवाच
“अरे जाने दो ना, शुभांगी ने तो तुम्हे पिछले महीने भर से उल्लु बना रखा है !”
मेरा ट्युबलाईट जला! मैं शुभांगी की ओर मुडा
“तो ये बधाई पत्र तुम ने लिखा था ?”
वो सिर्फ मुस्करायी ! अब मेरा मुंडा(खोपडा) खिसका ! लेकिन मैने धैर्य नही खोया
“अरे यार तुमने मेरी मौज़ लेनी थी वो तो ठीक है, लेकिन तुम लोग उस लड़की की ओर इशारे क्यो कर रहे थे ? मैने उससे कुछ कह दिया होता तो ?”
“हम वही तो चाहते थे कि तुम उससे कुछ कहो ! वो तुम्हे पसंद करती है, तुम तो खैर पत्थर दिल हो। तुम तो कुछ करोगे नही। तो सोचा हम ही कुछ मदद कर दें !”
मैने अपना माथा पिट लिया, अब इन्हे कौन समझाये कि एक लडके और लडकी मे निकटता का मतलब प्रेम नही होता । इच्छा तो हो रही थी कि शुभांगी को एक थप्पड रसीद कर दूं। लेकिन मन मार लिया !

मेरी छात्र कन्या HUGES मे है, उसके पास एक Dell का काला कम्प्युटर है, जिसका की बोर्ड, माउस ,मानीटर सब कुछ काला है। वह उसे ‘कल्लो बेगम’ के नाम से बुलाती है। मेरे पास हर ५ सितंबर शिक्षक दिवस पर उसका बधाई पत्र आता है।

हमारे अध्यापन के दौरान के हमारे कुछ सुभाषित :
१.चलो कंप्युटर देव को जोड घटाना सीखाया जाये !
२.पोईन्टर एक प्रेमिका की तरह होता है। प्रेमिका के साथ यदि कुछ भी होता है तो उसका असर प्रेमी पर होता है।
३.संगणक प्रोग्रामर पास्कल की खूबसूरती से प्यार कर बैठते है लेकिन शादी के लिये ‘सी’ जैसे अख्खड का चयन करते है।(यशवंत कान्हेटकर से चुराया हुआ)।
४.सी++, सी के प्रवाह को कक्षा की चारदिवारी मे बांधने का प्रयास है ! एक अनियंत्रित प्रवाह से नियंत्रीत प्रवाह अच्छा होता है ।
५.सी मे पाईंटर को गुढ रहस्य को ना जाने बगैर प्रोग्रामींग करवाना , बंदर के हाथ मे उस्तरा थमाना है।
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7 टिप्पणीयां “मेरी कल्लो बेगम” पर
मज़ा आया कल्लो बेगम से परिचय पाकर
pratyaksha द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?
सुनील द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

आषीश, तुम कुछ भी कहो, तुम्हारे बात लिखने से तो अवश्य लगता है कि शायद छोटी सी आशा थी तुम्हारे मन में भी जो किसी बात से होठों तक न आ पायी?
आपकी बात में दम तो है सुनील जी।  
Amit द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

कल्लो बेगम के बारे में जान कर खूशी हुई।
SHUAIB द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

अमित जी, सुनील जी, बात में दम है। आशीष जी, इस बार थप्पड पर नियंत्रण के लिये बधाई।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 27th, 2006

हमेशा की तरह लाजवाब संस्मरण !
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 28th, 2006

भाई, तुम कभी कोई ऐसी कहानी भी लिखोगे जिसमें तुम किसी लड़की पर आशिक हुए, कुछ प्यार का इज़हार किया आदि?
वैसे मुझे लगता है कि उस समय भी आपकी ज़िंदगी में कोई लड़की थी। वर्ना किसी लड़की के साथ सामान्य रह पाना कम से कम मेरे बस की बात तो नहीं।
बाकी सब अच्छा है।
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

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मेरी एक मूर्खता

सोमवार, मई 22, 2006


पिछली पोष्ट मे मैने कहा था:
दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मैं आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लंबा किस्सा है फिर कभी…।
ये चिठ्ठा वही किस्सा है….
ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं ।

सन १९९४, उम्र लगभग १७ वर्ष । वही किशोरावस्था और युवावस्था की संधि पर खड़ा मै । मध्यमवर्ग के आदर्शों के बीच पला बढ़ा आसमान को छूने की आकांक्षाओं रखने वाला , थोड़ा गुस्सैल , थोड़ा विद्रोही मन।

सपने देखे थे मेडिकल के, अच्छे अंकों के बावजूद प्रवेश नही मिल पाया था। निराशा थी पर निराशा से ज्यादा, व्यवस्था पर आक्रोश था। उम्र ही ऐसी थी जो व्यवस्था के अनुसार ढलने की बजाय व्यवस्था को तोड़ने मे विश्वास करती है।

हर असफलता एक नयी शुरूआत को जन्म देती है। मैने भी एक नयी शुरूआत का निश्चय कर लिया। चलो मेडिकल ना सही, विज्ञान मे स्नातक(बी एस सी) कर लेते है। पदवी(Degree) आने के बाद नागरी सेवा(Civil Services) का लक्ष्य निर्धारित किया। अब विषय कौन से चुने जायें ? जवाब आसान था ,भौतिकी और गणित मे तो रूचि बचपन से थी,लेकिन रसायन पसंद नही था। इसलिये इलेक्ट्रानिक्स ले लिया । मेडिकल की असफलता के बाद जीव-शास्त्र का तो प्रश्न ही पैदा नही होता था।

अब हम ठहरे थोडे पढाकू किस्म के जीव, पहले ही दिन से कक्षाओं मे जाना शुरू । बाकी पढाकूओ से सिर्फ अंतर इतना था कि कक्षा मे हम सामने की बेंचो पर ना बैठकर पीछे बैठते थे।

पहले ही दिन जब सभी का परिचय हो रहा था, हमने भी अपना परिचय दिया।
मैं आशीष हुं, मैं ज़िला परिषद स्कूल आमगांव से हुं और मैने १२ वी मे ९४ % अंक प्राप्त किये है !

