निधीजी के चिठ्ठे पर एक मजनू के बारे मे पढा, मेरे आस पास तो मजनूओ की भरमार रही है। सोचा चलो एक के बाद एक मजनूओ के किस्से लिखना शुरू कर दे।
ये किस्सा है उन दिनो का जब मै नया नया दिल्ली पहुंचा था। हम लोग कुल आठ लोग एक ही फ्लैट मे काल्काजी मे रहते थे। सभी के सभी नागपूर और उसके आसपास के क्षेत्र से थे। कुछ नौकरी करते थे, कुछ सघर्ष कर रहे थे। फ्लैट का खर्च नौकरीशुदा लोगो की जिम्मेदारी थी। जो संघर्ष कर रहे थे, उनका एक काम था, दिन मे अपना बायोडाटा बांटना, साक्षात्कार देना और रात मे…
वह अपने अपार्टमेंट की बालकनी मे अकेले खडा़ तारों को घूर रहा था। संजय पीछे कब आया उसे पता ही नही चला।
संजय : "यहाँ अकेले क्या कर रहा है, तू ठीक तो है ना ?"
वह : "सितारों मे अपनी महबूबा ढूंढ रहा हूं! कोई पसंद ही नही आ रही!"
"बातें मत बना, दो दिन से तू उखड़ा - उखड़ा है, सब दिखता है , तू कितने भी ठहाके लगा ले, तेरी आंखे चुगली कर देती है कि तू परेशान है। क्या हुआ बे?"
"अबे रूम मे इतने सारे दुःखी आत्मा पहले से है, देवदास, पंडित और कमलेश पहले से इश्क क…
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