मेरे प्राथमिक स्कूल का नाम : हिन्दी पूर्व माध्यमिक शाला झालिया महाराष्ट्र के गोंदिया जिले के चुनिंदा सरकारी हिन्दी माध्यम के स्कूलों मे से एक। अधिकतर स्कूल मराठी माध्यम के हुआ करते थे। यह स्कूल कक्षा 1 से कक्षा 7 तक का(पूर्व माध्यमिक) था। जब तक हम कक्षा पाँच पहुंचे , हर कक्षा मे दो सेक्शन हो गए थे। लेकिन कुल कमरे पाँच ही थे, दो छप्पर मिलाकर भी 7 ही होते थे, कक्षाएं दोगुनी! इसलिए पाठशाला दो पारीयों मे लगने लगी थी। कक्षा 1 से 4 सुबह की पारी में सुबह साढ़े सात से ग्यारह तक, क…
और पढ़ें22 वर्षो के अपने करियर में मैंने अब तक चार कम्पनियों में नौकरी की है। इस इंडस्ट्री में यह आंकड़ा बहुत कम है। जिसमे पहली नौकरी मजबूरी की थी, जो पैसे दे दिए उसी में नौकरी ले कर ली थी। जैसे ही हालात ठीक हुए दूसरी नौकरी खोजी, अपनी शर्तो पर, लेकिन मुंबई से दूर दिल्ली में।
दूसरी नौकरी ने बहुत कुछ सिखाया। मेरे करियर की नींव बनाई। हमने भी एक साल में ऐसा काम किया कि डेढ़ बरस तक तीन बार वेतनवृद्धी मिली, वेतन दोगुने से अधिक हो गया था। लेकिन मैनेजमेंट के कुछ ग़लत निर्णय, डाट काम बबल के …
रात के दस बजे, अचानक फोन बजा। फोन उठाने से पहले कट गया। नम्बर देखा, अनजाना था। फोन में इतिहास देखा , पता चला कि पिछले सप्ताह तीन मिस कॉल थे। आम तौर पर अनजाने नम्बर से आये मिसकॉल पर मैं वापस काल नही करता। अपनी जासूसी आरम्भ की, दो मिनट में पता कर लिया कि महाराष्ट्र से किसी राम का फोन है। नाम से फिर भी ढंग से याद नही आया।
सोचा काल बैक करते है, नम्बर पहुँच के बाहर। दोबारा मिस कॉल आई। काल बैक की तो नम्बर फिर से पहुंच के बाहर। तीसरी बार में रिंग गई।
बन्दे ने फोन उठाया। हमने पूछा …
हमारा बचपन ठेठ गाँव में बीता है। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ की सीमा के पास महाराष्ट्र के गोंदिया जिले में झालिया गांव! आदिवासी , नक्सली तहसील सालेकसा का गाँव। स्कूली शिक्षण भी पहली से सांतवी तक हिंदी माध्यम में झालिया के सरकारी प्राथमिक स्कूल में पढ़ी, उसके बाद बगल के गाँव कावराबांध से आंठवी से दसंवी पढ़ी। इसी स्कूल में पापा भी गणित और विज्ञान पढ़ाते थे।
कक्षा 11 और 12 पड़ोस के कस्बे आमगांव के सरकारी स्कूल से की, विज्ञान लिया था जोकि महाराष्ट्र में केवल अंग्रेजी माध्यम में …
बैंगलोर से हवाई-ट्रेन और टैक्सी यात्रा कर घर पहुंचे। घर पहुंचते तक अहसास हो गया था कि बैंगलोर की तुलना मे गोंदिया मे ठंड ज्यादा है, घर मे थर्मामीटर देखा 6 डीग्री सेल्सीयस। थर्मामीटर देखकर शरीर पर कपड़ो की एक परत और चढ़ा ली। यात्रा से आने के बाद का स्नान वाला इरादा त्याग दिया गया।
गर्मा गरम खाना तैयार था, जिसका भोग घर के सामने के आंगन मे सर्दी की गुनगुनी धूप मे बैठकर लगाया गया। गोंदिया वाले घर मे सबसे ज्यादा खुश गार्गी थी, बैंगलोर के दड़बेनुमा दो कमरे के घर की तुलना मे ये बड़ा स…
सामान्यत: दिसंबर मे मेरे पास काम कम होता है, इसलिये पहले से योजना बना कर रखी थी कि इस वर्ष छुट्टीयाँ दिसंबर मे ली जायेंगी। वैसे भी मै जिस प्रोजेक्ट मे काम कर रहा था उसमे दिसंबर मे क्रिसमस के आसपास दो सप्ताह तक काम बंद रहता है और सभी को छुट्टीयाँ लेनी होती है। सब कुछ योजना के अंतर्गत ही चल रहा था लेकिन अक्टूबर मे मेरे पास अपना प्रोजेक्ट बदलने का अवसर आया, नया प्रोजेक्ट चुनौती पुर्ण और करीयर के लिये महत्वपूर्ण था तो सोचा कि इस चुनौती को स्वीकार कर लिया जाये। अब दिसंबर की छुट्…
और पढ़ेंअंग्रेजी एक लंबे समय तक मेरे लिये हौवा रही है।इस विदेशी भाषा से लढने और काबू पाने के लिये मुझे एक अरसा लग गया। इस भूत को मैने कैसे काबू मे किया, यह एक लंबी कहानी है....