मैने जैसे ही यह कहा सारी की सारी कक्षा मेरी तरफ देखने लगी, जैसे मै चिडियाघर से छूटा हुआ प्राणी हूं। कक्षा मे फुसफुसाहट शूरू हो गयी, पता नही ये फुसफुसाहटें मेरे सरकारी स्कूल से होने की वजह से थी या एक गांव से होने या मेरे अंकों से या इन सभी से !

कॉलेज जीवन मे नया नया प्रवेश था। एक नया रोमांच था, एक नया माहौल था। भाई लोग पढ़ाई से ज्यादा गपशप, कैण्टीन मे समय गुज़ारते थे। कक्षा से गोल मारकर फ़िल्मे देखना और दूसरे दिन उसकी चर्चा करना। आसपास से गुजरती कन्याओ पर सीटी बजाना, टिप्पणियां करना …………

मेरे लिये ये सब कुछ नया था। मैं परिवार के साथ एक गांव मे रहता था। रोज़ सुबह साईकिल से ६ किमी आमगांव जाता था, वहां से २४ किमी ट्रेन से गोंदिया कालेज । शाम को इसका उल्टा। पढने के अलावा और कोई धुन नही थी। घर से कालेज , कालेज से घर और इसी मे मस्त। मस्ती का समय , रेल का सफर मे होता था। २० मिनट के सफर मे खूब मज़े होते थे। हम लोग टिकट निरीक्षक को देखकर जान बूझकर अपने डिब्बे से दूसरे डिब्बे मे चले जाते थे, वो हमारे पीछे पीछे आता था। उसे पूरी रेल घुमाने के बाद हम उसे अपनी मासिक टिकिट दिखा देते थे ।

कक्षा मे पढाकू और अनुशासित होने के कारण, थोडे लोकप्रिय हो गये थे, विशेषतः कन्याओ मे। हर काम समय से करने की आदत बचपन से डाल दी गयी थी। स्कूल मे कोई काम समय से ना करने की सबसे ज्यादा सजा मुझे ही मिलती थी। जुमला होता था “एक शिक्षक का पुत्र यदि ऐसा करेगा तो बाकी क्या करेंगे ?” घर मे सजा दुबारा मिलती थी , बोनस मे। एक आदत हो गयी थी । इसी से कालेज मे हमारे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका हमेशा पूर्ण रहती थी । रोज कोई ना कोई मेरे नोट्स और प्रायोगिक पुस्तिका नकल करने ले जाता था।

एक दिन एक खूबसूरत कन्या ने हमारी प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। [इस कन्या के पीछे सारी कक्षा के लड़के पडे थे। एक अनार और ४० बीमार।] मैं एक प्रयोग मे व्यस्त था,शराफत से उसे कहा मेरे बैग से निकाल ले । दूसरे दिन वह पुस्तिका वापिस ले आई। हम फिर से व्यस्त, उसे बैग मे रख देने कहा। मेरी जगह कोई और होता तो उसके हाथो मे पुस्तिका देकर(या लेकर) धन्य हो जाता और सारी की सारी कक्षा को कैंटीन मे चाय और समोसो की पार्टी दे देता।

इतने मे अशोक आया,उसने भी वही वाली प्रायोगिक पुस्तिका मांगी। अशोक हमारी कक्षा मे बी बी सी के नाम से जाना जाता था। यदि आपको कोई खबर कालेज मे फैलानी हो तो आपके पास २ रास्ते है; १. किसी कन्या को बता दो और कह दो कि किसी को ना बताए। २. आप अशोक को बता दो।

हमने उससे भी पुस्तिका बैग से निकाल लेने कहा। और ये मेरी बेवकूफी की शुरूवात थी। अशोक ने पुस्तिका निकाली। पुस्तिका के साथ एक सुगंधित गुलाबी लिफाफा भी निकल आया। अशोक ने लिफाफा देखकर मजमून भांप लिया । पूरी कक्षा मे सभी के सामने ज़ोर ज़ोर से पढ़ना शुरू कर दिया

प्रिय आशीष,
……………………… ……………………….. ………..
मुझे तुमसे प्यार है, मैं तुम्हारे बिना जी नही सकती
………. ………….. ………….. …………………… ………
तुम्हारी और सिर्फ तुम्हारी
………………

मेरा चेहरा एकदम लाल हो गया था, कुछ शर्म से कुछ क्रोध से। कक्षा की सारी कन्याये मेरी ओर देख कर मुस्करा रहीं थी जैसे कह रही हो बड़े छुपे रूस्तम निकले। लडके मज़े ले रहे थे। ये सब मेरे लिये अजीब सा था। मैने उस कन्या को ढूंढने की कोशिश की। वो कक्षा मे नही थी। मैने अशोक से पत्र छीना और कक्षा से बाहर आया ।

