जिन्दगी

शनिवार, जुलाई 23, 2005

जिन्दगी

एक शाम
बैठा था एकान्त में
गुनगुना रहा था
वही पुराना एक तराना
मै और मेरी जिन्दगी .

अचानक मन मे उठा
एक सवाल
उससे जुङे फ़िर अनेकों सवाल
क्या इन्ही सवालो का
नाम है जिन्दगी ?
या इन सवालो का जवाब
है जिन्दगी ?

मैने देखा है
अपने खूबसूरत कल का एक सपना
क्या यही है जिन्दगी ?
या अपने ख्वाबो को पा लेना
है जिन्दगी ?

अपनी मंजिल की ओर हर कदम
है मेरी जिन्दगी
कोई पडाव नहीं
एक सफर है मेरी जिन्दगी.

1 comments:

अनूप शुक्ला रविवार, जुलाई 31, 2005 7:07:00 pm  

भइये, ये क्या हो रहा है कि प्रेमचंद वाली पोस्ट पर टिप्पणी चिपक ही नहीं रही है।बहुत बढ़िया लगा बहाने पढ़ना-शादी करने के।एक ये भी जोड़ दो-ब्लागर पीछे पड़े थे कि शादी करके विवाहित
जीवन के अनुभव लिखो सो विवाहगति को प्राप्त हो गया।

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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