27 सितंबर 2026, यह वह तारीख है जब मैं जीवन के अर्ध शतक पर दस्तक दे रहा हूं और पहली मैराथन पूरी की है। मेरे इस कारनामे पर मेरे बचपन के मित्रों को आश्चर्य हो रहा होगा, उन्हें यकीन कर पाना मुश्किल हो रहा होगा कि खेल कूद, दौड़ धूप में फिसड्डी रहने वाला अब मैराथन पूरी कर रहा है।पिछले दस वर्ष से अर्ध मैराथन मे भाग ले रहा हुं। साल मे कम से कम एक से दो अर्ध मैराथन हो ही जाती है। इससे अधिक कभी कोशिश नही की।2016 में पहली बार अर्ध मैराथन पूरी की थी , जबकि एक बरस पहले 2015 में दस किम…
और पढ़ेंगहरी नींद सोया था, अलेक्सा ने जगा दिया। तैयार हुए , हल्का गर्म पानी पिया, चाय बनाई और पी।दौड़ने के लिए निकल लिए। फोन में म्यूजिक प्लेयर चालू किया। रात को नुसरत फतेह अली खान सुन रहे थे, वही शुरू हो गए ...ये जो हल्का हल्का सुरूर है ...
सुबह सुबह और सुरूर ... खैर जेब से फोन निकाल कर गाना बदलने का मूड नही हुआ, चलने दिया।हल्का अंधेरा था। पूरब में लालिमा थी , इक्का दुक्का तारे भी दिख रहे थे। याद आया कि कल ही असिमोव की "रोबोट्स ऑफ डॉन" खत्म की है, अगला उपन्यास "रोबोट्स…
विज्ञान फ़ंताशी मेरा फेवरेट जॉनर है। फाउंडेशन, ड्यून , स्टार ट्रेक, स्टार वार पढ़े और देखे है।
लगभग सारी विज्ञान फ़ंताशी गाथाओं में लोकतंत्र पर गंभीर चिंतन हुआ है। यहां पर मैं लोकतंत्र और विज्ञान फ़ंताशी पर संक्षिप्त लेकिन व्यावहारिक दृष्टिपात कर रहा हूं, मैने मुख्य तौर पर फ़ाउंडेशन, स्टार ट्रेक, स्टार वार्स और ड्यून का संदर्भ लिया है।
विज्ञान कथाओं में लोकतंत्र
विज्ञान कथाएँ अक्सर उन्नत तकनीक, अंतरतारकीय साम्राज्यों, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और परग्रही सभ्यताओं जैसी भविष्य की चुनौत…
हम सर्वाहारी है। हर वो चीज खा सकते है जो परोसी गई हो। फिर भी अब तक बीफ और पोर्क से दूर रहे है।कारण यही है कि जिस माहौल में पले, बढ़े उसमे ये दोनों चीजे खाने की मनाही थी, वही बाद में रूढ़ी हो गई और इन्हें खाने की कभी इच्छा नहीं हुई, बस कोई विकल्प खोज कर खा लिया।एक लम्बा अरसा विदेशों में बिताया है। इस दौरान अकेला रहा हूं या निवेदिता के साथ, लंच अधिकतर घर से टिफिन में ले जाता रहा हूं।ऑफिस में अधिकतर शाकाहारी लंच ही ले कर जाता रहा हूं। इस दौरान कई बार ऐसा हुआ है कि भारत से कोई …
और पढ़ेंआजकल लगभग रोज हाथी से ऑफिस आ रहे है। बचपन में कभी सोचा नहीं था कि कभी एक क्रूजर जैसी बाइक चलाएंगे, सोचना तो दूर जानते ही नहीं थे कि बाइक के भी प्रकार होते है। होशवाला बचपन 80 के दशक और 90 के दशक के शुरुवात का है, उस समय बाइक मतलब राजदूत और बुलेट! कभी कभार भूले भटके येजदी और जावा दिख जाती थी। हीरो होंडा, टीवीएस सुजुकी और कावासाकी बजाज का ज़माना आया नहीं था। बाइक से सबसे पहला वास्ता 12 की परीक्षाओ में पड़ा था। उस समय हम स्कूल साइकिल से जिला परिषद ज्युनियर कॉलेज आमगांव जाते थ…
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