घड़ी के कांटो में फंसी जिंदगी

रविवार, जून 28, 2020

रोज सुबह दो काम होते है गार्गी को स्कूल के लिए तैयार करना और जॉगिंग। सुबह 5:30 उठ जाते है।

अलेक्सा को बता रखा है कि सुबह जगा दे लेकिन हम उससे पहले उठ जाते है।

सोमवार से शुक्रवार तक तक ठीक है। शनिवार , रविवार छूट्टी रहती है तो सोते समय सोचते है कि कल सुबह देर से उठेंगे। अलेक्सा को भी मना कर देते है।

लेकिन 5:30 हुए कि नींद खुल जाती है। बाजू से आवाज आती है सो जाओ। करवट बदलते है, चादर खींचते है कि पेट से आवाज आती है कि उठ जाओ।

मजबूरन उठना पड़ता है। अब बाथरूम में सोचते है कि आज जॉगिंग नही जाएंगे।

नीचे आकर पानी पीते है, चाय बनाते है कि बाहर का नजारा देख कर लगता है चलो यार एक किमी दौड़ लेते है। वो एक किमी कब पांच छह किमी हो जाता है, पता ही नही चलता।

ये भी एक लत है। मशीनी घड़ी के साथ जैविक घड़ी के कांटो में फंसी जिंदगी। साथ में जॉगिंग से निकलने वाले हार्मोनों का नशा, जो ना मिले तो लगता है कि आज कुछ मिसिंग है।

मेरे बारे मे

Ashish Shrivastava
सूचना प्रौद्योगिकी मे 20 वर्षो से कार्यरत। विज्ञान पर शौकीया लेखन : विज्ञान आधारित ब्लाग विज्ञान विश्व तथा खगोल शास्त्र को समर्पित अंतरिक्ष । एक संशयवादी(Skeptic)व्यक्तित्व!
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