वो कन्या गैलरी से कालेज के बाहर जा रही थी। मैने उसके पीछे जाकर उसे रोका । गुस्से से मेरा दिमाग काम नही कर रहा था। ‘सटाक’ मैने एक थप्पड उसके चेहरे पर रसीद किया और पत्र फाडकर फेंक दिया । उसके मुंह से निकला
“तुम मुझे नही चाहते इसका मतलब ये नही कि तुम मुझे अपनी पसंद के इज़हार से रोक सकते हो।”
मै पैर पटकते हुये कॉलेज से निकला और अगली रेल से घर पहुंचा। रास्ते मे दिमाग ठंडा हुआ। मम्मी परेशान ,आज ये जल्दी कैसे आ गया। शाम को पापा ने कहा “कल से अभियांत्रीकी के प्रवेश शुरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो।” दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । वह दिन मेरा उस कालेज मे आखिरी दिन था, वह कन्या भी मुझे उस दिन के बाद कभी नही मिली।

आज जब मै पीछे मुड़कर देखता हुं तो एक अफसोस होता है कि काश मैने गुस्से को एक दिन के लिये काबू पा लिया होता। उसके प्यार को स्वीकारना या ना स्वीकारना अलग बात थी, लेकिन थप्पड मारना तो किसी भी तरह से सही नही था। उसने सही कहा था,आप किसी को अपनी पसंद के इज़हार से रोक तो नही सकते।
गलती अशोक की थी, उसे पत्र नही पढ़ना चाहिये था। लेकिन मेरा गुस्सा उस लड़की पर निकला। मैं उसे बाद मे प्यार से समझा भी सकता था। नही समझाता तो भी दूसरे दिन तो मैने कालेज ही छोड़ दिया था।
काश……घड़ी की सुईया पिछे की जा सकती…..
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13 टिप्पणीयां “मेरी एक मूर्खता” पर
अरे ये क्या किया आशीष भाई, लड़की को चाँटा मार दिया। अगर आपकी जगह मैं होता तो ….
लेकिन भगवान हमेशा ग़लत इंसान को ग़लत चीज़ देता है। मुझे दी फूटी किस्मत और आपको ……
प्रतीक पाण्डे द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

आशीष जी,
मुझे तो बस ये पंक्तियाँ याद आ रही है
“कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता
कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता”
सागर चन्द नाहर द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

आशीष तुम्हारी सजा यही है कि तुम उसे जिन्दगी भर याद रखोगे।
तुमने उसे भले ही बुरा भला कहा हो, लेकिन यकीन के साथ कह सकता हूँ, तुम्हारे दिल के किसी ना किसी कोने मे उसने घर बना लिया था। अब भी दिल्ली दूर नही, ढूंढना चाहो तो वो मिल सकती है (अपने रवि रतलामी “जिन खोजा तिन पांइया” सर्विस चलाते है।(मेरी वाली को ढूंढ रहे है, तुम्हारी वाली को भी ढूंढ देंगे)
और हाँ, अशोक टाइप के बन्दो से होशियार रहना: ये खुद तो रायता खाते नही, बस फ़ैला देते है।
बकिया चकाचक,
जीतू द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

:)
जो बीत गई, वो बात गई…भविष्य के लिये शुभकामनाऎं.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

दुःख हुआ पढकर आशीष भाई। भगवान आपके गुस्से को कम करे।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

मैं आपकी मनःस्थिती समझ सकता हूं….. कैसे और क्यों मत पूछो
खैर जो हुआ सो हुआ… वैसे जैसा जीतू जी ने कहा है.. तलाश करवालो..
और मिल जाये तो क्षमा मांग लो.. वैसे बहुत लंबी सजा काट चुके हो….
नितिन द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

दुख हुआ पढ कर! जो हुआ सो हुआ. लेखन में तुम्हारी ईमानदारी का और हिम्मत का कायल हूं -अब बीती ताहीं बिसार दे आगे की सुध ले!
ई-स्वामी द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

लेख पढ़ा अभी-अभी। कन्या अभी भी अनजाने में गाल सहलाती होगी। शायद गाना भी गाती हो:-

‘हमसे का भूल भई जो ये सजा हमका मिली’
आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।
आगे की मूर्खतायें सुनने का इंतजार है।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

ये पढने के बाद ये तो शर्तिया है कि आप लोग मुझे कोसना शुरू कर देंगे, कुछ गालीयां देंगे, हो सकता है कि कुछ खतरनाक सी टिप्पणियां भी आयें। वैसे मैं इस प्रतिक्रिया के लिये तैयार भी हुं।
अब क्या कहें। आपको कोसने का क्या फ़ायदा, जो बीत गया समय वह वापस नहीं आ सकता, कोस तो आप अपने आपको स्वयं ही रहे होंगे, हमार कोसने से का होगा!! यह भी ज्ञात है कि क्रोध में व्यक्ति अंधा हो जाता है। बस यही कामना है कि भूतकाल में की गई गलतियाँ आप दोहराएँगे नहीं।
Amit द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

