लालु और सूअर का बच्चा
लालुजी अपने ड्रायवर के साथ एक बार कार से जा रहे थे। एक गांव से पहले उनकी कार के निचे एक सूअर का बच्चा कुचल कर मर गया। लालुजी दुखी हुये। ड्रायवर को कुछ पैसे दिये और कहा कि “गांव मे जाओ और सूअर के मालिक को मुआवजा दे आओ”
ड्रायवर पैसे लेकर गांव चला गया। एक घंटा बीत गया, दो घंटे बीत गये ड्रायवर वापिस नही आया। लालुजी बैचेनी से टहलते रहे। तिसरे घंटे के आखिर मे ड्रायवर एक बोरा सिर पर लादे आते दिखा। पास आने पर लालुजी ने पूछा “का रे ड्रायबर , अतना देर काहे लगा दि…
बहुत पुरानी बात है, जब हम प्राथमिक स्कूल के छात्र थे। हमारा एक सहपाठी था मुन्नाभाई!
मुन्नाभाई हमारी कक्षा का नेता था, मतलब कि कक्षा कप्तान था। स्कूल के उसके दैनिक कार्यो मे होता था, सुबह सबसे पहले पहुंच कर दरीयों पर कब्जा करना। जी हां आपने सही पढा दरीयों पर कब्जा करना। हमारे स्कूल मे डेस्क बेंच नाम की वस्तुएँ नही हुआ करती थी। १०-१२ फुट लंबी और एक फुट चौडी दरीयां, दरीयां छात्रों की संख्या के हिसाब से उसी तरह कम हुआ करती थी, जिस तरह आई आई टी और आई आई एम की सीटें कम होती है। म…
इस विषयपर लिखने के लिये मूझे किसी चेतावनी या नोटीस देने की जरूरत नही है। धर्म पर लिखा गयी कोई भी लेख आपत्तिजनक नही हो सकता है। यदि वह लेख धर्म मानने वालो को आपत्तीजनक लगता है, इसका अर्थ यह है लेखक और पाठक दोनो मे से किसी एक को या दोनो को धर्म की जानकारी नही है। अज्ञान की कोई सजा नही होती है।
मेरे जिवन पर धर्म का क्या प्रभाव है, इस विषय पर मेरे अलावा भी मेरे आसपास के हर क़रीबी व्यक्ति का भी अलग मत हो सकता है। मेरे मित्र मुझे नास्तिक मानते है। मेरे परिवार के व्यक्ति मुझे नास्…
आदर्शवादी संस्कार सही या गलत इस पर विचार करने से पहले यह निश्चीत कर लिया जाये की, आदर्श की परिभाषा क्या हो ?
आदर्श परिवर्तनशील है। आदर्श भी सामाजिक मान्यताओ परंपराओ की तरह काल, व्यक्ति , परिस्थीती और समाज के अनुरूप बदलता रहता है। जो कल आदर्श था, आवश्यक नही कि वह आज आदर्श हो। आवश्यक नही कि जो किसी एक व्यक्ति के लिये आदर्श हो, दुसरे के लिये आदर्श हो।
पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्म्द गौरी को २१ बार क्षमा किया था, यह व्यव्हार पृथ्वीराज चौहान के लिये उस समय की मान्यताओ के लिये आदर्श …
हम फिल्मे क्यों देखते है ? अरे भाई मै तो सिर्फ अपने बारे मे बता सकता हुं कि मै फिल्मे क्यों देखता हुं। भगवान की दया से अब तक क्वांरा हु और कोई महिला मित्र है नही, इसलिये अकेले ही देखता हुं। एक जमाना था जब हम यारो के साथ फिल्मे देखा करते थेहै। वैसे यारो के साथ फिल्मे कहां देखते थे, हंगामा करते थे, नैन सुख लेते थे, पॊप कार्न खाते थे और ठंडा पीते थे। मतलब कुल जमा चित्रपट गृह मे फ़िल्म देखने के अलावा हर वो हरकत करते थे जो नयी नयी जवानी मे की जाती है।
फिल्मे अब भी देखते है लेकिन …
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