मेरा बचपन एक गाँव मे बीता है जोकि जिल्हा मुख्यालय से 30 किमी दूरी पर था। गाँव मे आधुनिक सुविधाओं के नाम पर ज़्यादा कुछ नही था, लेकिन बिजली थी, आवागमन के लिये दिन मे राज्य परिवहन निगम की बसे कुछ घंटो के अंतराल पर थी। गाँव के लोग उच्च शिक्षित तो नही थे लेकिन अधिकतर लोग साक्षर थे और अनपढ़ो की संख्या अपेक्षतः स…
मेरा गांव जहां मेरा सारा बचपन और किशोरावस्था बीता एक आम भारतीय गांव था। गांव के पश्चिम मे पाठशाला थी ,उसके बाद एक बड़ा सा मैदान। इस मैदान को ‘झंडा टेकरा’ कहा जाता था। पाठशाला के पीछे एक पहाड़ी, पहाड़ी और ‘झंडा टेकरा’ को विभाजित करती हुयी एक नहर। गांव के उत्तर मे था एक बडा बरगद का पेड़ और उसके पिछे एक बड़ा सा तालाब। बरगद के पेड़ और गांव को अलग करती एक पक्की सडक।
ये बरगद का पेड़ गांव का हृदय-स्थल था, ये बस स्थानक तो था ही साथ मे चौपाल का भी कार्य करता था। गांव के सारे के सारे…
ये किस्से उस समय के है जब मै प्राथमिक पाठ्शाला मे था। हम महाराष्ट्र के गोंदिया जिले मे एक गांव झालिया मे रहते थे, गांव के बाहर थी हमारी पाठशाला। पाठशाला के ठीक सामने एक बडा सा मैदान और एक कुंआ। एक तरफ ध्वजस्तंभ,जिसका प्रयोग साल मे दो बार १५ अगस्त और २६ जनवरी को होता था। पाठशाला के एक तरफ थी,पानी की नहर, पीछे एक छोटी सी पहाड़ी।
पाठशाला की इमारत का निर्माण इस तरह से किया गया था कि किसी भी कक्षा मे प्रवेश करने के लिये तीन सीढीया चढनी होती थी। पाठशाला का समय होता था ११ बजे सुबह…
आज गुरु पूर्णिमा है, वेद व्यास का जन्मदिन ! गुरु पूर्णिमा एक ऐसा पर्व है जिसमें हम अपने गुरुजनों, श्रेष्ठजनों व माता-पिता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं तथा उनका आदर करते है।
इस दिन के साथ बचपन की काफी सारी खट्टी मीठी यादे जुड़ीं हुयी हैं। मुझे याद है कि मेरा स्कूल मे प्रवेश इसी दिन कराया गया था। सुबह कलम -पाटी पूजा हुयी थी, तिलक लगाया गया था। पाटी पर एक बड़ा सा ॐ बनाया गया था। एक मंत्र भी पढ़ा गया था
ॐ नमः सिद्धम ।
ॐ नमः सिद्धम । इस मंत्र से याद आया कि हमारे गांव मे एक …
“रांग नंबर” यह फोन पर वार्ता का सबसे मह्त्वपूर्ण शब्द है। ऐसे तो हमारे फोन इतिहास मे ना जाने कितने रांग नंबर आते है ,लेकिन कुछ रांग नम्बर हमेशा याद रह जाते है…
ऐसा ही एक रांग नम्बर मुझे आया था।
एक घनघोर अंधेरी रात, बारिश हो रही थी और बिजली जा चुकी थी। बिजली जाने पर हमेशा की तरह मै मोमबत्ती ढूंढ रहा था।वैसे भी मुझे मोमबत्ती हमेशा बिजली आ जाने के बाद ही मिलती है। मै मोमबत्ती शोध मुहिम मे व्यस्त था कि मेरा फोन बजा। फोन उठाने पर एक कर्णप्रिय मधुर आवाज आयी
“हैलो, बिजली आफिस ”
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