:( कोसा तो नहीं आपको पर समझ नहीं आया - लड़की को झापड़ । और तो और आपने अपना सन्काय भी बदल लिया । विचित्र किस्सा है । पहले कभी नहीं सुनी ऐसी बात । हाँ एक सुझाव है, कभी वह कन्या मिल जाय तो माफ़ी मान्ग लीजियेगा | मेरे हिसाब सेे बेचारी ने इतनी बडी़ गलती भी नहीं की थी कि उसे ऐसी सज़ा दी जाती |
Nidhi द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006

भाई आशीष, एक बार तो ढूंढना ही चाहिए आपको उन्हें।

रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 23rd, 2006
[…] मैने शादी के पहले विद्यार्थी जीवन मे, और शादी के बाद – मुन्ने की मां के विरोध के बावजूद - अनगिनत राते मैदानो मे, खेतों मे, नदी के किनारे बितायीं हैं: कभी पुच्छल तारे को देखने के लिये, कभी लिओनिडस को देखने के लिये, पर अधिकतर आसमान मे तारों को देखने के लिये| मुझे आसमान के तारों को देखना, उनका अध्यन करना हमेशा पसन्द था| पर काश कभी कोई मेरे साथ होती जिससे मै तारों के वर्गीकरण के बारे मे बता पाता| पर क्या मालुम मै भी वही मूर्खता कर बै� ता जो यहां बतायी जा रही है| […]
छुट-पुट » Blog Archive » Oh Be A Fine Girl Kiss Me द्वारा दिनांक मई 24th, 2006

are bhai, chaanta maar diya, kuch bhi ho jaata main kisi ladki ko chaanta naa maar paata, vishwaas ho giya kaa paa bahut hi krodhit rahe honge, gussa sach me ek pahadi nadi ke manid hai, ummeed hai ke ab aap waise mijaz nahi rakhte.
kumar द्वारा दिनांक मई 28th, 2006

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मेरे अधूरे सपने

शुक्रवार, मई 19, 2006


सपने, हां सपने तो मैने खूब देखे है, बचपन से लेकर जवानी तक ! सपने देखना कब शुरू किया , याद नही, शायद होश संभालने के साथ ही, सपने देखना शुरू कर दिया था। सपने , खुली आंखों के सपने !

बचपन नंदन ,चंदामामा और इंद्रजाल कामिक्स पढ़ते हुये बीता। परिया, जादू की छडी, चमत्कारी शक्तियों और जादू की छडी से सराबोर वो कहानियां ! इन कहानियो के मायाजाल मे लिपटे सपने ! जो यथार्थ के धरातल पर असंभव थे, लेकिन बाल-मन उन्ही सपनों के मग्न रहता था। इसी दौरान दूर-दर्शन पर विक्रम बेताल और सिहांसन बत्तीसी जैसे धारावाहिक भी देखे ! बस सपनों पर एक तिलिस्मी धुंध छा गयी थी। सपने देखा करता था कि बस एक जादू की छडी मिल जाये और दूनिया मेरे कदमों मे ! इस छडी की आवश्यकता उस समय ज्यादा महसूस होती थी जब सर्दियो मे सुबह सुबह उठकर २ किमी दूर पैदल स्कुल जाना होता था । देर से स्कुल पहुंचने पर मास्टरजी मुर्गा जो बनाते थे।

खैर थोडे बड़े हुये, तिलीस्मी धुंध छटी । धीरे धीरे पता चला परियां, जादू की छडीयां सिर्फ कहानियो मे होती है। हाईस्कूल मे आ गये थे,पापा के ही स्कूल मे पढ़ना शुरू किया । पापा विज्ञान शिक्षक थे, रूचि बदली। अब विज्ञान प्रगति, आविष्कार और चकमक ज्यादा पढ़ते थे। नंदन ,चंदामामा भी पढ़ते थे लेकिन यथार्थ के धरातल पर रहकर। इन्ही दिनो स्टार ट्रेक, सिग्मा और टर्निंग पॊईंट देखना शूरू किया। बस फिर क्या था , सपना देखा कि बड़े होकर वैज्ञानीक बनेंगे। उन दिनो “विज्ञान प्रगति” मे सौर मंडल की उत्पत्ती और ग्रहों की जानकारी पर एक श्रंखला प्रकाशित हो रही थी, जिसके लेखक देवेन्द्र मेवाडी थे। स्टार ट्रेक, सिग्मा और विज्ञान-प्रगति ने, अंतरिक्ष यात्री बनने का सपना दिखा दिया ! उन्ही दिनो डिस्कवरी अंतरिक्ष यान का प्रक्षेपण भी हुआ था। राकेश शर्मा अब मेरे नायक थे।

इन्ही दिनो मे गर्मियों मे ननीहाल गया, मेरे नाना जी चित्रकार थे। उनके बनाये चित्र देखे। वहाँ चित्र-कला का भूत चढ़ा। नाना तो थे नही लेकिन मामा थे। उन्होने चित्र-कला की बारीकी सिखाया। बिना किसी स्केल या साधन के पेंसील से सरल रेखा खींचना , ये मेरा पहला पाठ था। वापिस घर आने के बाद कुछ दिनो तक चित्र-कला का भूत सवार रहा, कुछ इनाम भी जीते। ये भूत अभियांत्रीकी के दिनो तक रहा ,उसके बाद छूट सा गया।
दसंवी अच्छे अंकों से पास की। हाईस्कूल पास करने के बाद विज्ञान लेना तय था। मेरा सपना भी था, विज्ञान मे ही आगे बढ़ने का। लेकिन मेरे सपनो मे अब मम्मी पापा के भी सपने थे। पापा की इच्छा मुझे डाक्टर बनाने की थी। सच कहूं तो मेरी इच्छा उस समय पता नही क्या बनने की थी , मुझे आज तक नही मालूम। मेरे सपनो मे अंतरिक्ष यात्री, पायलट, चित्रकार और डाक्टर सभी शामिल थे।

पापा ने ११ वी मे मुझे भौतिकी, रसायन , जीव विज्ञान के साथ गणित भी दिलवा दिया था। गणित मेरे खून मे है, मेरे पापा, ताउजी दोनो गणीत मे एम एस सी हैं। मै बिना मेहनत किये इसमे १००% अंक ले लेता था। सिलसिला आगे भी जारी रहा जब मैने बिना किसी विशेष मेहनत के १२ वी मे गणित ने फिर से एक बार शतक लगाया।

१२ वी का परिणाम आया, अच्छे अंक थे लेकिन इतने अच्छे भी नही थे कि मेडिकल मे प्रवेश दिला सकें। ९४% अंक लाने के बाद मुझे एम बी बी एस मे प्रवेश नही मिल पाया। [मेरा एक मित्र जिसे ४२% अंक थे , उसे प्रवेश मिल गया। ये बात और है कि ३ सत्र लगातार असफल होने के बाद वह मेडीकल कॉलेज छोड़ आया]
मेरा डाक्टर बनने का सपना चकनाचूर हो चुका था। मैने निराशा मे बी एस सी मे भौतिकी , गणित और रसायन विषय लेकर प्रवेश ले लिया । अब मेरा सपना स्नातक हो कर नागरी सेवा (सिविल सर्विस) मे जाने का था।

लगभग २ महीनों तक बी एस सी की कक्षा पूरे मन से की। एक दिन शाम को पापा ने कहा कि कल से अभियांत्रिकी के प्रवेश शूरू हो रहे है, तुम्हारा नाम प्रथम सूची मे है। कल जाकर प्रवेश ले लो। मैं चकराया। पापा ने मुझे बताये बिना अभियांत्रिकी मे प्रवेश के लिये अर्जी डाल दी थी। उन्हे मालूम था कि मैं मेडिकल मे प्रवेश ना मिलने से निराश हूं और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार नही होंउंगा। दो महीने बाद मैं निराशा से उबर चुका था, और अभियांत्रिकी प्रवेश के लिये तैयार था।

दूसरे दिन मैने संगणक अभियांत्रिकी मे प्रवेश ले लिया और अपने विज्ञान महाविद्यालय को अलविदा कहा । इस दिन एक ऐसी घटना घटी जिसे मै आज भी नही भुला पाया हूं। ये एक लम्बा किस्सा है फिर कभी…।

मैने संगणक विज्ञान क्यो चुना, यह मैं आज भी नही जानता। यह मेरी सूची मे नही था। वैसे भी १९९४ मे यह वरीयता सूची मे यह रसायन अभियांत्रीकी , यांत्रीकी, इलेक्ट्रानिक, दूर संचार अभियांत्रीकी, विद्युत अभियांत्रीकी आदि के बाद आता था। जब मैं प्रवेश के लिये लिपिक के पास खड़ा था तब मेरे सामने सभी विकल्प थे। लेकिन पता नही क्या हुआ और मैने संगणक अभियांत्रीकी मे प्रवेश ले लिया। मेरे सभी मित्रों को आश्चर्य था। मैने उन दिनो एक लेख पढ़ा था “कम्प्युटर रिवोल्युशन“, शायद ये उसका असर था।

अभियांत्रीकी प्रवेश के बाद भी मेरा पढ़ना जारी रहा। राहुल सांकृत्यायन को पढा। “वोल्गा से गंगा तक” ने मुझे काफी प्रभावित किया। राहुल सांकृत्यायन ने मुझे यायावरी का सपना दिखाया ! नागरी सेवा का सपना अपनी जगह था।

खेलो मे मै क्रिकेट खेलता था, लेकिन सचिन बनने का सपना नही देखा था । कालेज की टीम के एक छ्ठे सातवें क्रमांक के बल्लेबाज को सपने देखना भी नही चाहिये। शतंरज मे भी रूची थी लेकिन एक सीमा तक ही ! कुल मिला कर खेलो की दूनिया मे मैने कोई सपना नही देखा था।

समय अपनी रफ्तार से चलता रहा, कालेज के पाठ्यक्रम के साथ और भी बहुत कुछ पढते रहे। अभियांत्रिकी के अंतिम वर्ष मे कुछ ऐसी परिस्थितियां बन गयी कि मुझे एक नौकरी हर हालत मे चाहिये थी। संगणक अभियांत्रिकी का अच्छा समय आ चुका था, ढेर सारी नौकरियाँ थी। अच्छा खासा वेतन था। बिना किसी संघर्ष के नौकरी मिल गयी।

जिन्दगी के संघर्ष मे कुछ ऐसा फंसा कि नागरी सेवा का सपना, सपना ही रह गया। ऐसे भी मै जो नौकरी कर रहा था वो मुझे पसंद थी। नौकरी छोडकर परिक्षा की तैयारी की हिम्मत नही थी, साथ कुछ आलस भी था। यदि मैने नागरी सेवा की परिक्षा दी होती तो मेरे विषय इतिहास और अर्थशास्त्र होते !

अब मै सोचता हूं कि मैने इतने सपने देखे(अंतरिक्षयात्री, चित्रकार, वैज्ञानिक,डाक्टर,नागरी सेवा) लेकिन करियर ऐसे क्षेत्र (कम्प्युटर प्रोग्रामिंग) मे बना जिसके बारे मे कभी सोचा ही नही था! लेकिन आज मुझे अपने वर्तमान करियर से पूरी संतुष्टि है।

बाकी सपने जो अधुरे है, हो सकता है कि भविष्य के गर्भ मे छिपे है, शायद धीरे धीरे पूरे हो जायें । यायावरी का जो सपना था, आज सपना नही है। हर सप्ताह मेरी यायावरी जारी है। काफी घूम चुका हूं देश मे विदेश मे, लेकिन बहुत कुछ बाकी है। एक और छिपा हुआ सपना पढ़ते रहने का जो कभी ना तो रुका था ना रुकेगा ! चित्रकारी के लिये हो सकता है भविष्य मे कभी समय निकल आयें।
मैने जो सपने देखे, कुछ पूरे हुये। कुछ टूटे लेकिन सपने देखना जारी है…..

आये हो तो आँखों में कुछ देर ठहर जाओ
इक उम्र गुज़रती है ,इक ख़्वाब सजाने में।

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6 टिप्पणीयां “मेरे अधुरे सपने” पर
आशीष, बहुत अच्छा भी लिखा है और दिल भी लिखा है.
सभी सपने पूरे हो जायें और देखने को सपने ही न रहें, उससे बुरा क्या हो सकता है? जो सपने अभी तक पूरे नहीं हुए वे भविष्य के लिए तुम्हारा इंतजार करेंगे.
मैं सोचता था कि ऐसी जादू की छड़ी हो जिससे मुझे गणित आ जाये, पर मुझे भी गणित नहीं आया, जब तक गणित का विषय रहा, उसमें मुश्किल से ही पास हो पाया. शायद इसी लिए मेरे मन में डाक्टर बनने की छायी कि इसमें गणित नहीं पड़ना पड़ेगा!
पर यह सच है कि जीवन की एक राह चुनो तो अन्य सब राहें छोड़नी ही पड़ती हैं!
सुनील द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बहुत ही अच्छा लिखा है। सच में मै खो गया और मजा भी आ गया।
e-shadow द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बढ़िया लिखा,हमेशा की तरह!
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 20th, 2006

बहुत अच्छा लिखा है, आशिष भाई.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 21st, 2006

ख्वाब सजते रहें,सपने सवंरते रहें
दुआ है आप आगे बड़ते रहें ।
ratna द्वारा दिनांक मई 21st, 2006

बहुत अच्छा
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 22nd, 2006

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एक और रेल यात्रा

गुरुवार, मई 11, 2006


मैं एक घुमक्कड किस्म का व्यक्ति हूं, एक जगह पर रहना पसंद नही आता। यायावरी का ऐसा भूत सर पर सवार है कि तकरीबन हर सप्ताह कही ना कही चला जाता हूं। यायावरी भी ऐसी कि कभी रेल से , कभी बस से, कभी अपनी फटफटिया से । कुछ यात्राये मेरी पूर्व नियोजित होती है जो कि मै रेल से करता हूं लेकिन अधिकांश पूर्व नियोजित नही होती है।

मेरी यात्राये जो पूर्व नियोजित नही होती अच्छी खासी रोमांचक होती है। एन समय पर रेल आरक्षण मिल गया तो ठीक , नही मिला तो बस से, वह भी नही हुआ तो रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा। जी हां रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा ! मेरे अधिकांश दोस्त ये नही मानते कि मै रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा कर सकता हूं। इसके पिछे कारण यह है कि मेरे दोस्त मुझे एक नाजुक किस्म का इंसान समझते है। मेरी इस छवि के लिये मै ही जिम्मेदार हूं। मै घर के बाहर हमेशा बोतलबंद पानी पीता हुं, अच्छे होटल/रेस्तरां (साफ सुथरे) मे खाना/नास्ता करता हूं। खुली चीजें या सडक किनारे नही खाता। मै ऐसा पहले(कालेज के दिनो मे) नही था, हर जगह हर चीज खा लेता था। बिना साफ सफाई की परवाह किये लेकिन कुछ नही होता था, सब कुछ हजम कर जाता था। शायद शरी्र की प्रतिरोधक क्षमता अच्छी थी लेकिन अब ऐसा नही है । अब तो कभी गलती से यहां वहां का पानी पी लिया तो गला खराब हो जाता है, बाहर खाने के बाद पेट खराब हो जाता है। शायद यह सब रहन सहन के इस आधुनिक जीवन अंदाज के कारण है जहां प्रतिरोधक क्षमता दिनोदिन कम होते जा रही है।

हां तो मै कह रहा था कि मै आज भी रेल के अनारक्षित डिब्बे मे यात्रा करने का हैसला रखता हूं। पिछले दिनो मै अपने गृहनगर गोंदिया से दुर्ग अपनी ननीहाल जा रहा था, एक्सप्रेस रेल से कुल २ घन्टे का सफर था। आरक्षण का तो सवाल ही नही था। बैग उठाया और चल दिये। स्टेशन पहुंचे, रेल आयी। देखा तो होश उड गये, अनारक्षित डिब्बे मे पैर रखने जगह नही। याद किया अपने भूतकाल को, जिस तरह सिनेमाहाल मे नयी फिल्म के जारी होने पर भीड़ भाड़ मे घुस कर टिकट ले आते थे, वह अनुभव यहां काम आया। ना केवल अंदर घुस गये, बल्कि उपर वाली सीट ( पता नही सीटे होती है या सामान रखने के लिये) पर कब्जा कर लिया।

अब आप अपनी कल्पना शक्ति के घोडे दौडाइये, इस दृश्य की कल्पना किजीये। मई के महिने की एक गर्म दोपहर, तापमान ४५ से उपर। विदर्भ/छत्तिसगड के पिछ्डे क्षेत्र से गुजरती हुयी रेल का एक अनारक्षित डिब्बा, जिसमे अपनी क्षमता से तीन गुने यात्री सवार है। रेल के चलने के बाद कोलाहाल शांत हो गया है। किसी के हिलने के लिये भी जगह नही है लेकिन सभी शांत है । अधिकांश यात्री मज़दूर या ग्रामीण है, कुछ मध्यमवर्ग के लोग भी है। यात्रीयो के सामान के नाम पर सूटकेस कम, गठरीया और पोटलियां ज्यादा है ! मै टी-शर्ट और ऐसे पैंट मे हूं, जिसके पांयचे घुटनो से निचे अलग कर बरमुडा बना सकते है। पिठ पर एक पिठ्ठू बैग है, साथ मे आई-पोड है और हाथो मे एक अंग्रेजी उपन्यास (”Five Point Someone”)। उपर की सीट पर मै अपनी दूनिया मे मस्त बैठा हुआ हूं, संगीत और उपन्यास मे मग्न, सारी दूनिया से बेखबर।

रेल अपनी रफ्तार से जा रही थी, मुझे गर्मी महसूस होने लगी थी। सोचा कि चलो अपने पैंट को बरमुडा बना लिया जाये। घुटने पर से चेन खोल कर मैने दोनो पायचे अलग कर दिये और बैग मे रख दिये। इतने मे नीचे से एक हंसी का फव्वारा छुटा मैने नीचे देखा क्या हुआ ? सब मेरी तरफ देख कर हंस रहे थे ! जनता मेरा करामाती पैंट देख के हैरान थी ! एक ग्रामीण ने कहा
“आपका पैंट बढिया है जी, पैंट का पैंट , गर्मी लगी तो हाफ पैंट !”
हंसी का एक और फव्वारा छूटा । इस बार मेरा ठहाका भी शामील था।

इतने मे एक १८-१९ साल का लडके ने कहा
“आप नीचे मेरी जगह पर बैठ जाओ , मै आपकी जगह बैठ जाता हूं।” 
उसे मेरा उपर बैठना अजिब लग रहा होगा, या सोच रहा होगा पता नही ये बेचारा यहां कहां आकर फंस गया है। उसे मुझ पर दया आ गयी थी, मैने उसका प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। मै सोच रहा था कि पढा लिखा होना(दिखना) चलो कहीं तो काम आया !

नीचे आकर बैठा रेल “हाजरा प्रपात” के पास से गुजर रही थी। यह सतपुडा पर्वत श्रंखला की एक प्राग- ऐतिहासिक जगह है जिसकी गुफाओ मे आदिमानव रहा करता था। इस जगह के बारे मे तस्वीरो के साथ पूरा एक चिठ्ठा फीर कभी..

अब जनता की नजर मेरे आईपोड पर थी।
एक ने पूछ ही लिया
“ये क्या है जी? टेप रिकारडर है क्या जी ?”
मैने कहा
“जी, ये टेप रिकार्डर जैसा ही है, लेकिन इसमे कैसेट नही होती है। इसमे ४००० गाने रिकार्ड कर सकते है !”
वह
“बताओ साला क्या जमाना आ गया है,पहले इत्ता बडा ग्रामोफोन आता था, और इत्ता बडा रेकाड आता था ५-६ गाने वाला। अब इसको देखो माचिस का डिब्बे के अंदर ४००० गाने ”
मै मन मे
“अबे मेरे आईपॊड को माचिस का डिब्बा बोला, तेरी तो !”
लेकिन सारी जनता फिर से दिल खोल के हंसी, और हम भी ।

अब मेरा आईपोड हर कीसी के हाथो से गुजर रहा था, सब उलट पूलट के देख रहे थे। मैने इयरफोन उन लोगो को थमा दिये, और आईपोड के बारे मे बताने लगा ! सभी को आश्चर्य हो रहा था। मै शरारत मे कभी कभी आवाज तेज कर देता था ।

“चाय गरम !” 
एक चाय वाला आया। उन लोगो मे से किसी ने चाय ली और एक कप मुझे भी थमा दिया। एक आम भारतीय कितना सरल हृदय होता है, दो मिठे बोल बोल लो और जो चाहे करवा लो। कुछ देर की पहचान और दो मिठे बोल , बदले मे उनके प्यार से भरी वो चाय ।

दुर्ग पास आ गया था, मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे, फिर हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !
मै रेल से उतर के चल दिया था, एक और सुहानी याद लिये, जिसमे ना तो मई की गर्मी की तपिस थी, ना सफर की परेशानी, जिसमे थी वही आम भारतीय हृदय की निश्छलता !
***********************************


12 टिप्पणीयां “एक और रेल यात्रा” पर
वाह आशीष भाई,
बडा सुहाना सफ़र रहा आपके साथ, वो भी गरमी की दोपहर मे. बहुत रोचक लेखनी होती है आपकी सदा.
समीर लाल द्वारा दिनांक मई 11th, 2006

आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.
e-shadow द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

सच में जनता डिब्बे में सब को गले लगाती भारतियता दिखती है और a.c first में स्वंय में सिमटी ,गर्दन टेड़ी किए अँग्रेज़ियत ।
ratna द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

मज़ा आ गया. ऐसी स्थितियों से अनेकों बार गुजरा हूँ, लेकिन शायद इतना अच्छा वर्णन एक बार भी न कर पाऊँ. धन्यवाद!
Hindi Blogger द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

दोस्त, आनंद आ गया आपकी यह पोस्ट पढ़कर। छत्तिसगढ़ की स्मृतियां भी ताज़ा हो गईं।
आशा है आने वाले समय में अन्य संस्मरणों को पढ़ने का आवसर भी प्राप्त होगा।
आभिनव द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

यात्रा विवरण बढिया था !
pratyaksha द्वारा दिनांक मई 12th, 2006

वाह आशीष भाई, बढ़िया अनुभव वर्णित किया है। मैंने तो कभी अपने लोअर की टखनों वाली ज़िप खोल उसे बरमुडा नहीं बनाया, अच्छा ही हुआ!!
और वो हाजरा प्रपात वाली तस्वीरों की पोस्ट के बारे में भूलना नहीं, जल्द ही लिखना।
आनन्‍द आ गया, सच में आम भरतीय जन मानस इतना भोला है तभी तो नेता उन्‍हे इतनी आसानी से बेवकूफ बनाते हैं.
अजी आम जनता तो भोली भाली ही होती है, चाहे भारतीय हो या कहीं और की, और कुछ अति स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए उनके साथ खिलवाड़ करते हैं।
Amit द्वारा दिनांक मई 13th, 2006

बढ़िया बयान किया! तुम्हारे सारे लेख बहुत अच्छे लगते हैं। जनता के पास ऐसे-ऐसे धाँसू डायलाग मिलते हैं कि लगता है क्या अभिव्यक्ति क्षमता है! हमारे एक स्टाफ ने एक दिन दूसरे की बुराई करते हुये कहा-साहब,वो तो ससुरा हैंडपंप है,एकफिट ऊपर तो सौ फिट अंदर। समय के संपन्न होने की प्रक्रिया में लोग जनसामान्य से कटने लगते हैं तथा ऐसे तमाम सहज अनुभवों से वंचित होते जाते हैं। बहरहाल बधाई !लिखने के लिये।
अनूप शुक्ला द्वारा दिनांक मई 14th, 2006

आशीष भाई, मैं पूरा लेख पढ़ने से पहले पूछना चाहता हूँ कि आप अक्सर ी तो ि क्यों लिखते हैं। जैसे पिछे, ठिक, चिज़ आदि
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006

बहुत अच्छा लिखा है आशीष भाई। आप तो उल्टा भी वैसा ही बिना ग़ल्ती किए लिखते हो
‘मैने अपने पैंट के तुकडे फीर से जोड लिये थे,फीर हंसी का एक और फव्वारा छूटा था !’
रजनीश मंगला द्वारा दिनांक मई 18th, 2006

[…] सांय 5 बजे के करीब मेरे मोबाईल का अलार्म बज उ� ा और मैंने उ� के देखा कि मैं लगभग पाँच घंटे सोया हूँ, इसलिए काफ़ी हद तक तरोताज़ा महसूस कर रहा था। बाकि लोग पहले ही उ� गए थे। तत्पश्चात नीचे गंगा स्नान के लिए जाने का निर्णय हुआ। अब डुबकी लगाने के लिए मैं तैराकी के वस्त्र आदि तो लाया न था, इसलिए जो कपड़े रात को पहने सफ़र किया था, वो ही पहन लिए। जो लोअर पहन रखा था, घुटनों से उसकी ज़िप खोल दो तो वह बरमुडा बन जाता था, � ीक आशीष भाई की पैन्ट की तरह!! तो बस टखने से निचले हिस्से को अलग किया और चल दिए नीचे गंगा स्नान के लिए। […]
world from my eyes - दुनिया मेरी नज़र से!! » ए वीकेन्ड इन � षिकेश - भाग २ द्वारा दिनांक मई 26th, 2006

[…] अब रविरतलामी के तथा अन्य दोस्तों के फरमाइशी आदेश ,अमित की हरिद्वार-श्रषिकेश यात्रा विवरण,आशीष के रोचक हाफ पैंट-फुल पैंट विवरण तथा इससे पहले विजय वडनेरे के सिंगापुर विवरण तथा सुनील दीपक जी के इधर-उधर भ्रमण के विवरण ने फिर से हमें अपने यात्रा विवरण लिखने के पानी पर चढ़ाया है। […]
फ़ुरसतिया » अजीब इत्तफाक है… द्वारा दिनांक जून 5th, 2006

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मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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